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Date : 27-May-2022
Index

देन
कथा :
रहीम खानखाना अकबर के नौ रत्नों में एक थे । अकबर उनसे बड़ा खुश था और बहुत जमीन-जायदादें दीं । करोड़ों रुपया उन्हें भेंट किया । वह जैसा उनके पास पैसा आता था ऐसे ही वे लुटा भी देते थे । मरे तो भिखारी थे । करोड़ों रुपये आए-गए उनके हाथ में, लेकिन जो आया--बांटा । बांटने में कभी रुके नहीं । ऐसा बांटा कि शायद अकबर भी थोड़ा ईष्यालु हो उठता था ।
कहते हैं गंग कवि ने एक दोहा कहा । इतने खुश हो गए रहीम, कि छत्तीस लाख रुपये, एक-दो कोड़ियों में, बोरों में बंधवाकर चुपचाप रातोंरात गंग कवि के घर भेज दिए, किसी को पता न चले । गंग बहुत हैरान हुआ तो गंग ने एक पद लिखा -
सीखे कहां नवाबज्यू ऐसी देनी देन
ज्यों-ज्यों कर ऊंचो करौ त्यों-त्यों नीचे नैन
यह देना कहां से सीखे ? यह नवाबी कहां सीखी ? यह सम्राट होना कहां सीखा ? देनेवाले बहुत देखे, लेकिन रात चोरी से अंधेरे में... । अंधेरे में तो लोग चुराने आते हैं, देने कोई आता है ? किसी को पता न चले--ऐसी देनी देन । देनेवाला तो अकड़कर खड़ा हो जाता है । सारे संसार को दिखलाना चाहता है । और तुम, जैसे-जैसे तुम्हारा हाथ ऊंचा होता जाता है, देने की क्षमता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे आंख नीची होती जाती है । रहीम ने इसके उत्तर में एक दोहा लिखा -
देनहार कोऊ और है भेजत सो दिन-रैन
लोग भरम हम पे करें याते नीचे नैन
देनेवाला कोई और है, जो दिन-रात भेज रहा है और लोग शक हम पर करते हैं; इसलिए आंखें नीची हैं । इसलिए देने में संकोच है । क्योंकि लोग सोचेंगे, हमने दिया । यह परमात्मा की धारणा का लाभ है ।
लाओत्सु -- सफलता चाही, विफलता मिलेगी । अगर सचमुच सफलता चाहिए हो, सफलता चाहना ही मत; फिर तुम्हें कोई विफल नहीं कर सकता ।
एक बहुत बड़ा धनपति निकोडेमस, जीसस के पास गया और जीसस से उस युवक निकोडेमस ने कहा, तुम्हारे प्रभु के राज्य की चर्चा मैं सुना हूं; मेरे मन में भी लोभ उठता है, मैं उसमें प्रवेश पा सकूंगा या नहीं? तो जीसस ने कहा कि तेरी योग्यता क्या है? तो निकोडेमस ने कहा कि न मैं चोरी करता हूं, न मैं व्यभिचारी हूं, न मैं शराब पीता हूं, न मैं मांसाहार करता हूं--और क्या चाहिए? जिन-जिन सदगुणों की चर्चा है शास्त्रों में, सब मुझमें हैं । जीसस ने कहा, इनसे काम न चलेगा; तू जा और अपनी संपत्ति बांट आ ।
निकोडेमस ने कहा, फिर मुझे विचार करना पड़ेगा । क्योंकि न मैं मांसाहार करता हूं, न मैं शराब पीता हूं, न मैं व्यभिचारी हूं, शास्त्र का नियमित अध्ययन करता हूं, पूजा-प्रार्थना करता हूं, गिरजा, मंदिर जाता हूं, सभी पवित्र उत्सव में सम्मिलित होता हूं--और क्या चाहिए? जीसस ने कहा, इस सबसे कुछ काम न चलेगा । तेरे पास जो धन है, वह तू सब बांट आ । निकोडेमस ने कहा, तब तो बड़ी कठिन बात है ।
और निकोडेमस की जगह कोई भी होता हममें से, तो यही कहता । हम भी सस्ते धर्म कर लेते हैं । न मांसाहार करते हैं, न शराब पीते हैं; ये सस्ते धर्म हैं । इनके न करने से कुछ हल नहीं होता, लेकिन इनके करने से नुकसान होता है । न करने से कोई फायदा नहीं होता ।
इसे थोड़ा ठीक से समझ लें ।
इनके करने से नुकसान होता है । इनके करने में पाप है, इनके न करने में पुण्य बिलकुल नहीं है । अगर आप एक गड्ढ़े में गिर जाएं, तो पैर टूटता है । लेकिन गड्ढ़े में न गिरें, तो कुछ उपलब्धि नहीं होती । कि आप कहें कि मैं किसी गड्ढ़े में नहीं गिरा, बस काफी है--तो स्वर्ग का द्वार कहां है । गड्ढ़े में गिरने से पैर टूटता है, उसकी तकलीफ भोगनी पड़ती है । लेकिन गड्ढ़े में नहीं गिरे आप, तो इससे कुछ उपलब्धि नहीं हो गई । इससे कोई गुणवत्ता पैदा नहीं हो गई, कोई पात्रता पैदा नहीं हो गई । यह निषेधात्मक है । कोई मांसाहार करता है, तो नुकसान उठाता है, शराब पीता है, तो नुकसान उठाता है, लेकिन न पीने से कोई फायदा नहीं होता । इसलिए अगर कोई इस तरह के सस्ते धर्म पूरे कर रहा हो, तो ठीक से समझ लें । नुकसान से बचेगा, फायदा बिलकुल नहीं होगा । नुकसान से बच गए, इतना ही क्या कम है? मगर उससे ज्यादा मत मांगना ।
जीसस ने कहा कि जो तेरे पास है, तू सब छोड़कर आ । क्योंकि जो बचाएगा, उससे छीन लिया जाता है और जो सब छोड़ देता है, उससे छीनने का कोई उपाय नहीं । मैं तुझे असली में समृद्ध होने का रास्ता बता रहा हूं । लेकिन तू अपने हाथ से गरीब है, तू पकड़े हुए है । निकोडेमस वापस लौट गया । यह उसके बस की बात न थी ।
अगर दान की कुंजी समझ में न आई, तो धर्म के द्वार पर आप बड़े उदास खड़े हो जाएंगे, बड़े पीड़ा से भरे, जैसे अब लुटने के करीब हैं, सब लुटा जा रहा है ।
ओ प्रसन्न तीर्थयात्री ! अगर तेरे पास दान की कुंजी है, तो दान के द्वार पर तू प्रसन्नता से भर जाएगा । अन्यथा दुख से, पीड़ा से भरेगा क्योंकि वहां छिनेगा सब ।
सराय
कथा :
इब्राहीम सम्राट था बल्ख का । एक फकीर उसके द्वार पर आया और झंझट करने लगा कि मुझे इस महल में ठहरना है । लेकिन वह 'महल' नहीं कह रहा था । वह कहता था, यह 'सराय' में मुझे ठहरना है । बड़े जोर-जोर से लड़ रहा था वह पहरेदार से । पहरेदार ने कहा, हजार दफे कह दिया यह धर्मशाला नहीं, सराय नहीं । सराय गांव में दूसरी है । यह राजा का महल है । यह राजा का खुद का निवास है । तुम होश में हो ? तुम क्या बातें कर रहे हो ? यह कोई ठहरने की जगह नहीं । तो उसने कहा, फिर मैं राजा को देखना चाहता हूं । इब्राहीम भी भीतर से सुन रहा था--बड़े जोर से । और उस फकीर की आवाज में कुछ जादू था, कुछ चोट थी ।
वह जिस ढंग से कह रहा था, ऐसा नहीं लगता था कि सिर्फ जिद्दी, कोई पागल है । उसके कहने में कुछ रहस्य मालूम होता था । उसने कहा, उसे बुलाओ भीतर ।
वह फकीर भीतर आया और उसने कहा, 'कौन राजा है ? तुम !' वह सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा कि साफ है कि मैं राजा हूं । और यह मेरा निवास है और तुम व्यर्थ पहरेदार से झंझट कर रहे हो ।
उसने कहा, बड़ी हैरानी की बात है ! मैं पहले भी आया था, तब एक दूसरा आदमी इस सिंहासन पर बैठा था और वह भी यही कहता था ।
उस राजा ने कहा, वे मेरे पिता थे, वे अब स्वर्गवासी हो गये । उसने कहा, उनके पहले भी मैं आया था, तब एक तीसरा ही आदमी बैठा था । और हर बार पहरेदार भी बदल जाते हैं । आदमी भी बदल जाते हैं । यह मकान वही है । और हर बार जब मैं आता हूं, तब यही झंझट ! उसने कहा, वे हमारे पिता के पिता थे, वे भी स्वर्गवासी हो गये ।
तो उसने इब्राहीम से पूछा -- जब मैं चौथी बार आऊंगा, तुम मुझे यहां मिलोगे, इस सिंहासन पर, कि फिर कोई और मिलेगा ? जब इतने लोग यहां बदलते जाते हैं, इसलिए तो मैं कहता हूं यह सराय है, धर्मशाला है । तुम भी टिके हो थोड़ी देर; मेरे टिक जाने में क्या बिगड़ रहा है ? सुबह हुई, तुम भी चल पड़ोगे, हम भी चल पड़ेंगे ।
कहते हैं इब्राहीम को बोध हुआ । वह सिंहासन से नीचे उतर आया और उसने कहा कि तूने मुझे जगा दिया । अब तू रुक, मैं चला । अब यहां रुककर भी क्या करना है ! जहां से सुबह जाना पड़ेगा, इतनी देर भी क्यों गंवानी !
इब्राहीम ने छोड़ दिया राजमहल । इब्राहीम सूफियों का एक बड़ा फकीर हो गया ।
मूढ़ और बुद्धपुरुषों में एक समानता है । बुद्धपुरुषों के लिए कोई समस्या नहीं रही, मूढ़ों के लिए अभी समस्या उठी ही नहीं ।
मालिक
कथा :
एक सूफी फकीर अपने विद्यार्थियों को लेकर जा रहा था और राह पर उसने देखा कि एक आदमी गाय को रस्सी से बांधे खींचे लिये जा रहा है । तो उसने अपने विद्यार्थियों को कहा, घेर लो इस आदमी को, एक शिक्षा देनी है । वह आदमी भी थोड़ा चौंका, लेकिन अवाक खड़ा रह गया कि क्या मामला है, क्या शिक्षा है । वह सूफी फकीर ने अपने शिष्यों से पूछा 'मैं तुमसे पूछता हूं कि इनमें गुलाम कौन किसका है ? यह आदमी इस गाय का गुलाम है कि गाय इस आदमी की गुलाम ?' स्वभावतः शिष्यों ने कहा कि गाय इस आदमी की गुलाम है, क्योंकि इस आदमी के हाथ में गाय की रस्सी है और यह जहां चाहे वहां ले जा सकता है । सूफी फकीर ने कहा, तुमने बहुत ऊपर से देखा । अब ऐसा समझो कि हम यह रस्सी बीच से काट दें तो गाय इस आदमी के पीछे जायेगी कि यह आदमी इस गाय के पीछे जायेगा ? उन्होंने कहा, अगर रस्सी काट दी तो गाय तो इस आदमी के पीछे जानेवाली नहीं; यह तो रस्सी में भी मुश्किल से जाती मालूम पड़ रही है । यह आदमी ही गाय के पीछे जायेगा ।
तो उस फकीर ने कहा, रस्सी के धोखे में मत पड़ो ! इस गाय को इस आदमी से कुछ लेना-देना नहीं है । इस गाय ने कोई तादात्म्य इस आदमी से नहीं बनाया है; इस आदमी ने तादात्म्य बनाया है गाय से । तो गुलाम यह आदमी है, गाय नहीं ।
परमात्मा के लिए कोई प्रमाण नहीं है; है और प्रमाण नहीं है । प्रेम के लिए कोई प्रमाण नहीं है; है और प्रमाण नहीं है । सौंदर्य के लिए कोई प्रमाण नहीं है; है और प्रमाण नहीं है । अगर मैं कहूं देखो ये खजूर के वृक्ष कैसे सुंदर हैं, और तुम कहो, 'हमें तो कोई सौंदर्य दिखायी नहीं पड़ता । वृक्ष जैसे वृक्ष हैं । सिद्ध करें ।' मुश्किल हो जायेगी । कैसे सिद्ध करें कि सुंदर हैं ! सुंदर होने के लिए सौंदर्य की परख चाहिए -- और तो कोई उपाय नहीं । आंख चाहिए, और तो कोई उपाय नहीं ।
गुरजिएफ तिफलिस के गांव के पास ठहरा हुआ है कुछ मित्रों को लेकर। और उसने उनको कहा है कि मैं तुमसे एक प्रयोग करवा रहा हूं, 'stop exercise'। मैं जब कहूं, stop, रुको, तो तुम रुक जाना जैसे भी होओ। अगर तुमने एक पैर ऊपर उठाया है चलने के लिए, तो वह पैर फिर वहीं रह जाए। फिर बेईमानी मत करना; क्योंकि बेईमानी तुम्हारे अपने साथ होगी। नीचे मत रखना, वहीं रुक जाना। गिर जाओ भला, लेकिन सचेतन, अपनी तरफ से पैर वहीं रखना। गिर जाओ, दूसरी बात। लेकिन तुम पैर नीचे मत टिकाना। मुंह खोला है बोलने को, तो फिर खुला ही रह जाए, जब कहा, stop। हाथ उठाया काम के लिए, हाथ वहीं रह जाए। आंख खुली थी, तो खुली रह जाए, फिर पलक न झपे।
इसका वह महीनों से प्रयोग करवा रहा था। क्या मतलब है इसका? इसका मतलब इतना ही है कि यह प्रक्रिया तभी हो सकती है, जब मालिक जगे, अन्यथा नहीं हो सकती। और इस प्रक्रिया को किसी को करना है, तो उसके भीतर का मालिक जगना शुरू हो जाएगा।
हां, नौकर धोखा देंगे। आपने पैर उठाया और गुरजिएफ ने कहा, stop। तो मन कहेगा, वह देख तो नहीं रहा है, उसकी पीठ उस तरफ है। यह पैर नीचे रख ले। नाहक परेशान हो जाएगा। अगर उसकी मान ली, मन की, और पैर नीचे रख लिया, तो मालिक सोया रहेगा। लेकिन अगर कह दिया कि नहीं; पैर अब ऐसा ही रहेगा; तो मन हारा। और जब मन हारता है, तभी मन के पीछे जो छिपी शक्ति है, वह जीतती है।
मन की हार स्वयं की जीत बन जाती है। नौकरों का हारना, मालिक का जगना हो जाता है। जब तक नौकर जीतते रहते हैं, मालिक को खबर ही नहीं लगती कि हारने की हालत पैदा हो गई है महल में। जब नौकर हार जाते हैं, तो मालिक को उठना पड़ता है।
तो गुरजिएफ यह प्रयोग करा रहा था। पास ही एक बड़ी नहर थी। सूखी थी, अभी पानी छूटा नहीं था। एक दिन सुबह वह अपने तंबू में था। तीन-चार लोग नहर पार कर रहे थे। कोई लकड़ी काटने जा रहा था, कोई जंगल गया था, कोई कुछ कर रहा था। जोर से तंबू के बाहर आवाज गूंजी, stop! चार लोग नहर पार कर रहे थे। सूखी नहर थी। वे वहीं रुक गए। रुके नहीं कि दो क्षण बाद नहर में पानी छोड़ दिया गया। घबड़ाए!
एक ने लौटकर देखा कि गुरजिएफ तो तंबू के भीतर है, उसे पता भी नहीं है कि हम नहर में खड़े हैं। पानी छूट गया है। वह निकलकर बाहर आ गया। उसने कहा, स्टाप का मतलब कोई मरना तो नहीं है! तीन खड़े रहे। पानी और बढ़ा। कमर तक पानी हो गया, तब एक ने लौटकर देखा। उसने देखा कि अब तो जान जाने का खतरा है। यह पानी ऊपर बढ़ता जा रहा है। अब कोई अर्थ नहीं है। कपड़े भी भीगे जा रहे हैं। कोई सार नहीं है। वह बाहर निकल आया। दो फिर भी खड़े रहे। पानी और ऊपर बढ़ा, गर्दन, ओंठ--और तीसरा भी छलांग लगाकर बाहर हो गया। उसने कहा, अब तो सांस का खतरा है। लेकिन चौथा फिर भी खड़ा रहा। stop यानी stop। जब ठहर गए, तो ठहर गए।
मन ने जरूर कहा होगा, पागल है। मर जाएगा। जिंदगी गंवा देगा। बाहर निकल जा। तीन साथी बाहर निकल गए, उनमें भी बुद्धि है। वे भी साधना कर रहे हैं। तू ही कोई साधना नहीं कर रहा है। लेकिन नहीं; खड़ा ही रहा।
फिर पानी नाक को डुबा गया। फिर आंख को डुबा गया। फिर पानी की लहर सिर को डुबा गई। और गुरजिएफ भागा तंबू के बाहर। कूदा नहर में, उस युवक को बाहर निकालकर लाया। वह करीब-करीब बेहोश था। पानी भर गया था। पानी निकाला। वह युवक होश में आया और गुरजिएफ के चरणों पर गिर पड़ा। उसने कहा, मैंने तो कभी सोचा भी न था कि अगर मैं इतना बल दिखाऊंगा, तो मेरे भीतर का सोया मालिक जग जाएगा! मैंने मृत्यु के इस क्षण में अमृत को भी जान लिया है।
अज्ञान बंधन है, ज्ञान मुक्ति है। अज्ञान रुग्णता है, ज्ञान स्वास्थ्य है।
अमरीका के अरबपति एंड्रू कारनेगी ने अपने आत्म-संस्मरण में लिखवाया है। मरने के दो दिन पहले उसने अपने सेक्रेटरी को पूछा कि मैं तुझसे यह पूछना चाहता हूं कि अगर दुबारा हम दोनों को जन्म मिले, तो तू मेरा सेक्रेटरी होना चाहेगा या तू एंड्रू कारनेगी होना चाहेगा और मुझे अपना सेक्रेटरी बनाना चाहेगा?
एंड्रू कारनेगी मरा, तो दस अरब रुपए छोड़ कर मरा।
उसके सेक्रेटरी ने कहा, माफ करिए, आपको मैं इतना जानता हूं कि कभी भी परमात्मा से ऐसी प्रार्थना नहीं कर सकता कि मैं एंड्रू कारनेगी होना चाहूं। काश, आपका मैं सेक्रेटरी न होता, तो शायद इस कामना से भी मर सकता था कि भगवान मुझे भी एंड्रू कारनेगी बना दे। कारनेगी ने पूछा, तेरा क्या मतलब? तो उस सेक्रेटरी ने कहा कि मैं देखता हूं रोज जो हो रहा है। आप सबसे ज्यादा गरीब आदमी हैं। न आप ठीक से सो सकते हैं, न आप ठीक से बैठ सकते हैं, न आप ठीक से बात कर सकते हैं। न आपको अपनी पत्नी से मिलने की फुर्सत है, न अपने बच्चों के साथ बात करने की फुर्सत है। और देखता हूं कि दफ्तर में आप सुबह साढ़े आठ बजे पहुंच जाते हैं; चपरासी भी साढ़े नौ बजे आते हैं; क्लर्क साढ़े दस बजे आते हैं; मैनेजर बारह बजे आता है; डायरेक्टर्स एक बजे पहुंचते हैं। डायरेक्टर्स तीन बजे चले जाते हैं; मैनेजर चार बजे चला जाता है; साढ़े चार बजे क्लर्क भी चले जाते हैं; पांच बजे चपरासी भी चले जाते हैं; मैंने आपको सात बजे से पहले कभी घर लौटते नहीं देखा।
चपरासी भी पहले चले जाते हैं। क्योंकि चपरासी दूसरे की सुरक्षा कर रहे हैं, अपनी नहीं। एंड्रू कारनेगी अपनी ही सुरक्षा कर रहा है।
कलह को मिटाना है, तो कलह के भीतर प्रवेश करना जरूरी है।
नादिरशाह हिंदुस्तान आया। उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। उसने हाथी कभी देखा न था। पहली दफा देखा, बैठने की इच्छा हुई। जब वह हाथी पर बैठा तो उसने आगे झांककर देखा, महावत अंकुश लिए बैठा है। तो उसने कहा, तू यहां क्या कर रहा है? तो उस महावत ने कहा, महानुभाव! यह हाथी है, इसको चलाने के लिए फीलवान की जरूरत होतीं' है। उसने कहा, लगाम मुझे दे और तू नीचे उतर। वह तो घोड़े का आदी था, उसने कभी हाथी देखा नहीं था। कहा, तू नीचे उतर, लगाम मुझे दे। महावत हंसने लगा, उसने कहा -- इसकी कोई लगाम नहीं होती और हम फीलवान ही इसे चला सकते हैं। तो कहते हैं, नादिरशाह छलांग लगाकर नीचे कूद गया। उसने कहा, जिसकी लगाम मेरे हाथ में न हो, उस पर बैठना खतरे से खाली नहीं। मैं ऐसी चीज का मालिक होना ही नहीं चाहता, जिसकी लगाम मेरे हाथ में न हो।
रथ में बंधे हुए घोड़े मित्र हो सकते हैं, अगर लगाम हो और सारथी होशियार हो।
एक आदमी था दब्बू, जैसे कि अधिक आदमी होते हैं। सड़क पर तो बहुत अकड़ में रहता था, लेकिन घर में पत्नी से बहुत डरता था, जैसा कि सभी डरते हैं! कभी-कभी कोई अपवाद होता है, उसको छोड़ा जा सकता है। उसके कुछ कारण हैं। दिनभर लड़ा हुआ, थका-मांदा आदमी घर में और लड़ाई नहीं करना चाहता; किसी तरह निपटारा कर लेना चाहता है। पत्नी दिनभर लड़ी-करी नहीं, तैयार रहती है, पूरी शक्तियां हाथ में रहती हैं। वह आदमी थका-मांदा लौट रहा है, अब लड़ने की हिम्मत भी नहीं। युद्ध के स्थल से वापस आ रहे हैं, कुरुक्षेत्र से! अब वे और दूसरा कुरुक्षेत्र खड़ा करना नहीं चाहते।
पत्नी पहले दिन से ही आकर कब्जा कर ली थी उस आदमी पर; बड़ी मुश्किल में डाल दिया था। और पत्नी इसकी चर्चा भी करती थी। और एक दिन तो और स्त्रियों ने कहा कि हम मान नहीं सकते। हां, यह तो हम सब जानते हैं कि पति डरते हैं। लेकिन इतना हम नहीं मान सकते, जितना तू बताती है कि डरते हैं। तो उसने कहा कि आज तुम दोपहर को घर आ जाओ। आज छुट्टी का दिन है और पति घर पर होंगे। आज मैं तुम्हें दिखा दूंगी।
पंद्रह-बीस स्त्रियां मुहल्ले की इकट्ठी हो गईं। जब सब स्त्रियां इकट्ठी हो गईं, तो उस स्त्री ने अपने पति से कहा कि उठ और बिस्तर के नीचे सरक! वह बेचारा जल्दी से उठा और बिस्तर के नीचे सरक गया। फिर उसने और रौब दिखाने के लिए कहा कि अब दूसरी तरफ से बाहर निकल! उस आदमी ने कहा कि अब मैं बाहर नहीं निकल सकता। मैं दिखाना चाहता हूं, इस घर में असली मालिक कौन है!
हम भी कभी अगर इंद्रियों पर कोई मालकियत करते हैं, तो वह ऐसे ही, बिस्तर के नीचे घुसकर! और कोई मालकियत हमने कभी इंद्रियों पर नहीं की है। कभी बहुत कमजोर हालत में, ऐसा मौका पाकर कभी हम घोषणा करते हैं। मगर ठीक सामने इंद्रिय के, उसकी शक्तिशाली इंद्रिय के सामने हम कभी घोषणा नहीं करते। जैसे कि आदमी बूढ़ा हो गया, तो वह कहता है, मैंने अब तो काम-इंद्रिय पर विजय पा ली। वह पागलपन की बातें कर रहा है। ये बिस्तर के नीचे घुसकर बातें हो रही हैं। तो जब जवान है व्यक्ति और जब इंद्रिय सबल है, तभी मौका है घोषणा का।
अब आपका पेट खराब हो गया है, लीवर के मरीज हो गए हैं, खाया नहीं जाता। आपने कहा, अब तो हमने भोजन पर बिलकुल विजय पा ली। दांत न रहे, दांत गिर गए, अब चबाते नहीं बनता। अब आप कहने लगे कि हम तो लिक्विड आहार लेते हैं; कुछ रस न रहा! ये बिस्तर के नीचे घुसकर आप घोषणाएं कर रहे हैं।
दूषित मन से वचन बोलने पर या कर्म करने पर दु:ख उसका अनुसरण उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार कि चक्का गाडी खींचने वाले बैलों के पैरों का । पवित्र मन से वचन बोलने या काम करने पर सुख उसका अनुसरण उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार कि छाया ।
इंग्लैंड के स्कूल में परीक्षा हो रही थी- बाइबिल की क्लास की परीक्षा। और शिक्षक ने यह सवाल पूछा कि लिखो सब निबंध कि जीसस जब सागर के तट पर गए तो उन्होंने सारे सागर को शराब में बदल दिया।
एक बच्चे ने तो मिनट में उत्तर लिखा और खड़ा हो गया कि यह मेरा उत्तर पूरा हो गया। शिक्षक ने कहा इतने जल्दी! यह इतना कठिन सवाल है कि बड़े-बड़े पंडित और बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ सदियों से सिर मारते रहे हैं और इसका हल नहीं कर पाए। देखूं तेरा उत्तर!
लेकिन उसे पता नहीं था वह बच्चा कौन है; भविष्य उसका क्या था, उसे पता नहीं था। उस बच्चे ने एक छोटा सा, एक वाक्य लिखा था। उसने एक छोटा सा वाक्य लिखा था -- The sea saw her master and blushed! सागर ने अपने मालिक को देखा, अपने प्यारे को देखा और शरमा गया! इसलिए लाली छा गई। शराब-वराब नहीं। इसी बात को कहने के लिए यह कहानी गढ़ी गई। वह बच्चा बाद में बायरन बना- इंग्लैंड का महाकवि! लक्षण दे दिया उसने काव्य का वहीं। बड़े-बड़े पंडित जो व्याख्या नहीं कर सके थे, उसने एक वाक्य में व्याख्या कर दी। सदियों-सदियों में जीसस जैसा मालिक पृथ्वी पर चलता है! एक वाक्य में व्याख्या हो गई।
जीवन एक परम अवसर है। परम क्योंकि इसमें परमात्मा पाया जा सकता है। न जाओ काबा, न काशी।
डायोजनीज, यूनान में एक फकीर हुआ। नग्न रहता था। अलमस्त आदमी था, कोई चिंता-फिक्र न थी, शरीर स्वस्थ था, शक्तिशाली था। कुछ लोग निकल रहे थे जंगल से और वह एक झाड के नीचे विश्राम कर रहा था। वे आठ आदमी थे । उनका धंधा गुलामों को बेचना था।
उन्होंने इस मस्त आदमी को सोए देखा। उन्होंने कहा कि अगर यह पकड में आ जाए! लेकिन इसको पकड़ो कैसे? हालांकि यह सो रहा है, हम आठ हैं; मगर अगर यह जाग गया, तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी। अगर यह हाथ आ जाए, तो खूब दाम मिल सकते हैं। हमने बहुत गुलाम बेचे हैं। मगर इस गुलाम को तो बाजार में ले जाएंगे, तो ऐसा हीरा कभी आया ही नहीं, इसके तो बड़े दाम मिल जाएंगे।
क्या करें, वे विचार ही कर रहे थे। उनकी बातचीत सुनकर डायोजनीज की नींद खुल गई। तो उसने आंखें बंद ही किए कहा कि तुम परेशान मत होओ, बांध लो। चलूंगा साथ, घबड़ाओ मत।
वे और भी घबडाए कि यह आदमी किस तरह का है! आदमी को गुलाम बनाना हो, तो वह हजार झंझटें खड़ी करता है, कमजोर आदमी भी करता है। वह भी उछलकूद मचाता है, शोरगुल मचाता है, मार-पीट करेगा, उसमें भी ताकत आ जाती है। और यह आदमी ऐसे ही पड़ा है, और आंखें ही बंद किए! आंख खोलकर भी नहीं देखा कि कौन हो, क्या हो?
उसने कहा कि ज्यादा चिंता-फिक्र मत करो; चिंता-फिक्र का मैं दुश्मन हूं। यही मेरी शिक्षा है कि चिंता-फिक्र छोड़ो। तुम बांध ही लो। मैं चलने को राजी हूं। मैं कोई अड़चन खड़ी न करूंगा।
डरते-डरते उन्होंने उसके हाथ बांधे। उसने हाथ आगे कर दिए। बांध तो लिया उसे, लेकिन भीतर कुछ टूट गया उनके। यह आदमी बांधने जैसा है नहीं। इतना स्वतंत्र आदमी उन्होंने देखा ही न था, जो बंधने को इतनी आसानी से राजी हो।
सिर्फ परम स्वतंत्र आदमी ही बंधने को राजी हो सकता है। उसको अपने पर इतना भरोसा है, अपनी स्वतंत्रता की इतनी श्रद्धा है कि क्या तुम उसे मिटाओगे! और जिसको आठ आदमी मिलकर मिटा दें, वह भी कोई मोक्ष है? वह भी कोई स्वतंत्रता है, मुक्ति है? जिसको कोई गुरु मिटा दे, वह भी कोई मोक्ष है?
डायोजनीज बंध गया। उसने फिर पूछा कि किस तरफ चलें? तुम बता दो, क्योंकि मैं जरा तगड़ा आदमी हूं। अगर मैं पूरब जाऊं, तो तुम को पूरब जाना पड़ेगा। तुम आठ कुछ कर न पाओगे। इसलिए तुम मुझे राह बता दो। और एक आदमी आगे हो जाए; कहां चलना है!
एक आदमी आगे हो गया। लेकिन रास्ते में उन लोगों पर उसका बड़ा प्रभाव पड़ने लगा। उसकी मस्ती, उसकी चाल! वह गीत गुनगुनाए! वह जैसे कि जंगल से लाया शेर हो! और इतना निर्भीक कि तुम उसे बांध भी न सको, बंधने को भी खुद ही राजी हो!
आखिर वे पूछने लगे, तुम आदमी किस तरह के हो? ऐसा आदमी हमने देखा नहीं, जिंदगी हमें गुलामों का धंधा करते हो गई। उसने कहा, तुम भी गुलाम हो। गुलामों का धंधा करने वाले गुलामों से बेहतर नहीं हो सकते। बंधन एकतरफा नहीं होता। बंधन दोधारी धार है। जब तुमने मुझे बांधा, तब मैं भी बंधा तुम्हारे साथ। तुम जहां घसिटोगे, मुझे भी घसिटना पड़ेगा।
डायोजनीज ने कहा, हम इस राज को समझ गए कि गुलाम ही गुलामों को बाँधते हैं, परतंत्र लोग ही परतंत्रों को परतंत्र करते हैं। हम स्वतंत्र हैं। तुम हमें क्या बाँधोगे? हम खुद ही बंधे हैं!
वे उससे बड़े प्रभावित हो गए। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी जंजीरें भी निकाल लीं। उन्होंने कहा कि तुम पर जंजीरें! तुम तो वैसे ही चल रहे हो साथ।
वह साथ रहा। बाजार आ गया। उसके आस-पास भीड़ लग गई । लेकिन लोगों को तय करना मुश्किल हुआ कि मालिक कौन है, गुलाम कौन है! उन मालिकों ने, तथाकथित मालिकों ने आवाज भी दी, बताया भी कि हम एक गुलाम को ले आए हैं। लोगों ने गुलाम को देखा, बहुत शक्तिशाली, बिना जंजीरों के!
डायोजनीज ने कहा कि रुको, तुमसे न चलेगा काम। वह खड़ा हो गया टिकटी पर, जिस पर खड़े होकर नीलाम किए जाते थे गुलाम, और उसने खड़े होकर जो बात कही, वह बड़ी अनूठी है। उसने कहा, एक मालिक बिकने आया है, कोई गुलाम खरीदने को तैयार है?
मालिक तो मालिक है, कारागृह में भी। और गुलाम तो गुलाम ही रहेगा, खुले आकाश के नीचे भी।
सीख खुद को भी दो
कथा :
एक आदमी को लाटरी मिल गई है । उसकी पत्नी बहुत चिंतित और परेशान है, घबड़ा गई है । उस आदमी के हाथ में कभी सौ रुपये नहीं आए, इकट्ठे पांच लाख रुपये ! पास में चर्च है । वह पादरी के पास गई है और उसने प्रार्थना की, पांच लाख की लाटरी मिल गई है, पति दफ्तर से लौटते होंगे । क्लर्क हैं, सौ रुपये से ज्यादा कभी देखे नहीं हैं हाथ में, पांच लाख ! उन्हें किसी तरह इस सुख से बचाओ । कहीं कुछ हानि न हो जाए !
पादरी ने कहा, घबड़ाओ मत, एकदम से सुख पड़े तो खतरा हो सकता है, installment में पड़े तो खतरा नहीं हो सकता । हम आते हैं; हम खंड-खंड सुख देने का इंतजाम करते हैं ।
पादरी बुद्धिमान था; आ गया, बैठ गया । पति घर लौटा । पादरी ने सोचा, पांच लाख इकट्ठा कहना ठीक नहीं, पचास हजार से शुरू करो । तो उसने पति को कहा कि सुना तुमने, पचास हजार लाटरी में मिले हैं ! फिर आंखों की तरफ देखा कि इतना पचा जाए तो फिर और पांच लाख की बात करूं ! लेकिन उस आदमी ने कहा, सच ! अगर पचास हजार मुझे मिले हैं, यह सच है, तो पच्चीस हजार चर्च को दान देता हूं । पादरी का हार्ट-फेल हो गया । पच्चीस हजार ! पांच पैसे कोई चर्च को देता नहीं था ।
झाँक रहे है इधर उधर सब।
अपने अंदर झांकें कौन ?
ढ़ूंढ़ रहे दुनियाँ में कमियां ।
अपने मन में ताके कौन ?
दुनियाँ सुधरे सब चिल्लाते ।
खुद को आज सुधारे कौन ?
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
खुद पर आज विचारे कौन ?
हम सुधरें तो जग सुधरेगा
यह सीधी बात स्वीकारे कौन?"
मोह
कथा :
एक आदमी एक गांव में बहुत धनपति है । फिर गांव में लोग मरने लगे, अकाल पड़ा । तो लोगों ने उससे कहा, इतना धन है तुम्हारे पास, इतना धान्य है तुम्हारे पास, लोग मर रहे हैं, ऐसे क्षण पर रोको मत--बांटो । तो उस आदमी ने कहा, जिसे तुम बांटने के लिए कह रहे हो, वह अगर बंट जाए तो मैं मर जाऊं । तो लोग मर रहे हैं माना, लेकिन मैं मरना नहीं चाहता ! यह तुम भी जानो । और लोग मर रहे हैं, तो दूसरे पैदा हो जाएंगे । लेकिन जो धन मैंने इकट्ठा किया है, वह दूसरा कहां से आ सकता है ? लोग बड़े चकित हुए । कभी न सोचा था !
लेकिन उन्हें पता नहीं कि लोग उस आदमी के लिए छायाओं की तरह झूठे हैं; धन आत्मा की तरह सच्चा है । लोग हैं ही नहीं उसकी जीवन-परिधि में । उसके मन के घेरे में लोगों का कोई अस्तित्व नहीं है । वे प्रतिबिंब हैं । आते हैं, जाते हैं । धन बहुत वास्तविक है ।
फिर उसकी पत्नी भी बीमार पड़ गई । गांवभर में लोग मर रहे हैं, बीमारियां फैल गईं । उसकी पत्नी बीमार पड़ गई, तो लोगों ने कहा, कम से कम अपनी पत्नी को दिखाने के लिए वैद्य को बुला लो ! उसने कहा, पत्नी फिर भी मिल सकती है । लेकिन धन फिर भी मिलेगा, इसका आश्वासन है ?
जिसके मन में धन का मोह है, हम नहीं समझ पाते उसकी भाषा । जैसे अर्जुन पूछ रहा है कि स्थितधी कैसी भाषा बोलता है ? ऐसे ही मोहग्रस्त कैसी भाषा बोलता है, वह भी हम नहीं समझ सकते । मोहग्रस्त कैसे उठता, कैसे बैठता, हमारी पकड़ में नहीं आता । हां, अपने-अपने मोह को देखेंगे, तो पकड़ में आ सकता है । सबके मोह हैं । दूसरे का मोह हमारी समझ में नहीं आता, हमारा मोह ही हमारी समझ में आता है ।
उसने कहा, पत्नी दूसरी मिल जाएगी । पत्नी मर गई । फिर तो वह खुद भी मरने के करीब आ गया । बीमारियां उसे भी पकड़ लीं । लोगों ने कहा, अब तो कम से कम अपने पर कृपा करो । अब तो तुम्हीं मरने के करीब हो ! उसने कहा, धन न बचे और मैं बच जाऊं, ऐसे बचने से तो मर जाना ही बेहतर है । वह तो बड़ा दुखद है, वह तो बड़ा भयप्रद है कि धन न बचे और मैं बच जाऊं । कल्पना ही नहीं कर सकता धन के बिना मेरे होने की । हां, मेरे न होने की कल्पना कर सकता हूं । लेकिन धन के बिना मेरे होने की कल्पना नहीं कर सकता ।
मोहग्रस्त आदमी ऐसी ही भाषा बोलता है । वह कहता है, यह स्त्री मुझे न मिली, तो मैं मर जाऊंगा । इस स्त्री के बिना होने की मैं कल्पना नहीं कर सकता । हां, अपने न होने की कल्पना कर सकता हूं । वही मोह, वह कहता है, ऐसा नहीं होगा...अगर मंत्री पद नहीं मिला, तो मर जाऊंगा । मंत्री पद के बिना अपने होने की कल्पना नहीं कर सकता । हां, अपने न होने की कल्पना कर सकता हूं । मोहग्रस्त की यही भाषा है ।
फिर लोगों ने कहा, लेकिन तुम मर जाओगे, तो यह धन पड़ा रह जाएगा । इतने दिन बचाया है, फिर इसका क्या होगा ? उसने कहा कि क्या तुम सोचते हो, मैं धन को पड़ा रहने दूंगा ! मैं साथ ले जाऊंगा । लोगों ने कहा, अब तक सुना नहीं कि कोई धन को साथ ले गया हो ! उसने कहा, सुन लेना, जब मैं ले जाऊंगा, तब तुम्हें पता चल जाएगा ।
मोहग्रस्त मन की स्मृति खो जाती है; सोच-विचार खो जाता है; सहज विवेक खो जाता है । वह कह रहा है, मैं धन को भी साथ ले जाऊंगा ! मोहग्रस्त आदमी कहता है, छोडूंगा ही नहीं, प्राण में समा लूंगा । अपना-अपना मोह !
उस आदमी ने कहा, ले जाऊंगा साथ । और सच में एक रात उसने कोशिश की । मोहग्रस्त आदमी कोई भी कोशिश कर सकता है । उसकी स्मृति खो जाती है, उसका विवेक खो जाता है । रात उसने देखा कि शायद सुबह नहीं होगी । तो आधी रात वह उठा । उसने अपने सारे हीरे-जवाहरात, जो भी कीमती था, वह एक बोरी में बंद किया । लेकर नदी के किनारे पहुंचा । उसने सोचा कि अपने बोरे को कमर से बांधकर नदी में कूद जाऊं । आखिरी चेष्टा कि साथ ले जाऊं ! लेकिन नदी गहरी है और अगर किनारे कूद पड़े, तो लाश तो किनारे लगी रह जाएगी । वह हीरे-जवाहरातों से भरा हुआ बोरा किनारे रह जाएगा । न मालूम कोई उसे उठा ले !
तो उसने नाविकों को जगाया । कहता हूं नाविकों को, एक नाविक के जगाने से काम चल जाता । पर नाविकों को जगाया, क्योंकि वह आदमी ठहराए बिना नहीं कर सकता था काम; उसे जाना था बीच नदी में । उसने मांझियों को जगाया और कहा कि सबसे कम में कौन ले जा सकता है ? सबसे कम में ! और वह आदमी मरने जा रहा है । यह सब धन लेकर डूब जाने वाला है । तो सबसे कम में कौन ले जा सकता है ! ठहराया उसने । सबसे कम, छोटी से छोटी अशर्फी में जो राजी था, उस मल्लाह के साथ वह नदी में उतरा । और आखिर जब बीच मझधार में पहुंच गया, तो उसने उस मल्लाह से कहा कि क्या एक मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा पूरी न करोगे ? उसने कहा, क्या मतलब ? कैसी आखिरी इच्छा ? तो उसने कहा कि अगर तुम वह अशर्फी न मांगो, तो मैं शांति से मर जाऊं । पर एक मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा ! इतनी दुष्टता करोगे कि एक मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा पूरी न करो ?
गरीब मल्लाह ने उस मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा पूरी कर दी । वह धनपति शांति से कूद गया । ऐसे ही हम सब कूद जाते हैं, अपने-अपने मोह से भरी हुई मृत्यु में ।
समाज, संस्कृति, सभ्यता तुम्हें जो बीमारी दे देते हैं, धर्म उस बीमारी की औषधि है, और कुछ भी नहीं । धर्म समाज-विरोधी है, सभ्यता-विरोधी है; संस्कृति-विरोधी है । धर्म बगावत है । धर्म क्रांति है ।
मुल्ला नसरुद्दीन का बेटा नदी में डूब रहा था-बाढ आयी नदी में । एक पुलिस वाले ने अपनी जान को जोखिम में डाल कर उसे बचाया । उसे लेकर घर गया । बेटा दौड़ता हुआ भीतर गया, पुलिस वाला खड़ा रहा कि शायद मां-बाप में से कोई आकर कम से कम धन्यवाद तो देगा । नसरुद्दीन भीतर से आया और उस लड़के ने इशारा किया पुलिस वाले की तरफ । नसरुद्दीन ने कहा क्या आपने ही मेरे बेटे को नदी में बचाया ? पुलिस वाला प्रसन्न हुआ कि अब धन्यवाद देगा या कुछ भेंट देगा या कुछ पुरस्कार । उसने कहा -- जी हाँ, मैंने ही बचाया, बड़ी खतरनाक हालत थी । उसने कहा : छोड़ो जी खतरनाक हालत, बेटे की टोपी कहां है ?
वह टोपी कहीं बह गयी है । अब बेटे को बचाया, इसकी चिंता नहीं है, टोपी का मोह !
अल्बर्ट आइंस्टीन -कोई भी समस्या चेतना के उसी स्तर पर हल नही की जा सकती जिस पर वह उत्पन्न हुई है ।
एक सेठ नदी में डूब रहा था । एक गरीब भिखमंगे ने दौड़ कर बचाया । कठिन था बचाना, क्योंकि सेठ भारी-वजनी था । बड़ा पेट, बड़ा सेठ ! गरीब भिखमंगा, हड्डी-पसली सूखी; मगर किसी तरह खींच कर लाया । उनको बचाने में अपनी भी जान दांव पर लगा दी । सेठ ने जब आंखें खोलीं, थोड़ा होश संभाला, तो एक रुपये का नोट दिया उसे और कहा, तूने मुझे बचाया, यह रुपया ले, किसी दुकान से जा कर भुना ला, आठ आने तू रख लेना, आठ आना मुझको दे देना । उस भिखमंगे ने कहा, सेठ, यहां तो कोई आसपास दूकान दिखाई नहीं पड़ती और अब आठ आने के पीछे क्या पंचायत करनी ? आप संभाल कर रखो । जब दुबारा डूबो तब पूरा नोट ही दे देना ।
आदमी मरते दम तक भी पकड़ता है, छोड़ता नहीं ।
मुल्ला नसरुद्दीन बहुत वृद्ध हो गया । सिर गंजा हो गया तो दवाइयों की तलाश करता फिरता था कि किसी तरह बाल उग आएं । किसी महात्मा के प्रसाद से, जड़ी-बूटी के उपयोग से बामुश्किल चार बाल निकल आए-चार बाल! वह पहुंच गया नाईबाड़े हजामत बनवाने । नाई चौंका । उसने कहा, बड़े मियां, बाल गिनूं या काटूँ ? मुल्ला नसरुद्दीन ने बहुत शरमाते हुए कहा, काले कर दो ।
चार बाल उग आए हैं उनको भी काले करने का मन है! आदमी अंत तक भी छोड़ नहीं पाता । मौत द्वार पर आ जाती है और मोह नहीं छूटता । यमदेवता द्वार पर दस्तक देने लगते हैं और कामदेवता के साथ दोस्ती नहीं छूटती । जागो!
सेवा उसकी, जो हमसे आगे है । दया उसकी, जो हमसे पीछे हो । क्योंकि सेवा में पकड़ने पड़ेंगे चरण । दया में देना होगा, जो हमारे पास है ।
एक अदालत में मुकदमा था । दो आदमियों ने एक-दूसरे का सिर फोड़ दिया था । जब मजिस्ट्रेट पूछ्ने लगा कारण तो बताओ, तो वे दोनों हंसने लगे । उन्होंने कहा, क्षमा करें, दंड जो देना हो दे दें । अब कारण न पूछें । मजिस्ट्रेट ने कहा, मैं दंड बिना कारण पूछे दे कैसे सकता हूं? और तुम इतने घबड़ाते क्यों हो कारण बताने से? झगड़ा हुआ, कारण होगा ।
वे दोनों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे । वह कहने लगा, अब तू ही बता दे । वह कहने लगा, अब तू बता दे । कारण ही ऐसा था कि बताने में संकोच लगने लगा । फिर बताना ही पड़ा । जब मजिस्ट्रेट ने जोर-जबरदस्ती की कि अगर न बताया तो दोनों को सजा दे दूंगा । तो बताना पड़ा । कारण ऐसा था कि बताने जैसा नहीं था ।
दोनों नदी के किनारे बैठे थे । दोनों पुराने मित्र । और एक ने कहा कि मैं भैंस खरीदने की सोच रहा हूं । दूसरे ने कहा कि देख, भैंस तू खरीदना ही मत क्योंकि मैं खेत खरीदने की सोच रहा हूं एक बगीचा खरीद रहा हूं । अब कभी यह भैंस घुस गई मेरे बगीचे में, झगड़ा-झंझट हो जाएगा । पुरानी दोस्ती यह भैंस को खरीद कर दांव पर मत लगा देना । और देख, मैं तेरे को अभी कहे देता हूं कि अगर मेरे बगीचे में भैंस घुस गई तो मुझसे बुरा कोई नहीं ।
उस आदमी ने कहा, अरे हद हो गई! तूने समझा क्या है? तेरे बगीचे के पीछे हम भैंस न खरीदें? तू मत खरीद बगीचा, अगर इतनी बगीचे की रक्षा करनी है । भैंस तो खरीदी जाएगी, खरीद ली गई । और कर ले जो तुझे करना हो ।
बात इतनी बढ़ गई कि उस आदमी ने वहीं रेत पर एक हाथ से लकीर खींच दी और कहा,' यह रहा मेरा बगीचा । और घुसा कर देख भैंस । और दूसरे आदमी ने अपनी अंगुली से भैंस घुसा कर बता दी । सिर खुल गए ।
उन्होंने कहा, मत पूछें कारण । जो दंड देना हो दे दें । न अभी मैंने बगीचा खरीदा है, न इसने अभी भैंस खरीदी है । और हम पुराने दोस्त हैं । अब जो हो गया सो हो गया । दोनों पकड़ कर ले आए गए अदालत में ।
तुमने भी कई दफे ऐसे बगीचों के पीछे झंझटें खड़ी कर लीं, जो अभी खरीदे नहीं गए । तुम जरा अपने मन की जांच-पड़ताल करना, तुम्हें हजार उदाहरण मिल जाएंगे । बैठे-बैठे न मालूम क्या-क्या विचार उठ आते हैं ! और जब कोई विचार उठता है तो तुम क्षण भर को तो भूल ही जाते हो कि यह विचार है । क्षण भर तो मूर्च्छा छा जाती है, और विचार सच मालूम होने लगता है ।
धूप से आते हो घर, अंधेरा मालूम पड़ता है । ऐसे ही बाहर जन्मों-जन्मों से भटके हो, जब आंख बंद करते हो तो भीतर अंधेरा मालूम पड़ता है । यह बिलकुल स्वाभाविक है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक टैक्सी में बैठा हुआ पहाड़ से नीचे उतर रहा था । ढलान से उतरते हुए अचानक टैक्सी का ब्रेक खराब हो गया और गाड़ी अत्यंत वेग से दौड़ने लगी । नियंत्रण के बाहर हो गई गाड़ी ।
ड्राइवर घबड़ाया और उसने पूछा कि बड़े मियां, गाड़ी का ब्रेक फेल हो गया । अब मैं क्या करूं? मुल्ला ने कहा, सबसे पहले मीटर बंद करो । फिर जो चाहे करना ।
जीवन में विभाजन, विरोध, पोलेरिटी मनुष्य की है।
स्वामी राम टोकियो में मेहमान थे। और तब की बात है, जब टोकियो में नए ढंग के मकान बहुत कम थे, सभी लकड़ी के मकान थे। एक सांझ निकलते थे, और एक मकान में आग लग गई है; लोग सामान बाहर निकाल रहे हैं। जिसका मकान है,वह छाती पीटकर रो रहा है। राम भी उस आदमी के पास खड़े होकर उस आदमी को गौर से देखने लगे।
वह छाती पीट रहा है, रो रहा है और चिल्ला रहा है, कह रहा है, मैं मर गया! राम थोड़े चिंतित हुए, क्योंकि वह आदमी बिलकुल नहीं मरा है। बिलकुल साबित, पूरा का पूरा है। चारों तरफ उसके घूमकर भी देखा। उस आदमी ने कहा भी कि क्या देखते हो! मैं मर गया हूं, लुट गया, सब खो गया।
राम बड़े चिंतित हुए, क्योंकि उसका कुछ भी नहीं खोया है। वह आदमी पूरा का पूरा है। लेकिन हां, मकान में तो आग लगी है, और लोग ला रहे हैं सामान। तिजोड़ियां निकाली जा रही हैं। कीमती वस्त्र निकाले जा रहे हैं। हीरे-जवाहरात निकाले जा रहे हैं। फिर आखिरी बार आदमियों ने आकर कहा कि अब एक बार और हम भीतर जा सकते हैं। अंतिम क्षण है। एक बार और,इसके बाद मकान में जाना असंभव होगा। लपटें बहुत भयंकर हो गई हैं। अगर कोई जरूरी चीज रह गई हो, तो बता दें।
उस आदमी ने कहा, मुझे कुछ याद नहीं आता। मुझे कुछ भी याद नहीं आता कि क्या रह गया और क्या आ गया। मैं होश में नहीं हूं। मैं बिलकुल बेहोश हूं। तुम मुझसे मत पूछो। तुम भीतर जाओ। तुम जो बचा सको, वह ले आओ।
हर बार वे आदमी बाहर आते थे, तो बहुत खुश। कुछ बचाकर लाते थे। आखिरी बार छाती पीटते रोते हुए बाहर निकले और एक लाश लेकर बाहर निकले। उस आदमी का इकलौता बेटा अंदर रह गया था और जलकर समाप्त हो गया था।
स्वामी राम ने अपनी डायरी में लिखा कि उस दिन उस मकान से चीजें तो सब बचा ली गईं, लेकिन मकान का होने वाला मालिक, जलकर समाप्त हो गया। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि करीब-करीब हर आदमी की जिंदगी में ऐसी ही घटना घटती है। चीजें बचाने की कोशिश में चीजें तो बच जाती हैं, मालिक मर जाता है!
निश्चित एक ही तथ्य है कि मृत्यु होगी। उस निश्चित तथ्य को सोच कर, ध्यान में रख कर जीवन को बनाओ।
एक आदमी के घर मौत आई। उसने द्वार पर दस्तक दिया। आदमी ने भीतर से छिपे हुए पूछा, 'कौन है?' तो मौत ने कहा कि मैं हूं, यमदूत! मृत्यु तुम्हारी! उस आदमी ने कहा, 'धन्यवाद भगवान का! मैं समझा कि इनकम-टैक्स के लोग आये!'
जीवन का उपयोग तो तुम कचरा इकट्ठा करने में करते हो। और फिर मर कर तुम परमात्मा को पाना चाहते हो!
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे सुबह बोली कि रात भयंकर आधी उठी, अनेक मकान गिर गए अपना भी छप्पर उड़ गया। कई लोग मर गए, आधा गांव बरबाद हो गया है। ऐसी बिजली ऐसे बादल ऐसा गर्जन कि मुर्दे भी कब्रों से उठ आएं!
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा अरे तो मुझे क्यों नहीं उठाया? ऐसा अवसर मैं देखने से चूक ही गया! जरा मुझे भी उठा देती।
लोग ऐसे सो रहे हैं।
क्रोध अहंकार की संतति है, अहंकार का ही विस्तार है।
एक आदमी ने रात स्वप्न देखा। फिर सुबह वह जब बाजार की तरफ चला, तो बड़ा उदास था। किसी मित्र ने उसे पूछा कि इतने उदास हो, बात क्या है? उसने कहा, मैंने एक स्वप्न देखा है। और स्वप्न में मैंने देखा कि मुझे बीस हजार रुपए पड़े हुए रास्ते पर मिल गए हैं। तो मित्र ने कहा, इसमें भी उदास होने की क्या बात है! यह तो सपना है। सपने के रुपयों की क्या चिंता करनी, क्या उदासी! उस आदमी ने कहा, उससे मैं परेशान नहीं हूं। मैंने यह पत्नी को बता दिया और वह सुबह से ही रो—पीट रही है। वह कहती है, उसी वक्त बैंक में जमा क्यों न कर दिए?
विज्ञान पदार्थों की खोज है और धर्म परमात्मा की खोज है।
एक कंजूस आदमी ने अपने बेटे को चश्मा दिलवाया। दूसरे दिन सुबह ही बेटा बाहर बैठा है अपनी किताबें वगैरह लिए। उसके बाप ने भीतर के कमरे से पूछा कि बेटे, क्या कुछ पढ़ रहे हो? उस लड़के ने कहा कि नहीं। तो बाप ने पूछा, तो क्या कुछ लिख रहे हो? उसके लड़के ने कहा, नहीं। तो बाप ने कहा, तो फिर चश्मा उतारकर क्यों नहीं रख देते! लगता है, तुम्हें फिजूलखर्ची की आदत पड़ गई है।
Aldous Huxley -- परमात्मा से हम जब भी प्रार्थना करते हैं, हम चाहते हैं कि दो और दो चार न हों।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी गुलजान अचानक ही सत्तर साल की कम उम्र में चल बसी। मुल्ला नसरुद्दीन कुछ समय तो गुलजान के बगैर रहा, लेकिन फिर अकेले उससे न रहा गया। अंततः वह इस निदान के लिए डाक्टर के पास पहुंचा और डाक्टर को अपनी परेशानी बताई और बोला कि मैं बिना शादी किए नहीं रह सकता।
डाक्टर ने उसकी जांच-पड़ताल की और कहा, नसरुद्दीन, यह शादी जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकती है, फैसला तुम्हारे हाथ में है।
नसरुद्दीन बोला, डाक्टर साहब, कुछ भी हो जाए, शादी मैं करूंगा। फिर आप चिंता न करें, अगर मेरी नई पत्नी को कुछ हो गया तो उसकी छोटी बहन भी मौजूद है।
डाक्टर चौंका कि उसका तो अर्थ अनर्थ हो गया। उसने कहा था जीवन को कुछ हो सकता है। वह कह रहा है मुल्ला नसरुद्दीन के जीवन को कुछ हो सकता है। मुल्ला नसरुद्दीन समझ रहा है कि लड़की के जीवन को कुछ हो जाएगा--तो कोई फिक्र नहीं, उसकी छोटी बहन मौजूद है। अब ऐसे आदमी से क्या बात करनी और आगे। ऐसे लोग भी हैं, जिनको अपने मरने की तो याद ही नहीं आती! डाक्टर ने एक नजर इस बूढ़े नसरुद्दीन की तरफ दया से डाली। पिचके हुए गाल, मुंह में एक दांत नहीं, शरीर की एक-एक हड्डी उभर कर बाहर निकली आ रही है, पेट और पीठ दोनों मिल कर एक हो गए हैं। डाक्टर को देख कर बड़ी दया आई। वह बोला, नसरुद्दीन, यदि ऐसी ही बात है कि तुम बिना पत्नी के नहीं रह सकते, तो जरूर शादी कर लो। मैं शादी करने से तुम्हें रोकूंगा नहीं। लेकिन मेरी एक सलाह है, यदि मानो तो अपने घर में एक जवान मेहमान भी रख लो। यदि पत्नी के साथ-साथ एक जवान मेहमान घर में रख लो तो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए ठीक रहेगा।
मुल्ला बोला, यह बात ठीक रही। आपने हमारी मानी, हम आपकी माने लेते हैं। चलो, पत्नी भी रख लेते हैं और एक मेहमान भी रख लेते हैं।
शादी के सात-आठ माह बाद डाक्टर को अचानक आकस्मिक रूप से बाजार में मुल्ला नसरुद्दीन जाता हुआ दिखाई दिया--चूड़ीदार पाजामा, खादी की अचकन, गांधी टोपी लगाए, कोई फिल्मी धुन गाता हुआ चला जा रहा था। डाक्टर ने उसे रोक कर हालचाल पूछे और पूछा, नसरुद्दीन, तुम्हारी पत्नी के क्या हालचाल हैं? आठ माह हो गए शादी हुए और आज मिल रहे हो! क्या हाल है पत्नी का?
मुल्ला बोला, पत्नी कुछ ही दिनों में मां बनने वाली है।
डाक्टर ने बधाई देते हुए पूछा कि जवान मेहमान का क्या हाल है?
नसरुद्दीन शर्माता हुआ बोला, जी, वह भी मां बनने वाली है।
यहां सब हार जाते हैं, यह जुआ ऐसा है! जीतते केवल वही हैं जो चाह से मुक्त हो जाते हैं--जो चाह की व्यर्थता को देख लेते हैं; जो तृष्णा की दौड़ से जाग जाते हैं; जो वासना से हट जाते हैं और प्रार्थना में लीन हो जाते हैं।
वासना के आधार से सुनना
कथा :
एक छोटा बच्चा एक बगीचे में आम तोड़ता हुआ पकड़ा गया । माली ने उसे पकड़ा, पुलिस-थाने ले गया । लड़का भोला-भाला था । भोला-भालापन देखकर दरोगा ने कहा, 'बेटे, तुम्हें बुरे लोगों से बचना चाहिए ।' उस लड़के ने कहा, 'अजी मैंने तो माली से बचने की बहुत कोशिश की, पर उसने मुझे पकड़ ही लिया ।'
दरोगा कह रहा है, बुरी संगति से बचो, ताकि चोरी न सीखो । लड़का सुन रहा है कि यह माली बुरा आदमी है; मैं तो भागने की कोशिश कर ही रहा था; इससे बचने की कोशिश कर ही रहा था, फिर भी इसने पकड़ लिया ।
व्यावहारिक सत्य पारमार्थिक सत्य नहीं है । व्यावहारिक सत्य की उपयोगिता है, वास्तविकता नहीं । पारमार्थिक सत्य की कोई उपयोगिता नहीं है, सिर्फ वास्तविकता है ।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी गुस्से से भरी हुई घर आई और उसने मुल्ला से कहा कि भिखारी भी बड़े धोखेबाज होते हैं ।
'क्यों क्या हो गया ?' नसरुद्दीन ने पूछा ।
'अजी एक भिखारी की गर्दन में तख्ती लगी थी, जिस पर लिखा था -- जन्म से अंधा । मैंने दया करके पर्स में से दस पैसे निकाल कर उसके दान-पात्र में डाल लिए । तो जानते हो, कहने लगा, हे सुंदरी, भगवान तुम्हें खुश रखे । अब तुम्हीं बताओ कि उसे कैसे मालूम हुआ कि मैं सुंदरी हूं ? '
मुल्ला खिलखिला कर हंसने लगा और कहने लगा, तब तो वह वास्तव में अंधा है और जन्म से अंधा है । मैं ही एक अंधा नहीं हूं एक और अंधा भी है । अगर आंख होती तो तुझे सुंदरी क्यों कहता ?
पत्नी कुछ कह रही है, मुल्ला कुछ सुन रहा है । मुल्ला वही सुन रहा है जो सुनना चाहता है ।
या तो कामना रहती है, वासना रहती है, या प्रज्ञा रहती है। दोनों साथ नहीं रहते हैं।
मुल्ला एक जगह काम करता था । मालिक ने उससे कहा कि तुम अच्छी तरह काम नहीं करते, नसरुद्दीन ! मजबूरन अब मुझे दूसरा नौकर रखना पड़ेगा । नसरुद्दीन ने कहा, अवश्य रखिए हुजूर, यहां काम ही दो आदमियों का है ।
सुकरात -- जब मैंने जान लिया कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं उसी दिन प्रकाश हो गया ।
मुल्ला नसरुद्दीन से एक दिन पूछा कि तू पागल की तरह बचाए चला जाता है । रद्दी-खद्दी चीजें भी फेंकता नहीं । कूड़ा-कर्कट भी इकट्ठा कर लेता है । सालों के अखबारों के अंबार लगाए बैठा है । कुछ कभी तेरे घर से बाहर जाता ही नहीं । यह तूने बचाने का पागलपन कहां से सीखा ? उसने कहा, एक बुजुर्ग की शिक्षा से । मैं थोड़ा चौंका । क्योंकि मुल्ला नसरुद्दीन ऐसा आदमी नहीं कि किसी से कुछ सीख ले । तो मैंने कहा, मुझे पूरे ब्योरे से कह, विस्तार से कह । किस बुजुर्ग की शिक्षा से ?
उसने कहा, मैं नदी के किनारे बैठा था । एक बुजुर्ग पानी में गिर गए और जोर-जोर से चिल्लाने लगे, 'बचाओ ! बचाओ !' उसी दिन से मैंने बचाना शुरू कर दिया ।
तुम वही सुन लोगे जो सुनना चाहते हो । इसलिए सुनने की बड़ी अनूठी कला सीखनी जरूरी है । जो ठीक से सुनना सीख गया उसमें समझ पैदा होती । तुम ठीक से तो सुनते ही नहीं ।
कवि जी को आई जम्हाई
बोले, हे मां !
सुन कर कविपत्नी भभकी
बोली, होकर तीन बच्चों के बाप
नाम रट रहे हेमा का ?
सत्यानाश हो सिनेमा का
मुल्ला नसरुद्दीन से मैंने एक दिन पूछा कि नसरुद्दीन, तू कुरान रोज पड़ता है फिर भी तू शराब पीए चला जाता है? कुरान में तो साफ लिखा है शराब के खिलाफ । उसने कहा, बिलकुल लिखा है । लेकिन अपनी-अपनी सामर्थ्य से जितना कर सकता हूं करता हूं । मैंने कहा, मैं कुछ समझा नहीं । तो उसने कहा कि देखें, कुरान में लिखा है : 'शराब पीयोगे यदि तो दोजख में पड़ोगे ।' तो अभी मैं आधे ही वचन तक पहुंचा हूं- 'शराब पीयोगे.. ।' इससे आगे अभी मेरी सामर्थ्य नहीं है । धीरे-धीरे जाऊंगा । आगे भी जाऊंगा मगर अभी तो 'शराब पीयोगे' इतने तक.. .इतने तक रस आ रहा है । यह भी कुरान की ही आज्ञा है । मैं कोई कुरान के विपरीत नहीं चल रहा हूं ।
मन बड़ा चालबाज है । और उसकी चालबाजियां बडी सूक्ष्म हैं । वह वही सुन लेता है जो सुनना चाहता है । मतलब की बात सुन लेता है । जो नहीं सुनना है, नहीं सुनता ।
मुल्ला नसरुद्दीन शिकार को गया था। पत्नी भी नहीं मानी। और पत्नी न माने तो क्या करो। पत्नी ने कहा, मैं भी आती हूं। जरा देखूं भी तो कि तुम कैसे शिकारी हो! मुल्ला ने अपने मित्र चंदूलाल को कहा कि अब शिकार करना मुश्किल है। इसे देख कर ही मेरे हाथ-पैर कंपते हैं। लगाऊंगा निशाना कहीं, लग जाएगा कहीं। जब मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी जा रही थी तो चंदूलाल की पत्नी भी पीछे नहीं रह सकती थी। चंदूलाल की पत्नी भी साथ हो ली। एक से एक घटनाएं घटीं उस शिकार की यात्रा पर।
पहली घटना तो यह घटी कि मुल्ला नसरुद्दीन ने गोली मारी, उड़ रहे पक्षियों को तो नहीं लगी, चंदूलाल की बैठी पत्नी को लगी। चंदूलाल ने कहा, हद कर दी भाई! यह क्या किया? मेरी पत्नी मार डाली! मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, अरे इसमें क्या नाराज होने की बात है! यह तुम बंदूक लो और मेरी पत्नी को मार लो। बराबर हो गया।
मगर चंदूलाल भी एक पहुंचा हुआ पुरुष है। उसने कहा कि इतना सुख मैं तुम्हें नहीं दे सकता। दोस्त तो वही जो दुख में काम आए। दुख में काम आ सकता हूं, सुख तुम्हें नहीं दे सकता । अब जो हुआ सो हुआ।
दूसरे दिन दूसरी घटना घटी। चंदूलाल एकदम भागा हुआ आया और नसरुद्दीन से कहा, क्या कर रहे हो? नसरुद्दीन अपनी बंदूक में गोलियां भर रहा था। कहा कि तुम तो गोलियां भर रहे हो मचान पर बैठे हुए और हमने जो तंबू लगाया है, तुम्हारी पत्नी वहां अकेली है, और एक चीता अंदर घुस गया है। मुल्ला फिर भी अपनी गोलियां भरता रहा। चंदूलाल ने कहा, तुम समझे कि नहीं? उसने कहा, सब समझ गया। लेकिन इसमें मेरा क्या कसूर? अब चीता घुसा है, खुद भूल की है, खुद भोगे। हमने भूल की, हमने भोगा। और चीतों से मुझे ऐसे भी कोई बड़ा लगाव नहीं है। जाए भाड़ में।
यूं दोनों पत्नियों से छुटकारा हुआ। पहले पत्नियों के डर के कारण निशाना नहीं लग रहा था, तीसरे दिन खुशी के कारण निशाना चूक गया। उड़ रहे थे हंस, पंक्ति उड़ रही थी हंसों की, होगी कोई पच्चीस-तीस हंसों की कतार। और मुल्ला नसरुद्दीन ने चलाई गोली। कोई सिक्खड़ भी मारता पच्चीस-तीस हंसों में तो एकाध को चोट लग जाती। गोली चल गई, कोई हंस गिरा नहीं। मुल्ला एक क्षण चुप रहा और फिर चंदूलाल से बोला, चंदूलाल, समझे कुछ? चंदूलाल ने कहा, क्या खाक समझें? अरे--मुल्ला ने कहा--समझो, चमत्कार देख रहे हो! हंस मर गए और उड़ रहे हैं। इसको कहते हैं चमत्कार!
हम जो सुनना चाहते हैं, सुन लेते हैं । वही थोड़े ही सुनते हैं जो कहा जाता है । हमारा सुनना शुद्ध नहीं है, विकृत है ।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन सड़क पर बेहोश हो गया। उसके इर्द-गिर्द भीड़ जमा हो गई, हर कोई उसे होश में लाने के लिए सलाहें देने लगा। भीड़ में से एक बुढ़िया बोली, 'बेचारे को थोड़ी ब्रांडी दे दो।'
कोई बोला, 'इसके मुंह पर पानी के छींटे मारो।'
'इसे ब्रांडी दो।' बुढिया फिर बोली।
'इसे पंखा करो।' कोई बोला।
'इसे ब्रांडी दो।' बुढिया बोली।
'इसे अस्पताल ले जाओ।' किसी ने कहा।
'इसे ब्रांडी दो।' बुढिया फिर बोली।
तभी मुल्ला नसरुद्दीन उठकर बैठ गया और जोर से चिल्लाया, 'आप सब लोग अपनी बकवास बंद कीजिये और उस बेचारी बुढिया की भी कोई सुन लो।'
जिंदगी में लाख मौके मिलते हैं। लेकिन हम चूकने में बड़े कुशल हैं! हम चूकते ही चले जाते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन मस्जिद जाता है। मस्जिद के मौलवी को उसने कहा कि सुबह आने की बड़ी मुश्किल होती है, तय ही नहीं कर पाता, तय ही करने में समय निकल जाता है, कि जाऊँ कि न जाऊँ, जाऊँ कि न जाऊँ; मन में बड़ी दुविधा रहती है, अब आप तो जानते ही हैं। मन दुविधाग्रस्त है मेरा। मौलवी ने कहा-तू एक काम कर, परमात्मा पर छोड़ दे। उसने कहा-यह कैसे तय होगा और पक्का कैसे पता चलेगा कि परमात्मा की मर्जी क्या है? मुल्ला थोड़ा डरा भी, क्योंकि परमात्मा की मर्जी तो निश्चित ही यह होगी कि मस्जिद जाओ। मगर उसने कहा कि पक्का कैसे चलेगा कि परमात्मा की मर्जी क्या है? तो मौलवी ने कहा-तू ऐसा काम कर, एक रुपया रख ले और कहा कि अगर चित गिरे तो परमात्मा चाहता है मस्जिद जाओ, और अगर पुत गिरे तो परमात्मा चाहता है कि मस्जिद मत जाओ। दूसरे दिन मुल्ला नहीं आया। रास्ते में बाजार में मौलवी को मिला, मौलवी ने पूछा-आए नहीं, भाई? उसने कहा कि आपने कहा था, वही किया। मौलवी ने कहा तो क्या हुआ? पुत गिरा रुपया? उसने कहा कि पहली बार में तो नहीं गिरा। सत्रह बार फेंकना पड़ा, तब पुत गिरा। मगर गिरा। जब पुत गिरा तब फिर मैं निश्चिंत सो गया; मैंने कहा कि अब जब परमात्मा की ही मर्जी है!
आदमी बहुत बेईमान है। अपनी मर्जी को परमात्मा पर भी थोपने की चेष्टा करता है। वहीं से उसके सारे कष्टों का जन्मस्रोत है।
एक बड़ा चित्रकार शास्त्रीय चित्रों के संबंध में एक सभा में बोल रहा था। उसने कोई दो घंटे तक चित्रकला की बड़ी सूक्ष्मतम गहराइयों में प्रवेश किया। चित्रकला के बड़े सूक्ष्म पहलू उघाड़े और समझाये। मंत्रमुग्ध थे लोग। और अंत में उसने पूछा कि कोई सवाल? कुछ पूछने को न था। क्योंकि उसने करीब-करीब जो भी पूछा जा सकता था, सब कह दिया था। लोग तो चुप रहे, लेकिन एक बूढ़ी औरत खड़ी हो गई। उसने कहा, एक सवाल है। इस फर्श को साफ करने के लिए किस पॉलिश का उपयोग किया गया है? वह जिस हाल में सभा हो रही थी, इसमें कौन सा तेल लगाया गया है, कि इतनी चमचमाहट मालूम हो रही है?
चित्रकला की लंबी कथा, चित्रों के रहस्य का सारा निवेदन व्यर्थ गया। यह स्त्री पूरे वक्त फर्श को ही देखती रही होगी। और इसने सोचा कि यह आदमी रंगों और चित्रों के संबंध में इतना जानता है कि फर्श पर कौन सा तेल लगाकर इसको चमकाया गया है, जरूर जानता होगा। यह औरत घर में फर्श चमकाने में लगी रहती होगी। कुछ औरतें हैं जिनका दिमाग इसी में खराब हो जाता है। वे फर्श ही चमकाती रहती हैं। उनको खुद को चमकाने का मौका ही नहीं आता। वे घर की ही सफाई में लगी रहती हैं। उन्हें भीतर की सफाई का समय ही नहीं मिलता। पर जिस तरफ ध्यान लगा हो, वह बात तत्क्षण समझ में आ जाती है। तुम चूंकि बाहर की तरफ में ध्यान लगाये हुए हो, बाहर समझ में आता है।
अति, मन का भोजन है। तुम मध्य में आये कि मन गया।
शाम हो रही थी, परंतु चंदूलाल की पत्नी शापिंग समाप्त करने का नाम ही नहीं ले रही थी। चंदूलाल थक कर चूर हो गए थे और दिल ही दिल में बिलों का हिसाब जोड़ रहे थे। देवी जी ने उनकी बोरियत मिटाने के लिए कहा: 'देखो तो चांद कितना सुंदर लग रहा है!'
चंदूलाल एकदम भड़क उठे, बोले: 'अब उसे खरीदने के लिए मेरे पास बिलकुल पैसे नहीं हैं!'
भेडचाल
कथा :
एक गांव में एक लफंगे आदमी की लोगों ने नाक काट दी । उससे बहुत परेशान थे । हर किसी से छेड़-खान... । गांव की बहू-बेटियों का जीना दूभर हो गया था ।
नाक कट गई तो वह बड़ा परेशान हुआ, अब क्या करना ! वह साधु हो गया और दूसरे गांव चला गया । दूसरे गांव में एक वृक्ष के नीचे बैठ गया, धूनी रमा कर ।
गांव के लोग...कुतूहल जगा, कौन है भाई ! कुछ विचित्र भी है, नाक भी नहीं है, और बड़ी आंखें बंद किये हुए, और ध्यान-मग्न बैठा है ! लोग आये । गांव के लोग इकट्ठे हो गये । किसी ने पूछा, 'महाराज ! आप यहां क्या कर रहे हैं ?' उसने कहा कि परमात्मा का स्वाद ले रहे हैं; भोग कर रहे हैं प्रभु का । अहा ! कैसा आनंद बरस रहा है ।
लोगों ने भी आकाश की तरफ देखा । कहा कि हमें दिखाई नहीं पड़ता । उसने कहा, ‘तुम्हें कैसे दिखाई पड़ेगा... ! उसके लिए नाक कटवानी जरूरी है । और यह तो हिम्मतवरों का काम है । यह तो कभी कोई... । तो धर्म तो खड्ग की धार है । खानानिधार !'
एकाध हिम्मतवर खड़ा हो गया, क्योंकि यह तो चुनौती हो गई । उसने कहा, "क्या समझा है तुमने ? कोई नामर्दों का गांव है ! मैं तैयार हूं ।' उसने कहा, 'तैयार हो तो बस ठीक ।' वह उसे पास दूसरे खेत में ले गया, झाड़ की छाया के किनारे जाकर उसने उसकी नाक काट दी । चीख पड़ा वह आदमी । उसने कहा कि दिखाई तो कुछ पड़ता नहीं । उसने कहा, ‘पागल ! किसी से कहना मत ! क्या हमको दिखाई पड़ता है । मगर जब कट गई तो अपनी इज्जत तो बचानी है, अब तुम्हारी भी कट गई । अब अगर तुमने लोगों से जाकर कहा कि कुछ दिखाई नहीं पड़ता तो वह लोग हंसेंगे, तुम बुद्धू समझे जाओगे । तुम्हारी मर्जी ! अब तो तुम हमारे साथ ही हो जाओ । अब तो तुम जाकर, नाचते हुए जाओ और कहना, अहा ! जैसे हजारों सूरज एक साथ निकले हों, करोड़ों कमल खिले हों । हे प्रभु ! कैसा आनंद दिखला रहा है, कभी भी दिखाई न पड़ा था । अब तो तुम यही कहो ।'
'वैसे तुम्हारी मर्जी', उसने कहा, 'तुमको मैं कहता नहीं कि यही कहो । तुम्हें सच्चाई कहनी हो सच्चाई कह दो ।'
उसने कहा, 'अब क्या खाक सच्चाई कहेंगे ! अब नाक तो कट ही गई है, अब और कटवानी है क्या सच्चाई कहकर ?'
उसने जाकर गांव में शोरगुल मचा दिया । वह नाचता हुआ गया । गांव में कई लोग तैयार हो गये नाक कटवाने को । कहते हैं, धीरे-धीरे उस पूरे गांव की नाक कट गई । खबर राजा तक पहुंची । राजा भी आया देखने, गांव में लोग नाच रहे हैं, चीख रहे हैं, बड़े प्रसन्न हैं । राजा ने कहा -- हद्द हो गई ! ईश्वर को पाने की इतनी सरल तरकीब ! न सुनी, न शास्त्रों में पढ़ी ।
मगर जब इतने लोगों को हो गया है तो राजा तक तैयार हो गया । उसके वजीर ने कहा, "ठहरो महाराज ! इतनी जल्दी मत करो, क्योंकि इस आदमी को मैं...इसकी शक्ल मुझे पहचानी मालूम पड़ती है । यह तो दूसरे गांव का आदमी है और वहां के लोगों ने इसकी नाक काटी थी । तुम जरा रुको । नाक मत कटवा लेना । तुम्हारे कटवाने पर तो बड़ा उपद्रव हो जायेगा । फिर तो यह पूरा राज्य कटवा लेगा ।'
जिसकी कट जाती है, वह फिर उसकी बचाने की भी चेष्टा करता है । मैंने अब तक कोई धनपति नहीं देखा जिसकी नाक कट न गई हो; न कोई राजनेता देखा जिसकी नाक कट न गई हो । लेकिन अब किससे कहें ! अब यह दुख अपना किससे कहें, किससे रोयें ! अब जो हो गया, हो गया । और अपनी इज्जत यही है, इसी में है कि कहे चले जाओ कि बड़े आनंदित हैं, बड़े प्रसन्न हैं ।
तुम, जिन्होंने पा लिया है, उनकी तरफ जरा गौर से देखना । जिन्होंने बड़े महल बना लिये हैं, उनकी तरफ जरा गौर से देखना । जिनके पास तिजोड़ियां भर गई हैं, उनको जरा गौर से देखना । कुछ मिला है ?
पतंजली योग - यम करो, नियम करो, संयम करो; आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार करो; धारणा, ध्यान, समाधि करो । तो फिर चित्त की लहरें शांत हो जाएंगी ।
पंडित मटकानाथ ब्रह्मचारी को अपने आश्रम के लिए एक भैंस खरीदनी थी। वे गाय-भैंसों के बाजार में गए। एक भैंस उन्हें अच्छी लगी। उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट, मुख चमकीला, पूंछ लंबी, दांत सफेद, पैर सुडौल, चाल मस्त और सींग भी अत्यंत सुंदर थे। उसने अभी पहला ही बछड़ा जना था। दूध बीस किलो रोज देती थी। लेकिन कीमत भी उसकी कम न थी। पांच हजार से कम में उसे बेचने वाला तैयार न था। ब्रह्मचारी आगे बढ़ गया।
आगे चंदूलाल भी अपनी पवित्र, धार्मिक, मरियल, टूटी टांग व कड़ी पूंछ वाली भैंस बेचने के लिए खड़ा था। उसके दांत सड़े और सींग आड़े-तिरछे थे। शरीर बस हड्डियों का ढांचा था। ब्रह्मचारी मटकानाथ ने आश्चर्य से पूछा, अरे चंदूलाल! तुम भी भैंस बेच रहे हो?
हां, खरीदना है क्या? चंदूलाल ने प्रश्न किया।
यह दूध कितना देती है?
दूध! अरे दूध तो इसने आज तक नहीं दिया!
और बछड़े कितनी बार जन चुकी है?
चंदूलाल ने बताया, मेरी भैंस ने आज तक एक भी बछड़ा नहीं जना, और न कभी जनेगी।
इसे कौन खरीदेगा भाई? पंडित मटकानाथ ब्रह्मचारी ने पूछा, इसकी कीमत कितनी रखी है?
बीस हजार से एक पैसा कम नहीं।
बाप रे बाप! होश-हवास में हो या पी रखी है चंदूलाल? इसकी कीमत इतनी ज्यादा क्यों है?
ज्यादा कहां है! चंदूलाल ने कहा, ब्रह्मचारी होकर भी ब्रह्मचर्य का अर्थ नहीं समझते? भैंस ब्रह्मचारी है, बाल-ब्रह्मचारी है। और चरित्र की ही कीमत है।
दृष्टिविहीन साधु, दृष्टिविहीन त्यागी, दृष्टिविहीन महात्मा बस चंदूलाल की भैंस हैं। उनका चरित्र, उनका वैराग्य, उनके व्रत-उपवास, उनकी साधुता--सब झूठी है, सब ऊपर-ऊपर है, सब निर्वीर्य है, नपुंसक है, निष्क्रिय है; उससे कुछ सृजन कभी नहीं हुआ।
वास्तविक ब्रह्मचर्य सृजनात्मक होगा। उससे कुछ जन्मेगा। अगर बच्चे न जन्मेंगे तो उपनिषद जन्मेंगे। अगर बच्चे न जन्मेंगे तो कुरान जन्मेगी। अगर बच्चे न जन्मेंगे तो कोई सुंदर गीत, कोई नृत्य, कोई वीणा बजेगी, कोई बांसुरी बजेगी। लेकिन जन्म तो निश्चित होगा। अगर देह के तल पर न होगा तो आत्मा के तल पर होगा। उससे बुद्धत्व का जन्म होगा। उससे जिनत्व का जन्म होगा। उससे असली वैराग्य का जन्म होगा।
गैर-ध्यानी को तो बहुत बार मरना पड़ता है। ध्यानी एक ही बार मरता है--ध्यान में। उसके बाद सब मृत्यु झूठ हो जाती है।
मुल्ला नसरुद्दीन नमाज पढ़ने गया था । होगा ईद का उत्सव या कोई धार्मिक त्यौहार । हजारों लोग नमाज पढ़ रहे थे । उसकी कमीज उसके पाजामा में उलझी थी । तो पीछे वाले आदमी को जरा अच्छा नहीं लगा तो उसने झटका देकर कमीज को ठीक कर दिया । उसने सोचा कि मामला कुछ है । उसने सामनेवाले आदमी को... उसकी कमीज में झटका दिया । उस आदमी ने पूछा, क्या बात है? झटका क्यों देते हो? उसने कहा, भाई मेरे पीछेवाले से पूछो । मैं तो समझा कि रिवाज होगा । इस मस्जिद में पहले कभी आया नहीं ।
हम कर रहे हैं एक-दूसरे का अनुकरण । रस तो पाया कहां है? रस से तो तुम्हारी पहचान कहां हुई है? रस मिले तो प्रभु मिले । रस पा लिया तो सब पा लिया ।
अपने मतलब की बात
कथा :
एक आदमी जुआरी है, बड़ा जुआरी है ! सब गंवा दिया है । एक रात घर लौटा देर से । जूआ खेलकर ही लौटा था । पत्नी नाराज थी । उसने कहा -- तुम फिर पहुंच गये जुआ-घर ! अब बचा क्या है ? उसने कहा, 'जुआ-घर नहीं गया था, महाभारत हो रही थी रास्ते में, वहां बैठकर सुन रहा था । रास्ते से निकला, वहां महाभारत हो रही थी, वह देखता आया था ।' कुछ और बहाना न मिला तो यही उसने कह दिया । पत्नी ने कहा, 'मैं मान नहीं सकती, तुम और महाभारत सुनने गये ! तुम्हारे कपड़े से, तुम्हारे चेहरे से जुए-घर की बास आती है ।'
उसने कहा -- सुन देवी ! और वहां मैंने यह भी सुना महाभारत में कि युधिष्ठिर खुद जुआ खेलते थे । धर्मराज ! और जुआ खेलते थे । तू मेरे पीछे नाहक पड़ी है । इससे साफ सिद्ध होता है कि जुआ एक धार्मिक कृत्य है, युधिष्ठिर खेलते थे और धर्मराज थे ।
पत्नी ने कहा -- तो फिर ठीक है । तो सोच राखिओ, कि द्रौपदी के पांच पति थे ।
तुम्हारा विरोध, तुम्हारे रस की घोषणा है । लड़ना मत, अन्यथा हारोगे । इस जीवन का यह विरोधाभासी नियम ठीक से समझ लेना : जिससे तुम लड़े उसी से तुम हारोगे । लड़ना ही मत ! संघर्ष सूत्र नहीं है विजय का । साक्षी ! बैठ कर देखते रहो । अब बंदर उछल-कूद रहे हैं, करने दो । वे अपने स्वभाव से ही चले जाएंगे । तुमने अगर उत्सुकता न ली ।, तो बार-बार तुम्हारे द्वार न आएंगे । तुमने अगर उत्सुकता ली -- पक्ष में या विपक्ष में -- तो दोस्ती बनी ।
मेरे एक मित्र हैं, लेखक हैं । उनकी शादी हुई तो जिस घर में गए-देहाती हैं-जिस घर में शादी हुई, वह बड़ा संस्कारशील, कुलीन घर है । छोटी-छोटी पूड़ी! तो वे एक पूड़ी का एक ही कौर कर जाएं । उनकी पत्नी को शर्म आने लगी । पहली ही दफा विवाह के बाद आए थे पत्नी को लेने । तो उसने ऐसा कोने से छिप कर इशारा किया दो अंगुलियों का । इशारा किया कि दो टुकडे करके तो कम से कम खाओ । वे समझे कि शायद इस घर में दो पूड़ी एक साथ खाई जाती हैं । सो उन्होंने दो पूड़ियों का एक कौर बना लिया । मुझे कहते थे कि बड़ी बदनामी हुई ।
बोकाजू -- जब भूख लगती है तब भोजन करता हूं और तब सिर्फ भोजन करता हूं । और जब नींद आती है तब, और केवल तब ही सोता हूं । और तब केवल सोता हूं ।
एक बार बुद्ध कहीं प्रवचन दे रहे थे। अपने प्रवचन ख़त्म करते हुए उन्होंने आखिर में कहा, जागो, समय हाथ से निकला जा रहा है। सभा विसर्जित होने के बाद उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा, चलो थोड़ी दूर घूम कर आते हैं। आनंद बुद्ध के साथ चल दिए। अभी वे विहार के मुख्य दरवाजे तक ही पहुंचे थे कि एक किनारे रुक कर खड़े हो गए।
प्रवचन सुनने आए लोग एक-एक कर बाहर निकल रहे थे। इसलिए भीड़ सी हो गई थी। अचानक उसमे से निकल कर एक स्त्री गौतम बुद्ध से मिलने आई । उसने कहा -- तथागत, मै नर्तकी हूं । आज नगर सेठ के घर मेरे नृत्य का कार्यक्रम पहले से तय था, लेकिन मै उसके बारे में भूल चुकी थी। आपने कहा, समय निकला जा रहा है तो मुझे तुरंत इस बात की याद आई । उसके बाद एक डकैत बुद्ध की ओर आया। उसने कहा, तथागत मै आपसे कोई बात छिपाऊंगा नहीं। मै भूल गया था कि आज मुझे एक जगह डाका डालने जाना था कि आज उपदेश सुनते ही मुझे अपनी योजना याद आ गई। बहुत बहुत धन्यवाद!
उसके जाने के बाद धीरे धीरे चलता हुआ एक बूढ़ा व्यक्ति बुद्ध के पास आया। वृद्ध ने कहा, जिन्दगी भर दुनियादारी की चीजों के पीछे भागता रहा। अब मौत का सामना करने का दिन नजदीक आता जा रहा है, अब मुझे लगता है कि सारी जिन्दगी यूं ही बेकार हो गई। आपकी बातों से आज मेरी आंखें खुल गईं। आज से मैं अपने सारे दुनियादारी / मोह छोड़कर निर्वाण के लिए कोशिश करना चाहता हूं। जब सब लोग चले गए तो बुद्ध ने कहा, देखो आनंद! प्रवचन मैंने एक ही दिया, लेकिन उसका हर किसी ने अलग अलग मतलब निकाला। जिसकी-जितनी झोली होती है, उतना ही दान वह समेट पाता है। निर्वाण प्राप्ति के लिए भी मन की झोली को उसके लायक होना होता है। इसके लिए मन का शुद्ध होना बहुत जरूरी है।
संसार समय के माध्यम से देखा गया सत्य है। सत्य समय-शून्य माध्यम से देखा गया संसार है।
एक लंबी और थकान भरी यात्रा में, तीन मुसाफिर साथ हो लिये। उन्होंने अपने पाथेय से लेकर सुख-दुख, सबकी साझेदारी कर ली।
कई दिनों के बाद उन्हें मालूम हुआ कि अब उनके पास सिर्फ कौर भर रोटी और घूंट भर पानी बचा है और वे इस बात के लिये झगड़ने लगे कि यह पूरा भोजन किसको मिले? नहीं बात बनी, तो उन्होंने रोटी और पानी को बांटने की कोशिश की। फिर भी वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके।
जब रात उतरी तब एक ने सो जाने का सुझाव दिया। तय किया कि जागने पर वह व्यक्ति निर्णय करेगा जो रात में सबसे बढ़िया स्वप्न देखेगा।
दूसरी सुबह सूर्योदय के साथ तीनों मुसाफिर नींद से उठे।
पहले ने कहा, 'यह मेरा स्वप्न है। मैं ऐसे स्थानों में ले जाया गया, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। वे ऐसे अपूर्व, अदभुत और प्रशांत थे। और मुझे एक ज्ञानी पुरुष मिला, जिसने मुझे कहा कि तुम भोजन के हकदार हो, क्योंकि तुम्हारा व्यतीत और भावी जीवन, योग्य और सराहनीय है।'
दूसरे ने कहा, 'आश्चर्य की बात है, स्वप्न में मैंने अपने पूरे अतीत और भविष्य को देखा। और मेरे भविष्य में मुझे एक सर्वज्ञ पुरुष मिला, जिसने कहा कि अपने मित्रों से बढ़कर तुम रोटी के हकदार हो, क्योंकि तुम अधिक विद्वान और धैर्यवान हो। तुम्हारा पोषण ठीक से होना चाहिए, क्योंकि तुम निश्चित मनुष्यों के नेता बनने वाले हो।'
तीसरे यात्री ने कहा, 'मेरे स्वप्न में मैंने न कुछ देखा, न कुछ सुना, और न कुछ कहा। मैंने एक दुर्निवार वर्तमान का अनुभव किया, जिसने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उठूं, रोटी और पानी की तलाश करूं और तत्क्षण उनका भोग करूं। और मैंने वही किया।'
प्रसन्नता सद्भाव की छाया है; वो सद्भाव का पीछा करती है. प्रसन्न रहने का कोई और तरीका नहीं है ।
कंजूसी में मारवाड़ियों को भी मात कर देने वाले चंदूलाल परेशान सूरत लिए एक दिन मटकानाथ ब्रह्मचारी के पास पहुंचे और बोले, मेरी मदद कीजिए। पिछले दो सप्ताहों से लगातार मुझे एक सपना आ रहा है कि सौ-सौ रुपये के नोट आसमान से बरस रहे हैं, साथ में कुछ दस-दस और पांच-पांच के नोट भी हैं। लेकिन हवा इतनी जोर से चलती है कि सारे रुपये उड़ जाते हैं, जमीन पर गिर ही नहीं पाते। मैं तो इस सपने से बहुत ही परेशान हो गया हूं। रोज-रोज वही का वही बेहूदा सपना। आखिर हर चीज की एक सीमा होती है। मैं तंग आ गया हूं कृपा कर मेरी समस्या को सुलझाइए!
ब्रह्मचारी मटकानाथ ने अपने घड़े जैसी तोंद पर हाथ फेरते हुए कहा, धैर्य रखो भाई चंदूलाल। यह कोई विकट समस्या नहीं है। मैंने कई लोगों के एक से एक बेहूदे और भयानक दुख-स्वप्न तक समाप्त कर दिए हैं। इस तरह के रोगों की एक ही रामबाण दवा है- हनुमान-चालीसा। जैसे ही स्वप्न आए, बस हनुमान जी की जय बोलो और चालीसा पढ़ो। और फिर देखना चमत्कारिक प्रभाव बजरंग बली का! एक पल में नोट बरसने बंद हो जाएंगे।
क्या कहा- चंदूलाल ने गुस्से में कहा- अबे, मेरे तो प्राण ही निकल जाएंगे। अबे, नोटों का बरसना बंद नहीं करवाना, तेज हवा का चलना बंद करवाना है।
हे शक्तिशाली चेतन! धर्म-अधर्म, सुख-दुख मन के व्यापार हैं । न तू स्वरूपत: कर्ता है और न भोक्ता है । तू तो तत्त्वत: सदैव मुक्त ही है ।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी एक दिन अपने पति से बोली कि पच्चीस साल हो गए विवाहित हुए—कोई मेहमान घर आया था, उसके सामने ही उसने यह बात उठानी ठीक समझी, नसरुद्दीन शायद लज्जित हो जाए—पच्चीस साल हो गए, मैं इस घर में बंदिनी होकर रह रही हूं। कभी हम एक बार भी एक साथ घूमने भी घर के बाहर नहीं निकले!
नसरुद्दीन ने कहा, फजलू की मां, बात का इतना बतंगड़ मत बनाओ। इतनी बात बढ़ा—चढ़ाकर मत कहो। अतिशयोक्ति की तुम्हें आदत हो गई है। जब एक बार घर में स्टोव फट गया था, तो हम दोनों साथ—साथ बाहर निकले थे कि नहीं?
मैं वही फसल काटता हूं जो मैंने बोई है; अन्यथा कुछ भी हो नहीं सकता।
एक छोटे बच्चे से स्कूल में शिक्षक ने पूछा, तू इतनी देर से क्यों आया है?
तो उसने कहा, मैं गिर पड़ा और लग गई।
उसके शिक्षक ने कहा, अरे-अरे, मुझे माफ कर! मुझे क्या पता कि तू गिर पड़ा और लग गई। कहां लग गई? कहां गिर पड़ा?
उसने कहा, अब आप यह न पूछें तो अच्छा। बिस्तर पर गिर पड़ा और नींद लग गई!
ध्यानी को अकेला होना है--इतना अकेला होना है कि वहां कोई परमात्मा भी न रह जाए;
ढब्बूजी ने अखबार में शराब की बुराइयां छपी देखीं तो अखबार फेंकते हुए कहा, बंद! आज से बिलकुल बंद!
पास ही बैठे चंदूलाल ने पूछा, ढब्बूजी, क्या बंद कर रहे हो? क्या शराब पीना?
जी नहीं, अखबार लेना--ढब्बूजी ने जवाब दिया।
एक बार एक बुढ़िया एक डाक्टर के पास पहुंची और डाक्टर से बोली, डाक्टर साहब, क्या मैं अब सीढ़ियों के द्वारा चढ़-उतर सकती हूं?
एक महीने पहले ही डाक्टर ने उसके पैर का प्लास्टर छोड़ा था और उसे सीढ़ियां चढ़ने-उतरने के लिए मना किया था। डाक्टर ने बुढ़िया को अच्छी तरह चेक किया और बोला, जी हां, अब आप सीढ़ियां चढ़-उतर सकती हैं।
बुढ़िया ने चैन की सांस लेते हुए कहा, हे भगवान, शुक्र है तेरा! मैं तो पाइप के सहारे चढ़ कर अपने कमरे में जा-जा कर तंग आ गई थी।
विवाह एक पाठशाला है, जो तुम्हें एक बड़ा पाठ देती है कि दूसरे से तृप्ति नहीं हो सकती और दूसरे से आनंद नहीं मिल सकता।
मुल्ला नसरुद्दीन चंदूलाल से -- चंदूलाल, कुछ स्त्रियां ऐसे कपड़े पहनती हैं कि पुरुषों के प्राण निकलते हैं।
चंदूलाल -- हां, कुछ स्त्रियां भोजन भी ऐसा ही पकाती हैं।
अल्बर्ट आइंस्टीन - तुम अपने शुभ कर्मों रूपी बीज बोते रहो, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है कि इनमें से कौन सा फल देगा, हो सकता है कि सभी फल देने वाले हो जाएं ।
एक पेड पर तोता बैठा था वो अपनी भाषा मे रटा जा रहा था; नीचे चार मित्र बैठे थे । उन लोगो ने आपस मे बात करी कि ये तोता कया बोल रहा है । पहला मित्र जो व्यापारी था वो बोला -- तोता बोल रहा है 'लूण-तेल-अदरक'; दूसरा मित्र जो पहलवान था वो बोला -- नहीं-नहीं तोता बोल रहा है 'दंड-बैठक-कसरत'; तीसरा जो पनवाड़ी था, बोला -- तोता कहा रहा है 'पान-बीड़ी-सिगरेट'; चौथा, जो भक्त था, बोला -- नहीं-नहीं तोता कह रहा है 'सीता-राम-दशरथ' ।
फूलों को सोने की कसने की कसौटी पर कस-कस कर मत देखना, नहीं तो सभी फूल गलत हो जाएंगे ।
एक पुलिस इंस्पेक्टर एक जेबकतरा से कह रहा था: "जेब काटते हुए तुम्हें कभी शर्म नहीं आती?'
जेबकतरा ने कहा: "आती है साहब, जरूर आती है। तब किसी यात्री की जेब में एक रुपया भी नहीं मिलता तो बहुत शर्म आती है।'
हरयाणवी नौजवान से किसी ने पूछा -- कामयाबी के लिए छठ्ठ रखते हो ? उसने कहा -- छट्ठ तो नहीं लट्ठ रखता हूँ ।
जो अपने को खोएगा, वही पाएगा। और जो अपने को बचाएगा, बुरी तरह खो जाएगा। अज्ञात का निमंत्रण स्वीकर करो।
एक देहात में एक आदमी नये-नये खुले बैंक में उधार लेने गया। बैंक के मैनेजर ने पूछा, तुम्हारा काम क्या है? उसने कहा, मैं गाय-बैल बेचने का काम करता हूं। तुम्हारे पास कितने गाय-बैल हैं? उसने कहा, पांच सौ। ठीक है। उसको कोई ज्यादा चाहिए भी नहीं था, केवल दो हजार रुपये उधार मांग रहा था। दो हजार उसने उधार दे दिए। दो महीने बाद वह आकर पैसे चुका गया। जब उसने पैसे चुकाए और थैली खोली, तो उसके पास कम से कम पचास हजार रुपये थे। दो हजार उसने निकाल कर दे दिए नोट और बाकी नोट समेट कर उसने थैली में रख दिए..ऐसे जैसे कागज-पत्तर हों! मैनेजर ने पूछा, इतने रुपये तुम्हारे पास हैं, इनको बैंक में जमा कर दो, ब्याज भी मिलेगा। उसने कहा, ठीक है, तुम्हारे पास कितनी गाय-भैंसें हैं? जब दो हजार रुपये उधार दिए तो पांच सौ गाय-बैल, गाय-भैंसें; तो पचास हजार रुपये दे रहा हूं! गाय-भैंसें कहां हैं?
शाह की मुहर आने-आने पर; खुदा की मुहर है दाने-दाने पर।
पति कमरे में शराब पी रहा था,यह देखकर पत्नी गुस्से से बोली:-आपने तो कहा था कि बिना किसी वजह के शराब को हाथ भी नहीं लगाएंगे फिर ये सब क्या है?
पति:-वजह है पगली… वजह है...अब देखो, दीवाली आ रही है बच्चों को राकेट चलाने के लिए खाली बोतल चाहिए कि नहीं?
पक्ष
कथा :
एक आदमी ने एक किताब लिखी है । पश्चिम के मुल्कों में तेरह का आंकड़ा बुरा समझा जाता है । तो बड़ी होटलों में तेरहवीं मंजिल ही नहीं होती, क्योंकि वहां कोई ठहरता नहीं तेरहवीं मंजिल पर । बारहवीं मंजिल के बाद सीधी चौदहवीं होती है । चौदहवीं कहने से हल हो जाता है, है वह तेरहवीं; मगर चौदहवीं कह दी तो उतरनेवाले को क्या फिक्र है ! लेकिन तेरहवीं कहो तो कोई उतरने को राजी नहीं । तेरह नंबर का कमरा नहीं होता । तेरह तारीख को लोग यात्रा करने नहीं जाते ।
तो एक आदमी ने बड़ी किताब लिखी है । उसने सारे आंकड़े इकट्ठे किये हैं कि तेरह निश्चित ही खतरनाक आंकड़ा है । तेरह तारीख को कितने युद्ध शुरू हुए, उसने सब हिसाब बनाया है । तेरह तारीख को कितनी कार-दुर्घटनाएं होती हैं; तेरह तारीख को कितने लोग कैंसर से मरते हैं; तेरह तारीख को कितने तलाक होते हैं -- तेरह तारीख, तेरहवीं मंजिल, तेरह का जहां-जहां संबंध है, उसने बड़े हजारों आंकड़े इकट्ठे किये हैं ।
कोई मित्र मुझे दिखाने लाया था, वह भी बड़ा प्रभावित था । उसने कहा कि देखो, अब तो तथ्य सामने हैं । मैंने उससे कहा, तू चौदह तारीख की खोज कर, इतने ही तथ्य, चौदह तारीख में भी मिल जायेंगे । चौदह को भी लोग मरते हैं । चौदह को भी कार-दुर्घटनाएं होती हैं । और चौदहवीं मंजिल से भी लोग गिरते हैं । तू कोई भी तारीख के पीछे पड़ जा । जिंदगी इतनी बड़ी है, तुम कोई भी पक्ष तय कर लो, तुम्हें प्रमाण मिल जायेंगे ।
भक्त की भाषा है कि परमात्मा कर रहा है । ज्ञानी की भाषा है कि स्वभाव से हो रहा है ।
सुनते समय पूर्व-धारणाओं को लेकर मत चलना । नहीं तो पूर्व-धारणाएं पर्दे का काम करेंगी । रंग घोल देंगी जो कहा गया है उसमें । तुमने कभी खयाल किया, रात तुम अलार्म लगाकर सो गये हो, चार बजे उठना है ट्रेन पकड़ने । और जब अलार्म बजता है, तो तुम एक सपना देखते हो कि मंदिर की घंटियां बज रही हैं । अलार्म खतम! तुमने एक सपना बना लिया ।
अब घड़ी एलार्म बजाती रहे, क्या करेगी घड़ी? तुमने एक तरकीब निकाल ली । तुमने कुछ और सुन लिया! सुबह तुम हैरान होओगे कि हुआ क्या? अलार्म भरा था, अलार्म बजा भी, मैं चूक क्यों गया? तुम्हारे पास अपनी एक धारणा थी, एक सपना था । तो अगर तुमने सुना कोई पक्षपात के साथ, तो तुम कुछ का कुछ सुन लोगे ।
नास्तिक को समझाएं, तो नास्तिक और मजबूत नास्तिक हो जाता है। आस्तिक को समझाएं, तो आस्तिक और मजबूत आस्तिक हो जाता है।
खलील जिब्रान ने एक छोटी-सी कहानी लिखी है। एक गांव में एक महाआस्तिक और एक महानास्तिक था। सारा गांव परेशान था उनके कारण। क्योंकि आस्तिक लोगों को समझाता था कि ईश्वर है, नास्तिक समझाता था कि नहीं है। आखिर गांव ने उन दोनों से कहा कि तुम निर्णय पर पहुंच जाओ कुछ, ताकि हमारी परेशानी कम हो।
पूर्णिमा की एक रात, गांव ने विवाद का आयोजन किया और नास्तिक और आस्तिक ने प्रबल प्रमाण दिए। आस्तिक ने ऐसे प्रमाण दिए, जिनका खंडन मुश्किल था। नास्तिक ने ऐसा खंडन किया कि आस्तिकता के पैर डगमगा जाएं। रातभर विवाद चला और विवाद बड़ा परिणामकारी रहा। आस्तिक के प्रमाण इतने प्रभावशाली सिद्ध हुए कि सुबह होते-होते नास्तिक आस्तिक हो गया, और नास्तिक के तर्क इतने प्रभावशाली सिद्ध हुए कि सुबह होते-होते आस्तिक नास्तिक हो गया। गांव की मुसीबत जारी रही! गांव में एक महाआस्तिक और एक महानास्तिक बना रहा।
विज्ञान वस्तु के साथ मेहनत करता है, धर्म व्यक्ति के साथ मेहनत करता है।
आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में एक फुटबाल मैच हो रहा था। और दो दल थे। प्रोटेस्टेंट ईसाई, उनका एक दल था, और कैथोलिक ईसाई, उनका एक दल था। हजारों लोग देखने इकट्ठे हुए थे, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दोनों ही, क्योंकि दोनों के दल थे। और मामला सिर्फ फुटबाल का नहीं था, धर्म का हो गया था। जो जीतेगा.. .फुटबाल का ही सवाल नहीं है कि फुटबाल में जीत गया। अगर कैथोलिक पार्टी जीत गई, तो कैथोलिक धर्म जीत गया। और अगर प्रोटेस्टेंट पार्टी जीत गई, तो प्रोटेस्टेंट धर्म जीत गया।
भारी कशमकश थी, और भारी उत्तेजना थी, और दोनों दलों के लोग दोनों तरफ मौजूद थे अपने-अपने दल को प्रोत्साहन देने के लिए। और तब कैथोलिक दल ने बहुत अच्छा खेल लिया। विजय के करीब आते मालूम पड़े। एक आदमी उछल-उछलकर उनको प्रोत्साहन दे रहा था। वह इतनी खुशी में आ गया था कि अपनी टोपी भी उछाल रहा था। उसके पास के लोगों ने समझा कि यह कैथोलिक मालूम पड़ता है।
फिर हवा बदली और प्रोटेस्टेंट दल तेजी से जीतता हुआ मालूम पड़ने लगा। लेकिन' वह जो आदमी टोपी उछाल रहा था, वह अब भी टोपी उछालता रहा और नाचता रहा।
तब आस-पास के लोग जरा चिंतित हुए। तो पड़ोसी ने पूछा कि माफ करें, आप कैथोलिक हैं या प्रोटेस्टेंट? आप किसके पक्ष में नाच रहे हैं? किसकी खुशी में नाच रहे हैं? क्योंकि पहले जब कैथोलिक जीत रहे थे, तब भी आप टोपी उछाल रहे थे। तब भी बड़े आप आनंदित हो रहे थे। और अब जब कि कैथोलिक हार रहे हैं और प्रोटेस्टेंट जीत रहे हैं, तब भी आप आनंदित हो रहे हैं। तो आप किसके पक्ष में आनंदित हो रहे हैं?
उस आदमी ने कहा, मैं किसी के पक्ष में आनंदित नहीं हो रहा हूं मैं तो खेल का आनंद ले रहा हूं। जिस आदमी ने पूछा था, उसने अपनी पत्नी से कहा कि यह आदमी नास्तिक मालूम होता है।
अपने भीतर जो है, उसका नग्न दर्शन जरूरी है।
लंबा समय
कथा :
अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन में उल्लेख है कि एक मित्र के घर गया था । भुलक्कड़ आदमी था । बात चलती रही, भोजन हो गया । फिर बात चलती रही । मित्र बार-बार घड़ी देखे, जम्हाई ले । आइंस्टीन भी बार-बार घड़ी देखे, जम्हाई ले; लेकिन उठे न । आखिर मित्र ने कहा, 'दो बज रहे हैं, पत्नी राह देखती होगी... ।'
आइंस्टीन ने कहा, 'मतलब ?'
मित्र ने कहा, 'मेरा मतलब यह है कि पत्नी राह देखती होगी... । वैसे कोई हर्जा नहीं है, आप बैठें और ।' आइंस्टीन घबड़ाकर खड़ा हो गया । उसने कहा, 'हद्द हो गई, मैं तो सोचता था कि कब आप जायें तो मैं सोऊं । मैं तो यही सोच रहा था कि मैं अपने घर में हूं ।'
आदमी की बीमारी तो एक है -- कहो अज्ञान, कहो अहंकार कहो माया, कहो भ्रांति, कहो बेहोशी, मूर्च्छा, प्रमाद, पाप, विस्मरण --जो तुम कहना चाहो । बीमारी एक है, नाम हजार हैं ।
इमर्सन से कोई पूछता था, तुम्हारी उम्र कितनी है? तो इमर्सन ने कहा कि तीन सौ साठ वर्ष! अब इमर्सन, ईमानदार और सच्चा आदमी झूठ बोलेगा नहीं। जिसने पूछा, उसने समझा कि लगता है, मेरे सुनने में कोई भूल हो गई। उसने कहा, माफ करें। मैं ठीक से सुन नहीं पाया। कान पास लाया। इमर्सन ने जोर से कहा कि तीन सौ साठ वर्ष! उस आदमी ने कहा कि आप मजाक तो नहीं कर रहे! क्योंकि झूठ तो आप नहीं बोल सकते। मजाक तो नहीं कर रहे! तीन सौ साठ! ज्यादा से ज्यादा आप साठ साल के मालूम पड़ते हैं।
इमर्सन ने कहा कि अच्छा, तो तुम दूसरे हिसाब से नाप रहे हो। हमारा हिसाब और है। साठ साल में आदमी जितना जीता है, हम उससे छः गुना ज्यादा जी चुके हैं। एक-एक क्षण का हमने छः गुना ज्यादा उपयोग किया है। हम उस हिसाब से कहते हैं, तीन सौ साठ साल। अगर तुम भी साठ साल के हो, तो हम तीन सौ साठ साल के हैं। क्योंकि तुमने किया क्या है? जीए कहां हो?
तो वह आदमी पूछने लगा कि समझ लें कि आप छः गुना जी लिए। पा क्या लिया? और हम छः गुना कम जीए, तो क्या खो दिया? तो इमर्सन ने कहा, मेरी आंख में देखो, मुझे देखो, दो दिन मेरे पास रुक जाओ।
वह आदमी दो दिन इमर्सन के पास था। फिर उसके पैर छूकर, माफी मांगकर गया कि भूल हो गई कि मैंने आपसे पूछा कि क्या पा लिया। आज मैं पहली दफा जीवन में जानकर जा रहा हूं कि मैंने साठ साल सिर्फ गंवाए हैं; कुछ पाया नहीं।
दो दिन उसने देखी इमर्सन की शांति, देखी वह झील, जहां कोई एक रिपल, एक छोटी-सी तरंग भी नहीं उठती। देखा दो दिन इमर्सन के पास बैठकर कि उसके आस-पास शीतल विकिरण हो रहा है; उसके पास भी बैठकर जैसे स्नान हो जाता है। देखा इमर्सन के कमरे में सोकर और पाया कि सिर्फ इमर्सन के कमरे में सोने से भी उसके सपनों का गुणात्मक रूप बदल गया है; उसकी नींद की क्वालिटी बदल गई है। इमर्सन के साथ जंगल में चलकर देखा कि जंगल वही नहीं मालूम होता है। इस जंगल में वह पहले भी निकला था, लेकिन वृक्ष इतने हरे न मालूम पड़े थे। और फूल इतने ताजे न मालूम पड़े थे। और फूल इतने खिले न दिखाई पड़े थे। और पक्षियों का गीत इस तरह सुनाई नहीं पड़ा था, जैसा इमर्सन के साथ सुनाई पड़ने लगा।
एक शांत आदमी पास है, तो वह दूसरे को भी शांत करने की व्यवस्था जुटा देता है। दो दिन बाद वह क्षमा मांगकर लौटा। उसने कहा, मेरे साठ साल तो बेकार चले गए। अब जो थोड़े-बहुत दिन बचे हैं, क्या मैं कुछ पा सकता हूं?
इमर्सन ने कहा कि अगर छः क्षण भी बचे हों, और तुम अपने साथ ईमानदार हो, तो उतना पा सकते हो, जितना तीन सौ साठ साल में मैंने पाया। लेकिन अपने साथ ईमानदार, to be honest with onself.
'मुझे कोसा', 'मुझे मारा', 'मुझे हराया', 'मुझे लूटा' - जो मन में ऐसी गाठें बांधते रहते हैँ, उनका बैर शान्त नहीं होता ।
अर्थ का अनर्थ
कथा :
एक रोगी ने अपने डाक्टर से आकर कहा कि बड़ी कठिनाई है; जो आपने कहा था, हो नहीं पाता । डाक्टर ने कहा कि मैंने ऐसी कोई कठिन बात तुमसे कही न थी । इतना ही तो कहा था कि जो तुम्हारा बच्चा खाता है, वही भोजन तुम लो । इसमें क्या अड़चन है ? कुछ दिन तक जो तुम्हारा बच्चा लेता है, वही भोजन तुम लो, तो तुम्हारा शरीर ठीक रास्ते पर आ जायेगा ।
उसने कहा कि मैंने प्रयत्न तो किया, पर सफल न हो सका । डाक्टर ने कहा, 'क्या बेवकूफी है ? इतनी-सी बात तुमसे न हो सकी कि तुम्हारा बच्चा जो खाता है वही तुम खाओ ? दूध पीता है तो दूध पीओ । खिचड़ी खाता है तो खिचड़ी खाओ । और जितनी थोड़ी मात्रा में खाता है उतनी ही मात्रा में खाओ । यह भी तुमसे न हो सका ?'
उसने कहा -- डाक्टर साहब, मेरा बच्चा मोमबत्ती, कोयला, मिट्टी, जूते के फीते, ऐसी कौन-सी चीज है जो नहीं खाता ! वही तो मैं मरा जा रहा हूं खा-खाकर । मेरी हालत और खराब हो गई है ।
यहां सभी उदास हैं । पक्षी उदास है, उड़ नहीं पाता । हो सकता है, सोने के पिंजड़े से मोह लग गया हो । यहां कवि उदास है, क्योंकि उदासी के गीत ही लोग सुनते हैं और तालियां बजाते हैं । यहां विचारक उदास है, क्योंकि हंसते और आनंदित आदमी को तो लोग पागल समझते हैं, विचारक को कौन समझता है ? यहां सब उदास हैं । इस उदासी से भरे वातावरण में, उदासी के पार होना बड़ा मुश्किल मालूम होता है । यहां की हवा उदास है । यहां की हवा में कामवासना है, क्रोध है, लोभ है, मोह है । यहां मोक्ष की किरण को उतारना बड़ा कठिन है ।
एक रोगी ने एक दांत के डाक्टर से पूछा, कि क्या आप बिना कष्ट के दांत निकाल सकते हैं ?
डाक्टर ने कहा, हमेशा नहीं । अभी कल की ही बात है । एक व्यक्ति का दांत मरोड़ कर निकालते समय मेरी कलाई उतर गयी !
मुल्ला नसरुद्दीन को एक जगह नौकरी पर रखा गया । मालिक ने कहा, जब तुम्हें नौकरी पर रखा गया था, तब तुमने कहा था कि तुम कभी थकते नहीं, और अभी-अभी तुम मेज पर टांग पसार कर सो रहे थे ।
मुल्ला ने कहा, मालिक, मेरे न थकने का यही तो राज है ।
जीवन को स्वाभाविक रूप से जीना विद्रोह है । धार्मिक जीवन विद्रोही का जीवन है ।
एक दिन मटकानाथ ब्रह्मचारी अपने मित्र भोंदूमल को ज्ञान-दान कर रहे थे। भोंदूमल की जीवनचर्या की बहुत आलोचना कर रहे थे। उसने उसे अनेक उपदेश दिए, धर्मोपदेश दिए। अंत में उन्होंने जीवन में ब्रह्मचर्य का महत्व और ब्रह्ममुहूर्त में जागने के आध्यात्मिक लाभों पर प्रकाश डालने के बाद पूछा : सच-सच कहो भोंदूमल, तुम सोकर कब उठते हो?
उपदेश और सलाह-मशवरे सुन-सुन कर थक चुके भोंदूमल ने रोती सी आवाज में जवाब दिया, आप मानेंगे नहीं, लेकिन सच कहता हूं जैसे ही सूरज की किरणें मेरे कमरे में प्रवेश करती हैं मैं फौरन जाग जाता हूं।
फिर झूठ बोले—मटकानाथ ब्रह्मचारी का क्रोध भड़क उठा -- सरासर झूठ बोलते हुए तुझे शर्म नही आती? वाह रे निशाचर, सारा गांव जानता है कि तुम दिन भर सोते हो और शाम को चार बजे सोकर उठते हो। अरे कुंभकरण, कुछ तो लाज करो!
ईश्वर की सौगंध खाकर कहता हूं मैं झूठ नहीं बोलता -- भोंदूमल ने सफाई दी। मेरे कमरे के दरवाजे-खिड़कियों का मुंह पश्चिम दिशा की ओर है, मैं क्या करूं! उठता हूं तभी जब सूरज की किरणें मेरे मुंह पर पड़ती हैं। अब मकान ही गलत बना है तो उसमें मेरा क्या कसूर है?
अर्थ तो तुम निकालोगे अपने! ब्रह्ममुहूर्त शब्द में क्या अर्थ होगा? तुम अपना अर्थ डालोगे।
अल्बर्ट आइंस्टीन -- ईश्वर के सामने हम सभी एक बराबर ही बुद्धिमान हैं-और एक बराबर ही मूर्ख भी ।
पुलीस ट्रेनिंग के दौरान अफसर ने पूछा -- ये हाथ में क्या है?
संता : सर, बन्दूक है
अफसर : ये बन्दूक नहीं, तुम्हारी इज्जत है, शान है, ये तुम्हारी माँ है
फिर अफसर ने दूसरे सिपाही बंता से पूछा : ये हाथ में क्या है?
बंता : सर, ये संता की माँ है, उसकी इज्जत है, उसकी शान है, हमारी मौसी है
अल्बर्ट आइंस्टीन -- जब आप एक अच्छी लड़की के साथ बैठे हों तो एक घंटा एक सेकंड के समान लगता है; जब आप धधकते अंगारे पर बैठे हों तो एक सेकंड एक घंटे के समान लगता है - यही सापेक्षता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन अखबार पढ़ रहा था। अखबार में खबर छपी थी। किसी वैज्ञानिक ने हिसाब लगाया था कि जब भी तुम एक सांस लेते हो, उतनी देर में पृथ्वी पर पांच आदमी मर जाते हैं!
मुल्ला ने अपनी पत्नी को कहा, जो भोजन पका रही थी, कि 'सुनती हो, फजलू की मां, जब भी मैं एक बार सांस लेता हूं पांच आदमी मर जाते हैं!'
फजलू की मां ने कहा, 'मैंने तो कई दफे कहा कि तुम सांस लेना क्यों नहीं बंद करते! अब कब तक सांस लेते रहोगे और लोगों को मारते रहोगे?'
अल्बर्ट आइंस्टीन -- दो चीजें अनंत हैं: ब्रह्माण्ड और मनुष्य की मूर्खता; और मैं ब्रह्माण्ड के बारे में दृढ़ता से नहीं कह सकता ।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक साइकिल खरीदी। दुकानदार से कहा, सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा टिकाऊ साइकिल हो, कीमत चाहे जो हो सो ले लो।
दुकानदार ने सर्वश्रेष्ठ साइकिल देते हुआ कहा, नसरुद्दीन, एक साल के अंदर कोई टूट-फूट नहीं होगी, इसकी गारंटी है।
मुल्ला साइकिल पर सवार हुआ, चंदूलाल कैरियर पर बैठे, और चल पड़े घर की तरफ। पंद्रह मिनट बाद ही वापस आ गए और क्रोध में उबलते हुए मुल्ला ने चिल्ला कर दुकानदार से कहा, हद्द हो गई बेईमानी की भी! अरे एक साल की गारंटी दी और एक घंटे में टूट-फूट शुरू। वापस रखो अपनी साइकिल! हमें नहीं चाहिए।
क्या बात करते हो जी! दुकानदार ने हैरत में आकर कहा, कहां हुई टूट-फूट?
दिखता नहीं, अंधे हो क्या? मुल्ला तैश में आकर बोला, मेरे चार दांत टूट गए और इस बेचारे चंदूलाल का कीमती चश्मा टूट गया!
अल्बर्ट आइंस्टीन -- हर कोई जीनियस है. लेकिन अगर आप एक मछली को उसके पेड़ पर चढ़ने की काबिलियत के हिसाब से आंकेंगे तो वो पूरी उम्र यही सोच कर जियेगी कि वो मूर्ख है ।
चंदूलाल मुल्ला नसरुद्दीन से बोला, मुल्ला, मैं बहुत कम बोलने वाला आदमी हूं।
नसरुद्दीन ने कहा कि हां, वैसे तो शादी मेरी भी हो चुकी है।
अल्बर्ट आइंस्टीन -- एक जहाज हमेशा किनारे पर सुरक्षित रहता है - लेकिन वो इसलिए नहीं बना होता है ।
एक महिला अपने बीमार पति को देखने अस्पताल गई और उसकी तबीयत का हाल पूछा। पति ने कहा -- बुखार तो टूट गया; अब टांग में दर्द है। पत्नी बोली -- लल्लू के पापा! घबड़ाओ मत जी। अरे जब बुखार ही टूट गया, तो टांग भी टूट जाएगी।
सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर ।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर ॥
शादी के बाद पहली बार बहू रसोई मे गई और रेसिपी बुक में पढ़कर खाना बना रही थी । सास बाहर से घर लौटी, फ्रिज खोला, अन्दर देखकर अचंभित हुई और पूछी: ये मन्दिर का घण्टा फ्रिज में क्यों रखा है ? बहू : किताब में लिखा है, सब चीजों का मिश्रण कर लें और एक घण्टा फ्रिज में रखें ।
(कबीर)
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं ॥
जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर से मिलन नहीं हुआ लेकिन जब घमंड खत्म हो गया तभी ईश्वर का साक्षात्कार हुआ ।
बहू जींस पहनकर घर से बाहर जैसे ही जाने लगी, सास ने कहा -- क्या जमाना है !! बहू ने पलटकर कहा -- दही जमा लेना माँजी ।
(कबीर)
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय ॥
प्रेम खेत में नहीं पैदा होता है और न ही प्रेम बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, अपना सिर दो और इसे ले जाओ ।
पागलों के अस्पताल के एक रूम में सभी पागल डांस कर रहे थे.. बस एक पागल चुपचाप बैठा था . . . डॉक्टर समझा, वो ठीक हो गया और पूछा तुम डान्स क्यों नहीं कर रहे? पागल: अरे बेवकूफ मै दूल्हा हूँ...!
जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।
मुल्ला नसरुद्दीन से उसका मकान मालिक कह रहा है, 'नसरुद्दीन, रुपये तुमने उधार लिए थे, क्या बिल्कुल भूल गए? आज छह महीने होने आ गए हैं, वापसी का कोई नाम नहीं है!' नसरुद्दीन ने कहा, 'बड़े मियां, थोड़ा समय तो दो, निश्चित ही भूल जाऊंगा। तुम हर महीने याद दिलाए चले जाते हो; भूलने ही नहीं देते। थोड़ा समय दो।'
छोटा बच्चा अपनी बूढ़ी दादी से पूछता है: दादी मां, क्या आप टें बोल सकती हैं? दादी मां ने कहा: हां बेटे, क्यों नहीं बोल सकती!
बच्चा बोला: अच्छा तो बोलिए! क्योंकि मां कह रही थी कि जब यह बुढ़िया टें बोलेगी तो बहुत सारा पैसा मिलेगा।
भीड़
कथा :
एक राजनेता मरा । उसकी पत्नी दो वर्ष पहले मर गयी थी । जैसे ही राजनेता मरा, उसकी पत्नी ने उस दूसरे लोक के द्वार पर उसका स्वागत किया । लेकिन राजनेता ने कहा -- अभी मैं भीतर न आऊंगा । जरा मुझे मेरी अर्थी के साथ राजघाट तक हो आने दो ।
पत्नी ने कहा अब क्या सार है ? वहां तो देह पड़ी रह गयी, मिट्टी है । उसने कहा मिट्टी नहीं; इतना तो देख लेने दो, कितने लोग विदा करने आये !
राजनेता और उसकी पत्नी भी अर्थी के साथ-साथ, किसी को तो दिखाई न पड़ते थे, पर उनको अर्थी दिखाई पड़ती थी, चले । बड़ी भीड़ थी ! अखबारनवीस थे, फोटोग्राफर थे । झंडे झुकाए गये थे । फूल सजाये गये थे । मिलिट्री के ट्रक पर अर्थी रखी थी । बड़ा सम्मान दिया जा रहा था । तोपें आगे-पीछे थीं । सैनिक चल रहे थे । गदगद हो उठा राजनेता ।
पत्नी ने कहा, इतने प्रसन्न क्या हो रहे हो ?
उसने कहा, अगर मुझे पता होता कि मरने पर इतनी भीड़ आयेगी तो मैं पहले कभी का मर गया होता । तो हम पहले ही न मर गये होते, इतने दिन क्यों राह देखते ! इतनी भीड़ मरने पर आये इसी के लिए तो जीये ! भीड़ के लिए लोग जीते हैं, भीड़ के लिए लोग मरते हैं ।
संन्यास संसार की महत्वाकांक्षा की पराजय से फलित होता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन गाड़ी में बैठकर आ रहा था। भरी धूप, गर्मी के दिन, और वह कांच न उतारे खिड़कियों के। मैंने उससे पूछा कि मार डालोगे? वह कहने लगा, मर जाना ठीक है, लेकिन मोहल्ले वालों को यह पता चल जाए कि गाड़ी एयर-कंडीशंड नहीं, यह बरदाश्त के बाहर है।
दूसरों के पास एयर-कंडीशंड गाड़ी है। हवा के झोंके बाहर हैं, लेकिन वह दरवाजे-खिड़कियां बंद किए बैठा है। पसीने से तर-बतर है, लेकिन बरदाश्त करना ही होगा। दूसरों का अनुकरण!
विलियम शेक्सपीयर -- यदि तुम प्यार करते हो और तुम्हे कष्ट मिलता है तो और प्यार करो । अगर तुम और प्रेम करते हो और तुम्हे ज्यादा कष्ट मिलने लगता है तो और भी ज्यादा प्रेम करो । अगर तुम और भी ज्यादा प्रेम करते हो और फिर भी तुम्हे कष्ट मिलता है तो तबतक प्रेम करते रहो जबतक की कष्ट मिलना बंद न हो जाये ।
जेम्स थरबर की एक बहुत प्रसिद्ध कथा है कि सांपों के देश में एक बार एक शांतिप्रिय नेवला पैदा हो गया। नेवलों ने तत्क्षण उसे शिक्षा देनी शुरू की कि सांप हमारे दुश्मन हैं। पर उस नेवले ने कहा, 'क्यों? मेरा उन्होंने अब तक कुछ भी नहीं बिगाड़ा।' पुराने नेवलों ने कहा, 'नासमझ, तेरा न बिगाड़ा हो, लेकिन वे सदा से हमारे दुश्मन हैं। उनसे हमारा विरोध जातिगत है।' पर उस शांतिप्रिय नेवले ने कहा, 'जब मेरा उन्होंने कुछ नहीं बिगाड़ा तो मैं क्यों उनसे शत्रुता पालूं।'
खबर फैल गई नेवलों में कि एक गलत नेवला पैदा हो गया है, जो सांपों का मित्र और नेवलों का दुश्मन है। नेवले के बाप ने कहा, 'यह लड़का पागल है।' नेवले की मां ने कहा, 'यह लड़का बीमार है।' नेवले के भाइयों ने कहा, 'यह लड़का, यह हमारा भाई बुजदिल है।' समझाया बहुत उसे कि यह हमारा फर्ज है, राष्ट्रीय कर्तव्य है, कि हम सांपों को मारें। हम इसीलिए हैं। इस पृथ्वी को सांपों से खाली कर देना है, क्योंकि उन के कारण ही सारी बुराई है। सांप ही शैतान हैं। उस शांतिप्रिय नेवले ने कहा, 'मैं तो इसमें कोई फर्क नहीं देखता। सांपों को भी मैं देखता हूं, मुझे उन में कोई शैतान नहीं दिखाई पड़ता। उनमें भी संत हैं और शैतान हैं, जैसे हम में भी संत और शैतान हैं।'
खबर फैल गई कि वह नेवला वस्तुतः सांप ही है। सांपों की तरह रेंगता है। और उससे सावधान रहना। क्योंकि शक्ल उसकी नेवले की है और आत्मा सांप की है। बड़े-बूढ़े इकट्ठे हुए, पंचायत की और उन्होंने आखिरी बार कोशिश की नेवले को समझाने की कि 'तू पागलपन मत कर।' उस नेवले ने कहा, 'लेकिन सोचना-समझना तो जरूरी है।' एक नेवला भीड़ में से बोला, 'सोचना-समझना गद्दारी है।' दूसरे नेवले ने कहा, 'सोचना-समझना दुश्मनों का काम है।'
फिर जब वे उसे न समझा पाये तो उस नेवले को उन्होंने फांसी दे दी। जेम्स थरबर ने अंतिम वचन इस कहानी में लिखा है, कि यह शिक्षा मिलती है कि अगर तुम अपने दुश्मनों के हाथ न मारे गये, तो अपने मित्रों के हाथ मारे जाओगे। मारे तुम जरूर जाओगे।
परमात्मा में प्रविष्ट होने पर ही व्यक्ति समाज से मुक्त हो पाता है।
एक स्कूल में एक शिक्षक ने अपने बच्चों से पूछा कि अगर एक घर के भीतर आंगन में दस भेड़ें बंद हों और एक छलांग लगा कर दीवाल से बाहर निकल जाए तो कितनी भीतर रहेंगी? एक बच्चा जोर से हाथ हिलाने लगा । उसने कभी हाथ हिलाया भी न था । वह बच्चा सबसे ज्यादा कमजोर बच्चा था । शिक्षक बड़ा खुश हुआ; उसने कहा, अच्छा पहले तू उत्तर दे । उसने कहा, एक भी न बचेगी । शिक्षक ने कहा, पागल हुआ है? मैं कह रहा हूं दस भेड़ें भीतर हैं और एक छलांग लगा कर निकल जाए तो भीतर कितनी बचेंगी? तुझे गणित आता है कि नहीं? तुझे गिनती आती है कि नहीं?
उस छोटे लड़के ने कहा, गिनती आती हो या न आती हो, भेड़ें मेरे घर में हैं । मैं भेड़ों को जानता हूं । एक छलांग लगा गई, सब लगा गईं । गणित तुम समझो, भेड़ों को मैं समझता हूं । और भेड़ें गणित को नहीं मानतीं । भेड़ तो अनुकरण से जीती है ।
भीड़ भेड़ है । सदगुरु तुम्हें भीड़ से मुक्त कराता है ।
एक रात एक झाड़ पर एक हंस के जोड़े ने विश्राम किया। उस झाड़ पर कौओं का बसेरा था। हंस तो जा रहा था मानसरोवर, लेकिन रात हो गई, थका था, तो विश्राम कर लिया। सुबह जब चलने को हुआ और अपनी हंसनी से कहा कि चल अब उड़ चलें, तो कौओं ने कहा कि यह क्या शरारत है? एक तो हमने ठहराया और तुम हमारी पत्नी को ले चले! यह अतिथि का ढंग है? एक तो हम मेजबान और यह तुम हमें फल दे रहे हो! यह धन्यवाद!
हंस की आंखें तो फटी की फटी रह गईं। उसने कहा, क्या तुम कहते हो? यह तुम्हारी पत्नी! यह मेरी हंसनी है। तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती? तुम काले, यह गोरी!
कौओं ने कहा, किसको धोखा दे रहे हो? यह काली है, किसने कहा गोरी है? वहां तो कौए ही कौए थे। सारे कौओं ने कांव-कांव करके कहा, काली है! गोरी कौन कहता है? मतदान हो जाए।
हंस तो समझ गया कि झंझट है। मतदान में भी क्या होगा--कौए ही कौए हैं! भीड़ ही इनकी है। हंस ने कहा कि भई तुम्हारी इस बस्ती में कोई अदालत, कोई काजी, कोई न्यायाधीश है?
उन्होंने कहा, है। चलो, वहां निर्णय करवा लें।
गया हंस। न्यायाधीश भी कौआ था। कौओं की बस्ती थी। हंस ने तो सिर फोड़ लिया। उसने कहा, मारे गए! जूरी भी हैं कि नहीं? कहा कि जूरी भी हैं। बारह कौए बैठे थे जूरी में। पुलिसवाले कौए, क्लर्क कौए, मजिस्ट्रेट कौआ, जूरी कौए--अदालत कौओं की थी। हंस ने कहा, मुकदमा लड़ना बेकार है। मैं हार ही गया।
अंधे के लिए कहीं कोई सूरज नहीं, कहीं कोई चांदतारे नहीं। आंख वाले के लिए अंधेरे में भी रोशनी है।
एक भूतपूर्व एम.एल.ए. बस स्टॉप पर खड़ा हुआ आकर और थोड़ी देर बाद गिर पड़ा गश खाकर।
उसकी चेतना उड़ गई और उसके आस-पास अच्छी-खासी भीड़ जुड़ गई। एक आदमी ने लोगों से अनुरोध किया कि आप ये भीड़ हटा लीजिए बेचारे को हवा आने दीजिए। तब मैंने कहा, 'नहीं! ये भीड़ रहने दीजिए आपको शायद मालूम नहीं है कि यह बेहोश पड़ा व्यक्ति एक हारा हुआ विधायक है; हाल-फिलहाल ये भीड़ इसके लिए लाभदायक है; आप भीड़ हटाने की नादानी क्यों कर रहे हैं; अरे, भीड़ ने साथ छोड़ दिया था इसीलिए तो ये दौरे पड़ रहे हैं!'
अगर संख्या से तय होता हो सत्य, तो महावीर, बुद्ध और कृष्ण सब गलत हैं। संख्या तो मूर्खों की अधिक है। करोड़ों-करोड़ों अरबों-अरबों लोग कैसे गलत हो सकते हैं? और लोकतंत्र ने और एक लोगों को भ्रांति दे दी है कि जहां भीड़ है, जहां अधिक लोगों के हाथ हैं, वहां सत्य है।
मुल्ला नसरुद्दीन, चंदूलाल और ढब्बूजी तीनों एक दिन जम कर पी गए। नशे में ढब्बूजी ने चंदूलाल से कहा, यार, आज तो इच्छा हो रही है कि ताजमहल ही खरीद डालूं।
चंदूलाल बोले, वाह भाई वाह! ऐसे कैसे खरीद लोगे? अरे जब मैं बेचूंगा तभी खरीदोगे न! फिलहाल उसे बेचने का मेरा कोई इरादा नहीं है।
तभी नसरुद्दीन बीच में ही उसकी बात काटते हुए बोला, अबे चंदूलाल के बच्चे, तेरा बेचने का इरादा भी होगा तो कैसे बेचेगा? अरे जब मैं खाली करूंगा तभी तो बेचेगा न! तू क्या सोचता है मैं उसे आसानी से खाली करने वाला हूं?
जो दिन गया सो जान दे, मूरख अबहूं चेत। कहता पलटूदास है, करिले हरि से हेत ॥
बर्नार्ड शॉ को किसी ईसाई पुरोहित ने कहा कि आप अपने को ईसाई नहीं मानते; करोड़ों लोग ईसाई हैं, क्या इतने लोग गलती कर सकते हैं, क्या इतने लोग गलत हो सकते हैं? बर्नार्ड शॉ ने जो उत्तर दिया वह बहुत अदभुत है। खूब ध्यानपूर्वक सुनना। बर्नार्ड शॉ ने कहा: इतने लोग सही हो ही नहीं सकते। क्योंकि सत्य तो कभी किसी एकाध के जीवन में उतरता है। इतने लोग अगर सत्य हों तो सारी पृथ्वी सत्य से जगमग हो जाए। बर्नार्ड शॉ ने कहा कि मैं तो इसीलिए ईसाई नहीं हूं कि इतने लोग ईसाई हैं तो सब गड़बड़ होगा। नहीं तो इतने लोग ईसाई हो सकते थे?
जहां भीड़ चले वहां सावधान हो जाना। भीड़ चाल भेड़ चाल है। और परमात्मा की तलाश तो केवल वे ही कर पाते हैं जिनके पास सिंहों की आत्मा है—जो सिंहनाद कर सकते हैं।
दरिया -- बगुले से तो कौआ भला, कम से कम बाहर भीतर एक ही रंग तो है।
कर्ता
कथा :
एक आदमी की स्त्री भाग गयी, तो उसे खोजने निकला । खोजते -खोजते जंगल में पहुंच गया । वहां एक साधु एक वृक्ष के नीचे बैठा था । उसने पूछा कि मेरी स्त्री को तो जाते नहीं देखा ? घर से भाग गई है । बड़ा बेचैन हूं । तो उस साधु ने पूछा, तेरी स्त्री का नाम क्या है ? उसने कहा, 'मेरी स्त्री का नाम, मुसीबत ।'
साधु ने कहा, 'मुसीबत ! तुमने भी खूब नाम रखा । ऐसे तो सभी स्त्रियां मुसीबत होती हैं, बाकी तूने नाम भी खूब चुनकर रखा । तेरा नाम क्या है ?' साधु उत्सुक हुआ कि यह तो नाम में बड़ा होशियार है । उसने कहा, 'मेरा नाम मूर्ख ।'
वह साधु हंसने लगा । उसने कहा, तू खोजबीन छोड़ । तू तो जहां बैठ जायेगा, मुसीबतें वहीं आ जायेंगी । कोई कहीं तुझे जाने की जरूरत नहीं ।
तेरा मूर्ख होना काफी है । मुसीबतें तुझे खुद खोज लेंगी । तुम जो भी करोगे बंधन होगा ।
भय से जो निकलता है, वह संसार है ।
मुल्ला नसरुद्दीन शांत बैठा था अपने घर में । और पत्नी एकदम उस पर टूट पड़ी और कहा कि अब तुम मुझे और न भड़काओ । अरे, नसरुद्दीन ने कहा, हद हो गई । मैं अपना शांत बैठा अपना हुक्का गुड़गुड़ा रहा हूं एक शब्द नहीं बोला । शब्द न निकले इसलिए हुक्के को मुंह में डाले बैठा हूं और तू कहती है और न भड़काओ । बात क्या है? उसने कहा, इसीलिए तो! इसीलिए कि तुम इतने चुप बैठे हो कि इससे भड़कावा पैदा होता है । बोलो कुछ । चुप बैठने का मतलब? बैठे-बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे हो और मैं यहां मौजूद हूं!
आदमी न बोले तो फंसता, बोले तो फंसता । लोग तैयार हैं । लोग उबले बैठे हैं, कोई भी बहाना चाहिए ।
तुम्हें कोई क्रोध न दिलवाए और क्रोध तुम्हारे भीतर भरा हो तो तुम कुछ न कुछ बहाना खोज कर उसे बाहर निकाल कर रहोगे ।
एक कारागृह में एक आदमी प्रविष्ट हुआ । एक कोठरी में उसे ले जाया गया । कोठरी में जो पहले से ही कारागृह में बंद आदमी था, उसने पूछा, कितने दिन की सजा हुई? इस आदमी ने कहा, दो साल की । उसने कहा -- तू वहीं दरवाजे के पास अपना डेरा रख । जल्दी तेरे को निकल जाना है । इधर हमको तीस साल रहना है । उसकी अकड़! वहीं रख डेरा दरवाजे के पास । ऐसे ही कोई सिक्सडू मालूम होता । नौसिखुआ! चले आए! करना-धरना नही आता कुछ । अभी वही रह । तेरे जाने का वक्त तो जल्दी आ जाएगा । दो साल ही हैं न कुल? इधर तीस साल रहना है । तो दादा गुरु... । कारागृह में लोग अपने पाप का भी बखान करते हैं जोर से । बड़ा करके बढ़ा-चढ़ा कर अतिशयोक्ति करके । ठीक वैसा ही जैसा कि तुम रुपया दान दे आते तो हजार बताते हो ।
एक सज्जन मेरे पास आए, पत्नी उनके साथ थी । पत्नी ने अपने पति की प्रशंसा में कहा कि बड़े दानी हैं । शायद आपने इनका नाम सुना हो, न हो, एक लाख रुपया दान कर चुके अब तक । पति ने ऐसा धक्का मारा हाथ से और कहा, एक लाख दस हजार । यह कोई बात है! वह दस हजार की चोट लग गई उनको कि दस हजार भूले ना रही है, क्या मामला है?
जैसे ताजा दूध शीघ्र नहीं जमता, उसी तरह किया गया पाप शीघ्र नहीं फलता, राख से ढंकी आग की तरह जलता हुआ वह मूर्ख का पीछा करता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन और उसके मित्र में कुछ झंझट हो गयी थी। वर्षों बीत गये उस बात को, लेकिन जब भी मिलना होता है तो मुल्ला उसे याद दिलाता है कि खयाल रखना! आखिर एक दिन उसने कहा कि देखो मुल्ला, कितनी बार तुमसे क्षमा मांग चुका, और कितनी बार तुम क्षमा कर चुके, और कितनी बार तुम मुझसे कह चुके कि ठीक है, भुला दी बात, क्षमा कर दी, फिर तुम याद क्यों दिलाते हो? मुल्ला ने कहा, मैंने भुला दी, वह ठीक है, लेकिन तुम मत भूल जाना, इसीलिए याद दिलाता हूं।
जब दूसरे को याद दिलानी पड़े, तो खुद भी याद रखनी ही पड़ती है।
एक युवा अपनी प्रेयसी के साथ समुद्र के तट पर गया है । चांदनी रात है । और समुद्र में जोर से लहलहा कर लहरें आ रही हैं तट की तरफ । वह युवक आकाश की तरफ मुंह उठा कर सागर से कहता है, हे सागर! लहरा, जोर से लहरा! अपनी पूरी शक्ति से लहरों को उठा!
इतनी सुंदर रात और लहरें तो उठ ही रही हैं, लहरें उठ कर तट की तरफ आ ही रही हैं । उसकी प्रेयसी कहती है, आश्चर्य, तुम्हारी इतनी सामर्थ्य! मुझे कभी पता न था कि सागर तुम्हारी मानता है । तुमने कहा, लहरें उठो, और लहरें उठने लगीं! और तुमने कहा, लहरें आओ तट की तरफ, और लहरें तट की तरफ आने लगीं!
जिसकी तुमने स्वतंत्रता छीनी, उसे तुमने स्वच्छंद होने के लिए उकसाया ।
नसरुद्दीन एक नदी में नहा रहा है । गहरी नदी है । उसे अंदाज नहीं, आगे बढ़ गया और डूबने की हालत हो गई । एक आदमी ने उसे निकाल कर बचाया । फिर वह आदमी जहां भी मिल जाता उसे--रास्ते में, बाजार में, मस्जिद में--वह कहता, याद है, मैंने ही तुम्हें बचाया था! नसरुद्दीन परेशान हो गया । कोई मौका न चूके वह आदमी । जहां भी मिल जाए, वह कहे, नसरुद्दीन याद है, मैंने तुम्हें नदी में डूबते से बचाया था ।
एक दिन नसरुद्दीन ने उसका हाथ पकड़ा और उसे कहा कि याद है, जल्दी मेरे साथ आओ । उसने कहा, कहां ले जाते हो? उसने कहा, जल्दी तुम मेरे साथ आओ । नदी के किनारे खड़े होकर नसरुद्दीन कूद पड़ा । जितने गहरे पानी में उसने बचाया था, उसमें खड़े होकर कहा कि मेरे भाई, अब तू जा, बचाना मत । वह बहुत मंहगा पड़ गया था । तू जा! अब हम बच सकेंगे तो बच जाएंगे, मरेंगे तो मर जाएंगे । बाकी तू मत बचाना । तू देख ले कि अब हम बिलकुल उतने ही पानी में आ गए हैं न, जितने पानी से तूने निकाला था! अब तू जा ।
हम जो भी थोड़ा सा कर लेते हैं, तो उसका ढिंढोरा पीटते फिरते हैं । वह ढिंढोरा पीटना ही बताता है कि वह हमारे लिए कर्तव्य नहीं था; वह सौदा था । उस करने में हमने कोई आनंद नहीं पाया था । उसमें भी हमने कोई bargain किया था । उसमें भी हमने कोई सौदा किया था; उसमें भी हम अर्थशास्त्र के बाहर नहीं थे ।
तुम दुनिया में रहो मगर दुनिया तुम्हारे अन्दर नहीं रहनी चाहिए ।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने गांव में ज्योतिषी का काम भी करता था। बैठा था बाजार में अपनी दुकान खोलकर, कि गांव का एक राजनेता जो कि चुनाव अभी—अभी हार गया था, वहां से निकला। नसरुद्दीन ने कहा कि ठहरो, अपना भविष्य नहीं जानना चाहते? उस राजनेता ने कहा, छोड़ो भविष्य अब; अब मैं हार चुका, अब कोई भविष्य नहीं है। मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं। मेरे लिए तुम्हारे ज्योतिष का कोई मूल्य नहीं है। नसरुद्दीन ने कहा, रुको। यह तो जान लो कि आत्महत्या में सफल होओगे या नहीं!
अल्वेयर कामू -- आदमी चाहे कुछ और न कर सकता हो, चाहे सभी जगह आदमी असफल, असमर्थ मालूम पड़ता हो, लेकिन आत्मघात एक ऐसी बात है, जिससे सिद्ध हो जाता है कि हम भी हैं।
जज: नसरुद्दीन, तुम्हारी इतनी हिम्मत आखिर कैसे हुई कि तुमने अपनी पत्नी को झाडू से मारा?
मुल्ला: क्या करूं हुजूर, परिस्थिति ही ऐसी थी कि मैं क्या आप खुद भी यदि मेरी जगह होते तो चूकते नहीं!
जज ने पूछा: क्या मतलब? मैं समझा नहीं।
मुल्ला: जरा विस्तार से सुनिए। मेरी बीबी की पीठ मेरी तरफ थी। पास ही में मूठ वाली झाडू पड़ी थी। उसकी गर्दन में दर्द था, अतः वह एकदम से मुड़ कर पीछे देख भी नहीं सकती थी। और फिर पीछे वाला दरवाजा भी खुला हुआ था। अब बताइए इसमें मेरा क्या दोष है?
तुम अपनी जिंदगी को देखोगे तो बस ऐसा ही पाओगे: एक लहर आई, धका गई, तुम कुछ कर गए; दूसरी लहर आई, धका गई, तुम कुछ कर गए। और फिर भी तुम सोचते हो तुम कर्ता हो! फिर भी तुम सोचते हो तुम्हारे कृत्य कर्म हैं!
नहीं, कर्म नहीं हैं, प्रतिकर्म हैं। भीड़ के धक्कमधक्के में हो रहे हैं। तुम अपने मालिक नहीं हो। जो जागा नहीं है, वह अपना मालिक होता नहीं है। तुम नींद में हो। इस नींद में तो तुम अगर स्वर्ग भी पहुंच जाओ तो भी नरक ही पाओगे।
बुद्ध : अगर कोई खुँखार डाकु आपके अंग दुधारी तलवार से काट रहा हैं और अगर आप के मन में नफरत जागती हैं तो आप मेरी शिक्षा का आचरण नहीं कर रहे हैं ।
झेन फकीरों में यह मजाक बहुत चलती है।
एक झेन फकीर मरने के करीब था, आंख खोली, उसने अपने शिष्यों से पूछा कि भाई, मैं तुमसे एक बात पूछता हूं, मरने की घड़ी करीब आ गयी। तुमने कभी ऐसा सुना है कि कोई आदमी बैठे-बैठे मरा हो? शिष्यों ने कहा, बैठे-बैठे! देखा तो नहीं, मगर हमने सुना है कि कुछ फकीर बैठे-बैठे पद्मासन में मरे। तो उसने कहा, फिर जाने दो, वह बात जंचेगी नहीं कुछ। तुमने ऐसा सुना है, कोई आदमी खड़े-खड़े मरा हो? उन्होंने कहा, यह जरा दुर्गम बात हैं, कठिन बात है: मगर सुना है हमने कि कभी-कभी ऐसे फकीर भी हुए हैं कि खड़े-खड़े मरे हैं। उसने कहा, यह भी जाने दो। तुमसे मैं यह पूछता हूं, तुमने ऐसा जाना, कभी सुना कि कोई शीर्षासन करता हुआ मरा हो? शिष्य भी भौंचक्के रह गए! सुना नहीं, सोचा भी नहीं था कभी, कोई शीर्षासन करते मरे! उन्होंने कहा कि नहीं, न तो सुना है, न कभी सोचा--कल्पना भी नहीं की। तो उसने कहा, फिर यही ठीक रहेगा। अरे, जब मरना ही है तो ढंग से मरना।
वह सिर के बल खड़ा हो गया। अब वह मर गया कि जिंदा है, यह शिष्यों को समझ में न आए। सिर के बल खड़ा आदमी। उनका खयाल था, मर जाएगा तो गिर जाएगा; मगर वह खड़ा ही है। और से भी देखा, सांस भी कुछ चलती सी मालूम नहीं होती। मगर मुर्दा, और थोड़े डरे भी, तो कोई भूत-प्रेम तो नहीं हो गया, मामला क्या है? मर जाए आदमी और शीर्षासन में खड़ा रहे!
तो उन्होंने पास में ही उसकी ही एक बहिन थी, वह भी एक साध्वी थी, पास के ही आश्रम में उसको खबर भेजी, उसकी बड़ी बहिन थी। वह बड़ी बहिन आयी और उसने कहा--बदतमीज, जिंदगी भर भी उलटे-सीधे काम करता रहा और मरकर भी तुझे चैन नहीं? रस्ते पर आओ! उसकी बात सुनकर ही वह फकीर उतरा और उसने कहा कि यह मेरी बहिन को कौन यहां बुला लाया? यह मुझे चैन से मरने भी न देगी। तेरा क्या विचार है? कैसे मरूं? उसने कहा, सीधे लेट जाओ बिस्तर पर। मरने के ढंग से मरो! वह लेट गया और मर गया।
धम्मपद : पानी ले जाने वाले पानी को ले जाते हैं, बाण बनाने वाले बाण को सीधा करते हैं, बढ़ई लकड़ी को सीधा या बांका करते हैं और पंडित अपना दमन करते है
किसी व्यक्ति ने सद्गुरु बोकूजू से पूछा : हमें कपड़े पहनने होते हैं और प्रतिदिन भोजन करना होता है, इस सभी से हम कैसे बाहर आएं? बोकूजू ने उत्तर दिया : हम कपड़े पहनें, हम भोजन करें। प्रश्नकर्त्ता ने कहा : मैं कुछ समझा नहीं। बोकूजू ने उत्तर दिया : यदि तुम नहीं समझे, तो अपने कपड़े पहन लो, और खाना खा लो।
Que : When there is darkness everywhere how to write poetry?
Ans : You write poetry on darkness
परमात्मा की खोज
कथा :
रवींद्रनाथ का गीत है कि मैं परमात्मा को खोजता था अनेक जन्मों से । बहुत खोजा, मिला नहीं । कभी -कभी दूर, बहुत दूर चांद-तारों पर उसकी झलक दिखाई पड़ जाती थी । आशा बंधी रही, खोजता रहा । फिर एक दिन संयोग और सौभाग्य कि उसके द्वार पर पहुंच गया । तख्ती लगी थी -- यही रहा घर भगवान का ! चढ़ गया सीढ़ियां एक छलांग में, जन्मों-जन्मों की यात्रा पूरा हुई थी । अहोभाग्य ! हाथ में सांकल लेकर बजाने को ही था कि तब एक भय पकड़ा कि अगर वह मिल गया, तो फिर ? फिर मैं क्या करूंगा ? अब तक परमात्मा को खोजना ही तो मेरा कुल कृत्य था । अब तक इसी सहारे जीया । यही थी मेरी जीवन-यात्रा । तो परमात्मा अगर मिल गया तो वह तो मृत्यु हो जाएगी । फिर मेरे जीवन का क्या ? फिर मेरी यात्रा कहाँ ? फिर कहां जाना है, किसको पाना है, क्या खोजना है ? फिर तो कुछ भी न बचेगा । तो बहुत घबड़ा गया । छोड़ दी सांकल आहिस्ता से, कि कहीं आवाज न हो जाए, कहीं वह द्वार खोल ही न दे ! जूते हाथ में ले लिए । भागा तो तब से भाग रहा हूं ।
अब भी खोजता हूं, रवींद्रनाथ ने लिखा है उस गीत में -- अब भी खोजता हूं परमात्मा को हालांकि मुझे पता है उसका घर कहां है । उस जगह भर को छोड़ कर सब जगह खोजता हूं; क्योंकि खोजना ही जीवन है । उस जगह भर जाने से बचता हूं । उस घर की तरफ भर नहीं जाता । वहाँ से किनारा काट लेता हूं । और सब जगह पूछता फिरता हूं, परमात्मा कहां है ? और मुझे पता है कि परमात्मा कहां है ।
मृत्यु में तो आदमी बचता है, मोक्ष में बिलकुल नहीं बचता । मृत्यु में तो शरीर खोता है; मन बचता है, अहंकार बचता है, संस्कार बचते हैं, सब कुछ बच जाता है, सिर्फ शरीर बदल जाता है । मृत्यु में तो केवल वस्त्र बदलते हैं; पुराने जीर्ण -शीर्ण वस्त्र छूट जाते हैं, नए वस्त्र मिल जाते हैं । मोक्ष में शरीर भी गया, संस्कार भी गए, अहंकार भी गया, मन भी गया; तुमने जो जाना, अनुभव किया -- सब गया । तुम गए ! तुम पूरे के पूरे गए, समग्रता से गए ! फिर जो शून्य बचता है, तुम्हारे अभाव में, तुम्हारी गैर मौजूदगी में जो बचता है -- वही मोक्ष है, वही परमात्मा है, वही सत्य है । तुम तो ऐसे चले जाओगे जैसे प्रकाश के आने पर अधंकार चला जाता है । मोक्ष के आने पर तुम न बचोगे -- मोक्ष महामृत्यु है ।
यूनानी कथाओं में सिसिफस की कथा है। कामू ने उस पर एक किताब लिखी है, दि मिथ आफ सिसिफस। सिसिफस को सजा दी है देवताओं ने कि वह एक पत्थर को खींचकर पहाड़ के शिखर तक ले जाए। और सजा का दूसरा हिस्सा यह है कि जैसे ही वह शिखर पर पहुंचेगा-पसीने से लथपथ, हांफता, थका, पत्थर को घसीटता-वैसे ही पत्थर उसके हाथ से छूटकर वापस खड्डे में गिर जाएगा। फिर वह नीचे जाए, फिर पत्थर को खींचे और चोटी तक ले जाए। और फिर यही होगा, और फिर-फिर यही होता रहेगा। अब यह सजा है। और यह इटरनिटी तक होता रहेगा। यह अंत तक होता रहेगा। अनंत तक होता रहेगा।
अब वह सिसिफस है कि फिर जाता है खाई में, फिर उठाता है पत्थर को। जब वह पत्थर को उठाता है, तो फिर इसी आशा से कि इस बार सफल हो जाएगा। अब की बार तो पहुंचा ही देगा शिखर पर। बता ही देगा देवताओं को कि बड़ी भूल में थे। देखो, सिसिफस ने पत्थर पहुंचा ही दिया। फिर खींचता है। महीनों का अथक श्रम; किसी तरह टूटता, मरता ऊपर शिखर पर पहुंचता है। पहुंच नहीं पाता कि पत्थर हाथ से छूट जाता है और फिर खाई में गिर जाता है। फिर सिसिफस उतर आता है।
आप कहेंगे, बड़ा पागल है। खाई में क्यों नहीं बैठ जाता?
अगर इतना आपको पता चल गया, तो आपकी जिंदगी में धर्म की शुरुआत हो जाएगी। क्योंकि हम सब सिसिफस हैं। कहानी अलग-अलग होगी, पहाड़ अलग-अलग होंगे, पत्थर अलग- अलग होंगे, लेकिन सिसिफस हम सब हैं। हम वही काम बार-बार किए चले जाते हैं, बार-बार शिखर से छूटता है पत्थर और खाई में गिर जाता है। लेकिन बड़ा मजेदार है आदमी का मन, वह बार-बार अपने को समझा लेता है कि कुछ भूल-चूक हो गई इस बार मालूम होता है। अगली बार सब ठीक कर लेंगे। फिर शुरू कर देता है। और ऐसी भूल-चूक अगर एक-दो जन्म में होती हो तो भी ठीक है। जो जानते हैं, वे कहेंगे, अनंत जन्मों में ऐसा ही, ऐसा ही, ऐसा ही होता रहा है।
भौतिक सुख की चाह आध्यात्मिक खोज का अनिवार्य हिस्सा है।
लाओत्से से किसी ने पूछा कि तुम कहते हो, शास्त्रों से कुछ भी नहीं मिला, लेकिन हमने सुना है कि तुमने शास्त्र पढ़े! तो लाओत्से ने कहा कि नहीं, शास्त्रों से बहुत कुछ मिला। सबसे बड़ी बात तो यह मिली शास्त्र पढ़कर कि शास्त्रों से कुछ भी नहीं मिल सकता है। यह कोई कम मिलना है! नहीं कुछ मिल सकता है, लेकिन बिना पढ़े यह पता नहीं चल सकता था। पढ़ा बहुत, खोजा बहुत, नहीं मिल सकता है, यह जाना। यह कोई कम दाम नहीं है। निगेटिव है, इसलिए हमें खयाल में नहीं आता।
लाओत्से -- seek, and you will loose; खोजो, और तुमने खोया। seek, and you will not find; खोजो, और तुम कभी न पा सकोगे। do not seek, and find; मत खोजो, और पा लो।
एक मछली ने जाकर मछलियों की रानी से पूछा कि सागर के संबंध में बहुत सुनती हूं, कहां है यह सागर? कहां खोजूं कि मिल जाए? कहां जाऊं कि पा लूं? कौन-सा है मार्ग? क्या है विधि? क्या है उपाय? कौन है गुरु, जिससे मैं सीखूं? यह सागर क्या है? यह सागर कहां है? यह सागर कौन है?
वह रानी मछली हंसने लगी। उसने कहा, खोजा, तो भटक जाओगी। गुरु से पूछा, कि उलझन हुई। विधि खोजी, तो विडंबना है। खोजो मत; पूछो मत। उस मछली ने कहा, लेकिन फिर यह सागर मिलेगा कैसे? तो उस रानी मछली ने कहा, सागर के मिलने की बात ही गलत है, क्योंकि सागर को तूने कभी खोया ही नहीं है। तू सागर ही है। सागर में ही पैदा होती है; सागर में ही बनती है; सागर में ही जीती है; सागर में ही विदा होती है; सागर में ही लीन। जो कुछ है, सागर ही है चारों तरफ। लेकिन उस मछली ने कहा, मुझे तो दिखाई नहीं पड़ता! मछली को सागर दिखाई नहीं पड़ सकता, क्योंकि हम सिर्फ उसी को देख पाते हैं, जो कभी मौजूद होता है और कभी गैर-मौजूद हो जाता है।
उनसे मिलने को तो क्या कहिए जिगर ।
खुद से मिलने को ज़माना चाहिए ॥
एक अमीर आदमी, एक करोड़पति, जीवन के अंत में सारा धन पाकर चिंतित हो उठा। चिंतित हो उठा कि आनंद अब तक मिला नहीं! जीवनभर धन, धन, धन सोचा था । सोचा था, धन साधन बनेगा, आनंद साध्य होगा। साधन पूरा हो गया, आनंद की कोई खबर नहीं। साधन इकट्ठे हो गए, आनंद की वीणा पर कोई स्वर नहीं बजता। साधन इकट्ठा हो गया, भवन तैयार है, लेकिन आनंद का मेहमान आता हुआ दिखाई नहीं पड़ता, उसकी कोई पदचाप सुनाई नहीं पड़ती है। चिंतित हो जाना स्वाभाविक है।
गरीब आदमी कभी चिंतित नहीं हो पाता, यही उसका दुर्भाग्य है। अगर वह चिंतित भी होता है, तो साधन के लिए होता है कि कैसे धन मिले, कैसे मकान मिले! अमीर आदमी की जिंदगी में पहली दफा साध्य की चिंता शुरू होती है; क्योंकि साधन पूरा होता है। अब वह देखता है, साधन सब इकट्ठे हो गए, जिसके लिए इकट्ठे किए थे, वह कहां है!
इसलिए जब तक किसी आदमी की जिंदगी में साध्य का खयाल न उठे, तब तक वह गरीब है। चाहे उसके पास कितना ही धन इकट्ठा हो गया हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके अमीर होने की खबर उसी दिन मिलती है, जिस दिन वह यह सोचने को तैयार हो जाता है--सब है जिससे आनंद मिलना चाहिए ऐसा सोचा था, लेकिन वह आनंद कहां है? साधन पूरे हो गए,लेकिन वह साध्य कहां है? भवन बन गया, लेकिन अतिथि कहां है? उसी दिन आदमी अमीर होता है। वही उसका सौभाग्य है। लेकिन बहुत कम अमीर आदमी अमीर होते हैं।
वह अमीर आदमी अमीर था; चिंता पकड़ गई उसे। उसने अपने घर के लोगों को कहा कि बहुत दिन प्रतीक्षा कर ली, अब मैं खोज में जाता हूं। अब तक सोचता था कि इंतजाम कर लूंगा, तो आनंद का अतिथि आ जाएगा। इंतजाम पूरा है, अतिथि का कोई पता चलता नहीं। अब मैं उसकी खोज पर निकलता हूं। बहुत-से हीरे-जवाहरात अपने साथ लेकर वह गया। गांव-गांव पूछता था लोगों से कि आनंद कहां मिलेगा? लोगों ने कहा, हम खुद ही तलाश में हैं। इस गांव तक हम उसी की तलाश में पहुंचे हैं। रास्तों पर लोगों से पूछता था, आनंद कहां मिलेगा? वे यात्री कहते कि हम भी सहयात्री हैं, फेलो ट्रेवलर्स हैं; हम भी खोज में निकले हैं। तुम्हें पता चल जाए, तो हमें भी खबर कर देना।
जिससे पूछा उसी ने कहा कि तुम्हें खबर मिल जाए, तो हमें भी बता देना। हमें कुछ पता नहीं, हम भी खोज में हैं। थक गया, परेशान हो गया, मौत करीब दिखाई पड़ने लगी। आनंद की कोई खबर नहीं।
फिर एक गांव से गुजर रहा था, तो किसी से उसने पूछा। झाड़ के नीचे एक आदमी बैठा हुआ था। देखकर ऐसा लगा कि शायद यह आदमी कोई जवाब दे सके। क्योंकि अंधकार घिर रहा था सांझ का, लेकिन उस आदमी के आस-पास कुछ अलौकिक प्रकाश मालूम पड़ता था। रात उतरने को थी, लेकिन उसके चेहरे पर चमक थी सुबह की। पकड़ लिए उसके पैर, धन की थैली पटक दी। और कहा कि ये हैं अरबों-खरबों रुपए के हीरे-जवाहरात--आनंद चाहिए!
उस फकीर ने आंखें ऊपर उठाईं और उसने कहा कि सच में चाहिए? बिलकुल तुम्हें आज तक कभी आनंद नहीं मिला?उसने कहा, कभी नहीं मिला। उसने कहा, कभी कोई थोड़ी-बहुत धुन बजी हो! कोई धुन नहीं बजी। उसने कहा, कभी थोड़ा-बहुत स्वाद आया हो! उस आदमी ने कहा, बातों में समय खराब मत करो; तुम पहले आदमी हो, जिसने एकदम से यह नहीं कहा कि मैं भी खोज रहा हूं। मुझे बताओ! उस फकीर ने पूछा, कोई परिचय ही नहीं है? उसने कहा, कोई परिचय नहीं है।
इतना कहना था कि वह फकीर उस झोले को, जिसमें हीरे-जवाहरात थे, लेकर भाग खड़ा हुआ। उस अमीर ने तो सोचा भी नहीं था। वह उसके पीछे भागा और चिल्लाया, मैं लुट गया। तुम आदमी कैसे हो! गांव परिचित था फकीर का, अमीर का तो परिचित नहीं था। गली-कूचे वह चक्कर देने लगा। सारा गांव जुट गया। गांव भी पीछे भागने लगा। अमीर चिल्ला रहा है, छाती पीट रहा है, आंख से आंसू बहे जा रहे हैं। और वह कह रहा है, मैं लुट गया; मैं मर गया; मेरी जिंदगीभर की कमाई है। उसी के सहारे मैं आनंद को खोज रहा हूं; अब क्या होगा! मेरे दुख का कोई अंत नहीं है। मुझे बचाओ किसी तरह इस आदमी से; मेरा धन वापस दिलवाओ। वह गांवभर में चक्कर लगाकर भागता हुआ फकीर वापस उसी झाड़ के नीचे आ गया, जहां अमीर का घोड़ा खड़ा था। झोला जहां से उठाया था वहीं पटककर, जहां बैठा था वहीं झाड़ के पास फिर बैठ गया।
पीछे से भागता हुआ अमीर आया और सारा गांव। अमीर ने झोला उठाकर छाती से लगा लिया और भगवान की तरफ हाथ उठाकर कहा, हे भगवान, तेरा परम धन्यवाद! फकीर ने पूछा, कुछ आनंद मिला? उस अमीर ने कहा, कुछ? बहुत-बहुत मिला। ऐसा आनंद जीवन में कभी भी नहीं था। उस फकीर ने कहा, पाने के पहले खोना जरूरी है;
हर आदमी के भीतर कम से कम तीन व्यक्तित्व हो जाते हैं। एक तो जैसा वह है, लेकिन उसे उसका कोई पता नहीं। एक दूसरा, जैसा वह अपने को समझता है। और एक वैसा, जैसा वह लोगों को स्वयं को समझाना चाहता है।
शेखचिल्ली को किसी ने कह दिया कि तेरी पत्नी विधवा हो गई। भरे बाजार में वह छाती पीटकर रोने लगा। भीड़ इकट्ठी हो गई, लोग हंसने लगे। किसी ने पूछा, मामला क्या है? उसने कहा, मेरी पत्नी विधवा हो गई। उन्होंने कहा, पागल! तू जिंदा बैठा है तो तेरी पत्नी विधवा हो कैसे सकती है? उसने कहा, इससे क्या होता है? मेरे जिंदा रहने से क्या होता है? मैं जिंदा बैठा था, मेरी मां तक विधवा हो गई थी। मैं जिंदा बैठा था, मेरी फूई विधवा हो गई। मैं जिंदा बैठा था, मेरी मामी विधवा हो गई। मुहल्ले में कितनी औरतें विधवा हो गयीं, पूरे गांव में कितनी औरतें विधवा हो गयीं, मैं जिंदा बैठा था। इससे क्या फर्क पड़ता है? वह फिर छाती पीटकर रोने लगा।
तुम परमात्मा को खोज रहे हो, वह खोज ऐसी ही है, जैसे कोई आदमी मान लेता हो कि उसकी पत्नी विधवा हो गई है और वह जिंदा बैठा है। परमात्मा को खोया कब है? तुम हो तो परमात्मा है ही। तुम्हारे होने में ही समाया।
जो निर्विचार है, वह विचार के अतिक्रमण में हो गया; वह ध्यान में पहुंच गया, समाधि में पहुंच गया।
एक आदमी भागा हुआ जा रहा है एक रास्ते से। तेजी में है। सांझ ढलने के करीब है। राह के किनारे बैठे हुए एक आदमी से उसने पूछा कि दिल्ली कितनी दूर है? उस बूढ़े आदमी ने कहा, दो बातों का जवाब पहले दे दो, फिर मैं बताऊं कि दिल्ली कितनी दूर है। उसने कहा, अजीब आदमी मिले तुम भी! इतना सीधा बता दो कि दिल्ली कितनी दूर है। दो बातों के सवाल और जवाब का क्या सवाल है? उस बूढ़े आदमी ने कहा, फिर मुझसे मत पूछो। क्योंकि मैं गलत जवाब देना कभी पसंद नहीं करता।
कोई और नहीं था, इसलिए मजबूरी में उस जल्दी जाने वाले आदमी को भी उस बूढ़े से कहना पड़ा, अच्छा भाई, पूछ लो तुम्हारे सवाल। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता; कोई संगति नहीं है। मैं पूछता हूं, दिल्ली कितनी दूर है, इसमें मुझसे पूछने का कोई सवाल ही नहीं है।
पर उस बूढ़े ने कहा, तो तुम जाओ। नहीं तो मेरे दो सवाल! पहला तो यह कि तुम जिस तरफ जा रहे हो, इसी तरफ जाने का इरादा है? तो दिल्ली बहुत दूर है। क्योंकि दिल्ली आठ मील पीछे छूट गई है। अगर ऐसे ही जाने का है, तो दिल्ली पहुंचोगे जरूर, यह मैं नहीं कहता कि गलत जा रहे हो, लेकिन पूरी जमीन का चक्कर लगाकर। और वह भी बिलकुल सीधी, नाक की रेखा में चलना। जरा चूके, कि चक्कर चूक गया, तो दिल्ली से फिर बचकर निकल जा सकते हो। सिर मत हिलाना जरा भी। बिलकुल नाक की सीध में जाना। फिर भी मैं पक्का नहीं कहता कि दिल्ली पहुंचोगे। सारी जमीन घूमकर भी जरा भी चूक गए, इरछे-तिरछे हो गए, तो फिर चूक जाओगे। इसलिए मैं पूछता हूं कि इरादा क्या है? इसी तरफ जाने का है? और अगर लौटने की तैयारी हो, तो दिल्ली बहुत पास है; पीठ के पीछे है। आठ ही मील का फासला है।
उस आदमी ने कहा, यह मेरी समझ में आया। माफ करो कि मैंने तुमसे कहा कि असंगत बात पूछते हो। संगत बात थी। लेकिन दूसरा क्या सवाल है?
उस आदमी ने कहा कि जरा चलकर भी मुझे बताओ कि कितनी चाल से चलते हो। क्योंकि दूरी चाल पर निर्भर करती है, मीलों पर नहीं। आठ मील, तेज चलने वाले के लिए चार मील हो जाएंगे; धीरे चलने वाले के लिए सोलह मील हो जाएंगे। और एक कदम चलकर बैठ गए, तो आठ मील अनंत हो जाएंगे। इसलिए जरा चलकर बताओ! चाल क्या है? क्योंकि सब रिलेटिव है। दिल्ली की दूरी या सभी दूरियां रिलेटिव हैं, सापेक्ष हैं। कितना चलते हो?
उस आदमी ने कहा कि माफ करना। यह भी मेरे खयाल में नहीं था। तुम ठीक ही पूछते हो।
परमात्मा भी, जिस दिशा में हम जाते हैं, पदार्थ की दिशा में, वहां हमें कभी नहीं मिलेगा। दिल्ली तो शायद मिल जाए, दिल्ली के उलटे चलकर भी, क्योंकि जमीन का घेरा बहुत बड़ा नहीं है। लेकिन पदार्थ का घेरा अनंत है। अगर हम पदार्थ की तरफ खोजते हुए चलते हैं, तो हम अनंत तक भटक जाएं, तो भी परमात्मा तक नहीं लौटेंगे।
सत है, वह सदा है, सनातन है, अनादि है, अनंत है।
एक सूफी फकीर के पास एक आदमी आया और उसने कहा कि मैं सत्य की खोज में आया हूं। उस फकीर ने कहा, यह खोज बड़ी कठिन है। तुम्हारी तैयारी पूरी है? उसने कहा, मेरी तैयारी पूरी है। तो फकीर ने कहा, अपना नाम-पता लिखा दो; अगर इस खोज में तुम मर जाओ, तो तुम्हारे अस्थि-पंजर मैं कहां भेजूं! उस आदमी ने कहा कि अगर आप बुरा न मानें, तो मैं अस्थि-पंजर खुद ही लिए जाता हूं। और भाग खड़ा हुआ! आपको कष्ट होगा भेजने का, मैं खुद ही लिए जाता हूं!
उसने सोचा भी न था कि सत्य की खोज में अस्थि-पंजर भी कभी भेजने की जरूरत पड़ सकती है। वह भी नहीं समझा। अस्थि-पंजर से उस फकीर का मतलब बड़ा गहरा रहा होगा।
आत्मजयी का अर्थ है, वह व्यक्ति, जो अपने भीतर पूरी आंखों से देख सकता है।
एक आदमी बड़ी हड़बड़ी में एक सड़क के किनारे खड़े होकर अपनी सब जेबें देख रहा है। दो-चार लोग भी इकट्ठे खड़े हो गए हैं उसकी हड़बड़ी देखकर। कभी इस जेब में हाथ डालता है, फिर उस जेब में हाथ डालता है। सिर्फ एक कोट का ऊपर की जेब छोड़ देता है।
फिर आखिर किसी ने पूछा कि महाशय, आप कई बार जेबों में हाथ डालकर देख चुके और बड़े परेशान हैं; पसीने की बूंदें आ गईं; मामला क्या है? उस आदमी ने कहा कि मेरा बटुआ खो गया है। मैंने सब जेबें देख ली हैं, सिर्फ एक को छोड़कर। तो उन्होंने पूछा कि महाशय, उसको भी देख क्यों नहीं लेते? उस आदमी ने कहा कि उसे देखने में बड़ा डर लगता है कि अगर उसमें भी न हुआ तो? इसलिए मैं उसको छोड़कर बाकी में देख रहा हूं!
भीतर जाने में भी हम डरते हैं कि कहीं आत्मा न हुई तो? इधर बाहर से किताब पढ़कर बैठ जाते हैं; बड़ी चैन मिलती है कि भीतर आत्मा है, परमात्मा है। अमृत के झरने फूट रहे हैं। आनंद की धाराएं बह रही हैं। बाहर किताब में पढ़कर बड़े निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन कभी जेब में हाथ नहीं डालते भीतर। कहीं न हुई तो? तो एक भरोसा और टूट जाए, एक आशा और विखंडित हो जाए। एक आश्वासन, जिसके सहारे सब दुख झेले जा सकते थे; सब जेबें टटोली जा सकती थी जिसके सहारे कि अगर यहां न मिला तो ठीक है, कोई हर्ज नहीं, वहां तो खोज ही लेंगे; तो वहां तो मिल ही जाएगा। कहीं वह भी न टूट जाए, उस भय से भीतर झांककर भी नहीं देखते।
चंचल, चपल, कठिनाई से निवारण योग्य चित्त को मेधावी वैसे सीधा करता है जैसे बाण बनाने वाला बाण को ।
झेन फकीर कहते हैं, परमात्मा को पाना तो स्वभाव को पाना है, इसलिए अभ्यास की कोई भी जरूरत नहीं। तो हम कह सकते हैं, हम तो कोई अभ्यास कर ही नहीं रहे, तो फिर हमको परमात्मा क्यों नहीं मिलता? झेन फकीर कहेंगे, आप नहीं कर रहे, ऐसा मत कहिए। आप परमात्मा को खोने का अभ्यास कर रहे हैं। अभ्यास आप कर रहे हैं परमात्मा को खोने का। तो झेन फकीर कहते हैं, सिर्फ परमात्मा को खोने का अभ्यास मत करिए, और आप परमात्मा को पा लेंगे।
जो मूढ़ होकर मूढ़ता को स्वीकार करता है, वह इस (अंश) में पंडित है; और जो मूढ़ होकर (अपने को) पंडित मानता है वह मूढ़ ही कहा जाता है ।
अठारह सौ अस्सी में यूरोप में अल्तामिरा की गुफाएं खोजी गईं और उन गुफाओं की खोज के वक्त एक बहुत मजेदार घटना घटी। एक बहुत बड़े जमींदार डान मार्शिलानो की जमीन पर अचानक पहाड़ियों में ये गुफाएं मिल गईं। एक कुत्ता भूल से गुफा के भीतर कूद गया। वर्षा में कुछ मिट्टी गलकर गिर गई; गङ्ढा हो गया; और कुत्ता उसके अंदर चला गया, फिर निकल न पाया। वहां उसने बहुत शोरगुल मचाया। तब मार्शिलानो के किसान, मजदूर जाकर किसी तरह खोदकर कुत्ते को निकाले। कुत्ता तो निकल आया, साथ में गुफाओं का आविष्कार हो गया। बड़ी गहरी और बड़ी अदभुत गुफाएं थीं। मनुष्य के पूरे इतिहास की दृष्टि उन गुफाओं ने बदल दी।
मार्शिलानो को पता चला, तो वह इतिहास का विद्यार्थी था, उसने तत्काल सब इंतजाम किया। विशेषकर वह मनुष्य की हड्डियों का अध्ययन कर रहा था वर्षों से। तो उसने सोचा कि ये गुफाएं न मालूम कितनी पुरानी होंगी, तो हड्डियां, कीमती हड्डियां इसमें मिल सकती हैं, और किसानों ने खबर दी कि बहुत अस्थिपंजर हैं।
तो मार्शिलानो ने सर्चलाइट लेकर गुफाओं को खुदवाया और उनमें प्रवेश किया। छः दिन तक रोज घंटों वह सरककर गुफाओं में जाता, एक-एक हड्डी पर नजर रखता। हड्डियां खोजीं उसने बहुत। सातवें दिन उसकी छोटी लड़की ने, जो सात-आठ साल की लड़की थी, उसने कहा, मैं भी अंदर चलना चाहती हूं। वह लड़की को ले गया।
आप जानकर हैरान होंगे कि अल्तामिरा की असली गुफाएं उस लड़की ने खोजीं सात साल की। सर्चलाइट लेकर वह जो इतिहासज्ञ पिता था, वह नहीं खोज पाया। बड़ी अदभुत घटना घटी। जब वह लड़की को लेकर गया, तो वह अपना सरककर अपनी हड्डियों की जांच-पड़ताल में लग गया कि जमीन में एक हड्डी भी चूक न जाए; सर्चलाइट पास था। अचानक लड़की चिल्लाई, पिताजी, पिताजी, ऊपर देखिए!
छः दिन से वह जा रहा था रोज, लेकिन उसने ऊपर आंख ही नहीं उठाई थी। वह नीचे हड्डियां बीनने में इतना व्यस्त था कि गुफाओं के ऊपर सीलिंग पर क्या है, उसने नजर न डाली थी। सीलिंग पर तो इतने अदभुत चित्र थे, जैसे कल रंगे गए हों। और ठेठ बीस हजार साल पुराने चित्र निकले।
अल्तामिरा की गुफाएं सारे जगत में प्रसिद्ध हो गईं उन चित्रों के कारण। इतने अदभुत चित्र थे कि जिसने भी उन्हें बनाया होगा, पिकासो से कम सामर्थ्य का चित्रकार नहीं था। तो सारा इतिहास बदलना पड़ा। क्योंकि खयाल था कि पुराने जमाने में तो किसी आदमी के पास इतनी बड़ी कला नहीं हो सकती। लेकिन पाया यह गया कि वे जो अल्तामिरा की गुफाओं पर जो जानवरों के चित्र हैं, सांड के चित्र हैं, वे इतने कलात्मक हैं और इतने अदभुत हैं कि आज भी कोई चित्रकार उनका मुकाबला नहीं कर सकता।
हैरान हुआ मार्शिलानो कि वह छः दिन से रोज सर्चलाइट लेकर आ रहा था, लेकिन सर्चलाइट उसका जमीन पर लगा था। वह हड्डियां खोज रहा था कि कोई हड्डी चूक न जाए। तो ऊपर नजर नहीं गई।
हम सब भी जब तक प्रकृति में हड्डियां खोजते रहते हैं...। बड़ा सर्चलाइट हमारे पास है। लेकिन ऊपर सीलिंग की तरफ नहीं उठ पाता, वह परमात्मा की तरफ नहीं उठ पाता। टू मच आक्युपाइड जमीन पर सरकने में और प्रकृति में खोज करने में। हड्डियों की ही खोज है; कुछ और बहुत खोज नहीं है।
चाहे मूढ़ जीवन भर पंडित की सेवा में रहे, वह धर्म को नहीं जान पाता जैसे चम्मच सूप के रस को
ईश्वर ने सारी सृष्टि बना डाली, फिर उसने आदमी बनाया। वह बड़ा खुश था। सारी दुनिया उसने बना डाली। बहुत खुश था। सब कुछ सुंदर था। फिर उसने आदमी बनाया। और उस दिन से वह बेचैन और परेशान हो गया। आदमी ने उपद्रव शुरू कर दिए। आदमी के साथ उपद्रव का जन्म हो गया।
तो उसने अपने सारे देवताओं को बुलाया और उनसे पूछा कि एक बड़ी मुश्किल हो गई है। यह आदमी को बनाकर तो गलती हो गई मालूम होती है। और आदमी रोज—रोज उसके दरवाजे पर खड़े रहने लगे। यह शिकायत है, वह शिकायत है। यह कमी है, वह कमी है। ईश्वर ने कहा, अब एक उपाय करो कुछ। मैं किसी तरह आदमी से बचना चाहता हूं। मैं कहां छिप जाऊं?
किसी देवता ने कहा, हिमालय पर बैठ जाएं, गौरीशंकर पर। ईश्वर ने कहा कि तुम्हें पता नहीं, कुछ ही समय बाद हिलेरी और तेनसिंग एवरेस्ट पर चढ़ जाएंगे, फिर मेरी मुसीबत फिर शुरू हो जाएगी। किसी ने कहा, तो चलें चांद पर बैठ जाएं। तो ईश्वर ने कहा, चांद पर पहुंचने में कितनी देर लगेगी! जल्दी ही आदमी चांद पर उतर जाएगा। मुझे कोई ऐसी जगह बताओ, जहां आदमी पहुंच ही न पाए।
तब एक के देवता ने ईश्वर के कान में कहा। ईश्वर ने कहा, बिलकुल ठीक। यह बात जंच गई। और देवताओं ने पूछा कि कौन— सी है वह बात? ईश्वर ने कहा, अब तुम उसको पूछो ही मत। क्योंकि लीक आउट हो जाए, आदमी तक पहुंच जाए, तो खतरा हो सकता है।
उस के ने ईश्वर के कान में कहा कि आप आदमी के ही भीतर छिप जाइए। यह वहां कभी नहीं पहुंच पाएगा। एवरेस्ट चढ़ लेगा, चांद पर उतर जाएगा, भीतर खुद के...। ईश्वर ने कहा, यह बात जंच गई।
और कथा है कि तब से ईश्वर आदमी के भीतर छिप गया है। और तब से आदमी ईश्वर से शिकायत करने में असफल हो गया है। खोजता है बहुत, लेकिन मिल नहीं पाता कि उससे शिकायत कर दे, कि कोई प्रार्थना कर दे, कि कोई स्तुति कर दे।
भीतर जाना— उस भीतर जाने के लिए कृष्ण धीरे— धीरे अर्जुन को एक—एक कदम अनेक—अनेक इशारों को देकर आखिरी जगह ले आए हैं, जहां वे कहते हैं, अर्जुन, हे धनंजय, पांडवों में मैं तुझमें हूं। तू अपने में ही देख ले। मत पूछ कि क्या मैं भाव करूं। मत पूछ कि कहां मैं खोजूं। सच ही खोजना चाहता है, तो मैं तेरे भीतर मौजूद हूं तू वहीं देख ले, वहीं खोज ले।
हम सबको भी भरोसा नहीं आता इस बात का कि परमात्मा हमारे भीतर मौजूद है। आएगा भी नहीं। अगर कोई हमसे कहे कि शैतान आपके भीतर मौजूद है, तो हम थोड़ा मान भी लें। क्योंकि हमारा अपने से जो परिचय है, उससे शैतान का तो तालमेल बैठ जाता है। लेकिन कोई हमसे कहे कि परमात्मा आपके भीतर है, तो हम सोचते हैं, कोई मेटाफिजिकल, कोई ऊंचे दर्शन की बात चल रही है! इसमें कुछ है नहीं सार।
परमात्मा, मेरे भीतर! हम किसी के भी भीतर मानने को राजी हो जाएं, खुद के भीतर मानने में बड़ी तकलीफ होगी। क्योंकि हम भीतर अपने जानते हैं कि क्या है। भीतर के चोर को हम जानते हैं। भीतर के बेईमान को हम जानते हैं। भीतर के व्यभिचारी को हम जानते हैं। कैसे हम मान लें कि परमात्मा हमारे भीतर है।
लेकिन इसका सिर्फ एक ही मतलब है कि आप भीतर को जानते ही नहीं। जिसको आप जानते हैं भीतर, वह आपका मन है, वह वस्तुत: भीतर नहीं है, वह वास्तविक इनरनेस नहीं है। जिसको आप जानते हैं मन, वह आपका आंतरिक अंतस्तल नहीं है। वह केवल बाहर की परछाईं है, जो आपके भीतर इकट्ठी हो गई है। वे केवल बाहर से बनी हुई प्रतिक्रियाएं हैं, जो आपके भीतर इकट्ठी हो गई हैं।
ऐसा समझें कि आप जिसको मन कहते हैं, वह बाहर से ही आए हुए प्रभावों का जोड़ है। वह भीतर नहीं है। मन के भी भीतर आप हैं। अगर मैं आपको देखता हूं तो बाहर एक दुनिया है। एक दुनिया मेरे बाहर है। फिर मैं भीतर आंख बंद करता हूं तो भीतर विचारों की एक दुनिया है। वह भी मुझसे बाहर है। क्योंकि उसको भी मैं देखता हूं भीतर। तो विचार मुझे दिखाई पड़ते हैं; क्रोध, कामवासना मुझे दिखाई पड़ती है। जैसे आप मुझे दिखाई पड़ते हैं, ऐसे ही विचारों की भीड़ भीतर दिखाई पड़ती है। वह भी मुझसे बाहर है। मेरे शरीर के भीतर है, लेकिन मुझसे बाहर है।
आप मुझसे बाहर हैं। आंख बंद करता हूं आपकी तस्वीर मुझे भीतर दिखाई पड़ती है, वह भी मुझसे बाहर है। और वह तस्वीर आपकी है। आपने अपने भीतर कभी कोई एकाध तस्वीर देखी है, जो बाहर से न आई हो? आपने अपने भीतर कभी कोई एकाध विचार देखा, जो बाहर से न आया हो? आपने भीतर ऐसा कुछ भी देखा है, जो बाहर का ही प्रतिफलन न हो?
तो फिर से खोज करें। आप अपने भीतर की जांच करें, तो आप पाएंगे, वह तो सब बाहर की ही कतरन, बाहर का ही कचरा, बाहर का ही जोड़ है। तो यह फिर भीतर नहीं है। यह बाहर का ही हाथ है, जो आपके भीतर प्रवेश कर गया है। अगर आपको अंतस्तल को जानना है, तो थोड़ा और पीछे चलना पड़े।
भीतर का अनुभव मन से नहीं होता, भीतर का अनुभव तो साक्षी से होता है। भीतर का अनुभव तो ज्ञाता से होता है। भीतर का अनुभव तो द्रष्टा से होता है।
यहूदियों में एक सिद्धात है कि आदमी तो परमात्मा को खोजेगा कैसे? कमजोर, अज्ञानी! यहूदी मानते हैं, परमात्मा ही आदमी को खोजता है। यहूदी फकीर बालशेम से किसी ने पूछा कि यह सिद्धात बड़ा अजीब है। अगर परमात्मा आदमी को खोजता है, तो अभी तक हमें खोज क्यों नहीं पाया? हम खोजते हैं, नहीं खोज पाते, यह तो समझ में आता है। परमात्मा खोजता है, तो हम अभी तक क्यों भटक रहे हैं?
बालशेम ने कहा कि तुम्हें खोजे कहा? तुम जहां भी बताते हो कि तुम हो। वहां पाए नहीं जाते। वहा जब तक वह पहुंचता है, तुम कहीं और! वह तुम्हारा पीछा कर रहा है। लेकिन तुम पारे की तरह हो, तुम छिटक—छिटक जाते हो। तुम्हारा कोई पता—ठिकाना नहीं है, कोई आइडेंटिटी नहीं है। तुम्हारी कोई पहचान नहीं है। तुम्हें कैसे पहचाना जाए?
घमंड उस अभिमान का नाम है, जो वास्तविक नहीं है। और अभिमान उस घमंड का नाम है, जो वास्तविक है। लेकिन दोनों पाप हैं और दोनों आसुरी हैं। मतलब यह कि एक आदमी, जो सुंदर नहीं है और अपने को सुंदर समझता है और अकड़ा रहता है। सुंदर है नहीं, सुंदर समझता है, अकड़ा रहता है। यह घमंड है। दूसरा आदमी सुंदर है, सुंदर समझता है और अकड़ा रहता है। वह अभिमान है। पर दोनों ही आसुरी हैं।
एडीसन ने एक हजार आविष्कार किए, शायद इतने ज्यादा आविष्कार किसी आदमी ने नहीं किए। पिछले पहले महायुद्ध में अमरीका में राशनिंग हुई और एडीसन को भी राशन-कार्ड लेकर दुकान पर जाना पड़ा। कार्ड जमा कर दिए गए हैं। जब उसका नंबर आएगा....... वह queue में खड़ा है। और जब नाम पुकारा गया थामस एडीसन का, तो वह भी ऐसा देखने लगा चारों तरफ जैसे किसी दूसरे आदमी के लिए पुकारा गया है। कोई व्यक्ति भीड़ में उसे पहचानता था। उसने कहा, जहां तक मैं समझता हूं, मैंने अखबारों में आपके फोटो देखे हैं, आप ही एडीसन मालूम पड़ते हैं। उसने कहा, तुमने अच्छी याद दिलाई। असल में तीस साल से मुझे अपने से मिलने का कोई मौका ही नहीं मिला, फुर्सत भी नहीं मिली। लेबोरेट्री में तीस साल इतने जोर से लगा था वह आदमी। और फिर वह इतना कीमती आदमी था कि उसका नाम लेकर तो कोई बुलाता नहीं था। वह अपना नाम भूल गया था। तीस साल से किसी ने उसका नाम लिया भी नहीं था उसके सामने।
यहां तो दो क्षण का विराम है। जैसे राही रुक जाए वृक्ष के तले, धूप से थका—मांदा। फिर चल पड़ना है। यहां घर नहीं है, यहां तो बस सराय है।
एक अमरीकन कवि ने अपने संसमरण में लिखा है कि वह एक रात ट्रेन में सवार हुआ केलिफोर्निया जाने को। डब्बे में एक और युवक था। होगी कोई तीस साल की उम्र। और तो कोई था नहीं। रात तो दोनों सो गए। सुबह एक—दूसरे से परिचय हुआ। जिस जगह कवि बैठा था, उस युवक ने कहा, क्षमा करें, मुझे उस खिड़की पर बैठ जाने दें। तो कवि ने पूछा कि क्या कारण है? इतनी खिड़कियां हैं, इस पर ही बैठने का क्या कारण है? उस कमरे में केवल दो ही आदमी हैं।
तो उस युवक ने कहा, अब आप पूछते हैं तो आपको कहता हूं। आज से दस साल पहले मैंने एक जघन्य अपराध किया। मैं जेल में डाल दिया गया। दस साल की सजा हुई। छूटकर घर वापस लौट रहा हूं। शंकित हूं। दस साल में मेरे परिवार से कोई मुझे जेल में मिलने नहीं आया। आशा तो यही करता हूं कि वे लोग सीधे—सादे हैं, ग्रामीण हैं, इतनी दूर की यात्रा सैकड़ों मील की उनके लिए करनी असंभव रही होगी। पर कौन जाने, शायद उन्होंने मुझे त्याग ही दिया! दस वर्षों में एक पत्र भी मेरे परिवार से नहीं आया। आशा तो यही करता हूं कि वे लोग गैर पढ़े—लिखे हैं, इसलिए न लिख सके होंगे। लेकिन मन में यह भय भी है कि हो सकता है, उन्होंने जानकर ही न लिखा हो। किसी और से तो लिखवा ही सकते थे! वे लौग गरीब हैं, गैर पढ़े-लिखे हैं, पर कुलीन हैं और बड़े स्वाभिमानी हैं। मेरे कारण जो उनकी प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचा है, शायद वे मुझे अंगीकार करने को राजी भी न हों।
तो मैंने उनको लिखा है कि फलां-फलां ट्रेन से मैं आ रहा हूं। सुबह होते ही, सूरज के उगते ही, गाव में यह ट्रेन प्रवेश करेगी। गाव के बाहर ही, स्टेशन के पूर्व ही हमारा खेत है। उसमें सेव का एक बड़ा वृक्ष है। वह स्टेशन की लाइन के बिलकुल करीब है। तो मैंने उनको लिखा है, उस पर तुम एक सफेद झंडी लगा देना, ताकि मुझे पता चल जाए कि मैं लौट सकता हूं घर। अगर सफेद झंडी लगी मिली, तो मैं स्टेशन पर उतर जाऊंगा और घर आ जाऊंगा। अगर न लगी मिली, तो ट्रेन पर सवार रहूंगा। कहीं भी उतर जाऊंगा फिर, और संसार में खो जाऊंगा। फिर तुम मेरा नाम दुबारा न सुन सकोगे।
इसलिए इस जगह मुझे बैठ जाने दें। इस खिड़की से वह वृक्ष ठीक से दिखाई पड़ेगा। कवि भी अभिभूत हो गया। जगह दे दी। लेकिन जैसे-जैसे गांव करीब आने को होने लगा, युवक बेचैन हो गया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे हैं।
उसने कवि से फिर प्रार्थना की कि आप कृपा करके वापस यहां बैठ जाएं, क्योंकि मेरी आंखों में इतने आंसू भर गए हैं कि मैं देख भी नहीं पा रहा हूं। आप मेरे लिए देख दें। कहीं ऐसा न हो कि झंडी हो और मुझे दिखाई न पड़े। या ऐसा भी हो सकता है कि झंडी न हो और मेरी कल्पना के कारण मुझे दिखाई पड़ जाए, मैं इतना भावाविष्ट हूं। आप वापस आ जाएं और मुझे बता दें।
कवि भी भावाविष्ट हो गया। वह बैठ गया है। वह देख रहा है बाहर टकटकी लगाए। उसकी आख से भी, जैसे ही वृक्ष दिखाई पड़ा, आंसुओ की धार लग गई। उस युवक ने उसे हिलाया और कहा कि क्या झंडी नहीं है? उसने कहा, नहीं, मैं इसलिए नहीं रो रहा हूं। मैं इसलिए रो रहा हूं कि पूरे वृक्ष पर झंडियां ही झंडियां हैं। पत्ते तो दिखाई ही नहीं पड़ते। हजारों झंडियां बांध दी हैं उन्होंने।
बाधाएं हैं, तो तुम्हारे कारण हो सकती हैं। परमात्मा तो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है वृक्ष पर हजारों झंडियाँ बांधकर।
तौबा जो मैंने की, निकल आया ज़रा सा मुंह ।
वह रंग रूप ही नहीं, सुबहे बहार का ॥ -- महाकवि दाग
बसन्त को सौंदर्य का बड़ा अभिमान था । जब से मैंने शराब पीने से तौबा कर ली है, तब से बसन्त-लक्ष्मी का मुंह फीका पड़ गया है । जब तक मैं शराबी था, तभी तक उसकी शोभा का कायल था। अब तो मुझे उसमें भी विशेषता मालूम नहीं होती ।
एक छोटे स्कूल में एक शिक्षक ने बच्चों से पूछा, 'हाथी कहां पाये जाते हैं?' एक छोटी लड़की ने खड़े होकर कहा, 'हाथी, पहली बात, खोते ही नहीं। इतने बड़े होते हैं, तो खोएंगे कहां? पाने का सवाल नहीं है।'
परमात्मा कैसे खो जाएगा? वही सब कुछ है। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। तुमने कैसे खोया है--यह पूछो। यह मत पूछो कि परमात्मा कैसे खो गया है।
एक राजा संसार के सर्वोच्च धर्म की खोज में था। वह युवा से बूढा हो आया था, लेकिन उसकी खोज पूरी नहीं हो पाई थी। अलग-अलग धर्मों के पंडित, साधु और दार्शनिक आते थे। वे एक दूसरे से लडते थे। एक दूसरे के दोष दिखलाते थे। एक दूसरे को भ्रांति और अज्ञान में सिद्ध करते थे। लेकिन राजा ने खोज बंद नहीं की। एक दिन एक युवा भिखारी उसके द्वार पर भीख मांगने आया। राजा को अत्यंत चिंतित, उदास और खिन्नमना देख उसने कारण पूछा। राजा ने उससे कहाः 'जान कर भी तुम क्या करोगे? बडे-बडे पंडित, साधु और संत भी कुछ नहीं कर सके हैं।' वह भिखारी बोलाः 'हो सकता है, उनका बडा होना ही उनके लिए बाधा बन गया हो? फिर पंडित तो कभी भी कुछ नहीं कर सके हैं। वस्त्रों से पहचाने जानेवाले साधु और संत भी क्या साधु और संत होते हैं?' राजा ने उस भिखारी को गौर से देखा। उसकी आंखों में कुछ था जो भिखारी की नहीं, सम्राटों की ही आंखों में होता है। इसी बीच वह भिखारी पुनः बोलाः 'ैं तो कुछ भी नहीं कर सकता हूं। असल में मैं हूं ही नहीं; लेकिन जो है, वह बहुत कुछ कर सकता है।' उसकी बातें निश्चित ही अदभुत थीं। राजा के पास आए हजारों समझाने वालों से वह एकदम ही भिन्न था। राजा सोचने लगा कि ऐसे दीन-हीन वेष में यह कौन है? फिर भी प्रकटतः उसने कहाः 'मैं सर्वोच्च धर्म की खोज कर जीवन को धर्ममय बनाना चाहता था, लेकिन यह नहीं हो सका और फलतः अब अंत समय में मैं बहुत दुखी हूं। कौन सा धर्म सर्वोच्च है? ' वह भिखारी खूब हंसने लगा और बोलाः 'राजन! आपने गाडी के पीछे बैल बांधने चाहे, इससे ही आप दुखी हैं। धर्म की खोज से जीवन धर्म नहीं बनता, जीवन के धर्म बनने से ही धर्म की खोज होती है। और यह भी कैसा पागलपन कि आपने सर्वोच्च धर्म खोजना चाहा? अरे धर्म की खोज ही काफी थी। सर्वोच्च धर्म? यह तो मैंने कभी सुना नहीं। ये तो शब्द ही असंगत हैं। धर्म में फिर और कुछ जोडने को नहीं रह जाता है। वृत्त ही होता है, पूर्ण वृत्त नहीं। क्योंकि जो पूर्णवृत्त नहीं है, वह वृत्त ही नहीं है। वृत्त का होना ही उसकी पूर्णता भी है। धर्म का होना ही उसकी निरपेक्ष, निर्दोष सत्यता भी है। और जो सर्वोच्च धर्म को सिद्ध करने आपके पास आते रहे, वे भी या तो आपसे कम पागल नहीं थे, या फिर पाखंडी थे। जो जानता है, वह धर्मों को नहीं, धर्म को ही जानता है।'
राजा ने विह्वल होकर उस भिखारी के पैर पकड लिए। उस भिखारी ने कहाः 'मेरे पैर छोडें। मेरे पैरों को न बांधें। मैं तो आपके भी पैरों को मुक्त करने आया हूं। राजधानी के बाहर नदी के पार चलें। वहीं मैं धर्म की ओर इंगित कर सकता हूं।' वे दोनों नदी-तट पर गए। राजधानी की श्रेष्ठतम नावें बुलाई गईं। लेकिन वह भिखारी प्रत्येक नाव में कोई न कोई दोष बता देता था। अंततः राजा परेशान हो गया। उसने भिखारी से कहाः 'महात्मन्! हमें केवल एक छोटी सी नदी पार करनी है। इसे तो तैर कर भी पार किया जा सकता है। छोडें इन नावों को और चलें, तैर कर ही पार चले चलें। व्यर्थ ही विलंब क्यों कर रहे हैं? '
वह भिखारी जैसे इसकी ही प्रतीक्षा में था। उसने राजा से कहाः 'राजन! यही तो मैं कहना चाहता हूं। धर्म-पंथों की नावों के पीछे क्यों पडे हैं? क्या उचित नहीं है कि परमात्मा की ओर स्वयं ही तैर चलें? वस्तुतः धर्म की कोई नाव नहीं। नावों के नाम से सब मल्लाहों के व्यवसाय हैं। स्वयं तैरना ही एकमात्र मार्ग है। सत्य स्वयं ही पाया जाता है। कोई और उसे नहीं दे सकता। सत्य के सागर में स्वयं ही तैरना है। कोई और सहारा नहीं है। जो सहारे खोजते हैं, वे तट पर ही डूब जाते हैं। और जो स्वयं तैरने का साहस करते हैं, वे डूब कर भी पहुंच जाते हैं।'
तुमको समझ न पाया!
प्यासा अंतर जग के विस्तृत, मरु में भटक-भटक कर हारा,
तुम्हें समझने के प्रयत्न में, बिता दिया निज जीवन सारा!
पर तुम बने रहे जीवन भर मृगतृष्णा की छाया!
तुमको समझ न पाया!
तुम हो मन के मीत, कहा, व्याकुल विह्वल मानस ने मेरे,
तुम्हें प्राप्त करने के हित, पूजे मानव-पत्थर बहुतेरे!
तुमने किस पर्दे के पीछे निज संसार बसाया!
तुमको समझ न पाया!
या तो तुम मुझमें अपने में, भेद-भाव-आभास मिटा दो,
या मेरे मन का अपने प्रति, तुम समूल विश्वास मिटा दो।
मैं जीवन भर जग की भूल-भुलैया में भरमाया!
तुमको समझ न पाया!
मुल्ला नसरुद्दीन भागा जा रहा था बाजार से अपने गधे पर। बड़ी तेजी में था। बाजार में लोगों ने भी पूछाः 'नसरुद्दीन इतनी जल्दी कर कहां चले जा रहे हो?' उसने कहाः 'अभी मत रोको, लौट कर बताऊंगा।' लौट कर जब आया तो लोगों ने पूछाः 'इतनी जल्दी क्या थी?' उसने कहाः 'मुझे दूसरे गांव जाना है और मैं अपने गधे को खोजने जा रहा था। फिर मुझे गांव से बाहर जाकर याद आई कि मैं गधे पर बैठा हुआ हूं!' नसरुद्दीन ने कहाः 'खैर, मैं तो नासमझ हूं। लेकिन मूर्खों, तुम्हें तो बताना था! मैं तो गधे पर बैठा था, इसलिए मुझे दिखाई भी नहीं पड़ रहा था! और मेरी नजरें तो आगे लगी थीं। लेकिन तुम्हें तो गधा दिखाई दे रहा था!' बाजार के लोगों ने कहाः 'हमें तुमने मौका ही कहां दिया! हमने पूछा भी था कि नसरुद्दीन, कहां जा रहे हो?' नसरुद्दीन ने कहाः 'उस वक्त मैं जल्दी में था।'
If you can't make it good,at least make it look good. -- Bill Gates
मायाजाल
कथा :
चीन में एक सम्राट का एक ही बेटा था । वह बेटा मरण-शय्या पर पड़ा था । चिकित्सकों ने कह दिया हार कर कि हम कुछ कर न सकेंगे, बचेगा नहीं, बचना असंभव है । बीमारी ऐसी थी कि कोई इलाज नहीं था । दिन दो दिन की बात थी, कभी भी मर जाएगा । तो बाप रात भर जाग कर बैठा रहा । विदा देने की बात ही थी । आंख से आंसू बहते रहे, बैठा रहा । कोई तीन बजे करीब रात को झपकी लग गई बाप को बैठे-बैठे ही । झपकी लगी तो एक सपना देखा कि एक बहुत बड़ा साम्राज्य है, जिसका वह मालिक है । उसके बारह बेटे हैं-बड़े सुंदर, युवा, कुशल, बुद्धिमान, महारथी, योद्धा ! उन जैसा कोई व्यक्ति नहीं संसार में । खूब धन का अंबार है ! कोई सीमा नहीं ! वह चक्रवर्ती है । सारे जगत पर उसका साम्राज्य है ! ऐसा सपना देखता था, तभी बेटा मर गया । पत्नी दहाड़ मार कर रो उठी । उसकी आंख खुली । चौंका एकदम । किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया । क्योंकि अभी-अभी एक दूसरा राज्य था, बारह बेटे थे, बड़ा धन था-वह सब चला गया; और इधर यह बेटा मर गया ! लेकिन वह ठगा-सा रह गया । उसकी पत्नी ने समझा कि कहीं दिमाग तो खराब नहीं हो गया, क्योंकि बेटे से उसका बड़ा लगाव था । एक आंसू नहीं आ रहा आंख में । बेटा जिंदा था तो रोता था उसके लिए, अब बेटा मर गया तो रो नहीं रहा बाप । पत्नी ने उसे हिलाया और कहा, तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया ? रोते क्यों नहीं ?
उसने कहा, 'किस-किस के लिए रोओ ? बारह अभी थे, वे मर गए । बड़ा साम्राज्य था, वह चला गया । उनके लिए रोऊं कि इसके लिए रोऊं ? अब मैं सोच रहा हूं कि किस-किस के लिए रोऊं । जैसे बारह गए, वैसे तेरह गए ।'
बात समाप्त हो गई, उसने कहा । वह भी एक सपना था, यह भी एक सपना है ।
यह जीवन जो चारों तरफ फैला है, इतना विराट मंच, इसमें अगर तुम भटक जाओ तो कुछ आश्चर्य नहीं ! तुम होश में नहीं हो, तुम मूर्च्छित हो ।
एक आदमी एक ट्रेन में न्यूयार्क की तरफ सफर कर रहा था। एक बीच के स्टेशन पर एक युवक भी सवार हुआ। उस युवक के हाथ के बस्ते को देखकर लगता था वह किसी इंश्योरेंस का एजेंट होगा। उस बूढ़े आदमी के पास वह बैठा। फिर थोड़ी देर बाद उसने पूछा कि क्या महाशय आप बात सकेंगे आपकी घड़ी में कितना बजा हुआ है? वह बूढ़ा थोड़ी देर चुप रहा और उसने कहा क्षमा करें, मैं न बता सकूंगा। उस युवक ने कहा, क्या आपके पास घड़ी नहीं है। उस बूढ़े ने कहा, घड़ी तो जरूर है, लेकिन मैं थोड़ा आगे का भी विचार कर लेता हूं, तभी कुछ करता हूं। अभी तुम पूछोगे कितना बजा है और मैं घड़ी में देखकर बताऊंगा कितना बजा है। हम दोनों के बीच बातचीत शुरू हो जाएगी। फिर तुम पूछोगे, आप कहां जा रहे हैं। मैं कहूंगा, न्यूयार्क जा रहा हूं। तुम कहोगे, मैं भी जा रहा हूं। आप किस मोहल्ले में रहते हैं। तो मैं अपना मोहल्ला बताऊंगा। संकोचवश मुझे कहना पड़ेगा, अगर कभी वहां आएं, तो मेरे घर भी आना। मेरी जवान लड़की है। तुम घर आओगे, निश्चित ही उसके प्रति आकर्षित हो जाओगे। तुम उससे कहोगे कि चित्र देखने चलती हो। वह जरूर राजी हो जाएगी। और यह मामला यहां तक बढ़ेगा कि एक दिन मुझे विचार करना पड़ेगा कि बीमा एजेंट से अपनी लड़की की शादी करनी है या नहीं करनी है। और मुझे बीमा एजेंट बिलकुल भी पसंद नहीं आते। इसलिए कृपा करो, मुझसे तुम घड़ी का समय मत पूछो।
न तुम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो, न तुम ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी हो, और न तुम आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा आदि इंद्रियों से ग्रहण किये जाने वाले हो, अपितु तुम अकेला, अदृश्य और विश्व के द्रष्टा हो । ऐसा समझकर सुखी हो जाओ ।
वहम
कथा :
एक आदमी बड़ा परेशान था । उसे एक वहम हो गया कि रात उसने एक सपना देखा-वह मुंह खोल कर सोता था, बचपन से उसकी खराब आदत पड़ गई थी-रात उसने सपना देखा कि मुंह उसका खुला है, और एक सांप उसमें घुस गया । घबड़ाहट में नींद तो खुल गई, लेकिन जब उसकी नींद खुली, तब भी सपना ऐसा प्रगाढ़ था कि उसने बराबर सांप की पूंछ सरकते देखी-अंतिम पूंछ । वह चीखा भी, चिल्लाया भी, लेकिन तब तक वह कंठ के अंदर उतर गया । अब उसके बड़े इलाज किये गये, एक्सरे लिये गये, दवाइयां दी गयीं । डाक्टर कहें उससे कि कोई सांप नहीं है, क्योंकि एक्सरे में आता नहीं । वह कहे, हम तुम्हारी मानें कि अपनी ? वह पेट में चलता है !
अब तुम थोड़ा सोचो उस आदमी को, अगर तुम भी ऐसा विचार करो तो चलने लगेगा । विचार की बड़ी क्षमता है । कल्पना की बड़ी शक्ति है । उसकी कल्पना प्रगाढ़ हो गई । वह बैठ न सके, पेट में दर्द हो, कहीं सांप यहां सरक रहा है, कहीं वहां सरक रहा है ! और उसका जीवन बेचैनी से भर गया । वह रात सो न सके । काम-धाम सब बंद हो गया । चिकित्सकों के पास जाये, वे कहें कि सांप हो भीतर तो हम इलाज करें, कुछ है ही नहीं ।
संयोग की बात, वह एक सम्मोहनविद के पास गया । उसने कहा कि सांप है । कौन कहता है नहीं है ? कहने वाले गलत । एक्सरे गलत होगा । लेकिन सांप है ।
उसकी बात सुनते ही वह आदमी आश्वस्त हुआ, उसने कहा कि गुरु मिले ! आप की ही तलाश कर रहा था । मानते ही नहीं लोग । अब मैं मरा जा रहा हूं ।
और उसकी तकलीफ तो सच थी, चाहे सांप झूठ हो । इसे थोड़ा समझ लेना । उसकी तकलीफ तो सच थी, चाहे सांप झूठ हो । सांप झूठ हो या सच हो, इससे क्या फर्क पड़ता है ? उसकी तकलीफ तो सच थी । वह दुबला हो गया, सूख कर हड्डी-हड्डी हो गया । उसकी एक ही घबड़ाहट, एक ही बेचैनी, कि इस सांप से कैसे छुटकारा होगा । सब अस्त-व्यस्त उसका जीवन हो गया ।
लेकिन उस सम्मोहनविद ने कहा, हम हल कर लेंगे । उसने इंतजाम किया । उसने उसकी संडास में एक सांप रखवा दिया । जब वह सुबह जाये मल-विसर्जन को, तो घर के लोगों को कहा कि सांप छोड़ देना । बस बाकी मैं निपटा लूंगा ।
जब वह मल-विसर्जन को गया, तो सांप उसने सरकता देखा । नीचे देखा, तो भागा, खुश हो कर बाहर आया । उसने कहा कि देखो, लाओ तुम्हारे एक्सरे ! वह डाक्टरों के पास गया, उसने कहा कि देखो, सांप था, निकल गया !
उसी दिन से वह ठीक हो गया ।
'कोई औषधि नहीं' का अर्थ यह होता है कि बीमारी झूठ है । इस झूठ बीमारी को झूठ जान लेने में ही छुटकारा है।
नब्बे प्रतिशत हम अपने को मुक्त करते हैं और प्रभु के लिए अर्पित होते हैं, दस प्रतिशत कीमत चुकाते हैं भीड़ के साथ रहने की ।
एक मनोवैज्ञानिक अपने मरीज की बातें सुन रहा था । मरीज ने कहा कि मुझे ऐसा वहम हो गया है कि मेरे ऊपर कीड़े-मकोड़े चलते रहते हैं । जानता हूं कि यह भ्रम है, लेकिन दिन भर मुझे यह खयाल बना रहता है कि यह गया, यह चढ़ा, सिर पर जा रहा है, पैर में जा रहा है, कपड़े में घुस गया, और खड़े होकर उसने अपने कपड़े झटकारे । मनोवैज्ञानिक ने कहा, ठहर । इतने जोर से मत झटकार, कहीं मुझ पर न गिर जाएं ।
जिसे हम मनोवैज्ञानिक कहते हैं, वह वहीं खड़ा है जहां रुग्ण व्यक्ति खड़े हैं । भेद अगर कुछ है तो जानकारी का है । भेद अगर कुछ है, अंतरात्मा का नहीं है । मनोवैज्ञानिक ने मन के संबंध में अध्ययन किया है, मन के संबंध में अभी जागरूक नहीं हुआ ।
इसलिए हम सदगुरुओं को मनोवैज्ञानिक नहीं कहते ।
बिल्ली से चूहा बचकर निकल भी जाए, लेकिन सचेत मनुष्य से सत्य बचकर नहीं निकल सकता।
कल्पना का बोझ
कथा :
एक बौद्ध कथा है, दो भिक्षु एक नदी से पार होते थे कि भिक्षु ने देखा कि एक युवती नदी पार करना चाहती है, तो वह घबड़ा गया । नदी गहरी है, शायद युवती कहे कि मेरा हाथ सम्हाल लो । वह अनजान मालूम होती है । सुंदर युवती है ! वह उसके पास से निकला, युवती ने कहा भी कि मुझे नदी के पार जाना है, क्या आप मुझे सहारा देंगे ? उसने कहा, मुझे क्षमा करो,मैं भिक्षु हूं स्त्री को मैं छूता नहीं ! और उसके हाथ-पैर कंप गये और वह भागा तेजी से नदी पार कर गया ।
बूढ़ा आदमी ! बहुत दिन का दबाया हुआ काम, भीतर फुफकार मारने लगा वह; यह खयाल ही कि स्त्री का हाथ पकड़ ले, सपनों को जन्म देने लगा । वह तो नदी पार कर गया घबड़ाहट में । सोचा, भगवान को धन्यवाद दिया कि चलो बचे, एक झंझट आती थी, एक गड्ढे में गिरने से बचे ! तब पीछे लौट कर देखा तो बड़ा हैरान हो गया । हैरान भी हुआ, थोड़ा ईर्ष्या से भी भरा, थोड़ी जलन भी पैदा हुई । वह जो युवा संन्यासी पीछे आ रहा था, वह लड़की को कंधे पर बिठा कर नदी पार करवा रहा है । कंधे पर बिठा कर ! हाथ पकड़ना भी एक बात थी, स्पर्श भी वर्जित है, और मैं तो बूढ़ा हूं और यह जवान है, और यह अभी नया-नया दीक्षित हुआ है ! और यह क्या पाप हो रहा है ?
फिर दो मील तक दोनों चलते रहे । आश्रम पहुंचने के पहले तक का फिर बोला नहीं, बहुत नाराज था, आगबबूला था । नाराजगी में ईर्ष्या भी थी, नाराजगी में रस भी था, क्रोध भी था, अपने को ऊंचा और धार्मिक मानने की अस्मिता भी थी, और इसको निकृष्ट और अधार्मिक मानने का भाव भी था । सभी कुछ मिश्रित था । सीढ़ियां जब वे चढ़ने लगे आश्रम की, तब उससे न रहा गया; उसने कहा कि सुनो मुझे गुरु से जा कर कहना ही पड़ेगा, क्योंकि यह तो नियम का उल्लंघन हुआ है । और तुम युवा हो, और तुमने स्त्री को कंधे पर बिठाया, स्त्री सुंदर भी थी !
उस युवा ने कहा, आप भी आश्चर्य की बात कर रहे हैं । मैं तो उस स्त्री को नदी के किनारे उतार भी आया, क्या आप उसे अब भी अपने कंधे पर लिये हुए हैं ? अब भी ! आप भूले नहीं ? दो मील पीछे की बात, आप अभी खींचे लिये जा रहे हैं ?
संसार में तृप्त और परमात्मा में अतृप्त-ऐसी साधक की परिभाषा है । परमात्मा में तृप्त और संसार में अतृप्त-ऐसी संसारी की परिभाषा है ।
भरोसा
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन अपने डाक्टर के पास गया था । 'डाक्टर साहब,' कहने लगा वह, 'अगर किसी दिन मैं यहां आ कर पतलून की जेब से इतने नोट निकालूं कि आपके पिछले सभी बिलों का भुगतान हो जाये, तो आप क्या मानेंगे ? क्या समझेंगे ?'
डाक्टर ने कहा, 'यही कि तुम किसी दूसरे की पतलून पहने हुए हो । '
तुम्हें भरोसा नहीं आता । मैं कह भी रहा हूं तो भी तुम सुनते हो, तुम कहते हो हुआ होगा जनक को; मगर यह पतलून अपनी नहीं है । तुम तो जानते हो, अपनी पतलून में हाथ डालेंगे तो खाली है । हाथ ही तुमने नहीं डाला है । खाली का तुमने भरोसा कर लिया है, बिना खोजे ।
जीसस -- सुई के छेद से भी ऊंट निकल सकता है लेकिन ऐ अमीर लोगों! तुम प्रभु के राज्य में प्रवेश न पा सकोगे ।
मुल्ला नसरुद्दीन बड़ा शक्की स्वभाव का था। जब उसने नई—नई कार खरीदी तो यार—दोस्तों ने समझाया कि नसरुद्दीन, ड्राइवर जरा सोच—समझ कर रखना, बड़े बदमाश होते हैं ये लोग। मौका पाते ही आंखों में धूल झोंक कर नई गाड़ी के सामान बदल लेते हैं और कबाड़खाने से खरीद कर पुराने कल—पुर्जे डाल देते हैं।
नसरुद्दीन ने कहा बिलकुल ठीक, मैं ड्राइवर की बराबर निगरानी रखूंगा।
पास ही के मुहल्ले में रहने वाले और ईमानदार समझे जाने वाले मियां महमूद को नसरुद्दीन ने ड्राइवर रखा। पहला ही दिन था, सुबह—सुबह मुल्ला शहर घूमने निकला। घर से चलने के पहले महमूद बोला मालिक एक स्कू—ड्राइवर भी साथ रख लीजिए, वक्त—बेवक्त कहीं काम आ सकता है। नसरुद्दीन ने गरज कर कहा. बड़े मियां, कमाल है! वक्त पर स्कू—ड्राइवर ही काम आना है तो मैने तुम्हें किसलिए ड्राइवर रखा है? यह भी खूब रही, ड्राइवर भी रखूं? ऊपर से स्कू—ड्राइवर भी रखूं! तुमने अभी गाड़ी को हाथ नहीं लगाया और धोखा देना शुरू किया!
बेचारे मियां महमूद ने बामुश्किल नसरुद्दीन को समझाया कि स्कू—ड्राइवर कोई ड्राइवर नहीं होता, यह तो पेचकस का नाम है। मुल्ला का संदेह विश्वास में परिणत हो उठा कि जरूर यह चालबाज नवजवान उसकी नई कार के बेशकीमती कल— पुर्जे बदलने की फिराक में है, वरना पेंचकस की क्या जरूरत आ पड़ी अभी—अभी, शुरू—शुरू, पहले ही दिन! खैर, मन ही मन अपने संदेह को दबाए वह घर से निकला और मियां महमूद की एक—एक हरकत को शरलक होम्स की जासूसी निगाहों से नसरुद्दीन देख रहा था। जब महमूद ने खटाक से कुछ किया तो इंजन की आवाज तेज हो उठी।
मुल्ला ने सीट से उचक कर पूछा मियां, क्या किया तुमने? यह आवाज कैसी हुई? जवाब मिला, हुजूर, मैंने अभी— अभी गेयर बदला, इसी कारण यह आवाज हुई। मेरे दोस्तों ने सच कहा था— मुल्ला नसरुद्दीन ने गरीब ड्राइवर की गर्दन पकड़ कर कहा— मगर तुम्हारा भी जवाब नहीं बड़े मियां! अरे जब दिन—दहाड़े मेरी आंखों के सामने ही गेयर बदल रहे हो तो न जाने मेरी पीठ पीछे क्या— क्या न करोगे!
थोड़ी दूर जाकर घरघराहट की आवाज के साथ कार खड़ी हो गई। महमूद बोला, मालिक, गाड़ी में पेट्रोल खत्म। अब गाड़ी आगे नहीं जा सकती। नसरुद्दीन ने मन ही मन सोचा, जरूर इस बदमाश ने ही कुछ गड़बड़ की है। कल से मैं दूसरा आदमी रख लूंगा। मगर प्रकट में वह बोला, पेट्रोल नहीं है तो न रहे और यदि गाड़ी आगे नहीं जा सकती तो सुनो मियां, गाड़ी पलटाओ और वापस घर चलो।
संदेह करने वाला व्यक्ति तो किसी भी चीज पर संदेह करेगा।
अहो, प्राणियों की भीड़ में भी मुझे द्वैत नहीं दिखता; क्योंकि वह तो घनघोर जंगल है । मैं उसमें क्या मोह करूं?
जिस आदमी ने अमरीका में पहला बैंक खोला, उससे किसी ने पूछा जब वह बड़ा सफल हो गया, कि तुमने बैंक खोला कैसे?
उसने कहा : मैंने किताबों में पढ़ा, यूरोप में बैंक हैं —उनके संबंध में। मैंने भी अपने द्वार पर एक तख्ती लगा दी—बैंक। घंटे भर बाद एक आदमी आया और दो सौ डालर जमा करवा गया। सांझ दूसरा आदमी आया और डेढ़ सौ डालर जमा करवा गया। तीसरे दिन तक तो मेरी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि मेरे भी पास जो बीस डालर थे, वे भी मैंने अपने बैंक में जमा कराए।
ऐसे भरोसा पैदा हो जाता है।
तुम अपनी छवि को दूसरे की आंख में ही देखते हो; और तो उपाय भी नहीं है। तुम अपने को पहचानते भी दूसरे के माध्यम से हो; और तो कोई उपाय भी नहीं है। दूसरे की आंखें दर्पण का काम करती हैं। अब अगर दर्पण के सामने तुम मुस्कुराते हुए खड़े हो गए तो दर्पण क्या करे?
अपना पता अपने से पूछना होगा - आंख बंद करके देखना होगा। लेकिन लोग आंख बंद नहीं करते हैं; आंख बंद की कि सो जाते हैं।
लोभी का दान
कथा :
एक झेन फकीर के पास एक आदमी हजारों स्वर्ण-अशर्फियां ले कर आया । उसने बड़े जोर से अशर्फियों का थैला पटका । उनकी खनखनाहट पूरे मंदिर में गंज गई । लोग ऐसे ही दान देते हैं -- खनखनाहट की आवाज ! उस फकीर ने जोर से कहा कि झोला धीमे से नहीं रख सकते ? वह आदमी थोड़ा हैरान हुआ, क्योंकि वह करोड़पति था, उस गांव का सबसे धनपति था । और यह फकीर.. ! और वह देने आया है; धन्यवाद की तो बात दूर रही, यह उससे कहता है, झोला शांति से नहीं रख सकते ? पर उसने कहा, आप सुनें महाराज ! लाखों रुपये लाया हूं आपको भेंट करने ! उसने कहा, ठीक !
मगर उसने धन्यवाद भी न दिया । वह धनपति जरा बेचैन होने लगा । उसने कहा, महाराज कुछ तो कहे ।
उसने कहा, अब कुछ क्या कहना है ? मुझको तुम धन्यवाद दो और जाओ ।
वह धनपति बोला -- यह जरा सीमा के बाहर की बात हो गई । धन्यवाद मैं आपको दूं और जाऊं-मतलब ?
तो उसने कहा, दान स्वीकार कर लिया है, इसकी दक्षिणा न दोगे ? तुम्हारा दान स्वीकार कर लिया, इसके लिए धन्यवाद न करोगे ? तुम्हारा दान इंकार भी किया जा सकता था, फिर क्या करते ? तो या तो धन्यवाद दो, या उठा लो झोला, जाओ अपने घर, फिर दुबारा इस तरफ मत आना ।
मैक्यावेली -- राजनीति में न कोई मित्र होता है, न कोई शत्रु। इसलिए मित्र को भी ऐसी बात मत कहना जो तुम शत्रु से छिपाना चाहते हो, क्योंकि कल यह मित्र शत्रु हो सकता है। और शत्रु के खिलाफ ऐसे शब्द मत बोलना जो तुम मित्र के खिलाफ नहीं बोलना चाहोगे, क्योंकि कल यह शत्रु मित्र हो सकता है।
संघर्ष का महत्व
कथा :
एक किसान परमात्मा से बहुत परेशान हो गया । कभी ज्यादा वर्षा हो जाए कभी ओले गिर जाएं, कभी पाला पड़ जाए कभी वर्षा न हो, कभी धूप हो जाए फसलें खराब होती चली जाएं, कभी बाढ़ आ जाए और कभी सूखा पड़ जाए । आखिर उसने कहा कि सुनो जी, तुम्हें कुछ किसानी की अक्ल नहीं, हमसे पूछो ! परमात्मा कुछ मौज में रहा होगा उस दिन । उसने कहा, अच्छा, तुम्हारा क्या खयाल है ? उसने कहा कि एक साल मुझे मौका दो, जैसा मैं चाहूं वैसा मौसम हो । देखो, कैसा दुनिया को सुख से भर दूं धन-धान्य से भर दूं !
परमात्मा ने कहा, ठीक है, एक साल तेरी मर्जी होगी, मैं दूर रहूंगा । स्वभावत: किसान को जानकारी थी । काश, जानकारी ही सब कुछ होती ! किसान ने जब धूप चाही तब धूप मिली, जब जल चाहा तब जल मिला, बूंद-भर कम-ज्यादा नहीं, जितना चाहा उतना मिला । कभी धूप, कभी छाया, कभी जल-ऐसा किसान मांगता रहा और बड़ा प्रसन्न होता रहा; क्योंकि गेहूं की बालें आदमी के ऊपर उठने लगीं । ऐसी तो फसल कभी न हुई थी । कहने लगा, अब पता चलेगा परमात्मा को ! न मालूम कितने जमाने से आदमियों को नाहक परेशान करते रहे । किसी भी किसान से पूछ लेते, हल हो जाता मामला । अब पता चलेगा ।
गेहूं की बालें ऐसी हो गईं, जैसे बड़े-बड़े वृक्ष हों । खूब गेहूं लगे । किसान बड़ा प्रसन्न था । लेकिन जब फसल काटी, तो छाती पर हाथ रख कर बैठ गया । गेहूं भीतर थे ही नहीं, बालें ही बालें थीं । भीतर सब खाली था । वह तो चिल्लाया कि हे परमात्मा, यह क्या हुआ ? परमात्मा ने कहा, अब तू ही सोच । क्योंकि संघर्ष का तो तूने कोई मौका ही न दिया । ओले तूने कभी मांगे ही नहीं । तूफान कभी तुमने उठने न दिया । आंधी कभी तूने चाही नहीं । तो आधी, अंधड़, तूफान, गड़गड़ाहट बादलों की, बिजलियों की चमचमाहट. तो इनके प्राण संगृहीत न हो सके । ये बड़े तो हो गए लेकिन पोचे हैं ।
निरपवाद रूप से जिन्होंने अब तक खोजा है, पाया है, वे भीतर के खोजी हैं । निरपवाद रूप से जिन्होंने खोजा बहुत और पाया कभी नहीं, वे बाहर के खोजी हैं ।
मुल्ला नसरुद्दीन तैरना सीखना चाहता था । तो किसी पड़ोसी ने कहा, यह कोई बड़ी बात नहीं । इतना शोरगुल क्यों मचाते हो? आओ मेरे साथ, मैं सिखा देता हूं । गए नदी के किनारे । सीढ़ी पर ही काई जमी थी, मुल्ला का पैर फिसल गया और धड़ाम से गिरा । गिरते ही उठा और भागा घर की तरफ । वह जो सिखाने ले गया था-जो उस्ताद-उसने कहा, अरे, कहां भागे जा रहे हो? सीखना नहीं है? मुल्ला ने कहा, अब जब तैरना सीख लूंगा तभी नदी के पास आऊंगा । यह तो झंझट है । पैर फिसल गया, चारों खाने चित्त हो गए, और कहीं नदी में गिर जाते तो जान से हाथ धो बैठते । तेरा क्या भरोसा! वक्त पर काम आए, न आए । अब आऊंगा नदी के पास, लेकिन तैरना सीखकर ।
अब तैरना कोई गद्दे-तकियों पर थोड़े ही सीखता है । कितना ही हाथ-पैर पटको अपने गद्दे पर लेट कर-सुविधा तो है, खतरा कोई भी नहीं है, लेकिन जहां खतरा नहीं वहां सीख कहां? खतरे में ही सीख है । खतरे में ही अनुभव है । जितना बड़ा खतरा है,जितनी बड़ी चुनौती है उतनी ही बड़ी संपदा छिपी है ।
कर्ता का भ्रम
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन सौ साल का हो गया, तो दूर-दूर से अखबारनवीस उसका इंटरव्यू लेने आए । सौ साल का हो गया आदमी ! वे उससे पूछने आए कि तुम्हारे स्वास्थ्य का राज क्या है ? तुम अब भी चलते हो, फिरते हो ! तुम प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ते हो । तुम्हारे शरीर में कोई बीमारी नहीं । तुम्हारा राज क्या है ?
मुल्ला ने कहा, मेरा राज ! मैंने कभी शराब नहीं पी, धूम्रपान नहीं किया ! नियम से जीया । नियम से सोया-उठा, संयम ही मेरे जीवन का और मेरे स्वास्थ्य का राज है ।
वह इतना कह ही रहा था कि बगल के कमरे में जोर से कुछ अलमारी गिरी तो वे सब चौंक गए । पत्रकारों ने पूछा, यह क्या मामला है ? तो उसने कहा, ये मेरे पिताजी हैं ! वे मालूम होता है कि फिर शराब पी कर आ गए !
मूढ़ का जितना भी ज्ञान है वह अनिष्ट के लिए होता है, वह उसकी प्रज्ञा को गिराकर उसके कुशल कर्मों का नाश कर डालता है ।
एक गांव में एक बूढ़ी औरत रहती थी । वह नाराज हो गई गांव के लोगों से । उसने कहा -- भटकोगे तुम अंधेरे में सदा । उन्होंने पूछा, मतलब ? उसने कहा कि मैं अपने मुर्गे को ले कर दूसरे गांव जाती हूं । न रहेगा मुर्गा, न देगा बांग, न निकलेगा सूरज ! मरोगे अंधेरे में ! देखा नहीं कि जब मेरा मुर्गा बांग देता है तो सूरज निकलता है ?
वह बूढ़ी अपने मुर्गे को ले कर दूसरे गांव चली गई क्रोध में, और बड़ी प्रसन्न है, क्योंकि अब दूसरे गांव में सूरज निकलता है ! वहां मुर्गा बांग देता है । वह बड़ी प्रसन्न है कि अब पहले गांव के लोग मरते होंगे अंधेरे में ।
सूरज वहां भी निकलता है । मुर्गों के बांग देने से सूरज नहीं निकलता, सूरज के निकलने से मुर्गे बांग देते हैं । तुम्हारे कारण संसार नहीं चलता । तुम मालिक नहीं हो, तुम कर्ता नहीं हो । यह सब अहंकार, भ्रांतियां हैं ।
दुनियां में दो तरह के लोग हैं । एक हैं -- भोगी । भोगी कहते हैं -- जो हो रहा है, यह और जोर से हो । एक हैं योगी जो कहते हैं -- जो हो रहा है, यह बिलकुल न हो । ये दोनों ही संघर्ष में हैं । योगी कह रहा है, बिलकुल न हो, जैसे कि उसके बस की बात है ! जैसे उससे पूछ कर शुरू हुआ हो ! जैसे उसके हाथ में है !
भोगी कह रहा है, और जोर से हो, और ज्यादा हो ! सौ साल जीता हूं दो सौ साल जीऊं । एक स्त्री मिली, हजार स्त्रियां मिलें । करोड़ रुपया मेरे पास है, बीस करोड़ रुपया मेरे पास हो । भोगी कह रहा है, और जोर से हो; वह भी सोच रहा है, जैसे उससे पूछ कर हो रहा है; उसकी अनुमति से हो रहा है; उसकी आकांक्षा से हो रहा है ।
दोनों की भ्रांति एक है । दोनों विपरीत खड़े हैं, एक दूसरे की तरफ पीठ किए खड़े हैं; लेकिन दोनों की भ्रांति एक है । भ्रांति यह है कि दोनों सोचते हैं कि संसार उनकी अनुमति से चल रहा है । चाहें तो बढ़ा लें, चाहें तो घटा दें ।
मूढ़ व्यक्ति, जो नहीं है उसकी संभावना जगाता है; भिक्षुओं में अग्रणी बनाना चाहता है; संघ के आवास / विहार का स्वामित्व चाहता है; पराए संघ में आदर सत्कार की कामना करता है
एक महल के पास पत्थरों का एक ढेर लगा था । और एक छोटा बच्चा खेलता आया और उसने एक पत्थर उठा कर महल की खिड़की की तरफ फेंका । पत्थर जब ऊपर उठने लगा तो पत्थर ने अपने नीचे पड़े हुए पत्थरों से कहा, सगे-संबंधियों से कहा, सुनो, जिन पंखों के तुमने सदा स्वप्न देखे, वे मेरे पैदा हो गए हैं । आज मैं आकाश में उड़ने के लिए जा रहा हूं ।
स्वप्न तो पत्थर भी देखते हैं उड़ने के । उड़ नहीं पाते । मजबूरी में तड़पते हैं । आज इस पत्थर को अहंकार जगा । फेंका तो किसी ने था लेकिन पत्थर ने घोषणा की, कि देखते हो, सुनते हो? जिन पंखों के तुमने स्वप्न देखे वे मुझमें पैदा हो गए । आज मैं आकाश की यात्रा को जा रहा हूं । भेजा जा रहा था लेकिन उसने कहा, जा रहा हूं । पहल उसके स्वयं के भीतर से न आई थी । प्रारंभ किसी और ने किया था, लेकिन प्रारंभ का मालिक वह स्वयं बन गया ।
और फिर जब जाकर कांच की खिड़की से टकराया और कांच चकनाचूर हो गया तो खिलखिला कर अट्टहास करके हंसा । और उसने कहा, सुनते हो? हजार बार मैंने कहा है, हजार बार चेताया है, मेरे मार्ग में कोई न आए अन्यथा चकनाचूर कर दूंगा । अब जब पत्थर कांच से टकराता है तो कांच चकनाचूर होता है, पत्थर करता नहीं । यह कांच और पत्थर के स्वभाव से घटता है कि कांच चकनाचूर होता है । फर्क समझ लेना होने में और करने में । पत्थर ने कुछ किया नहीं है । करने को क्या है? कांच टूटा है । पत्थर निमित्त है तोड्ने में, कर्ता नहीं है ।
जो मन की तरफ उन्मुख रहा, उसकी पीठ आत्मा की तरफ रहती है ।
एक सभा में एक राजनेता बहुत देर तक बोलता चला गया । धीरे - धीरे लोग हटते गये, उठते गये । आखिर में सिर्फ एक आदमी मुल्ला नसरुद्दीन बैठा रह गया । फिर भी राजनेता ने पीछा न छोड़ा, उसे जों कहना था वह कहता ही रहा । अंत करके उसने नसरुद्दीन को कहा कि धन्यवाद नसरुद्दीन, मैंने तो कभी नहीं सोचा था कि तुम्हारा मुझमें इतना लगाव है, कि तुम और इतने प्रेम से मुझे सुनोगे । मैं तुम्हारा आभारी हूं । वर्षों हो गये इस गांव में रहते, मैंने तुम्हारी तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया । एक तुम अकेले बचे और सब चले गये । नसरुद्दीन ने कहा फिजूल की बातों में न पड़ो, मैं आपके बाद का बोलने वाला हूं इसलिए बैठा हूं । अब बैठो और सुनो मुझे । सुननेवाले तो जा चुके, मुझे बोलना है । मैं वक्ता को धन्यवाद देने के लिए बोलनेवाला हूं, अब तुम बैठो और सुनो । सुनने को मैं भी यहाँ बैठा नहीं हूं ।
अगर नर्तकी देखे कि सारे दर्शक जा चुके हैं तो नर्तन का क्या अर्थ रह जाएगा! बंद हो जाएगा । यह मन का जो नर्तन चल रहा है, तुम इसके जब तक रसविभोर होकर, उत्सुक होकर, विश्लेषक बने हो, तब तक गड़बड है, तब तक जारी रहेगा । तुम मुंह मोड़ लो, तुम पीठ कर लो, तुम मन से विमुख हो जाओ । जो मन से विमुख हुआ, वह आत्मा के सन्मुख हो जाता है ।
उसका स्वयं में अनुभव आत्मा का अनुभव है, उसका सबमें अनुभव परमात्मा का अनुभव है।
छिपकलियों को कभी निमंत्रण मिल जाता है उनकी जात-बिरादरी में, तो जाती नहीं, वे कहती हैं महल गिर जाएगा, सम्हाले हुए हैं। छिपकली चली जाएगी तो महल गिर जाएगा!
रमजान के उपवास के दिन हैं और मुल्ला नसरुद्दीन एक रास्ते के किनारे से निकलता है। प्यास लगी है, तो उसने कुएं में झांककर देखा, देखा कि चांद कुएं में पड़ा है। सोचा उसने कि चांद यहां फंसा पड़ा है! उपवास के दिन हैं, और अगर चांद बाहर न निकाला गया, तो लोग उपवास कर-करके मर जाएंगे, उपवास का अंत कैसे आएगा?
भागा हुआ पास के गांव में गया, रस्सी लेकर आया। रस्सी को डाला कुएं में चांद को फंसाने के लिए और निकालने के लिए। फंस भी गया चांद। मुल्ला ने बड़ी ताकत लगाई। बड़ी मुश्किल में पड़ा; क्योंकि रस्सी उसकी कुएं में जाकर एक पत्थर से फंस गई थी। बहुत खींचा, फिर सोचा भी कि चांद जैसी चीज है, मुश्किल तो होगी ही। लेकिन हजारों-लाखों लोगों का सवाल है, मुझे मेहनत करके निकाल ही देना चाहिए। बहुत ताकत लगाई, तो रस्सी टूट गई। मुल्ला धड़ाम से कुएं के नीचे गिरा। घबराहट में आंखें बंद हो गईं। सिर लहूलुहान हो गया। जब आंख खुली, तो चांद आकाश में दिखाई पड़ा। उसने कहा कि चलो, कोई हर्ज नहीं। थोड़ी हमें मुश्किल भी हुई, तो कोई बात नहीं, लेकिन चांद मुक्त हो गया!
यदि आप अमीर होने की अनुभूति चाहते हैं तो उन वस्तुओं पर विचार करें जो जिन्हें पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन सुबह बैठकर बहुत चिंतन में लीन है। और उसकी पत्नी ने पूछा कि इतना क्या सोच— विचार में पड़े हो? तो मुल्ला ने कहा, मैं यह सोच रहा हूं कि आदमी जब मरता होगा, तो उसके भीतर क्या होता होगा? कैसे पक्का होता होगा कि मैं मर गया? समझो कि मैं मर जाऊं, तो मैं कैसे जानूंगा कि मैं मर गया? उसकी पत्नी ने कहा कि छोड़ो मूढ़ता की बातें। जब मरोगे, तो एकदम पता चल जाएगा, हाथ-पैर ठंडे हो जाएंगे बर्फ जैसे!
पंद्रह दिन बाद मुल्ला जंगल में लकड़ियां काट रहा है। अपने गधे को उसने एक झाड से बांध दिया है और लकड़ियां काट रहा है। सर्द सुबह है और बर्फ पड़ रही है। उसके हाथ-पैर ठंडे होने लगे। उसने सोचा, निश्चित, मौत करीब है। कहा था पत्नी ने कि अपने आप पता चल जाएगा। जब हाथ-पैर ठंडे होंगे, अपने आप जान जाओगे कि मरने लगे। फिर उसने सोचा कि मरे हुए आदमी लकड़ियां तो कभी काटते देखे नहीं गए, तो लकड़ी काटना इस वक्त उचित नहीं है। कुल्हाड़ी छोड्कर वह जमीन पर लेट गया। लेटते ही से और ठंडा होने लगा। बर्फ पड़ रही है जोर की। उसने कहा कि निश्चित ही मौत आ गई!
उसे लेटा हुआ और मरा हुआ देखकर दो भेड़ियों ने उसके गधे पर हमला कर दिया, जो उसके पीछे ही झाड से बंधा है। मुल्ला ने अपने मन में कहा, कोई हर्ज नहीं, अगर आज मैं जिंदा होता, तो मेरे गधे के साथ ऐसी स्वतंत्रता तुम नहीं ले सकते थे! काश, मैं जिंदा होता। लेकिन अब कोई बात ही नहीं है, मैं मर ही गया हूं!
आदमी अगर अपनी आत्महत्या भी कर रहा है, तो वह ऐसी ही भ्रांति में है कि मैं कर रहा हूं। लेकिन जिंदगीभर करने का हम भ्रम पालते हैं, इसलिए मौत में भी हम पाल सकते हैं। हम जिंदगीभर सोचते हैं, यह मैं कर रहा हूं। यह मैं कर रहा हूं। यह मैं कर रहा हूं! हम तो यहां तक सोचते हैं कि सांस भी मैं ले रहा हूं। जी भी मैं रहा हूं!
नहीं, आप सांस भी नहीं ले रहे हैं, जी भी आप नहीं रहे हैं। अगर आप ही सांस लेते होते, तो मौत तो कभी आ ही नहीं सकती। मौत दरवाजे पर आ जाती, आप कहते, अभी मैं सांस लेना बंद नहीं करता, मैं लेता ही रहूंगा। लेकिन सांस बाहर जाएगी, नहीं लौटेगी, आप भीतर नहीं ले सकेंगे। जीवन आपसे नहीं चल रहा है, आपकी बहुत गहराई से चल रहा है। जहां से जीवन चल रहा है, वही परमात्मा है; जहां से मौत आती है, वही परमात्मा है। आप सिर्फ बीच की एक लहर हैं।
आदमी का अहंकार कि 'मैं बचाता हूँ', भी अहिंसा नहीं ।
महावीर जब चींटी से बच कर चल रहे हैं तो आप इस भ्रांति में मत रहना कि आप भी जब चींटी से बच कर चलते हैं, तो वही कारण है जो महावीर का कारण है। आप जब चींटी से बच कर चलते हैं, तो चींटी से बच कर चल रहे हैं। और महावीर जब चींटी से बच कर चलते हैं तो अपने पर ही पैर न पड़ जाये, इसलिए बच कर चल रहे हैं! इन दोनों में बुनियादी फर्क है। महावीर का बचना अहिंसा। आपका बचना हिंसा ही है। दूसरा मौजूद है कि चींटी न मर जाये। और चींटी न मर जाये इसकी चिंता आपको क्यों है? इसकी चिंता सिर्फ इसलिए है कि कहीं चींटी के मरने से पाप न लग जाये। वह अदर ओरियेंटेड कांशसनेस है। कि कहीं चींटी के मरने से पाप न लग जाये, कहीं चींटी के मरने से नरक में न जाना पड़े, कहीं चींटी के मरने से पुण्य न छिन जाये, कहीं चींटी के मरने से स्वर्ग न खो जाये! चींटी से कोई प्रयोजन नहीं है, प्रयोजन सदा अपने से है। लेकिन चींटी पर ओरियेंटेड है। दिमाग चींटी पर केंद्रित है, चींटी से बच रहे हैं।
रामकृष्ण एक दिन गंगा पार कर रहे हैं। बैठे हैं नाव में। अचानक चिल्लाने लगते हैं जोर से, कि मत मारो, मत मारो, क्यों मुझे मारते हो? पास, आस-पास बैठे लोग कोई भी उनको नहीं मार रहे हैं। सब भक्त हैं, उनके पैर छूते हैं, पैर दबाते हैं, उनको कोई मारता तो नहीं। सब कहने लगे, आप क्या कह रहे हैं? कौन आपको मार रहा है? रामकृष्ण चिल्लाये जा रहे हैं। उन्होंने पीठ उघाड़ दी। पीठ पर देखा तो कोड़े के निशान हैं। खून झलक आया है। सब बहुत घबड़ा गये। रामकृष्ण से पूछा, यह क्या हो गया? किसने मारा आपको? रामकृष्ण ने कहा, वह देखो, वे मुझे मार रहे हैं।
उस किनारे पर मल्लाह एक आदमी को मार रहे हैं कोड़ों से, और उसकी पीठ पर जो निशान बने हैं वे रामकृष्ण की पीठ पर भी बन गये। ठीक वही निशान। और जब तट पर उतर कर भीड़ लग गई है और दोनों के निशान देखे गये हैं तो तय करना मुश्किल हो गया कि कोड़े किसको मारे गये? ओरिजिनल कौन है? रामकृष्ण को चोट ज्यादा पहुंची है मल्लाह से। निशान वही हैं, चोट ज्यादा है। क्योंकि मल्लाह तो विरोध भी कर रहा होगा भीतर से, रामकृष्ण ने तो पूरा स्वीकार ही कर लिया! चोट ज्यादा गहरी हो गई। लेकिन रामकृष्ण के मुख से जो शब्द निकला--'मुझे मत मारो', इसका मतलब समझते हैं? एक शब्द है हमारे पास, sympathy, सहानुभूति। यह सहानुभूति नहीं है।
सहानुभूति हिंसक के मन में होती है। वह कहता है, मत मारो उसे। दूसरे को मत मारो। सहानुभूति का मतलब है कि मुझे दया आती है। लेकिन दया सदा दूसरे पर आती है। यह सहानुभूति नहीं है, यह समानुभूति है, empathy है। सिम्पैथी नहीं है। यहां रामकृष्ण यह नहीं कह रहे हैं कि "उसे' मत मारो। रामकृष्ण कह रहे हैं 'मुझे' मत मारो--यहां दूसरा गिर गया!
असल में दूसरे से जो हमारा फासला है वह शरीर का ही फासला है, चेतना का कोई फासला नहीं। चेतना के तल पर दो नहीं हैं। हम दूसरे को बचायें तो वह अहिंसा नहीं हो सकती। हम दूसरे को बचायें, तो वह भी हिंसा ही है। जिस दिन हम ही रह जाते हैं, और बचने को कोई भी नहीं रह जाता, उस दिन अहिंसा फलित होती है।
फ्रेडरिक नीत्से -- लोग सत्य चाहते ही नहीं। जब भी मैंने लोगों से सत्य कहा, लोगों ने गालियां दीं। और जब भी मैंने असत्य कहा, लोग बड़े प्रसन्न हुए, मुस्कुराए और धन्यवाद दिया। सत्य लोगों को देना ही मत, अन्यथा वे तुम्हें कभी क्षमा न करेंगे।
एक महिला किसी डॉक्टर से कह रही थी कि मेरे पति को रात नींद नहीं आती, क्या करूं? तो डॉक्टर ने कहा:"ये दो गोलियां लो और सब ठीक हो जाएगा।' चलते वक्त वह पूछने लगी कि ये गोलियां पति को कब देनी हैं? डॉक्टर ने कहा: "पति को नहीं देनी, ये तुम्हें लेनी हैं। अगर तुम सो गयीं तो वे सो ही जाएंगे। माई, कोई तरह तुम सो जाओ।'
बासी भोजन
कथा :
श्रावस्ती में एक सेठ था -- मृगार । उसके लड़के की पत्नी थी विशाखा । विशाखा सुनने जाती थी बुद्ध को । मृगार कभी कहीं सुनने गया नहीं । वह धन-लोलुप धन के पीछे पागल था । वह सबसे बड़ा श्रेष्ठि था श्रावस्ती का । श्रावस्ती भारत की सबसे ज्यादा धनी नगरी थी और मृगार उसका सबसे बड़ा धनपति था ।
तुम्हें शायद खयाल में न हो, जो शब्द हिंदी में है सेठ, वह श्रेष्ठि का ही अपभ्रंश है, श्रेष्ठ का अपभ्रंश है । अब तो सेठ गाली जैसा लगता है । लेकिन कभी वह श्रेष्ठतम लोगों के लिए उपयोग किया जाता था ।
नगर का सबसे बड़ा, श्रावस्ती का सबसे बड़ा श्रेष्ठि था मृगार, लेकिन कभी बुद्ध को सुनने न गया था । विशाखा उसकी सेवा करती-अपने ससुर की; उसके लिए भोजन बनाती । लेकिन विशाखा को सदा पीड़ा लगती थी कि यह ससुर बूढ़ा होता जाता है और बुद्ध के वचन भी इसने नहीं सुने । जानना तो दूर, सुने भी नहीं । इसका जीवन ऐसे ही धन, पद, वैभव में बीता जा रहा है । यह जीवन यूं ही रेत में गंवाए दे रहा है । यह सरिता ऐसे ही खो जाएगी सागर में पहुंचे बिना ।
तो एक दिन जब मृगार भोजन करने बैठा और विशाखा उसे भोजन परोसती थी, तो वह कहने लगी -- तात ! भोजन ठीक तो है ? सुस्वादु तो है ?
मृगार ने कहा : सदा तू सुंदर सुस्वादु भोजन बनाती है । यह प्रश्न तूने कभी पूछा नहीं, आज तू पूछती है, बात क्या है ? तेरा भोजन सदा ही सुस्वादु होता है ।
विशाखा ने कहा -- आपकी कृपा है, अन्यथा भोजन सुस्वादु हो नहीं सकता, क्योंकि यह सब बासा भोजन है । मैं दुखी हूं कि मुझे आपको बासा भोजन खिलाना पड़ता है ।
मृगार बोला -- पागल ! बासा ! पर बासा तू खिलाएगी क्यों ? धन-धान्य भरा हुआ है कोठियों में, जो तुझे चाहिए प्रतिदिन उपलब्ध है । बासा क्यों ?
उसने कहा कि नहीं मैं वह नहीं कह रही, आप समझे नहीं । यह जो धन-धान्य है, शायद होगा आपके पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण; लेकिन इस जीवन में तो मैंने आपको कोई पुण्य-पुरुषार्थ करते नहीं देखा । इसलिए मैं कहती हूं यह सब बासा है । होगा, पिछले जन्मों में आपने कुछ पुण्य किया होगा, इसलिए धनी हैं । लेकिन मैंने अपनी आंखों से जबसे आपके घर में बहू हो कर आई हूं मैंने आपका कोई पुण्य-प्रताप, आपका कोई पुण्य-पुरुषार्थ, आपके जीवन में कोई प्रेम, कोई धर्म, कोई पूजा, कोई प्रार्थना, कोई ध्यान, कुछ भी नहीं देखा । इसलिए मैं कहती हूं यह पिछले जन्मों के पुण्यों से मिला हुआ भोजन बासा है तात ! आप ताजा भोजन कब करेंगे ?
मृगार आधा भोजन किए उठ गया । रात भर सो न सका । बात तो सही थी, चोट गहरी पड़ी । दूसरे दिन सुबह विशाखा ने देखा, वह भी बुद्ध के वचन सुनने के लिए मौजूद है, वह भी सुन रहा है । तब सुन-सुन कर वह ज्ञान की बातें करने लगा । वर्ष बीतने लगे । पहले वह ज्ञान की बातें न करता था, अब वह ज्ञान की बातें करने लगा; लेकिन जीवन वैसा का वैसा रहा । फिर विशाखा ने कहा कि तात ! आप अब भी बासा ही भोजन कर रहे हैं, अब ज्ञान का बासा भोजन कर रहे हैं । ये बुद्ध के वचन हैं, आपके नहीं । ये उनकी सुन कर अब आप दोहरा रहे हैं । आप अपनी कब कहेंगे ? आप जो गीत अपने प्राणों में ले कर आए हैं, वह कब प्रगट होगा ? प्रभु, उसे प्रगट करें । कुछ आपके भीतर छिपा पड़ा है झरना, उसे बहाएं ! यह अब भी बासा है ।
तुम्हारा धन भी बासा है, तुम्हारा ज्ञान भी बासा है । और बासा होना ही पाप है । सब पाप बासे हैं । पुण्य तो सदा ताजा है, सद्यः स्वात ! अभी-अभी हुई वर्षा में ताजे खड़े हुए फूल, अभी-अभी ऊगे सूरज की किरणों में नाचती सुबह की ताजी-ताजी पत्तियां-ऐसा पुण्य है ।
ज्ञान को सुन कर सब कुछ मत मान लेना । जब तक जान न लो, तब तक रुकना मत ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन मिलने आया। तो ऐसा लगता था कि कई दिनों से स्नान नहीं किया है। कपड़े गंदे पहने है। तो मैंने उससे कहा, 'नसरुद्दीन, कुछ तो अपने बाप-दादों का स्मरण करो। एक तुम्हारे पिता थे कि लोग कहते हैं पेरिस में उनके कपड़े सिलते थे, लंदन में कपड़ों की धुलाई होती थी, और स्वच्छता से रहते थे। अभी भी जो लोग उनको जानते रहे--क्योंकि उनको मरे बीस साल हो गये--जिन्होंने उनको देखा है, वे अब भी उनके कपड़ों और रहने-सहने के ढंग और शान की चर्चा करते हैं। और एक तुम हो!' नसरुद्दीन ने कहा कि देखो, यह मैं वही कपड़े पहने हुआ हूं जो मेरे पिता पहनते थे। आप बिलकुल गलती कर रहे हैं। यह कोट वही है।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर में एक रात चोर घुसे। चोर बड़े सम्हल कर चल रहे थे, लेकिन मुल्ला एकदम से झपट कर अपने बिस्तर से उठा, लालटेन जला कर उनके पीछे हो लिया। चोर बहुत घबड़ाए। उसने मौका ही नहीं दिया भागने का। वह ठीक दरवाजे पर खड़ा हो गया लालटेन लेकर। चोरों ने कहा कि भई, तुम तो सो रहे थे, एकदम नींद से कैसे उछल पड़े?
मुल्ला ने कहा, घबड़ाओ मत, चिंता न लो। भागने की जल्दी न करो। अरे मैं तो सिर्फ तुम्हें सहायता देने के लिए लालटेन जला कर...अंधेरे में कैसे खोजोगे? तीस साल हो गए इस घर में मुझे खोजते हुए, एक कौड़ी नहीं मिली। और तुम अंधेरे में खोज रहे हो, मैंने दिन के उजाले में खोजा। इसलिए लालटेन जला कर तुम्हारे साथ आता हूं; अगर कुछ मिल गया, बांट लेंगे।
दुनिया बहुत बड़ी है, जीवन का भी है विस्तार बड़ा,
तू किस भ्रम में युगोंऱ्युगों से इस सराय के द्वार खड़ा?
मुल्ला नसरुद्दीन के घर में एक चोर घुस गया। चोर ने अपनी चादर बिछायी सामान बांधने के लिए, वह अंदर सामान लेने गया, मुल्ला उसकी चादर पर सो गया। बिल्कुल आख बंद करके लेटे रहा है। तो चोर लौटा, उसने कहा: यह भी हद हो गई! घर में तो कुछ मिला ही नहीं, और चादर भी गई! उसने मुल्ला से कहा कि भई चादर तो दे दो। मुल्ला ने कहा कि इसी तरह कोई-कोई कभी-कभी आ जाता है, उसी से तो हमारा जीवन चल रहा है। चादर कहां से दें?
एक चोर किसी के घर में घुसा। कुछ खास तो वहां था नहीं। मगर जो भी कूड़ा-कबाड़ था, अब आ ही गया था, रात खराब गई, चलो जो है ले चलें। वह उसी को बांध-धूंध कर चलने लगा। जब वह चलने लगा तो आधे रास्ते में उसने पाया कि कोई पीछे चला आ रहा है। उसने लौटकर देखा, वही आदमी है जिसके घर में वह सामान ले आया है। उसने पूछा कि भाई, तुम किसलिए आ रहे हो उसने कहा कि घर हम बदलना ही चाहते थे पहले से। हम भी वहीं रहेंगे जहां तुम रहते हो। सामान तो तुम ले ही आए हो, हम को कहां छोड़ जाते हो?
तुम्हारे पास है क्या? तुम इतने घबडाए किसलिए हो? लेकिन लोग बड़े डरे हुए हैं कि कहीं कुछ छिन न जाए, कहीं कुछ खो न जाए! जिनके पास कुछ नहीं है, उनका डर कि कहीं कुछ खो न जाए, सिर्फ एक मान्यता है यह अपने को समझाए रखने की कि हमारे पास कुछ है। जरा खोलकर तो देखो पोटली, सिवाय दुःखों के और कुछ भी नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक बड़े प्रसिद्ध कवि के साथ ट्रेन में सफर कर रहे था । कवि थे तो ट्रेन में बैठ-बैठे भी कविताएं लिख रहे थे। मुल्ला ने उन से पूछा -- कोई किताब पत्रिका वगैरह है आपके पास? खाली बैठा हूं, कुछ पढूं। कवि जी ने फौरन पास में रखी हुए एक किताब देते हुए कहा -- यह पढ़िए, मेरी कविताओं का संकलन है। मुल्ला नसरुद्दीन बोला -- धन्यवाद, उसे तो आप अपने पास रखिए। वैसे पढ़ने के लिए तो मेरे पास टाइम-टेबिल भी है।
अपनी-अपनी नजर
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी खाना खा रहे थे, तभी रेडियो पर राग मल्हार आने लगा । 'वाह-वाह !' मुल्ला ने कहा, 'क्या प्यारी चीज है ।'
'क्या ?' पत्नी ने जरा जोर से पूछा ।
'मैंने कहा, क्या प्यारी चीज है !' मुल्ला ने और जरा जोर से दोहराया ।
पत्नी बोली, 'इस रेडियो को बंद करो तो कुछ सुनाई दे । इस बेसुरी आऽऽऽ आऽऽऽ के कारण तुम्हारी बात सुनाई ही नहीं दे रही है ।'
जो लड़ेगा, वह हारेगा। जो जानेगा, वह जीतेगा।
एक स्त्री ने किसी फोटोग्राफर से मेले में पूछा, 'बच्चों की फोटो किस रेट से उतारते हो!' फोटोग्राफर ने कहा, 'दस रुपये में बारह!'
'तब तो मैं बाद में आऊंगी।'
फोटोग्राफर ने कहा। 'क्यों?'
उसने कहा, 'अभी तो मेरे दो बच्चे हैं!'
समझने के ढंग! अपनी अपनी समझ!
अगर दूसरे में चोर दिखेगा, तो भीतर विषमता आएगी। और दूसरे में अगर बजती हुई बांसुरी सुनाई पड़ेगी, तो भीतर समता आएगी।
एक गांव में भूकंप आ गया। बहुत लोग गुजर रहे हैं--एक आदमी रास्ते से गुजर रहा है। भूकंप आया जोर से। मकान कंपने लगे। मकानों से चीजें नीचे गिरने लगीं। दूसरे लोग चिल्लाकर भागे कि हे राम! मर जाएंगे। उस आदमी ने कहा, हे भगवान! मुझे खयाल आया कि मेरी पत्नी ने मुझे चिट्ठी डालने को दी थी दो दिन पहले, और वह अभी तक मेरे खीसे में रखी है! भूकंप देखकर खयाल आया! पड़ोस वाले आदमी ने कहा कि तू यह क्या कह रहा है! भूकंप देखकर तुझे यह खयाल आया कि पत्नी ने चिट्ठी दी थी डालने को, वह अभी तक खीसे में रखी है! उसने कहा कि हां, क्योंकि अगर चिट्ठी नहीं डाली गई है, यह पता चल गया, तो मेरे घर में भूकंप आता है!
वह दूसरा आदमी समझ ही नहीं सका कि भूकंप से और चिट्ठी डालने का क्या संबंध हो सकता है। कोई भी तो संबंध नहीं है, इररेलेवेंट है। लेकिन किसी का हो सकता है। अपने-अपने घर की बात है! अपने-अपने अनुभव की बात है।
मिलरेपा (तिब्बत) -- अधार्मिक आदमी मैं उसको कहता हूं, जिससे अगर हम कहें कि हमारे गांव में फलां-फलां आदमी बहुत अच्छी बांसुरी बजाता है, तो वह फौरन कहेगा कि छोड़ो भी; क्या खाक बांसुरी बजाएगा! वह निपट चोर रखा है। और धार्मिक आदमी मैं उसे कहता हूं, अगर हम उससे कहें कि हमारे गांव में फलां आदमी चोर है, तो वह कहेगा, मान नहीं सकता; वह इतनी अच्छी बांसुरी बजाता है कि चोरी कैसे करता होगा!
एक राजा वृद्ध हो गये उन्होंने अपने तीन पुत्रों में से एक को उत्तराधिकारी चुनने हेतु परीक्षा लेने का विचार किया | तीनों पुत्रों को बुलाकर एक – एक मुद्रा दी और कहा कि इससे अपने कमरे को पूरा भरना है । पहले पुत्र ने उस धन से अपना कमरा कचरे से भर दिया | दूसरे पुत्र ने उस धन से अपना कमरा घास फूंस से भरवा दिया । तीसरे पुत्र ने अपने कमरे में उस धनराशि से एक दीपक जलाया तो पूरा कमरा प्रकाश से भर गया । अगरबत्ती जलाई तो पूरा कमरा सुगंध से भर गया और उस कमरे में वादद्यन्त्र बजे तो कमरा संगीत के स्वरों से भर गया । राजा ने तीसरे पुत्र को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जिसने अपने कमरे को प्रकाश, सुगंध और संगीत से भर दिया था ।
बर्ट्रेड रसेल -- आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अपराध-भाव है।
एक जापानी कंपनी ने, एक जूता बनाने वाली कंपनी ने अपने एजेंट को अफ्रीका भेजा। कोई सौ वर्ष पहले की बात है। और एक अमेरिकी कंपनी ने भी अपने जूता बनाने वाले, जूता बेचने वाले एजेंट को अफ्रीका भेजा। दोनों एक ही दिन उतरे। दोनों ने साथ ही जाकर बाजार की तलाश की। दोनों साथ ही लौटे। पोस्ट आफिस से जाकर दोनों ने तार किए अपने—अपने मालिकों को।
अमेरिकन ने लिखा कि तत्काल दूसरे हवाई जहाज से वापस आ रहा हूं क्योंकि यहां जूते बिकने की कोई संभावना नहीं। कोई जूता पहनता ही नहीं। जापानी ने लिखा कि यहां दो—तीन महीने लगेंगे। धंधे की बड़ी संभावना है। जूते इतने बिक सकते हैं, जितने की आप कल्पना ही नहीं कर सकते। क्योंकि जूते किसी के पास भी नहीं हैं!
तथ्य एक ही था कि लोग जूता नहीं पहनते थे। एक ने देखा, जब पहनते ही नहीं हैं, तो खरीदेगा कौन! बात खतम हो गयी। वह निराश हो गया। वह लौटने की तैयारी करने लगा। एक ने देखा, जब किसी के पास भी जूते नहीं हैं, सभी बिना जूते के घूम रहे हैं, तो बाजार की पूरी संभावना है। इससे बडा बाजार कहां मिलेगा! तो जरा वक्त लगेगा, लोगों को समझाना पड़ेगा कि तुम नंगे पैर हो। लेकिन जूते की बिकने की बड़ी संभावना है।
तथ्य तो एक ही होता है, देखने के ढंग अलग-अलग होते हैं।
आग लगी इस वृक्ष को जलने लगे हैं पात ।
उड़ जाओ ऐ पक्षियों जब पंख तुम्हारे साथ ॥
किसी शहर में दो देहाती सड़क के बीचों-बीच चल रहे थे। चौराहे पर खड़े हुए पुलिसमैन ने कहा, भाई साहब, किनारे से चलिए। दोनों फुटपाथ पर आकर कहने लगे -- अजीब आदमी है, खुद तो सड़क के बीचों-बीच खड़ा है और हमें फुटपाथ पर चलने को कह रहा है!
इस जगत में केवल संन्यासी ही भोगी है। इस जगत में केवल विरक्त ही, वीतराग ही आनंद को, शांति को उपलब्ध रहता है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्र से -- कल रात मेरा पड़ोसी आधी रात को मेरा दरवाजा पीटने लगा। मित्र -- मुल्ला, तब तो तुम बहुत परेशान हुए होंगे। मुल्ला ने कहा -- नहीं जी, मैं और परेशान होता! मैं तो अपना गाना पहले की तरह ही गाता रहा।
हम जब यह कहते हैं कि महावीर बहुत बड़े त्यागी हैं, असल में हम संपत्ति के प्रति अपने आदर को सूचित करते हैं, महावीर के प्रति नहीं। अगर हम महावीर को समझेंगे तो हमें दिखाई पड़ेगा, महावीर ने वह छोड़ दिया जो व्यर्थ था। छोड़ना भी कहना शायद गलत है, क्योंकि व्यर्थ को छोड़ा नहीं जाता, व्यर्थ दिख जाए तो छूट जाता है।
बच्चा अपने दोस्त से -- आज हमारे घर में लड़का पैदा होने वाला है । बच्चे के दोस्त ने पूछा -- तुम्हें कैसे पता? । बच्चा -- पिछली बार मम्मी के पेट में दर्द हुआ था तो बहन पैदा हुई थी, आज पापा के पेट में दर्द है ।
सब कुछ जान लो, लेकिन जो स्वयं को न जान ले तो वह जानना जानना नहीं है। सब कुछ जीत लो, लेकिन अगर स्वयं को न जीता, तो वह जीत विजय नहीं है। सब कुछ पा लो, लेकिन स्वयं को न पाया तो वह पाना उपलब्धि नहीं है।
विचित्र-सिंह के सामने से एक negro निकला; विचित्र सिंह ने अपने photographer दोस्त से कहा -- देख भाई, negative जा रहा है ।
जो जानने चलेगा, उसे एक दिन पता चलता है कि बिना हुए जाना ही नहीं जा सकता।
एक आदमी मछली मार रहा था। तीन घंटे से मुल्ला नसरुद्दीन उसके पीछे खड़ा देख रहा था। आखिर मुल्ला उससे बोला कि तीन घंटे खराब किए, तुमने एक मछली न पकड़ी।
है ऐसी ही बात जो चुप हूं ।
वरना क्या बात कहनी नहीं आती!
चंदूलाल ने अपनी पत्नी से कहा: अरी सुनती हो, आज तो मैं अपना छाता ले जाना ही भूल गया था।
पत्नी ने पूछा: आपको कब पता चला?
चंदूलाल ने सिर खुजाते हुए कहा: अरे वह तो जब बारिश रुक गयी और छाता बंद करने के लिए मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया, तब पता चला कि छाता तो है ही नहीं।
उनसे मिलकर मैं उन्हीं में खो गया।
और जो कुछ है, वह आगे राज़ है॥
डॉक्टर : आपको रोग क्या है?
मरीज : सबेरे उठने के बाद एक घंटे तक सिर चकराता रहता है।
डॉक्टर : उसमें क्या है! अरे एक घंटे बाद उठा करो।
मुट्ठिभर चाहिए तो सिकंदर हो जा ।
कायनात चाहिए तो कबीर हो जा ॥
एक बेटा मां से बोला: मां, एक चवन्नी दे दो। मां ने पूछा: क्यों? बेटे ने कहा: स्कूल मैं लेट गया था, इसलिए अध्यापक ने चवन्नी दंड लगाया है। मां ने कहा : सुन, तू भी अपने बाप की तर्ज पर जा रहा है। जहां गए वहीं लेट गए। लेटने की जरूरत क्या थी?
कष्ट भौतिक असुविधा है, जब कोई कष्ट में होता है तो उसकी खोज सुख के लिए होती है, उसकी खोज सत्य के लिए नहीं होती। दुख आत्मिक पीड़ा है, जब कोई दुख में होता है तो उसकी खोज सत्य के लिए होती है
एक बेटी ने अपने पिता से कहा : पापा, मेरा प्रेम हो गया है। अब मेरा विवाह करवा दो इसी लड़के से। करूंगी तो इसी लड़के से। जीऊंगी तो इसी लड़के के लिए, नहीं तो मर जाऊंगी। पापा ने कहा: 'बेटी, धीरज रख। शादी के पहले यह तो पता कर ले कि लड़का क्या काम करता है, उसकी कितनी जायदाद है?' बेटी ने कहा: 'ओह पापा, आप उससे मिल कर जरूर खुश होंगे, क्योंकि वह भी बिलकुल यही बातें आपके बारे में पूछ रहा था।'
जो मृत्यु के पार न जा सके, वह संपत्ति नहीं है।
एक शराबी अपने मित्रों से कह रहा था। 'आजकल शक्ल बहुत धोखा देती है। एक साहब मुझे विनोद खन्ना ही समझ बैठे।'
दूसरा बोला: 'यह तो क्या, कुछ भी नहीं। एक सज्जन मुझे मोरारजी देसाई समझ बैठे। मैं शराब पी रहा था, वे समझे कि स्वमूत्र पी रहा हूं।'
तीसरा बोला: 'अरे छोड़ो, यह कुछ भी नहीं। जब मैं पांचवी बार जेल गया तो जेलर बोला -- 'हे भगवान, तो तू फिर आ गया!'
आचरण नहीं पालना होता है, ज्ञान उपलब्ध करना होता है। जो आचरण से प्रारंभ करेंगे, उन्होंने गलत मार्ग से प्रारंभ किया। उन्होंने एक छोर से प्रारंभ किया। अज्ञान में आचरण आरोपित होगा, cultivated होगा। ज्ञान में आचरण सहज होता है। अज्ञान में क्रोध को दबा कर क्षमा करनी पड़ेगी, ज्ञान में क्रोध ही उत्पन्न नहीं होता है।
एक सिनेमा-घर के गेट कीपर को दांत में दर्द हो रहा था। खयाल रखना, सिनेमा-घर का गेट कीपर था। वह दौड़ा हुआ डॉक्टर के पास गया और बोला: 'डॉक्टर साहब, दांत में मुझे बहुत दर्द हो रहा है। 'कौन से दांत में'--डॉक्टर ने पूछा। गेट-कीपर ने कहा: 'नीचे की बालकनी में, सामने वाली लाइन में, दूसरे नंबर पर।'
संसार मतलबआंखों पर परदा डाले हुए लोगों की भीड़!
अहमक अहमदाबादी से किसी ने पूछा: 'भाई, तुम तो पूरे जोरू के गुलाम हो, कल शाम तुम अपने कोट में खुद बटन टांक रहे थे।' अहमक अहमदाबादी ने कहा: 'तुम्हारा कहना बिलकुल गलत है। वह कोट मेरा नहीं, मेरी बीबी का था।'
इमेनुएल कांट -- नैतिक व्यक्ति वह है, जो दूसरे व्यक्ति का साधन की तरह उपयोग नहीं करता है।
चंदूलाल अपने मित्र से कह रहा था: अरे अहमक, तुम तो दूसरी शादी के विरुद्ध थे, फिर तुमने शादी कैसे की ली?
अहमक अहमदाबादी ने कहा: चंदूलाल, तुम समझे नहीं। मुझे बिलकुल अपने विचारों की लड़की मिल गई, वह भी दूसरी शादी के विरुद्ध थी!
परमात्मा को खरीदने जो चला हो, वह हृदय की पूंजी पर भरोसा रखे। बुद्धि की पूंजी वहां नहीं चलती। वे सिक्के वहां काम नहीं आते। वहां पंडित पिछड़ जाते हैं। वहां कभी-कभी हृदयपूर्वक अज्ञानी भी प्रवेश कर जाता है।
अहमक अहमदाबादी अपनी पत्नी से बोले: बार-बार मैं तुम्हारे मुंह से बेवकूफ शब्द सुन रहा हूं। उम्मीद है कि तुम मुझे नहीं कह रही हो।
पत्नी बोली: आप अपने-आप को समझते क्या हैं? क्या दुनिया में आप अकेले ही बेवकूफ हैं?
गुरु समझाते नहीं, दिखाते हैं। समझाया क्या जा सकता है? सब समझाना तुम्हें केवल खिड़की तक ले आने के लिए फुसलाना है--बस।
बच्चे ने पूछा: 'मां नरक में स्कूल होता है क्या'? मां ने कहा: 'नहीं नरक में स्कूल नहीं होता। लेकिन बेटा, यह तू क्यों पूछ रहा है'? बच्चे ने कहा: 'फिर मां, लोग नरक जाने से डरते क्यों हैं?'
जिसको प्यास ही चुल्लू की लगी हो, उसको सागर में डुबाने का क्या प्रयोजन! जो यों ही चला आया हो--कुतूहल के वश, उसको उतना ही उत्तर चाहिए। जो जिज्ञासा लेकर आया हो, उसे गहरा उत्तर चाहिए। जो मुमुक्षा से आया हो, उसे अंतिम उत्तर चाहिए।
अहमक अहमदाबादी अपनी पत्नी से बोले: 'प्यारी, अपने पड़ोसी बड़े कंजूस हैं। ऐसे कंजूस मैंने जीवन में नहीं देखे।' पत्नी चौंकी। अहमक अहमदाबादी और ऐसी बात कहें! बोली: 'क्यों?' अहमक अहमदाबादी बोले: 'उनके बेटे टीकू ने कल चवन्नी निगल ली थी तो उसको निकलवाने के लिए मूर्खों ने दो-दो डॉक्टर को बुलवाया! अरे कंजूसी की भी हद होती है! अब अपने ही सुपुत्र छुन्नु ने चवन्नी निगल ली थी, आज तीन साल हो गये, मैंने तो तुम्हें बताया भी नहीं कि नाहक डॉक्टर को बुलवाना पड़े। और फिर वैसे भी चवन्नी की अभी अपने को जरूरत नहीं थी, जब जरूरत होगी निकलवा लेंगे। कोई डॉक्टर मरे थोड़े जा रहे हैं!'
संदेह के साथ ज्यादा देर मत रहना, ज्यादा मत सोचना। अन्यथा तुम भूल ही जाओगे कि वह संदेह है, वही तुम्हारी आस्था हो जाएगा।
'मेरे नाम से मेरे चाचा से वसीयत में इतनी लंबी रकम छोड़ी थी। इसी कारण लगता है कि तूने मुझसे विवाह किया है। यह बात सच है न?' अहमक अहमदाबादी की पत्नी एकदम भन्ना कर बोली। अहमक अहमदाबादी बोले: 'गलत, बिलकुल गलत, जी बिलकुल गलत! सौ प्रतिशत गलत। अन्य कोई भी तुम्हारे नाम से ऐसी वसीयत करता तो भी मैं तुमसे ही विवाह करता। इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हारे चाचा ने वसीयत की कि पिता ने वसीयत की--वसीयत होनी चाहिए। मेरा प्रेम अखंड है!'
मोक्ष में कोई मार्ग नहीं है, वहां मंजिल ही मंजिल है। संसार में मार्ग ही मार्ग है, वहां कोई मंजिल नहीं है।
रास्ते में कुछ मिला
एक ने कहा : ओह, यह कला है।
दूसरे ने कहा : उफ, यह क्या बला है।
तीसरे ने ध्यान से देखा और कहा : छीः, यह तो जूते का तला है ।
अगर ऐसे जीए कि जो भी कमाया, मौत ने छीन लिया, जो भी बचाया, मौत ने लूट लिया, तो तुम सांसारिक हो।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन नदी के किनारे बैठा था। वर्षा के दिन हैं--नदी बाढ़ में है। और दस अंधे आए और वे पार होना चाहते हैं। सस्ते जमाने की कहानी है। नसरुद्दीन ने कहा, -- पार करवा दूंगा। एक-एक पैसा एक-एक अंधे का लूंगा। अंधे राजी हो गए। एक-एक अंधे को नसरुद्दीन कंधे पर उस पार ले गया। नौ को तो पार करवा दिया, तब तक थक भी गया और दसवां थोड़ा वजनी भी था; पैर फिसल गया और दसवां अंधा हाथ से छूट गया। बाढ़ थी तेज; दसवें को बहा ले गई। आवाज और शोरगुल सुन कर नौ अंधे चौंके कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने पूछा, 'क्या बात है नसरुद्दीन!' उसने कहा, 'कुछ भी नहीं; तुम्हारे फायदे में ही है; एक पैसा कम देना पड़ेगा।'
भीतर दीवाली होगी। बाहर दीवाला!
एक सम्राट गरीबों की पीड़ा से बहुत परेशान था। थोड़े से लोग समृद्ध थे, सारा राज्य गरीब था। दूध नहीं मिलता, मक्खन नहीं मिलता; गरीब को छाछ से ही गुजारा करना पड़ता। उसने अपने बुद्धिमानों को बुलाया और उनसे कहा, 'कोई रास्ता निकालो, ताकि गरीब भी दूध पी सके।' बहुत सोचा बुद्धिमानों ने, लेकिन रास्ता क्या निकले? बुद्धिमान कितने जमाने से सोच रहे हैं, रास्ता निकला नहीं। और बुद्धिमानों ने बहुत उपाय किए, सब व्यर्थ गए।
लेकिन पुराने जमाने में हर राजा के दरबार में एक मूर्ख भी राजा रखते थे--एक महामूर्ख भी रखते थे। यह बड़े मजे की बात है कि कई बार बुद्धिमान जो नहीं खोज पाता, वह मूर्ख खोज लेता है। क्योंकि बुद्धिमान सोचता ही रहता है; मूर्ख छलांग लगा जाता है।
कहावत है कि जहां बुद्धिमान चलने में डरते हैं, वहां मूर्ख आंख बंद करके प्रवेश कर जाता है। कभी कभी वह पहुंच भी जाता है। कभी कभी वह ऐसी चोट करता है कि बुद्धिमान तिलमिला जाएं।
बुद्धिमान तो कुछ उत्तर न ला सके। उस मूर्ख ने एक दिन सुबह चिल्लाते हुए कहा, 'मिल गया सूत्र; आ गई बात पकड़ में; निकाल लाया राज।'
दरबार इकट्ठा हो गया। उन्होंने पूछा, 'तूने क्या हल निकाला है?' उसने कहा, 'बड़ी सरल तरकीब है। कल से हर आदमी दूध पीएगा।' राजा भी चकित हुआ; उसने कहा, 'एक छोटी सी बात है। एक फरमान निकाला जाए कि अब से छाछ दूध कहा जाएगा, दूध छाछ कही जाएगी। इतनी सी बात है। हर गरीब दूध पाएगा, हर अमीर छाछ पीएगा। जरा से एक फरमान की जरूरत है; नाम बदल देने की जरूरत है। इसमें इतना परेशान होने की बात ही कहां है!'
बौरे आमों पर बौराए भौंर न आए, कैसे समझूं मधुऋतु आई!
मुल्ला नसरुद्दीन को किसी ने बाजार में चलते देखा; एक पैर में काला जूता पहने है, दूसरे में लाल । पूछा कि भइया, कोई नई फैशन निकली है ! एक जूता लाल एक काला ! मुल्ला ने कहा -- नहीं जी, कोई फैशन नहीं निकली, यह उस मूर्ख दुकानदार की हरकत है । दो जोड़ी जूते खरीदे हैं, दोनों डिब्बों में ऐसे ही जूते बांध दिए हैं..एक काला, एक लाल ।
सीधी-सी बात है। मगर जटिल चित्त को दिखाई पड़नी मुश्किल हो जाती है ।
जीवन की हर बाधा को मुस्कुरा कर झेलिए, धूप कितनी भी हो सागर सूखा नही करते।
एक जर्मन और अंग्रेज जनरल दूसरे महायुद्ध के हार जाने पर बात कर रहे थे। जर्मन जनरल ने अंग्रेज जनरल से पूछा कि 'हमारी समझ में नहीं आता है। हमारे पास तुमसे अच्छे साधन थे। जर्मनी के पास ज्यादा यांत्रिक कुशलता थी। हमारे पास तुमसे ज्यादा जबान थे। हमारे पास तुमसे ज्यादा उत्साह था। हमारे पास तुमसे बड़ा नेता था, जादूगर नेता था हमारा; उसमें चमत्कार था। फिर भी हम हार गए? '
अंग्रेज जनरल हँसा। उसने कहा, 'इसके पीछे कारण हैं। हम जब भी युद्ध में जाते थे, तो पहले प्रार्थना करते थे। वही हमारा राज है। प्रार्थना के बिना हम कभी गए नहीं युद्ध में।'
जर्मन बोला, 'यह तुम क्या कह रहे हो? प्रार्थना तो हम भी करते थे!' अंग्रेज हंसा, उसने कहा, 'तुम करते होओगे। लेकिन जर्मन भाषा भगवान समझता भी है? '
जीवन का सत्य
कथा :
एक महिला एक दुकान पर बच्चों के खिलौने खरीद रही है । एक खिलौने को वह जमाने की कोशिश कर रही है, जो टुकड़े-टुकड़े में है और जमाया जाता है । उसने बहुत कोशिश की, उसके पति ने भी बहुत कोशिश की; लेकिन वह जमता ही नहीं । आखिर उसने दुकानदार से पूछा कि सुनो, पांच साल के बच्चे के लिए हम यह खिलौने खरीद रहे हैं; न मैं इसको जमा पाती हूं न मेरे पति जमा पाते हैं । मेरे पति गणित के प्रोफेसर हैं । अब और कौन इसको जमा पाएगा ? मेरा पांच साल का बच्चा इसको कैसे जमाएगा ?
उस दुकानदार ने कहा, सुनें, परेशान न हों । यह खिलौना जमाने के लिए बनाया ही नहीं गया । यह तो बच्चे के लिए एक शिक्षण है कि दुनिया भी ऐसी ही है, कितना ही जमाओ, यह जमती नहीं । यह तो बच्चा अभी से सीख ले जीवन का एक सत्य । इसको जमाने की कोशिश करेगा बच्चा, हजार कोशिश करेगा, मगर यह जमाने के लिए बनाया ही नहीं गया, यह जम सकता ही नहीं । इसमें तुम चूकते ही जाओगे । इसमें हार निश्चित है ।
जब भी कोई व्यक्ति पूरा खिल जाता है, तभी वह नैवेद्य बन जाता है। वह भी प्रभु के चरणों में समर्पित और स्वीकृत हो जाता है।
एक बहुत अंधेरी रात में एक अंधा आदमी अपने एक मित्र के घर मिलने गया था। जब वह वापस लौटने लगा, तो रास्ता अंधेरा था और अकेला था। उसके मित्र ने कहा कि मैं एक लालटेन हाथ में दिए देता हूं ताकि रास्ते पर साथ दे।
वह अंधा आदमी बोला, मेरे लिए लालटेन का क्या उपयोग होगा? मेरे लिए तो हाथ में लालटेन हो तो और न हो तो, दोनों हालतों में रास्ता अंधेरा है।
फिर भी उसके साथी ने कहा, लालटेन लेते ही जाओ। तुम्हारे लिए तो प्रकाश नहीं होगा, लेकिन कम से कम दूसरे लोग समझ सकेंगे कि तुम रास्ते पर हो और वे टकराने से बच जाएंगे।
वह अंधा आदमी उस लालटेन को लेकर गया। लेकिन थोड़ी देर बाद ही एक दूसरा आदमी उससे टकरा गया। उस अंधे आदमी ने पूछा, क्या बात है? क्या मेरी लालटेन बुझ गई है?
वह दूसरा व्यक्ति बोला, मुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ता। लालटेन तो मैं भी लिए हुए हूं। मैं अंधा हूं।
वे दोनों ही अंधे थे और दोनों के हाथ में लालटेन थी, लेकिन दोनों टकरा गए और गिर गए।
हमारी दुनिया की स्थिति करीब-करीब ऐसी हो गई है। सबके पास अच्छे विचार हैं। सबके पास अच्छे खयाल हैं। सभी को पता है कि ठीक क्या है। लेकिन आंखें न होने से हम सब टकरा जाते हैं और गिर जाते हैं। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है जिसे यह पता न हो कि ठीक क्या है। सदविचार सभी को पता हैं। लेकिन आंखें न होने से उनका कोई मूल्य नहीं है, और वे अंधेरे में अंधे के हाथ में प्रकाश की तरह सिद्ध होते हैं।
चाहे विज्ञ पुरुष मुहूर्त भर ही पंडित की सेवा में रहे, वह शीघ्र ही धर्म को जान लेता है जैसे जिव्हा सूप के रस को ।
बुद्ध के पास एक स्त्री सुबह-सुबह आई है। उसका लड़का मर गया है और बुद्ध गांव में रुके हैं। तो वह छाती पीटती हुई आई और उसने कहा कि मैं तुम्हारी बातें तभी सुनूंगी, जब तुम मेरे लड़के को जिंदा कर दो। लोग कहते हैं, तुम भगवान हो। तो भगवान ने तो इतना बड़ा जगत बनाया, तुम मेरे इस लड़के को ही जिंदा कर दो।
बुद्ध के संन्यासी, भिक्षु मुश्किल में पड़ गए। अब क्या होगा! बुद्ध ने कहा, कर दूंगा सांझ तक। एक छोटा-सा काम तू पहले मेरे लिए कर ला। गांव में जा--मैं इसे जिंदा करने की दवाई बुला रहा हूं--और किसी भी घर से सरसों के बीज ले आ, उस घर से, जिसमें कोई कभी मरा न हो। जा, सांझ तक लेकर आ जाना। बस, तू सरसों के बीज ले आना उस घर से जिसमें कोई कभी न मरा हो; मैं इसे सांझ जिंदा कर दूंगा।
औरत खुशी से भागी पागल होकर, जरूर किसी न किसी के घर में सरसों के बीज मिल जाएंगे, और उसका बेटा जिंदा हो जाएगा। लेकिन एक-एक घर के द्वार पर उसने दस्तक दी। जिस घर में भी गई, वहीं लोगों ने कहा, सरसों के बीज तो हैं। अभी-अभी फसल कटी है। तो बुद्ध ने कोई बड़ी कठिन दवाई नहीं मांगी है। लेकिन हमारे घर के सरसों के बीज काम न पड़ेंगे। हमारे घर में तो बहुत लोग मरे हैं।
सांझ तक एक-एक घर छान डाला। और सांझ तक हर घर पर यही बात सुनकर कि हर घर में कोई मरा है, और मृत्यु जीवन का नियम है, वह स्त्री सुबह रोती हुई आई थी, सांझ हंसती हुई आई।
बुद्ध ने कहा, ले आई सरसों के बीज? उस स्त्री ने कहा, सरसों के बीज तो नहीं लाई, लेकिन बड़ी बुद्धिमत्ता लेकर आई हूं। बच्चे को लौटा दें। मैं अपनी प्रार्थना वापस लेती हूं। उसे जिंदा करने की कोई जरूरत नहीं। बुद्ध ने कहा, इतनी जल्दी कैसे तू बदल गई?
उस स्त्री ने कहा कि जिस तथ्य की तरफ मेरी कभी आंख ही न उठी थी, उस तथ्य का दर्शन होते ही सब बदल गया। जब सभी मरते हैं, और जब सभी को मरना है, तो मेरे बेटे के साथ भी अपवाद कैसे हो सकता है! नहीं; अब मैं दुखी नहीं हूं। और अब मैं लड़के को जिलाने की प्रार्थना वापस लेने आई हूं। और आपसे यह भी प्रार्थना करने आई हूं कि आज से मैं भी समझिए कि मर गई, क्योंकि मर ही जाऊंगी। मरने के पहले जीवन को जानने की कोई विधि हो, तो मुझे बताएं। अब सदा जीने की कोई आकांक्षा नहीं है, क्योंकि मृत्यु तथ्य है; इसलिए अब मृत्यु का कोई भय भी नहीं है। लेकिन जब तक जी रही हूं, तब तक जीवन को जानने की कोई विधि हो, तो मुझे बताएं।
बुद्ध ने कहा, दिनभर में तेरी इतनी बड़ी बदलाहट! वह तो सांझ संन्यासिनी हो गई। उसने बुद्ध से उसी सांझ दीक्षा ली।
किस बात से यह बदलाहट हुई? एक तथ्य की तरफ दृष्टि उठी--एक बड़े तथ्य की तरफ--कि मृत्यु जीवन का हिस्सा है।
विलियम शेक्सपीयर -- दुःख अकेले नहीं आता बल्कि झुंडों में आता है ।
दुनिया में कुछ गंभीर लोग pathologically बीमार हैं। और ऐसे लोग धर्म की तरफ बड़ी जल्दी आकर्षित होते हैं। उसका कारण है, क्योंकि जिंदगी में उनको कहीं कोई उपाय नहीं मिलता अपनी उदासी के लिए। तो बीमार तरह के लोग मंदिरों में, मस्जिदों में और चर्चों में इकट्ठे हो जाते हैं। जिंदगी तो हंसती मालूम पड़ती है, वहां उन्हें बिलकुल जिंदगी बेकार मालूम पड़ती है। जहां भी फूल खिलते हैं, वहां वे बिलकुल भाग खड़े होते हैं। जहां कोई हंसता है, प्रसन्न होता है, वहां से वे हट जाते हैं।
तो बीमारों और विक्षिप्तों के समूह कहीं न कहीं तो इकट्ठे होंगे। और धर्म उनके लिए बहुत सुगम उपाय है। क्योंकि धर्म के नाम पर उदास होना, एक रेशनलाइजेशन बन जाता है, एक बुद्धियुक्त बात बन जाती है। फिर उनकी उदासी को आप बीमारी नहीं कह सकते, उनकी उदासी तपश्चर्या हो जाती है। और उनके दुख को फिर आप यह नहीं कह सकते कि तुम नाहक दुखी हो। उनका दुख एक मेटाफिजिक्स, एक दर्शनशास्त्र बन जाता है। वे दुखी यूं ही नहीं हैं, बल्कि वे दुखी लोग इकट्ठे होकर सभी हंसने वालों को पापी कहेंगे।
और हालत यह है— यह सोचने जैसी है— कि दुखी लोग हमेशा मुखर होते हैं। पीड़ित और परेशान लोग बहुत बकवासी होते हैं। वे काफी बोलने वाले लोग होते हैं। वे अपने दुख को मुखर कर देते हैं, और वे दुख के आस—पास दर्शनशास्त्र खड़े कर लेते हैं। और जो हंसता है, उसे वे condemn, उसे वे निंदा कर सकते हैं।
विलियम शेक्सपीयर -- गरीबी और संतुष्टि संपन्नता है और बहुत संपन्नता ।
एक आदमी ने एक महल बनवाया था। उसमें एक ही दरवाजा रखा था कि कोई शत्रु घर के भीतर न घुस सके। दरवाजे पर सख्त पहरा रखा था। फिर पड़ोस का राजा उसके महल को देखने आया। उसने कहा, और सब ठीक है, एकदम अच्छा है, मैं भी ऐसा ही महल बनाना चाहूंगा। लेकिन एक गलती है तुम्हारे महल में। इसमें एक दरवाजा है, यह खतरा है। दरवाजे से मौत भीतर आ सकती है। तुम कृपा करो, यह दरवाजा और बंद कर लो। फिर तुम पूर्ण सुरक्षित हो जाओगे। फिर न कोई भीतर आ सकता है, न कोई बाहर जा सकता है।
उस राजा ने कहा, खयाल तो मुझे भी यह आया था, लेकिन अगर दरवाजा भी मैं बंद कर लूंगा तो फिर सुरक्षा की जरूरत भी किसे रह जाएगी। मैं तो मर ही जाऊंगा। जी रहा हूं, क्योंकि दरवाजा खुला है। तो उस दूसरे राजा ने कहा, इसका मतलब यह हुआ कि दरवाजा अगर बिलकुल बंद हो जाए तो तुम मर जाओगे। एक दरवाजा खुला है तो तुम थोड़े जी रहे हो। दो दरवाजे खुलेंगे, तुम थोड़ा और ज्यादा जीओगे। अगर सब दरवाजे खुले रहेंगे तो तुम पूरी तरह से जीओगे।
लेकिन सब दरवाजे खोलने में हम डरते हैं, और इसलिए जी नहीं पाते। सब दरवाजे बंद कर लेते हैं जिंदगी के, फिर भीतर सिक्योरिटी में, सुरक्षा में निश्चिंत होकर सो जाते हैं। उसी सोने को हम जिंदगी समझ लेते हैं।
आकार ग्रहण करने वाली वस्तुओं को झूठी जान और जो आकार-विहीन है उस चेतन आत्मा को अविनाशी समझ । इतना आत्म-तत्त्व का उपदेश ग्रहण कर लेने से पुन: देहधारण करने की संभावना नहीं रह जायेगी ।
च्चांग्त्सु एक कब्रिस्तान से निकल रहा था। सुबह का अंधेरा था; भोर होने में देर थी। एक आदमी की खोपड़ी से उसका पैर टकरा गया। तो उस खोपड़ी को अपने साथ ले आया। उसे सदा अपने पास रखता था। अनेक बार उसके शिष्यों ने कहा भी, इस खोपड़ी को फेंकें; यह भद्दी मालूम पड़ती है। और इसे किसलिए रखे हैं?
तो च्चांग्त्सु कहता था, इसे मैं याददाश्त के लिए रखे हूं। जब भी मेरी खोपड़ी भीतर गरम होने लगती है, मुझे लगता है कि मैं कुछ हूं तभी मैं इसकी तरफ देखता हूं कि आज नहीं कल मरघट में पड़े रहोगे; लोगों की ठोकरें लगेंगी। कोई क्षमा भी मांगने रुकेगा नहीं। जब मुझे कोई गाली देता है या जब कोई मुझे मारने को तैयार हो जाता है, तब मैं उसकी तरफ नहीं देखता, इस खोपड़ी की तरफ देखता हूं। तब मेरा मन भीतर ठंडा हो जाता है कि ठीक ही है। इस खोपड़ी को कब तक बचाऊंगा? फिर अनंत काल तक यह पड़ी रहेगी, ठोकरें खाएगी। तो क्या फर्क पड़ता है कि अभी कोई मार जाता है कि कल कोई मार जाएगा, जब मैं बचाने के लिए मौजूद न रहूंगा!
तो यह खोपड़ी भी शून्यता में ले जाएगी।
अपनी वास्तविक स्थिति का स्मरण कि मैं मरणधर्मा हूं कि यह देह थोड़ी देर के लिए है; कि मेरी सीमाएं हैं; कि मेरे ज्ञान की सीमा है, मेरे सामर्थ्य की सीमा है, और मैं स्वतंत्र नहीं हूं परतंत्र हूं; सब तरफ से मैं घिरा हूं और सब तरफ से परस्पर आश्रित हूं; मेरी कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है। ऐसी प्रतीति गहरी होती जाए, यह विचार गहन होता जाए, यह ध्यान में उतरता जाए, यह हृदय में बैठ जाए, तो शरणागति फलित होगी।
मौत जीवन का वास्तविक तथ्य है, दुर्घटना नहीं। यह कोई संयोग नहीं है। यह होने ही वाला है, यह जीवन की नियति है।
महान जासूस शरलक होम्स अपने मित्र डाक्टर वाटसन के साथ सिनेमा देखने गए थे। फिल्म में घुड़दौड़ का एक दृश्य था। शरलक होम्स ने कहा, वाटसन, देखो यह जो पीले रंग वाला घोड़ा है न, यही रेस में जीतेगा।
नहीं-नहीं, डाक्टर वाटसन बोले, मेरे खयाल से तो काला घोड़ा ही जीतेगा, वही सबसे आगे भी है।
कुछ ही समय में रेस के अंत होतेऱ्होते पीला घोड़ा वाकई तेज दौड़ कर आगे आ गया और जीत गया। डाक्टर वाटसन बोले--आश्चर्यविमुग्ध होकर बोले--मेरे मित्र, मुझे तुम पर नाज है। माना कि तुम विश्व के सर्वश्रेष्ठ ख्यातिनाम जासूस हो, मगर तुमने यह कैसे पता लगाया कि पीला घोड़ा ही जीतेगा जब कि वह दौड़ में सबसे पीछे था?
यह कोई कठिन मामला नहीं, वाटसन--शरलक होम्स ने मुस्कुरा कर भेद खोला--मैं यह फिल्म पहले भी कई बार देख चुका हूं।
इस संसार की फिल्म को तुम कितनी बार देख चुके हो, अभी भी तुम्हें पता नहीं कि पीला घोड़ा जीतेगा! अभी भी तुम आशा बांधे हो कि काला घोड़ा जीतेगा, क्योंकि काला घोड़ा आगे है। यहां पीले घोड़े ही जीतते हैं।
Moonlight floods the whole sky from horizon to horizon; How much it can fill your room depends on its windows. -- Rumi
आत्मज्ञान के अतिरिक्त अभाव से और कोई मुक्ति नहीं है। महत्वाकांक्षाएं नहीं, आत्मज्ञान ही अभाव से मुक्त करता है। और उसके लिए चित्त से महत्वाकांक्षाओं की विदाई अत्यंत आवश्यक है।
सुलतान बैजद युद्ध में हार गया था और विजेता तैमूर के समक्ष बंदी बनाकर लाया गया था। उसे देख कर अनायास ही तैमूर जोर से हंसने लगा था। इस पर अपमानित बैजद ने बडे अभिमान से सर उठा कर कहा थाः 'जंग में फतह पाकर इतना गर्व मत करो तैमूर, याद रखो कि दूसरे की शिकस्त पर हंसने वाला एक दिन खुद अपनी शिकस्त पर आंसू बहाता है!' सुलतान बैजद काना था और तैमूर लंगडा। काने बैजद की बात सुन कर लंगडा तैमूर और दुगनी तेजी से हंसने लगा और बोलाः 'मैं इतना बेवकूफ नहीं कि इस छोटी सी जीत पर हंसूं! मुझे तो अपनी और तुम्हारी स्थिति पर हंसी आ रही है! देखो न, तुम काने और मैं लंगडा! मैं तो यह सोच कर हंसा कि खुदावंद हम-तुम जैसे लंगडों-कानों को क्यों बादशाहतें देता है?'
गुरु ने कहा, मैं कब्र में सोए तैमूर से कहना चाहता हूं -- यह दोष खुदावंद का नहीं है। वस्तुतः लंगडों-कानों के अतिरिक्त और कोई बादशाहतें पाने को उत्सुक ही नहीं होता है। क्या यह सत्य नहीं है कि जिस दिन मनुष्य-चित्त स्वस्थ होगा, उस दिन बादशाहतें नहीं होंगी? क्या यह सत्य नहीं है कि जो स्वस्थ हुए हैं, उनसे बादशाहतें सदा ही छूटती रही हैं?
Why are there beings at all, instead of Nothing? -- Martin Heidegger
कृष्ण एक दिन भोजन करते थे और बीच भोजन में उठे और द्वार की तरफ भागे। जो उन्हें भोजन कराते थे उन्होंने कहा क्या करते हैं? कहां भागते हैं बीच भोजन में उठते हैं। उन्होंने कहाः मेरा एक भक्त बहुत कष्ट में पड़ा हुआ है। दुष्ट उसे सता रहे हैं, उसे पत्थर मार रहे हैं। ये कहते वे भागे, द्वार के बाहर भी निकल गए लेकिन द्वार से फिर वापिस लौट आए, भोजन करने बैठ गए। तो जिन्होंने पहला प्रश्न पूछा था उन्होंने पूछा आप लौट आए बीच से। उन्होंने कहा उस भक्त ने खुद भी पत्थर अपने हाथ में उठा लिया है। अब मेरे जाने की वहां कोई जरूरत नहीं रही। अभी लोग उसे मार रहे थे वह निहत्था, असहाय खड़ा हुआ झेल रहा था, मेरी जरूरत थी। अब उसने पत्थर खुद भी उठा लिए हैं अब मेरी कोई भी जरूरत नहीं है।
We grown-up people think that we appreciate music, but if we realized the sense that an infant has brought with it of appreciating sound and rhythm, we would never boast of knowing music. The infant is music itself. -- Hazrat Inayat Khan
बुद्ध एक गांव के पास से गुजरते थे। जल्दी में थे। पहुंचना था दूसरे गांव--सांझ होने के पहले। पूछा एक किसान से, 'कितना दूर होगा गांव?' उसने कहाः 'बस, दो ही मील; चले नहीं कि पहुंचे!' बुद्ध दो मील चल चुके। सूरज ढलने के करीब आ गया। एक दूसरा ग्रामीण गुजरता था, उससे पूछाः 'गांव कितनी दूर होगा?' उसने कहाः 'बस, कोई दो मील है, चले नहीं कि पहुंचे!'
बुद्ध मुस्कुराए; उन्होंने अपने शिष्यों को कहाः 'ठीक से सुन लेना इनकी बात। पहला ग्रामीण हमें दो मील चला गया!' शिष्य फिर भी न समझे।
दो मील चल चुके, रात पड़ने लगी। एक तीसरे ग्रामीण से पूछा, 'कितनी दूर होगा गांव?' उसने कहाः 'घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है। बस, दो मील है।' बुद्ध ने कहाः 'सुनते हो? ऐसे ही मन की आशा चलाए जाती है--कि मंजिल, बस पास है। ये ग्रामीण बुद्धिमान हैं। ये झूठ नहीं बोल रहे हैं। ये मन के सूत्र को समझते हैं।'
दो मील चलना आसान है--दो मील की आशा में आदमी दो हजार मील भी चल लेता है। पहले से ही पता हो कि दो हजार मील चलना है, तो थक कर गिर जाए, टूट जाए, वहीं मिट जाए।
Talmud -- Do not be daunted by the enormity of the world's grief. Do justly now, love mercy now, walk humbly now. You are not obligated to complete the work, but neither are you free to abandon it.
सम्राट अकबर ने अपनी विजय की बड़ी यात्राओं के बाद एक छोटा सा नगर बसाया-फतेहपुर। फतेहपुर का मतलब; 'विजय का नगर'। सारे जीवन की विजय यात्रा के बाद उसने एक विजय की नगरी बनानी चाही, तो सीकरी नाम के छोटे से गांव को फतेहपुर में बदल दिया। करोड़ों रुपये खर्च किए। बड़ी खूबसूरत नगरी बनाई। और जब वह बूढ़ा हो रहा था, तो उसने एक फकीर को पूछा कि इस नगरी के द्वार पर मुझे कोई वचन लिखना है; कोई बहुमूल्य वचन लिखना है--कि यात्री जब इस फतेहपुर सीकरी में पहुंचे, तो वह वचन सब कुछ कह दे। उस सूफी फकीर ने जीसस का एक वचन अकबर को खुदवाने के लिए कहा। वह अभी भी फतेहपुर सीकरी के द्वार पर खुदा है। वह वचन बाइबिल में कहीं मिलता नहीं। लेकिन सूफियों की परंपरा में उस वचन का उल्लेख है। वह वचन बड़ा कीमती है। वह वचन हैः 'यह संसार एक सेतु है; चलना जरूर, गुजरना जरूर, पर इस पर कहीं भूल कर भी मकान मत बनाना।' This world is a bridge, pass through it but dont make a dwelling on it
अकबर ने वचन तो खुदवा दिया, लेकिन चिंतित हुआ। और उसने फकीर को कहा, 'मुसीबत में डाल दिया। क्योंकि मैं सोचता था--विजय की नगरी बनवा रहा हूं। तुम कहते हो, संसार एक सेतु है। इस संसार में फिर विजय की नगरी बन ही नहीं सकती। यहां कोई विजय होती ही नहीं।'
और अकबर का रस फतेहपुर सीकरी में समाप्त हो गया। नगर बना भी और बिना बसे रह गया। फतेहपुर सीकरी कभी आबाद नहीं हुआ। वह जिस दिन से बना है, उसी दिन से खंडहर पड़ा है। उसमें कभी कोई बसने नहीं गया। वह बात ही खत्म हो गई। अकबर को भी दिखाई पड़ गया कि इस संसार में कोई विजय संभव नहीं है। यहां कोई मंजिल ही उपलब्ध नहीं होती।
फतेहपुर सीकरी, बुलन्द दरवाजे के तोरण पर ईसा मसीह से संबंधित कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं जो इस प्रकार हैं -- "मरियम के पुत्र यीशु ने कहा: यह संसार एक पुल के समान है, इस पर से गुज़रो अवश्य, लेकिन इस पर अपना घर मत बना लो। जो एक दिन की आशा रखता है वह चिरकाल तक आशा रख सकता है, जबकि यह संसार घंटे भर के लिये ही टिकता है, इसलिये अपना समय प्रार्थना में बिताओ क्योंकि उसके सिवा सब कुछ अदृश्य है"
एक फकीर यात्रा कर रहा है-एक जहाज से। तूफान आया बड़ा; नाव डूबने को होने लगी। अब डूबी, तब डूबी। सारे नाविक घुटने टेक कर परमात्मा से प्रार्थना करने लगे। सिर्फ वह फकीर चुपचाप खड़ा रहा। आखिर कप्तान को क्रोध आ गया। उसने कहा, 'तुम क्यों खड़े हो? धार्मिक आदमी होकर तुमसे इतना भी नहीं बनता कि तुम प्रार्थना में सम्मिलित हो जाओ?' उसे फकीर ने कहा, 'यह नाव क्या मेरे बाप की है? जिसकी हैः वह फिकर करे।'
अजीब लगता है उसका वक्तव्य। लेकिन बड़ा सोचने जैसा है।
कप्तान ने सीधा कहाः 'न हो नाव तुम्हारी, लेकिन डूबोगे तो तुम भी?' उस फकीर ने कहाः 'जिसको समझ में आ गया है कि नाव मेरी नहीं है, वह कभी डूबता नहीं। 'मेरापन' ही डूबता है। न नाव मेरी है, न शरीर मेरा है, न जीवन मेरा है। जिसकी हो वह रोए, चिल्लाए, प्रार्थना करे। हम कुछ बचाने को उत्सुक नहीं हैं। क्योंकि बचाने योग्य कुछ है भी नहीं। हम राजी हैं; जो हो जाए।'
अष्टावक्र -- तेरा बंधन तो यही है कि तू अपने को छोड़ दूसरे को द्रष्टा देखता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर में आग लगी। रात उसकी पत्नी ने जोर से उसकी रजाई हिलाई और कहा, 'उठो, नसरुद्दीन, घर में आग लगी है।' उसने कहा, 'तू क्यों फिकर करती है! कोई हमारा मकान है? किराए से रहते हैं!' वापस रजाई ओढ़ कर वह सो गया। किराएदार को इतनी क्या चिंता है!
Change happens very slow and very sudden. -- Dorothy Bryant
सार और असार
कथा :
परम रासायनिक नागार्जुन के जीवन में उल्लेख है । वह दार्शनिक भी था, विचारक भी था । अपूर्व दार्शनिक था ! शायद भारत में वैसा कोई दूसरा दार्शनिक नहीं हुआ । उसे दो सहयोगियों की जरूरत थी, जो रसायन की प्रक्रिया में उसका साथ दे सकें । तो उसने बड़ी खोज की । दो रसायनविद आए । वह उनकी परीक्षा लेना चाहता था । तो उसने कुछ रासायनिक द्रव्य दिए दोनों को और कहा कि कल तुम इसका मिश्रण बना कर ले आना । अगर तुम सफल हो गए मिश्रण बनाने में, तो जो भी सफल हो जाएगा वह चुन लिया जाएगा ।
वे दोनों चले गए । दूसरे दिन एक तो मिश्रण बना कर आ गया और दूसरा रासायनिक द्रव्य वैसे के वैसे ले कर आ गया । नागार्जुन ने उस दूसरे से पूछा कि तुमने बनाया नहीं ? उसने कहा कि मैं गया, रास्ते पर एक भिखारी मर रहा था, मैं उसकी सेवा में लग गया । चौबीस घंटे उसको बचाने में लग गए, मुझे समय ही नहीं मिला । और यह जो प्रक्रिया है इसमें कम से कम चौबीस घंटे चाहिए । इसलिए मुझे क्षमा करें । मैं जानता हूं कि मैं अस्वीकृत हो गया, लेकिन कुछ और उपाय न था । भिखारी मर रहा था, मुझे चौबीस घंटे उसकी सेवा करनी पड़ी । वह बच गया, मैं खुश हूं । मुझे जो आपकी सेवा का मौका मिलता था, वह नहीं मिलेगा, लेकिन मैं प्रसन्न हूं । मेरी कोई शिकायत नहीं ।
और नागार्जुन ने इसी आदमी को चुन लिया । और नागार्जुन के और दूसरे सहयोगी थे, वे कहने लगे कि यह आप क्या कर रहे हैं ? जो आदमी रसायन बना कर ले आया है, उसको नहीं चुन रहे ? नागार्जुन ने कहा, जीवन का मूल्य रसायन से ज्यादा है । यह रसायन-वसायन तो ठीक है मगर जीवन का मूल्य... । इस आदमी के पास पकड़ है । यह जानता है कि कौन-सी चीज ज्यादा मूल्यवान है -- बस, यही तो रहस्य है । सार और असार में इसे भेद है ।
अपने से धोखा
कथा :
दो छोटे-छोटे गांव एक पहाड़ी पर बसे थे । एक था क्षत्रियों का गांव और एक था जुलाहों का गांव । जुलाहे सदा से क्षत्रियों से पीड़ित थे, सदा डरते रहे । क्षत्रिय, क्षत्रिय; जुलाहे जुलाहे ! उनके सामने अकड़ कर भी न निकल पाते । क्षत्रियों ने नियम बना रखा था कि उनके गांव में से कोई जुलाहा मूंछ पर ताव दे कर नहीं निकल सकता, तो मूंछ नीची कर लेनी पड़ती । बड़ी पीड़ा थी जुलाहों को । आखिर उन्होंने कहा, इसका कुछ उपाय करना पड़े, आखिर एक सीमा होती है सहने की । उन्होंने कहा, एक रात जब क्षत्रिय सोए हों-क्योंकि जागे में तो उन पर हमला करने में झंझट है-जब सब क्षत्रिय सोए हों-और उनको कभी कल्पना भी नहीं हो सकती, किसी क्षत्रिय ने सपना भी न देखा होगा कि जुलाहे हमला करेंगे-तो रात में हम चले जाएं और अच्छी मार-कुटाई कर दें और लूटपाट कर लें ।
बड़ी हिम्मत बांध कर जुलाहों ने क्षत्रियों के गांव पर हमला किया, लेकिन जुलाहे तो जुलाहे थे । सोए हुए क्षत्रिय भी जागे हुए जुलाहों के लिए काफी थे । वे पहले ही से घबड़ा रहे थे, एक-दूसरे के पीछे हो रहे थे, बामुश्किल तो पहुंचे क्षत्रियों के गांव में ! उनके पहुंचने के शोरगुल में इसके पहले कि वे हमला करें या कुछ करें, क्षत्रिय जग गए । वे सोच-विचार ही काफी करते रहे कि कहां से करें किस पर करें; सोचते रहे कि सबसे कमजोर क्षत्रिय कौन है, पहले उसी को देखें ।
अब ये भी कोई ढंग होते हैं ? उतनी देर में क्षत्रिय जाग गए, वे तलवारें निकाल लाए । जुलाहों ने तलवारें देखीं तो भागे, बेतहाशा भागे । जब जुलाहे भाग रहे थे, तो उनमें से उनका एक साथी कहने लगा कि भाइयों ! भागे तो जाते ही हो, भला मारो-मारो तो कहते चलो । तो जुलाहे भागते जाते और चिल्लाते जाते : 'मारो-मारो !'
भीतर से कभी परधर्म की आवाज नहीं आती। परधर्म की आवाज सदा बाहर से आती है।
एक राजनेता की सभा थी, वह बड़ा नाराज हो रहा था, बड़ा दुखी हो रहा था। बाद में मैनेजर को बहुत डांटने लगा। उसने कहा कि मामला क्या है? नाराज आप किसलिए हैं? उसने कहा, सिर्फ ग्यारह माला! उसने कहा, ग्यारह कोई कम हैं? उसने कहा, बारह के पैसे चुकाए थे।
अपनी माला भी.. खुद ही पैसे चुकाने पड़ते हैं और गिनती रखनी पड़ती है। फूल भी तब फूल नहीं रह जाता। अहंकार पर चढ़े फूल भी कांटे हो जाते हैं। भीतर की ग्रंथि के बदलने की बात है।
आपका नाद-बोध तीव्र नहीं है, तो आपको कभी नहीं सुनाई पड़ती कि पक्षी भी चहचहा रहे हैं।
भारतीय पार्लियामेंट में हिमालय में पाई जाने वाली नील गाय को मारने का सवाल था। वह गाय जैसी होती है और खेतों को नुकसान कर रही थी और संख्या उसकी बहुत बढ़ गई थी-उन्नीस सौ बावन के करीब।
तो अब गाय को कैसे मारना? नील गाय-उसका नाम गाय जैसा है; वह गाय है नहीं, गाय जैसी है। झंझट खड़ी हो जाएगी, मूढ़ों का उपद्रव मच जाएगा। साधु-संन्यासी दिल्ली पर हमला कर देंगे कि गाय को मार रहे हो? यह तो महापाप हुआ जा रहा है। हजार ब्राह्मणों को मारने के बराबर पाप लगता है एक गाय को मारना। यह तो तूफान आ जाएगा।
तो राजनीतिज्ञों ने होशियारी की। पहले उन्होंने उसका नाम. बदल दिया-नील घोड़ा। बात खतम! अब मजे से मारो। कोई न उठा-न कोई शंकराचार्य, न कोई साधु-संन्यासी-कोई दिल्ली की तरफ न गया। बात ही खतम हो गई। नील घोड़ा है, इसको मारने में क्या हर्ज है? लेकिन मर वही गाय रही है।
जो स्वीकार कर ले, वह बच सकता है।
फ्रेडरिक महान ने अपनी डायरी में एक संस्मरण लिखा है कि मैं अपनी राजधानी के बड़े कारागृह में गया। सम्राट स्वयं आ रहा है, स्वभावतः हर अपराधी ने उसके पैर पकड़े, हाथ जोड़े और कहा कि अपराध हमने बिलकुल नहीं किया है। यह तो कुछ शरारती लोगों ने हमें फंसा दिया। किसी ने कहा कि हम तो होश में ही न थे, हमसे करवा लिया किन्हीं षडयंत्रकारियों ने। किन्हीं ने कहा कि यह सिर्फ कानून--हम गरीब थे, हम बचा न सके अपने को; बड़ा वकील न कर सके, इसलिए हम फंस गए हैं। अमीर आदमी थे हमारे खिलाफ, वे तो बच गए, और हम सजा काट रहे हैं।
पूरे जेल में सैकड़ों अपराधियों के पास फ्रेडरिक गया। हरेक ने कहा कि उससे ज्यादा निर्दोष आदमी खोजना मुश्किल है! अंततः सिर्फ एक आदमी सिर झुकाए बैठा था। फ्रेडरिक ने कहा, तुम्हें कुछ नहीं कहना है? उस आदमी ने कहा कि माफ करें! मैं बहुत अपराधी आदमी हूं। जो भी मैंने किया है, सजा मुझे उससे कम मिली है।
फ्रेडरिक ने अपने जेलर को कहा, इस आदमी को इसी वक्त जेल से मुक्त कर दो; कहीं ऐसा न हो कि बाकी निर्दोष और भले लोग इसके साथ रहकर बिगड़ जाएं! इसे फौरन जेल के बाहर कर दो। वह आदमी बहुत हैरान हुआ। उसने कहा कि आप क्या कह रहे हैं? मैं अपराधी हूं। फ्रेडरिक महान ने कहा कि कोई आदमी अपने अपराध को स्वीकार कर ले, इससे बड़ी निर्दोषता, इससे बड़ी innosence और कोई भी नहीं है। तुम बाहर जाओ।
परमात्मा के जगत में भी केवल वे ही लोग संसार के बाहर जा पाते हैं, जो अपनी वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने में समर्थ हैं। अपने को जो धोखा देगा, देता रहे।
परमात्मा को धोखा नहीं दिया जा सकता है।
जीसस के पास एक आदमी आया। गांव का साधारण ग्रामीण किसान है। बैलों को गाली देने में बहुत ही कुशल है अपनी बैलगाड़ी में जोतकर। जीसस निकलते हैं गांव के रास्ते से। वह आदमी अपने बैलों को बेहूदी गालियां दे रहा है। बड़े आंतरिक संबंध बना रहा है गालियों से। जीसस उसे रोकते हैं और कहते हैं कि पागल, तू यह क्या कर रहा है! तो वह आदमी कहता है कि कोई बैल मुझे गाली वापस तो नहीं लौटा देंगे। तो क्या मेरा बिगड़ेगा?
वह आदमी ठीक कहता है। हमारा गणित बिलकुल ऐसा ही है। जो आदमी गाली वापस नहीं लौटा सकता, उसे गाली देने में हर्ज क्या है? इसलिए अपने से कमजोर को देखकर हम सब गाली देते हैं। कभी तो हम बेवक्त भी गाली देते हैं, जब कि कोई जरूरत भी न हो। कमजोर दिखा, कि हमारा दिल मचल आता है कि थोड़ा इसको सता लो।
जीसस ने कहा कि बैलों को गाली तू दे रहा है, अगर वे गाली लौटा सकते, तो कम खतरा था, क्योंकि निपटारा अभी हो जाता। लेकिन चूंकि वे गाली नहीं लौटा सकते, लेकिन गाली तो लौटेगी। तू महंगे सौदे में पड़ेगा। यह गाली देना छोड़।
जीसस की तरफ उस आदमी ने देखा; जीसस की आंखों को देखा, उनके आनंद को, उनकी शांति को। उसने उनके पैर छुए और कहा कि मैं कसम लेता हूं कि अब मैं इन बैलों को गाली नहीं दूंगा।
जीसस दूसरे गांव चले गए। दो-चार दिन उस आदमी ने बड़ी मेहनत से अपने को रोका। लेकिन कसमों से दुनिया में कोई रुकावटें नहीं होतीं। कसम से कहीं कोई रुकावट होती है? समझ से रुकावट होती है। दो-चार दिन रोका अपने को, जबरदस्ती। खा ली थी कसम ईसा के प्रभाव में। दो-चार दिन में प्रभाव क्षीण हुआ, आदमी अपनी जगह वापस लौट आया। उसने कहा कि छोड़ो भी, ऐसे तो हम मुसीबत में पड़ जाएंगे। बैलगाड़ी चलाना मुश्किल हो गया है। हिसाब बैलगाड़ी चलाने का रखें कि गाली न देने का रखें! बैलों को जोतें कि अपने को जोते रहें! बैलों को सम्हालें कि खुद को सम्हालें! यह तो एक बहुत मुसीबत हो गई। गाली उसने वापस देनी शुरू कर दी। चार दिन जितनी रोकी थी, उतनी एक दिन में निकाल ली। रफा-दफा हुआ। मामला हल्का हुआ। मन उसका शांत हुआ।
कोई तीन-चार महीने बाद जीसस उस गांव से वापस निकल रहे हैं। उसको तो पता भी नहीं था कि यह आदमी फिर मिल जाएगा रास्ते पर। वह धुआंधार गालियां दे रहा है बैलों को। जीसस ने खड़े होकर राह के किनारे से कहा, मेरे भाई!
उसने देखा जीसस को, उसने कहा बैलों से, देखो बैल, ये मैंने तुम्हें गालियां बताईं जैसी कि मैं तुम्हें पहले दिया करता था। बैलों से बोला, ये मैंने तुम्हें गालियां दीं जैसी कि मैं तुम्हें पहले दिया करता था। अब मेरे प्यारे बेटो, जरा तेजी से चलो।
जीसस ने कहा कि तू बैलों को ही धोखा नहीं दे रहा है, तू मुझे भी धोखा दे रहा है। और तू मुझे धोखा दे, इससे कुछ बहुत हर्जा नहीं है; तू अपने को धोखा दे रहा है। अंतिम धोखा तो खुद पर ही गिर जाता है। जीसस ने कहा, हो सकता है, मैं दुबारा इस गांव फिर कभी न आऊं। मैं माने लेता हूं कि तू बैलों को गालियां नहीं दे रहा था, सिर्फ बैलों को पुरानी याद दिला रहा था। लेकिन किसलिए याद दिला रहा था! तू मुझे धोखा दे कि तू बैलों को धोखा दे, इसका बहुत अर्थ नहीं है। लेकिन तू अपने को ही धोखा दे रहा है।
यदि साथ चलने के लिए साधु-विहारी, धैर्य-संपन्न, बुद्धिमान साथी मिल जाय तो सारी परेशानियों को ताक पर रखकर प्रसन्न-वदन और स्मृतिमान होकर संग विचरण करे ।
एक चर्च में एक फकीर बोलने आया था। कोई एक हजार लोग उसे सुनने को इकट्ठे थे। उसने उन एक हजार लोगों से पूछा कि मैं तुमसे पूछना चाहूंगा, तुममें से कोई ऐसा है जिसने घृणा के ऊपर विजय पा ली हो? क्योंकि जिसने अभी घृणा पर विजय नहीं पाई, वह प्रार्थना करने में समर्थ न हो सकेगा। इसके पहले कि मैं तुम्हें प्रार्थना के लिए कहूं, मैं यह जान लूं कि तुममें से कोई ऐसा है, जिसने घृणा पर विजय पा ली हो!
हजार लोगों में से कोई उठता हुआ नहीं मालूम पड़ा, लेकिन फिर एक आदमी उठा। एक सौ चार वर्ष का एक बूढ़ा आदमी खड़ा हुआ।
उस पादरी ने कहा, खुश हूं, प्रसन्न हूं, आनंदित हूं, क्योंकि हजार में भी एक आदमी ऐसा मिल जाए, जिसने घृणा पर विजय पा ली है, तो थोड़ा नहीं। और अगर एक आदमी भी इस चर्च में ऐसा है, जिसने घृणा पर विजय पा ली है, तो हम प्रभु को इस चर्च में उतारने में सफल हो जाएंगे। तुम्हारी अकेले की प्रार्थना पर्याप्त होगी, इन सबके जीवन में भी प्रकाश डालने के लिए। मैं तुमसे प्रार्थना करूंगा, उस फकीर ने कहा कि तुम इन लोगों को भी बताओ कि तुमने अपनी घृणा पर विजय कैसे प्राप्त की?
और उस बूढ़े आदमी ने कहा, बड़ी सरलता से। क्योंकि वे सब दुष्ट, जिन्होंने मुझे सताया था, और वे सब मूढ़, जिन्होंने मुझे परेशान किया था और जिनसे मुझे घृणा थी, वे सब मर चुके हैं। अब कोई बचा ही नहीं, जिसे मैं घृणा करूं। आप ही बताइए मैं किसको घृणा करूं?
'मैं' के अतिरिक्त इस जगत में और कोई दुख नहीं है, और कोई पीड़ा नहीं है।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर के बाहर बैठा है। और गांव का जो मौलवी है, वह मस्जिद से नमाज पढ़कर लौट रहा है। अचानक बरसात आ गई, तो वह तेजी से भागा। मुल्ला ने कहा कि ठहरो! शर्म नहीं आती, धार्मिक आदमी होकर और भागते हो? वह मौलवी भी थोड़ा घबड़ाया कि धार्मिक आदमी होने से। भागने का क्या लेना-देना! उसने कहा, क्या मतलब? मुल्ला ने कहा, परमात्मा पानी बरसा रहा है और तुम भागकर परमात्मा का अपमान कर रहे हो? किसका पानी है यह? यह जल किसका है?
मौलवी भी डर गया, और अपनी इज्जत की रक्षा के लिए और पड़ोसियों को पता न चल जाए कि परमात्मा के पानी का अपमान हुआ; वह आहिस्ता-आहिस्ता घर पहुंचा, तरबतर पानी में। सर्दी पकड़ गई, बुखार आ गया, निमोनिया हो गया।
तीन दिन बाद वह अपनी खिड़की में बैठा है अपनी दुलाई ओढ़े हुए। देखा कि नसरुद्दीन बाजार से लौट रहा है। पानी की थोड़ी-सी बूंदें आईं। नसरुद्दीन भागा। उस मौलवी ने चिल्लाकर कहा कि ठहर नसरुद्दीन! भगवान का अपमान कर रहा है? नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं; भगवान का पानी गिर रहा है, कहीं मेरा पैर उस पर न पड़ जाए और अपमान न हो जाए, इसलिए घर जा रहा हूं!
विलियम शेक्सपीयर -- सभी लोगो की सुनें लेकिन कहें कुछ लोगो से ही ।
एक आदमी एक तोते को बेचने गया। एक सर्कस में पहुंचा। उसने सर्कस के मैनेजर को कहा, 'सिर्फ बीस रुपये दे दें। यह तोता असाधारण है। यह इस तरह बोलता है, कि कभी कोई तोता नहीं बोला।' मैनेजर ने कहा कि, अगर सच में ही यह बात है, तो बीस रुपये में तुम इसे क्यों बेच रहे हो? हटाओ इस तोते को यहां से। बीस रुपये में कोई ऐसे अदभुत तोते को बेचने आयेगा?
तोता एकदम उछला अपने पिंजड़े में और उसने कहा, 'महाशय, जल्दी मत करें। मैं सच में ही ऐसा तोता हूं। और इस आदमी से बुरा आदमी खोजना मुश्किल है, जो मेरा मालिक है। इसने मेरे कारण लाखों रुपये कमाये हैं। हिटलर, मुसोलिनी, चर्चिल, रूजवेल्ट, सभी ने मुझे प्रशंसा के पत्र दिए हैं। जगह-जगह मुझे स्वर्णपदक मिले, इसने सब बेच खाये। यह मुझे ठीक से खाना भी नहीं देता, पानी भी नहीं पिलाता। आप थोड़ी दया करें और मुझे खरीद लें।'
सर्कस का मैनेजर तो चौंका कि ऐसी भाषा, जैसे ठीक काशी से शिक्षित पंडित हो -- शुद्ध और इतनी संगत! उसने उस आदमी को कहा 'तू पागल है। यह तोता लाखों का है और इसको तू बीस रुपये में बेच रहा है? क्या कारण है तेरा बेचने का?' उसने कहा कि 'और तो सब ठीक है, मैं इसकी झूठ से बहुत ऊब गया हूं। चौबीस घंटे बकवास! एक तो बकवास लगाये रखता है। और मुझे पता है कि सिर्फ तोता है। तो सिर्फ बकवास है, भीतर तो कुछ है नहीं इसके। और जो भी सुन लेता है, दोहराने लगता है। ये हिटलर, मुसोलिनी, न इसने कभी देखे। तो मैं इससे थक गया हूं। इससे मैं छुटकारा चाहता हूं। बीस रुपये तो सिर्फ बहाना है, आप इसको मुफ्त में भी रख लें।'
जो चीज अंत में मूढ़तापूर्ण हो जाती है वह पहले से ही मूढ़तापूर्ण थी, सिर्फ तुम देख न पाये।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कुछ पेंटिंग तैयार की। मुझे दिखाने ले गया। सब ऊलजलूल, न कोई तुक न कोई अर्थ; बस किसी तरह कोई भी ब्रश उठा कर रंग पोत दिया! मैंने पूछा कि नसरुद्दीन, यह तुमने क्या किया? उसने कहा : आप समझे नहीं, यह मॉडर्न आर्ट है, यह आधुनिक कला है। यह इसी तरह की होती है। मैंने पिकासो की भी पेंटिंग देखी हैं और डाली की भी। उन्हीं को देख कर तो मुझे प्रेरणा उठी। पिकासो और डाली को भी मात कर दिया है।
कभी बापदादे भी... सीधी रेखा खींचना आया नहीं और आधुनिक कला की कृतियां बना दीं! मैंने यूं ही मजाक में पूछा कि अब क्या करोगे?
उसने कहा कि चाहूं तो लाख-लाख, दो-दो लाख में बिकेंगी।
मैंने कहा : मुझे दिखता नहीं कि इतना कोई समझदार आधुनिक कला का तुम्हें भारत में मिल जाए जो इन पर लाख-लाख, दो-दो लाख दे दे।
मुल्ला ने कहा : फिकर क्या, अरे तो घर की संपत्ति घर में रहेगी!
तू अद्वितीय है, सबका द्रष्टा है और सर्वदा-सर्वथा मुक्त है । तेरा यही बंधन है कि दूसरे को अपना द्रष्टा मानता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक बाजार से गुजर रहा है। एक आम वाले का ठेला खड़ा है और आम वाला उस तरफ मुंह करके किसी से बात कर रहा है। तो उसने एक आम उठाकर अपने झोले में डाल लिया। फिर उसकी आत्मा कचोटने लगी। फिर उसे लगा कि चोरी करना तो ठीक नहीं। और बेचारे आम वाले को धोखा दे दिया। गरीब आदमी है; और गरीब को धोखा देना उचित नहीं है। यह मैंने पाप किया।
तो वह वापस गया। झोले से आम निकाला और आम वाले से कहा कि आम बदल दो। आम वाले ने समझा कि खरीदा होगा इसने, तो उसने बेचारे ने बदल दिया। तब वह प्रसन्नता से घर लौटा। उसने कहा, पहला तो मैंने चुराया था, दूसरा उसने खुद ही दिया है। अब आत्मा में कोई कांटा नहीं चुभ रहा है। अब वह बिलकुल प्रसन्न घर जा रहा है; क्योंकि दूसरा उसने खुद दिया है। अब कोई सवाल ही नहीं है।
करीब-करीब आप यही कर रहे हैं। जरा-सा हेर-फेर कर लेते हैं और सोचते हैं, सब हल हो गया। ऐसे हल नहीं होगा। यह धोखा चल नहीं सकता। आपको समझना ही होगा कि मूल समस्या क्या है।
सारी खोज की दुविधा, समस्या, उलझाव यही है कि हम उसे खोज रहे हैं जो मिला ही हुआ है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक गांव से गुजर रहा है। कोई मर गया है, घर के आस-पास भीड़ है, लाश सामने रखी है। नसरुद्दीन भूखा है। छोटा गांव है। सारा गांव वहीं इकट्ठा है। कोई भोजन देने के लिए भी अभी उत्सुक नहीं होगा। अभी कोई मेहमान बनाने की भी तैयारी में नहीं है। और गांव इतने दुख में है कि वह यह बात भी करे कि मुझे भूख लगी है, कि मुझे भोजन चाहिए तो भद्दा मालूम पड़ेगा।
वह भी भीड़ में जाकर खड़ा हो गया और उसने पूछा कि क्या बात है? क्यों रो रहे हो? तो उन्होंने कहा कि क्यों रो रहे हैं, यह भी पूछने की कोई बात है? घर का आदमी मर गया है। गांवभर का प्यारा था।
नसरुद्दीन ने कहा कि मैं उसे जिला सकता हूं। लेकिन अभी मैं भूखा हूं। पहले मेरा पेट भर जाए, मैं स्नान कर लूं, पूजा-पाठ कर लूं; इसे मैं जिला सकता हूं। रोने की कोई भी जरूरत नहीं है।
भूख में ऐसा कह तो गया। फिर जब पेट भर गया, हाथ-मुंह धोकर पूजा-पाठ जब उसने की, तब पूजा-पाठ कर नहीं सका, क्योंकि अब उसको झंझट मालूम हुई कि अब क्या करना? कहीं मरा हुआ कभी कोई जिंदा हुआ है!
फिर भी वह आया, लाश के पास बैठा; और उसने कहा कि यह आदमी कौन था? इसका धंधा क्या था? उन्होंने कहा कि यह आदमी! जाहिर आदमी है, यह बड़ा नेता था; राजनीति इसका धंधा था। नसरुद्दीन क्रोध से खड़ा हो गया और उसने कहा कि नालायकों, मेरा समय खराब किया! राजनीतिज्ञ मरकर कभी जिंदा नहीं होते। तुम्हें पहले ही बताना था, नाहक मेरा समय खराब करवा दिया। अब तक मैं दूसरे गांव पहुंच गया होता।
आप भी जिंदगी में बहाने खोज रहे हैं। कभी यह, कभी वह। लेकिन हमेशा समझा लेते हैं अपने को कि असफलता का कोई कारण है।
रूप देखने की जो वासना है, वह आपकी आंखों को आपसे बांधे रखती है। उस वासना के रज्जु से आंख बंधी रहती है। अगर आपकी देखने की इच्छा खो जाए, आप इसी क्षण अंधे हो जाएंगे।
एक मित्र अपने बहुत प्रगाढ हितेषी से कह रहा था कि दो स्त्रियों के बीच मुझे चुनाव करना है- किससे शादी करूं ? एक सुंदर है- अति सुंदर है, लेकिन दरिद्र है, दीन है। और एक अति कुरूप है, पर बहुत धनि है। और अकेली बेटी है बाप की । अगर उससे विवाह करूं, तो सारा धन मेरा है। कोई और मालिक नहीं उस धन का । बाप बुढा है। मां तो मर चुकी, बाप भी आज गया, कल गया। लेकिन स्त्री कुरूप है। बहुत कुरूप है। तो क्या करूं, क्या न करू ? उसके मित्र ने कहा कि इसमें सोचने की बात है। अरे, शर्म खाओ। प्रेम और कहीं धन की बात सोचता है। जो सुंदर है, उससे विवाह करो। प्रेम सौंदर्य की भाषा जानता है- धन की भाषा नहीं। जो सुंदर हैं, उससे विवाह करो । मित्र ने कहा, तुमने ठीक सलाह दी। और जब मित्र जाने लगा, तो उसके हितैषी ने पुछा कि भई, और उस कुरूप लडकी का पता मुझे देते जाओ।
दर्पण पर जिसने भरोसा किया, वह चूका। वही संसारी है- जो दर्पण पर भरोसा करता है।
बीवी :- ये बन्दूक लेके दरवाजे पे क्यों खड़े हो..?
पति :- शेर का शिकार करने जा रहा हूं.
बीवी :- तो जाते क्यों नहीं..?
पति :- बहार कुत्ता खड़ा हैं..!!
माला लेकर बैठे, जल्दी-जल्दी राम-राम राम-राम किया, देखते जा रहे हैं आंख खोल कर कि घड़ी में कितना समय है, दुकान पर कोई ग्राहक तो नहीं आ गया! लोग दुकान पर भी बैठ कर माला फेरते रहते हैं। कुत्ता आता है, उसको भगा देते हैं। नौकर को इशारा कर देते हैं कि ग्राहक को देख! माला जप रहे हैं, राम-राम भी जप रहे हैं, हरि-हरि भी जप रहे हैं। लोग तो इतने चालबाज हैं कि सोचते हैं परमात्मा को भी धोखा दे लेंगे। आदमी को तो धोखा देते ही हैं, अपने को तो धोखा देते ही हैं, परमात्मा को भी धोखा देने की आकांक्षा रखते हैं!
राम का नाम तो तब सच होता है जब तुमसे झरता है।
तू इधर उधर की न बात कर, यह बता काफिला क्यों लुटा ।
मुझे चोरों से गिला नहीं, तेरी चौकीदारी का सवाल है ॥
एक दिन जब रात मुल्ला नसरुद्दीन के मित्र चंदूलाल मुल्ला के घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि मच्छरदानी तो पलंग पर लगी है और मुल्ला अपने आराम से पलंग के नीचे जमीन पर लेटा हुआ है। वह तो अवाक रह गया। बोला, मुल्ला, यह क्या हो रहा है? तुम नीचे और मच्छरदानी ऊपर पलंग पर! आखिर माजरा क्या है?
मुल्ला नसरुद्दीन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, चंदूलाल, शायद तुम नहीं समझे। देखो मैंने मच्छरों को धोखा देने का क्या जोरदार तरीका ढूंढा है! मच्छर मच्छरदानी देख कर समझ रहे हैं कि मैं ऊपर सो रहा हूं और मैं यहां मजे में नीचे लेटा हूं। कहो कैसी रही!
आदमियों को धोखा देते-देते तुम मच्छरों को धोखा देने लगोगे! परमात्मा की तो क्या बिसात!
जो जल्दी करेगा उसे देर हो जाती है।
दो मछलीमार बैठ कर बात कर रहे थे। एक मछलीमार ने कहा कि 'कल तो हद्द हो गई- ऐसी मछली पकड़ी कि मुझ अकेले से खींची न जा सके; दस आदमी लगाने पड़े, तब कहीं मछली खिंच कर किनारे पर आ सकी।'
इतनी बड़ी मछली उस छोटी सी नदी में हो भी नहीं सकती--जिसके किनारे बैठ कर वे बात कर रहें हैं। उस नदी में पूर आ जाए, इतनी बड़ी मछली वहां हो तो।
दूसरे ने कहाः 'यह कुछ भी नहीं है। दो दिन पहले मैंने कांटा डाला नदी में, मछली तो पकड़ में नहीं आई, एक लालटेन उलझ कर कांटे में आ गई और चमत्कार यह कि लालटेन पर लिखा हुआ थाः नेपोलियन के जमाने की! और अभी तक जल रही थी!'
पहले आदमी ने कहा: 'देखो, अगर तुम अपनी लालटेन का जलने का मामला बुझा दो, तो मैं भी अपनी मछली की मोटाई-लंबाई कम कर सकता हूं।'
औरन को उजियार मशालची जाय अंधेरे ।
त्यों ज्ञानी की बात माया से रहते घेरे ।
तथाकथित पंडितों की कुछ ऐसी ही स्थिति है। जैसे मशालची खुद अंधेरे में रहकर दूसरों को उजाला दिखाए ऐसे ही मशालें बड़ी लिए हैं, शास्त्रों का बड़ा बोझ है। खुद माया से घिरे हैं; दूसरों को राह बता रहे हैं
मुल्ला नसरुद्दीन का पूरा परिवार उससे परेशान था। दफ्तर के आदमी परेशान थे। मुहल्ला भर परेशान था, क्योंकि वह अपने को इनफालिबल समझता था कि मुझसे कभी कोई भूल ही नहीं हुई और न हो सकती है। ऐसा आदमी बहुत दुष्ट हो जाता है, जिसको ऐसा ख्याल हो; उसके पास रहना बड़ा कठिन मामला है। क्योंकि उससे भूल कभी होती ही नहीं। जब भी भूल हो, तुम्हीं से होगी। उसकी भूलें भी तुम्हारे कंधों पर पड़ेंगी।
आखिर एक दिन एक आदमी बहुत ही परेशान हो गया। और उसने कहा, 'नसरुद्दीन एक सवाल पूछूं? जिंदगी में कभी एकाध बार भी तुमसे भूल हुई?' नसरुद्दीन ने कहा, 'हां, एक बार मुझसे भूल हुई।' वह आदमी सुन कर चौंका कि इतना भी स्वीकार कर लिया, इसकी आशा नहीं थी! उसने बहुत उत्तेजित होकर पूछा, 'वह कौन सी घटना है, जरूर कहो।' नसरुद्दीन ने कहा, 'एक बार मैंने सोचा कि मुझसे भूल हुई, लेकिन हुई नहीं। बस, वही एक भूल है।'
आईना कब किसको सच बता पाया है
जब देखा दायाँ तो बायाँ ही नजर आया है ॥
एक शराबी शराब पी रहा था, किसी ने उससे कहा कि -- जानते हो क्या कर रहे हो? पता है कि यह तुम क्या पी रहे हो? This is a slow poison. यह आहिस्ता-आहिस्ता मारने वाला जहर है!
उस आदमी ने कहा -- But I am not in a hurry, मैं भी कोई जल्दी में नहीं हूं।
ये न पूछना जिंदगी खुशी कब देती है
शिकायतें तो उन्हें भी है जिन्हें हिंदगी सब देती है ॥
मुल्ला नसरुद्दीन से मैंने पूछा कि कैसी चल रही है? कहा कि बड़े मजे की चल रही है। हम दोनों ही खुश हैं, पत्नी भी खुश, मैं भी खुश। मैंने कहा कि यह मामला जरा मुश्किल है; सच कह रहे हो? उसने कहा: बिल्कुल सच कह रहा हूं। तुम दोनों कैसे खुश हो सकते हो? उसने कहा: बात आपको समझा कर कहूं। वह कभी प्लेट फेंक कर मारती है, कभी डिब्बा फेंक कर मारती है। अगर लग गया तो वह खुश होती है, अगर नहीं लगा तो हम खुश होते हैं। ऐसे हम दोनों ही खुश हैं।
जब देखो कोई अपना खोल दो रूह के राज़
देखो फूल तो गाओ जैसे बुलबुल बाआवाज़
लेकिन जब देखो कोई धोखे व मक्कारी भरा
लब सी लो और बना लो अपने को बन्द घड़ा
वो पानी का दुश्मन है बोलो मत उसके आगे
तोड़ देगा वो घड़े को जाहली का पत्थर उठाके
-- मौलाना रूमी
मुल्ला नसरुद्दीन का दावा था कि उससे कभी गलती नहीं हुई। लोग उससे ऊब गए थे सुन-सुन कर यह बात। जब देखो तब; जहां देखो वहां; जब मौका मिल जाए, छोड़े ही नहीं अवसर यह बताने का कि मुझसे कभी कोई भूल नहीं हुई; जीवन में मैंने गलती की ही नहीं। किंतु एक दिन जब उसने कहा कि एक बार उससे सचमुच गलती हो गई थी, तो सुनने वाले एकदम चैंक पड़े। मित्रों को भरोसा न आया अपने कानों पर, कि नसरुद्दीन कहे कि मुझसे और गलती हो गई!
एक मित्र ने कहा कि नसरुद्दीन क्या कह रहे हो? तुमसे और गलती! कभी नहीं, कभी नहीं! ऐसा हो ही कैसे सकता है? क्या कह रहे हो, कुछ सोच रहे हो कि बिना सोचे बोल गए हो?
नसरुद्दीन ने कहा: हां भई, एक बार हो गई थी। एक बार मैंने सोचा था कि मैं गलती पर हूं, किंतु बाद में पता चला कि मैं ठीक था।
सोने और रुपये से भर जाय जंगल अगर
बिना मर्ज़ी ख़ुदा की ले नहीं सकते कंकर
सौ किताबें तुम पढ़ो अगर कहीं रुके बिना
नुक़्ता ना रहे याद खुदा की मर्ज़ी के बिना
और गर ख़िदमत करी, न पढ़ी एक किताब
गिरेबां के अन्दर से आ जाते इल्म नायाब
-- मौलाना रूमी
बोझ
कथा :
एक संन्यासी हिमालय की यात्रा पर गया था । वह अपना बिस्तर-बोरिया बांधे हुए चढ़ रहा है- पसीने से लथपथ, दोपहर है घनी, चढ़ाव है बड़ा । और तभी उसने पास में एक पहाड़ी लड़की को भी चढ़ते देखा, होगी उम्र कोई दस-बारह साल की, और अपने बड़े मोटे-तगड़े भाई को जो होगा कम से कम छह सात साल का, उसको वह कंधे पर बिठाए चढ़ रही है-पसीने से लथपथ । उस संन्यासी ने उससे कहा, बेटी, बड़ा बोझ लगता होगा ? उस लड़की ने बड़े चौंक कर देखा और संन्यासी को कहा, स्वामी जी ! बोझ आप लिए हैं, यह मेरा छोटा भाई है !
तराजू पर तो छोटे भाई को भी रखो या बिस्तर को रखो, कोई फर्क नहीं पड़ता-तराजू तो दोनों का बोझ बता देगा । लेकिन हृदय के तराजू पर बड़ा फर्क पड़ जाता है । छोटा भाई है, फिर बोझ कहाँ ? फिर बोझ में भी एक रस है, फिर बोझ भी निबोझ है ।
वही व्यक्ति कर्म से मुक्त हो जाता है, जो सब कर्मों को संयत रूप से कर लेता है और उनके बाहर हो जाता है।
एक फकीर एक ट्रेन में सवार हुआ। बैठा है सीट पर, लेकिन अपना बिस्तर अपने सिर पर रखे रहा। पास-पड़ोस के लोगों ने जरा चौंककर देखा। फिर किसी ने कहा कि महाशय! बिस्तर नीचे आराम से रखें। आप यह क्या कर रहे हैं? उस फकीर ने कहा, लेकिन टिकट मैंने सिर्फ अपने लिए दिया, तो बिस्तर का बोझ ट्रेन पर डालना ठीक नहीं है। मैं अपने ही ऊपर बोझ रखे हुए हूं। लेकिन लोगों ने कहा कि महाशय, आप अपने सिर पर भी रखें, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता, ट्रेन पर बोझ पड़ ही रहा है। आप नीचे रखें कि सिर पर रखें। हां, सिर पर रखकर आप भर परेशान हो रहे हैं। ट्रेन पर कोई अंतर नहीं पड़ रहा है इससे।
वह फकीर हंसने लगा, उसने कहा कि मैं तो सोचा कि अज्ञानी हैं यहां, इसलिए सिर पर रखूं। मुझे क्या पता कि इस कमरे में ज्ञानी हैं! उसने बिस्तर नीचे रख दिया। लोग और हैरान हुए। उन्होंने कहा, हम तुम्हारा मतलब न समझे! उस आदमी ने कहा, मैं तो यह सोचकर कि तुम सब सारी जिंदगी का भार अपने ऊपर रखते होओगे, ऐसे सब भार परमात्मा पर है! लेकिन मकान बनाओगे तो कहोगे, मैंने बनाया। बोझ तुम अपने ऊपर रखोगे। इसीलिए मैं बिस्तर अपने सिर पर रखकर बैठा कि तुम्हारे बीच यही संगत होगा। लेकिन तुम बड़े ज्ञानी हो; अच्छा हुआ।
इस फकीर ने हम सब की मजाक की, गहरी मजाक की और हृदय के गहरे घाव को छूने की कोशिश की।
हमने अपनी एक-एक हथकड़ी की जंजीर को बहुत ही मजबूत फौलाद से ढाला है। हमने सब तरह का इंतजाम किया है कि जिंदगी में आनंद का कोई आगमन न हो सके। हमने सब द्वार-दरवाजे बंद कर रखे हैं कि रोशनी कहीं भूल-चूक से प्रवेश न कर जाए। हमने सब तरफ से अपने नरक का आयोजन कर लिया है। इस आयोजन को काटने के लिए इतने ही आयोजन की विपरीत दिशा में जरूरत पड़ती है। उसी का नाम योग-अभ्यास है।
सुकरात मर रहा है, तो किसी मित्र ने पूछा कि कोई काम बाकी तो नहीं रह गया? सुकरात ने कहा, मेरी कोई आदत कभी किसी काम को बाकी रखने की नहीं थी। मैं हमेशा ही तैयार था मरने को। कभी भी मौत आ जाए, मेरा काम पूरा, साफ था। सब जो करने योग्य था, मैंने कर लिया था। जो नहीं करने योग्य था, नहीं किया था। मेरा हिसाब सदा ही साफ रहा है। मेरे खाते-बही, कभी भी मौत का इंस्पेक्टर आ जाए, देख ले, तो मैं वैसा नहीं डरूंगा, जैसा इनकम टैक्स के इंस्पेक्टर को देखकर कोई भी दुकानदार डरता है, ऐसा सुकरात ने कहा होगा। सिर्फ एक छोटी-सी बात रह गई, वह भी मुझे पता नहीं था, नहीं तो मैं सुबह उस आदमी को कहता।
एचीलियस नाम के आदमी ने एक मुर्गी मुझे उधार दी थी, छः आने उसके बाकी रह गए हैं। बस इतना ही सस्पेंडेड है। बस, और कुछ भी नहीं है। वह भी मैं चुका देता, लेकिन जेल में पड़ा हूं और छः आने कमाने का भी कोई उपाय मेरे पास नहीं है। अचानक मुझे जेल में ले आए, अन्यथा मैं उसके छः आने चुका देता। एक काम भर इस पृथ्वी पर मेरा अधूरा पड़ा है, वे छः आने एचीलियस को देने हैं। मेरे मरने के बाद तुम मेरे मित्र, एक-एक, दो-दो पैसा इकट्ठा करके उसे दे देना, ताकि बहुत भार मुझ पर न रह जाए। छः आने का इकट्ठा बहुत पड़ेगा। एक-एक पैसे का तुम सब का रह जाएगा। किसी रास्ते पर, किसी मार्ग पर अगर अनंत में कभी मिलना हो गया, तो मैं चुका दूंगा। बस, इतना ही बोझ है, बाकी सब निपटा हुआ है।
आप मरते वक्त कितने आने के बोझ से भरे होंगे? कोई हिसाब लगाना मुश्किल हो जाएगा। न मालूम कितना अटका रह जाएगा सब तरफ! किसी को गाली दी थी, माफी नहीं मांग पाए। किसी पर क्रोध किया था, क्षमा नहीं कर पाए। किसी को प्रेम करने के लिए कहा था, लेकिन कर नहीं पाए। किसी को सेवा का भरोसा दिया था, लेकिन हो नहीं पाई। सब तरफ सब अधूरा अटका रह जाएगा।
Albert Einstein -- एक मेज, एक कुर्सी, एक कटोरा फल और वायलन; भला खुश रहने के लिए और क्या चाहिए ?
मुल्ला नसरुद्दीन एक कार बेचने वाली दुकान में गया। उसने एक कार बड़ी देर तक गौर से देखी। दुकानदार ने बहुत समझाया। उसकी उत्सुकता देखी, लगा कि खरीददार है। प्रशंसा में उसने कहा कि यह कार दो घंटे में दिल्ली पहुंचा देती है, बड़ी तेज गाड़ी है। नसरुद्दीन ने कहा, फिर सोचकर कल आऊंगा।
वह कल आया। कहने लगा कि नहीं भाई, नहीं खरीदनी है। दुकानदार ने कहा, लेकिन हो क्या गया? क्या भूल-चूक मिली? उसने कहा, भूल-चूक का सवाल ही नहीं। मुझे दिल्ली जाना ही नहीं; मुझे लखनऊ जाना है! रातभर सोचा कि दिल्ली जाने का कोई कारण? कोई कारण दिखायी नहीं पड़ता!
अब कार न तो दिल्ली ले जाती है, न लखनऊ ले जाती है, सिर्फ ले जाती है। ऊर्जा तटस्थ है।
नास्तिक नासमझ है। क्योंकि अगर यह सिद्ध भी हो जाए कि परमात्मा नहीं है, तो भी नास्तिक को कुछ मिलेगा नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक संगीत-समारोह में गया। एक महिला इतना रद्दी गा रही थी कि लोग बोर ही नहीं हो रहे थे, अनेकों के तो हाथ फड़फड़ा रहे थे कि इसकी गर्दन दबा दो। पर महिला जान कर छोड़ रहे थे। अगर पुरुष गायक रहा होता तो पिटा होता उस दिन। मुल्ला भी बहुत ऊब गया था। उठ-उठ बैठता था। कई बार उसने डंडा उठा लिया। उसने अपने बगल में बैठे हुए एक शांत श्रोता से कहा, मुझे तो उलटी करने का मन हो रहा है भाई। यह औरत गाना कब बंद करेगी? इसकी आवाज तो ऐसी सड़ियल और भद्दी है कि जैसे कोई डालडा के डिब्बे में कंकड़-पत्थर डाल कर हिलाए। गाती है कि रंभाती है! आखिर यह है कहां की गायिका की दुम? कभी नाम भी नहीं सुना इन देवी जी का। और आप क्यों इतनी शांति से सुन रहे हैं? इस स्त्री पर तो मुझे क्रोध आ ही रहा है, मगर यह स्त्री तो दूर है, कहीं मेरा डंडा तुम्हारे सिर पर न पड़ जाए!
पड़ोसी श्रोता ने शरमदगी से सिर हिला कर कहा कि क्षमा करें, वह मेरी बीबी है। कोई सुने या न सुने, मुझे तो सुनना ही पड़ेगा। और फिर रोज-रोज का अभ्यास भी काम पड़ रहा है, यह रोज ही सुनना पड़ता है।
नसरुद्दीन को बड़ा पछतावा हुआ। उसने झट से क्षमा मांगी। कहा, माफ करना भाईजान, मेरा मतलब यह था कि वैसे आवाज तो सुरीली है, मधुर है, सुरताल का ज्ञान भी अच्छा है, लेकिन गीत ही जरा बेढंगा है। न शब्द अच्छे हैं, न तुक ठीक से मिलती है और न कोई श्रेष्ठ भाव-अभिव्यंजना है। अरे किसी अच्छे कवि का गीत चुनना था गाने के लिए। कहां का सड़ा-गला गीत है! किस मूरखनाथ ने लिखा है यह गीत?
बगल में बैठे हुए आदमी ने शर्म से सिर झुका कर नीचे कहा, मैंने ही लिखा है!
सोए हुए लोग गीत लिख रहे हैं, सोए हुए लोग गीत गा रहे हैं, सोए हुए लोग सुन रहे हैं। सब सड़ा-गला है, सब दुर्गंधयुक्त है। जिंदगी इतनी कुरूप ऐसे ही नहीं हो गई है, हम सबने बना रखी है। हम सबने मिल कर इस नरक को बनाया है। तुम सोचते हो नरक कहीं और है? नरक वहीं है जहां कोई नींद में हो। और स्वर्ग भी कहीं और नहीं है; स्वर्ग वहीं है जहां कोई जाग गए।
भई, सूरज! जरा इस आदमी को जगाओ!
भई, पवन! जरा इस आदमी को हिलाओ!
यह आदमी जो सोया पड़ा है, जो सच से बेखबर; सपनों में खोया पड़ा है।
भई, पंछी! इसके कानों पर चिल्लाओ!
भई, सूरज! जरा इस आदमी को जगाओ! वक्त पर जगाओ,
नहीं तो जब बेवक्त जागेगा यह तो जो आगे निकल गए हैं उन्हें पाने घबरा के भागेगा यह!
घबरा के भागना अलग है; क्षिप्र गति अलग है; क्षप्र तो वह है जो सही क्षण में सजग है।
सूरज, इसे जगाओ! पवन, इसे हिलाओ! पंछी, इसके कानों पर चिल्लाओ!
आस्तिकता का गणित
कथा :
Blaise Pascal बहुत बड़ा गणितज्ञ और वैज्ञानिक था । उसका एक मित्र था -- दि मेयर । वह जुआरी था । कहते हैं, दुनिया के खास बड़े जुआरिओं में एक था । उसने अपना सब जीवन जुए पर लगा दिया था । जुए में जब कभी कोई बड़ी कठिनाई आ जाती, उसे कोई प्रश्न उठता, तो वह पास्कल से पूछा करता था कि तुम इतने बड़े गणितज्ञ हो, जरा मेरे जुए में साथ दो । पास्कल का मित्र था, इसलिए पास्कल उसकी बात सुनता था । पास्कल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, कि उसकी बातें सुन-सुन कर मैं ईसाई हो गया ।
यह बड़े आश्चर्य की बात है, जुआरी की बातें सुन-सुन कर ईसाई ! पास्कल कहता है, इस तरह मैं ईसाई हुआ । उसके जुआरी के मनोविज्ञान को समझ कर मुझे समझ में आया कि धार्मिक आदमी का मनोविज्ञान भी जुआरी का है । जुआरी एक रुपया लगाता है .. अगर जीतेगा तो पच्चीस रुपए मिलने वाले हैं; अगर हारेगा सिर्फ एक ही रुपया जायेगा । यह उसका मनोविज्ञान है । हारने में कुछ खास खोता नहीं, अगर मिल गया तो पच्चीस गुना मिलता है या हजार गुना मिलता है । अगर खोया तो कुछ खास खोता नहीं । मिलता है तो बहुत मिलता है । इन दोनों के बीच जुआरी तौलता है ।
पास्कल ने लिखा है कि मैंने भी सोचा कि यदि ईश्वर है, आस्तिक मानता है कि ईश्वर है, अगर मरने के बाद आस्तिक ने पाया कि ईश्वर नहीं है, तो क्या खोया ? थोड़ा-सा समय खोया- प्रार्थना-पूजा में लगाया, जो सत्संग में गंवाया, बाइबिल, कुरान उलटने में जो नष्ट हुआ- थोड़ा-सा समय खोया । अगर ईश्वर नहीं पाया तो आस्तिक इतना ही खोएगा कि थोड़ा सा समय खोया और जब पूरी ही जिंदगी खो गई तो उस थोड़े समय से भी क्या फर्क पड़ता है ? लेकिन अगर ईश्वर हुआ, तो शाश्वत रूप से स्वर्ग में निवास करेगा, भोगेगा आनंद !
नास्तिक कहता है, ईश्वर नहीं है । अगर ईश्वर न हुआ तो ठीक, नास्तिक ने कुछ भी नहीं खोया । लेकिन अगर ईश्वर हुआ, तो अनंत काल तक नर्कों के दुख.. ।
इसलिए पास्कल ने लिखा कि मैं कहता हूं यह सीधा गणित है कि ईश्वर को मानो । इसमें खोने को तो कुछ भी नहीं है, मिलने की संभावना है । न मानने में कुछ मिलेगा नहीं अगर ईश्वर न हुआ; लेकिन अगर हुआ तो बहुत कुछ खो जाएगा ।
पास्कल कहता है, अगर तुम्हें थोड़ी भी सुरक्षा और जुए का थोड़ा भी अनुभव है, तो ईश्वर सौदा करने जैसा है । अब यह एक सरणी है । इस सरणी में ईश्वर के प्रति कोई प्रेम नहीं है । यह सीधा तर्क है ।
विध्वंस परमात्म-विरोध है; सृजन परमात्मा की तरफ प्रार्थना है।
इनकमटैक्स दफ्तर में एक आदमी का पत्र आया । उस आदमी ने लिखा कि क्षमा करें, बीस साल पहले मैंने कुछ धोखाधड़ी की थी इनकमटैक्स देने में और तब से मैं ठीक से सो नहीं पाया । तो ये पचास डॉलर भेज रहा हूं । अब क्षमा करो और मुझे सोने दो । अगर नींद न आई तो शेष पचास डॉलर भी भेज दूंगा ।
ऐसे आधे-आधे न चलेगा । किसको धोखा दे रहे हो? धोखा और सबको दे देना, परमात्मा को मत देना । क्योंकि परमात्मा को दिया गया धोखा फिर तुम्हें सोने न देगा, जागने भी न देगा; उठने न देगा, बैठने न देगा ।
मुल्ला नसरुद्दीन को एक रेलवे क्रासिंग पर नौकरी मिल गयी। पहले ही दिन आधा दरवाजा तो उसने खोल दिया क्रासिंग का और आधा बंद रखा। एक कारवाला आदमी रुका, उसने कहा कि जिंदगी हो गयी मुझे यहां से गुजरते, मगर या तो दरवाजा बंद होता है, या खुला होता है; यह आधा क्या मामला है! नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि ट्रेन आयेगी; इसलिए आधा खोल रखा है।
आदमी को ठंड लगती है, नदी में नहाता है, तो जोर-जोर से कहने लगता है, हरे राम, हरे राम! वह ठंड को भुलाने की कोशिश कर रहा है। किसी आदमी को गली में, अंधेरे में डर लगता है, तो वह कहता है, जय हनुमान, जय हनुमान! वह डर को भुलाने की कोशिश कर रहा है। ये जितने लोग काम को भुलाने के लिए राम-राम-राम जप रहे हैं, ये सिर्फ भुलाने की कोशिश कर रहे हैं; ये कहीं भी नहीं पहुंच सकते। ये कभी भी नहीं पहुंच सकते, पहुंचने का कोई इनके लिए कोई उपाय नहीं है।
कोई प्रबुद्ध कैसे बन सकता है? बन सकता है, क्योंकि वो प्रबुद्ध होता है -- उसे बस इस तथ्य को पहचानना होता है ।
एक युवक आया है उस फकीर के पास और उस युवक ने कहा कि मैंने सुना है, बुद्ध ने कहा है कि मेरी बात सब के उपयोग की है। धर्म सब के लिए है। लेकिन, उस युवक ने कहा, इसमें मुझे बड़ी शंका होती है। मुझे शंका होती है कि बुद्ध के वचन अगर सब के उपयोग के लिए हैं, तो बहरों का क्या होगा? क्योंकि बहरे तो सुन ही न सकेंगे, तो उनके लिए उपयोग कैसे होगा? बुद्ध खड़े भी रहें, अंधे तो देख ही न सकेंगे, तो सत्संग कैसे होगा?
उस फकीर ने क्या किया? उस फकीर ने वही किया, जो फकीरों को करना चाहिए। पास में पड़ा था एक डंडा, उसने जोर से उस आदमी के पेट में डंडे का जोर से धक्का दिया। उस आदमी ने चीख मारी। उसने कहा, आप यह क्या करते हैं? तो उस फकीर ने कहा, अहा! मैं तो समझता था कि तुम गूंगे हो। तो तुम गूंगे नहीं हो, बोलते हो! जरा मेरे पास आओ। तो वह आदमी डरता हुआ पास आया। उसने कहा, अहा! मैं तो सोचता था कि तुम लंगड़े हो। लेकिन तुम तो चलते हो!
उस आदमी ने कहा, इन बातों से क्या मतलब जो मैं पूछने आया हूं! तो उस फकीर ने कहा कि तुम इसकी फिक्र छोड़ो, दूसरे अंधे, लूले और गूंगों की। अगर तुम गूंगे नहीं हो, लूले नहीं हो, अंधे नहीं हो, तो कम से कम तुम लाभ ले लो। और जब कोई अंधे आएंगे, तब उनसे मैं निपट लूंगा। जब कोई गूंगे आएंगे, तब उनसे मैं निपट लूंगा। तुम फिक्र छोड़ो। इतना तय है कि तुम अंधे, लूले, लंगड़े, गूंगे नहीं हो। तुमने क्या लाभ लिया बुद्ध के वचनों का? उसने कहा, अभी तक तो कुछ नहीं लिया! तो उस फकीर ने कहा कि पागल, तू फिक्र कर रहा है उनकी, जो न ले सकेंगे; और तू अपनी फिक्र कब करेगा, जो ले सकता है!
तो उस फकीर ने कहा कि जो गूंगे हैं, वे तो गूंगे हैं ही; और जो बहरे हैं, वे तो बहरे हैं ही; लेकिन तेरे बहरेपन को हम क्या करें? तेरे गूंगेपन को हम क्या करें?
हमारी सारी चेष्टाएं असम्यक हैं। या तो हम जरूरत से कम करते हैं; और या हम जरूरत से ज्यादा कर देते हैं।
एक आदमी एक सांझ--रात उतर रही है एक गांव के ऊपर--सड़क पर तेजी से कुछ खोज रहा है। और लोग भी खड़े हो गए और कहा कि हम भी सहायता दे दें, क्या खोज रहे हो? तब तक वह आदमी थक गया था, तो हाथ जोड़कर परमात्मा से प्रार्थना कर रहा है कि मैं एक नारियल चढ़ा दूंगा; मेरी खोई चीज मिल जाए। तो लोगों ने कहा, भई, तेरी चीज क्या है, वह तो तू बता दे!
उसका एक पैसा खो गया है। पांच आने का नारियल! पुराने जमाने की कहानी है। पांच आने का नारियल, एक पैसा खो गया है, उसको चढ़ाने के लिए सोच रहा है! उन लोगों ने कहा, तू बड़ा पागल है। एक पैसा खो गया, उसके लिए पांच आने का नारियल चढ़ाने की सोच रहा है! उस आदमी ने कहा, पहले पैसा तो मिल जाए, फिर सोचेंगे कि चढ़ाना है कि नहीं। नहीं मिला तो अपना निर्णय पक्का है! मिल गया तो पुनर्विचार के लिए कौन रोक रहा है!
मेधावी उद्योग, अप्रमाद, संयम तथा दमन द्वारा ऐसा द्वीप बना ले जिसे बाढ़ आप्लावित न कर सके ।
सोरोकिन ने कहीं एक छोटा-सा मजाक लिखा है। लिखा है कि सोरोकिन एक समाजवादी से बात कर रहा था, जो कहता था, सब चीजें बांट दी जानी चाहिए समान। सोरोकिन ने उससे कहा कि जिन आदमियों के पास दो मकान हैं, क्या आपका खयाल है, एक उसको दे दिया जाए, जिसके पास एक भी नहीं? उस आदमी ने कहा, निश्चित। बिलकुल ठीक। यही चाहता हूं। जिन आदमियों के पास दो कारें हैं, सोरोकिन ने कहा, एक उसको दे दी जाए, जिसके पास एक भी नहीं? उस आदमी ने कहा कि बिलकुल दुरुस्त। यही तो मेरी फिलासफी है, यही तो मेरा दर्शन है। सोरोकिन ने कहा कि क्या आपका यह मतलब है कि जिस आदमी के पास दो मुर्गियां हैं, एक उसको दे दी जाए, जिसके पास एक भी नहीं? उस आदमी ने कहा, बिलकुल गलत। कभी नहीं! सोरोकिन ने कहा कि कैसा समाजवाद है! अभी तक तो आप कहते थे, बिलकुल ठीक! उसने कहा, न मेरे पास दो मकान हैं और न दो कारें हैं, मेरे पास दो मुर्गियां हैं। यह बिलकुल गलत। यहां तक समाजवाद लाने की कोई जरूरत नहीं है।
न पापी मित्रों की संगत करे, न अधम पुरुषों की । संगति करे कल्याण मित्रों की, उत्तम पुरुषों की ।
एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा है कि अगर आग भी बरसती हो, तो भी तुझे बिना देखे मैं नहीं रह सकता। अगर प्रलय भी आ जाए, तो भी तुझे बिना देखे मैं नहीं रह सकता। अगर एटम बम भी बरसता हो, तो भी मैं तुझे देखे बिना नहीं रह सकता। फिर उसकी प्रेयसी ने, जब वह विदा हो रहा था, उससे पूछा कि कल आने वाले हो या नहीं? उसने कहा कि देखो; अगर सांझ वर्षा न हुई, तो मैं जरूर आ जाऊंगा।
जैसे सघन शैल-पर्वत वायु से प्रकम्पित नहीं होता, वैसे ही समझदार लोग निंदा और प्रशंसा से विचलित नहीं होते
मुल्ला नसरुद्दीन को उसके देश के सम्राट ने उसकी बातें, उसके व्यंग्य का मजा लेने के लिए अपने पास रख लिया था। पहले ही दिन सम्राट भोजन के लिए बैठा, तो नसरुद्दीन को भी साथ बिठाया था। कोई सब्जी सम्राट को बहुत पसंद आई। तो नसरुद्दीन ने कहा, आएगी ही पसंद, यह सब्जी नहीं, अमृत है। और उसने उसके गुणों की ऐसी महिमा बखान की कि सम्राट ने अपने रसोइए को कहा कि रोज यह सब्जी तो बनाना ही।
दूसरे दिन भी वह सब्जी बनी, लेकिन वैसा रस न आया। तीसरे दिन भी बनी। चौथे दिन भी बनी। और नसरुद्दीन था कि वह रोज उसकी प्रशंसा करता चला गया कि यह अमृत है। इसका कोई मुकाबला नहीं। यह बेजोड़ है जगत में। इसके स्वाद का संबंध स्वर्ग से है, पृथ्वी से नहीं।
सातवें दिन सम्राट ने थाली उठाकर फेंक दी और कहा कि नसरुद्दीन, बंद करो यह बकवास! यह सब्जी मेरी जान ले लेगी। नसरुद्दीन ने कहा कि मालिक, यह जहर है। और इसका संबंध नर्क से है! उस सम्राट ने कहा, नसरुद्दीन, तुम आदमी कैसे हो? कल तक तुम इसे स्वर्ग बताते रहे, आज यह नर्क हो गई! नसरुद्दीन ने कहा कि हुजूर, मैं नौकर आपका हूं इस सब्जी का नहीं। तनख्वाह आपसे पाता हूं इस सब्जी से नहीं।
यहाँ कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है; हर कोई अपनी तकदीर और अपनी हक़ीकत बनाने में लगा है ।
मैं एक संध्या मुल्ला नसरुद्दीन के घर गया। दस्तक दी तो उसने दरवाजा खोला और छेद से मुझे देखा। उसने भी छेद से मुझे देखा और मुझे भी वह छेद से दिखाई पड़ गया। मैंने कहा, 'नसरुद्दीन क्या मामला है?' वह सिर्फ तुर्की टोपी लगाये, बाकी बिलकुल नंगा था। तो उसने कहा, 'भीतर आ जायें। आप अपने ही हैं, कहने में कुछ हर्ज नहीं।' 'नंगे क्यों घूम रहे हो?' उसने कहा, 'इस समय मुझसे मिलने कोई आता ही नहीं। कपड़े पहनने की कोई जरूरत नहीं।' फिर मैंने कहा, 'अगर ऐसा ही है तो यह तुर्की टोपी क्यों लगा रखी है?' तो उसने कहा, 'शायद कभी कोई आ ही जाये!'
इस दुनिया में वही आदमी धार्मिक है, जिसे कुछ भी होने का वहम नहीं है।
एक पागल आदमी एक मनोचिकित्सक के पास गया। उस आदमी को यह वहम हो गया था कि वह एक कुत्ता है। उसने चिकित्सक को कहा कि कुछ करें। क्या करूं, क्या न करूं! मुझे यह वहम हो गया है कि मैं एक कुत्ता हूं। चिकित्सक ने कहा, यह तो बड़ी बुरी बात है। बड़ी बुरी बीमारी है, इससे छुटकारा पाना होगा। कब से तुझे यह वहम है? उसने कहा, जब से मैं छोटा सा पिल्ला था, तभी से!
तुमने इतने मुखौटे ओढ़ लिए हैं कि अब तुम्हें असली का पता लगाना ही मुश्किल है कि असली कौन है?
एक शराबघर में एक आदमी घुसा। काफी पीये था। और उसने चिल्ला कर कहा कि सुनो! इस नगर में मुझसे शक्तिशाली और कोई भी नहीं। कोई कुछ नहीं बोला, तो उसकी हिम्मत और बढ़ गई। उसने कहा कि इस नगर में ही क्या, इस देश में मुझसे शक्तिशाली कोई नहीं। कोई चुनौती दे, धूल चटा दूं। कोई कुछ नहीं बोला, तो हिम्मत और बढ़ गई। इसी तरह तो हिम्मतें बढ़ी हैं लोगों की! लोग नहीं बोले क्योंकि लोग अपने कामों में व्यस्त थे। लोग अपने पीने में व्यस्त थे, किसको लेना-देना था इस पागल से? तो उसने कहा कि सुनो, अब मैं सच्ची बात बताये देता हूं, इस पृथ्वी पर मुझसे शक्तिशाली कोई भी नहीं। और तब एक आदमी उठा और उसने जाकर एक जोर का चांटा उस आदमी को मारा। तो वह जमीन पर गिर पड़ा चारों खाने चित्त। कोई दो क्षण होश ही खो गये। फिर उठा, गौर से आंख खोली और इस आदमी से कहा कि 'भई, तुम कौन हो?' तो इसने कहा कि 'मैं वही आदमी हूं जो तुम अपने आप को समझ रहे थे, जब तुम शराबघर में आये।'
हर आदमी अपने को कुछ और समझ रहा है, जो वह नहीं है। और इसको समझता ही हो ऐसा नहीं, इसको सिद्ध करने के सब उपाय करता है।
एक मारवाड़ी मरा, तो उसने अपने वकील को कहा कि जो-जो नौकर मेरे घर पांच साल से नौकरी कर रहे हैं, सबको पचास-पचास हजार रुपया मैं दान कर देता हूं। वकील को भी भरोसा नहीं हुआ। क्योंकि वह जिंदगी से इसको जानता था। इसने पांच पैसे कभी किसी को नहीं दिया। यह पचास हजार रुपये एक-एक नौकर को? और नौकर उसके काफी थे, बड़ा कारबार था। वकील ने कहा कि 'मैं समझा नहीं, आप होश में तो हैं?' उस मारवाड़ी ने कहा, 'मैं और बेहोश? तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है। मेरे घर ऐसा कोई नौकर है ही नहीं जिसे पांच साल तक मैं टिकाऊं। इसलिए देना तो एक को भी न पड़ेंगे, लेकिन पचास हजार एक-एक को दिये, दान की चर्चा हो जायेगी।'
मैं क्या हूं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। तुम्हें अपने होने में तो कोई रस ही नहीं है, लोग क्या कहते हैं तुम्हारे संबंध में बस, इसी में रस है। यह गृहस्थ का लक्षण है।
मुल्ला नसरुद्दीन चिकित्सक के पास गया। जैसे ही चिकित्सक ने उसे कहा कि लेटिए टेबल पर; उसने जल्दी से खीसे में हाथ डाला, अपना बटुआ निकाला। चिकित्सक ने कहा, कोई फिक्र नहीं; फीस बाद में दे देना। उसने कहा, फीस कौन दे रहा है! हम अपने रुपये गिन रहे हैं। आपरेशन के बाद गिनने में क्या सार! पहले गिन लेना उचित है। कितने थे, इतना पक्का तो होना चाहिए; आपरेशन के बाद वापस गिन लेंगे।
संदेह के होने में कोई बुराई नहीं है; मन में ही हो, हृदय में न हो। हृदय भरोसा करता हो तो वह परम घटना घट सकती है।
एक पादरी रोज प्रवचन देता था, तो गांव का सब से बूढ़ा आदमी सामने ही बैठता था--बड़ा प्रतिष्ठित धनी आदमी। और न केवल सामने बैठता था...। उम्र भी कोई अस्सी-बयासी साल की हो गई--थका- मांदा जिंदगी भर का। मगर वह दानी भी था। चर्च को उसने दान भी दिया था। और सब से बड़ा प्रतिष्ठित नागरिक भी था, मेयर भी रह चुका था। और कई बातें थीं। तो वह सामने ही बैठता और पुरोहित को बहुत अखरता, क्योंकि वह दो-तीन मिनट में ही सो जाता। सिर हिलाने लगता। न केवल इतना--घुर्राता भी! सामने ही घुर्राता--बैठ कर। तो वह पुरोहित बड़ा परेशान होता। उसको बड़ी बाधा पड़ती। उस बूढ़े के साथ उसका छोटा नाती भी आता था--सात-आठ साल का लड़का ।
उसने तरकीब निकाली। पुरोहित ने उसके नाती को एक दिन अलग से बुलाया और कहा कि 'देख, तू अपने दादा को जगा दिया कर, मैं तुझे चार आने दिया करूंगा। जब भी वे सोएं, जगा दिया। जरा-सा धक्का मार देना।'
चार आने के लोभ में उसने कहा, 'अच्छा, कर देंगे।'
जैसे ही बूढ़ा सोता, वह लड़का उसको जगा देता। ऐसी तीन सप्ताह तक तो बिलकुल ठीक चला। वह पुरोहित बड़ा प्रसन्न था। लेकिन चैथे सप्ताह देखा कि बूढ़ा सो रहा है, घुर्रा रहा है; लड़का बैठा है और जगा नहीं रहा। उसे बड़ी हैरानी हुई। उसने एक-दो दफे इशारा भी किया; लड़का इधर-उधर देखे। उसने उसको फिर इशारा किया कि....। उस लड़के ने इशारा कर दिया कि 'नहीं'। पीछे उसको बुला कर पूछा कि 'बात क्या है! हम तेरे को चार आने देते हैं, काहे का देते हैं? चार आने रोज हम तेरे को देते हैं। तू जगाता क्यों नहीं?'
उसने कहाः 'दादा आठ आने देने लगे है। उन्होंने कहा हैः मुझे जगाना भर नहीं, आठ आना ले लिया कर। अब मैं नहीं जगा सकता। अब आप सोच लो। अगर रुपये का इरादा हो...!' तुम्हारी चाहत क्या है, उससे सब निर्भर होगा।
कबीर -- माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ॥
माला फेरते हुए बहुत समय हुआ, मन में कोई परिवर्तन नहीं आया; हाथ के मनके छोड़कर मन को टटोल ॥
स्वीडन में एक बडा वैज्ञानिक घोड़े का नाल लटकाए हुए था। एक अमरीकन पत्रकार उसे मिलने गया। उसने कहा -- 'आश्चर्य, आप इतने बड़े वैज्ञानिक, नोबल पुरस्कार के विजेता, और आप यह घोड़े का नाल लटकाए हुए हैं! स्वीडन में लोग लटकाते हैं। वे मानते हैं कि उससे लाभ होता है। . . . मगर आप ! आप इस अंधविश्वास में पड़े हैं!' वह वैज्ञानिक हंसने लगा। उसने कहा -- मैं इसको बिल्कुल नहीं मानता। यह बिल्कुल अंधविश्वास है। पत्रकार ने पूछा -- जब आप कहते ही हैं कि यह बिल्कुल अंधविश्वास है और नहीं मानते, तो फिर अपनी बैठक में क्यों लटकाए हुए हैं? वेज्ञानिक ने कहा -- जिस आदमी ने यह मुझे दिया, उसने कहा कि मानो या न मानो, लाभ तो होगा ही।
लाओत्सु -- जब मैं कुछ सत्य की बात कहता हूं तो लोग हंसते हैं, उपहास करते हैं; तब मैं निश्चित समझ जाता हूं कि जो मैंने कहा, वह सत्य ही होना चाहिए। अगर वह सत्य न होता तो लोग उपहास क्यों करते!
उदासीन
कथा :
हैरिगेल जापान में था और तीन वर्षों तक धनुर्विद्या सीखता था एक झेन गुरु से । धनुर्विद्या भी ध्यान को सिखाने के लिए एक माध्यम है । तीन वर्ष पूरे हो गए थे और हैरिगेल उत्तीर्ण भी हो गया था-बामुश्किल उत्तीर्ण हो पाया । क्योंकि पाश्चात्य बुद्धि तकनीक को तो समझ लेती है, टेक्योलॉजिकल है, लेकिन उससे गहरी किसी बात को समझने में उसे बड़ी अड़चन होती है ।
वह झेन गुरु कहता था : तुम चलाओ तो तीर, लेकिन ऐसे चलाओ जैसे तुमने नहीं चलाया । अब यह बड़ी मुश्किल बात है । हैरिगेल निष्णात धनुर्विद था । सौ प्रतिशत उसके निशाने ठीक बैठते थे । लेकिन वह गुरु कहता : नहीं, अभी इसमें झेन नहीं है; अभी इसमें ध्यान नहीं है ।
हैरिगेल कहता मेरे निशाने बिलकुल ठीक पड़ते हैं, अब और क्या चाहिए ?
यह पाश्चात्य तर्क है कि जब निशाने सब ठीक लग रहे हैं, सौ प्रतिशत ठीक लग रहे हैं, तो अब और क्या इसमें भूल-चूक है ? लेकिन झेन गुरु कहता. हमें तुम्हारा निशाना ठीक लगता है कि नहीं, इससे सवाल नहीं; तुम ठीक हो या नहीं, इससे सवाल है । निशाना चूके तो भी चलेगा । निशाने की फिक्र किसको है ? तुम न चूको ।
बात बड़ी कठिन थी । वह कहता -- तुम ऐसे तीर चलाओ कि चलाने वाले तुम न रहो; कर्ता तुम न रहो, तुम सिर्फ साक्षी । चलाने दो परमात्मा को, चलाने दो विश्व की ऊर्जा को, मगर तुम न चलाओ ।
अब यह बड़ी कठिन बात है । हैरिगेल कहेगा कि मैं न चलाऊ तो मैं फिर तीर को प्रत्यंचा पर रखूं ही क्यों ? अब जो रखूंगा तो मैं ही रखूंगा । जब खींचा प्रत्यंचा को तो मैं ही खींचा, कौन बैठा है खींचने वाला ? और जब तीर का निशाना लगाऊंगा तो मैं ही लगाऊंगा, कौन बैठा है देखने वाला और ? तीन वर्ष बीत गए और गुरु ने उससे कहा कि अब बहुत हो गया, अब तुम्हारी समझ में न आएगा । यह बात नहीं होने वाली, तुम वापिस लौट जाओ ।
तो आखिरी दिन वह छोड़ दिया उसने खयाल किया, अपने से होने वाला नहीं है या यह कुछ पागलपन का मामला है । वह गुरु से विदा लेने गया है । गुरु दूसरे शिष्यों को सिखा रहा है । तीन वर्ष उसने कई बार गुरु को तीर चलाते देखा, लेकिन यह बात दिखाई न पड़ी थी । नहीं दिखाई पड़ी थी, क्योंकि खुद की चाह से भरा था कि कैसे सीख लूं ? कैसे सीख लूं ? बड़ा भीतर तनाव था । आज सीखने की बात तो खत्म हो गई थी । वह विदा होने को आया है-आखिरी नमस्कार करने । कुछ भी हो इस गुरु ने तीन वर्ष उसके साथ मेहनत तो की है । तो वह बैठा है एक बेंच पर, गुरु दूसरे शिष्यों को सिखा रहा है । वह खाली हो जाए, तो हैरिगेल उससे क्षमा मांग ले और विदा ले ले । खाली बैठे- बैठे उसको पहली दफा दिखाई पड़ा कि अरे, गुरु उठाता है प्रत्यंचा, लेकिन जैसे उसने नहीं उठाई । कोई तनाव नहीं है उठाने में । रखता है तीर, लेकिन जैसे उदासीन । चढ़ाता है हाथ, खींचता है हाथ, लेकिन जैसे प्रयोजन-शून्य; सूना-सूना; भीतर कोई चाहत नहीं है कि ऐसा हो, जैसे कोई करवा ले रहा है ! तुमने फर्क देखा पू तुम अपनी प्रेयसी से मिलने जा रहे हो तो तुम्हारी गति और होती है; और किसी के संदेशवाहक हो कर जा रहे हो, किसी ने चिट्ठी दे दी कि जरा मेरी प्रेयसी को पहुंचा देना, तो तुम रख लेते हो उदासीन मन से खीसे में, तुम्हें क्या लेना-देना ! चले जाते हो, दे भी देते हो; मगर वह गति, त्वरा, ज्वर, जो तुम्हारी प्रेयसी की तरफ जाने में होता है, वह तो नहीं होता, तुम सिर्फ संदेशवाहक हो ।
तुमने देखा, पोस्टमैन आता है, डाकिया ! तुम्हें लाख रुपये की लाटरी मिल गई हो, वह ऐसे ही चला आता है कि जैसे दो कौड़ी का लिफाफा पकड़ा रहा है । तुम्हें हैरानी होती है कि अरे, तू कैसा पागल है ? लाख रुपये मुझे मिल गए और तू बिलकुल ऐसे ही चला आ रहा है जैसे रोज आता है-वही रोनी सूरत, वही साइकिल पर सवार चला आ रहा है ! मगर उसे क्या लेना-देना है ? संदेशवाहक, संदेशवाहक है ।
देखा हैरिगेल ने कि गुरु ठीक कहता था, मैं चूकता रहा हूं । वह उठा, और चकित हुआ थोड़ा,
क्योंकि उसे लगा, मैं नहीं उठा हूं कोई चीज उठी ! वह उठ कर गुरु के पास गया, उसने गुरु के हाथ से तीर-कमान ले लिया, चढ़ाया, निशाना मारा और गुरु प्रफुल्लित हो गया, उसने गले से लगा लिया । उसने कहा, हो गया ! आज 'उसने' चलाया । आज तू उदासीन था । तीन वर्ष में जो न हो पाया, वह आज आखिरी घड़ी में हो गया ।
उसकी खुशी में उसने गुरु को निमंत्रण दिया कि आज मेरे साथ भोजन करें । गुरु आया, एक सात-मंजिल मकान में भोजन करने बैठे, अचानक भूकंप आ गया । जापान में आमतौर से भूकंप आ जाते हैं । सब भागे, पूरा भवन कंप गया । हैरिगेल खुद भी भागा । भागने में उसे यह भी याद न रही कि गुरु कहां है । सीडी पर भीड़ हो गई, क्योंकि कोई पचीस-तीस आदमियों को उसने बुलाया था । तो उसने पीछे लौट कर देखा, गुरु तो शांत आंख बंद किए बैठा है, जहां बैठा था, वहीं बैठा है । हैरिगेल को यह इतना मनमोहक लगा-यह घटना, गुरु का यह निश्चित रहना, यह भूकंप का होना, यह मौत द्वार पर खड़ी, यह मकान अभी गिर सकता है, सात-मंजिल मकान है, कंपा जा रहा है जड़ों से, और गुरु ऐसा बैठा है निश्चित, जैसे कुछ भी नहीं हो रहा है ! वह भूल ही गया भागना । ऐसा कुछ जादू गुरु की मौजूदगी में उसे लगा ! कुछ ऐसी गहराई, जो उसने कभी नहीं जानी ! वह आ कर गुरु के पास बैठ गया; कंप रहा है, लेकिन उसने कहा कि मेहमान घर में बैठा हो और मेजबान भाग जाए, यह तो अशोभन है-तो मैं भी बैठूंगा; फिर जो इनका होगा, मेरा भी होगा । भूकंप आया और गया, क्षण भर टिका । गुरु ने आंख खोली, और जहां से बात टूट गई थी भूकंप के आने और लोगों के भागने के कारण, उसे फिर वहीं से शुरू कर दिया ।
हैरिगेल ने कहा -- छोड़िए भी, अब मुझे कुछ याद नहीं कि कौन-सी हम बात कर रहे थे । वह बात आयी-गयी हो गई, इस संबंध में कुछ अब मुझे जानना नहीं । मुझे कुछ और जानने की उत्सुकता है । इस भूकंप का क्या हुआ ? हम सब भागे, आप नहीं भागे ?
गुरु ने कहा : तुमने देखा नहीं, भागा मैं भी । तुम बाहर की तरफ भागे, मैं भीतर की तरफ भागा । तुम्हारा भागना नासमझी से भरा है, क्योंकि तुम जहां जा रहे हो वहां भी भूकंप है । पागलो, जा कहां रहे हो ? इस मंजिल पर भूकंप है तो छठवीं पर नहीं है ? तो पांचवीं पर नहीं है ? तो चौथी पर नहीं है ? क्या पहली मंजिल पर नहीं है ? तुम अगर किसी तरह मकान के बाहर भी निकल गए, तो सड़क पर भी भूकंप है । तुम भूकंप में ही भागे जा रहे हो । तुम्हारे भागने में कुछ अर्थ नहीं है । मैं ऐसी जगह सरक गया, जहां कोई भूकंप कभी नहीं जाते । मैं अपने भीतर सरक गया । इस भीतर सरक जाने का नाम है 'उदासीन'-अपने भीतर बैठ गए !
जब तक तुम दर्पण न बन जाओ, तब तक सत्य का प्रतिफलन कैसे होगा?
ताली
कथा :
एक अदभुत फकीर थे -- महात्मा भगवानदीन । वे कभी-कभी मेरे पास रुकते थे । मेरी तो छोटी उम्र थी, लेकिन उनका मुझसे बड़ा लगाव था । वे कभी मेरे गांव से गुजरते तो मेरे पास जरूर रुकते । उनकी एक खूबी थी जब वे बोलते, अगर कोई ताली बजा दे तो बड़े नाराज हो जाते । वे उठ कर ही खड़े हो जाते कि अब मैं बोलूंगा ही नहीं, क्यों ताली बजाई ? मैंने उनसे कहा कि लोग ताली बजा रहे हैं, आप इतने नाराज होते हैं ? वे कहते लोग ताली ही तब बजाते हैं, जब कोई आदमी बुद्धुपन करता है । मैंने जरूर कोई गलती की होगी । पहली तो बात, इन बुद्धुओं को अगर मैं सच बात कहूं तो समझ में न आएगी, गलत कहूं तभी समझ में आती है, और तभी ये ताली बजाते हैं । ताली बजाई कि मैं तत्काल समझ जाता हूं कि हो गई कोई गलती ।
दर्पण में मुख और संसार में सुख होता नहीं है, सिर्फ दिखता है ।
तर्क
कथा :
हरि सिंह गौर एक बड़े वकील थे । उन्होंने सागर विश्व-विद्यालय का निर्माण किया । सारी दुनिया के ख्यातिलब्ध वकील थे । प्रिवि कौंसिल में एक मुकदमा था । वे किसी महाराजा की तरफ से मुकदमा लड़ रहे थे । वे तो जिसके पक्ष में खड़े हो जाते थे, वह जीतेगा ही -- यह निश्चित था । इसलिए वे कुछ ज्यादा फिक्र भी नहीं करते थे ।
धीरे- धीरे उनकी प्रतिष्ठा ऐसी हो गई थी कि वे जिसके पक्ष में हों, वह जीतने ही वाला है । तो विरोधी तो पस्त हो जाते थे । उनका ज्ञान-भंडार भी बहुत था । और उनके पास काम भी बहुत था । एक दिल्ली में दफ्तर था, एक पीकिंग में, एक लंदन में । भागे फिरते थे तीनों जगह । काम भी बहुत था, उलझन भी बहुत थी । रात किसी पार्टी में संलग्न थे और देर से आए और सो गए और देख नहीं पाए फाइल । सुबह अदालत में जाना पड़ा बिना फाइल देखे, तो सीधे खड़े हो गए, भूल गए कि किसके पक्ष में हैं-और विपक्षी के पक्ष में दलील देने लगे ।
विपक्षी के पक्ष में उन्होंने घंटे भर तक दलील की । बड़ा सन्नाटा छा गया अदालत में कि यह हो क्या रहा है ! मजिस्ट्रेट भी बेचैन, विरोधी वकील भी बेचैन कि यह मामला क्या है ? विरोधी भी बेचैन ! और उनका जो आदमी था, जिसके पक्ष में वे लड़ रहे थे-किसी महाराजा के-वह तो पसीने-पसीने हो गया कि जब अपना ही वकील यह कह रहा है, तो अब क्या रहा ? अब तो कोई उपाय नहीं है । अब तो मारे गए ।
आखिर उनके सेक्रेटरी ने हिम्मत जुटाई, उनके पास जा कर कान में कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं ? यह तो आपने अपने आदमी को मार डाला । आपने तो बुरी तरह उसे खराब कर दिया । अब तो यह मुकदमा जीतना मुश्किल है ।
उन्होंने कहा, क्या मतलब ? क्या मैं विरोधी की तरफ से बोल रहा हूं ? उन्होंने कहा, घबड़ा मत ! उन्होंने टाई-वाई ठीक की और मजिस्ट्रेट से कहा कि महानुभाव, अभी मैंने वे दलीलें दीं जो मेरा विरोधी वकील देगा, अब मैं इनका खंडन शुरू करता हूं ।
और खंडन शुरू कर दिया और मुकदमा जीत गए । और बड़ी सुगमता से जीते, क्योंकि अब विरोधी को कुछ कहने को बचा ही नहीं; वह जो कहता और जितनी अच्छी तरह से कह सकता था, उससे भी ज्यादा अच्छी तरह से उन्होंने कह ही दिया था, अब कुछ बचा ही नहीं था कहने को, और उसका खंडन भी कर दिया था ।
तर्क की कोई निष्ठा नहीं है । तर्क तो वेश्या है । वह तो किसी के भी साथ खड़ा हो जाता है ।
Immanuel Kant एक बड़ा विचारक हुआ, एक स्त्री ने उससे प्रेम निवेदन किया। दो-तीन वर्ष तो उसके प्रेम में रही, राह देखी कि वह निवेदन करे। क्योंकि स्त्रियां प्रतीक्षा करती हैं। निवेदन भी आक्रमण है। वह स्त्रैण-मन को ठीक नहीं लगता। वह राह देखती है कि प्रेमी निवेदन करे। लेकिन Kant कुछ बोला ही नहीं। तीन साल बीत गये। मजबूरी में उस स्त्री ने कहा कि क्या कहते हो, कुछ कहो। ऐसे जिंदगी बीत जाएगी। मैं तुम्हारी होना चाहती हूं सदा के लिए। Kant ने कहा, मुझे डर था कि कभी न कभी यह सवाल उठेगा। मैं इस पर सोचूंगा।
वह बड़ा दार्शनिक था। बड़ी अदभुत कथा है। और कथा ही होती तो भी ठीक था, सही है। वह सोचता रहा, सोचता रहा। कहते हैं तीन साल बाद उसने जाकर उस युवती के घर पर दस्तक दी। युवती के पिता ने द्वार खोला। उसने पूछा कि कैसे आये, बहुत दिन से दिखायी नहीं पड़े। उसने कहा कि मैं यह कहने आया हूं कि मैंने निर्णय कर लिया कि विवाह करूंगा। पिता ने कहा,तुम बड़ी देर से आये। उसका तो विवाह हो भी चुका, एक बच्चा भी पैदा हो गया। तुम इतनी देर कहां रहे? Kant ने कहा, मैं सोचता रहा। जेब से उसने अपनी किताब निकाल कर बतायी। विवाह के पक्ष में और विपक्ष में जितनी भी बातें हो सकती थीं,सब उसने लिख रखी थीं। हिसाब लगाया था, पक्ष में कितनी हैं, विपक्ष में कितनी हैं; फायदा क्या होगा, हानि क्या होगी? और तब उसने यही तय किया था कि फायदा थोड़ा ज्यादा है। बहुत रत्तीभर का फर्क है। कोई ज्यादा फर्क नहीं है। हानि भी बहुत है,लेकिन फायदा थोड़ा ज्यादा है। और फायदा यह है कि उससे अनुभव होगा।
सोचते-सोचते तो जिंदगी बीत जाएगी। तर्क में जीवन खो जाता है। जिसका परमात्मा के साथ तालमेल बैठ जाता है, उसके फूल खिल जाते हैं । जिसका तालमेल नहीं बैठता, वह तर्क की उधेड़बुन में ही लगा रह जाता है । वह सोच-विचार में लगा रहता है, क्या ठीक, क्या गलत? उसका तर्क बसंत से मेल नहीं खाने देता । ऋतु आ जाती है, वृक्ष उदास ही खड़ा रहता है, वह सोचता ही रहता है यह बसंत है या नहीं? और आए बसंत को जाने में देर कितनी लगती है! वसंत आ गया । बसंत आ, गया! इतनी देर । चूके तर्क में, संदेह में कि जो था, नहीं हो जाता है ।
पुराने युगों में यह नियमित व्यवस्था थी कि गुरु अगर देखता कि कोई तर्क करने आ गया, तो उसे उस जगह भेज देता, जहां तर्क ही चलता था। ताकि वह तर्क से थक जाए, परेशान हो जाए। और इतना ऊब जाए कि एक दिन आकर वह कहे कि तर्क बहुत कर लिया, कुछ मिला नहीं; अब कोई ऐसी बात कहें, जिससे कुछ हो जाए।
दो फकीर सामने रहते हैं। एक फकीर का शिष्य है, वह अपने गुरु को आकर कहता है कि सामने वाला जो सूफी है, यह आपके बाबत बहुत गलत-सलत बातें प्रचारित करता है। यह कुछ गंदी-गंदी बातें भी आपके संबंध में गढ़ता है, अफवाहें उड़ाता है। आप इसे ठीक क्यों नहीं कर देते? कुछ बोलते क्यों नहीं? तो उस फकीर ने कहा, तू ऐसा कर, तू उसी से जाकर पूछ कि राज क्या है! पर ऐसे जल्दी मत पूछना, क्योंकि कीमती बातें अजनबियों को नहीं बताई जाती हैं। और राहगीर चलते आकर कुछ पूछ लें, तो उनको उत्तर जो दिए जाते हैं, वे रास्ते की ही कीमत के होते हैं। तो उसने कहा, मैं क्या करूं? कहा कि साल भर उसकी सेवा कर; निकट पहुंच। और जब आंतरिकता बन जाए, तब किसी दिन क्षण का खयाल रख कर, समय का बोध रख कर, अवसर खोज कर उससे पूछना।
तो साल भर उसने सेवा की। बहुत निकटस्थ हो गया, आत्मीय हो गया। एक दिन पैर दाब रहा था रात, तब उसने अपने गुरु को पूछा कि आप गालियां देते हैं, सामने वाले गुरु के खिलाफ सब कुछ कहते हैं, इसका राज क्या है? तो उसने कहा, तू पूछता है, किसी को बताना मत। मैं उसका शिष्य हूं। और राज बताने की मनाही है, तू जाकर उसी से पूछ ले। पर ये बातें अजनबियों को नहीं बताई जाती हैं, राह चलतों को नहीं बताई जाती हैं। जरा निकट हो जाना।
उसने कहा, अच्छी मुसीबत में पड़े! हम तुम्हें दुश्मन समझ कर साल भर मेहनत किए, तुम शिष्य निकले! उसके ही शिष्य हो! वहीं वापस जाना पड़ेगा।
दो साल गुरु की पुनः सेवा की लौट कर। एक क्षण सुबह स्नान कराते वक्त--कोई नहीं था, गुरु को वह स्नान करा रहा था--पूछा कि आज मुझे बता दें, यह राज क्या है?
तो उसके गुरु ने कहा कि वह मेरा ही शिष्य है। और उसे वहां इसलिए रख छोड़ा है कि वह मेरे संबंध में गलत बातें उड़ाता रहे। ताकि जिनको उन गलत बातों पर भरोसा आ जाए, वे मेरे पास न आ सकें, वे गलत लोग हैं। उनके साथ मेरा समय नष्ट न हो। मेरा समय कीमती है। मैं उन्हीं पर खर्च करना चाहता हूं, जो सत्य की तलाश में आए हैं। और जो अफवाहों से लौट सकते हैं, उनकी कोई तलाश नहीं है। वह आदमी अपना है। और उसने इतनी सेवा की है मेरी इन बीस वर्षों में, जिसका हिसाब नहीं है। सैकड़ों फिजूल के लोगों से उसने मुझे बचाया है। यह नियमित व्यवस्था थी।
श्रद्धा से भरने का अर्थ है, जब कोई हृदय को सीधा खोलने को तैयार है।
नसरुद्दीन अपने बेटे को कह रहा था कि तू यूनिवर्सिटी जा रहा है, तो तर्कशास्त्र जरूर पढ़ लेना। पर उसके बेटे ने कहा कि जरूरत क्या है तर्कशास्त्र को पढ़ने की? तर्कशास्त्र सिखा क्या सकता है? नसरुद्दीन ने कहा, तर्कशास्त्र में बड़ी खूबियां हैं; वह तुझे आत्यंतिक रूप से बेईमान बना सकता है। और अगर बेईमान होना हो, तो तर्क जानना बिलकुल जरूरी है। ईमानदारी बिना तर्क के हो सकती है; बेईमानी बिना तर्क के नहीं हो सकती है।
उसके बेटे ने कहा, मुझे कुछ समझाएं; क्योंकि मुझे तर्क का कुछ भी पता नहीं। तो नसरुद्दीन ने कहा कि समझ, एक मकान में किचेन की चिमनी से दो आदमी बाहर निकलते हैं। एक आदमी के कपड़े बिलकुल शुभ्र, सफेद हैं। उन पर जरा भी दाग नहीं लगा है। और दूसरा आदमी बिलकुल गंदा हो गया है, काला पड़ गया है। सारे कपड़े और चेहरे पर चिमनी की कालिख लग गई है। मैं तुझसे पूछता हूं कि उन दोनों में से कौन स्नान करेगा?
स्वभावतः, उसके बेटे ने कहा कि जो गंदा और काला हो गया, वह स्नान करेगा। नसरुद्दीन ने कहा, गलत। यही तो तर्क जानने की जरूरत है। क्योंकि जो आदमी गंदा है, उसे अपनी गंदगी नहीं दिखाई पड़ेगी, उसे दूसरे आदमी के सफेद कपड़े पहले दिखाई पड़ेंगे। और जब वह सोचेगा कि दूसरे आदमी के सफेद कपड़े हैं, तो मेरे भी सफेद होंगे। लड़के ने कहा, मैं समझा आपकी बात, मैं समझ गया। जिस आदमी के सफेद कपड़े हैं, वह स्नान पहले करेगा। क्योंकि वह गंदे आदमी को देखेगा; वह सोचेगा, जब यह इतना गंदा हो गया, तो मैं कितना गंदा नहीं हो गया होऊंगा। एक ही चिमनी से दोनों निकले हैं। मैं समझ गया। नसरुद्दीन ने कहा, गलत! उसके बेटे ने कहा, हद हो गई, दोनों बातें गलत! नसरुद्दीन ने कहा, गलत! क्योंकि जो तर्क जानता है, वह यह कहेगा कि जब एक ही चिमनी से दोनों निकले, तो एक सफेद और एक गंदा कैसे निकल सकता है? नसरुद्दीन ने कहा कि अगर दुनिया में सबको गलत सिद्ध करना हो, तो तर्क जानना जरूरी है।
घबड़ाहट की वजह से, भय की वजह से आदमी मान लेता है, आत्मा अमर है, अनुभव की वजह से नहीं। क्योंकि अनुभव तो बड़ी और बात है। और अनुभव तो उसे उपलब्ध होता है, जो मृत्यु से भय छोड़ देता है और जीवन की वासना छोड़ देता है।
झेन फकीरों की एक मीठी कथा है। दो मंदिर थे एक गांव में। दोनों मंदिर के पुजारियों में विरोध था जैसा कि होता है। दोनों एक दूसरे के खिलाफ पीढ़ी दर पीढ़ी से दुश्मन थे। न कभी मिलते थे। रास्ते पर भी एक दूसरे से मिल जायें, तो बच कर निकल जाते थे। लेकिन दोनों पुजारियों के पास दो छोटे लड़के थे जो उनकी सेवा में थे। बाजार से सामान लाना, सब्जी खरीद लाना, दौड़ धूप के काम! बच्चे, बच्चे हैं। बूढ़ों को भी बिगाड़ने में देर लग जाती है। उन बच्चों को भी पुरोहित कहते थे कि देखो, दूसरे मंदिर के बच्चे के साथ खेलना मत। लेकिन बच्चे, बच्चे हैं। बिगड़ने में समय लगता है। वे कभी-कभी रास्ते पर मिल जाते थे तो दो बात भी कर लेते थे।
एक दिन पहले मंदिर का बच्चा वापिस आया। वह उदास था और उसने अपने गुरु को कहा कि आज बड़ी मुश्किल हो गई। मैं जा रहा था रास्ते पर, चौराहे पर दूसरे मंदिर का लड़का मिला। मैंने उससे पूछा, 'कहां जा रहे हो?' तो उसने कहा, 'जहां हवा ले जाये।' तो फिर मैं कुछ भी न सोच पाया कि अब मैं क्या कहूं? उसने तो बड़ी पहेली कह दी।
गुरु बहुत नाराज हुआ कि पहले तो तूने भूल की पूछ कर। क्योंकि उन अज्ञानियों से पूछना क्या! और जब मैं यहां मौजूद हूं, तो जो भी पूछना हो मुझसे पूछ। और पूछ कर तूने सिद्ध किया कि हम अज्ञानी हैं। हम सदा उत्तर देते हैं। पूछते हम कभी नहीं। अब पूछ ही लिया, तो उसे हराना जरूरी है। तू हार कर लौटा है। ऐसा कभी हुआ नहीं। इस मंदिर का कण-कण विजेता है। यहां सारी कथा विजय की है। हम हारे कभी नहीं। कल उसे हराना पड़ेगा तुझे। कल फिर पूछना, 'कहां जा रहे हो?' और वह जब कहे, 'हवा जहां ले जाये', तो कहना, 'और अगर हवा न चल रही हो, सब बंद हो, फिर क्या करोगे?' उसका मुंह बंद करना जरूरी है।
यही उत्तर है धार्मिकों का--मुंह बंद कर देना दूसरों का। लड़का उत्सुकता से जल्दी उठकर चौराहे पर दूसरे दिन खड़ा हो गया। आया दूसरे मंदिर का लड़का। उसने पूछा, 'कहां जा रहे हो?' उसने कहा, 'जहां पैर ले जायें।'
बड़ी मुसीबत हो गई! उत्तर तैयार था, लेकिन स्थिति बदल गई। बंधे उत्तर...लोगों की यही दशा होती है हर वक्त। उनका उत्तर तैयार है, और स्थिति रोज बदलती है। उत्तर कहीं नहीं बैठता। सब जगह अड़चन आ जाती है।
लौटा दुख में और उसने कहा, 'वह लड़का बेईमान है। कल कुछ कहा, आज बदल गया।' गुरु ने कहा, ''उस मंदिर के लोग सदा के बेईमान हैं, इसीलिए हम कहते हैं उनसे बात ही मत करना। वे भरोसे के नहीं हैं। हम जिस उत्तर पर अटल हैं, उस पर अटल रहते हैं। उनका कोई भरोसा नहीं है जब जैसा देखा, बदल गये। उनकी स्थिति तो गिरगिट जैसी है। अवसरवादी हैं, अपारचुनिस्ट हैं, मगर हराना जरूरी है। तो कल फिर पूछना, 'कहां जा रहे हो?' वह लड़का कहेगा, 'जहां पैर ले जायें।' तो कहना, 'और अगर लंगड़े हो गये, फिर क्या करोगे?' उसका मुंह बंद करना हर हालत में जरूरी है।''
बस! पंडित एक दूसरे का मुंह बंद करने में लगे रहते हैं। वह लड़का फिर जाकर और भी जल्दी खड़ा हो गया। आया, उधर से दूसरे मंदिर का लड़का। पूछा इसने, 'कहां जा रहे हो?' उसने कहा, 'बाजार सब्जी लेने जा रहे हैं।' अब कोई उत्तर की संगति न रही। न पैर, न हवा। वह लौटा बहुत दुख में। उसने अपने गुरु से कहा कि 'इसका मुंह बंद करना मुश्किल है। क्योंकि मैं तैयार उत्तर ले जाता हूं। और वह बदल जाता है।'
जिंदगी भी ऐसी ही बदल रही है प्रतिपल। और तुम तैयार उत्तर ले कर उसके पास जाते हो। तुम अगर जिंदगी को चूक रहे हो, तो तुम्हारे तैयार उत्तरों के कारण चूक रहे हो। परमात्मा का अगर द्वार बंद है, तो तुम्हारे ज्ञान के कारण बंद है। तुम अपने ज्ञान को हटाओ और तुम उसे पाओगे वह सामने खड़ा है।
जो नदी सागर में अपने को गिरते देखती होगी, वह घबड़ा जाती होगी। मिट रही है, मौत है सागर। लेकिन उसे पता नहीं कि यह सागर मौत भी है, गर्भ भी। क्योंकि कल फिर उठेगी ताजी होकर, नई होकर, युवा होकर।
एक सुबह मुल्ला नसरुद्दीन अपनी छपरी में बैठा हुआ है। अचानक वर्षा का झोंका आया। गांव का जो मौलवी है, वह पानी की बूंदें पड़ी तो तेजी से भागा। नसरुद्दीन ने कहा, रुको, यह परमात्मा का अपमान है। मौलवी भी घबड़ा गया; क्योंकि नसरुद्दीन वजनी आदमी था। और गाँव में खबर हो जाए। और उससे कह रहा था, तो उसका कुछ मतलब होगा। उसने कहा, क्या मतलब? तो उसने कहा, जब परमात्मा वर्षा कर रहा है, तो तुम उसका अपमान कर रहे हो भागकर। धीमे-धीमे जाओ। मौलवी को भी बात समझ में आई। बेचारा धीरे-धीरे घर तक गया, भीग गया वर्षा में। बूढ़ा आदमी था, बुखार आ गया।
वह तीसरे दिन अपने बिस्तर में बुखार में बैठा हुआ था, तब उसने खिड़की से देखा कि वर्षा का फिर झोंका आया और नसरुद्दीन बाजार से भागा जा रहा है। तो उसने कहा, रुक, नसरुद्दीन! भूल गया? तो नसरुद्दीन रुका नहीं, भीतर भागता हुआ घर में आया और उसने कहा कि नहीं, भूला नहीं। इसीलिए भाग रहा हूं कि परमात्मा पानी गिरा रहा है, उसके पानी पर कहीं मेरे नापाक पैर न पड़ जाएं। गंदा आदमी हूं, नहाया भी नहीं। ये गंदे पैर उसके पानी पर न पड़ जाएं, इसीलिए तो भाग रहा हूं। भूला नहीं हूं।
सत्य से इतना ही अर्थ नहीं है कि सच बोलना। सत्य से अर्थ है, प्रामाणिक होना, authentic होना। सत्य से अर्थ है, जैसे आप भीतर हैं, वैसे ही बाहर होना।
एक बार नसरुद्दीन ट्रेन में यात्रा कर रहा था। टिकट कलेक्टर ने आकर उससे टिकट मांगी। मुल्ला बोला, हुजूर, टिकट तो नहीं है। टिकट कलेक्टर बोला, मियां, क्या तुम्हें पता नहीं कि बिना टिकट ट्रेन में बैठना मना है? मुल्ला ने जवाब दिया, मालूम था हुजूर, इसीलिए तो देखिए न मैं कब से खड़ा हूं! मैं बैठा ही नहीं! निद्रा के अपने तर्क हैं।
अगर जागना हो तो सोए मन की बहुत मत सुनना। मन कहे भी तो भी सुनी-अनसुनी कर देना। इसका ही अर्थ है शिष्यत्व।
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी बीबी के जन्मदिन पर उसे एक चप्पल लाकर भेंट दी। सिर्फ एक चप्पल बाएं पैर की। बीबी बहुत नाराज हुई: क्या तुम मुझे पागल समझते हो जो सिर्फ एक पैर की चप्पल लाकर दे दी? इससे भला होता तुम कुछ न देते। क्यों मेरी बेइज्जती करते हो आप? मुल्ला बोला -- कैसी बात करती हो गुलजान, क्या तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें दो चप्पलें देकर तुम्हारी दोगुनी बेइज्जती करूं?
अगर एक चप्पल से बेइज्जती होती है तो दो चप्पल से दोगुनी हो जाएगी। गणित तो ठीक, हिसाब तो ठीक, हिसाब में तो कोई चूक नहीं है। मगर बुनियाद ही गलत है, आधार ही गलत है। तर्क के हम बड़े भवन खड़े कर लेते हैं--बिना यह सोचे कि रेत पर खड़े कर रहे हैं। तर्क बहुत कुशल है, लेकिन प्रतिभावान नहीं।
भीतर तो कांटे ही कांटे उग रहे हैं। लोग कैक्टस हो गए हैं--कांटे ही कांटे! और उन कांटों को खूब पानी भी दे रहे हैं।
एक बूढ़ा कौआ अपने बेटे को शिक्षा दे रहा था और उससे कह रहा था कि 'देख अनुभव की बात है -- आदमी से सावधान रहना; आदमी भरोसे के नहीं है। और अगर किसी आदमी को तू झुकते देखे, फौरन उड़ जाना; वह पत्थर उठा रहा होगा।' बेटे ने कहा, ' और अगर वह पत्थर पहले से ही बगल में दबाये आ रहा हो तो?' यह सुनते ही बूढ़ा कौआ उड़ गया और उसने कहा कि यह लड़का भी खतरनाक है; इसके पास रुकना उचित नहीं ।
रात दो बजे मुल्ला को जगा कर
घबराई हुई बीबी बोली, सकपका कर..
'सुनते हो, खटर-पटर की आवाज आ रही है, लगता है घर में घुसे हैं चोर,
पड़े क्या हो जी, उठो, मचा दो शोर!'
नसरुद्दीन बोला..
'गुलजान, सोने दो मुझे, मत करो बोर,
कुछ भी नहीं है, तू व्यर्थ ही घबरा रही है
शायद चौके में बिल्ली कुछ खा रही है
चोर हल्ला नहीं करते, चुपचाप आते हैं
समझी कुछ, ऐ बुद्धिमान! वे बर्तनों की उठापटक नहीं मचाते हैं
जो होगा देखेंगे, सुबह होने दो
बोर मत करो गुलजान, मुझे सोने दो!'
तर्क में हार कर बीबी मौन हो गई बेचारी
मन में तो मगर शक था, सो न सकी डर की मारी
तीन बजे फिर नसरुद्दीन को जगा कर बोली,
'डार्लिंग, आए एम सारी!
चोर कभी नहीं करते शोर
तुम्हारी यह बात मुझे समझ आ रही है
इसलिए कहती हूं..उठो, जरा देखो तो सही जरूर कुछ गड़बड़ है मेरी जान
घंटा भर से अपने घर में, है बिल्कुल सुनसान
बात क्या है? कोई आवाज नहीं आ रही है!'
चेहरा
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक धनपति के घर मस्जिद के लिए कुछ दान मांगने गया । जैसे कि धनपति होते हैं, धनपति ने ऐसा खिड़की से झांक कर देखा, देखा कि मुल्ला आया है, जरूर कुछ दान मांगने आया होगा । उसने अपने दरबान को कहा कि कह दो कि वे बाहर गए हैं । मुल्ला ने भी देख लिया था । उस सिर को मुल्ला भी देख चुका था खिड़की से ।
दरबान ने कहा कि महानुभाव, आप गलत समय आए मालिक बाहर गए हैं ।
तो मुल्ला ने कहा, कोई हर्जा नहीं, हम फिर आ जाएंगे । मालिक आ जाएं तो हमारी तरफ से मुफ्त एक सलाह उनको दे देना कि बाहर तो जाएं, लेकिन सिर घर न छोड़ कर जाया करें । इसमें कभी खतरा हो सकता है ।
अगर तुमने समझा कि दर्पण में तुम्हारा चेहरा है, तो फिर तुम्हें दर्पण को ले कर घूमना पड़ेगा; नहीं तो चेहरा घर छूट जाएगा, बिना चेहरे के तुम जाओगे ।
गुरु तो दर्पण है; तुम्हें तुम्हारा चेहरा पहचनवा देता है । लेकिन एक दफा पहचान आनी शुरू हो गई, तो अंततः तो अपने भीतर ही खोजना है ।
जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग
एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग ।
होली का दिन था और गांव के नेताजी को लोगों ने पकड़ लिया। वैसे ही साल भर का गुस्सा था नेताजी पर और होली का मौका, दिल खोल कर कबीर बके और खूब गालियां दीं, खूब दचका और पटका नेताजी को। होली है ही इसीलिए कि जो साल भर नहीं कर सके, एक दिन के लिए छुटकारा, एक दिन की छुट्टी। खूब रंग दिया मुंह उनका कोलतार से कि जनम-जनम लग जाएं धोने में। फिर सांझ को उनके घर देखने गए कि हालत क्या है, क्योंकि कोलतार ऐसा रंगा था कि चमड़ी भला निकल जाए, मगर कोलतार न निकले। लेकिन नेताजी शुभ्र खादी पहने हुए, मुस्कुराते हुए कुर्सी पर बैठे थे! चेहरा बिलकुल जैसा था वैसा, न कोई कोलतार, दाग भी नहीं, चिह्न भी नहीं। बड़े हैरान हुए। कहा कि कोलतार पोता था सुबह, उसका क्या हुआ?
नेताजी ने कहा, वह देखो कोने में! एक मुखौटा पड़ा था, उस पर कोलतार पुता था। नेताजी ने कहा, क्या तुम सोचते हो कि हम अपना असली चेहरा लेकर बाजार में निकलते हैं?
सोचना मत, देखना। देखो, तो चीजें साफ हैं; सोचो, तो सब धुंधला हो जाता है।
त्यागी
कथा :
एक फकीर एक सम्राट का मित्र था । सम्राट उस फकीर से बहुत ही प्रभावित था । इतना प्रभावित था कि एक दिन उसने कहा कि प्रभु, मुझसे देखा नहीं जाता कि इस वृक्ष के नीचे धूप, छाया, गर्मी में आप बैठे रहें; राजमहल चलें !
सोचा था सम्राट ने कि जब मैं यह कहूंगा, फकीर कहेगा कि 'नहीं-नहीं, नहीं-नहीं, राजमहल और मैं ? मैं छोड़ चुका संसार !' ऐसा कहा होता फकीर ने तो सम्राट प्रसन्न हुआ होता । उसके मन में और भी फकीर के प्रति आदर बढ़ा होता । लेकिन फकीर मेरे जैसा रहा होगा । वह उठ कर खड़ा हो गया । उसने कहा, घोड़ा इत्यादि कहां है ? सम्राट थोड़ा सकुचाया कि अरे, यह कैसा त्यागी ! मगर अब कुछ कह भी न सकता था । ले आया घोड़ा, लेकिन बेमन से लाया । वह फकीर चढ़ कर घोड़े पर बैठ गया । उसने कहा कि चलो ।
ले आया महल, लेकिन मजा चला गया । क्योंकि मजा तो यही था सम्राट का कि महात्यागी गुरु ! यह कैसा त्यागी ? अब लेकिन कह भी कुछ नहीं सकता, अपने हाथ से ही फंस गया, बुला लाया । उसको अच्छे से अच्छे कमरे में रखा, जो श्रेष्ठतम, सुंदरतम महल का हिस्सा था । वह वहीं रहने लगा । वह जैसे वृक्ष के नीचे बैठा रहा था, वह सुंदर महल में बैठा रहने लगा ।
कुछ दिन बाद सम्राट की बेचैनी बढ़ने लगी । उसने कहा, यह तो बात अजीब हो गई । छह महीने बीत जाने पर उसने कहा कि महाराज एक प्रश्न उठता रहा है. ।
फकीर ने कहा, इतनी देर क्यों की ? प्रश्न तो उसी दिन उठ गया था जब मैंने कहा, घोड़ा ले आओ !
सम्राट डरा । उसने कहा कि आपको पता है ?
'पता कैसे नहीं होगा ? क्योंकि तत्क्षण तुम्हारा चेहरा बदल गया था । उसी क्षण मेरा तुमसे संबंध छूट गया, जब मैंने घोड़े से संबंध जोड़ा । उसी क्षण मैं कोई त्यागी नहीं रहा तुम्हारे लिए । बोलो, छह महीने क्यों रुके ? इतनी देर क्यों तकलीफ सही ? मुझे पता है कि तुम बेचैन हो रहे । क्या है ?'
कहा, 'इतना-सा पूछना है कि अब तो मुझमें और आपमें कुछ भी अंतर नहीं है । अब तो ठीक आप भी मेरे जैसे हैं-महल में रहते हैं, सुख-सुविधा, नौकर-चाकर, अच्छा खाना-पीना ! भेद तो तब था, जब आप बैठे थे वृक्ष के नीचे-आप फकीर थे, त्यागी थे, महात्मा थे, मैं राजा था, भोगी था । अब क्या भेद है ?'
उस फकीर ने कहा, जानना चाहते हो भेद, तो गांव के बाहर चलो ।
राजा ने कहा, ठीक ।
दोनों गांव के बाहर गए । फकीर ने कहा, थोड़ी दूर और चलें ।
दोपहर हो गई । सम्राट ने कहा, अब बता भी दें, बताना है तो कहीं भी बता दें, अब आधा जंगल आ गया यह ।
नहीं, उसने कहा कि थोड़ी दूर और । सूरज अस्त होते ही समझा दूंगा ।
सूरज अस्त होने लगा । सम्राट ने कहा, अब... अब बोलें !
उसने कहा कि इतना ही समझाना है कि अब मैं वापिस नहीं जा रहा । तुम जाते हो कि चलते हो ? सम्राट ने कहा, मैं कैसे चल सकता हूं आपके साथ ? महल है, पत्नी है, बच्चे हैं, सारी व्यवस्था.. । मैं कैसे चल सकता हूं ?
फकीर ने कहा, लेकिन मैं जा रहा हूं । फर्क समझ में आया ?
सम्राट उसके पैर पर गिर पड़ा । उसने कहा कि नहीं, मुझे छोड़े मत, मुझसे बड़ी भूल हो गई । उसने कहा, मैं तो अभी फिर घोड़े पर बैठने को तैयार हूं । लेकिन तुम फिर मुश्किल में पड़ जाओगे ।
अपने शब्दों के साथ सावधान रहे; एक बार वो कह दिए जाएं तो उन्हें सिर्फ माफ़ किया जा सकता है भुलाया नहीं जा सकता ।
महाराष्ट्र की बड़ी प्राचीन कथा है राका-बांका की । राका ठीक वैसा ही रहा होगा, जिसका संन्यास परिग्रह के विपरीत निकला । तो वह लकड़ियां काटता, बेचता, उससे जो मिल जाता उससे भोजन कर लेता । सांझ जो बचता वह बांट देता, रात घर में न रखता । परम त्यागी । लेकिन एक बार बेमौसम वर्षा हो गई । तीन चार दिन वर्षा होती रही । जंगल न जा सका । भूखे रहना पड़ा । उसकी पत्नी बांका, वे दोनों भूखे रहे । चौथे दिन गए जंगल, लकड़ियां काट कर आता था सका आगे-आगे लकड़ियां लिए, पीछे पत्नी भी लकड़ियां ढो रही है । देखा, राह के किनारे एक अशर्फियों से भरी थैली पड़ी है । जल्दी से लकड़ियां नीचे पटकीं, थैली को गड्डे में डाला, ऊपर से मिट्टी डाल दी ।
जब वह मिट्टी डाल ही रहा था, डालने को चुक ही रहा था काम पूरा करके कि उसकी पत्नी आ गई । उसने पूछा क्या करते हो? तो कसम तो खाई थी सच बोलने की । झूठ बोल नहीं सकता था । तो उसने कहा, बड़ी मुश्किल हो गई । यह आचरण ऊपर से आरोपित होता तो ऐसी मुश्किल न आती । कसम खाई थी सत्य बोलने की तो असत्य तो बोल नहीं सकता । तो कहा कि अब सुन । मैं चलता था तो देखा अशर्फियां पड़ी हैं । किसी राहगीर की गिर गई होंगी । उनको गड्डे में डाल कर मिट्टी डाल रहा था कि कहीं तू है-तू ठहरी स्त्री! कहीं तेरा मन लुभायमान न हो जाए । फिर तीन दिन के भूखे हैं हम । कहीं मन में भाव न आ जाए कि उठा लें । तुझे बचाने के लिए इनको डाल दिया गड्डे में, मिट्टी ऊपर से फेंक दी ।
कहते हैं, बांका हंसने लगी । उसी दिन से उसका नाम बांका हुआ । बांकी औरत रही होगी । हंसने लगी, खूब हंसने लगी । राका बड़ा हैरान हुआ । उसने कहा, बात क्या है? हंसती क्यों हो?
उसने कहा, मैं इसलिए हंसती हूं कि तुम मिट्टी पर मिट्टी डालते हो । मिट्टी पर मिट्टी डालते तुम्हें शर्म नहीं आती?
अब ये दो दृष्टिकोण हैं । एक है त्यागी । उसका त्याग भी परिग्रह-केंद्रित है । अभी सोना दिखाई पड़ता है । लाख कहे कि सोना मिट्टी है मगर अभी सोना दिखाई पड़ता है । मिट्टी कहता ही इसलिए है ताकि जो दिखाई पड़ता है उसको झुठला दे । अभी सोना पुकारता है । अभी सोना बुलाता है । अभी सोने में निमंत्रण है । मिट्टी कह-कह कर समझाता है अपने को कि मिट्टी है, कहां चले? मत जाओ, बिलकुल मत जाओ, मिट्टी है । मगर सोना अभी सोना है ।
यह जो बांका ने कहा, यह परम त्याग है । यह ठीक संन्यास है ।
सांसारिक आदमी-- जो दुख में है, और सुख खोजता है । संन्यासी -- जो समझ गया कि दुख से बचने और सुख को खोजने में ही दुख है । सिद्ध -- जो पहुंच गया उस जगह, जहां सुख और दुख के पार हो गया ।
एक बार शैतान का मन ऊब गया । उसने संन्यास लेने का निश्चय कर लिया । तब उसने अपने गुलामों को बेचना शुरूकर दिया : बुराई, झूठ, ईर्ष्या, निरुत्साह, दर्प, हिंसा, परिग्रह आदि-आदि । सब पर तख्तियां लगा दीं । खरीददार तो सदा से मौजूद हैं । शैतान की दुकान पर कब ऐसा हुआ कि भीड़ न रही हो । परमात्मा के मंदिर खाली पड़े रहते हैं । शैतान की दुकान पर तो सदा भीड़ होती है, भारी भीड़ होती । जमघट होता है । क्यू लगे रहते हैं ।
और जब यह लोगों को पता चला कि शैतान अपने विश्वस्त गुलामों को भी बेच रहा है तो सभी पहुंच गए । राजनेता पहुंचे, धनपति पहुंचे । सभी तरह के उपद्रवी पहुंच गए । क्योंकि शैतान के सुशिक्षित सेवक मिल जाएं तो फिर क्या? फिर तो दुनिया फतह! एक के बाद एक गुलाम बिकने लगे । शैतान के भक्त आते गए और अपनी- अपनी पहचान, अपनी-अपनी पसंद का गुलाम खरीदते गए । पर एक बहुत ही भोंडी और कुरूप औरत खड़ी थी जिसे कोई पहचान ही नहीं पा रहा था कि यह कौन है? और कठिनाई और भी थी कि उसके गले में जो तख्ती लगी थी, सबसे ज्यादा कीमत की थी ।
अंतत: एक आदमी ने पूछा कि महानुभाव, बड़ा आश्चर्य है, इस स्त्री को हम पहचान नहीं पा रहे हैं । यह कौन है आपकी सेविका? और ऐसी कुरूप और ऐसी भोंडी कि इसे देख कर ही जी मिचलाता । और सबसे ज्यादा कीमत लगा रखी है । बात क्या है? कोई खरीददार गया भी नहीं इसके पास । यह देवी कौन है? इसके संबंध में कुछ बता दें । शैतान से उस ग्राहक ने पूछा ।
शैतान ने कहा, ओह, यह? यह मेरी सबसे प्रिय और वफादार गुलाम है । मैं इसके सहारे बड़ी आसानी से लोगों को अपने शिकंजे में कस लेता हूं । क्यों, पहचाना नहीं इसे? बहुत कम लोग इसे पहचानते हैं इसीलिए तो इसके द्वारा धोखा देना आसान होता है । इसे कोई पहचानता नहीं मगर यह मेरा दाहिना हाथ है ।
फिर शैतान अट्टहास कर उठा और बोला, महत्वाकांक्षा है यह । महत्वाकांक्षा! एंबीशन! यह सबसे भोंडी और सबसे कुरूप मेरी सेविका है, लेकिन सबसे कुशल । आदमी जीता महत्वाकांक्षा में । यह पा लूं यह मिल जाए, और मिल जाए, और ज्यादा मिल जाए । तुम उसी महत्वाकांक्षा को धर्म की दिशा में मत फैलाओ ।
संन्यास सत्य को पाने की महत्वाकांक्षा नहीं है, संन्यास महत्वाकांक्षा का त्याग है ।
रामतीर्थ अमेरिका से वापस लौटे, टेहरी गढ़वाल में मेहमान थे। उनकी पत्नी मिलने आई। खिड़की से देखा पत्नी को आते हुए, तो खिड़की बंद करके द्वार बंद कर लिया। एक मित्र साथ ठहरे हुए थे, सरदार पूर्ण सिंह। उन्होंने कहा, दरवाजा क्यों बंद करते हैं? क्योंकि मैंने आपको किसी भी स्त्री के लिए कभी दरवाजा बंद करते नहीं देखा! पूर्ण सिंह जानते हैं कि जो आ रही है, उनकी पत्नी है--या थी। रामतीर्थ ने कहा, वह मेरी कोई भी नहीं है। पर पूर्ण सिंह ने कहा कि और भी जो स्त्रियां आती हैं, वे भी आपकी कोई नहीं हैं। लेकिन उन और कोई नहीं स्त्रियों के लिए कभी द्वार बंद नहीं किया! नहीं, यह स्त्री जरूर आपकी कोई है--विशेष आयोजन करते हैं, द्वार बंद करते हैं! रामतीर्थ ने कहा, वह मेरी पत्नी थी; लेकिन मेरी कोई पत्नी नहीं है। पूर्ण सिंह ने कहा, अगर वह पत्नी नहीं है, तो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा किसी भी स्त्री के साथ करते हैं। द्वार खोलें!
यह व्यवहार विशेष है; यह विपरीत राग का व्यवहार है। एक भ्रम था कि मेरी पत्नी है, अब एक भ्रम है कि मेरी पत्नी नहीं है। लेकिन अगर पहला भ्रम गलत था, तो दूसरा भ्रम सही कैसे हो सकता है? वह पहले पर ही खड़ा है; वह पहले का ही विस्तार है।
पहला भ्रम तो हमारी समझ में आ जाता है। दूसरा भ्रम विरागी का भ्रम है--संन्यासी का, त्यागी का--वह जरा हमारी समझ में मुश्किल से आता है। लेकिन साफ है बात कि यह पत्नी विशेष है, यह साधारण नहीं है। इस स्त्री के प्रति रामतीर्थ की कोई दृष्टि है। किसी दिन रामतीर्थ ने इस स्त्री के लिए उठकर द्वार खोला होता, अब उठकर द्वार बंद कर रहे हैं। लेकिन इस स्त्री के लिए उठते जरूर हैं। किसी दिन द्वार खोलने उठे होते, अपनी पत्नी है; आज द्वार बंद करने उठे हैं, अपनी पत्नी नहीं है। लेकिन द्वार तक रामतीर्थ को उठना पड़ता है; वैराग्य नहीं है।
पूर्ण सिंह ने कहा कि अगर आप द्वार नहीं खोलते हैं, तो मैं नमस्कार करता हूं। मेरे लिए आपका सब ब्रह्मज्ञान व्यर्थ हो गया। मैं जाता हूं। यह कैसा ब्रह्मज्ञान है! क्योंकि किसी स्त्री से आपने नहीं कहा अब तक रुकने के लिए। सभी स्त्रियों में ब्रह्म दिखाई पड़ा। आज इस स्त्री में कौन-सा कसूर हो गया है कि ब्रह्म नहीं है!
रामतीर्थ को भी चुभी बात; खयाल में पड़ी। द्वार तो खोल दिया। लेकिन विचारशील व्यक्ति थे। यह तो दिखाई पड़ गया कि वैराग्य फलित नहीं हुआ है। क्योंकि वैराग्य का अर्थ ही यह है कि जहां न राग रहा हो, न विराग रहा हो। वैराग्य भी न रहा हो, वहीं वैराग्य है। मोह की निशा पूरी ही खो गई हो। मेरा खो गया हो, मेरा नहीं है, यह भी खो गया हो। जहां वैराग्य भी नहीं है, वहीं वैराग्य है।
रामतीर्थ को भी दिखाई तो पड़ गया। समझ में तो आ गया। उसी दिन उन्होंने गेरुए वस्त्र छोड़ दिए। यह जानकर आपको हैरानी होगी कि रामतीर्थ ने जिस दिन जल-समाधि ली, उस दिन वे गेरुए वस्त्र नहीं पहने हुए थे। उस दिन उन्होंने साधारण वस्त्र पहन लिए थे। क्योंकि यह उनको भी यह साफ हो गया था कि यह वैराग्य नहीं है।
कर्म योग एक बहुत ही बड़ा रहस्य है ।
जेम्स थरबर की एक बहुत प्रसिद्ध कथा है कि सांपों के देश में एक बार एक शांतिप्रिय नेवला पैदा हो गया। नेवलों ने तत्क्षण उसे शिक्षा देनी शुरू की कि सांप हमारे दुश्मन हैं। पर उस नेवले ने कहा, 'क्यों? मेरा उन्होंने अब तक कुछ भी नहीं बिगाड़ा।' पुराने नेवलों ने कहा, 'नासमझ, तेरा न बिगाड़ा हो, लेकिन वे सदा से हमारे दुश्मन हैं। उनसे हमारा विरोध जातिगत है।' पर उस शांतिप्रिय नेवले ने कहा, 'जब मेरा उन्होंने कुछ नहीं बिगाड़ा तो मैं क्यों उनसे शत्रुता पालूं।'
खबर फैल गई नेवलों में कि एक गलत नेवला पैदा हो गया है, जो सांपों का मित्र और नेवलों का दुश्मन है। नेवले के बाप ने कहा, 'यह लड़का पागल है।' नेवले की मां ने कहा, 'यह लड़का बीमार है।' नेवले के भाइयों ने कहा, 'यह लड़का, यह हमारा भाई बुजदिल है।' समझाया बहुत उसे कि यह हमारा फर्ज है, राष्ट्रीय कर्तव्य है, कि हम सांपों को मारें। हम इसीलिए हैं। इस पृथ्वी को सांपों से खाली कर देना है, क्योंकि उन के कारण ही सारी बुराई है। सांप ही शैतान हैं। उस शांतिप्रिय नेवले ने कहा, 'मैं तो इसमें कोई फर्क नहीं देखता। सांपों को भी मैं देखता हूं, मुझे उन में कोई शैतान नहीं दिखाई पड़ता। उनमें भी संत हैं और शैतान हैं, जैसे हम में भी संत और शैतान हैं।'
खबर फैल गई कि वह नेवला वस्तुतः सांप ही है। सांपों की तरह रेंगता है। और उससे सावधान रहना। क्योंकि शक्ल उसकी नेवले की है और आत्मा सांप की है। बड़े-बूढ़े इकट्ठे हुए, पंचायत की और उन्होंने आखिरी बार कोशिश की नेवले को समझाने की कि 'तू पागलपन मत कर।' उस नेवले ने कहा, 'लेकिन सोचना-समझना तो जरूरी है।' एक नेवला भीड़ में से बोला, 'सोचना-समझना गद्दारी है।' दूसरे नेवले ने कहा, 'सोचना-समझना दुश्मनों का काम है।'
फिर जब वे उसे न समझा पाये तो उस नेवले को उन्होंने फांसी दे दी। जेम्स थरबर ने अंतिम वचन इस कहानी में लिखा है, कि यह शिक्षा मिलती है कि अगर तुम अपने दुश्मनों के हाथ न मारे गये, तो अपने मित्रों के हाथ मारे जाओगे। मारे तुम जरूर जाओगे।
कबीर - सिंहों के नहीं लेहड़े, संतों की नहीं जमात।
दो फकीरों में बड़ा विवाद था। विवाद एक छोटी-सी बात को लेकर था कि एक फकीर कुछ पैसे पास रखता था, और एक फकीर कुछ भी पैसे पास नहीं रखता था। जो पास पैसे नहीं रखता था, वह कहता था, छोड़ने में आनंद है, पकड़ने में दुख है। जो पास पैसे रखता था, वह कहता था कि थोड़ा तो पकड़ना ही पड़े, नहीं तो बड़ा दुख होता है।
फिर वे एक नदी के किनारे पहुंचे। सांझ ढल गई, माझी नाव छोड़ने को था, उसने पैसे मांगे। इस तरफ रुकना खतरनाक था, जंगली जानवरों का डर था, उस तरफ जाना जरूरी था। तो जिसके पास पैसे थे, और जो पैसे का आग्रही था, उसने कहा, अब बोलो; के गीता अब तुम्हारा त्याग चलाओ! अब तुम्हारे पास जो त्याग की संपदा है, उसका उपयोग करो, हमें उस तरफ जाना है। पैसे मेरे पास हैं, अगर तुमसे कुछ न बन पड़े, तो मैं पैसे देता हूं, हम उस तरफ हो जाते हैं।
फकीर मुस्कुराता रहा, वह जो त्याग का पक्षपाती था। फिर जिसके पास पैसे थे, उसने पैसे दिए, वे नदी पार किए। नदी पार करके जिसके पास पैसे थे, उसने कहा, अब बोलो!
उस पहले फकीर ने कहा, लेकिन त्याग से ही हम पार हुए। तुम पैसे छोड़ सके, तुम पैसे दे सके, इसीलिए हम पार हुए हैं। पैसे होने से हम पार नहीं हुए हैं, पैसा छोड़ने से ही पार हुए हैं। और अगर मैं पार नहीं हो रहा था, तो उसका कारण यह नहीं था कि मेरा त्याग बाधा था, मेरे पास और त्याग की सुविधा न थी, और छोड़ने को नहीं था; बस। तकलीफ मेरे त्याग की नहीं थी, त्याग मेरा कम पड़ रहा था, और मेरे पास छोड़ने को नहीं था, थोड़ा और त्याग करने की जरूरत थी। तुम कर सके। लेकिन सही मैं ही हूं। हम छोड़ने से इस पार आए।
निर्धन का दुख निर्धनता नहीं, दुख यही है कि पकड़ने को कुछ भी नहीं है, हाथ खाली है। धनी का दुख यह है कि हाथ भर गए हैं, छोड़ने की हिम्मत नहीं है।
द्वंद्व
कथा :
एक मुसलमान मौलवी मरने के करीब था । गांव में कोई और पढ़ा-लिखा आदमी नहीं था, तो मुल्ला नसरुद्दीन को ही बुला लिया कि वह मरते वक्त मरते आदमी को कुरान पढ़ कर सुना दे । मुल्ला ने कहा, कुरान इत्यादि छोड़ो । अब इस आखिरी घड़ी में मैं तो तुमसे सिर्फ एक बात कहता हूं इस प्रार्थना को मेरे साथ दोहराओ ।
और मुल्ला ने कहा -- कहो मेरे साथ कि हे प्रभु और हे शैतान, तुम दोनों को धन्यवाद ! मेरा खयाल रखना ।
उस मौलवी ने आंखें खोलीं । मर तो रहा था, लेकिन अभी एकदम होश नहीं खो गया था । उसने कहा, तुम होश में तो हो ? तुम क्या कह रहे हो -- हे प्रभु, हे शैतान !!
मुल्ला ने कहा, अब इस आखिरी वक्त में खतरा मोल लेना ठीक नहीं । पता नहीं कौन असली में मालिक हो ! तुम दोनों को ही याद कर लो । और फिर पता नहीं तुम कहां जाओ -- नर्क जाओ कि स्वर्ग जाओ ! नर्क गए तो शैतान नाराज़ रहेगा कि तुमने ईश्वर को ही याद किया, मुझे याद नहीं किया । स्वर्ग गए तब तो ठीक । लेकिन पक्का कहाँ है ? और ऐसी घड़ी में कोई भी खतरा मोल लेना ठीक नहीं । जोखिम मोल लेना ठीक नहीं; तुम दोनों को ही खुश कर लो । राजनीति से काम लो थोड़ा । तो जिनको तुम मंदिरों में प्रार्थना करते देखते हो, वे राजनीति से काम ले रहे हैं थोड़ा । इस जगत को भी सम्हाल रहे हैं; मौत के बाद कुछ होगा तो उसको भी सम्हाल रहे हैं । नहीं हुआ तो कुछ हर्ज नहीं; लेकिन अगर हुआ.. ।
हमारे भीतर जो है, वही हमें बाहर दिखाई पड़ने लगता है। भीतर अगर द्वंद्व है, तो बाहर भी द्वंद्व दिखाई पड़ने लगता है।
एक रात एक फकीर के घर में एक चोर घुस गया। आधी रात थी। सोचा, सो गया होगा फकीर। भीतर गया,तो हैरान हुआ। मिट्टी का छोटा-सा दीया जलाकर फकीर कुछ चिट्ठी-पत्री लिखता था। घबड़ा गया चोर। छुरा बाहर निकाल लिया। फकीर ने ऊपर देखा और कहा कि छुरा भीतर रखो। शायद ही कोई जरूरत पड़े। फिर कहा कि थोड़ा बैठ जाओ, मैं चिट्ठी पूरी कर लूं, फिर तुम्हारा क्या काम है, उस पर ध्यान दूं। ऐसी बात, कि चोर भी घबड़ाकर बैठ गया!
चिट्ठी पूरी की। फकीर ने पूछा, कैसे आए? सच-सच बता दो। ज्यादा बातचीत में समय खराब मत करना; अब मेरे सोने का वक्त हुआ। उस चोर ने कहा, अजीब हैं आदमी आप! देखते नहीं, छुरा हाथ में लिए हूं। आधी रात आया हूं। काले पकड़े पहने हूं। चोरी करने आया हूं! फकीर ने कहा, ठीक। लेकिन गलत जगह चुनी। और अगर यहां चोरी करने आना था, तो भलेमानस,पहले खबर भी तो कर देते; हम कुछ इंतजाम करते। यहां चुराओगे क्या? मुश्किल में डाल दिया मुझे आधी रात आकर। और इतनी दूर आ गए, खाली हाथ जाओगे, यह भी तो बदनामी होगी। और पहला ही मौका है कि मेरे घर भी किसी चोर ने ध्यान दिया। आज हमको भी लगा कि हम भी कुछ हैं। कभी कोई आता ही नहीं इस तरफ। तो ठहरो, मैं जरा खोजूं। कभी-कभी कोई-कोई कुछ भेंट कर जाता है। कहीं कुछ पड़ा हो, तो मिल जाए।
दस रुपए कहीं मिल गए। उस फकीर ने उसको दिए और कहा कि यह तुम ले जाओ। रात बाहर बहुत सर्द है। अपने शरीर पर जो कंबल था, वह भी उसे दे दिया। वह चोर बहुत घबड़ाया! उसने कहा, आप बिलकुल नग्न हो गए! रात सर्द है। फकीर ने कहा, मैं तो झोपड़े के भीतर हूं। लेकिन तुझे तो दो मील रास्ता भी पार करना पड़ेगा। और रुपयों से तो कपड़े अभी मिल नहीं सकते। रुपयों से तन ढंक नहीं सकता। तो यह कंबल ले जा! फिर मैं तो भीतर हूं। और फिर कब! इस गरीब की झोपड़ी पर कोई कभी चोरी करने आया नहीं। तूने हमें अमीर होने का सौभाग्य दिया। अब हम भी कह सकते हैं किसी से कि हमारे घर भी चोरों का ध्यान है! तू जा। मजे से जा। हम बड़े खुश हैं!
चोर चला गया। फकीर अपनी खिड़की पर बैठा हुआ उसे देखता रहा। ऊपर आकाश में चांद निकला है पूर्णिमा का। आधी रात। चारों तरफ चांदनी बरस रही है। उस रात उस फकीर ने एक गीत लिखा और उस गीत की पंक्तियां बड़ी अदभुत हैं। उस गीत में उसने लिखा कि चांद बहुत प्यारा है! बेचारा गरीब चोर! अगर मैं यह चांद भी उसे भेंट कर सकता! लेकिन अपनी सामर्थ्य के बाहर है। यह चांद भी काश, मैं उस चोर को भेंट कर सकता! बेचारा गरीब चोर! लेकिन अपनी सामर्थ्य के बाहर है।
फिर वह चोर पकड़ा गया--कभी, कुछ महीनों बाद। अदालत ने इस फकीर को भी पूछा बुलाकर कि इसने चोरी की? फकीर ने कहा कि नहीं। क्योंकि जब मैंने इसे दस रुपए भेंट किए, तो इसने धन्यवाद दिया। और जब मैंने इसे कंबल दिया, तो इसने मुझे बहुत मनाया कि आप ही रखिए; रात बहुत सर्द है। यह आदमी बहुत भला है। वह तो मैंने ही इसे मजबूर किया, तब बामुश्किल, बड़े संकोच में यह कंबल ले गया था।
फिर उसको दो साल की सजा हो गई। कुछ और चोरियां भी थीं। फिर सजा के बाद छूटा, तो सीधा भागा हुआ उस फकीर के चरणों में आया। उसके चरणों में गिर पड़ा कि तुम पहले आदमी हो, जिसने मुझसे आदमी की तरह व्यवहार किया। अब मैं तुम्हारे चरणों में हूं। अब तुम मुझे आदमी बनाओ। तुमने व्यवहार मुझसे पहले कर दिया आदमी जैसा, अब मुझे आदमी बनाओ भी। उस फकीर ने कहा, और मैं कर भी क्या सकता था?
जो हमारे भीतर होता है, वही दिखाई पड़ता है।
अगर फकीर के भीतर जरा भी चोर होता, तो वह पुलिस वाले को चिल्लाता। पास-पड़ोस में चिल्लाहट मचा देता कि चोर घुस गया। लेकिन फकीर के भीतर अब कोई चोर नहीं है। तो मकान में चोर भी आ जाए, तो भी चोर नहीं मालूम पड़ता, दुश्मन नहीं मालूम पड़ता; मित्र ही मालूम पड़ता है।
समभाव का अर्थ है, भावना । अभी घटना घटी नहीं है, तुम चेष्टा कर रहे हो । तुम प्रयास कर रहे हो, साध रहे हो । समदर्शी का अर्थ है: घटना घट गई । अब तुम्हें दिखाई पड़ने लगा ।
मार्कट्वेन एक बार एक चर्च में गया । वह जो चर्च का पुरोहित था, बोल रहा था । वाणी उसकी मधुर थी, शब्द उसके प्यारे थे, बड़ा काव्य था, और धर्म की बड़ी सरल उसकी व्याख्या थी । मार्कट्वेन बड़ा प्रभावित हो गया । उसने खीसे में हाथ डालकर सोचा कि दस डालर दान कर दूं । डालर खीसे में थे । लेकिन दस मिनट व्याख्यान और आगे चला, तो मार्कट्वेन ने सोचा, दस भी देने की क्या जरूरत है, पांच से भी काम चल सकता है और फिर अभी किसी को बताया भी तो नहीं है कि दस देना है, तो कोई अपराध भी नहीं कर रहे हैं । पांच से ही काम चल जाएगा । और व्याख्यान लंबा चला, तो ढ़ाई-दो पर उतरता गया मार्कट्वेन । और उसने लिखा है, जब मेरे सामने बर्तन आया दान का, तो मेरी तबीयत हुई कि एकाध-दो डालर इसमें से उठा लूं । तब तक मैं वहां पहुंच चुका था । किसी तरह अपने को रोक कर भागा कि कहीं उठा ही न लूं! देने की तो बात ही खतम हो गई ।
वह जो आपके भीतर जब भी शुभ करने का कुछ होता है, तो एक विपरीत शक्ति बोलती है । जब अशुभ करने का होता है, तब भी एक विपरीत शक्ति बोलती है । ये दो आपके भीतर आवाजें हैं । इन आवाजों को जो ठीक से पहचानने लगता है, उसे अपने भीतर का द्वंद्व और युद्ध-क्षेत्र स्पष्ट हो जाता है । और जैसे ही व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़ता है, अनुभव करता है कि मैं शरीर नहीं हूं, वैसे ही यह युद्ध स्पष्ट होता है । तब एक नए तल पर उसे दिखाई पड़ता है कि मेरा होना ही दो में विभाजन है । कुछ है मेरे भीतर जो नीचे की तरफ जा रहा है, और कुछ है मेरे भीतर जो ऊपर की तरफ जा रहा है । और उन दोनों के खिंचाव के मध्य में 'मैं' हूं । और उन दोनों के खिंचाव की वजह से मेरा संताप है; मेरी चिंता, दुख, पीड़ा ।
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद ।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद ॥
कबीर -- तू झूठे सुख को सुख कहकर मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।
हुआंग पो के सामने एक युवक आया है और कह रहा है कि मैं शांत हो गया हूं । हुआंग पो पूछता है -- अगर तुम शांत हो गए हो, तो तुम यहां किसलिए आए हो? जाओ! क्योंकि मैं तो सिर्फ अशांत लोगों का इलाज करता हूं । युवक न तो जा सकता है, क्योंकि देखता है, हुआंग पो किसी और ही ढंग से शांत मालूम होता है । कहता है -- नहीं, कुछ दिन तो रुकने की आज्ञा दें ।
हुआंग पो कहता है -- शांत लोगों के लिए रुकने की कोई भी आज्ञा नहीं है । जरा सोच कर बाहर से फिर आओ । अशांत तो नहीं हो? क्योंकि मैं नहीं सोचता हूं, कि तुम दो सौ मील पैदल चल कर मुझे बताने सिर्फ यह आओगे कि मैं शांत हूं । और अगर इसके लिए आए हो, तो बात खतम हो गई । धन्यवाद! परमात्मा करे कि तुम सच में ही शांत होओ । लेकिन एक दफा बाहर जाकर फिर सोच आओ ।
युवक बाहर जाता है । और तभी हुआंग पो कहता है -- अब बाहर जाने की कोई जरूरत नहीं, लौट आओ । क्योंकि अगर अभी इतनी भी अशांति बाकी है कि सोचना है कि शांत हूं या नहीं, वापस आ जाओ । तुम्हारी झिझक ने सब कुछ कह दिया है । तुम सोचने जा रहे हो बाहर कि मैं शांत हूं या नहीं, यह काफी अशांति है । रुको! जहां भी चुनाव है, वहीं अशांति है । अभी तुम चुनने जा रहे हो कि शांत हूं कि अशांत हूं? तुम पर्याप्त अशांत हो । बैठो! मैं तुम्हारे काम पड़ सकता हूं । लेकिन तभी, जब तुम अपने मन की धोखे देने की कुशलता को समझ जाओ ।
कनफ्यूशियस गुजरता है बगीचे के पास से । देखता है, नब्बे साल का बूढ़ा, अपने तीस साल के जवान बेटे को, दोनों जुते हैं, पसीने से तरबतर हो रहे हैं, पानी खींच रहे हैं । कनफ्यूशियस को दया आई । उसने कहा, पागल, तुम्हें पता नहीं मालूम होता है । बूढ़े के पास जाकर उसने कहा कि तुम्हें पता है कि अब तो शहरों में हमने घोड़ों से या बैलों से पानी खींचना शुरू कर दिया है! तुम क्यों जुते हुए हो इसके भीतर?
उस बूढ़े ने कहा, जरा धीरे कहो, मेरा जवान बेटा न सुन ले । कनफ्यूशियस बहुत हैरान हुआ । उसने कहा, जरा थोड़ी देर से आना, जब मेरा बेटा घर भोजन करने चला जाए ।
जब बेटा चला गया, कनफ्यूशियस वापस आया और उसने कहा, तुमने बेटे को क्यों न सुनने दिया?
उस बूढ़े ने कहा कि मैं नब्बे साल का हूं और अभी तीस साल के जवान से लड़ सकता हूं । लेकिन अगर मैं अपने बेटे को घोड़े जुतवा दूं, तो नब्बे साल की उम्र में मेरे जैसा स्वास्थ्य उसके पास फिर नहीं होगा । घोड़ों के पास होगा, मेरे बेटे के पास नहीं होगा । यह बात तुम मत कहो । मेरा बेटा सुन ले तो उसका जीवन नष्ट हो जाए । हमें पता चल गया है, हमें पता चल गया है कि शहरों में घोड़े जुतने लगे हैं । और हमें यह भी पता चल गया है कि मशीनें भी बन गई हैं जो पानी को कुएं से खींच लें । और हमारा बेटा चाहेगा कि मशीनों से खींच ले । लेकिन जब मशीनें कुएं से पानी खींचेंगी, तो बेटा क्या करेगा? उसके शरीर का क्या होगा? उसके स्वास्थ्य का क्या होगा?
हम एक तरफ जो करते हैं, तत्काल उसका दूसरी तरफ परिणाम होता है ।
हेनरी फोर्ड ने अपना पूरा मकान एयरकंडीशंड किया । उसका पोर्च भी air-conditioned है । कार भीतर आती है, तो दरवाजा automatic खुलता है; कार बाहर जाती है, तो automatic बंद हो जाता है । Air-conditioned कार है । उसमें बैठ कर वह अपने दफ्तर के air-conditioned पोर्च में उतरता है, फिर अपने air-conditioned दफ्तर में चला जाता है । फिर उसको पच्चीस बीमारियां आनी शुरू होती हैं । फिर चिकित्सक उससे कहते हैं कि तुम दो घंटे गर्म पानी के टब में बैठे रहो । फिर वह दो घंटे गर्म पानी के टब में बैठ कर पसीना निकलवाता है ।
फिर उसको खयाल आता है कि यह मैं क्या कर रहा हूं? air-conditioned करके सारी व्यवस्था मैं पसीने को रोक रहा हूं । फिर पसीने को रोक कर, दो घंटे टब में बैठ कर पसीने को निकाल रहा हूं । फिर पसीना ज्यादा निकल गया, गर्मी मालूम पड़ती है, इसलिए air-conditioned में बैठ कर अपने को ठंडा कर रहा हूं । फिर ज्यादा ठंडा हो गया, फिर पसीना नहीं निकला, बीमार पड़ता हूं, तो फिर...यह मैं कर क्या रहा हूं?
करीब-करीब, संघर्ष की जो भाषा है, वह ऐसे ही द्वंद्व में डाल देती है ।
पश्चिम के विज्ञान के चिंतन ने करीब-करीब ऐसी हालत पैदा कर दी है । हर चीज से लड़ना है, सब चीज से भयभीत होना है । क्योंकि जब लड़ना है, तो भयभीत होगे । और जब लड़ना है, तो हर एक के विपरीत सुरक्षा का आयोजन करना है । हिटलर ने शादी नहीं की इसीलिए, कि शादी कर ले, तो कम से कम एक स्त्री तो कमरे में सोने की हकदार हो जाएगी । और रात वह गर्दन दबा दे!
बायजीद -- जिन-जिन को मैंने धनुर्विद्या सिखाई, उनका आखिरी निशाना मैं ही बना ।
टाल्सटाय ने अपना एक संस्मरण लिखा है। एक दिन सुबह-सुबह जल्दी नींद खुल गई। और टाल्सटाय चल पड़ा चर्च की ओर। पहुंच गया। पांच बजे थे, कुहासा छाया था मास्को नगर में। चारों तरफ अंधेरा था। सूरज के उगने में घंटों की देर थी। चर्च के भीतर गया। आवाज सुनाई पड़ी। आवाज कुछ पहचानी मालूम पड़ी, तो चुपचाप धीरे-धीरे भीतर गया। कोई प्रायश्चित्त कर रहा है, कोई रिपेंटेंस कर रहा है। आवाज पहचानी हुई लगी कि कोई परिचित है।
टाल्सटाय शाही घराने का आदमी था; खुद काउंट था। कौन होगा? धीरे-धीरे सरककर पीछे पहुंचा। देखा, गांव का, मास्को का सबसे बड़ा धनपति खड़ा हुआ परमात्मा से कह रहा है अंधेरे में कि हे प्रभु, मैंने बहुत पाप किए। मैं चोर हूं, बेईमान हूं, बुरा हूं। मुझसे बुरा कोई भी नहीं है! टाल्सटाय ने कहा, अरे, यह आदमी इतना बुरा! क्योंकि इसको तो हम सोचते थे, बहुत अच्छा है। इसको तो गांव में लोग धर्मवीर कहते हैं। मंदिर बनाता, चर्च बनाता। यह चर्च भी उसका ही बनाया हुआ है। और यह आदमी पापी और सबसे बुरा।
स्वभावतः, टाल्सटाय को लगा, भागूं और जाकर बाजार में खबर करूं कि हम बड़ी भूल में पड़े हैं। पर कहा, थोड़ा रुक जाऊं, इससे मिलकर जाऊं।
उस आदमी की प्रार्थना पूरी हुई। सुबह की किरणें फूटने लगीं। उस आदमी ने पीछे लौटकर देखा; देखा, लिओ टाल्सटाय! घबड़ाया। और उसने कहा, देखो महाशय, जो कुछ सुना है, उसे तत्काल भूल जाओ। वह मैंने कहा ही नहीं। टाल्सटाय ने कहा, आप क्या कह रहे हैं? अगर आपने नहीं कहा, तो किस चीज को भूलने के लिए कह रहे हैं! उसने कहा, ठीक से समझ लो। ये शब्द जो मैंने यहां कहे, भूल जाओ। समझो कि मैंने कहे ही नहीं। और अगर कहीं इन शब्दों को मैंने सुना कि तुमने किसी को बताया, तो अदालत में मानहानि का मुकदमा चलाऊंगा। टाल्सटाय ने कहा, गजब कर रहे हैं आप! अभी आप कह रहे थे कि मुझसे बड़ा पापी और कोई भी नहीं!
टाल्सटाय को पता नहीं, पेंडुलम घूम गया। गया! बात खतम हो गई। वह आदमी मुकदमा चलाने को उत्सुक है; अभी प्रायश्चित्त करने को उत्सुक था! क्या हो रहा है?
आत्मा के प्रवेश की जो पतली-सी द्वार-रेखा है, डोर लाइन; दरवाजा तो बहुत बड़ा होता है; रेखा मात्र है प्रवेश की--वह संतुलन है, वह बैलेंस है, समत्व है।
एक मजाकिया आदमी ने एक गधे के पास दोनों तरफ घास के दो ढेर लगा दिए बराबर दूरी पर। और गधा बीच में खड़ा था। उसे भूख तो लगी, तो वह बाएं तरफ जाना चाहा, तब मन ने कहा कि दाएं। उस तरफ भी घास थी। दाएं तरफ जाना चाहा तो मन ने कहा बाएं।
कहते हैं गधा भूखा बीच में खड़ा-खड़ा मर गया, क्योंकि न वह बाएं जा सका, न दाएं।
वही साधना पड़ेगा हमें, जो हमारा चुनाव है, जो हमारा द्वंद्व है। हम सबके द्वंद्व अलग अलग हैं।
राजस्थान में एक लोक-कथा है। एक गांव में गांव के राजपूत सरदार ने गांवभर में खबर रख छोड़ी है कि कोई मूंछ बड़ी न करे। खुद मूंछ बड़ी कर रखी है। और अपने दरवाजे पर तख्त डालकर बैठा रहता है। और गांव में खबर कर रखी है कि कोई मूंछ ऊंची करके सामने से न निकले। अगर मूंछ भी हो, तो नीची कर ले।
गांव में एक नया वणिक आया है, नया वैश्य आया है। उसने नई दुकान खोली है। उसको भी मूंछ रखने का शौक है। पहली बार राजपूत के सामने से निकल रहा है। राजपूत ने कहा, वणिक-पुत्र, मूंछ नीची कर लो! शायद तुम्हें पता नहीं, मेरे दरवाजे के सामने मूंछ ऊंची नहीं जा सकती। वणिक-पुत्र ने कहा, मूंछ तो ऊंची ही जाएगी! तलवारें खिंच गईं। राजपूत दो तलवारें लेकर बाहर आ गया। राजपूत था इसलिए दो लाया। एक वणिक-पुत्र के लिए, एक अपने लिए।
वणिक-पुत्र ने तलवार देखी। कभी पकड़ी तो न थी। सिर्फ मूंछ ऊंची रखने का शौक था। सोचा, यह झंझट हो गई। वणिक-पुत्र ने कहा, ठीक है। खुशी से इस युद्ध में मैं उतरूंगा। लेकिन एक प्रार्थना कि जरा मैं घर होकर लौट आऊं। उस राजपूत ने कहा, किसलिए? वणिक-पुत्र ने कहा, आपको भी ठीक जंचे, तो आप भी यही करें। हो सकता है, मैं मर जाऊं, तो मेरे पीछे मेरी पत्नी और बच्चे दुखी न हों; उनकी मैं गर्दन काटकर आता हूं। अगर आपको भी जंचती हो बात, हो सकता है, आप मर जाएं, तो आप अपनी पत्नी और बच्चों की गर्दन काट दें; फिर हम लड़ें मौज से। राजपूत ने कहा, बात ठीक है।
वणिक-पुत्र अपने घर गया। राजपूत ने भीतर जाकर गर्दनें साफ कर दीं। बाहर आकर बैठ गया। थोड़ी देर में वणिक-पुत्र मूंछ नीची करके लौट आया। उसने कहा, मैंने सोचा नाहक झंझट क्यों करनी! जरा-सी मूंछ को नीची करने के लिए उपद्रव क्यों करना! यह तुम्हारी तलवार सम्हालो! उस राजपूत ने कहा, तुम आदमी कैसे हो? मैंने अपनी पत्नी और बच्चे साफ कर दिए! तो उस वणिक-पुत्र ने कहा कि फिर तुम जानते ही नहीं कि वणिक का अपना गणित होता है। हमारा अपना हिसाब है!
प्रत्येक व्यक्ति का टाइप है, और प्रत्येक व्यक्ति के रुझान हैं, और प्रत्येक व्यक्ति की संवेदनशीलताएं हैं, और प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके जीवन का महत्वपूर्ण द्वंद्व है। और हर एक को अपना द्वंद्व देख लेना चाहिए कि मेरा द्वंद्व क्या है? प्रेम और घृणा मेरा द्वंद्व है? मित्रता-शत्रुता मेरा द्वंद्व है? धन-निर्धनता मेरा द्वंद्व है? यश-अपयश मेरा द्वंद्व है? सुख-दुख, ज्ञान-अज्ञान, शांति-अशांति, मेरा द्वंद्व क्या है?
सुकरात -- एक ईमानदार आदमी हमेशा एक बच्चा होता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बुढ़ापे में गांव में मजिस्ट्रेट बना दिया गया था, आनरेरी मजिस्ट्रेट। पहला ही मुकदमा आया, तो एक पक्ष ने अपनी कहानी प्रस्तुत की। मुल्ला इतना अभिभूत और प्रभावित हो गया, तो उसने कहा कि बिलकुल ठीक, बिलकुल सत्य! कोर्ट के क्लर्क ने झुककर मुल्ला से कहा, आप यह क्या कर रहे हैं! अभी दूसरा, दूसरा पहलू तो आपने सुना ही नहीं! अभी एक ही आदमी बोला है; अभी इसका दुश्मन मौजूद है। और मजिस्ट्रेट को इस तरह का वक्तव्य देना उचित नहीं है। मुल्ला ने कहा, दूसरे का भी सुन लेते हैं।
दूसरे ने उसके खिलाफ सारी बातें कहीं और मुल्ला इतना प्रभावित हो गया कि उसने कहा कि बिलकुल ठीक, बिलकुल सत्य! क्लर्क ने झुककर कहा कि महानुभाव, आप कर क्या रहे हैं! थोड़ा सोचिए-विचारिए। और दोनों ही एक साथ सत्य कैसे हो सकते हैं? पहला भी सत्य, दूसरा भी सत्य! मुल्ला क्लर्क से इतना प्रभावित हो गया, उसने क्लर्क से कहा कि तुम जो कह रहे हो, वह बिलकुल सत्य है। दोनों सत्य कैसे हो सकते हैं? बिलकुल ठीक कह रहे हो।
हमें कठिनाई मालूम पड़ेगी कि यह आदमी नासमझ है। लेकिन हम सब ऐसे ही आदमी हैं। हां, इतने स्पष्ट हम नहीं हैं।
सुकरात - मृत्यु संभवतः मानवीय वरदानो में सबसे महान है ।
एक बाप ने अपने बेटे को कहा कि अगर कोई पूछे, 'पिताजी घर पर हैं?' तो तू पहले पूछना, 'आप कौन? मित्र हैं? मित्र हैं, ऐसा कहे तो कहना, आइये भीतर। अगर कहे कि मैं इंश्योरेन्स का आदमी हूं, बीमा के लिए आया हूं, तो कहना, बाहर गये हैं। कब लौटेंगे कुछ पता नहीं।'
बेटा बाहर बैठा था। एक आदमी आया। उसने पूछा, 'पिताजी घर हैं?' उसने कहा, 'आप कौन हैं? मित्र हैं, या इंश्योरेन्स के आदमी?' उसने कहा, 'मैं दोनों हूं।' बेटे ने कहा, 'तब ठीक। आइये, घर के भीतर बैठें, अभी बाहर गये हैं, कब लौटेंगे कुछ पता नहीं।' क्या करे बेटा आखिर!
भीड़ अपने को सत्य मानती है, अपने से भिन्न को असत्य मानती है।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर में ठहरा था। उसकी पत्नी ने कहा कि सुनो, नसरुद्दीन ने कल दस हजार रुपये का जीवन बीमा करवा लिया है। उसने कुछ इस ढंग से कहा कि मुझे लगा कि जैसे नसरुद्दीन ने कुछ गलत किया है। तो मैंने पूछा, इसमें कुछ गलती तो की नहीं? यह तो अच्छा ही है। और तुम्हारे हित के लिये है, कि दस हजार का बीमा नसरुद्दीन ने करवा लिया। उस पत्नी ने कहा कि छिः आप समझते नहीं हैं उन्हें। यह बीमा उन्होंने मरने के खयाल से नहीं किया है, यह तो मुझे जलाना चाहते हैं। यह तो मुझे तरसाना चाहते हैं। न मरेंगे और मैं तरसती रहूंगी कि मर जायें तो दस हजार रुपये मिलें। आप इन्हें समझते नहीं।
बड़ी कठिनाई है आदमी के साथ। वह क्या करता है; क्यों करता है? दूसरे उसकी क्यों ऐसी व्याख्या करते हैं। क्यों दूसरों को कुछ और सुनाई पड़ता है? मुश्किल है।
कर्ता न रह जाये, क्रिया रह जाये। कर्म मात्र बचे और कर्ता कोई भी न बचे। तब जीवन में एक-स्वरता आयेगी।
मुल्ला नसरुद्दीन बीमार था। मरणासन्न था। उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं चिंता से डरती हूं। डर लगता है कि अगर मैं विधवा हो गई, तो क्या होगा? नसरुद्दीन ने कहा, 'तू बिलकुल मत घबड़ा। मेरे जिंदा रहते तुझे विधवा करनेवाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ। जब तक मैं जिंदा हूं, तू क्यों घबड़ाती है? यह सवाल ही नहीं है।'
लेकिन नसरुद्दीन आश्वस्त है अपने जीवन के प्रति। जैसे सभी लोग आश्वस्त हैं। कोई नहीं सोचता कि मैं मरूंगा। सारी दुनिया मरेगी। हमेशा कोई दूसरा मरता है। मैं तो कभी मरता नहीं। हमेशा दूसरों को मरघट पहुंचा आता हूं। मैं तो सदा जिंदा हूं। जब भी दूसरा मरता है तभी तुम्हें लगता है, तुम नहीं मरोगे। एक गहरी प्रसन्नता भीतर होती है। फिर दूसरा मरा। सिद्ध होता है कि हमेशा दूसरे ही मरते हैं, मैं नहीं। निश्चित ही तुम अभी तक तो मरे ही नहीं। तुम्हारे अनुभव में वह घटना घटी भी नहीं। कभी घटेगी भी नहीं। क्योंकि जब तुम मरोगे तो तुम नहीं रहोगे, अनुभव कैसा? सदा दूसरा मरता है। हर दूसरा मरनेवाला खबर देता है कि तुम अमर हो।
कर्ता खो जाए और क्रिया हो। यही योग का सार है।
एक अनपढ़ ग्रामीण, सम्राट के दर्शन के लिए, अपने घोड़े पर सवार हो राजधानी की तरफ चला। संयोग की बात, सम्राट भी उसी मार्ग से, शिकार करने के बाद राजधानी की तरफ वापिस लौटता था। उसके संगी-साथी कहीं पीछे जंगल में भटक गये थे। वह अपने घोड़े पर अकेला था। इस ग्रामीण का उस सम्राट से मिलना हो गया।
सम्राट ने पूछा, क्यों भाई चौधरी! राजधानी किसलिए जा रहे हो? तो उस ग्रामीण ने कहा कि सम्राट के दर्शन करने; बड़े दिन की लालसा है, आज सुविधा मिल गई। सम्राट ने कहा, तुम बड़े सौभाग्यशाली हो। सम्राट के दर्शन ऐसे तो आसान नहीं, लेकिन तुम्हें आज सहज ही हो जायेंगे। ग्रामीण ने कहा, जब बात ही उठ गई, तो एक बात और बता दें। दर्शन तो सहज हो जायेंगे, लेकिन मैं पहचानूंगा कैसे कि सम्राट यही है? यही मन में एक चिंता बनी है। सम्राट ने कहा, घबड़ाओ मत; जब हम राजधानी में पहुंचें और तुम देखो, किसी घोड़े पर सवार आदमी को, जिसे सभी लोग झुक-झुक कर नमस्कार कर रहे हैं, तो समझना कि यही सम्राट है।
फिर वे बहुत तरह की बातें, गपशप करते राजधानी पहुंच गये, द्वार के भीतर प्रविष्ट हुए; लोग झुक-झुक कर नमस्कार करने लगे। ग्रामीण बहुत चौंका। थोड़ी देर बाद उसने कहा कि भाई साहब, बड़ी दुविधा हो गई, या तो सम्राट आप हैं या मैं हूं।
उसकी दुविधा, मन की ही दुविधा है। मन इतने निकट है चेतना के कि भ्रांति हो जाती है कि या तो सम्राट आप हैं या मैं हूं। जब भी कोई झुक कर नमस्कार करता है तो मन समझता है, मुझे की जा रही है; इसी भ्रांति से अहंकार निर्मित होता है।
मन का दीया आशा के तेल से जलता है।
एक गांव में एक साधु का आगमन हुआ। वह अद्वैतवादी साधु था। गांव में एक गरीब सीधा आदमी था। इस साधु ने उसे पकड़ लिया; रास्ते से जा रहा था। वह सीधा आदमी अपने खेत जा रहा था, सो उसे पकड़ लिया और कहा कि रुको, क्या जिंदगी खेत में ही गंवा दोगे? कुछ स्मरण करो! यह जगत माया है। उस सीधे आदमी ने कहा, अब आपने शिक्षा ही दी, तो कुछ रास्ता बता दें। तो साधु ने उसे एक मंत्र दिया। मंत्र था सोहम्? कि सदा सोहम्-सोहम् का जाप करते रहो; मैं वही हूं I am that, सोहम्। कुछ दिनों बाद वह गरीब सीधा आदमी सोहम् का जाप करता रहा।
गांव में दूसरे साधु का आगमन हुआ। लोगों ने उस दूसरे साधु को बताया कि हमारे गांव में एक सीधा-सादा किसान है, लेकिन सोहम् का जाप करता है, और बड़ा प्रसन्न रहता है। साधु ने कहा, बिलकुल गलत। उसे बुलाकर ले आओ। उससे कहा कि यह बिलकुल गलत है। यह साधु द्वैतवादी था। सोहम् अद्वैतवादी का मंत्र है। इसने कहा, यह बिलकुल गलत है; यह पाठ ठीक नहीं है। इससे तुम भटक जाओगे।
उस गरीब सीधे आदमी ने कहा, आप सुधार कर दें। उस साधु ने कहा, 'दासोहम्' -- तेरा दास हूं यह पाठ करो। सोहम् नहीं, दासोहम्। उसमें 'दा' और जोड़ दो। उस गरीब आदमी ने 'दा' जोड़ दिया।
दो-चार महीने बाद फिर एक अद्वैतवादी साधु का गांव में आगमन हुआ। लोगों ने खबर दी। उसने कहा कि बिलकुल गलत है। द्वैत तो आना ही नहीं चाहिए मंत्र में। यह 'दासोहम्' ठीक नहीं है। तुम इसमें एक स और जोड़ दो, 'सदा सोहम्' -- सदा मैं वही हूं। गरीब आदमी ने कहा, अब जैसी आपकी मरजी!
थोड़ी-बहुत शांति पहले मिली थी, दूसरे में उससे भी कम हो गई। अब तीसरे में वह बहुत उलझ गया। वह भी कम हो गई। लेकिन अब साधु ने कहा, तो वह 'सदा-सोहम्' करने लगा।
कुछ ही दिन बाद फिर एक द्वैतवादी साधु का गांव में आगमन हुआ। उसने कहा कि यह बिलकुल गलत है। अद्वैत की बात ही गलत है। तुम इसमें एक 'दा' और जोड़ दो, 'दास दासोहम्'। तो उस गरीब ने कहा कि मैं बिलकुल पागल हो जाऊंगा। थोड़ी-बहुत शांति मिलना शुरू हुई थी, सब नष्ट हो गई। और अब कब अंत होगा इसका!
इस जगत में दो ही आयाम हैं। या तो मैं चेतना को खोजूं या पदार्थ को खोजूं।
मैं एक सड़क से गुजर रहा था एक नगर में और एक चर्च के द्वार पर मैंने एक तख्ती लगी देखी। छपी हुई तख्ती लगी थी। शायद और चर्चों के द्वार पर भी लगाई गई होगी। तख्ती पर लिखा था, इफ टायर्ड आफ सिन, कम इन—अगर पाप से थक गए तो भीतर आ जाओ।
तख्ती बड़ी मौजूं मालूम पड़ी। लेकिन तख्ती के नीचे हाथ से घसीटे अक्षरों में जैसे किसी ने लाल लिपिस्टिक से लिखा था, इफ नाट, देन कॉल, फोर सेवन वन वन। किसी वेश्या का पता था। बात तो और भी मौजूं लगी।
असली सवाल मन का है, तुम्हारी देह का नहीं है।
तुम किसी के घर गए, कुत्ता सामने मिला। और कुत्ते को पक्का नहीं है कि मालिक के दोस्त हो कि दुश्मन हो, अपने हो कि पराए हो, कि तुमसे कैसा व्यवहार करना! तो कुत्ता दोनों काम करता है--भौंकता भी है, पूंछ भी हिलाता है। यह राजनीति है। वह देख रहा है कि जैसी स्थिति होगी, जिस तरफ ऊंट करवट लेगा, उसी तरफ हम भी हो जाएंगे पूंछ से जय-जयकार बोल रहा है। पूंछ से कह रहा है जिंदाबाद, मुंह से कह रहा है मुर्दाबाद! और देख रहा है, प्रतीक्षा कि स्थिति साफ हो जाए कि मामला क्या है!
फिर घर का मालिक आ गया और तुम्हें गले लगा लिया, भौंकता बंद हो गया, पूंछ हिलती रही। घर का मालिक आ गया, उसने कहा आगे बढ़ो, और दरवाजा देखो--कि पूंछ हिलना बंद हो जाएगी कुत्ते की, भौंकना बढ़ जाएगा!
कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय ।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय ॥
कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।
शत्रु का चुनाव
कथा :
एक गधे ने सिंह को चुनौती दे दी और कहा : अगर हो हिम्मत तो आ मैदान में और हो जाए सीधा युद्ध । लेकिन सिंह चुपचाप चला गया । सियार यह सुन रहा था । उसने थोड़ा आगे बढ़ कर सिंह को पूछा कि सम्राट, बात क्या है ? एक गधे की चुनौती को भी तुम स्वीकार नहीं किए !
उसने कहा पागल हुआ है ? अगर उसकी चुनौती मैं स्वीकार करूं, तो पहले तो अफवाह उड़ जाएगी कि सिंह गधे से लड़ा । यह बदनामी होगी । ऐसा कभी हुआ नहीं । यह हमारे कुल, वंश, परंपरा में नहीं हुआ कि गधे से लड़े । लड़ना है गधे से. गधे को समाप्त कर दे सकते हैं, लड़ना क्या है ? अगर गधा हारा तो उसका कोई अपमान नहीं है । हम जीते भी तो कोई सम्मान नहीं । लोग कहेंगे, क्या जीते, गधे से जीते ! और कहीं भूल-चूक से जीत गया गधा -- गधे हैं इनका भरोसा क्या, तो हम सदा के लिए मारे गए । इसलिए मैं चुपचाप चला आया हूं । गधे से झंझट में पड़ना ठीक नहीं है ।
छोटे से अगर तुम उलझोगे, जीते भी तो छोटे से जीते । और काश अगर हार गए, तो छोटे से हारे ! दुश्मन जरा सोच कर चुनना । मित्र तो कोई भी चल जाएगा, शत्रु जरा सोच कर चुनना । शत्रु जरा बड़ा चुनना । क्योंकि चुनौती, संघर्षण तुम्हें अवसर देगा, तुम्हारे अपने आत्म-विकास का ।
निश्चिन्त
कथा :
एक जापानी कथा है । एक युवक विवाहित हुआ । अपनी पत्नी को ले कर -- समुराई था, क्षत्रिय था, अपनी पत्नी को लेकर नाव में बैठा । दूसरी तरफ उसका गांव था । बड़ा तूफान आया, अंधड़ उठा, नाव डावाडोल होने लगी, डूबने-डूबने को होने लगी । पत्नी तो बहुत घबड़ा गई । मगर युवक शांत रहा । उसकी शांति ऐसी थी जैसे बुद्ध की प्रतिमा हो । उसकी पत्नी ने कहा, तुम शांत बैठे हो, नाव डूबने को हो रही, मौत करीब है ! उस युवक ने झटके से अपनी तलवार बाहर निकाली, पत्नी के गले पर तलवार लगा दी । पत्नी तो हंसने लगी । उसने कहा : क्या तुम मुझे डरवाना चाहते हो ?
पति ने कहा : तुझे डर नहीं लगता ? तलवार तेरी गर्दन पर रखी, जरा-सा इशारा कि गर्दन इस तरफ हो जाएगी ।
उसने कहा : जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे भय कैसा ?
उसने तलवार वापिस रख ली । उसने कहा : यह मेरा उत्तर है । जब तूफान-आँधी उसके हाथ में है तो मैं क्यों परेशान होऊं ? डुबाना होगा तो डूबेंगे, बचाना होगा तो बचेंगे । जब तलवार मेरे हाथ में है तो तू नहीं घबराती । मुझसे तेरा प्रेम है, इसलिए न ! कल विवाह न हुआ था, उसके पहले अगर मैंने तलवार तेरे गले पर रखी होती तो ? तो तू चीख मारती । आज तू नहीं घबडाती, क्योंकि प्रेम का एक सेतु बन गया । ऐसा सेतु मेरे और परमात्मा के बीच है, इसलिए मैं नहीं घबड़ाता । तूफान आए, चलो ठीक, तूफान का मजा लेंगे । डूबेंगे, तो डूबने का मजा लेंगे । क्योंकि सब उसके हाथ में है, हम उसके हाथ के बाहर नहीं हैं । फिर चिंता कैसी ?
भगोड़ा
कथा :
सुकरात के पास बड़ी खतरनाक पत्नी थी । 'जिनथिप्पे' उसका नाम था । ऐसी दुष्ट पत्नी कम ही लोगों को मिलती है । ऐसे तो अच्छी पत्नी मिलना मुश्किल है, मगर वह खराब में भी खराब थी । वह उसे चौबीस घंटे सताती । एक बार तो उसने चाय का उबलता पानी उसके सिर से डाल दिया । उसका आधा चेहरा सदा के लिए जल गया और काला हो गया । लेकिन सुकरात भागा नहीं, जमा रहा ! एक युवक उससे पूछने आया कि मैं विवाह करना चाहता हूं आपकी क्या सलाह है ? सोचा था युवक ने कि सुकरात तो निश्चित कहेगा, भूल कर मत करना । इतनी पीड़ा पाया है, सारा एथेन्स जानता था ! घर-घर में यह चर्चा होती थी कि आज 'जिनथिप्पे' ने सुकरात को किस तरह सताया । यह तो कम से कम कहेगा कि विवाह मत करना । वह युवक विवाह नहीं करना चाहता था । लेकिन सुकरात का सहारा चाहता था ताकि कह सके माँ-बाप को कि सुकरात ने भी कह दिया है । लेकिन युवक चौंका, क्योंकि सुकरात ने कहा -- विवाह तो करना ही ! अगर मेरी पत्नी जैसी मिली तो सुकरात हो जाओगे । अगर अच्छी पत्नी मिल गयी, सौभाग्य ! हानि तो है ही नहीं ! इसी पत्नी की कृपा से मैं शांत हुआ । इसकी मौजूदगी प्रतिपल परीक्षा है, पल-पल कसौटी है । अनुगृहीत हूं इसका । इसी ने मुझे बदला । इसी में अपने चेहरे को देख-देख कर मैंने धीरे-धीरे रूपांतरण किये । मन में तो मेरे भी बहुत बार उठा कि भाग जाऊं । सरल तो वही था । भगोड़ेपन से ज्यादा सरल और क्या है ! जहां जीवन में कठिनाई हो, भाग खड़े होओ ! इससे सरल क्या है ?
अक्रोध तब पैदा होगा, जब यह समझा जाय कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी नियति में चल रहा है। हमसे कुछ लेना-देना नहीं है। यह इस आदमी का इस समय का स्वभाव है ।
उत्तर
कथा :
एक आदमी ने बुद्ध से पूछा, ईश्वर है ? बुद्ध ने कहा, नहीं । उसी दिन दूसरे आदमी ने पूछा, ईश्वर है ? बुद्ध ने कहा, निश्चय ही । और उसी सांझ एक तीसरे आदमी ने पूछा और बुद्ध चुप रह गए । रात आनंद उनसे पूछने लगा, मुझे पागल कर दोगे क्या ? क्योंकि आनंद तीनों मौकों पर मौजूद था । उसने कहा : मैं आज सो न सकूंगा, आप मुझे समझा दें । यह बात निपटारा ही कर दें । ईश्वर है या नहीं ? सुबह आपने कहा, नहीं है । मैंने कहा, चलो ठीक, कोई बात नहीं, उत्तर एक साफ हो गया । दोपहर होते-होते आप बदल गए । कहने लगे, है । सांझ चुप रह गए ।
बुद्ध ने कहा -- उनमें से कोई भी उत्तर तेरे लिए नहीं दिया था, तूने लिया क्यों ? ऐसे बीच-बीच में झपटोगे तो झंझट में पड़ोगे । जो मेरे पास आया था पहले से ही भाव लिए कि ईश्वर नहीं है, उससे मैंने कहा, है । उसे उसकी स्थिति से हटाना जरूरी था । वह नास्तिक था । उसकी नास्तिकता को डावांडोल करना जरूरी था । उसकी यात्रा बंद हो गई थी । वह मान कर ही बैठ गया था कि ईश्वर नहीं है । बिना जाने मान कर बैठ गया था, ईश्वर नहीं है । बिना कहीं गए मानकर बैठ गया था कि ईश्वर नहीं है । उसको धक्का देना जरूरी था । उसकी जड़ों को हिलाना जरूरी था । उसे राह पर लगाना जरूरी था । तो मैंने कहा कि ईश्वर, ईश्वर है ।
वह जो दूसरा आदमी आया था, वह मान कर बैठ गया था, ईश्वर है । बिना खोजे, बिना आविष्कार किए, बिना चेष्टा, बिना साधना, बिना श्रम, बिना ध्यान, बिना मनन, बस मान कर बैठ गया था उधार कि ईश्वर है । उसे भी डगमगाना जरूरी था । उसकी श्रद्धा झूठी थी, उधार थी । उससे मुझे कहना पड़ा, ईश्वर नहीं है ।
और जो तीसरा आदमी सांझ आया था, उसकी कोई धारणा न थी, कोई विश्वास न था, वह परम खोजी था । उससे कुछ भी कहना खतरनाक है । कोई भी धारणा उसके भीतर डालनी उसके मन को विकृत करना है, इसलिए मैं चुप रह गया । मैंने उससे कहा मौन उत्तर है । और वह समझ गया । और बुद्ध ने कहा
- कुछ घोड़े होते हैं, उनको मारो तो बामुश्किल चलते हैं ।
- कुछ घोड़े होते हैं, उनको सिर्फ कोड़ा फटकारने से, चलने लगते हैं ।
- कुछ घोड़े होते हैं, सिर्फ कोड़ा देख लेते हैं, फटकारने की जरूरत नहीं पड़ती और चलते हैं ।
- और ऐसे भी कुछ कुलीन घोड़े होते हैं कि कोड़े की छाया भी काफी है ।
वह जो तीसरा था उसको कोड़े की छाया काफी थी । शब्द की जरूरत न थी । शब्द का कोड़ा चलाना आवश्यक न था-मौन रह जाना... ! उसने मुझे देख लिया । बात उसकी समझ में आ गई । कह दिया मैंने जो कहना था, सुन लिया उसने जो सुनना था । और शब्द बीच में आया नहीं, सिद्धात बीच में आए नहीं । भाषा का उपयोग नहीं हुआ । हृदय से हृदय मिल गए और साथ-साथ हम हो लिए । वह भी समझ गया, मैं भी समझ गया कि वह समझ गया है । तुम इन तीनों में से कुछ भी उत्तर, आनंद, मत ले लेना । तुम्हें कोई भी उत्तर नहीं दिया गया है ।
एक नास्तिक पूछता है कि 'क्या ईश्वर है?' तब उसका अर्थ और है। वह यह पूछ रहा है कि 'है तो नहीं, लेकिन फिर भी आपका क्या खयाल है?' वह इस तलाश में है कि तुम भी कह दो, 'नहीं है,' ताकि वह प्रसन्न हो। अगर तुम कहो कि 'है' तो वह विवाद करे।
आस्तिक भी पूछता है, 'ईश्वर है?' बड़ा भिन्न है। वह चाहता है, 'कहो, हां।' हां की अपेक्षा है उसके प्रश्न में। वह जानता तो है ही कि ईश्वर है; सिर्फ तुमसे और गवाही चाहता है। तुम भी उसके साथी हो जाओ, उसका विश्वास सघन करो, उसकी आस्था मजबूत हो। और अगर तुम कहो, 'है' तो वह प्रसन्न होता है। उसका अहंकार भरता है, कि जो मैं कहता था वह ठीक है। यह आदमी भी साथ है। उसने अपने भीतर के विश्वास को और बढ़ा लिया। एक गवाह और मिल गया। तुम कहो, 'नहीं' तो वह विवाद करेगा।
एक तीसरा आदमी है, जो न आस्तिक है, न नास्तिक है। जिसे कुछ पता नहीं कि ईश्वर है, या नहीं। वह भी पूछता है कि 'क्या ईश्वर है?' उसकी जिज्ञासा शुद्ध है। उसकी जिज्ञासा के पीछे कोई सिद्धांत विकृत करनेवाला नहीं है। उसकी जिज्ञासा में न आस्था है, न अनास्था है। उसकी जिज्ञासा, सिर्फ जिज्ञासा है। वह तुमसे उत्तर पाकर अपने भीतर कुछ भरने के लिए नहीं आया है। तुम्हारे उत्तर से उसे कोई अपेक्षा नहीं है।
ये बड़े भिन्न प्रश्न हैं। और ज्ञानी इन तीनों के अलग उत्तर देगा। पंडित तीनों का एक उत्तर देगा। क्योंकि पंडित प्रश्न को देखता है, ज्ञानी प्रश्नकर्ता को देखता है।
अचेतन में दबा हुआ विचार धक्के देता है, निकलने के लिए। उसकी निकलने की कोशिश और हमारी दबाने की कोशिश से ही रोग पैदा होता है।
सारे योरोप के ईसाई पादरियों का एक सम्मेलन था। तो उस बिशप ने उस पादरियों के सम्मेलन में कहा कि मैं तुमसे यह पूछना चाहता हूं कि चर्चों में जब तुम बोलते हो, तो लोग सिर्फ ऊबे हुए मालूम पड़ते हैं; bored मालूम पड़ते हैं। अधिक तो सोए मालूम पड़ते हैं। कोई रस लेता नहीं मालूम पड़ता। और लोग बार-बार घड़ी देखते मालूम पड़ते हैं। कारण क्या है? उत्तर वे पादरी नहीं दे सके, जो इकट्ठे थे। तब जिसने पूछा था, उस बिशप ने खुद ही कहा कि मैं समझता हूं कि कारण यह है कि तुम उन प्रश्नों के उत्तर दे रहे हो, जो कोई पूछता ही नहीं है, जो किसी के प्रश्न ही नहीं हैं।
सत्य, जो कि हारता हुआ भी मालूम पड़ता हो, अंत में जीत जाता है। असत्य प्रारंभ में जीतता हुआ मालूम पड़ता है, अंत में हार जाता है। सत्य प्रारंभ में हारता हुआ मालूम पड़ता है, अंत में जीत जाता है। लेकिन प्रारंभ से अंत को देख पाना कहां संभव है! जो देख पाता है, वह धार्मिक हो जाता है।
गुरजिएफ नाम का यूनान में एक फकीर था। वह एक गांव से निकलता था। एक बाजार में उसके कुछ दुश्मन थे, वह वहां से निकला, उन्होंने उसे पकड़ लिया और उसे बहुत गालियां दीं। उस पर बड़ा गुस्सा हुए, बहुत अपमान किया। जब वे सारी गालियां दे चुके, अपमान कर चुके, गुरजिएफ ने कहा, मित्रों, मैं कल फिर आऊंगा इसका उत्तर देने। वे लोग एकदम हैरान हो गए। उन्होंने गालियां दीं, अपमान किया, बड़े अभद्र शब्द कहे। ।
उन्होंने कहा, क्या पागल हो? हम गालियां दे रहे हैं, अपमान कर रहे हैं। कहीं गालियां, अपमान का उत्तर कल दिया जाता है? जो देना हो, अभी दो।
गुरजिएफ ने कहा कि हम मूर्च्छा में कुछ भी नहीं करते। हम तो विवेक करते हैं; विचार करते हैं। सोचेंगे, अगर जरूरी समझेंगे कि क्रोध करना है तो करेंगे। अगर नहीं समझेंगे तो नहीं करेंगे। हो सकता है तुम जो कह रहे हो, वह ठीक ही हो। इसमें भी कोई कठिनाई नहीं है कि तुम जो गालियां दे रहे हो, वे सच ही हों। तो हम फिर आएंगे ही नहीं। हम कहेंगे, ठीक है। उन्होंने जो कहा, ठीक ही था। तो हम उसको अपने चरित्र का बखान समझेंगे, उसको हम निंदा ही नहीं समझेंगे। सच्ची बात कह दी। अगर समझेंगे कि क्रोध करना जरूरी है, तो क्रोध करेंगे।
उन लोगों ने कहा, तुम बड़े गड़बड़ आदमी हो। कोई कभी सोच-विचार कर क्रोध किसी ने किया है? क्रोध तो बिना विचार के, अविचार में ही होता है। कभी क्रोध सोच-विचार कर नहीं होता।
जीवन और सत्य बगावती हैं। तुम जो भी कपड़े बनाते हो, वे सदा छोटे पड़ जाते हैं बच्चे के लिए। मुर्दे के लिए तुम जो कपड़े बनाओगे वे कभी छोटे न पड़ेंगे।
सूफी सत्य के खोजी माने जाते हैं--उस सत्य के जो विषयगत हकीकत का ज्ञान होता है।
एक अज्ञानी, लालची और प्रजापीड़क राजा ने निश्चय किया कि मैं इस सत्य को भी अपने अधिकार में ला कर रहूंगा। स्पेन के मुर्सिया नामक स्थान का स्वामी था वह और नाम था उसका रोडरिक। उसने यह भी तय किया कि तरागोना के सूफी उमर-अल-अलावी को यह सत्य बताने के लिए मजबूर किया जाये।
फलतः उमर को गिरफ्तार कर राज-दरबार में हाजिर किया गया। रोडरिक ने उनसे कहा, 'मैंने निर्णय किया है कि जो सत्य आप जानते हैं उसे आप मुझे उन शब्दों में बता देंगे जिन्हें मैं समझ सकूं। और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आपको अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ेगा।'
उमर ने उत्तर में पूछा, 'इस उदार दरबार में क्या आप उस जागतिक व्यवस्था को मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति किसी प्रश्न के उत्तर में सत्य कह दे और यदि वह सत्य उसे अपराधी न बताये तो उसको स्वतंत्र कर दिया जाना चाहिए?' रोडरिक ने कहा, 'ऐसा ही है।' उमर ने फिर कहा, 'जो लोग भी यहां उपस्थित हैं, उन्हें मैं इस बात का साक्षी बनाता हूं। और अब एक नहीं, तीनत्तीन सत्य आपको मैं बताऊंगा।' रोडरिक ने तब कहा, 'हमें इस बात का भी भरोसा होना चाहिए कि जिन्हें आप सत्य कहते हैं, वे वास्तव में सत्य हैं। इसलिए जो भी कहें, उसके साथ उसका सबूत भी रहना जरूरी है।' उमर बोले, 'आप जैसे स्वामी के लिए जिन्हें हम एक नहीं, तीन-तीन सत्य देने जा रहे हैं, हम ऐसे ही सत्य देंगे जो स्वयंसिद्ध हैं।'
रोडरिक अपनी प्रशस्ति सुन कर फैल गया। उमर ने कहा, 'पहला सत्य यह है, कि मैं वह हूं जिसे लोग तरागोना का सूफी उमर कहते हैं। दूसरा यह, कि आपने मुझे सच कह देने पर रिहा करने का वचन दिया है। और तीसरा यह, कि आप अपनी धारणा का सत्य चाहते हैं।'
इन वचनों का असर हुआ कि प्रजापीड़क राजा को उमर को रिहा कर देना पड़ा।
सत्य की खोज, कोई बाह्य-खोज नहीं है। सत्य की खोज एक आंतरिक पात्रता की तैयारी है।
सरकारी पक्ष की ओर से मुल्ला नसरुद्दीन को गवाही के तौर पर अदालत में पेश किया गया था। अभियुक्त के वकील ने मुल्ला से जिरह करते हुए पूछा, अच्छा यह बताओ मुल्ला, जब तुमने कत्ल होते हुए देखा था उस समय तुम घटनास्थल से कितनी दूर थे?
मुल्ला नसरुद्दीन तत्क्षण बोला, पंद्रह गज, दो फीट, नौ इंच।
वकील ने कहा, हद हो गई! तुम तो इस इत्मीनान से बोल रहे हो जैसे तुमने नाप लिया हो। नौ इंच...इंच-इंच! क्या तुम वहां नाप कर खड़े थे?
मुल्ला बोला, हां, मैंने नापा था--कत्ल के पहले नहीं, कत्ल के बाद।
वकील ने पूछा, क्यों? इसकी क्या जरूरत थी? नापने की क्या जरूरत थी?
मुल्ला ने कहा, क्योंकि मैं पहले से ही जानता था कि कोई बेवकूफ वकील जरूर इस प्रकार का सवाल पूछेगा।
पंडितों के सवाल और जवाब दो कौड़ी के हैं। सवाल भी दो कौड़ी के, जवाब भी दो कौड़ी के। सवाल भी सच्चे नहीं, जवाब भी सच्चे नहीं। स्वयं अनुभव नहीं हुआ है तो कैसे जवाब सच्चे हो सकते हैं?
अन्यथा वेद पांडित्यम्, शास्त्र पांडित्यम् च अन्यथा
अन्यथा आत्मम् तत्त्वम्, लोक: क्लिष्यंति च अन्यथा ॥
मालकिन, कल कचरे में ये सोने की अंगूठियां, छल्ले, इयर-रिंग्स और चांदी की पायलें मिलीं। आप अपना सामान जरा होश-हवास के साथ सम्हाल कर रखा करें--नौकरानी ने कहा--मान लीजिए अगर कुछ गुम हो गया तो मेरी ही बदनामी होगी। कोई यह न कहेगा कि आप खुद अपनी धन-संपत्ति के प्रति लापरवाह हैं; दोष आपका ही है।
फिक्र मत करो--मालकिन ने रहस्य खोला--ये सब चीजें नकली हैं।
वह तो मैं भी तुरंत समझ गई थी--नौकरानी ने उदास होकर कहा--तभी तो आपको देने आई हूं।
तुम भी जानते हो कि पंडित नकली हैं। पंडित भी जानते हैं कि वे नकली हैं। मगर तुम असली से डरते हो, क्योंकि असली के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। नकली सस्ता है।
संसारी वह है, जिसकी सारी संपदा मृत्यु छीन लेगी। मृत्यु के बाद जिसके पास कुछ भी न बचेगा। और संन्यासी वह है कि मृत्यु कितना ही छीने, जो असली है, मूल्यवान है, उसे नहीं छीन पाएगी।
एक बार बीरबल ने दरबार में यह बात कही कि कभी-कभी प्रश्न से भी ज्यादा खतरनाक उत्तर होता है। अकबर ने कहा, यह बात जंचती नहीं। बीरबल ने कहा, कभी समय मिलेगा तो जंचा दूंगा।
कोई पांच-सात दिन पीछे की बात है। अकबर आईने के सामने खड़ा होकर अपने बाल संवार रहा है कि बीरबल पीछे से आया और एक लात मारी। अकबर तो गिरते-गिरते बचा, आईना फूटते-फूटते बचा। अकबर ने लौट कर देखा और कहा: रुको, यह कोई ढंग है? और माना कि मैं तुझे प्रेम करता हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि तू सम्राट को लात मारे!
बीरबल ने कहा: हुजूर, क्षमा करें! मैं तो समझा कि बेगम साहिबा हैं।
सम्राट ने कहा: क्या मतलब? तो तू बेगम को लात मार रहा था? तेरा गला कटवा दूंगा!
बीरबल ने कहा: वह जो आपको करना हो करना, मैं तो सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं कि कभी-कभी प्रश्न से उत्तर और भी ज्यादा खतरनाक होता है।
जो कुछ भी तुम सोचते हो, फ़ना है मानो ।
वो जो तुम्हारी सोच में नहीं, उसे खुदा जानो ॥
--मौलवी रूमी
अकर्तत्व
कथा :
महाकवि हुआ : कूलरिज । मरा तो चालीस हजार कविताएं अधूरी छोड़ कर मरा । कूलरिज ने अपनी जिंदगी में केवल सात कविताएं पूरी की हैं। सात कविताएं लिखने वाला आदमी पृथ्वी पर दूसरा नहीं है, जो महाकवि कहा जा सके! कूलरिज महाकवि है। सात हजार लिखने वाले भी महाकवि नहीं हैं। कूलरिज सात लिखकर भी महाकवि है! क्या बात है? मरने के पहले किसी ने पूछा कि इतना अंबार लगा रखा है, इनको पूरा क्यों नहीं किया ? और अदभुत कविताएं हैं ! किसी में सिर्फ एक पंक्ति कम रह गई है । पूरी क्यों नहीं की ?
तो कूलरिज ने कहा : मैं कैसे पूरी करूं ? उसने वहीं तक लिखवाई । फिर मैं राह देखता रहा । फिर पंक्ति आगे नहीं आई । शुरू-शुरू में जब मैं जवान था, तो मैं जोड़-तोड़ करता था; तीन पंक्तियां उतरी, एक मैं जोड़ देता था । लेकिन धीरे- धीरे मैंने पाया, मेरी पंक्ति मेल नहीं खाती । वे तीन तो अपूर्व हैं; मेरी बड़ी साधारण ! वह तो ऐसा हुआ जैसे सोने में मिट्टी लगा दी, सुगंध में दुर्गंध जोड़ दी । जब मुझमें समझ आई तो फिर मैंने यह काम बंद कर दिया । कभी कविता पूरी उतरी तो उतरी; कभी अधूरी उतरी तो अधूरी उतरी । कभी ऐसा हो गया कि आधी अभी उतरी और आधी साल भर बाद उतरी, तब पूरी हुई । तो मैं सिर्फ प्रतीक्षा करता रहा हूं । मेरा किया इसमें कुछ भी नहीं है । जिसने लिखवाई हैं, उसी से तुम बात कर लेना ।
धार्मिक आदमी वही है, जो मंदिर धन्यवाद देने जाता है। अधार्मिक? अधार्मिक वह नहीं, जो मंदिर नहीं जाता; वह तो अधार्मिक है ही। अधार्मिक असली वह है, जो मंदिर मांगने जाता है।
रवींद्रनाथ ने गीतांजलि लिखी, फिर अंग्रेजी में अनुवाद की। अनुवाद करके सी.एफ.एण्ड्रूज को दिखाई। सोचा, अंग्रेजी भाषा है, पराई, कोई भूल-चूक न हो जाए। एण्ड्रूज ने चार जगह भूलें निकालीं। कहा, यहां-यहां गलत है। ठीक-ठीक gramatical, ठीक-ठीक व्याकरण के अनुकूल नहीं है। इन्हें ठीक कर लो। रवींद्रनाथ मान गए। एण्ड्रूज अंग्रेज, बुद्धिमान, विचारशील, ज्ञाता! बदलाहट कर ली। तत्काल काटकर, जो एण्ड्रूज ने कहा, वह लिख लिया।
फिर रवींद्रनाथ लंदन गए और वहां कवियों की एक छोटी-सी गोष्ठी में उन्होंने पहली दफा गीतांजलि सुनाई, जिस पर बाद में नोबल पुरस्कार मिलने को था। तब तक मिला नहीं था। छोटे-से, बीस कवियों के बीच में। एक कवि, अंग्रेज कवि यीट्स बीच में उठकर खड़ा हो गया और उसने कहा कि दो-चार जगह ऐसा लगता है कि शब्द किसी और के हैं! रवींद्रनाथ ने कहा, किस जगह? उस आदमी ने दो जगह तो बिलकुल पकड़कर बता दी--इस जगह शब्द किसी और के हैं।
रवींद्रनाथ ने कहा, लेकिन समझ में कैसे पड़ा तुम्हें? सच ही ये शब्द किसी और के हैं। मैंने इन्हें बदला है। तो यीट्स ने कहा कि जब तुम गा रहे थे, तब एक धारा थी, एक बहाव था, एक फ्लो था। अचानक लगा कि कोई पत्थर आ गया बीच में, धारा टूट गई। कोई और आ गया बीच में। हटाओ इन शब्दों को।
रवींद्रनाथ ने कहा, मैं अपने शब्द बताऊं, जो मैंने पहले रखे थे! यीट्स ने कहा कि ये शब्द भाषा की दृष्टि से गलत हैं,लेकिन भाव की दृष्टि से सही हैं। इन्हें जाने दो। भाषा की गलती चलेगी। अटका हुआ पत्थर तो सब नष्ट कर देता; वह नहीं चलेगा। ये चलेंगे; इन्हें चलने दो। ये सीधे आए हैं।
जब कोई व्यक्ति परमात्मा की वाणी से भरता है, तो उसे एक ही ध्यान रखना पड़ता है कि वह बीच में न आ जाए खुद।
पश्चिम का बहुत बड़ा नर्तक हुआ निजिंस्की । ऐसा नर्तक, कहते हैं मनुष्य जाति के इतिहास में शायद दूसरा नहीं हुआ है । उसकी कुछ अपूर्व बातें थीं । एक अपूर्व बात तो यह थी कि जब वह नृत्य की ठीक-ठीक दशा में आ जाता था-जिसको मैं नृत्य की दशा कह रहा हूं जब नर्तक मिट जाता है-तो निजिंस्की ऐसी छलांगें भरता था कि वैज्ञानिक चकित हो जाते थे । क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के कारण वैसी छलांगें हो ही नहीं सकतीं । और साधारण अवस्था में निजिंस्की भी वैसी छलांगें नहीं भर सकता था । उसने कई दफे कोशिश करके देख ली थी । अपनी तरफ से भी उसने कोशिश करके देख ली थी, हर बार हार जाता था ।
जब उससे किसी ने पूछा कि इसका राज क्या है? उसने कहा, मुझसे मत पूछो । मुझे खुद ही पता नहीं । क्योंकि मैंने भी कई दफे कोशिश करके देख ली । जब यह घटती है तब घटती है । जब नहीं घटती तब मैं लाख उपाय करूं, नहीं घटती । और जब घटती है तो मैं हैरान होता हूं । कुछ क्षण को ऐसा लगता है, गुरुत्वाकर्षण का मेरे ऊपर प्रभाव नहीं रहा । मैं एक पक्षी के पंख की तरह हलका हो जाता हूं । कैसे यह होता है, मुझे पता नहीं । एक बात भर समझ में आती है कि यह उन क्षणों में होता है जब मुझे मेरा पता नहीं होता, जब मैं लापता होता हूं । जब मैं होता ही नहीं तब यह घटता है ।
यह तो योग का पुराना सूत्र है । यह तो तंत्र का पुराना आधार है । निजिंस्की को कुछ पता नहीं वह क्या कह रहा है । अगर उसे पूरब के शास्त्रों का पता होता तो वह व्याख्या कर पाता ।
विज्ञान कहता है.. .न्यूटन ने खोजा वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे । गिरा फल और न्यूटन को खयाल आया, हर चीज ऊपर से नीचे की तरफ गिरती है । पत्थर भी हम ऊपर की तरफ फेंकें तो नीचे आ जाता है, तो जरूर जमीन में कोई गुरुत्वाकर्षण, कोई कशिश, कोई ग्रेविटेशन होना चाहिए । जमीन खींचती चीजों को अपनी तरफ ।
न्यूटन ने एक बात देखी । हमने और भी एक बात देखी, जो न्यूटन ने नहीं देखी । और खयाल रखना, वही दिखाई पड़ता है जो हम देखने को तैयार होते हैं । कृष्ण ने कुछ और देखा, अष्टावक्र ने कुछ और देखा । उन्होंने यह देखा कि ऐसी कुछ घड़ियां हैं जब अहंकार नहीं होता तो आदमी ऊपर की तरफ उठने लगता है; जैसे आकाश की कोई कशिश, कोई आकर्षण है । जैसे वैज्ञानिक कहते हैं ग्रेविटेशन, गुरुत्वाकर्षण, ऐसे अंतरतम के मनीषियों ने कहा है कि प्रभु का आकर्षण । ऊर्ध्व, ऊपर की ओर से उतरती कोई ऊर्जा और खींचने लगती है । लेविटेशन या ग्रेस, प्रसाद कहें ।
वही घट रहा था निजिंस्की को । कभी-कभी ऐसा हो जाता था, वह इतना तल्लीन.. .इतना तल्लीन हो जाता, ऐसा लवलीन हो जाता, ऐसा खो जाता कि फिर नर्तक न रहता, नृत्य ही बचता । कोई आयोजक न रह जाता भीतर, कोई नियंत्रक न रह जाता । कोई नृत्य करने वाला न रह जाता ।
तुलसीदास -- अंधेरी रात हो, घर में अंधेरा घिरा हो, तो प्रकाश की बातचीत से अंधेरा नहीं मिटता।
रिक्त मन
कथा :
तिब्बत में कथा है कि एक युवक धर्म की खोज में था । वह एक गुरु के पास गया । गुरु के बहुत पैर दबाए, सेवा की वर्षों तक-और एक ही बात पूछता था कि कोई महामंत्र दे दो कि सिद्धि हो जाए, शक्ति मिल जाए । आखिर गुरु उससे थक गया । गुरु ने कहा -- तो फिर ले ! इसमें एक कठिनाई है, वह मुझे कहनी पड़ेगी । उसी के कारण मैं भी सिद्ध नहीं कर पाया । मेरे गुरु ने भी मुझे बामुश्किल दिया था । मैं तो तीस साल सेवा किया, तब दिया था; मैं तुझे तीन साल में दे रहा हूं । तू धन्यभागी ! मगर सफल मैं भी नहीं हुआ, क्योंकि इसमें एक बड़ी बेढंगी शर्त है ।
उस युवक ने कहा -- तुम कहो तो ! मैं सब कर लूंगा । सारा जीवन लगा दूंगा ।
गुरु ने कहा यह मंत्र है, छोटा-सा मंत्र है । इस मंत्र को तू दोहराना, बस, पांच बार दोहराना, कोई ज्यादा मेहनत नहीं । लेकिन जितनी देर यह दोहराए, उतनी देर बंदर का स्मरण न आए ।
उसने कहा -- हद हो गई ! कभी बंदर का स्मरण आया ही नहीं जीवन में, अब क्यों आएगा ! जल्दी से मंत्र दो !
मंत्र तो तिब्बतियों का बड़ा सीधा-सादा है । दे दिया । मंत्र लेकर वह उतरा सीढ़ी मंदिर की, लेकिन बडा घबड़ाया । अभी सीढ़ियां भी नहीं उतर पाया कि बंदर उसके मन में झांकने लगे । इस तरफ, उस तरफ बंदर चेहरा बनाने लगे । वह बहुत घबड़ाया कि यह मामला क्या है ? यह मंत्र कैसा ? घर पहुंचा नहीं कि बंदरों की भीड़ उसके साथ पहुंची-मन में ही सब ! नहा- धो कर बैठा, लेकिन बड़ी मुश्किल ! नहा - धो रहा है कि बंदर हैं कि खिलखिला रहे हैं, जीभ बता रहे हैं, मुंह बिचका रहे हैं । उसने सोचा, यह भी अजीब मंत्र है; मगर मालूम होता है शक्तिशाली है, क्योंकि बाधा तो दिखाई पड़ने लगी है । रात भर बैठा, बहुत बार बैठा, फिर-फिर बैठा, उठ-उठ आए-क्योंकि पांच दफे कहना है कुल; एक- आध दफे ऐसा लग जाए योग कि पांच दफे कह ले और बंदर न दिखाई पड़े, मगर यह न हो सका । हर मंत्र के शब्द के बीच बंदर खड़ा ।
सुबह थका-मांदा आया, गुरु को कहा यह मंत्र सम्हालो ! न तुमसे सधा, न मुझसे सधेगा, न यह किसी से सध सकता है । क्योंकि यह बंदर इसमें बडी बाधा है । अगर यही शर्त थी तो महापुरुष कहते क्यों ? कहते भर नहीं । दुनिया का कोई जानवर नहीं याद आया रात भर । साधारणत: मन में वासना उठती है, स्त्रियां दिखाई पड़ती हैं; मगर इस रात स्त्री भी नहीं दिखाई पड़ी -- बस, यह बंदर ही बंदर । कहते न, तो शायद मंत्र सध जाता ।
गुरु ने कहा : मैं भी क्या करूं ? वह शर्त तो बतानी जरूरी है ।
चैतन्य से संबंध, विचार से संबंध-विच्छेद--यही बांध बनेगा आपके चारों तरफ ।
बुद्ध के पास मौलुंकपुत्त नाम का एक दार्शनिक आया। उसने कहा : ईश्वर है?
बुद्ध ने कहा -- सच में ही तू जानना चाहता है या यूं ही एक बौद्धिक खुजलाहट?
मौलुंकपुत्त को चोट लगी। उसने कहा -- सच में ही जानना चाहता हूं। यह भी आपने क्या बात कही! हजारों मील से यात्रा करके कोई बौद्धिक खुजलाहट के लिए आता है?
बुद्ध ने कहा -- तो फिर दांव पर लगाने की तैयारी है कुछ।
मौलुंकपुत्त को और चोट लगी, क्षत्रिय था। हालांकि यह सोचकर नहीं आया था। पूछा उसने बहुतों से था कि ईश्वर है और बड़े वाद-विवाद में पड़ गया था । मगर यह आदमी कुछ अजीब है, यह ईश्वर की तो बात ही नहीं कर रहा है, ये दूसरी ही बातें छेड़ दीं कि दांव पर लगाने की कुछ हिम्मत है । उसने कहा -- सब लगाऊंगा दांव पर, जैसे आप क्षत्रिय पुत्र हैं, मैं भी क्षत्रिय पुत्र हूं, मुझे चुनौती न दें।
बुद्ध ने कहा -- चुनौती देना ही मेरा काम है । सवाल के जवाब अगर मैं दूंगा, तो तेरे बोझ को और बढ़ा दूंगा । अगर तू बोझ ही बढ़ाने आया हो, तो बात और है । अगर तू बोझ हल्का करना चाहता है, तो न तो पूछ और न उत्तर मांग । तू इतना कर -- दो साल चुप मेरे पास बैठ । दो साल बोलना ही मत, कोई प्रश्न इत्यादि नहीं, कोई जिज्ञासा वगैरह नहीं । दो साल जब पूरे हो जाएं तेरी चुप्पी के तो मैं खुद ही तुझसे पूछूंगा कि मौलुंकपुत्त, पूछ ले जो पूछना है । फिर पूछना, फिर मैं तुझे जवाब दूंगा । यह शर्त पूरी करने को तैयार है ?
मौलुंकपुत्त थोड़ा तो डरा क्योंकि क्षत्रिय जान दे दे यह तो आसान मगर दो साल चुप बैठा रहे…! कई बार जान देना बड़ा आसान होता है, छोटी-छोटी चीजें असली कठिनाई की हो जाती हैं । जान देना हो तो क्षण में मामला निपट जाता है, कि कूद गए पानी में पहाड़ी से, कि चले गए समुद्र में एक दफा हिम्मत करके, कि पी गए जहर की पुड़िया -- यह क्षण में हो जाता है । इतने तेज जहर हैं कि तीन सैकंड में आदमी मर जाए, बस जीभ पर रखा कि गए, एक क्षण की हिम्मत चाहिए । लेकिन दो साल चुप बैठे रहना बिना जिज्ञासा, बिना प्रश्न, बोलना ही नहीं, शब्द का उपयोग ही नहीं करना -- यह ज़रा लंबी बात थी मगर फंस गया था । कह चुका था कि सब लगा दूंगा तो अब मुकर नहीं सकता था, भाग नहीं सकता था । स्वीकार कर लिया, दो साल बुद्ध के पास चुप बैठा रहा ।
जैसे ही राजी हुआ वैसे ही दूसरे वृक्ष के नीचे बैठा हुआ एक भिक्षु सारिपुत्त जोर से हंसने लगा । मौलुंकपुत्त ने पूछा -- आप क्यों हंसते हैं?
सारिपुत्त ने कहा -- मैं इसलिए हंसता हूं कि तू भी फंसा, ऐसे ही मैं फंसा था । मैं भी ऐसा ही प्रश्न पूछने आया था कि ईश्वर है और इन सज्जन ने कहा कि दो साल चुप । दो साल चुप रहा, फिर पूछने को कुछ न बचा । तो तुझे पूछना हो तो अभी पूछ ले । देख, तुझे चेतावनी देता हूं, पूछना हो अभी पूछ ले, दो साल बाद नहीं पूछ सकेगा ।
बुद्ध ने कहा -- मैं अपने वायदे पर तय रहूंगा, पूछेगा तो जवाब दूंगा । अपनी तरफ से भी पूछ लूंगा तुझसे कि बोल पूछना है ? तू ही न पूछे, तू ही मुकर जाए अपने प्रश्न से तो मैं उत्तर किसको दूंगा?
दो साल बीते, मौलुंकपुत्त चुप रहा, ध्यान किया, मौन रहा, विचार से संबंध तोड़ा, चैतन्य से संबंध जोड़ा, जाना कि मैं वही हूं, सिर्फ होना मात्र हूं; बाकी सब जो खयाल हैं, शब्द हैं, प्रत्यय हैं, धारणाएं हैं, वह मेरे चारों तरफ धूल की तरह जम गई हैं । वह वस्त्र से ज्यादा नहीं हैं, जैसे वस्त्र के भीतर नग्न देह है, ऐसे विचारों के भीतर नग्न चेतना है । दो साल बीते, वह भूल ही गया कि पूछने का दिन करीब आ गया, मगर बुद्ध नहीं भूले । दो साल बीतने पर ठीक उसी दिन, उसी मुहूर्त में बुद्ध ने पूछा -- मौलुंकपुत्त अब खड़ा हो जा, पूछ ले ।
मौलुंकपुत्त हंसने लगा। उसने कहा -- उस भिक्षु सारिपुत्त ने ठीक ही कहा था । दो साल चुप रहते-रहते चुप्पी में ऐसी गहराई आई; चुप रहते-रहते ऐसा बोध जमा, चुप रहते-रहते ऐसा ध्यान उमगा; चुप रहते-रहते विचार धीरे-धीरे खो गए, खो गए, दूर-दूर की आवाज मालूम होने लगे; फिर सुनाई ही नहीं पड़ते थे, फिर वर्तमान में डुबकी लग गई और जो जाना…बस आपके चरण धन्यवाद में छूना चाहता हूं। उत्तर मिल गया है, प्रश्न पूछना नहीं है।
परम ज्ञानियों ने ऐसे उत्तर दिए हैं -- प्रश्न नहीं पूछे गए उत्तर मिल गए हैं । प्रश्नों से उत्तर मिलते ही नहीं, शून्य से मिलता है उत्तर । और जो उत्तर मिलता है वही परमात्मा है । और तब तुम्हें चारों तरफ वही एक दिखाई पड़ता है । अभी कहीं नहीं दिखाई पड़ता फिर ऐसी जगह नहीं दिखाई पड़ती जहां न हो । उत्तर बाहर के हैं; और धूल जम जाएगी । अभी तुम पूछते हो परमात्मा कहां है; फिर पूछोगे परमात्मा कहां नहीं है !
सदगुरु वह है, जो आपके विचार छीन ले, आपको रिक्त कर दे, खाली कर दे । सदगुरु वह नहीं, जो आपको और नए विचार दे दे, उससे आपका बोझ और बढ़ जाएगा, वैसे ही आप काफी पीड़ित और परेशान हैं, ये विचार और आपको मुसीबत देंगे ।
एक रात एक होटल में एक नया मेहमान आकर ठहरा, ठहरते समय होटल के मालिक ने उसको कहा, मित्र, कहीं और ठहर जाएं, इस होटल में एक ही कमरा केवल खाली है वह हम आपको दे सकते हैं, लेकिन उसमें थोड़ी कठिनाई और अड़चन है । उसके नीचे जो मेहमान ठहरा हुआ है अगर आप थोड़े ऊपर हिले-डुले भी, थोड़ी आवाज भी हो गई, तो उससे झगड़ा हो जाने की संभावना है । पहले भी जो लोग उस कमरे में ठहराए गए हैं उनसे नीचे के मेहमान का झगड़ा हो गया । और इसलिए जब तक नीचे का मेहमान ठहरा हुआ है हमने तय किया है कि ऊपर के कमरे को खाली रखें । उस नये अतिथि ने कहाः कोई संभावना नहीं है कि मेरा उनसे झगड़ा हो जाएं, दिन भर मैं काम में व्यस्त रहूंगा रात लौटूंगा, दो-चार घंटे सोकर सुबह ही मुझे अपनी यात्रा पर आगे निकल जाना है । इसलिए कमरा दे दें, कोई चिंता झगड़े की न करें ।
कमरा दे दिया गया । वह मेहमान दिन भर गांव में काम करके रात लौटा, कोई बारह बज गए होंगे, वह थका-मांदा आया, उसे नीचे के मेहमान का कोई खयाल भी नहीं रहा, वह आकर बिस्तर पर बैठा, उसने अपना जूता खोल कर जूता नीचे पटका । जूते की आवाज जैसे ही फर्श पर हुई, उसे खयाल आया, कहीं नीचे के व्यक्ति की नींद न खुल जाए । उसने दूसरा जूता आहिस्ता से खोल कर चुपचाप रख दिया और सो गया । कोई दो घंटे बाद नीचे के आदमी ने आकर उसका दरवाजा भड़भड़ाया । वह नींद से उठा, परेशान हुआ कि सोते में मुझसे क्या भूल हो गई होगी? उसने दरवाजा खोला । नीचे के मेहमान ने कहाः महानुभाव, आपका एक जूता तो गिरा तो मैंने समझा कि आप आ गए हैं, लेकिन दूसरे जूते का क्या हुआ? मेरी नींद खराब कर दी । मैंने बहुत कोशिश की कि मुझे किसी के जूते से क्या लेना-देना? मैंने इस विचार को निकालने की बहुत कोशिश की कि मुझे क्या मतलब है कि किसी के दूसरे के जूते का क्या हुआ, क्या नहीं हुआ? कुछ भी हुआ हो । लेकिन जितना ही मैं इस विचार को निकालने की कोशिश करने लगा उतनी ही मुसीबत में पड़ गया । मेरी सारी नींद धीरे-धीरे उड़ गई और मुझे आपका दूसरा जूता हवा में लटका हुआ दिखाई पड़ने लगा, क्योंकि वह गिरा नहीं! मैंने उस जूते को हटाने की बहुत कोशिश की अपने मन से, लेकिन मैं आंख बंद करता और आपका जूता मुझे लटका हुआ दिखाई पड़ता । और मेरे मन में खयाल आता उस दूसरे जूते का क्या हुआ? आखिर कोई रास्ता न देख कर मैं आया हूं आपसे पूछने, क्षमा करें, क्योंकि नींद आपकी मैंने तोड़ी, लेकिन सिवाय इसके कोई रास्ता नहीं था कि दूसरे जूते के संबंध में मेरी जिज्ञासा समाप्त हो जाए, तो मैं जाकर निश्चिंतता से सो सकूं । उसने कहा कि मैंने बहुत कोशिश की उस दूसरे जूते के विचार को छोड़ने की, लेकिन उस विचार को हटाना संभव नहीं हुआ ।
आप भी ऐसे बहुत से विचारों से परिचित होंगे जिनको हटाना संभव नही हुआ होगा । जिनको हटाने में आप समर्थ नहीं हो सकेंगे । तो क्या कारण है कि उन विचारों के मालिक होने का भ्रम हम अपने भीतर पैदा करें? कौन सी वजह है कि मैं समझूं कि वे विचार मेरे हैं और मैं उनका मालिक हूं? यदि मैं विचारों का मालिक हूं तो मैं जब चाहूं तब विचार बंद हो जाने चाहिए और जब चाहूं तब वे चलने चाहिए ।
एक फकीर हुआ, नसरुद्दीन । वह एक सांझ अपने घर के बाहर निकल रहा था और तभी उसने देखा कि जलाल नाम का उसका एक दूसरे गांव का मित्र उसके द्वार पर आकर खड़ा हो गया । नसरुद्दीन ने कहा कि जलाल, बहुत दिनों बाद तुम आए हो, तुम ठहरो घर पर मैं कुछ मित्रों से जरूरी मिलने जा रहा हूं । उनसे मिल कर मैं कोई तीन घंटे बाद वापस लौटूंगा । तब तुमसे मिल सकूंगा । या तुम्हारी मर्जी हो तो तुम भी मेरे साथ चले चलो, कुछ मित्रों से मिलना हो जाएगा और रास्ते में तुमसे बातचीत भी होती रहेगी । जलाल ने कहा कि मेरे कपड़े धूल भरे हो गए हैं, रास्ते भर पसीने से मैं डूब गया हूं, इन कपड़ों को पहन कर किसी के घर जाना उचित न होगा । अगर तुम दूसरे कपड़े मुझे दे सको तो मैं उनको पहन लूं और तुम्हारे साथ चलूं । नसरुद्दीन ने अपने पास...उसके पास जो सबसे अच्छा कोट था, अच्छे कपड़े थे, वे अपने मित्र को पहना दिए और उनको पहना कर वह अपने गांव में जहां मिलने जाने को था वहां गया ।
वह पहले घर में पहुंचा । उसने जाकर उस भवन के मालिक को कहा कि ये हैं मेरे मित्र, मैं इनसे परिचय करा दूं, ये हैं जलाल, मेरे बहुत पुराने मित्र हैं । और यह जो कोट और कपड़े पहने हुए हैं, ये मेरे हैं ।
जलाल को बहुत परेशानी हुई होगी । बाहर निकलने पर उसने कहा कि तुम आदमी कैसे हो, इस बात को कहने कि क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं । इतना ही काफी था कि तुम मेरे बाबत बता देते, मेरे कपड़ों के संबंध में बताने कि कोई जरूरत न थी । और अब दूसरे घर में खयाल रखना, मेरे कपड़ों के बाबत कुछ भी कहने कि आवश्यकता नहीं ।
नसरुद्दीन दूसरे मकान में पहुंचा, उसने जाकर कहाः ये हैं मेरे मित्र जलाल, इनसे मिलिए, रही कपड़ों की बात, सो कपड़े इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं ।
जलाल तो बहुत परेशान हो गया । बाहर निकल कर उसने कहा कि तुम पागल तो नहीं हो, इस बात को बताने कि क्या जरूरत थी कि कपड़े मेरे हैं?
नसरुद्दीन ने कहा कि मैंने तो बहुत रोकने की कोशिश की, लेकिन यह विचार एकदम से मेरे भीतर घूमने लगा कि पहली दफे मैंने गलती कर दी है कह कर कि कपड़े मेरे हैं, तो भूल सुधार कर लूं और कह दूं के ये कपड़े इन्हीं के हैं । जलाल ने कहा कि देखो, बस अगले घर में इसकी कोई भी चर्चा उठानी उचित नहीं हैं । बिलकुल कोई बात उठानी उचित नहीं हैं । न तुम्हारे, न मेरे । इनकी बात ही मत उठाना ।
वे तीसरे घर में गए । नसरुद्दीन ने कहा कि ये रहे मेरे पुराने मित्र जलाल, रही कपड़ों की बात, सो उठाना बिलकुल उचित ही नहीं है कि किसके हैं?
बाहर निकल कर जलाल ने कहा कि अब मुझे तुमसे कुछ भी नहीं कहना है । लेकिन तुम आदमी कैसे हो? कपड़ों कि बात क्यों उठाई?
उसने कहा -- मैंने तो बहुत अपने को रोका, लेकिन कठिनाई यह हो गई कि यह रोकने की कोशिश से ही सारी मुसीबत हो गई । रोकते-रोकते यह बात मेरे मुंह से निकल गई कि कपड़ों की बात उठानी उचित नहीं है, किसी के भी हों । और इसका एक ही कारण मुझे दिखाई पड़ता है और वह यह है कि मैं इस बात को रोकने की कोशिश कर रहा था ।
जिस विचार को आप रोकने की कोशिश करेंगे आप पाएंगे कि वह बड़ी ताकत से उठना शुरू हो गया है । देखें और करें और पता चल जाएगा, जिन विचारों को हम निषेध करते हैं वे विचार बड़ा आकर्षण ले लेते हैं, उनमें बड़े प्राण आ जाते हैं, और वे बड़े बलपूर्वक हमारे भीतर उठना शुरू हो जाते हैं । लेकिन एक बात हमें इस घटना से जो खयाल आनी चाहिए वह नहीं आती, वह यह है कि विचारों के हम मालिक नहीं हैं । अगर हम मालिक होते तो हम कहते रुक जाओ और विचार रुक जाते और हम कहते चलो तो विचार चलते । लेकिन हम सभी को यह खयाल है कि मैं विचारक हूं, मैं सोचता हूं । हममें से कोई भी सोचता नहीं है, क्योंकि जो सोचेगा उसके जीवन में तो एक क्रांति घटित हो जाएगी । जो सोचेगा उसका तो जीवन बदल जाएगा । जो विचार करने में समर्थ हो जाएगा वह तो स्वतंत्र हो जाएगा ।
स्वतंत्रता और विचार करने की सामर्थ्य एक ही चीज के दो नाम हैं ।
लाओत्से के पास एक युवक मिलने आया और कहता है -- मुझे शांति चाहिए । लाओत्से कहता है -- कभी न मिलेगी । वह युवक कहता है -- ऐसी मुझमें आपको क्या कठिनाई मालूम पड़ती है? ऐसा मैंने क्या पाप किया है कि मुझे शांति कभी न मिलेगी? लाओत्से कहता है -- जब तक तू चाहेगा शांति को, तब तक नहीं मिलेगी । हमने भी चाह कर देखा बहुत दिन तक । और आखिर में पाया कि शांति की चाह जितनी बड़ी अशांति बन जाती है, उतनी जगत में कोई अशांति नहीं है । इस शांति को चाहना छोड़ कर आ ।
लिंची के पास कोई एक साधक आया है और लिंची से कहता है, सब मैंने छोड़ दिया । लिंची कहता है, कृपा कर, इसे भी छोड़ कर आ! वह युवक कहता है, लेकिन मैंने सब ही छोड़ दिया । लिंची कहता है, इतना भी बचाने की कोई जरूरत नहीं ।
कामयुक्त मन वर्तमान के प्रति अत्यंत उदास और भविष्य के प्रति अति आतुर मन है ।
किसी गुफा में तीन साधु ध्यान-मग्न बैठे थे। एक दिन उधर से शेर गुजरा। छह महीने बाद एक साधु बोला, 'कितना सुंदर शेर था'
एक साल बाद एक साधु बोला, 'वह शेर नहीं चीता था!'
दो साल बाद तीसरा साधु बोला, 'यदि तुम दोनो इसी प्रकार लड़ते झगड़ते रहे तो मैं किसी दूसरे स्थान पर चला जाऊंगा!'
संदेह बने जिज्ञासा, तो संशय बनता है श्रद्धा। श्रद्धा उसके ही पास होती है, जिसके पास जिज्ञासा होती है।
एक युवक नसरुद्दीन के पास आया है और उसने कहा कि कैसे कहते हो नसरुद्दीन कि मन को खाली करें? कैसे? नसरुद्दीन ने कहा कि अभी तो मैं कुएं पर पानी भरने जा रहा हूं, तू मेरे पीछे आ, और बीच में सवाल मत पूछना। अगर सवाल पूछा, तो भगा दूंगा। लौट कर जवाब दूंगा।
नसरुद्दीन ने दो बाल्टियां उठाईं और भागा कुएं पर। वह युवक साथ-साथ गया। नसरुद्दीन ने एक बाल्टी तो रखी कुएं के पाट पर। युवक थोड़ा हैरान हुआ, जब उसने बाल्टी को रखा जाते देखा। देखा कि उसमें कोई नीचे तलहटी थी ही नहीं। खाली ड्रम था। दोनों तरफ कुछ न था। पर उसने कहा कि इस मूरख ने कहा है कि बीच में सवाल न पूछना। फंस गए! यह तो कभी भरने वाली नहीं है। अब बुरे फंस गए। और जब तक, यह बोलता है, भर न जाए, घर न लौटूं, तब तक सवाल-जवाब कुछ होगा नहीं। और यह कब भरेगी? यह भर ही नहीं सकती। मगर उसने सोचा, थोड़ा तो साहस रखो। एक मिनट, दो मिनट देखो तो,यह करता क्या है।
नसरुद्दीन ने नीचे बाल्टी डाली। पानी खींच कर उस खाली ड्रम में डाला। जब तक उन्होंने डाला, तब तक वह निकल गया। उन्होंने दूसरी बाल्टी नीचे डाली। दोत्तीन बाल्टी निकल चुकीं।
उस युवक ने कहा कि ठहरो महानुभाव, अब मुझे पूछना भी नहीं है। अगर आप जवाब भी देते हों लौट कर, हमको पूछना नहीं है। लेकिन एक सलाह आपको दे दें।
नसरुद्दीन ने कहा कि चुप! अक्सर मैं देखता हूं कि जो लोग सीखने आते हैं, वे जल्दी से सिखाना शुरू कर देते हैं। You came as a deciple and now you have become master। अब तुम हमको advice दे रहे हो। गुस्ताख, इस तरह की बात दुबारा नहीं करना। खड़ा रह अपनी जगह पर!
उस आदमी ने कहा कि लेकिन यह भरेगी कब, जरा खयाल तो करिए! आप तीन बालटियां डाल चुके हैं। कुछ भी पानी एक बूंद नहीं बचा है।
नसरुद्दीन ने कहा कि दुनिया में जब कोई भी खयाल नहीं कर रहा है, तो मैंने ही ठेका लिया है गलत बातों का खयाल करने का? जन्म-जन्म से भर रहे हैं लोग, और नहीं भरा। और खयाल नहीं कर रहे हैं। तो हमने तो अभी तीन ही बालटी डाली हैं। ऐसा तो कुछ...। तू चुप रह!
वह थोड़ी देर और खड़ा रहा। नसरुद्दीन ने और दस-पांच बाल्टियां डालीं। उसने कहा कि थोड़ा तो खयाल करिए। एक सीमा होती है। जरा ऊपर नजर तो डालिए।
नसरुद्दीन ने कहा कि मुझे इससे प्रयोजन नहीं है कि बाल्टी भरती है या नहीं भरती है। मैं अपना पुरुषार्थ पूरा करके रहूंगा। हम भर कर रहेंगे। हम बाल्टी से पूछने नहीं जाएंगे। हम तो भर कर रहेंगे। हमारा काम भरना है। बाल्टी न भरेगी? देखें, कैसे नहीं भरती है!
उस युवक ने कहा, मैं जाता हूं, नमस्कार! वह चला गया।
लेकिन रात उसे नींद न आई कि यह आदमी! क्या मतलब रहा होगा इसका? बार-बार जितना सोचा, उतना उसे लगा कि भूल हो गई। थोड़ा रुकना था। पता नहीं, वह अभी भी भर रहा है या क्या कर रहा है? वह तो जैसे ही वह आदमी गया था, नसरुद्दीन अपने घर अपनी बाल्टी लेकर चले गए थे। वह आधी रात उठ कर कुएं पर पहुंचा, देखा कि जा चुका है। नसरुद्दीन के घर पहुंचा, देखा कि वह सो रहा है। उसे उठाया और कहा कि क्या हुआ? वह बाल्टी भरी कि नहीं?
नसरुद्दीन ने कहा, पागल, वह तेरे लिए रखी थी।
हम अपने मन को भर रहे हैं जन्मों-जन्मों से। और जन्मों को छोड़ दें, क्योंकि इतना पुराना है, वह हमें भूल गया। इस जन्म में भी हम भर रहे हैं। कभी खयाल किया कि जिस चीज से आपने भरा है, उसमें से रत्ती भर भी भीतर बचा है? कितनी बार क्रोध किया, कितना बचा है? कितनी बार भोग किया, कितना बचा है? क्या-क्या किया, उसमें से बचा क्या है? आपकी संपदा क्या है उसमें से? बाल्टी खाली है। और हम पूछते हैं कि बाल्टी को खाली कैसे करें? मजा यह है कि बाल्टी खाली है। वह भरी ही नहीं है। आपको खाली करने की जरूरत नहीं है। कृपा करके आप उसे भरने की जो पागलपन में लगे हैं, देख ही नहीं रहे हैं खाली बाल्टी की तरफ, कुएं में डाल रहे हैं, भर रहे हैं, डाल रहे हैं...।
जैसे नसरुद्दीन किसी से पूछे कि यह जो ड्रम रखा है कुएं के पाट पर, इसको खाली कैसे करें, वैसे ही हमारा पूछना है। मन भरा कहां है? किसको खाली करने की बात है? मन खाली है। लेकिन इतने जोर से हम भरते चले जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि यह मन खाली है।
श्रद्धावान का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति, जिसे ज्ञान का दंभ नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन की सम्राट से दोस्ती थी अपने देश के। नसरुद्दीन की ज्ञानियों में गिनती थी। सुलतान ने उससे एक दिन पूछा, मुल्ला, तुम जब प्रार्थना करते हो, तो मन शून्य हो पाता है या नहीं? मुल्ला ने कहा, बिलकुल हो जाता है। सम्राट को भरोसा न आया। उसने कहा, सच! तो इस शुक्रवार तुम नमाज करके सीधे मस्जिद से मेरे पास आ जाना। और तुम्हारे ईमान का भरोसा करूंगा। सच-सच मुझे बता देना। अगर तुमने सच-सच बता दिया, तो तुम्हें--वह अपने गधे पर बैठ कर आया था--तुम्हें फिर आगे से गधे की सवारी न करनी पड़ेगी। मेरे अस्तबल का जो सबसे शानदार जानवर है, सबसे शानदार घोड़ा है, वह मैं तुम्हें भेंट कर दूंगा।
नसरुद्दीन ने कहा, जरा देख सकते हैं उस घोड़े को? नसरुद्दीन ने घोड़े को देखा। तबीयत उसकी लार-लार हो गई। उसने कहा कि बड़ी मुश्किल में डाल दिया। खैर, शुक्रवार हाजिर हो जाऊंगा।
प्रार्थना करके नसरुद्दीन आया। दरवाजे पर सम्राट ने घोड़ा बांध रखा था। और नसरुद्दीन से कहा, ईमानदारी से कहो, प्रार्थना में कोई विचार तो नहीं आए? खाली थे तुम? नसरुद्दीन ने कहा, बिलकुल खाली था। आखिर-आखिर में जरा एक झंझट आई। सम्राट ने पूछा, वह झंझट क्या थी?
नसरुद्दीन ने कहा, वह यह थी कि घोड़ा तो दोगे सही, कोड़ा भी दोगे कि नहीं? साथ में कोड़ा भी दोगे कि नहीं? बस इस कोड़े ने मुझे परेशान कर दिया। लाख उपाय किया अल्लाह को याद करने का, लेकिन कोड़े के सिवाय कुछ याद न आया। बस एक ही बात पकड़े रही कि घोड़ा तो दे दोगे, लेकिन घर तक जाने के लिए कोड़े की भी जरूरत पड़ेगी, वह दोगे कि नहीं?
एक छोटा सा कोड़ा भीतर परमात्मा को हटा सकता है। कोड़ा कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है। लेकिन एक छोटे से कोड़े का खयाल परमात्मा को भीतर से हटा सकता है। यह कुछ ऐसा है कि एक छोटा सा तिनका आंख में पड़ जाए, तो सारी दुनिया अंधेरी हो जाती है। और अगर हिमालय दिखाई पड़ता था, तो एक छोटे से तिनके के आंख में पड़ जाने से हिमालय फिर दिखाई नहीं पड़ता। एक छोटे से तिनके की आड़ में पूरा पर्वत छिप जाता है। छोटा सा विचार भीतर से शून्य को खाली कर देता है। शून्य को भरने के लिए क्षुद्रतम चीज भी काफी है।
जिसको श्रद्धा न हो साथ, अगर वह इंद्रियों को जीत ले, तो वह वैसे ही भ्रम में पड़ जाएगा, जैसे बहिर्प्रकृति को जीतकर वैज्ञानिक भ्रम में पड़ जाता है कि मैं सब कुछ हूं; सुप्रीम हो गया!
निजिंस्की कहा करता था कि जब मैं नाचता हूं, जब तक मैं नाचता हूं, तब तक नाचना साधारण होता है, और जब मेरे भीतर का शून्य नृत्य को पकड़ लेता है, तब नाचना असाधारण हो जाता है। एक दिन घर लौट कर उसकी पत्नी ने निजिंस्कीको कहा कि आज तुम ऐसे नाचे हो कि मैं रो रही हूं अपने मन में कि तुम ही एक अभागे आदमी हो कि तुमने भर निजिंस्कीका नाच नहीं देखा! आज तुम ऐसे नाचे हो कि तुम अकेले अभागे आदमी हो।
निजिंस्की ने कहा, तू गलती में है। मैंने भी देखा।
उसकी पत्नी ने कहा, मैं कैसे मानूं, तुम कैसे देख सकोगे?
निजिंस्की ने कहा कि जब तक मैं नाचता हूं, शुरू के थोड़े क्षणों में, तब तक मैं नहीं देख पाता। लेकिन फिर भीतर का शून्य नृत्य को पकड़ लेता है, तब तो मैं दूर खड़े होकर observer हो जाता हूं; फिर तो मैं देख पाता हूं।
बुद्ध -- जो मैं कह सकता था, वह मैंने कहा; लेकिन वह असली बात नहीं है। जो मैं नहीं कह सकता था, वह मैंने नहीं कहा है; वही असली बात है। इसलिए जो मेरे कहने को सुनते रहे हैं, वे मुझे नहीं समझ पाएंगे; जिन्होंने मेरे न कहने को भी सुना है, वही मुझे समझ सकते हैं।
झेन में कोई पांच सौ वर्ष पहले, एक बहुत अदभुत फकीर हुआ, बांकेई। जापान का सम्राट उसके दर्शन को गया। बड़ी चर्चा सुनी, बड़ी प्रशंसा सुनी, तो गया। सुना उसने कि दूर-दूर पहाड़ पर फैली हुई monestry है, आश्रम है। कोई पांच सौ भिक्षु वहां साधना में रत हैं। तो गया। बांकेई से उसने कहा, एक-एक जगह मुझे दिखाओ तुम्हारे आश्रम की, मैं काफी समय लेकर आया हूं। मुझे बताओ कि तुम कहां-कहां क्या-क्या करते हो? मैं सब जानना चाहता हूं।
आश्रम के दूर-दूर तक फैले हुए मकान हैं। कहीं भिक्षु रहते हैं, कहीं भोजन करते हैं, कहीं सोते हैं, कहीं स्नान करते हैं, कहीं अध्ययन करते हैं--कहीं कुछ, कहीं कुछ। बीच में, आश्रम के सारे विस्तार के बीच एक बड़ा भवन है, स्वर्ण-शिखरों से मंडित एक मंदिर है।
बांकेई ने कहा, भिक्षु जहां-जहां जो-जो करते हैं, वह मैं आपको दिखाता हूं। फिर वह ले चला। सम्राट को ले गया भोजनालय में और कहा, यहां भोजन करते हैं। ले गया स्नानगृहों में कि यहां स्नान करते हैं भिक्षु। ले गया जगह-जगह। सम्राट थकने लगा। उसने कहा कि छोड़ो भी, ये सब छोटी-छोटी जगह तो ठीक हैं, वह जो बीच में स्वर्ण-शिखरों से मंडित मंदिर है, वहां क्या करते हो? वहां ले चलो। मैं वह देखने को बड़ा आतुर हूं।
लेकिन न मालूम क्या हो कि जैसे ही सम्राट उस बीच में उठे शिखर वाले मंदिर की बात करे, बांकेई एकदम बहरा हो जाए, वह सुने ही न। एक दफा सम्राट ने सोचा कि शायद चूक गया, खयाल में नहीं आया। फिर दुबारा जोर से कहा कि और सब बातें तो तुम ठीक से सुन लेते हो! यह स्नानगृह देखने मैं नहीं आया, यह भोजनालय देखने मैं नहीं आया, उस मंदिर में क्या करते हो? लेकिन बांकेई एकदम चुप हो गया, वह सुनता ही नहीं। फिर घुमाने लगा--यहां यह होता है, यहां यह होता है।
आखिर वापस द्वार पर लौट आए, उस बीच के मंदिर में बांकेई नहीं ले गया। सम्राट घोड़े पर बैठने लगा और उसने कहा, या तो मैं पागल हूं या तुम पागल हो। जिस जगह को मैं देखने आया था, तुमने दिखाई ही नहीं। तुम आदमी कैसे हो? और मैं बार-बार कहता हूं कि उस मंदिर में ले चलो, वहां क्या करते हैं? तुम एकदम बहरे हो जाते हो। सब बात सुनते हो, इसी बात में बहरे हो जाते हो!
बांकेई ने कहा, आप नहीं मानते तो मुझे उत्तर देना पड़ेगा। आपने कहा, वहां-वहां ले चलो, जहां-जहां भिक्षु कुछ करते हैं, तो मैं वहां-वहां ले गया। वह जो बीच में मंदिर है, वहां भिक्षु कुछ भी नहीं करते। वहां सिर्फ भिक्षु भिक्षु होते हैं। वह हमारा ध्यान मंदिर है, Meditation Centre है। वहां हम कुछ करते नहीं, सिर्फ होते हैं। वहां doing नहीं है, वहां being है। वहां करने का मामला नहीं है। वहां जब करने से हम थक जाते हैं और सिर्फ होने का आनंद लेना चाहते हैं, तो हम वहां भीतर जाते हैं। अब मेरी मजबूरी थी, क्या करते, आपने कहा था वहां ले चलो।
नींद में मौन हो जाने का अर्थ सुषुप्ति है।
एक युवा संन्यस्त होने एक गुरु के पास पहुंचा। निर्जन मंदिर में उसने प्रवेश किया। गुरु ने उसके चारों तरफ देखा और कहा कि किसलिए आए हो? उस युवक ने कहा कि सब छोड़कर आया हूं तुम्हारे चरणों में, परमात्मा को खोजना है। उस गुरु ने कहा, पहले ये भीड़-भाड़ जो तुम साथ ले आए हो बाहर ही छोड़ आओ। उस युवक ने चौंककर चारों तरफ देखा, वहां तो कोई भी न था। भीड़- भाड़ का नाम ही न था, वह अकेले ही खड़ा था। उसने कहा, आप भी कैसी बात करते हैं, मैं बिलकुल अकेला हूं। तब तो उस युवक को थोड़ा शक हुआ कि मैं किसी पागल के पास तो नहीं आ गया!
उस गुरु ने कहा, वह मुझे भी दिखाई पड़ता है। आंख बंद करके देखो, वहां भीड़-भाड़ है। उसने आंख बंद की, जिस पत्नी को रोते हुए छोड़ आया है, वह दिखाई पड़ी। जिन मित्रों को गांव के बाहर विदा मांग आया है, वे खड़े हुए दिखाई पड़े। बाजार, दुकान, संबंधी, तब उसे समझ आया कि भीड़ तो साथ है।
जीवन में कोई उत्तर नहीं सीखे जाते, जीवन में दृष्टि सीखी जाती है।
एक बहुत बड़ा मूर्तिकार हुआ। उस मूर्तिकार को एक ही भय था सदा, मौत का। जब उसकी मौत करीब आने लगी, तो उसने अपनी ही ग्यारह मूर्तियां बना लीं। वह इतना बड़ा कलाकार था कि लोग कहते थे, अगर वह किसी की मूर्ति बनाए तो पहचानना मुश्किल है कि मूल कौन है, मूर्ति कौन है। मूर्ति इतनी जीवंत होती थी।
जब मौत ने द्वार पर दस्तक दी, तो वह अपनी ही ग्यारह मूर्तियों में छिपकर खड़ा हो गया। श्वास उसने साध ली। उतना ही फर्क था कि वह श्वास लेता, मूर्तियां श्वास न लेतीं। उसने श्वास रोक ली। मौत भीतर आई और बड़े भ्रम में पड़ गई। एक को लेने आई थी, यहां बारह एक जैसे लोग थे। लेकिन मौत को धोखा देना इतना आसान तो नहीं। मौत ने जोर से कहा -- और सब तो ठीक है, एक जरा सी भूल रह गई। वह चित्रकार बोला -- कौन सी भूल? मौत ने कहा -- यही कि तुम अपने को न भूल पाओगे।
जिस जगह आकर फरिश्ते के भी पिघल जाते हैं जोश
लीजिए हजरत सम्हलिए वह मुकाम आ ही गया
नैन -इन, एक जापानी जेन मास्टर थे । एक बार एक प्रोफ़ेसर उनसे जेन के बारे में कुछ पूछने आये, पर पूछने से ज्यादा वो खुद इस बारे में बताने में मग्न हो गए।
मास्टर ने प्रोफ़ेसर के लिए चाय मंगाई , और केतली से कप में चाय डालने लगे , प्रोफ़ेसर अभी भी अपनी बात करते जा रहा था की तभी उसने देखा की कप भर जाने के बाद भी मास्टर उसमे चाय डालते जा रहे हैं , और चाय जमीन पर गिरे जा रही है।
'यह कप भर चुका है, अब इसमें और चाय नहीं आ सकती ।', प्रोफ़ेसर ने मास्टर को रोकते हुए कहा - 'इस कप की तरह तुम भी अपने विचारों और ख़यालों से भरे हुए हो । भला जब तक तुम अपना कप खाली नहीं करते मैं तुम्हे जेन कैसे दिखा सकता हूँ ?', मास्टर ने उत्तर दिया ।
कृष्ण अर्जुन से -- तू अपने से मत लड़, तू अपने को स्वीकार कर। तू क्षत्रिय है, तू ब्राह्मण होने की नाहक चेष्टा मत कर। वह तेरा गुणधर्म नहीं है; वह तेरा स्वभाव नहीं है।
बुद्ध के जीवन में बड़ी प्यारी कथा है। बुद्ध एक जंगल से गुजरते हैं। उन्हें प्यास लग आई है। बूढ़े हो गए है बुद्ध। आखिरी दिनों की बात है मरने के कुछ छ महिने पहले की।
बुद्ध एक वृक्ष के नीचे बैठ जाते हैं आनंद से कहते हैं आनंद मुझे बड़ी प्यास लगी है। मुझसे और चला न जा सकेगा। हम एक झरना पीछे छोड़ आए हैं । तू वापस जा, यह मेरा भिक्षा-पात्र ले जा और जल भर ला।
आनंद पीछे लौट कर गया। लेकिन जो झरना वे पीछे छोड़ आए थे वह बिल्कुल गंदा-मटमैला हो गया था। अभी-अभी बैल-गाड़ियां उससे गुजर गई थी। तो सारा कीचड़-कवाड़ पत्ते--ऊपर उठ आए थे। पानी बिल्कुल गंदा हो गया था। पीने योग्य तो बिल्कुल ही नहीं था। और बुद्ध के लिए यह गंदा पानी आनंद ले जाए यह संभव नहीं था। वह वापस लौट आया। उसने कहा कि मैं आगे जाता हूं। कोई नदी खोजूंगा। वह झरना तो बड़ा गंदा हो गया। उससे आदमी निकल गए बैल-गाड़ियां निकल गईं। बैलों नें पानी पीया घोड़ों ने पानी पीया। वह तो बिल्कुल गंदा हो गया। वह पानी आपके लायक नहीं। बुद्ध ने कहा तू व्यर्थ परेशान न हो। फिर से जा। वही पानी ले आ।
बुद्ध ने आनंद से इतना ही कहा था कि अगर अब भी पानी गंदा हो तो तू किनारे बैठ जाना थोड़ी प्रतीक्षा करना।
बुद्ध कहें तो इनकार भी न कर सका आनंद। फिर गया और बड़ा हैरान हुआ। पानी फिर स्वच्छ हो गया था। पत्ते फिर वह गए थे। धूल-धवांस नीचे बैठ गई थी।
आनंद बैठ गया किनारे। थोड़े बहुत आखिरी कण धूल के तैरते होंगे वे भी बैठ गए। पानी एकदम स्फटिक जैसा शुद्ध-साफ हो गया। तब वह जल भर कर आया।
वह नाचता हुआ आया। उसने बुद्ध के चरणों में सिर रखा और उसने कहा आपने बड़ा गहरा संदेश दे दिया। आज मुझे सूत्र हाथ लग गया। यही सूत्र मैं मन के साथ भी उपयोग कर लूंगा। आज मेरे मन में एक बड़ी बात साफ हो गई। आपकी बड़ी अनुकंपा जो आपने मुझे वापस भेजा। मैं जाने को तैयार भी नहीं था। लेकिन क्रांति हो गई है--उस तट पर बैठे-बैठे।
उस झरने के पास बैठे-बैठे एक बात समझ में आ गई कि अगर मैं उतर जाऊं जल में। अगर आपने न कहा होता तो मैंने उतर कर शुद्ध करने की कोशिश की होती और उसी में सब अशुद्ध हो गया होता। मेरे उतरते ही से और कीचड़ उठ आई होती। आपने ठीक कह दिया था कि किनारे बैठ जाना और प्रतिक्षा करना। कुछ करना मत बस देखते रहना। अपने से झरना शुद्ध हो जाएगा। ऐसा ही मैं अपने मन के साथ भी कर लूंगा। मन में भी मैं उतर-उतर जाता हूं। मन को भी नियंत्रण में लाने की कोशिश करने लगता हूं। उसी कोशिश में मन मेरे हाथ से छिटक-छिटक जाता है। आज जैसे यह जल का झरना शांत हो गया निर्मल हो गया ऐसे ही मेरे मन का झरना भी मैं शांत और निर्मल कर लूंगा।
बुद्ध ने कहा इसीलिए तुझे वापस भेजा था। सदगुरु प्रत्येक स्थिति का उपयोग कर लेते है। यही जागरण तुझे आ जाए यही बोध यही बीज तेरे भीतर अंकुरित हो जाए इसीलिए तुझे वापस भेजा था। ठीक किया आनंद। शुभ किया आनंद। तू समझ गया। तू ने समझदारी की। यही राज है।
मैं तुमसे कह रहा हूं, कहना शुरू कर दिया है,
तौला नहीं है इसका छंद, सिर्फ खोल कर हवा में प्राण भर दिया है
मैं कह रहा हूं, तुम्हें सुनना चाहिए
फूल जो तुम्हारे लिए खिलाए जा रहे हैं, उनमें से तुम्हें, कुछ न कुछ चुनना चाहिए
आओ सुनो, और चुनो, मैं तुमसे कह रहा हूं।
अभाव
कथा :
महात्मा गांधी के मर जाने के बाद मुहम्मद अली जिन्ना उदास रहे । जिस दिन महात्मा गांधी की मौत हुई, जिन्ना अपने बाहर बगीचे में लान पर बैठा था । और तब तक जिन्ना ने जिद की थी, यद्यपि वे गवर्नर जनरल थे पाकिस्तान के, तब तक जिद की थी कि मेरे पास कोई सुरक्षा का इंतजाम नहीं होना चाहिए । 'मुसलमानों का देश, उनके लिए मैं जीया, उनके लिए मैंने सब किया, उनमें से कोई मुझे मारना चाहेगा, यह बात ही फिजूल है ।' इसलिए तब तक बहुत आग्रह किए जाने पर भी उन्होंने कोई सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की थी । लेकिन जैसे ही उनके सेक्रेटरी ने आ कर खबर दी कि गांधी को गोली मार दी गई, जिन्ना एकदम उठ कर बगीचे से भीतर चला गया । और दूसरी बात जो जिन्ना ने कही अपने सेक्रेटरी को, कि सुरक्षा का इंतजाम कर लो । जब हिंदू गांधी को मार सकते हैं, तो अब कुछ भरोसा नहीं । अब किसी का भरोसा नहीं किया जा सकता । तो मुसलमान जिन्ना को भी मार सकते हैं । उसके बाद जिन्ना के चेहरे पर वह प्रसन्नता कभी नहीं रही जो सदा थी । दुश्मन मर गया । गांधी के मरते ही जिन्ना भी मर गए । कुछ खो गया ।
भगोड़ा कहता है, स्त्री को देखना मत । ज्ञानी कहता है, होशपूर्वक देखना ।
एक चोर मुल्ला नसरुद्दीन के घर में घुसा। आधी रात, अंधेरे में। जैसे ही वह उसके घर में भीतर गया, अकेला नसरुद्दीन बिस्तर पर सोया था। वह भीतर गया नसरुद्दीन भी चुपचाप उठा और जा कर उसके कंधे पर हाथ रख कर बोला कि भाई साहब, घबराओ न। मैं जरा मोमबत्ती जला लूं!
चोर बहुत घबराया। उसने कहा -- 'मोमबत्ती किसलिए?'
नसरुद्दीन ने कहा: "तुम बिलकुल चिंता न करो। मैं तीस साल से इस घर में रहता हूं, खोज खोज मर गया, कुछ नहीं मिला; हो सकता है तुम्हारा भाग्य से कुछ मिल जाए। आधा-आधा कर लेंगे।'
कल मैं चालाक था, इसलिए मैं दुनिया बदलना चाहता था, आज मैं बुद्धिमान हूँ, इसलिए मैं अपने आप को बदल रहा हूँ। -- मौलाना रूमी
भाषा
कथा :
खलील जिब्रान की एक कहानी है । एक आदमी परदेस गया । वह एक बड़े होटल के सामने खड़ा है । लोग भीतर आ रहे हैं, जा रहे हैं, बैरे लोगों का स्वागत कर रहे हैं -- उसने समझा कि कोई राज-भोज है । वह भी चला गया । उसका भी स्वागत किया गया । उसको भी बिठाया गया । थाली लगाई गई, उसने भोजन किया ।
उसने कहा, अदभुत नगर है ! इतना अतिथि-सत्कार ! फिर बैरा तश्तरी में रख कर उसका बिल ले आया । लेकिन वह समझा कि बड़े अदभुत लोग हैं, लिख कर धन्यवाद भी दे रहे हैं कि आपने बड़ी कृपा की कि आप आए ! वह झुक-झुक कर नमस्कार करने लगा । वह बोला कि बड़ा खुश हूं । मगर वह बैरे को कुछ समझ में न आया कि मामला क्या है, यह झुक किसलिए रहा है, नमस्कार किसलिए कर रहा है ! कुछ समझा नहीं, तो मैनेजर को बुला लाया ।
उस आदमी ने समझा कि हद हो गई, अब खुद मालिक आ रहा है महल का ! वह झुक-झुक कर नमस्कार करने लगा और बड़ी प्रशंसा करने लगा, लेकिन एक-दूसरे की बात किसी को समझ में न आए । मैनेजर ने समझा, या तो पागल है या हद दर्जे का धूर्त है । उसको पुलिस के हवाले कर दिया । वह समझा कि अब शायद सम्राट के पास ले जा रहे हैं । वह ले जाया गया अदालत में, मजिस्ट्रेट बैठा था, वह समझा कि सम्राट... ।
मजिस्ट्रेट ने सारी बात समझने की कोशिश की, लेकिन समझने का वहां कोई उपाय न था । वहां भाषा एक-दूसरे की कोई जानता न था । आखिर उसने दंड दिया कि कुछ भी हो, इसको गधे पर बिठा कर, तख्ती लगा कर इसके गले में कि यह धूर्त है, दगाबाज है और दूसरे लोग सावधान रहें ताकि यह गांव में किसी और को धोखा न दे सके, इसकी फेरी लगवाई जाए । जब उसको गधे पर बिठाया जाने लगा, तब तो उसकी आंख से आंसू बहने लगे आनंद के । उसने कहा, हद हो गई, अब जुलूस निकाला जा रहा है ! मैं सीधा-सादा आदमी, मैं कोई नेता वगैरह नहीं हूं मगर मेरा जुलूस निकाला जा रहा है । मैं तो बिलकुल गरीब आदमी हूं, यह तो नेताओं को शोभा देता है, यह आप क्या कर रहे हैं !
मगर कोई उसकी सुने नहीं । जब वह गधे पर बैठ कर गांव में घूमने लगा तो स्वभावत: भीड़ भी पीछे चली । बच्चे चले शोरगुल मचाते । उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं है । जीवन में ऐसा कभी अवसर मिला नहीं था । एक ही बात मन में चुभने लगी कि आज कोई अपने देश का होता और देख लेता । जा कर कहूंगा तो कोई मानेगा भी नहीं ।
वह बडी गौर से देख रहा है भीड़ को । जब बीच चौरस्ते पर उसका जुलूस पहुंचा-शोभा-यात्रा -और काफी भीड़ इकट्ठी हो गई, तो उसे भीड़ में एक आदमी दिखाई पड़ा । वह आदमी उसके देश का था । वह चिल्लाया कि अरे, मेरे भाई, देखो क्या हो रहा है ! लेकिन वह दूसरा आदमी तो इस देश की भाषा समझने लगा था, यहां कई साल रह चुका था । ऐसा सिर झुका कर वह भीड़ में से निकल गया कि कोई दूसरा यह न देख ले कि हमारा इनसे संबंध है । लेकिन गधे पर बैठे हुए नेता ने समझा कि हद हो गई, ईर्ष्या की भी एक सीमा होती है !
भाषा समझ में न आए तो फिर मनगढ़ंत है सब हिसाब ।
आरोग्य परम लाभ है, संतुष्टि परम धन है, विश्वास परम बंधु है, निर्वाण परम सुख है ।
सुनी-अनसुनी
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन कुछ वर्षों लंदन में रहता था । दिल्ली में रहने वाले उसके छोटे भाई ने एक दिन उससे फोन पर बातचीत की । हाल-चाल पूछने के बाद छोटे भाई ने कहा भैया, मां कह रही हैं कि पांच सौ रुपये भेज दो ।
मुल्ला ने कहा -- क्या कहा ? कुछ सुनाई नहीं दे रहा ।
अब तक सब सुनाई दे रहा था । अचानक बोला : कुछ सुनाई नहीं दे रहा । छोटे ने फिर भी चिल्ला कर कहा, मां कह रही हैं पांच सौ रुपए भेज दो । मुल्ला ने फिर भी वही उत्तर दिया । छोटे ने और भी चिल्ला कर कहा, पर बड़े ने, मुल्ला ने, फिर भी वही जवाब दिया । इतने में आपरेटर, जो दोनों की बातें सुन रहा था, बोला अरे भाई, आपको सुनाई कैसे नहीं दे रहा ? आपकी मां कह रही हैं कि पांच सौ रुपए भेज दो !
मुल्ला ने कहा -- तुझे अगर सुनाई दे रहा है तो तू ही क्यों नहीं भेज देता ?
सुनाई तो सभी को दे रहा है, लेकिन वह पांच सौ रुपए भेजना !
प्रियों का संग न करे और न कभी अप्रियों का ही । प्रियों का अदर्शन दुखदाई होता है और अप्रियों का दर्शन भी दुखदाई होता है ।
एक गांव में एक धनपति था -- बडा कंजूस ! बामुश्किल दान देता था । और बाद में वह बहरा भी हो गया । लोगों को तो शक था कि वह बहरा इसीलिए हो गया कि लोग दान मांगने आएं तो वह कान पर हाथ रख ले, वह कहे कि कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा । पर एक आदमी आया । वह भी खूब चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था ।
उसने कहा कि भई बाएं तरफ से कह, मुझे दाएं कान में तो कुछ सुनाई पड़ता नहीं । उसने बाएं कान में कहा, बड़ी हिम्मत करके कहा कि सौ रुपए । दे तो वह लाख सकता था; लेकिन कंजूस है, कृपण है । सौ रुपए सुन कर उसने कहा कि नहीं भई, बाएं कान में ठीक सुनाई नहीं पड़ रहा, तू दाएं में कह । दाएं तक आते हुए उसने सोचा कि अब इसको सुनाई ही नहीं पड़ रहा, न सौ सुनाई पड़ रहे हैं, तो क्यों न बदल लूं-उसने कहा, दो सौ रुपए । उसने कहा, फिर बाएं वाली बात ही ठीक है । फिर जो बाएं से सुनाई पड़ा, वह ही ठीक है ।
सुनाई तो सब पड़ रहा है, बहरे बने बैठे हो ! क्योंकि सुनो तो जीवन में एक क्रांति घटेगी ।
प्रिय से शोक उत्पन्न होता है, प्रिय से भय उत्पन्न होता है । प्रिय से विमुक्त को शोक नहीं होता, फिर भय कहाँ से होगा ?
कोल्हू का बैल
कथा :
एक तर्कशास्त्री एक तेली के घर तेल लेने गया । वह बड़ा हैरान हुआ-तर्कशास्त्री था ! उसने देखा कि तेली तेल बेच रहा है और उसकी ठीक पीठ के पीछे कोल्हू चल रहा है; कोई चला नहीं रहा, बैल खुद ही चल रहा है । वह बहुत हैरान हुआ । उसने कहा कि तेली भाई, यह मुझे बड़े विस्मय में डालती है बात, क्योंकि बैल तो मारे-मारे नहीं चलते, यह तुम धार्मिक बैल कहां से पा गए ? ये तो सतयुग में हुआ करती थीं बातें, यह कलयुग चल रहा है । और यह सतयुगी बैल तुम्हें कहां से मिल गया ? यह अपने-आप चल रहा है; न कोई कोड़ा फटकारता है, न कोई पीछे मारता है ! उस तेली ने कहा कि यह अपने-आप नहीं चल रहा है, चलाया जा रहा है । उसके पीछे तरकीब है । आदमी की बुद्धि क्या नहीं कर सकती !
उस तर्क-शास्त्री ने कहा कि मैं जरा तर्क का विद्यार्थी हूं मुझे तुम समझाओ कि क्या मामला है ? तो उसने कहा -- देखते हैं, बैल के गले में घंटी बांध दी है ! बैल चलता रहता है, घंटी बजती रहती है । तो मुझे घंटी सुनाई पड़ती रहती है । जब तक बैल चलता है, घंटी बजती रहती है । जैसे ही घंटी रुकी कि मैं उठा और मैंने बैल को लगाई चोट । तो बैल को यह कभी पता ही नहीं चलता कि पीछे मालिक नहीं है । इसमें देर नहीं होती; घंटी रुकी कि मैंने कोड़ा मारा । तो बैल चलता रहता है, घंटी बजती रहती है । आंख पर पट्टियां बांध दी हैं । तो बैल को कुछ दिखाई तो पड़ता नहीं कि मालिक कहां है ।
तर्क-शास्त्री तर्क-शास्त्री था । उसने कहा -- और ऐसा भी तो हो सकता है कि बैल खड़ा हो जाए और सिर हिला कर घंटी बजाए ।
उस तेली ने कहा -- महाराज, जोर से मत बोलो, बैल न सुन ले ! तो और यह कहां की झंझट आप आ गए ! अभी तक बैल ने ऐसा किया नहीं । धीरे बोलो ! और दुबारा इस तरह की बात मत करना ।
जिनके तुम बैल हो; जिन पंडित-पुरोहितो के तुम बैल हो, जिन्होंने तुम्हारे गले में घंटी बांधी है, वे तुम्हें सुनने न देंगे नए की बात । वे अटकाव डालेंगे । उन्होंने तुम्हारी आंख पर पट्टियां बांधी हैं । उन्होंने सब भांति इस तरह इंतजाम किया है कि तुम अंधे की तरह जीयो और अंधे की तरह मर जाओ ।
जो भड़के हुए क्रोध को घूमते हुए रथ के सामान रोक ले, उसे सारथी कहते हैं, दूसरे लोग तो मात्र लगाम पकड़ने वाले होते हैं ।
एक बार एक महात्माजी अपने कुछ शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहते थें, एक दिन कहीं से एक बिल्ली का बच्चा रास्ता भटककर आश्रम में आ गया । महात्माजी ने उस भूखे प्यासे बिल्ली के बच्चे को दूध-रोटी खिलाई । वह बच्चा वहीं आश्रम में रहकर पलने लगा। लेकिन उसके आने के बाद महात्माजी को एक समस्या उत्पन्न हो गयी कि जब वे सांय ध्यान में बैठते तो वह बच्चा कभी उनकी गोद में चढ़ जाता, कभी कन्धे या सिर पर बैठ जाता । तो महात्माजी ने अपने एक शिष्य को बुलाकर कहा देखो मैं जब सायं ध्यान पर बैठू, उससे पूर्व तुम इस बच्चे को दूर एक पेड़ से बांध आया करो। अब तो यह नियम हो गया, महात्माजी के ध्यान पर बैठने से पूर्व वह बिल्ली का बच्चा पेड़ से बांधा जाने लगा ।
एक दिन महात्माजी की मृत्यु हो गयी तो उनका एक प्रिय काबिल शिष्य उनकी गद्दी पर बैठा । वह भी जब ध्यान पर बैठता तो उससे पूर्व बिल्ली का बच्चा पेड़ पर बांधा जाता । फिर एक दिन तो अनर्थ हो गया, बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुयी कि बिल्ली ही खत्म हो गयी। सारे शिष्यों की मीटिंग हुयी, सबने विचार विमर्श किया कि बड़े महात्माजी जब तक बिल्ली पेड़ से न बांधी जाये, तब तक ध्यान पर नहीं बैठते थे। अत: पास के गॉवों से कहीं से भी एक बिल्ली लायी जाये। आखिरकार काफी ढूंढने के बाद एक बिल्ली मिली, जिसे पेड़ पर बॉधने के बाद महात्माजी ध्यान पर बैठे।
उसके बाद जाने कितनी बिल्लियॉ मर चुकी और न जाने कितने महात्माजी मर चुके। लेकिन आज भी जब तक पेड़ पर बिल्ली न बॉधी जाये, तब तक महात्माजी ध्यान पर नहीं बैठते हैं। कभी उनसे पूछो तो कहते हैं यह तो परम्परा है। हमारे पुराने सारे गुरुजी करते रहे, वे सब गलत तो नहीं हो सकते । कुछ भी हो जाये हम अपनी परम्परा नहीं छोड़ सकते।
अर्जुन सोचता है कि वह एक बड़े युद्ध से बच रहा है। और कृष्ण देख रहे है कि वह एक बड़े युद्ध की शुरुआत कर रहा है। यह बड़ा बुनियादी और बारीक मामला है।
जाल
कथा :
एक मां अपने बेटे को कह रही थी कि बेटा, सदा दूसरों की सेवा करनी चाहिए । उसने पूछा: 'क्यों ?' उसकी मां ने कहा: 'क्यों ! शास्त्र ऐसा कहते हैं । भगवान ने इसीलिए तो बनाया हमें कि हम दूसरों की सेवा करें ।' उस बेटे ने कहा -- और दूसरों को किसलिए बनाया है ? इसका भी तो कुछ उत्तर होना चाहिए । हम उनकी सेवा करें, इसलिए बनाया है, और हमको इसीलिए बनाया है कि वे हमारी सेवा करें । तो सब अपनी- अपनी सेवा न कर लें, यह इतना जाल क्यों फैलाना ?
तुम अपेक्षा दूसरे की पूरी करो, दूसरे तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी कर रहे हैं । न वे प्रसन्न हैं, न तुम प्रसन्न हो । जगत बिलकुल उदास हो गया है ।
हे अतुल ! यह पुरानी बात है, लोग चुप बैठे हुए की निंदा करते हैं, बहुत बोलने वाले की निंदा करते हैं, मितभाषी की भी निंदा करते हैं । संसार में अनिंदित कोई नहीं है ।
भूख
कथा :
सिकंदर विश्व-विजय की यात्रा को निकला । अनेक देशों को जीतता हुआ, एक पहाड़ी कबीले के पास आया । उसे भी सिकंदर ने जीतना चाहा । जब हमला किया तो चकित हुआ । कबीले के नग्न लोग बैंण्ड-बाजे लेकर उसका स्वागत करने आए थे । थोड़ा सकुचाया भी । उसका इरादा तो हमले का था । वहा तो कोई लड़ने को तैयार ही न था । उस कबीले के लोगों के पास अस्त्र-शस्त्र थे ही नहीं । उन्होंने कभी अपने इतिहास में युद्ध जाना ही न था । वस्त्र भी उनके पास न थे । बड़े मकान भी उनके पास न थे -- झोपड़े थे; उन झोपड़ों में कुछ भी न था । क्योंकि संग्रह की वृत्ति उन्होंने कभी पाली नहीं ।
जहां संग्रह है वहां हिंसा होगी । जहां संग्रह है वहां युद्ध भी होगा । जहां मालकियत है वहां प्रतिस्पर्धा भी है ।
वे सिकंदर को ले गए । सिकंदर सकुचाया । किंकर्तव्य-विमूढ़ ! वह तो एक ही बात जानता था -- लड़ना । वे उसे अपने प्रधान के झोपड़े में ले गए । उसका बड़ा स्वागत किया गया फूल-मालाओं से । फिर प्रधान ने उसके लिए भोजन बुलाया । सोने की थाली-सोने की ही रोटी ! हीरे-जवाहरात जड़े हुए बर्तन-और हीरे-जवाहरातों की ही सब्जी ! सिकंदर ने कहा तुम पागल हुए हो ? सोने की रोटी कौन खाएगा ! हीरे-जवाहरातों की सब्जी ! तुमने मुझे समझा क्या है ? आदमी हूं ।
उस बूढ़े प्रधान ने कहा । हम तो सोचे कि आप अगर साधारण रोटी से ही तृप्त हो सकते हैं तो अपने देश में ही मिल जाती । इतनी दूर, इतनी यात्रा करके न आना पड़ता ! इतना संघर्ष, इतना युद्ध, इतनी हिंसा, इतनी मृत्यु-गेहूं की रोटी खाने को ? साधारण सब्जी खाने को ? यह तो तुम्हारे देश में ही मिल जाता । फिर क्या तुम पागल हुए हो ? इसलिए हमने तो जैसे ही खबर सुनी कि तुम आ रहे हो, बामुश्किल इकट्ठा करके किसी तरह खदानों से सोना, यह सब इंतजाम किया ।
वह बोला एक बात मुझे पूछनी है फिर : तुम्हारे देश में वर्षा होती है ? गेहूं की बालें पकती हैं ? घास उगती है ? सूरज चमकता है ? चांद-तारे निकलते हैं रात में ?
सिकंदर ने कहा : पागल हो तुम ! क्यों न निकलेगा सूरज ? क्यों न निकलेंगे चांद-तारे ? मेरा देश और देश जैसा ही देश है ।
वह सिर हिलाने लगा और कहा कि मुझे भरोसा नहीं आता । तुम्हारे देश में पशु-पक्षी हैं ? जानवर हैं ?
सिकंदर ने कहा: निश्चित हैं ।
वह हंसने लगा । उसने कहा: तब मैं समझ गया । तुम जैसे आदमियों के लिए तो परमात्मा सूरज को निकालना कभी का बंद कर दिया होता, पशु-पक्षियों के लिए ही निकलता होगा । वर्षा कभी की बंद कर दी होती तुम जैसे आदमियों के लिए-पशु-पक्षियों के लिए करनी पड़ती होगी ।
कहते हैं, सिकंदर इस तरह किसी पर हमला करके कभी न पछताया था ।
विजय वैर को जन्म देती है, पराजित दुःख की नींद सोता है । शांत-चित्त जय और पराजय को छोड़कर सुख की नींद सोता है ।
एक अंतर्राष्ट्रीय भोज-सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें दूर-दूर देशों से आए हुए महारथी सम्मिलित हुए थे। सम्मेलन में सबसे ज्यादा भोजन करने वाले व्यक्ति को सम्मानित किया जाने वाला था तथा उसे अनेक उपहार दिए जाने वाले थे। प्रतियोगिता आरंभ हुई और अंततः चंदूलाल ने दो सौ पूरियां, चार सौ रसगुल्ले, दो सौ प्लेट दही-बड़े, चार सौ कचौड़ियां और अस्सी गिलास शरबत पीकर अंत तक मैदान में अपने को जमाए रखा। निर्णायकों ने घबड़ा कर उसे विजयी घोषित किया कि कहीं मर-मरा न जाए। वह तो अभी तत्पर था और। वह तो कहता था, और थोड़ा चल जाने दो। रिकार्ड ही कायम कर देना है! मगर निर्णायक घबड़ा गए, उन्होंने कहा कि रिकार्ड कायम हो गया। मगर हम पर भी दया करो, नहीं तो हम पकड़े जाएंगे। अगर तुम मर गए तो पुलिस हमें सताएगी।
उन्होंने उसे विजयी घोषित किया और पुरस्कार लेने के लिए स्टेज पर आमंत्रित किया। बामुश्किल उठ सका चंदूलाल। तुम खुद ही सोच लो कैसे उठा होगा। मगर उठ गया।
अहंकार की तृप्ति जो न करवा ले थोड़ा है। मुर्दा उठ आते हैं। कोई मर जाए, उसके कान में अगर जाकर कह दो कि अरे, यह भी कोई वक्त है मरने का! अभी चुनाव पास, जीतने का मौका! और तुम हैरान मत होना अगर वह उठ कर बैठ जाए।
किसी तरह चंदूलाल उठ कर खड़ा हो गया, स्टेज पर पहुंचा। पुरस्कार लेने के बाद लोगों को संबोधित करते हुए बोला, दोस्तो! मैं आज यहां इस प्रतियोगिता में सम्मिलित हुआ हूं, कृपया इस बात को मेरी पत्नी तक न पहुंचने दें, अन्यथा वह मुझे आज का खाना नहीं देगी और मैं भूखा रह जाऊंगा।
लोग भरे जाते हैं, भरे जाते हैं। फिर भी भरता नहीं कुछ; फिर भी खाली के खाली रह जाते हैं।
वही चंदूलाल विश्व-प्रतियोगिता-फेम एक दिन घबड़ाए हुए डाक्टर के यहां पहुंचे और बोले, डाक्टर साहब, आजकल मुझे भूख नहीं लगती।
डाक्टर ने पूछा, आज सबेरे से क्या खाया?
चंदूलाल बोले, सबेरे बिस्तर पर वही कोई दस कप चाय पी और चाय के साथ दस-पंद्रह प्लेट जलेबियां। फिर हाथ-मुंह धोकर बाजार गया। वहां कोई पंद्रह प्लेट समोसे और कोई छह गिलास दूध पीया। फिर शहर का एक चक्कर मारा, तब तक ग्यारह बज चुके थे और भोजन का समय भी हो चुका था, सो घर पहुंचा। वहां बीस रोटियां और दस प्लेट चावल और कोई दस संतरे खाए, और...
डाक्टर बीच में ही टोकते हुए बोला, तो क्या अब मुझे खाने का इरादा है?
आत्मज्ञान के बिना व्यक्ति खाली है ही। और खालीपन काटता है; इसे किसी तरह भर लो! लोग ज्यादा भोजन करके भर लेते हैं। कोई धन इकट्ठा करता है, कोई ज्ञान इकट्ठा करता है।
कमाल
कथा :
कबीर का एक बेटा था : कमाल । कमाल का ही रहा होगा, इसलिए कबीर ने उसे नाम ’कमाल' दिया था । और कबीर जब नाम दें तो ऐसे ही नाम नहीं दे देते; कुछ सोच कर दिया होगा । लेकिन कमाल के संबंध में और शिष्यों को बड़ी ईर्ष्या थी । एक तो वह कबीर का बेटा था, तो उसकी प्रतिष्ठा थी, इसलिए शिष्यों को ईर्ष्या भी थी । और यह डर भी था कि कहीं आखिर में वही उत्तराधिकारी न हो जाए । इसलिए उस बेटे को खिसकाने के लिए उसके विरोध में हजार बातें लाने में लगे रहते थे ।
आखिर कबीर ने कहा कि ठीक, शिकायत क्या है तुम्हारी ? तो उन्होंने कहा कि आप और इसमें बड़ा फर्क है, यह आपसे बिलकुल विपरीत है । हमें शक है कि यह त्याग की बातें ऊपर-ऊपर से करता है, भीतर यह भोगी है । इसे आप अलग कर दें,इसके कारण आपकी बदनामी होती है । देखें, कल ही एक धनपति आपको हजार मुद्राएं भेंट करने आया था; आपने तो इंकार कर दिया; यह बाहर बैठा था दरवाजे पर, इसने पूछा : ‘अरे क्या लिए जाते हो ?’ तो उस धनपति ने कहा कि भेंट करने आया था कबीर को, वे तो लेते नहीं । तो कमाल ने क्या कहा ? कमाल ने कहा कि अब यहां तक बोझ ढोया है, फिर वापिस बोझ ढो कर घर ले जाएगा ! डाल दे यहीं !
तो शिष्यों ने कहा कि यह तो बेईमानी है, चालबाजी है । कबीर तो समझते होंगे । उन्होंने कहा कि ठीक, तो कमाल को अलग कर देते हैं । कमाल का झोपड़ा अलग कर दिया गया । काशी-नरेश कभी-कभी आते थे कबीर के पास । उन्होंने देखा कि कमाल दिखायी नहीं पड़ता । उन्हें कमाल में रुचि थी, रस था । पूछा: ‘कमाल दिखायी नहीं पड़ता ?’ कबीर ने कहा कि शिष्य उसके बड़े पीछे पड़े थे, अलग कर दिया, पास के झोपड़े में है । कारण पूछा तो कारण बताया ।
तो सम्राट गया । उसने अपनी जेब से एक बहुमूल्य हीरा निकाला और कहा कि आपको भेंट करने आया हूं-कमाल से कहा । कमाल ने कहा -- लाए भी तो पत्थर ! खाएंगे कि पीएंगे इसको ? इसका करेंगे क्या !’ यह सुन कर सम्राट ने मन में सोचा कि अरे ! और लोग कहते हैं कि भोगी और यह तो: इससे और महात्यागी क्या होगा ! इतना बहुमूल्य हीरा, शायद भारत में उस जैसा दूसरा हीरा न हो उस समय ! तो जेब में रखने लगे । तो कमाल ने कहा -- अब ले आए, अब कहां वापस ले जाते हो ! पत्थर ही है, डाल दो यहां !' तब जरा सम्राट को भी शक हुआ । तो उसने पूछा -- कहां डाल दूं ? तो कमाल ने कहा -- अगर पूछते हो कहां डाल दूं तो फिर ले ही जाओ । क्योंकि फिर तुमने इसे पत्थर नहीं समझा, इसका मूल्य है तुम्हारे मन में । अरे कहीं भी डाल दो, पत्थर ही है !
लेकिन सम्राट कैसे मान ले कि पत्थर ही है । है तो बहुमूल्य हीरा । तो कहा यहां झोपड़े में खोंस जाता हूं ।’ वह भी परीक्षा के लिए । सनौलियों की छप्पर थी, उसमें खोंस गया । सोचा कि मेरे जाते ही कमाल उसे निकाल लेगा । आठ दिन बाद वापिस आया । पूछा कमाल से कि मैं एक हीरा लाया था । कमाल ने कहा कि हीरा होता ही नहीं, लाओगे कहां से ? सब पत्थर हैं !
सम्राट ने कहा : चलो पत्थर सही ! मैं यहां लगा गया था झोपड़े में उसका क्या हुआ ? कमाल ने कहा: अगर किसी ने न निकाला हो तो वहीं होगा, तुम देख लो ।
वह हीरा वहीं खोंसा था ।
अब कमाल को समझना मुश्किल हो जाएगा । न तो भोगी इसे समझ पाएगा और न त्यागी इसे समझ पाएगा । यह परम अवस्था है । कबीर ने ठीक ही कहा कि इसका नाम कमाल है ।
फरीद -- सत्य में असत्य में फासला सिर्फ चार अंगुल का है, बस, जितना कान और आंख के बीच का फासला है, उतना ।
होनहार
कथा :
एक यहूदी कथा है कि एक सम्राट ऐसा ही भरोसा करता था कि जो होना है, होता है । गांव में एक भिखमंगा था -- बस एक ही भिखमंगा था । पूरी राजधानी धन-संपन्न थी । अंधा था भिखमंगा । नहीं कि आंख से अंधा था; बस कुछ ऐसा अंधापन था कि जो भी करता गलत हो जाता, कि गलत ही चुनता, कि गलत दिशा में ही जाता । जब सारे लोग बाजार में बेच रहे होते, तब वह खरीदता; जब चीजों के दाम गिर रहे होते, तब वह फंस जाता । जो करता, गलत हो जाता । वजीरों को उस पर दया आई । उन्होंने सम्राट से कहा कि गांव पूरा धनी है; यह एक आदमी बेचारा उलझन में पड़ा रहता है, इसका कुछ भाग्य विपरीत है, इसकी बुद्धि उल्टी है । जब सारी दुनिया कुछ कर रही है, वह न करेगा । जब सब सफल हो रहे हैं, धन कमा रहे हैं, तब न कमाएगा । जब सारे लोग फसल बो रहे हैं तब वह बैठा रहेगा । जब मौसम है बीज डालने का तब बीज न डालेगा; जब मौसम चला जाएगा तब बीज डालेगा । तब बीज भी सड़ जाते हैं; वे फिर पैदा नहीं होते हैं । फसल तो आती नहीं, हाथ का भी चला जाता है । इस पर कुछ दया करें ।
सम्राट ने कहा -- दया करने से कुछ भी न होगा, लेकिन तुम कहते हो तो एक प्रयोग करें ।
वह आदमी रोज सांझ को बाजार से लौटता अपने घर, तो एक पुल को पार करता है । सम्राट ने कहा -- पुल खाली कर दिया जाए । और अशर्फियों से भरा हुआ एक घडा, बड़ा घडा बीच पुल पर रख दिया । सम्राट और वजीर दूसरे किनारे बैठे हैं । पुल खाली कर दिया गया । कोई दूसरा जा न सकेगा ।
वही आदमी निकला अपनी धुन में, अपने सोच-विचार में, गुनगुनाता, ओंठ फड़फड़ाता । वजीर चकित हुए कि पुल पर पैर रखते ही उसने आंख बंद कर ली । वे बड़े हैरान हुए कि हद हो गयी । अब यह मूर्ख आंख क्यों बंद कर रहा है पुल पर ! लेकिन वह आंख बंद करके और टटोल-टटोल कर पार हो गया और घड़े को वहीं छोड़ गया, क्योंकि अंधे को अब घड़ा क्या दिखायी पड़ता ! जब वह उस तरफ पहुंच गया तो सम्राट ने कहा कि देखो......: । उसे पकड़ा । उससे पूछा कि महापुरुष, आंख क्यों बंद की ? उसने कहा कि कई दिन से मेरे मन में यह खयाल था कि एक दफे आंख बंद करके पुल पार करें । आज खाली देख कर, कि पुल पर कोई भी नहीं है, मैंने सोचा कर लो, यह मौका फिर न मिलेगा । राह खाली है, गुजर जाओ । यह अनुभव के लिए कि आंख बंद करके चल सकते हैं कि नहीं ।
'आज ही सूझा तुम्हें यह ?'
'नहीं, योजना तो पुरानी थी, लेकिन रास्ता कभी खाली नहीं होता था । लोग आ रहे जा रहे, धक्का-धुक्की हो जाए ।'
सम्राट ने कहा -- जो होना होता है, होता है ।
तुम कोई उपाय खोज लोगे सफल होने का तो असफलता तुम्हें खोजती आ जाएगी । यह बहुत कठिन तत्व है, क्योंकि अहंकार के विपरीत इससे बड़ी और कोई बात नहीं हो सकती । तो सिर्फ जो अकिंचन है, जिसने अहंकार छोड़ा, वही इसे समझ पाएगा ।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जो आदमी असफल होता रहता है, वह सफलता से डरने लगता है, क्योंकि प्रतिष्ठा का सवाल है। वह लोगों से कहता रहता है, असफलता ही मेरा भाग्य है। सारी दुनिया मेरे खिलाफ है। नियति मेरे विपरीत है, परमात्मा मेरे विपरीत काम कर रहा है! यह वह इतनी दफे कह चुका होता है कि अब उसे डर लगता है कि कहीं मैं सफल न हो जाऊं। नहीं तो मेरे पुराने वक्तव्यों का क्या होगा! तो अगर सफलता हाथ में भी आती हो, तो वह चूक जाएगा, छोड़ देगा, और फिर कहेगा कि देखो, नियति, भाग्य! मेरे को सफलता मिलने वाली ही नहीं है।
अपने ही दुश्मन बनकर हम जीते हैं। अपने मित्र बनकर जीने की बात है।
'सारे संस्कार अनित्य हैं' इसको जब कोई प्रज्ञा से देख लेता है तब उसको दुखों से निर्वेद प्राप्त होता है -- ऐसा है यह विशुद्धि का मार्ग !
विष्णु शिव से मिलने कैलाश आए थे। उनके वाहन हैं गरुड। वे विष्णु को उतार कर द्वार पर बाहर ही रुके थे, तभी उनकी दृष्टि तोरण पर बैठे भय से कांपते एक कपोत पर पडी। उन्होंने उससे भय का कारण पूछा। वह कपोत रोने लगा और बोलाः 'अभी-अभी यमराज भीतर गए हैं। वे मुझे देख ठिठके, विस्मयपूर्वक निहारा और फिर मुस्कुरा कर गदा हिलाते हुए आगे बढ गए। उनकी यह भेद-भरी हंसी मेरी मृत्यु की निश्चित सूचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मेरा अंत निकट है।' वह कपोत और जोर-जोर से रोने लगा। गरुड ने कहाः 'छिः छिः! तू व्यर्थ ही इतना भयातुर है। तू अभी युवा है, इसलिए रोग से मरने की तेरी संभावना नहीं। रहा शत्रु का भय, सो आ मेरी पीठ पर बैठ। निमिष मात्र में तुझे यहां से करोड-करोड योजन दूर लोकालोक पर्वत पर पहुंचा देता हूं, जहां तेरे किसी शत्रु के होने की कोई संभावना ही नहीं है।' यह आश्वासन पा कपोत की जान में जान आई और निमिष मात्र में ही गरुड ने उसे ऐसी निर्जन उपत्यका में पहुंचा दिया, जहां वह अजातशत्रु हो विचरण कर सकता था। किंतु गरुड के लौटते ही उनकी भेंट द्वार से निकलते यमराज से हुई। यमराज की दृष्टि तोरण पर थोडी ही देर पहले बैठे कपोत को खोज रही थी। गरुड ने हंस कर कहाः 'महाराज, वह कपोत अब यहां नहीं है। वह तो करोडों योजन दूर लोकालोक पर्वत पर निर्भय हो विचरण कर रहा है। मैं उसे अभी-अभी वहां छोड कर लौटा हूं!' यह सुन यमराज खूब हंसने लगे और बोलेः 'तो आखिर वहां पहुंचा ही दिया? मैं यही सोच कर और उसे यहां देख विस्मित हुआ कि वह यहां कैसे? उसे तो थोडे ही क्षणों बाद लोकालोक पर्वत पर मृत्यु के मुंह में जाना है!'
शून्य
कथा :
एक वैज्ञानिक ने जापान में एक प्रयोग किया-चमत्कार जैसा प्रयोग है । उसे प्रयोग करते-करते पौधों पर, यह खयाल आया कि पौधा बीज में से ही पूरा आता है या कि बहुत कुछ तो जमीन से लेता होगा ? तो उसने एक प्रयोग किया । एक गमले में उसने सब तरह से जांच-परख कर ली कि कितनी मिट्टी डाली है । एक-एक रत्ती-रत्ती नाप कर सब काम किया । कितना पानी रोज डालता है, उसका भी हिसाब रखा । वृक्ष बड़ा होने लगा, खूब बड़ा हो गया । फिर उसने वृक्ष को निकाल लिया । जड़ें धो डालीं । एक मिट्टी का कण भी उस पर न रहने दिया । और जब मिट्टी तोली तो बड़ा चकित हुआ, मिट्टी उतनी की उतनी है । मिट्टी में कोई फर्क नहीं पड़ा । उस बीज से ही आया है यह पूरा वृक्ष, उस शून्य से ही प्रगट हुआ है ।
बोधिधर्म सम्राट वू के सामने खड़ा है । और सम्राट वू ने उससे पूछा है, बोधिधर्म, उस पवित्र और परम सत्य के संबंध में कुछ कहो! बोधिधर्म ने कहा, कैसा पवित्र? कुछ भी पवित्र नहीं है! Nothing is holy! और कैसा परम सत्य? There is nothing but empytyness, शून्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ।
स्वभावतः, सम्राट वू चौंका और उसने बोधिधर्म से कहा, फिर क्या मैं यह पूछने की इजाजत पा सकता हूं कि मेरे सामने जो खड़ा होकर बोल रहा है, वह कौन है? तो बोधिधर्म ने क्या कहा, पता है? बोधिधर्म ने कहा, I do not know, मैं नहीं जानता । यह जो तुम्हारे सामने खड़े होकर बोल रहा है, यह कौन है, यह मैं नहीं जानता ।
वू तो समझा कि यह आदमी पागल है । वू ने कहा, इतना भी पता नहीं कि तुम कौन हो? बोधिधर्म ने कहा, जब तक पता था, तब तक कुछ भी पता नहीं था । जब से पता चला है, तब से यह भी नहीं कह सकता कि पता है । क्योंकि जिसका पता चल जाए, जिसे हम पहचान लें, जिसे हम नाम दे दें, वह भी कोई नाम है!
किसी ने बाद में बोधिधर्म को कहा कि वू बहुत दुखी और पीड़ित हुआ है । सम्राट बहुत अपमानित हुआ है । आपने इस तरह के जवाब दिए! सम्राट को ऐसे जवाब नहीं देने थे । आपने कह दिया कि मुझे पता ही नहीं कौन है ।
बोधिधर्म ने कहा कि तुम सम्राट की बात कर रहे हो! सम्राट की वजह से, कि यह बेचारा इतनी दूर आया, मैंने इतना भी जवाब दिया । अन्यथा इतना जवाब भी गलत था । वह भी नहीं है मेरे भीतर जो कह सके कि मुझे पता नहीं कौन है । यह तो सिर्फ उसकी वजह से कि वह और ही हैरान हो जाएगा इसलिए उसको मैंने कह दिया । But dont misunderstand me, बोधिधर्म ने कहा, मुझे गलत मत समझना । इतना भी मेरे भीतर नहीं है कोई जो कहे कि मुझे पता नहीं है । यह सिर्फ सम्राट इतनी दूर से चल कर आया था, वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था मेरी । जैसे कोई बच्चा आ जाए और हम उसे खिलौना पकड़ा दें, ऐसा मैंने उसे एक खिलौना दिया है ।
लाओत्से पर किसी ने एक गांव में हमला कर दिया था । लाओत्से ने तो लौट कर भी नहीं देखा कि वह आदमी कौन है । वह चलता ही गया । उस आदमी को बड़ी बेचैनी हुई । उसने लौट कर भी नहीं देखा कि पीछे से लकड़ी किसने मारी है । वह आदमी भागा हुआ आया और उसने लाओत्से को रोका और कहा कि लौट कर तो देख लो! अन्यथा हमारा मारना बिलकुल बेकार ही गया । कुछ तो कहो!
लाओत्से ने कहा, कभी भूल-चूक से अपना ही नाखून हाथ में लग जाता है, तो क्या करते हैं! कभी राह चलते अपनी ही भूल से गिर पड़ते हैं, घुटने टूट जाते हैं, तो क्या करते हैं! एक बार ऐसा हुआ कि मैं नाव में बैठा था और एक खाली नाव आकर मेरी नाव से टकरा गई, तो मैंने क्या किया! लेकिन अगर उस दूसरी नाव में कोई मल्लाह बैठा होता, तो? तो झगड़ा हो जाता । खाली नाव थी, तो कुछ न किया । लेकिन उसी दिन से मैंने समझ लिया कि जब खाली नाव को कुछ नहीं किया, तो मल्लाह भी बैठा हो तो क्या फर्क पड़ता है? तुमने अपना काम कर लिया, तुम जाओ । मुझे मेरा काम करने दो ।
वह आदमी दूसरे दिन पुनः आया और उसने कहा, मैं रात भर सो नहीं सका । तुम आदमी कैसे हो? तुम कुछ तो करो, तुम कुछ तो कहो, ताकि मैं निश्चिंत हो जाऊं ।
स्वभावतः, उसके मन में बहुत कुछ कठिनाई चलती रही होगी । हम सब अपेक्षाओं में चलते हैं । अगर मैं गाली देता हूं, तो मैं मान कर चलता हूं कि गाली लौटेगी । लौट आती है, तो नियमानुसार सब हो रहा है । नहीं लौटती है, तो बेचैनी होती है । बेचैनी उतनी हो जाती है कि मैं अगर प्रेम करता हूं, तो मान कर चलता हूं कि प्रेम लौटेगा; नहीं लौटता है, तो जैसी बेचैनी हो जाती है । हम सब के लेन-देन के सिक्के तय हैं ।
लाओत्से -- ये सिक्कों को बदल डालो । भीतर हो जाओ शून्यवत; संकल्प को हटा दो; और जो होता है, होने दो ।
सिर्फ उथले लोग पहुंचते हैं। नहीं पहुंचते, वही पहुंचने की बात करते हुए मालूम पड़ते हैं। यह जीवन इतना गहन है कि कोई कह न पाएगा कि पहुंच गए।
उपनिषदों में कथा है कि एक पिता ने अपने पांच बेटों को भेजा सत्य की खोज पर। वे गए। वर्षों बाद वे लौटे। पिता मरणासन्न है। वह पूछता है अपने बेटों से, सत्य मिल गया? ले आए? जान लिया?
पहला बेटा जवाब देता है, वेद की ऋचाएं दोहराता है। दूसरा बेटा जवाब देता है, उपनिषद के सूत्र बोलता है। तीसरा बेटा जवाब देता है, वेदांत की गहन बातें कहता है। चौथा बेटा बोलता है, जो भी सारभूत धर्मों ने पाया है, सब कहता है।
लेकिन जैसे-जैसे बेटे जवाब देते हैं, वैसे-वैसे बाप उदास होता चला जाता है। चौथे के जवाब देते-देते वह वापस बिस्तर पर लेट जाता है। लेकिन पांचवां चुप ही रह गया। बाप फिर उठ आया है। और उसने पूछा कि तूने जवाब नहीं दिया? शायद सोचा हो कि मैं लेट गया, थक गया। तेरा जवाब और दे दे; क्योंकि मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में जी रहा हूं। वह बेटा फिर चुप है। बाप कहता है, तू बोल। वह बेटा फिर चुप है। उसने आंख बंद कर ली हैं। वह बाप कहता है, तो मैं फिर निश्चिंतता से मर सकता हूं। कम से कम एक जान कर लौटा है, जो चुप है।
रहस्य का अर्थ है, उसे कभी पाया हुआ नहीं कहा जा सकता, जाना हुआ नहीं कहा जा सकता; न जाना हुआ भी नहीं कहा जा सकता। ज्ञात नहीं, अज्ञात नहीं।
बोधिधर्म वापस लौटता है--चीन दस वर्ष काम करके। अपने शिष्यों को इकट्ठा करता है और पूछता है, मुझे बताओ, धर्म का राज क्या है? रहस्य क्या है? संदेश क्या है बुद्ध का? मैंने तुम्हें क्या दिया?
वह जांच कर लेना चाहता है जाने के पहले।
एक शिष्य उत्तर देता है कि संसार और निर्वाण एक हैं, सब अद्वैत है।
बोधिधर्म उसकी तरफ देखता है और कहता है -- 'तेरे पास मेरी चमड़ी है'।
वह युवक बहुत हैरान हो जाता है, चमड़ी? अद्वैत की बात, और कहता है चमड़ी! बात जब सिर्फ अद्वैत की होती है, बात ही जब अद्वैत की होती है, तो चमड़ी ही होती है, कुछ और नहीं होता। बात तो उसने बड़ी ऊंची कही थी, पूरे अद्वैत की, कि संसार और ब्रह्म एक, संसार और मोक्ष एक, द्वैत है ही नहीं।
दूसरे से पूछता है। वह दूसरा कहता है, कठिन है कहना, अनिर्वचनीय है। बहुत मुश्किल है।
बोधिधर्म कहता है, तेरे पास मेरी हड्डियां हैं।
पूछता है युवक, सिर्फ हड्डियां?
बोधिधर्म कहता है, हां! क्योंकि तू कहता तो है अनिर्वचनीय, लेकिन कहता जरूर है। तू कहता है अनिर्वचनीय, नहीं कहा जा सकता, फिर भी कहता है। हड्डियां ही तेरे पास हैं।
और तीसरा युवक कहता है, न तो कहा जा सकता अनिर्वचनीय उसे, न कहा जा सकता अद्वैत उसे, शब्द नहीं वहां काम करते, वहां तो मौन ही सार्थक है।
बोधिधर्म कहता है, तेरे पास मेरी मज्जा है। मस्तिष्क में खोपड़ी को घेरे हुए जो है, वह तेरे पास है।
पर और इससे गहरी क्या बात होगी?
वह चौथे युवक की तरफ देखता है। वह चौथा युवक उसके पैरों में गिर पड़ता है और सिर उसके पैरों में रख देता है। वह उसे उठाता है। उसकी आंखें शून्य हैं, उसकी आंखों में जैसे कोई प्रतिबिंब नहीं दौड़ता; जैसे आकाश में कभी कोई बादल न चलता हो, ऐसा खाली।
वह उसे हिलाता है कि तूने मेरा प्रश्न सुना या नहीं? मैं तुझसे कुछ पूछता हूं, तुझ तक पहुंचा या नहीं?
शून्य आंखें शून्य ही बनी रहती हैं, बंद ओंठ बंद ही बने रहते हैं, वह दुबारा झुक कर सिर चरणों पर बोधिधर्म के रख देता है। वह उसे फिर उठाता है; वह कहता है, मुझे तू बोल!
नहीं बोलता, वह चुप है।
और बोधिधर्म कहता है, 'तेरे पास मैं हूं'; अब मैं जाता हूं। वह वापस लौट आता है।
इतना बड़ा है सब कि हमारा कुछ भी कहना सार्थक नहीं होता।
बुद्ध के समय में अजातशत्रु सम्राट बना । उसके पिता तो बुद्ध के भक्त थे, लेकिन वह तो पिता को कारागृह में डाल कर सम्राट बना था । तो बुद्ध के विपरीत था । स्वभावत: एक तो बुद्ध के भक्त थे उसके पिता, फिर दूसरे उसने जो किया था वह इतना अधार्मिक कृत्य था कि बुद्ध के पास जाये तो कैसे जाये ! बड़ी अपराध की भावना थी । फिर बुद्ध उसकी नगरी से गुजरे तो उसके आमात्यों ने, उसके मंत्रियों ने कहा : 'यह अशोभन होगा । यह उचित न होगा । यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा । इसके बड़े परिणाम बुरे होंगे । आप दर्शन को चलें । आप एक ही बार दर्शन करके औपचारिक ही लौट आना । लेकिन बुद्ध गांव में आयें और सम्राट न जाये, प्रजा पर बुरा परिणाम होगा । पिता को कारागृह में डाल देने से जितनी आपकी बेइज्जती नहीं हुई, उससे भी ज्यादा बड़ी बेइज्जती होगी । क्योंकि इस देश में सदा ही सम्राट फकीर के सामने झुकता रहा है । छोड़ें, आप चलें । सिर्फ औपचारिक ही सही ।'
बात तो समझ में उसे आई; हिसाब की थी । पिता के साथ जो पाप किया है वह भी पुंछ जायेगा । लोग कहेंगे कि नहीं, ऐसा बुरा नहीं; बुद्ध को सुनने भी गया, चरण भी छुए ।
तो वह चला । लेकिन जो आदमी पाप करता है, भयभीत होता है । वह अपने आमात्यों से भी डरा था । जो दूसरे को डराता है वह डरता भी है । जो दूसरे की हत्या करता है वह डरा भी होता है कि कोई उसकी हत्या न कर दे । जो दूसरे को चोट पहुंचाता है उसे आयोजन भी करने पड़ते हैं कि कोई उसे चोट न पहुंचा । तो वह डरा था । और जब बुद्ध के पड़ाव के पास पहुंचने लगा-वृक्षों की ओट में पड़ाव है-तो उसने अपने आमात्यों को कहा -- 'सुनो, तुम कहते थे दस हजार भिक्षु वहां मौजूद हैं, आवाज जरा भी सुनाई नहीं पड़ती । कुछ धोखा मालूम पड़ता है, कोई षड्यंत्र ।' उसने तलवार खींच ली । आमात्य हंसने लगे । उन्होंने कहा : ' आप नासमझी न करें । आपको बुद्ध का पता नहीं । आपको बुद्ध के पास बैठे दस हजार लोगों का भी पता नहीं । थोड़ा धैर्य रखें । कोई षड्यंत्र नहीं है, आप आयें ।'
वह नंगी तलवार लिए ही चला । जब तक उसने वृक्षों के पार जा कर देख न लिया कि दस हजार भिक्षु मौजूद हैं तब तक उसने तलवार भीतर न रखी । फिर बुद्ध से उसने जो पहला प्रश्न पूछा, वह यही था कि मैं तो बड़ा हैरान हो रहा हूं । दस हजार लोग बैठे हैं, बाजार मच जाता है, कीचड़ मच जाती है, बड़ा शोरगुल होता है -- ये चुप क्यों बैठे हैं ?
तो बुद्ध ने कहा 'एक शून्य हो कि दस हजार, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता । शून्य जुड़ते नहीं । शून्य एक-दूसरे में खो जाते हैं । ये ध्यान कर रहे हैं । ये अभी शून्य की दशा में बैठे हैं । अभी ये नहीं हैं ।'
पी.डी.ऑस्पेंस्की ने अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ टर्शियम आर्गानम में लिखा है कि दुनिया में दो तरह के गणित हैं। साधारण गणित। साधारण गणित का नियम है--आधारभूत नियम--कि अंश हमेशा अंशी से छोटा होता है। स्वभावतः, किसी चीज का हिस्सा उस पूरी चीज से छोटा होगा ही। एक पत्ते को तुम तोड़ लोगे तो पत्ता वृक्ष से छोटा होगा। फूल की एक पंखुड़ी को तोड़ोगे तो फूल से पंखुड़ी छोटी होगी। यह साधारण गणित है, ऑस्पेंस्की कहता है। और वह यह कहता है कि एक और भी गणित है--महागणित, पारलौकिक गणित।
उपनिषद जब कहते हैं कि पूर्ण से पूर्ण को निकाल लो, फिर भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है और पूर्ण में तुम पूर्ण को डाल दो तो भी पूर्ण बढ़ता नहीं--न घटता, न बढ़ता--यह किसी दूसरे गणित की बात हो रही है।
ऑस्पेंस्की कहता है: उस दूसरे गणित का नियम है--अंश अंशी के बराबर होता है, छोटा नहीं होता। साधारण गणित के हिसाब से बूंद सागर से छोटी है, बहुत छोटी है; महागणित के हिसाब से बूंद में सागर समाया हुआ है, बूंद सागर के बराबर है। क्योंकि जो राज सागर का है वही बूंद का है। आकार पर न जाओ, प्रकार पर मत जाओ--ये तो ऊपर की बातें हैं। भीतर के राज समझो, भीतर के रहस्य में झांको। एक बूंद में पानी का सारा रहस्य छिपा हुआ है। अगर हम एक बूंद को पूरा-पूरा समझ लें तो हमने सारे संसार के सागरों को समझ लिया। और इतना ही नहीं, जो गहरे गए हैं वे कहते हैं कि अगर हम एक बूंद को पूरा समझ लें तो हमने पूरे अस्तित्व को पूरा समझ लिया। क्योंकि एक बूंद में सब समाया हुआ है। बूंद में सब राजों का राज छिपा हुआ है।
ज्यादातर, या लगभग सभी प्रश्नों का एक निश्चित उत्तर है -- कदाचित् / कथंचित ।
जागना
कथा :
बुद्ध एक गांव से तीस बार निकले चालीस वर्षों की यात्रा में । और एक आदमी बार-बार सोचता था जाना है ! लेकिन कभी घर मेहमान आ गए, कभी पत्नी बीमार हो गई । अब पत्नियों का कोई भरोसा थोड़े ही है, कब बीमार हो जाएं ! ऐन वक्त पर हो जाती हैं । कभी दुकान पर ज्यादा ग्राहक, कभी खुद को सिर-दर्द हो गया । कभी जा ही रहा था, दूकान बंद ही कर रहा था कि कोई मित्र आ गया वर्षों के बाद । ऐसे अड़चन आती रही, आती रही । सोचा, अगली बार जब आएंगे.. । ऐसा तीस बार बुद्ध आए गांव और तीस बार वह आदमी चूक गया ।
चौंकना मत, सोचना मत कि तीस बार बहुत हो गया । तुम भी कम से कम तीन हजार बार चूके हो । कितने जन्मों से तुम यहां हो, कितने बुद्धों से तुम्हारा मिलना न हुआ होगा ! जीवन के पथों पर बहुत बार बुद्धों के आस-पास गुजर गए होगे, लेकिन तुमने कहा -- कल ! फिर मिल लेंगे, अभी जल्दी क्या ? अभी और दूसरे काम जरूरी हैं, वह पहले निपटा लेना है ।
परमात्मा को तो हम फेहरिस्त पर आखिर में रखते हैं; जब कुछ करने को न होगा, तब परमात्मा को सूझ-बूझ लेंगे ।
फिर एक दिन अचानक गांव में खबर आई कि बुद्ध ने घोषणा की कि आज वे देह छोड़ रहे हैं, तब वह आदमी घबराया । तब उसने फिक्र न की कि पत्नी बीमार है, कि बच्चे का विवाह करना है, कि दूकान पर ग्राहक है -- वह भागा । दूकान बंद भी नहीं की और भागा । लोगों ने कहा -- पागल हो गए हो, कहां जा रहे हो ? उसने कहा, अब बहुत हो गया । वह भाग कर पहुंचा, लेकिन देर हो गई थी । बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से पूछा था घड़ी-भर पहले -- कुछ पूछना तो नहीं ? अन्यथा मैं अब विलीन होऊं, मेरा समय आ गया है, मेरी नाव आ लगी किनारे, अब मैं जाऊं ?
भिक्षुओं ने कहा -- आपने बिना पूछे इतना कहा, बिना मांगे इतना दिया है, अब पूछने को कुछ भी नहीं । जो आपने दिया है, उसे ही हम कहां समझ पाए ? जो आपने कहा है, उसे ही हम अभी कहां गुन पाए ? जन्म-जन्म लगेंगे हमें, तब कहीं हम उसका सार निकाल पाएंगे ।
भिक्षु तो रोने लगे । बुद्ध वृक्ष के पीछे जा कर बैठ गए । उन्होंने शरीर का साक्षी-भाव साधा, शरीर से अलग हो गए । मन का साक्षी-भाव साध रहे थे, मन से अलग होते जाते थे, तभी वह आदमी भागता हुआ पहुंचा । उसने कहा -- कहां हैं ? बुद्ध कहां हैं ? अब और नहीं चूक सकता । अब कल नहीं बचा, क्योंकि अब वे जा रहे हैं ।
भिक्षुओं ने कहा -- अब तुम चुप रहो, तुम चूक ही गए । हम तो उनसे विदा भी ले चुके । अब तो वे धीरे-धीरे जीवन की पर्तों को छोड़ कर अनंत की यात्रा पर जा रहे हैं । उनकी नाव तो किनारे से छूटने के करीब है । अब नहीं, अब बहुत देर हो गई ।
लेकिन कहते हैं, बुद्ध ने जैसे ही यह सुना... । वे मन से छूट ही रहे थे । मन से छूट गए होते, तब तो सुन भी नहीं सकते थे । मन की आखिरी जगह से नाव की रस्सी खोल रहे थे कि सुन लिया, वापिस लौट आए । उठ कर आए और कहा -- मत रोको, मेरे नाम पर लांछन रह जाएगा कि मैं जीवित था, कोई मेरे द्वार आया था, झोली ले कर आया था और खाली हाथ लौट गया । नहीं, ऐसा मत करो । उसे क्या पूछना है, पूछ लेने दो । उसने तीस साल तक भूल की, इससे क्या मैं भूल करूं ? और जब भी आ गया वह, तभी जल्दी है । तीस साल में भी कौन आता है ! अनेक लोग हैं जो तीस-तीस जन्मों तक नहीं आते हैं । जब ऐसा भाव जगे तो हिम्मत करना ।
अगर तुम सिर्फ शांत हो जाओ और प्रबुद्ध न होओ, तो नींद में खो जाओगे। नींद में हम सभी शांत हो जाते हैं। लेकिन नींद कोई मंजिल नहीं है। अगर तुम प्रबुद्ध हो जाओ, बहुत जागे हुए हो जाओ, और शांत न हो सको, तो तुम पागल हो जाओगे। क्योंकि विश्राम तुम्हें मिल न सकेगा। जो आदमी सात दिन न सो पाये, वह विक्षिप्त होने लगेगा। कहते हैं, तीन सप्ताह जो आदमी न सोये, वह सुनिश्चित रूप से पागल हो जाएगा। विश्राम भी चाहिए।
महावीर का सूत्र है: 'प्रबुद्ध और उपशांत'; एक साथ। शांत भी बनो और जागे हुए भी बनो। यह दोनों साथ-साथ बढ़ें, अलग-अलग नहीं। अगर तुम प्रबुद्ध न हुए तो नींद में खो जाओगे। नींद अच्छी है, सुखद है, लेकिन सुख ही थोड़े गंतव्य है। परम आनंद न मिलेगा, मोक्ष न मिलेगा। मोक्ष तो जागे हुए के लिए है। लेकिन अगर तुम सिर्फ जागने ही लगो, और अनिद्रा को तुम समझ लो कि साधना है, और शांत होना खो जाए, तो तनाव से भर जाओगे। तनाव तुम्हें तोड़ देगा। दोनों का साथ-साथ जोड़ चाहिए। अनुपात दोनों का बराबर चाहिए। आधा-आधा। और सम्यक-रूप से साधना में जानेवाले व्यक्ति को निरंतर याद रखनी चाहिए कि इन दो में से किसी की भी मात्रा ज्यादा न हो पाये। अमृत भी बे-मात्रा हो, तो जहर हो जाता है। और जहर भी मात्रा में लिया जाए तो औषधि बन जाता है। तो एक तरफ शांति को बढ़ाओ और एक तरफ जागरण को।
पकड़ छोड़ो। मुट्ठी खुली रखो। सत्य कुछ आकाश-जैसा है। मुट्ठी बांधो, बाहर हो जाता है। मुट्ठी खोलो, भीतर आ जाता है। खुली मुट्ठी पर पूरा आकाश रखा है। बंद मुट्ठी खाली है। कुछ भी नहीं।
ध्यान में हम उसी की खोज करते हैं, जो जन्म के पहले था और मृत्यु के बाद भी होगा । ध्यान का अर्थ हुआ--किसी भांति इन सारी समाज के द्वारा दी गयी संस्कार की पर्तों को पार कर के अपने स्वभाव को पहचानना है । स्वभाव को पहचान लेना ध्यान है । इसलिए महावीर ने तो धर्म की परिभाषा ही स्वभाव की है । वत्थू सहावो धम्मं । वस्तु के स्वभाव को जान लेना धर्म है । तुम्हारा जो स्वभाव है, उसको जान लेना तुम्हारा धर्म है । जैन और हिंदू और मुसलमान नहीं, तुम कौन हो इसे पहचान लेना धर्म है ।
युधिष्ठिर बैठे हैं अपने अज्ञातवास, वनवास के समय । छिपे हैं, वेशभूषा बना रखी है, किसी को पता नहीं है कि कौन हैं--कुटी के सामने बैठे हैं! भीम एक कोने में बैठा हुआ कुछ सोच रहा है । एक भिखारी आया और उसने युधिष्ठिर को कहा, कुछ भीख मिल जाए । युधिष्ठिर ने कहा कि तू कल आ जाना । भीम एकदम उछल कर खड़ा हो गया और नाचने लगा और भीतर घर की तरफ दौड़ा । युधिष्ठिर ने पूछा कि तुझे क्या हो रहा है ।
भीम ने कहा कि मैं खबर करने जा रहा हूं कि मेरे भाई ने समय पर विजय पा ली । मैं यही सोच रहा था कि यह समय क्या है? और तुमने कहा कि कल आ जाना! एक बात तो पक्की है--कि तुम्हें पक्का है कि कल आएगा, तो मैं जरा गांव में खबर कर आऊं कि मेरे भाई ने समय पर विजय पा ली है । युधिष्ठिर भागे, उस भिखारी को लौटाया, और कहा, तू आज ही ले जा, क्योंकि कल का सच में ही, कहां भरोसा ।
आधे-अधूरे ज्ञान के साथ कभी आगे ना बढ़ें; ऐसा करने पर आपको लगेंगा की आप अज्ञानी हो, और अंत तक अज्ञानी ही बने रहोंगे ।
मौत आपको नहीं मिटाती, लेकिन लगता ऐसा है कि मौत आपको मिटाती है । वह इसलिए लगता है कि आप हैं ही नहीं । आपके पास जो है, वह सब उधार है, बाहर से लिया हुआ । Reflected है, प्रतिबिंबित है ।
ऐसा समझें कि चांद है । चांद की रात है और चांद बड़ी रोशनी देता है; लेकिन चांद की रोशनी उधार है । उसके पास अपनी कोई रोशनी नहीं है । सूरज की किरणें ही उस पर लौट कर वापिस लौट आती हैं । वे ही हमें रोशनी मालूम पड़ती हैं । इसलिए ठंडी है उसकी रोशनी । क्योंकि सूरज की गर्मी तो पी जाता है और सिर्फ रोशनी reflect होती है । इसलिए चांद ठंडा है । बाकी रोशनी उसके पास सूरज की ही है । यह मत सोचना कि चांद पर जो लोग उतरे हैं, उनको चांद पर रोशनी मिली होगी । वहां कोई रोशनी नहीं है । वह तो चांद केवल reflected है । रोशनी हमारी आंखों तक, हमारी आंख पर चोट करके हमें मालूम होती है ।
हमारी पृथ्वी भी चांद पर खड़े होकर चांद जैसी मालूम पड़ती है । यह आपको खयाल में न होगा कि आपकी यह जमीन गंदी, मटमैली, यह चांद का टुकड़ा है । चांद ‘पर' से रोशन है, इसके पास भी उधार संपत्ति है; सूरज के पास अपनी रोशनी है ।
सांसारिक आदमी चांद की तरह है, आध्यात्मिक व्यक्ति सूरज की तरह होने लगता है ।
मंसूर [858–922] के लोगों ने हाथ-पैर काट डाले, लेकिन मंसूर के प्रेम को चोट नहीं पहुंचाई जा सकी, जिन्होंने हाथ-पैर काटे होंगे, उन्होंने यही सोचा होगा कि देखें इसके प्रेम की स्थिति क्या है? मंसूर के लोग हाथ-पैर काट रहे थे, एक लाख लोग इकट्ठे थे, उसके पैर काट डाले, उसके हाथ काट डाले, उसकी आंखें फोड़ डालीं; लेकिन उसके होंठों पर जो प्रेम और मुस्कुराहट थी उसको नहीं छीना जा सका । और इसके पहले कि वह उसकी जबान काटते उन्होंने मंसूर से कहा कि तुम्हें कुछ कहना है? तो उसने कहा कि एक ही बात मुझे तुमसे कहनी है, मेरा शरीर कट रहा है, लेकिन मैं अपने प्रेम को देख रहा हूं कि वह अखंड है, इसलिए तुम शरीर पर विश्वास मत करना, उस प्रेम को खोजना जिसकी कोई मृत्यु नहीं है । मैं अपने शरीर को मरते देखता हूं, लेकिन उस प्रेम को मरते हुए नहीं देख रहा, जो मेरे भीतर है; तो मैं तुमसे कहता हूं, तुम शरीर पर विश्वास मत करना, तुम प्रेम को खोजना जो कि अमृत है, शरीर तो मर जाता है, लेकिन प्रेम अमर है ।
लेकिन उस प्रेम को तो केवल वे ही पा सकते हैं, जो जागे हुए हों । कुछ मामला ऐसा है, कि जाग्रत होते ही जीवन में कुछ नये फूल खिलने शुरू हो जाते हैं, जागरण के परिणाम स्वरूप ।
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र (वियोग) की रात और इतनी रौशन
-जिगर मुरादाबादी
जापान में एक बहुत अदभुत भिक्षु था । वहां के एक बहुत बड़े सरदार ने अपने लड़के को उस भिक्षु के पास जीवन के सत्य को जानने के लिए भेजा । लेकिन उस गुरु ने कहा कि मेरे जीवन के सत्य को बताने की जो विधि है बड़ी अजीब है । मैं पहले तलवार चलाना सिखाता हूं, फिर जीवन के सत्य के बाबत बताता हूं । उसका पिता बहुत हैरान हुआ कि तलवार सिखाने से उस सत्य का क्या संबंध? लेकिन उस गुरु ने कहा, फिर कहीं और ले जाएं, मेरी पद्धति तो यही है । तो दो वर्ष तक तो इसे तलवार चलाना सिखाऊंगा, फिर सत्य के बाबत बात करूंगा । मजबूरी थी, उस गुरु के अतिरिक्त कोई ऐसा व्यक्ति न था, जो शायद सत्य के संबंध में कुछ कह सके । उस बच्चे को वहां छोड़ना पड़ा ।
उस युवक को उस गुरु ने कहा, देख दो वर्ष बाद तो सत्य की बात करूंगा, उसके पहले तुझे तलवार चलाना सिखाऊंगा । और मेरे तलवार सिखाने की पद्धति भी बड़ी अजीब है, और वह यह है कि मैं वक्त-बेवक्त तेरे अनजाने, तेरे ऊपर तलवार से हमला कर दूंगा । लकड़ी की तलवार होगी, शुरू-शुरू में, फिर बाद में असली तलवार भी आएगी । जैसे कि तू बुहारी लगा रहा है और मैं पीछे से आकर लकड़ी की तलवार से हमला कर दूंगा । जैसे तू खाना खा रहा है, मैं पीछे से आकर हमला कर दूंगा तो तू सचेत रहना । होश में रहना हमेशा, attentive रहना । कभी भी हमला हो सकता है, आगे-पीछे से, उसकी कोई सूचना नहीं होगी ।
लड़का बहुत हैरान हुआ, यह तो बड़ी पागलपन की बात थी । लेकिन मजबूरी थी । वह बुहारी लगाता है, पीछे से आकर गुरु हमला कर देता है लकड़ी से । सिर में चोट आ जाती है । खाना खाता है, पीछे से हमला हो जाता है । किताब पढ़ने बैठता है, हमला हो जाता है । और कभी भी, चैबीस घंटे में कभी भी हमला हो सकता है, दस-बीस दफा हमला हो जाता है । एक दिन, दो दिन भीतर उसके होश रहने लगा । वह सचेत रहने लगा कि पता नहीं कब हमला हो जाए । उसके भीतर एक तरह का निरंतर खयाल रहने लगा । एक स्मृति रहने लगी, एक mind-fulness पैदा हो गई कि पता नहीं कब हमला हो जाए । चार-छह दिन बीतते-बीतते वह सचेत रहने लगा, गुरु के पैर भी आने शुरू होते कमरे में और वह सजग होकर सीधा खड़ा हो जाता । पैर की आवाज सुनाई पड़ने लगी । जो उसे कभी सुनाई नहीं पड़ी थी । गुरु एकदम छुपे-छुपे आता जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ने आती हो । उसके पैर की आवाज भी न होने देता । महीना-डेढ़ महीना बीतते-बीतते गुरु हमला करता और हमले के साथ उसका हाथ उठ जाता । तलवार रोक ली जाती, लकड़ी की तलवार थी ।
तीन महीने बीतते-बीतते गुरु के वार असफल जाने लगे । हमला होता और हमला रोक दिया जाता । छह महीने बीतते-बीतते कोई वार सफल नहीं होता था । एक भीतर निरंतर सजगता एहसास होने लगी । तब तो गुरु नींद में भी हमला करने लगा । सोया हुआ है युवक और वह हमला कर देता । अब और मुसीबत हो गई, जागना फिर भी ठीक था, लेकिन नींद में, लेकिन नींद में भी सचेत रहना जरूरी हो गया क्योंकि सोते में रात में दो-चार बार हमला होने लगा । महीना बीतते-बीतते सोते में भी गुरु के कदम पड़ते कमरे में, और उसके mind को अहसास होने लगता युवक को कि गुरु आ रहा है, वह उठ कर बैठ जाता । हम सब को भी थोड़ा अहसास होता है, हम यहां इतने लोग हैं अगर हम सारे लोग सोए हों, और मैं आकर बुलाऊं राम, तो जिसका राम नाम होगा उसकी नींद खुल जाएगी, बाकी किसी की नींद नहीं खुलेगी । राम शब्द से उसकी चेतना जुड़ गई है, निरंतर सुनते-सुनते । और किसी की नींद नहीं खुलती, राम उठ जाता है ।
यहां एक घर में दस महिलाएं सो रही हों, और एक मां सो रही हो, जिसका बच्चा हो और बच्चा रोएगा, दस महिलाएं सोई रहेंगी; जो मां है वह जग जाएगी । उसके मां होने की चेतना, उस बच्चे के रोने से जुड़ गई है । और बाकी सब सोए रहेंगे, मां उठ जाएगी । नींद में भी वह सूत्र जुड़ा हुआ है । धीरे-धीरे नींद में भी उसे बोध होने लगा, गुरु आता कमरे के बाहर वह उठकर बैठ जाता, नींद में भी वह हमले को रोकने लगा । साल पूरा हो गया, एक सुबह उस युवक को यह खयाल आया, बाहर बैठ कर वह अपनी किताब पढ़ रहा था और गुरु दूर दूसरे बरामदे में बैठा हुआ कुछ लिख रहा था । बूढ़ा आदमी था, कोई नब्बे साल की उसकी उम्र थी । उस युवक को यह खयाल आया कि मुझे तो यह निरंतर हमला करता है, जब चाहे तब मेरे ऊपर हमला कर देता है, सोते-जागते मेरी तो मुसीबत कर दी है, एक क्षण भी मुझे विश्राम में होने का मौका नहीं देता । हमेशा attention में मुझे रखता है । तो आज मैं भी इस बूढ़े पर हमला करके देखूं यह खुद भी attentive है या नहीं । यह खुद भी जागरूक रहता है या नहीं? दूर बरामदे में गुरु बैठा था, उसने अपनी किताब जिसमें वह लिख रहा था, आंख उठाई, और इससे कहा, मेरे बेटे! हमला मत कर देना, मैं बूढ़ा आदमी हूं, हड्डी-पसली टूट सकती है ।
यह तो घबड़ा गया । इसने कहा, क्या हुआ? मैंने तो सिर्फ सोचा । उस बूढ़े ने कहा -- तू ठहर दो वर्ष पूरे हो जाने दे, अभी तो मेरे पैर की ध्वनि सुनता है, नींद में हमले की खबर तुझे मिल जाती है । जितना-जितना तू जागरूक होगा, विचार की ध्वनि भी तुझे मिलने लगेगी, अभी पैर की ध्वनि सुनाई पड़ती है, फिर मेरे भीतर चलते विचार के पैर भी तुझे सुनाई पड़ने लगेंगे ।
जितना भीतर जागरण बढ़ता है, उतनी सूक्ष्म चीजें दिखाई पड़नी शुरू हो जाती हैं । अनुभव में आनी शुरू हो जाती हैं । उसने कहा तू घबड़ा मत, एक साल और रुक जा और हमला कर, उसमें कुछ हर्जा नहीं है । लेकिन मैं बूढ़ा आदमी हूं, और कहीं तुझे सिखाने के पहले ही समाप्त हो गया तो मुश्किल में पड़ जाएगा, इसलिए मैंने रोका, नहीं तो रोकने की कोई बात न थी । विचार भी दूसरे का सुना जा सकता है, जाना जा सकता है, जागरण चाहिए, होश चाहिए भीतर ।
कर्म नहीं बांधते, कर्ता बांध लेता है, कर्म नहीं छोड़ता है, कर्ता छूट जाये तो छूटना हो जाता है ।
एक राजकुमार भिक्षु हो गया । उसने बुद्ध से दीक्षा ले ली । दीक्षा के दूसरे ही दिन वह नगर में भिक्षा मांगने को निकला । बुद्ध ने उससे कहा कि तू सदा राजकुमार रहा है, भीख मांगने की तुझे कोई आदत नहीं, थोड़े दिन रुक जा, फिर भीख मांगना, अभी तो मैंने एक परिवार में कह रखा है, तू वहां चले जाना, और वहां भोजन कर आना । मेरी एक श्राविका है, एक महिला है, जिसका मेरे प्रति आदर और प्रेम है, उससे मैंने कह रखा है, तू वहां जाना ।
वह भिक्षु वहां गया । वह भोजन करने बैठा, भोजन करने जैसे ही बैठा, उसे खयाल आया, यह तो बड़े आश्चर्य की बात है, रास्ते में उसने सोचा था कि आज तो मैं भिखारी हो गया, पता नहीं क्या भोजन मिलेगा? उसे जो भोजन प्रिय थे उनकी याद आई थी । जैसे ही भोजन करने बैठा, देखा थाली में वे ही भोजन हैं, जो उसे प्रीतिकर थे, वह बहुत हैरान हो गया । सोचा शायद संयोग है । co-incidence हो सकता है । मैंने सोचा वही भोजन बने होंगे । वह भोजन करके उठने को ही था कि तब उसे खयाल आया कि रोज तो मैं भोजन के बाद थोड़ा विश्राम करता था, आज विश्राम नहीं कर सकूंगा । आज तो फिर उठना है और जाना है, धूप में वापस आश्रम की ओर । वह महिला जिसने भोजन कराया था, सामने खड़ी थी, उसने कहा, भिक्षु जी अगर भोजन के बाद दो क्षण विश्राम कर लेंगे, तो मुझे बहुत आनंद होगा । फिर उसे थोड़ी सी हैरानी हुई, यही उसके मन में खयाल चलता था । लेकिन सोचा, संयोग की बात होगी, शिष्टाचारवश उसने कहा । वह लेट गया, चटाई डाल दी गई, वह लेटा ही था कि उसे खयाल आया कि आज न तो मेरा कोई घर है, न कोई शय्या है, न कोई साया है । अब सब पराया हो गया, कल तक सब मेरा था । वह श्राविका, वह महिला जाती थी, उसने लौट कर कहा -- भंते, अगर बुरा न माने तो निवेदन करूं । न शय्या आपकी है, न मेरी है; न मकान आपका है, न मेरा है । हम मेहमानों से ज्यादा नहीं हैं इस जमीन पर ।
अब संयोग मानना बहुत कठिन था । अब तो बात सीधी हो गई थी, वह भिक्षु उठ कर बैठ गया और उसने कहा क्या मेरे विचार तुम तक पहुंच जाते हैं? क्या मैं जो सोचता हूं, उसे तुम पढ़ लेती हो? उस श्राविका ने कहा, जब अपने विचारों को देखने की निरंतर कोशिश की, निरंतर-निरंतर अपने विचारों के प्रति जागी, तो बड़ी हैरानी हुई । खुद के विचार तो जागने और देखने के कारण धीरे-धीरे समाप्त हो गए और अब मन इतना ज्यादा संवेदनशील हो गया है कि पास में कोई भी कुछ विचार करता है तो उसके विचार पकड़ में आ जाते हैं । वह भिक्षु उठ कर, घबड़ा कर खड़ा हो गया । श्राविका ने कहा -- लेटिए, विश्राम करिए, उसने कहा कि नहीं, उसने आंखें नीचे झुका लीं और वह दरवाजे से एकदम निकल भागा । समझ में भी न पड़ा कि बात क्या हो गई? श्राविका ने उसे कहा भी कि आप कैसे चले? लेकिन वह लौटा भी नहीं, उसने लौट कर धन्यवाद भी नहीं दिया ।
उसने बुद्ध के पास जाकर कहा कि क्षमा करें, अब उस द्वार पर कल मैं भोजन करने न जा सकूंगा । बुद्ध ने कहा, क्यों? कोई भूल हुई । भोजन ठीक नहीं था? जिसके घर भेजा था, उन्होंने आतिथ्य नहीं किया? स्वागत नहीं किया? उसने कहाः नहीं, स्वागत पूरा हुआ । जो मुझे प्रिय था, वह मुझे मिला । बहुत भले लोग हैं वे, और जिस महिला ने मेरी वहां सेवा की वह अदभुत है, लेकिन वहां मैं दुबारा नहीं जा सकूंगा । बुद्ध ने कहाः कारण? उस भिक्षु ने कहाः कारण यह है कि वह महिला तो दूसरों के विचार पढ़ लेती है । और उस सुंदरी युवती को देख कर मेरे मन में तो और विकार उठे थे, वासना भी उठी थी, वह भी उसने पढ़ ली होगी । मैं कैसे उसको मुंह दिखाऊंगा? उसकी आंख में आंसू आ गए । उसने कहा कि क्षमा करें, उसने तो मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया, लेकिन मुझे क्या पता था कि वह विचार भी पढ़ लेती है? वह क्या सोच रही होगी कि मैंने उसके साथ कैसा व्यवहार किया? मन में तो मैंने न मालूम क्या-क्या सोचा? वह सब पढ़ लिया गया है, मैंने उसके साथ बहुत दुर्व्यवहार किया है । काश! मुझे पता होता कि वह विचार पढ़ती है, तो शायद मैं सचेत रहता । लेकिन मुझे तो यह कोई पता भी नहीं था ।
बुद्ध ने कहा -- तुम्हें कल भी वहीं जाना होगा, मैंने जान कर तुम्हें वहां भेजा है । नये भिक्षुओं को वहां भेजने की मेरी आदत है, पुरानी । और इसीलिए भेजता हूं वहां, ताकि तुम अपने भीतर सचेत होना सीख सको । तुम कल भी वहां जाना, घबड़ाओ मत । लेकिन आज तुम सोए हुए गए थे भीतर कि भीतर क्या हो रहा है, तुम कोई खयाल ही नहीं कर रहे थे । कल तुम भीतर देखते हुए जाना कि भीतर कौन से विचार उठ रहे हैं? लेकिन जाना वहीं ।
मजबूरी में उस भिक्षु को कल भी वहीं जाना पड़ा । उस भिक्षु की जगह थोड़ा अपने को रख कर सोच लेंगे तो आसानी होगी । आपको जाना पड़ रहा है । उस घर की तरफ जहां एक सुंदरी युवती आपके विचार पढ़ सकती है? आप कैसे जाएंगे उस घर की तरफ, सोए हुए जा सकते हैं? नहीं । भीतर एक चेतना होगी कि कौन सा विचार सरक रहा है, वह कहीं पढ़ न लिया जाए । जैसे-जैसे वह भिक्षु उस घर के पास पहुँचाने लगा, भीतर जैसे रीढ़ सीधी हो गई । भीतर जैसे चित्त जग गया, भीतर जैसे सब नींद टूट गई । जैसे एक दीया जल गया । जब वह उसकी सीढ़ियों पर पहुंचा तो भीतर एकदम शांत और जागा हुआ था । एक-एक कदम उठा रहा था, तो उसे पता था । हृदय की धड़कन उसे सुनाई पड़ रही थी । कोई विचार सरकता था तो वह जागा हुआ था कि कहीं फिर कोई वैसा विचार खड़ा न हो जाए, देखूं क्या हो रहा है? वह भीतर प्रविष्ट हुआ, बैठा, उसने भोजन किया, उसने विदा ली । वह कल भागता हुआ, पीठ दिखा कर भागा था, आज वह नाचता हुआ वापस आया ।
वह बुद्ध के पैरों पर आकर गिर पड़ा, बुद्ध ने पूछा क्या हुआ? उसने कहा कि एक अदभुत घटना घट गई । मैं जानता ही नहीं था कि जागना क्या है? मुझे पता ही नहीं था, आप बार-बार कहते थे भीतर जागो, भीतर जागो, मेरी कुछ समझ में नहीं आता था कि यह भीतर जागो क्या है? आज मैंने पहली दफा देखा कि भीतर जागना क्या है? और न केवल मैंने यह जाना कि जागना क्या है, बल्कि मैंने यह भी देखा कि जब मैं भीतर बिलकुल जाग गया, उसकी सीढ़ियों पर पहुंचा तो जैसे ही मैं जागता गया, वैसे ही विचार विलीन होते गए, समाप्त होते गए । और जब मैं पूरी तरह जागा हुआ था तो मेरे मन में कोई विचार नहीं था । एकदम शान्ति थी । और उस शांति में मैंने जो आनंद और अमृत अनुभव किया है, वह अकल्पनीय है, उसे शब्दों में कहना कठिन है ।
बुद्ध ने कहा, मेरे मित्र जो सोता है, उसके मन में ही विचार चलते हैं, जो जागता है उसके मन से विचार विदा हो जाते हैं । सोना ही विचार में होना है, जागना विचार के बाहर हो जाना है । जैसे एक घर हो, उस घर में कोई दीया न जलता हो भीतर, तो चोर उस घर की तरफ आकर्षित होते हैं, और एक घर हो जिसके भीतर दीया जलता हो तो चोर उस घर के प्रति आकर्षित नहीं होते । जिस चित्त में जागरण का दीया जलता है, उसकी तरफ विचार और वासनाएं आकर्षित नहीं होते और जिस चित्त में कोई दीया नहीं जलता और सब अंधेरा होता है और सोया हुआ होता है, तो वहां सब कुछ आकर्षित होता है और घर में न मालूम कौन-कौन से मेहमान, अनचाहे मेहमान निवास करने लगते हैं ।
यदि आप खुद अपने साथ का आनंद नही लेते हो, तो कोई और उस से आनंदित कैसे हो सकता है?
एक सूफी फकीर हुआ है, बायजीद । बायजीद जब पहली दफा अपने गुरु के पास गया, तो उसे बड़ी नींद की आदत थी । गुरु समझाता रहता, बायजीद सो जाता । गुरु बायजीद को बाहर पहरे पर बिठालता, बायजीद सो जाता । गुरु ने बहुत बार कहा कि देख, तू सोने से ही चूक जाएगा । पर बायजीद कहता कि मैं इतना तो जागता रहता हूं; ऐसा तो नहीं कि सोया ही रहता हूं । बहुत जागता भी हूं, थोड़ा सोता भी हूं । पर उसके गुरु ने कहा, तुझे पता नहीं है कि कभी ऐसा होता है कि चौबीस घंटे जागे हो और एक क्षण को सो गए हो और सब खो जाता है ।
बायजीद ने उस रात एक सपना देखा कि वह मर गया है और स्वर्ग के द्वार पर पहुंच गया है । द्वार बंद हैं और द्वार पर एक तख्ती लगी है कि जो भी द्वार पर आए और प्रवेश का इच्छुक हो, वह चुपचाप बैठ जाए । एक हजार वर्ष में एक बार द्वार खुलता है, एक क्षण को । सजग हो बैठा रहे, जब द्वार खुले, भीतर प्रवेश कर जाए । बायजीद बड़ा घबड़ाया, एक हजार साल में एक बार खुलेगा एक क्षण को! और झपकी तो, एक हजार साल का मामला है, लगती ही रहेगी । बड़ी साहस करके, बड़ी हिम्मत जुटा कर, बड़ी ताकत लगा कर, आंखों को खोल कर बैठा-बैठा-बैठा, फिर झपकी लग गई । जब झपकी खुली तो देखा कि द्वार बंद हो रहा था । घबड़ाया, भागा, लेकिन द्वार बंद हो चुका था । फिर बैठा, फिर एक हजार साल बीते । फिर एक दिन झपकी लगी थी, आवाज आई कि द्वार खुला जैसे । लेकिन मन ने कहा, यह सब सपना है; ऐसे द्वार नहीं खुला करते । अभी हजार साल भी कहां पूरे हुए! फिर भी घबड़ा कर उठा, लेकिन देखा कि द्वार बंद हो रहा है । नींद खुल गई । सपने थे ।
गुरु के पास, आधी रात थी, उसी वक्त गया । और कहा, अब पलक न झपकाऊंगा, मुझे माफ कर दें । गुरु ने कहा, हुआ क्या? अपना सपना कहा । गुरु ने कहा, तूने ठीक से नहीं देखा । दरवाजे के इस तरफ तख्ती लगी थी कि हजार साल में एक बार द्वार खुलेगा, एक क्षण को खुला रहेगा और फिर बंद हो जाता है । जब द्वार बंद हो रहा था, तूने दूसरी तरफ लगी हुई तख्ती देखी कि नहीं? बायजीद ने कहा, दूसरी तरफ की तख्ती देखने का मौका नहीं मिला । द्वार करीब-करीब बंद ही हो रहा था तभी, तभी दो दफा... ।
बायजीद के गुरु ने कहा, अब दुबारा कभी सपना आए तो दूसरी तरफ की तख्ती भी एक दफा देख लेना । उस पर यह भी लिखा है कि यह द्वार तभी खुलता है, जब तुम सोते हो ।
जब हम मूर्च्छित होते हैं, तभी द्वार खुलता है । ऐसा द्वार के खुलने की क्या शर्त हो सकती है?
असल बात यह है, अगर और गहरे में जाएं--बायजीद के गुरु ने उससे नहीं कहा--अगर और गहरे में जाएं, तो जब द्वार खुलता है, तभी हम मूर्च्छित हो जाते हैं । वह हमारे मन का कारण है । ऐसा नहीं कि जब हम मूर्च्छित होते हैं, तब द्वार खुलता है । लेकिन जब द्वार खुलता है, तभी हम मूर्च्छित हो जाते हैं ।
बुद्ध -- जो नहीं समझते, उन्हें मैंने विधियां दी हैं । और जो समझते हैं, उन्हें मैंने समझ दी है ।
एक साधु के आश्रम में एक युवक बहुत समय से रहता था। फिर ऐसा संयोग आया कि युवक को आश्रम से विदा होना पड़ा। रात्रि का समय है, बाहर घना अंधेरा है। युवक ने कहा, रोशनी की कुछ व्यवस्था करने की कृपा करें।
उस साधु ने एक दीया जलाया, उस युवक के हाथ में दीया दिया, उसे सीढ़ियां उतारने के लिए खुद उसके साथ हो लिया। और जब वह सीढ़ियां पार कर चुका और आश्रम का द्वार भी पार कर चुका, तो उस साधु ने कहा कि अब मैं अलग हो जाऊं, क्योंकि इस जीवन के रास्ते पर बहुत दूर तक कोई किसी का साथ नहीं दे सकता है।
और अच्छा है कि मैं इसके पहले विदा हो जाऊं कि तुम साथ के आदी हो जाओ। और इतना कह कर उस घनी रात में, उस अंधेरी रात में उसने उसके हाथ के दीये को फूंक कर बुझा दिया।
वह युवक बोला, यह क्या पागलपन हुआ? अभी तो आश्रम के हम बाहर भी नहीं निकल पाए, साथ भी छोड़ दिया और दीया भी बुझा दिया!
उस साधु ने कहा, दूसरों के जलाए हुए दीये का कोई मूल्य नहीं है। अपना ही दीया हो तो अंधेरे में काम देता है, किसी दूसरे के दीये काम नहीं देते हैं। खुद के भीतर से प्रकाश निकले तो रास्ता प्रकाशित होता है, और किसी तरह रास्ता प्रकाशित नहीं होता है।
पीले पत्ते के सामान इस समय तू है, यमदूत तेरे पास खड़े हैं, तू प्रयाण के लिए तैयार है और (कुशल कर्मों का) पाथेय (रास्ते ही खुराक) तेरे पास कुछ नहीं है ।
एक बूढा शिक्षक था, युवकों को पेड़ पर चढ़ना सिखाता था। एक राजकुमार सीखने आया हुआ था। राजकुमार चढ़ गया था ऊपर की चोटी तक, वृक्ष की ऊपर की शाखाओं तक। फिर उतर रहा था, वह बूढ़ा चुपचाप पेड़ के नीचे बैठा हुआ देख रहा था। कोई दस फीट नीचे से रह गया होगा युवक, तब वह बूढ़ा खड़ा हुआ और चिल्लाया, सावधान! बेटे सावधान होकर उतरना, होश से उतरना!
वह युवक बहुत हैरान हुआ। उसने सोचा, या तो यह बूढ़ा पागल है। जब मैं सौ फीट ऊपर था और जहां से गिरता तो जीवन के बचने की संभावना न थी--जब मैं बिलकुल ऊपर की चोटी पर था, तब तो यह कुछ भी नहीं बोला, चुपचाप आंख बंद किए, वृक्ष के नीचे बैठा रहा! और अब! अब जबकि मैं नीचे ही पहुंच गया हूं, अब कोई खतरा नहीं है तो पागल चिल्ला रहा है, सावधान! सावधान!
नीचे उतरकर उसने कहा कि मैं हैरान हूं! जब मैं ऊपर था, तब तो आपने कुछ भी नहीं कहा--जब डेंजर था, खतरा था? और जब मैं नीचे आ गया, जहां कोई खतरा न था...उस बूढ़े ने कहा, मेरे जीवनभर का अनुभव यह है कि जहां कोई खतरा नहीं होता, वहीं आदमी सो जाता है। और सोते ही खतरा शुरू हो जाता है। ऊपर कोई खतरा न था--क्योंकि खतरा था और उसकी वजह से तुम जागे हुए थे, सचेत थे, तुम गिर नहीं सकते थे। मैंने आज तक ऊपर की चोटी से किसी को गिरते नहीं देखा--कितने लोगों को मैं सिखा चुका। जब भी कोई गिरता है तो दस-पंद्रह फीट नीचे उतरने में या चढ़ने में गिरता है, क्योंकि वहां वह निश्चिंत हो जाता है। निश्चिंत होते ही सो जाता है। सोते ही खतरा मौजूद हो जाता है। जहां खतरा मौजूद है, वहां खतरा मौजूद नहीं होता, क्योंकि वह सचेत होता है। जहां खतरा नहीं है, वहां खतरा मौजूद हो जाता है, क्योंकि वह सो जाता है।
तुम नि:संग हो, निष्क्रिय हो, स्वत: ज्ञान-स्वरूप और माया-मल से सर्वथा रहित हो । तुम्हारा मात्र यही एक बंधन है जो समाधि लगाकर किसी अन्य के दर्शन करना चाहते हो ।
एक बहुत अदभुत आदमी था। वह चोरों का गुरु था। उस जैसा कुशल कोई चोर नहीं था। कुशलता थी। वह तो एक टेकनिक था, एक शिल्प था। जब बूढ़ा हो गया तो उसके लड़के ने कहा कि मुझे भी सिखा दें। उसके गुरु ने कहा, यह बड़ी कठिन बात है।
पिता ने चोरी करनी बंद कर दी थी। उसने कहा, यह बहुत कठिन बात है। फिर मैंने चोरी करनी बंद कर दी, क्योंकि चोरी में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं कि जिनके कारण मैं ही बदल गया। उसके लड़के ने पूछा, कौन सी घटनाएं? उसने कहा, कुछ ऐसे खतरे आए कि उन खतरों में मैं इतना जाग गया--जागने की वजह से चोरी मुश्किल हो गई। और जागने की वजह से उस संपत्ति का खयाल आया है, जो सोने के कारण दिखाई नहीं पड़ती थी। अब मैं एक दूसरी ही चोरी में लग गया हूं। अब मैं परमात्मा की चोरी कर रहा हूं। पहले आदमियों की चोरी करता रहा।
लेकिन मैं तुम्हें कोशिश करूंगा, शायद तुम्हें भी यह हो जाए। चाहता तो यही हूं कि तुम आदमियों के चोर मत बनो, परमात्मा के ही चोर बनो। लेकिन शुरुआत आदमियों की चोरी से कर देने में भी कोई हर्जा नहीं है।
ऐसे हर आदमी ही, आदमी की ही चोरी से शुरुआत करता है। हर आदमी के हाथ दूसरे आदमी की जेब में पड़े होते हैं। जमीन पर दो ही तरह के चोर हैं--आदमियों से चुराने वाले और परमात्मा से चुरा लेने वाले। परमात्मा से चुरा लेने वाले तो बहुत कम हैं--जिनके हाथ परमात्मा की जेब में चले जाएं। लेकिन आदमियों के तो हाथ में सारे लोग एक-दूसरे की जेब में डाले ही रहते हैं। और खुद के दोनों हाथ दूसरे की जेब में डाल देते हैं, तो दूसरों के तो उनकी जेब में हाथ डालने की सुविधा हो जाती है। स्वाभाविक है, क्योंकि अपनी जेब की रक्षा करें तो दूसरे की जेब से निकाल नहीं सकते। दूसरे की जेब से निकालें तो अपनी जेब असुरक्षित छूट जाती है, उसमें से दूसरे निकालते हैं। एक म्युचुअल, एक पारस्परिक चोरी सारी दुनिया में चल रही है।
उसने कहा कि लेकिन चाहता हूं कि कभी तुम परमात्मा के चोर बन सको। तुम्हें मैं ले चलूंगा। दूसरे दिन वह अपने युवा लड़के को लेकर राजमहल में चोरी के लिए गया। उसने जाकर आहिस्ता से दीवाल की ईंटें सरकाईं, लड़का थर-थर कांप रहा है खड़ा हुआ। आधी रात है, राजमहल है, संतरी द्वारों पर खड़े हैं, और वह इतनी शांति से ईंटें निकालकर रख रहा है कि जैसे अपना घर हो। लड़का थर-थर कांप रहा है। लेकिन बूढ़े बाप के बूढ़े हाथ बड़े कुशल हैं। उसने आहिस्ता से ईंटें निकालकर रख दीं। उसने लड़के से कहा, कंपो मत। साहूकारों को कंपना शोभा देता है, चोरों को नहीं। यह काम नहीं चल सकेगा। अगर कंपोगे तो क्या चोरी करोगे? कंपन बंद करो। देखो, मेरे बूढ़े हाथ भी कंपते नहीं।
सेंध लगाकर बूढ़ा बाप भीतर हुआ। उसके पीछे उसने अपने लड़के को भी बुलाया। वे महल के अंदर पहुंच गए। उसने कई ताले खोले और महल के बीच के कक्ष में वे पहुंच गए। कक्ष में एक बहुत बड़ी बहुमूल्य कपड़ों की अलमारी थी। अलमारी को बूढ़े ने खोला। और लड़के से कहा, भीतर घुस जाओ और जो भी कीमती कपड़े हों, बाहर निकाल लो। लड़का भीतर गया, बूढ़े बाप ने दरवाजा बंद करके ताला बंद कर दिया। जोर से सामान पटका और चिल्लाया--चोर। और सेंध से निकलकर घर के बाहर हो गया।
सारा महल जग गया। और लड़के के प्राण आप सोच सकते हैं, किस स्थिति में नहीं पहुंच गए होंगे। यह कल्पना भी न की थी कि यह बाप ऐसा दुष्ट हो सकता है। लेकिन सिखाते समय सभी मां-बाप को दुष्ट शायद होना पड़ता है। लेकिन एक बात हो गई, ताला बंद कर गया है बाप, कोई उपाय नहीं छोड़ गया बचने का। चिल्ला गया है--महल के संतरी जाग गए, नौकर-चाकर जाग गए हैं, प्रकाश जल गए हैं, लालटेनें घूमने लगी हैं, चोर की खोज हो रही है। चोर जरूर मकान के भीतर है। दरवाजे खुले पड़े हैं, दीवाल में छेद है।
फिर एक नौकरानी मोमबत्ती लिए हुए उस कमरे में भी आ गई है, जहां वह बंद है। अगर वे लोग न भी देख पाएं तो भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वह बंद है और निकल नहीं सकता, दरवाजे पर ताला है बाहर। लेकिन कुछ हुआ। अगर आप उस जगह होते तो क्या होता?
आज रात सोते वक्त जरा खयाल करना कि उस जगह अगर मैं होता--उस लड़के की जगह तो क्या होता? क्या उस वक्त आप विचार कर सकते थे? विचार करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। उस वक्त आप क्या सोचते? सोचने का कोई मौका नहीं था। उस वक्त आप क्या करते? कुछ भी करने का उपाय नहीं था। द्वार बंद, बाहर ताला लगा हुआ है, संतरी अंदर घुस आए हैं, नौकर भीतर खड़े हैं, घर भर में खोजबीन की जा रही है--आप क्या करते?
उस लड़के के पास करने को कुछ भी नहीं था। न करने के कारण वह बिलकुल शांत हो गया। उस लड़के के पास सोचने को कुछ नहीं था। सोचने की कोई जगह नहीं थी, गुंजाइश नहीं थी। सो जाने का मौका नहीं था, क्योंकि खतरा बहुत बड़ा था। जिंदगी मुश्किल में थी। वह एकदम अलर्ट हो गया। ऐसी अलर्टनेस, ऐसी सचेतता, ऐसी सावधानी उसने जीवन में कभी देखी नहीं थी। ऐसे खतरे को ही नहीं देखा था। और उस सावधानी में कुछ होना शुरू हुआ। उस सचेतता के कारण कुछ होना शुरू हुआ--जो वह नहीं कर रहा था, लेकिन हुआ।
उसने कुछ, अपने नाखुन से दरवाजा खरोंचा। नौकरानी पास से निकलती थी। उसने सोचा शायद चूहा या कोई बिल्ली कपड़ों की अलमारी में अंदर है। उसने ताला खोला, मोमबत्ती लेकर भीतर झांका। उस युवक ने मोमबत्ती बुझा दी। बुझाई, यह कहना केवल भाषा की बात है। मोमबत्ती बुझा दी गई, क्योंकि युवक ने सोचा नहीं था कि मैं मोमबत्ती बुझा दूं। मोमबत्ती दिखाई पड़ी, युवक शांत खड़ा था, सचेत, मोमबत्ती बुझा दी, नौकरानी को धक्का दिया; अंधेरा था, भागा।
नौकर उसके पीछे भागे। दीवाल से बाहर निकला। जितनी ताकत से भाग सकता था, भाग रहा था। भाग रहा था कहना गलत है, क्योंकि भागने का कोई उपक्रम, कोई चेष्टा, कोई effort वह नहीं कर रहा था। बस, पा रहा था कि मैं भाग रहा हूं। और फिर पीछे लोग लगे थे। वह एक कुएं के पास पहुंचा, उसने एक पत्थर को उठाकर कुएं में पटका। नौकरों ने कुएं को घेर लिया। वे समझे कि चोर कुएं में कूद गया है। वह एक दरख्त के पीछे खड़ा था, फिर आहिस्ता से अपने घर पहुंचा।
जाकर देखा, उसका पिता कंबल ओढ़े सो रहा था। उसने कंबल झटके से खोला और कहा कि आप यहां सो रहे हैं, मुझे मुश्किल में फंसाकर? उसने कहा, अब बात मत करो। तुम आ गए, बात खतम हो गई। कैसे आए--तुम खुद ही सोच लेना। कैसे आए तुम वापस? उसने कहा मुझे पता नहीं कि मैं कैसे आया हूं। लेकिन कुछ बातें घटीं। मैंने जिंदगी में ऐसी अलर्टनेस, ऐसी ताजगी, ऐसा होश कभी देखा नहीं था। और out of that alertness, उस सचेतता के भीतर से, फिर कुछ शुरू हुआ, जिसको मैं नहीं कह सकता कि मैंने किया। मैं आ गया हूं।
उस बूढ़े ने कहा, अब दोबारा भीतर जाने का इरादा है? उस युवक ने कहा, उस सचेतता में, उस awareness में जिस आनंद का अनुभव हुआ है, अब मैं चाहता हूं, मैं भी परमात्मा का चोर हो जाऊं। अब आदमियों की संपदा में मुझे भी कोई रस दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि उस सचेतता में मैंने अपने भीतर जो संपदा देखी है, वह इस संसार में कहीं भी नहीं है।
कार्ल गुस्ताव जुंग -- मैंने हजारों मानसिक रोगियों के निरीक्षण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि बयालीस साल के बाद जो लोग रोगग्रस्त हैं उनका असली रोग मानसिक नहीं है, धार्मिक है। बयालीस साल के हो गए और 'हां' कहने की कला नहीं आई, अभी भी 'नहीं' कहे चले जा रहे हैं— बचपना है!
मुल्ला नसरुद्दीन के पास एक गधा था। और गधे को अक्सर सर्दी लग जाती, तो वह कंपने लगता, बुखार आ जाता। वह लेकर गया उसको एक जानवरों के डाक्टर के पास।
उस डाक्टर ने जांच—पड़ताल की और उसको दो गोलियां दीं और एक पोली नली दी। और कहा कि नली में गोलियों को रखना और एक छोर गधे के मुंह में डालना और दूसरे से फूंक मार देना, तो गोलियां इसके पेट में चली जाएंगी। गोलियां बहुत गरम हैं, एक ही दिन में ठीक हो जाएगा।
शाम को ही नसरुद्दीन लौटा, तो वह लट्ठ लिए हुए था। उसने जाकर दरवाजे पर लट्ठ मारा और कहा, कहां है वह डाक्टर का बच्चा? डाक्टर भी डरा, क्योंकि उसकी आंखें लाल, चेहरा सुर्ख, पसीने से भरा हुआ।
डाक्टर ने पूछा कि क्या हुआ?
उसने कहा, तूने पूरी बात क्यों न बताई?
कौन—सी पूरी बात?
नसरुद्दीन ने कहा, गधे ने पहले फूंक मार दी; गोलियां मेरे पेट में चली गईं!
उस डाक्टर ने पूछा, तुम करने क्या लगे?
उसने कहा, मैं जरा दूसरे सोच में पड़ गया, जरा देर हो गई। गोली रखकर, मुंह में नली लगाकर मैं बैठा और कुछ दूसरा खयाल आ गया।
उतने खयाल में तो बेहोशी हो जाएगी।
हम सब ऐसे ही जी रहे हैं। कुछ कर रहे हैं, कुछ खयाल आ रहा है। कुछ करना चाहते हैं, कुछ हो जाता है। कुछ सोचा था, कुछ परिणाम आते हैं। कभी भी वही नहीं हो पाता, तो हम चाहते हैं। वह होगा भी नहीं, क्योंकि वह केवल तभी हो सकता है, जब होश पूरा हो।
जीवन है हाथ में अभी, और अभी ही कुछ किया जा सकता है। वाणी, विचार, आचरण, सब पहलुओं पर होश की साधना।
एक शराबी रात ज्यादा पीकर लौटा। रास्ते पर कई जगह गिरा था तो चेहरे पर कई जगह खरोंच और चोट लग गई। घर आकर वह बाथरूम में गया और उसने मलहम की पट्टियां अपने चेहरे पर लगाई। जाकर चुपचाप बिस्तर में सो गया। और बड़ा प्रसन्न हुआ कि पत्नी को पता भी नहीं चला; शोरगुल भी नहीं हुआ; खरोंच वगैरह भी सुबह तक काफी ठीक हो जाएगी; पता भी नहीं चलेगा। बात निपट गई।
लेकिन सुबह ही उसकी पत्नी चिल्लाती बाथरूम से बाहर आई कि तुमने बाथरूम का दर्पण क्यों खराब किया है? पति ने पूछा, कैसा दर्पण!
क्योंकि वह रात बेहोशी में जो मलहम-पट्टी चेहरे पर लगानी थी, दर्पण पर लगा आया था। होश न हो, तो यही होगा। करेंगे कुछ, हो जाएगा कुछ। और शराबी को होना बिलकुल आसान है। क्योंकि चेहरा दिखाई दर्पण में पड़ रहा था, वहीं उसने पट्टिया लगा दीं।
केवल वे ही, जो होश से जगे हुए हैं और प्रतिपल जिनका ज्ञान जाग्रत है, वे ही जन्म में, मृत्यु में, जीवन में, भीतर के तत्व को पूरी तरह पहचानते हैं।
जंगल में लोमड़ियां एक तरह का प्रयोग करती हैं। वही भक्ति और वही ध्यान का प्रयोग है। लोमड़ी के ऊपर कभी-कभी मधुमक्खी बैठ जाती है, या मक्खियां बैठ जाती हैं। उनसे कैसे छुटकारा पाए? मुंह हिलाती है तो वे पीछे बैठ जाती हैं, पूंछ पकड़ लेती हैं। पूंछ हिलाती है तो सिर पर बैठ जाती है। सिर और पूंछ दोनों हिलाए तो बीच में बैठ जाती हैं। भागे तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। वे मक्खियां बैठी रहती हैं। उसके ऊपर उड़ती हैं। वे उसे बड़े कष्ट में डाल देती हैं।
तो लोमड़ी क्या करती है? जिन लोगों ने लोमड़ियों का अध्ययन किया है वे कहते हैं, वह बड़ी कुशलता का काम करती है। वह क्या करती, नदी में या तालाब में उतर जाती। उलटी उतरती--पूंछ की तरफ से पहले। पहले पूंछ डूब जाती पानी में तो मक्खियां उसकी पूंछ छोड़ देती। फिर उसकी पीठ डूब जाती तो मक्खियां उसकी गर्दन भी छोड़ देती। और भी लोमड़ी बड़ा होशियारी का काम करती है, एक पत्ता मुंह में पकड़ लेती है। फिर वह और बिलकुल डुबने लगी तो उसका सिर भी डूबने लगा। तो वे सारी मक्खियां उसकी नाक पर आ जातीं। फिर आखिरी झपके में वह अपनी नाक को भी डुबकी मार देती है। तो सारी मक्खियां पत्ते पर आ जाती हैं। वह पत्ते को छोड़ देती है। पत्ता नदी में बह जाता है।
क्रमशः, धीरे-धीरे एक-एक कदम। घटना तो एक ही क्षण में घटती है यह सच है। क्योंकि जब तक मक्खियां उसकी नाक पर बैठी हैं तब तक सब मक्खियां बैठी हैं। पूंछ पर नहीं हैं, पीठ पर नहीं हैं मगर लोमड़ी पर तो है ही। अभी नाक पर बैठी है। अभी मक्खी एक भी गई नहीं है। आखिरी क्षण तक भी सब मक्खियां उस पर बैठी हैं। जाती तो एक ही क्षण में हैं। जब वह आखिरी डुबकी मारती है, एक क्षण में पत्ते पर सारी मक्खियां हो जाती हैं और पत्ता बह जाता है, मक्खियों को ले जाता है। क्रमशः नहीं घटती बात। यह याद रखना।
यह मत सोचन कि भक्त क्रमशः भगवान के करीब आता है। और यह मत सोचना कि ध्यानी क्रमशः समाधि के करीब आता है। नहीं, घटना तो आकस्मिक ही है। घटना तो अनायास ही है। घटना तो एक क्षण में ही घटती है। मगर घटना की तैयारी क्रमिक होगी।
जो आज साहिबे मसनद हैं, वे कल नहीं होंगे ।
किरायेदार है, जाती-मकान थोड़े ही है ॥
तुम पूछते हो: प्रभु, कब जागुंगा? तुम्हारा मन एक बात भर स्वीकार नहीं करता कि अभी जागना हो सकता है। अगर कोई कहे हां, जरूर जागोगे अगले जन्म में, तुम निश्चित हुए। फिर तुम्हारे मन से सारा बोझ टला। तो तुमने कहा: तो अभी तो जाऊं, दुकान करूं। तो अभी तो जाऊं, चुनाव लडूं? अभी तो धन कमा लूं। अभी तो जागने में देर है। अभी तो थोड़े सपने और देखू लूं। एक करवट और लूं और रजाई में छुप जाऊं। मीठी सुबह ठंडी सुबह। अभी तो जगना नहीं है, अभी बड़ी देर है। देखेंगे अगले जन्म में।
दाग -- फलक देता है जिनको ऐश उनको गम भी होते हैं
जहां बजते हैं नक्कारे वहां मातम भी होते हैं
मरते समय सुकरात के एक शिष्य क्रेटो ने पूछा, गुरुदेव, यह तो बता दें जाते समय कि आप अपना अंतिम संस्कार किस विधि से करवाना चाहेंगे--पूर्वीय विधि से? सुकरात निश्चित ही पूर्वीय रहस्यवाद में उत्सुक था। क्या आप पसंद करेंगे अग्नि से संस्कार हो? आपकी देह अग्नि में तिरोहित हो जाए? या आप पश्चिम की विधि को पसंद करेंगे कि आपकी देह को जमीन में गड़ा दिया जाए?
सुकरात जहर पी चुका था, जहर का असर होना शुरू हो चुका था, फिर भी उसने आंख खोलीं, लड़खड़ाती जबान से जवाब दिया, क्रेटो, तू भी पागल है। वे जो मुझे जहर पिला रहे हैं, सोचते हैं मुझे मार रहे हैं। वे सोचते हैं कि मेरे दुश्मन हैं। तू सोचता है कि मेरा मित्र है। दुश्मन सोच रहे हैं--कैसे मारें! मित्र सोच रहे हैं--कैसे गड़ाएं! न वे मुझे मार पाएंगे, न तुम मुझे गड़ा पाओगे। जब उन्हें भी लोग भूल जाएंगे और तुम्हें भी लोग भूल जाएंगे, तब भी मैं जीवित रहूंगा। अगर उनका नाम और तुम्हारा नाम याद भी रहा, तो मेरे कारण याद रहेगा।
पृथ्वी कभी परमात्मा से खाली नहीं होती। अप्रकट परमात्मा तो सब तरफ मौजूद रहता है, लेकिन कहीं न कहीं परमात्मा प्रकट भी होता है।
खेल
कथा :
एक जर्मन विचारक जापान गया । वह एक घर में मेहमान था । घर के लोगों ने, घर के मेजबान ने, जिसकी उम्र कोई अस्सी साल की थी, कहा कि आज सांझ एक विवाह हो रहा है मित्र के परिवार में, आप भी चलेंगे ? उसने कहा -- जरूर चलूंगा, क्योंकि मैं आया ही इसलिए हूं कि जापानी रीति-रिवाज का अध्ययन करूं, यह मौका नहीं छोडूंगा ।
वह गया । वहां देख कर बड़ा हैरान हुआ कि वहाँ गुड्डे-गुड्डी का विवाह हो रहा था छोटे-छोटे बच्चों ने विवाह रचाया था और बड़े लोग भी सम्मिलित हुए थे । और बड़ी शालीनता से विवाह का कार्यक्रम चल रहा था । वह जरा हैरान हुआ । उसने कहा -- बच्चे तो सारी दुनिया में खेलते हैं, गुड्डा-गुड्डी का विवाह रचाते हैं; मगर बड़ी उम्र के लोग सम्मिलित हुए, फिर जुलूस निकला, बारात निकली, उसमें भी सब सम्मिलित हुए । वह रोक न पाया अपने को । घर आते से ही उसने कहा कि -- क्षमा करें ! यह मामला क्या है ? बच्चे तो ठीक हैं, बच्चे तो सारी दुनिया में ऐसा करते हैं; मगर आप सब बड़े-बूढ़े इसमें सम्मिलित हुए !
तो उसने हंस कर कहा -- बच्चे इसे असलियत समझ कर कर रहे हैं, हम इसे खेल-खेल में.. । बच्चे इतने प्रसन्न हैं, साथ देना जरूरी है । कभी वे भी जागेंगे । और हमारे साथ रहने से उनका खेल उन्हें बड़ा वास्तविक मालूम पड़ता है ।
फिर उस बूढ़े ने कहा -- और बाद में जिनको तुम असली विवाह कहते हो, असली दूल्हा-दूल्हन, वह भी कहीं खेल से ज्यादा है क्या ? वह भी खेल है । यह भी खेल है । यह छोटों का खेल है, वह बड़ों का खेल है ।
ऐसा पुरुष, जिसकी निंदा ही निंदा होती हो, या प्रशंसा ही प्रशंसा, न था, न होगा, न इस समय है ।
स्वप्न
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक रात सपना देखा । सपना देखा कि कोई उससे कह रहा है -- कितने रुपए चाहिए, ले ले ! मुल्ला ने कहा -- सौ रुपए । फिर आवाज आई । उसने कहा कि निन्यानवे दूंगा । मुल्ला जिद पर अड़ गया कि सौ ही लूंगा । ऐसी जिदमजिद में नींद खुल गई । नींद खुल गई तो मुल्ला घबराया । देखा कि यह तो सपना था । जल्दी से आख बंद की और बोला 'अच्छा निन्यानवे ही दे दो ।' मगर अब तो बात गई । अब तुम लाख उपाय करो, अब तो बात गई । न कोई देने वाला है, न कोई लेने वाला है । अब लाख बंद करो आँख, सपना टूटा सो टूटा ।
बर्ट्रेंड रसेल - जब पहली दफा मैंने एक जंगल में आदिवासियों को देखा तो मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हो गई कि काश मैं भी ऐसा ही नाच सकता, लेकिन अब तो मुश्किल है ! काश, इसी तरह घुंघरू बांध कर ढोल की थाप पर मेरे पैर भी फुदकते !
एक भवन में एक कुत्ता और बिल्ली दोनों एक साथ पाल लिए गए थे। एक सुबह उस बिल्ली ने उठ कर कहा, आज रात तो अदभुत हुआ, मैंने स्वप्न देखा कि इस वर्ष वर्षा में पानी नहीं, चूहे गिरेंगे।
वह कुत्ता बोला, बिलकुल नासमझी की बात है। न किसी शास्त्र में कभी लिखा है यह, न पुराणों में कभी इसकी कथा सुनी है, न किसी इतिहास में इसका उल्लेख है कि कभी चूहे गिरे हों। हां, ऐसे उल्लेख जरूर हैं जब वर्षा में हड्डियां गिरीं और पानी नहीं गिरा। उसने कहा, मैं भी स्वप्न देखता हूं, कभी यह नहीं देखा कि चूहे गिरते हों। हड्डियां गिरती हैं।
उस कुत्ते ने ठीक ही कहा। उसकी जो प्रतिध्वनियां हैं जगत के प्रति, वे हड्डियों की हैं। बिल्ली ने ठीक ही देखा। उसकी जो प्रतिध्वनियां हैं जगत से, वे चूहों की हैं।
आत्महत्या आपको कही नही ले जाती; साधारणतः यह हमें हमारी चेतना को छोटे रूप (स्तर) में ले जाती है, क्योंकि आत्महत्या से ये साबित होता है की हम बड़े रूप (स्तर) में जीने के काबिल नही है ।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने मनोचिकित्सक के पास एक बार गया। और उसने कहा कि मैं बडा व्यथित हूं और जब बहुत थक गया और परेशान हो गया, तब आपके पास आया हूं। उस मनोचिकित्सक ने पूछा कि क्या तकलीफ है? नसरुद्दीन ने कहा, एक ही स्वप्न बार—बार आता है, रोज आता है। और अब मैं थक गया हूं वर्षों से। अब मैं सो भी नहीं पाता। दिनभर भी लगता है, वह स्वप्न रात आएगा, और रात उस सपने में बीतती है।
चिकित्सक, मनोचिकित्सक भी उत्सुक और आतुर हो गया। उसने पूछा, कौन—सा स्वप्न है? उसने कहा, रोज एक स्वप्न देखता हूं। बैठा हूं अपने मकान के सामने, एक अति सुंदर युवती निकलती है और मैं उसके पीछे भागता हूं। और वह जाती है और अपने मकान में चली जाती है, और दरवाजा बंद कर लेती है। मैं दरवाजे पर खड़ा ठोंक रहा हूं दरवाजा, ठोंक रहा हूं। कई साल हो गए, रोज यही स्वप्न!
तो मनोचिकित्सक ने कहा, इस स्वप्न से आप मुक्त होना चाहते हैं न: नसरुद्दीन ने कहा, आप गलती समझे। मैं चाहता हूं वह दरवाजा बंद न कर पाए।
सपने से छूटने को कोई तैयार नहीं है। सपने को सुंदर बनाने की चेष्टा है।
पागल
कथा :
एक बड़ी प्रसिद्ध कहानी है खलील जिब्रान की । एक गांव में एक जादूगर आया । उसने गांव के कुएं में मंत्र पढ़ कर कोई एक चीज फेंक दी और कहा -- जो भी इसका पानी पीएगा, पागल हो जाएगा । गांव में दो ही कुएं थे । एक राजा के घर में था और एक गांव में था । सारा गांव तो पागल हो गया, राजा बचा और उसका वजीर बचा । राजा बड़ा खुश था कि हम अच्छे बचे, अन्यथा पागल हो जाते । लेकिन जल्दी ही खुशी दुख में बदल गयी, क्योंकि सारे गांव में यह खबर फैल गई कि राजा पागल हो गया । सारा गांव पागल हो गया था । अब पागलों का गांव, उसमें राजा भर पागल नहीं था -- स्वाभाविक था कि सारा गांव सोचने लगा, इसका दिमाग कुछ ठीक नहीं है, कुछ गड़बड़ है । राजा ने अपने वजीर से कहा कि. 'यह तो बड़ी मुसीबत हो गयी ! ये पगले खुद तो पागल हुए हैं ।’ लेकिन इन्हीं में उसके सिपाही भी थे, सेनापति भी थे, उसके रक्षक भी थे । उसने वजीर से पूछा -- हम क्या करें ? यह तो खतरा है ।
सांझ होते-होते पूरी राजधानी उसके महल के आसपास इकट्ठी हो गयी और उन्होंने कहा -- हटाओ इस राजा को ! हम स्वस्थ-चित्त राजा चाहते हैं । राजा ने कहा -- जल्दी करो कुछ ! क्या करना है ? वजीर ने कहा -- मालिक, एक ही उपाय है कि चल कर उस कुएं का पानी पी लें । भागे, जा कर कुएं का पानी पी लिया । उस रात गांव में जलसा मनाया गया और लोग खूब नाचे कि अपना राजा स्वस्थ हो गया । वे भी पगला गए ।
यह जो दुनिया है, पागलों की है । यहां सब मूर्च्छित हैं । यहां जाग्रत पुरुष भी तुम्हारे बीच जीए तो तुम्हारी भाषा के अनुसार चलना होता है । तुम्हारे बीच जीता है, तुम्हारे नियमों को पालना पड़ता है । तुम तो पालते हो अपने नियमों को बड़ी गंभीरता से, वह उन नियमों का पालन करता है बड़े खेल-खेल में, प्रमोदवशात !
लोग धन के पीछे भागे जा रहे हैं । एक आदमी धन के पीछे भागना बंद कर देता है, हम उसको मनोवैज्ञानिक के पास ले जाते हैं । हम कहते हैं, इसे क्या हो गया? जैसे सब हैं वैसा यह क्यों नहीं है? सब धन कमा रहे हैं, यह कहता है धन में क्या रखा है? अभी ऐसी घटना घटी न्यूयार्क में । एक आदमी बैंक से दस हजार डालर लेकर निकला । खूब धनी आदमी । और उसे ऐसे मौज आ गई रास्ते पर कि देखें क्या होता है । तो उसने सौ-सौ डालर के नोट लोगों को देने शुरू कर दिए । जो दिखा उसको कहा कि लो । लोगों ने नोट देखा, पहले तो भरोसा न आया कि सौ डालर का नोट कौन दे रहा है ऐसे अचानक? फिर उस आदमी को देखा, सोचे कि पागल है । उसने जो रास्ते पर मिला उसको नोट देने शुरू कर दिए ।
थोड़ी देर में खबर फैल गई कि वह आदमी पागल हो गया । थोड़ी देर में पुलिस आ गई, उस आदमी को पकड़ लिया कि तुम्हारा दिमाग खराब हो गया? वह कहने लगा, मेरे रुपये और मैं बांटना चाहूं तो तुम हो कौन? पर उन्होंने कहा, तुम पहले अदालत चलो । पहले तुम्हें प्रमाणपत्र लाना पड़ेगा मनोवैज्ञानिक का कि तुम स्वस्थ हो! क्योंकि ऐसा कोई करता?
यहां लोग पागल हैं धन इकट्ठा करने को । यहां अगर कोई बांटने लगे तो पागल मालूम होता है । बुद्ध लोगों को पागल मालूम हुए जब उन्होंने राजसिंहासन छोड़ा । महावीर भी पागल मालूम हुए जब उन्होंने साम्राज्य छोड़ा । पागल हैं ही ।
वह आदमी जाकर अदालत में कहा कि यह भी खूब रही । मेरे रुपये मैं बांटना चाहता हूं । मजिस्ट्रेट ने कहा रुको, मनोवैज्ञानिक का प्रमाणपत्र... । मनोवैज्ञानिक कोई प्रमाणपत्र देने को तैयार नहीं, क्योंकि ऐसा आदमी पागल होना ही चाहिए । दस हजार डालर बांट दिए । और वह कहता है कि अगर तुम मुझे प्रमाणपत्र दे दो तो मैं दस हजार निकाल कर और बांट दूं । मेरे पास बहुत हैं । और मुझे बहुत मजा आया । जिंदगी में इतना मजा मुझे कभी आया ही नहीं । इकट्ठे मैंने रुपये किए, खूब किए । यह सुख मैंने कभी पाया नहीं । मुझे बड़ा सुख मिल रहा है । मुझे बांटने दो ।
मनोवैज्ञानिक ने कहा, अगर तुम्हें फिर बांटना है तो तुम मुझे भी फंसाओगे । तो मैं तुम्हें प्रमाणपत्र नहीं दे सकता ।
जहां भीड़ पागल है धन के लिए वहां कोई आदमी धन को छोड़ दे तो पागल मालूम होता है । जहां लोग हिंसा से भरे हैं वहां कोई प्रेम से भर जाए तो पागल मालूम होता है । जीसस को फांसी ऐसे ही थोड़े दी! पागल मालूम हुआ । क्योंकि लोगों से कहने लगा, कोई तुम्हारे गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर देना । अब यह पागल ही कोई कहेगा । ये होश की बातें हैं? कि जीसस ने लोगों से कहा, कोई तुम्हारा कोट छीन ले तो कमीज भी दे देना । ये कोई होश की बातें हैं? कभी किसी समझदार ने ऐसा कहा है? कोई कौटिल्य, कोई मेक्यावेली ऐसा कहेगा? बुद्धिमान कभी ऐसा कहे हैं? इस आदमी का दिमाग फिर गया है ।
यह कहने लगा कि जो तुम्हें घृणा करें उन्हें प्रेम करना । और जो तुम्हें अभिशाप दें उन्हें वरदान देना । इसको सूली लगानी जरूरी हो गई । सूली पर लटक कर भी इसने अपना पागलपन न छोड़ा । सूली से अंतिम बात भी यही कही कि हे प्रभु! इन सबको क्षमा कर देना क्योंकि ये जानते नहीं, ये क्या कर रहे हैं । लेकिन उन करनेवालों से पूछो, वे भलीभांति जानते हैं कि क्या कर रहे हैं । वे एक पागल से छुटकारा पा रहे हैं । यह कोई बात है? कोई चाटा मारे, तुम दूसरा गाल कर देना ।
जीसस से एक शिष्य ने पूछा कि कोई एक बार मारे तो हम माफ कर दे, लेकिन कितनी बार? जीसस ने कहा, सात बार... नहीं-नहीं, सतहत्तर बार । फिर देखा गौर से और कहा कि नहीं-नहीं, सात सौ सतहत्तर बार ।
एक ईसाई फकीर को एक आदमी ने चांटा मार दिया तो उसने दूसरा गाल सामने कर दिया । जीसस ने कहा है तो करना पड़े । उसने दूसरे गाल पर भी चांटा मार दिया । वह आदमी भी अदभुत रहा होगा मारनेवाला । वह शायद फ्रेडरिक नीत्शे का अनुयायी रहा होगा । क्योंकि फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा है कि अगर कोई, तुम चांटा मारो, और एक गाल पर चांटा मारो और दूसरा तुम्हारे सामने कर दे तो और भी जोर से मारना, नहीं तो उसका अपमान होगा । उसने गाल दिखाया और तुमने चांटा भी न मारा?
तो रहा होगा फ्रेडरिक नीत्शे का अनुयायी । उसने और कस कर एक चांटा मारा । सोचता था कि अब यह फिर पुराना गाल करेगा । लेकिन वह फकीर उसकी छाती पर चढ़ बैठा । वह बोला, भाई रुको । यह क्या बात है? तुम्हारे गुरु ने कहा है कि जो एक गाल पर चांटा मारे, दूसरा करना । उसने कहा कि दूसरा गाल बता दिया । तीसरा तो है ही नहीं । और गुरु ने इसके आगे कुछ भी नहीं कहा है । अब मैं मुखत्यार खुद । अब मैं तुझे बताता हूं ।
आदमी पागल है । अगर वह नियम का थोड़ा पालन भी करता है तो बस, एक सीमा तक । जहां तक नियम, मुर्दा नियम पालन करना है, कर लेता है । लेकिन उसके बाद असलियत प्रकट होती है ।
सुकरात को जब सूली दी जाती थी, जहर पिलाया जाता था, मारने की आता दी गई थी तो मजिस्ट्रेट को भी उस पर दया आई थी और उसने कहा था, एक अगर तू वचन दे दे तो हम तुझे क्षमा कर दें । इतना तू वचन दे दे कि अब तू जिसको तू सत्य कहता है उसकी बातचीत बंद कर देगा तो हम तुझे क्षमा कर दें ।
सुकरात ने कहा, फिर जीकर क्या करूंगा? जीने का अर्थ ही क्या है जहां सत्य की बात न हो, जहां सत्य की चर्चा न हो?जहां सत्य की सुगंध न हो तो जीने का अर्थ क्या है? इससे बेहतर मर जाना है । तुम मुझे मौत की सजा दे दो । मैं रहूंगा तो मैं सत्य की बातें करूंगा ही । मैं रहूंगा तो और कोई उपाय ही नहीं है, मेरे रहने से सत्य की सुगंध निकलेगी ही ।
मजिस्ट्रेट को लगा होगा, सुकरात पागल है । मौत चुन रहा है । तुमने चुनी होती मौत? तुम कहते, छोड़ो सत्य इत्यादि । इसमें रखा क्या है? पाया क्या? उपद्रव में पड़े । अगर सब झूठ बोल रहे हैं और सारा जीवन झूठ से चल रहा है तो इसी में कुशलता है । इसी में है समझदारी कि तुम भी झूठ बोलो, लोगों के साथ चलो । लोग जैसे हैं वैसे रहो- भेड़चाल ।
बुद्ध -- सत्य के मार्ग पर चलते हुए कोई व्यक्ति दो गलतियाँ कर सकता है; एक, पूरा रास्ता तय न करना और दूसरा, इसकी शुरुआत भी न करना ।
एच. जी. वेल्स एक कहानी कहा करते थे। वे कहते थे, 'एक दफा मैं ट्रेन में सवार हुआ और एक आदमी मेरे पास बैठा था। वह इतना उदास था कि मुझे पूछना ही पड़ा कि इतनी उदासी क्यों? क्या परेशानी है? वह ऐसा मुर्दे की तरह बैठा था कि जैसे अब मरा, अब मरा। तो उस आदमी ने अपना दुख रोया। उसका दुख यह था कि उसने कहा कि अब मैं क्या बताऊं, किसको कहूं? मेरी पत्नी पागल हो गई है और वह अपने को मुर्गी समझने लगी है। और चौबीस घंटे 'कुकडूं कूं, कुकडूं कूं' किया करती है। उसका 'कुकडूं कूं' मेरे सिर में घूमता रहता है रात दिन। तो एच. जी. वेल्स ने उसको कहा कि 'भाई, इसमें इतने परेशान होने की जरूरत नहीं। किसी अच्छे मनोविश्लेषक को दिखा लो, ठीक हो जायेगी। इससे भी बड़ी बीमारियां ठीक हो जाती हैं।'
उसने और भी उदास हो कर कहा, 'साहब, वह तो ठीक है कि ठीक हो जायेगी, लेकिन हमें अंडों की जरूरत भी रहती है।'
वह जो पचास लोगों से प्रेम करता है उसके पचास संकट हैं, वो जो किसी से भी प्रेम नहीं करता उसका एक भी संकट नहीं है ।
एक नेताजी पागलखाने में भाषण देने गए। भाषण के बाद पागलखाने के इंचार्ज ने बतलाया कि आज आपके भाषण के बाद पागल जितने खुश नजर आ रहे हैं, इतना प्रसन्न तो मैंने उन्हें अपनी पूरी जिंदगी में नहीं देखा। पच्चीस साल मुझे नौकरी करते हो गए।
नेताजी यह सुन कर मुस्कुराए, बोले, भाषण ही आज मैंने ऐसा दिया था कि अच्छे-अच्छे तक बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकते; फिर ये तो बेचारे पागल हैं।
ऐ भाई, जरा यहां आओ -- एक पागल को बुला कर राजनीतिज्ञ ने पूछा -- तुम लोग आज इतने खुश क्यों नजर आ रहे हो?
पागल ने कहा, खुश क्यों न हों नेताजी, हमारा महासौभाग्य कि आप यहां पधारे। यह हमारा इंचार्ज तो एकदम पागल है, जब कि आप बिलकुल हमारे जैसे लगते हैं।
एक पागलखाने में, एक ही कोठरी में, तीन आदमी बंद थे; तीनों पुराने साथी थे, एक ही साथ पागल हुए थे । एक-दूसरे को रंग दिया होगा। एक मनोवैज्ञानिक उनका अध्ययन करने आया था। तो उसने पागलखाने के डाक्टर से पूछा कि इनमें नंबर एक की क्या तकलीफ है। डाक्टर ने कहा, 'यह नंबर एक, एक रस्सी में लगी हुई गांठ को खोलने का उपाय कर रहा था और खोल नहीं पाया, उसी में पागल हुआ।' और यह दूसरा क्या कर रहा था? 'यह भी वही गांठ खोल रहा था रस्सी में लगी हुई और खोलने में सफल हो गया, इसलिए पागल हुआ।' वह मनोवैज्ञानिक थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहा, 'ये तीसरे सज्जन?' डाक्टर ने कहा कि ये वे सज्जन हैं, जिन्होंने यह गांठ लगायी थी।
कोई गांठ लगा रहा है, कोई खोल रहा है; कोई सफल हो जाता है, कोई असफल हो जाता है -- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; सब पागल हो जाते हैं। लेकिन लोग गांठ लगाने-खोलने में उलझे हैं ।
कसूर
कथा :
अकबर की सवारी निकलती थी । एक आदमी छप्पर पर चढ़ कर गाली देने लगा । सैनिक उसे पकड़ लाए । अकबर के सामने दूसरे दिन उपस्थित किया । अकबर ने पूछा -- तूने ये गालियां क्यों बकी, क्या कारण है ? यह अभद्रता क्यों की ? उस आदमी ने कहा -- माफ करें, मैंने कुछ भी नहीं किया । मैं शराब पी लिया था । मैं होश में नहीं था । अगर आप मुझे दंड देंगे उस बात के लिए तो कसूर किसी ने किया, दंड किसी को दिया -- ऐसी बदनामी होगी । शराब पीने के लिए चाहें तो मुझे दंड दे लें -- शराब पीना कोई कसूर न था -- लेकिन गाली देने के लिए मुझे दंड मत देना, क्योंकि मैंने दी ही नहीं, मुझे पता ही नहीं । आप कहते हैं तो जरूर गाली मुझसे निकली होगी; लेकिन शराब ने निकलवाई है । मुझे कुछ पता नहीं है । मैं कैसे गाली दे सकता हूं !
और अकबर को भी बात समझ में आई । छोड़ दिया गया वह आदमी ।
दुनिया में दो तरह के अज्ञानी हैं -- एक, जिनको पता है; और एक, जिनको पता नहीं । जिनको अपने अज्ञान का पता है उन्हीं को ज्ञानी कहा जाता है, और जिनको अपने अज्ञान का पता नहीं, उन्हीं को अज्ञानी कहा जाता है ।
महाभारत के युद्ध के पश्चात् का दृश्य अत्यन्त हृदय-विदारक है। हंसता खेलता युग युद्ध की बलि चढ़ गया। नगर में विधवाओं का बाहुल्य हो गया था क्योंकि पुरुष लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए थे चाहे वे किसी भी पक्ष के हों। महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी शून्य में ताक रही है। 'श्रीकृष्ण … ' सिसकती हुई द्रौपदी कक्ष में प्रवेश कर चुके श्रीकृष्ण से लिपट जाती है। 'ये तुमने अपनी काया को क्या कर लिया' श्रीकृष्ण ने पूछा तो द्रौपदी का रुदन फूट पड़ता है। श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के सर को सहलाया और कहा 'कुछ देर रुदन कर लो पांचाली, मन हलका हो जायेगा।' द्रौपदी कुछ पलों तक रुदन करती रहती है। 'पांचाली, उस पलंग पर बैठ जाओ और कहो क्या कहना चाहती हो' श्रीकृष्ण ने सांत्वना दी।
द्रौपदी सुबकते हुए कह रही है 'यह क्या हो गया सखा, ऐसा मैंने नहीं सोचा था। सब विनाश हो गया। क्यों?' सदैव की भांति मुखमंडल पर मुस्कान लिए श्रीकृष्ण उत्तर में कहते हैं 'नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली! वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती।' 'तो हे सखा बताओ नियति इतनी क्रूर क्यों होती है और हमारे परिप्रेक्ष्य में नियति का क्या हस्तक्षेप है' द्रौपदी पूछ रही है। 'मैं प्यासा हूं सखी, मेरे लिए जल की व्यवस्था करो। प्यास बुझा कर मैं आराम से बात करता हूं। अब मेरे पास समय ही समय है। महाभारत समाप्त हुई मानो एक युग-सा बीत गया' श्रीकृष्ण कह रहे हैं। 'अवश्य सखा' कहती हुई द्रौपदी जल का प्रबन्ध करने का आदेश देती है।
श्रीकृष्ण ने अपनी प्यास बुझाई और कहना आरम्भ किया 'पांचाली, नियति हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है।' 'सखा, विस्तार से बताओ' द्रौपदी ने कहा। श्रीकृष्ण ने कहा 'तो सुनो पांचाली, तुम प्रतिशोध लेना चाहती थीं और तुम प्रतिशोध की अग्नि में जलती रहीं। अन्ततोगत्वा तुम सफल हुईं पांचाली! तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ। केवल दुर्योधन और दुःशासन ही नहीं अपितु सभी कौरव समाप्त हो गये। तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।'
द्रौपदी कहती है 'हे श्रीकृष्ण, यह तुम मेरे घावों को सहलाने आये हो या उन पर नमक छिड़कने आये हो?' श्रीकृष्ण 'नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने आया हूं। हमारे कर्मों के परिणामों को हम दूर-दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब परिणाम हमारे समक्ष होते हैं तो हमारे हाथों में कुछ भी नहीं रह जाता, हम कुछ नहीं कर पाते, हम असहाय हो जाते हैं।'
'तो क्या इस युद्ध के लिए मैं ही पूर्ण रूप से उत्तरदायी हूं?' द्रौपदी ने प्रश्न किया। 'नहीं द्रौपदी तुम स्वयं को इतना भी महत्वपूर्ण मत समझो, लेकिन तुम अपने कर्मों में थोड़ी-सी भी दूरदर्शिता रखती तो स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पातीं' श्रीकृष्ण ने कहा।
'एक अन्य अवसर पर जब दुर्योधन मय द्वारा निर्मित तुम्हारे महल के मायावी कक्ष में था तो वहां उसे अनेक भ्रांतियां और भ्रमजालों का सामना करना पड़ा। वहां भी तुमने -- अंधे का पुत्र अंधा होता है -- जैसे आहत करने वाले शब्द कह कर दुर्योधन का घोर अपमान किया। यदि तुम दुर्योधन का अपमान न करतीं तो संभवतः चीर-हरण की स्थिति उत्पन्न नहीं होती और परिस्थितियां भिन्न होतीं।'
'सुनो पांचाली, हमारे शब्द हमारे कर्म होते हैं। हमें अपने शब्दों को बोलने से पहले अवश्य तोल लेना चाहिए पांचाली। अन्यथा उसके दुष्परिणाम केवल स्वयं को ही नहीं अपितु पूर्ण परिवेश को विचलित करते रहते हैं, दुःखी करते रहते हैं। पांचाली, संसार में केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसका ज़हर उसके दांतों में नहीं, उसके शब्दों में होता है।'
उन्हें कामयाबी में सुकून नजर आया....तो वो दौड़ते गए,
हमें सुकून में कामयाबी दिखी तो हम ठहर गए !
ख़्वाईशो के बोझ में बशीर..तू क्या क्या कर रहा है..
इतना तो जीना भी नहीं...जितना तू मर रहा है...
स्मृति
कथा :
सिकंदर वेद की एक संहिता को यूनान ले जाना चाहता था और उसने पंजाब के एक गांव में पता लगाने की कोशिश की कि वेद की प्रति कहां मिल सकेगी । पता चल गया । एक वृद्ध ब्राह्मण के पास ऋग्वेद की संहिता थी । उसने घर घेर लिया । और उसने ब्राह्मण से कहा कि वेद की संहिता मुझे सौंप दो अन्यथा घर, तुम, संहिता, सबको जला डाला जायेगा । ब्राह्मण ने कहा -- इतने परेशान होने की जरूरत नहीं है, कल सुबह सौंप दूंगा, पहरा आप रखें ।
रात भर का समय क्यों चाहते हो ? सिकंदर ने पूछा । उसने कहा कि रात भर का समय चाहता हूं ताकि पूजा-पाठ कर लूं पीढ़ियों से यह संहिता हमारे घर में रही है तो इसे ठीक से सम्मान से विदा देना होगा न ! सुबह आप को भेंट कर देंगे । रात भर हम पूजा-पाठ कर लें, सुबह आप ले लेंगे । सिकंदर ने सोचा -- हर्ज भी कुछ नहीं है । पहरा तो लगा था, भाग कहीं सकता न था ब्राह्मण । लेकिन सिकंदर ने यह सोचा भी न था कि भागने के और कोई सूक्ष्म उपाय भी हो सकते हैं । यज्ञ की वेदी पर हवन किया और उसने ऋग्वेद का पाठ करना शुरू किया ।
सुबह जब सिकंदर पहुंचा तो ऋग्वेद की संहिता का आखिरी पन्ना ब्राह्मण के हाथ में था । वह एक-एक पन्ना पढ़ता गया और आग में डालता गया । उसका बेटा बैठा सुन रहा था । जब सिकंदर पहुचा तो उसने कहा -- 'मेरे बेटे को ले जाएं, इसे ऋग्वेद कंठस्थ करवा दिया है । यह संहिता है । शास्त्र तो मैं दे नहीं सकता था, उसकी तो गुरु से मनाही थी; लेकिन बेटा मैं दे सकता हूं, इसकी कोई मनाही नहीं है !
सिकंदर को तो भरोसा न आया कि सिर्फ एक बार दोहराने से और पूरा ऋग्वेद बेटे को कंठस्थ हो गया होगा ! उसने और पंडित बुलवाए, परीक्षा करवाई-चकित हुआ । वेद कंठस्थ हो गया था ।
स्मृति को व्यवस्थित करने के बहुत उपाय खोजे गए थे, इसलिए बहुत दिनों तक तो भारत में हमने वेद को लिखे जाने के लिए -स्वीकृति नहीं दी; जरूरत न थी । मनुष्य का मन इस भांति हमने व्यवस्थित किया था, ऐसी प्रणालियां खोजी थीं कि जरूरत नहीं थी कि किताब लिखी जाए; मन पर अंकित हो सकता था ।
समाज-सेवक
कथा :
एक ईसाई पादरी ने अपने स्कूल में बच्चों को कहा कि कम से कम प्रतिदिन एक अच्छा काम करना ही चाहिए । दूसरे दिन उसने पूछा कि कोई अच्छा काम किया ? तीन लड़के खड़े हो गये । उसने पहले से पूछा -- तुमने क्या अच्छा काम किया ? उसने कहा -- मैंने एक की स्त्री को सड़क पार करवाई । दूसरे से पूछा; उसने कहा -- मैंने भी एक बूढ़ी स्त्री को सड़क पार करवाई । पादरी को लगा कि दोनों को स्त्रियां मिल गईं ! फिर उसने कहा कि हो सकता है, कोई स्त्रियों की कमी तो है नहीं । तीसरे से पूछा कि तूने क्या किया ? उसने कहा कि मैंने भी एक स्त्री को सड़क पार करवाई । उसने कहा -- तुम तीनों को स्त्रियां मिल गईं ? उन्होंने कहा -- तीन नहीं थीं, एक ही बूढ़ी स्त्री थी । और सड़क पार होना भी नहीं चाहती थी, बामुश्किल करवा पाये । मगर करवा दी !
उपनिषद -- जो कहे मैं जानता हूं जान लेना कि नहीं जानता । जो कहे मुझे कुछ पता नहीं, उसका पीछा करना, हो सकता है उसे पता हो ! जिंदगी बड़ी पहेली है ।
मैं एक गांव में मेहमान था। पंद्रह अगस्त का दिन था। और स्कूल के बच्चे गांव में जुलूस लेकर निकले थे, उनकी कतार बनाई गई थी। छोटा बच्चा आगे, उससे फिर बड़ा, उससे फिर बड़ा, ऐसा सिलसिले से वे खड़े थे। कतार तो बिलकुल ठीक थी,सिर्फ एक लड़का, जो सबके आगे खड़ा था और झंडा लिए था, वह इस श्रृंखला के बाहर था।
तो मैंने पूछा एक लड़के को कि इस लड़के को श्रृंखला में क्यों खड़ा नहीं किया गया? क्या यह तुम्हारा अगुआ है? उसने कहा, अगुआ नहीं है, लेकिन इसको कहीं और खड़ा करो तो लोगों को चिउटियां लेता है। इसलिए इसको झंडा देकर आगे खड़ा करना पड़ा।
तुम्हारे सब राजनेता बस ऐसे ही हैं, चिउटियां! उनको कहीं भीतर खड़ा करो मत, झंझट का काम है। उनको आगे रखना पड़ता है। हालांकि वे झंडा लिए हैं, वे अकड़े हुए हैं। मगर कुल कारण उनके आगे होने का यह है कि वे उपद्रवी हैं। आगे होना हो तो उपद्रव से मुक्त होने का उपाय नहीं है; उपद्रवी होना पड़ेगा।
वेद -- हमें पता नहीं, किसने जगत बनाया! जिसने बनाया होगा, उसे ही पता हो। और कौन जाने, उसे भी पता है या नहीं!
मुल्ला नसरुद्दीन का लड़का था। तो वह उसके संबंध में सोचता था कि यह क्या बने, क्या न बने! तो उसने एक दिन कुरान रख दी, पास में एक सौ का नोट रख दिया, और एक तलवार रख दी। सोचा, तलवार उठा लेगा अंदर जाकर कमरे में, तो समझेंगे कि योद्धा बनेगा। कुरान उठा लेगा, तो समझेंगे कि धर्मगुरु, पुरोहित, साधु, फकीर, धर्म की यात्रा पर जाएगा। सौ का नोट उठा लेगा, तो समझेंगे कि धन, व्यवसाय, नौकरी, पेशा, कहीं धन कमाएगा। छिपकर देखता रहा। लड़का अंदर गया। वह नसरुद्दीन का ही लड़का था। उसने कुरान उठाकर बगल में दबाई; सौ का नोट खीसे में रखा, तलवार लेकर चल पड़ा। नसरुद्दीन ने कहा, यह राजनीतिज्ञ बनेगा!
पहचान
कथा :
एक महिला एक डॉक्टर के पास पहुंची-बड़े सर्जन के पास-और कहा कि मेरा कोई आपरेशन कर दें ! कोई आपरेशन ! उसने पूछा, 'तुम्हें हुआ क्या है ? बीमारी क्या है ?' उसने कहा : 'बीमारी मुझे कुछ भी नहीं । लेकिन आप कोई भी आपरेशन कर दें ।' डॉक्टर ने कहा, 'लेकिन, इसका कोई भी प्रयोजन समझ में नहीं आ रहा है ।' उसने कहा : 'जब भी मिलती हूं दूसरी महिलाओं से, किसी ने टान्सिल निकलवा लिये, किसी ने अपैन्डिक्स निकलवा ली, किसी ने कुछ; मेरा कुछ भी नहीं निकला तो बात करने को ही कुछ नहीं है । आप कुछ भी निकाल दें । चर्चा को तो कुछ हो जाता है ।' वह जब आपकी अपैन्डिक्स निकलती है तो सारा गांव सहानुभूति बतलाता है; जैसे कि आपने कोई महान कार्य किया है, कि धन्य कि आप पृथ्वी पर हैं और आपकी अपैन्डिक्स निकल गई है, और हम अभागे अभी तक बैठे हैं ! यह तो बड़ी आश्चर्य की बात हुई । यह तो ऐसा हुआ जैसे कोई अपने घाव को कुरेदता हो । सुख को झुठलाने की इच्छा होती है । दुख को मानने का मन होता है, क्योंकि दुख अतीत से चला आ रहा है । लंबी पहचान है ।
विरस
कथा :
गुरजिएफ जब छोटा बच्चा था, उसको एक फल बहुत अच्छा लगता था । और फल भी रसीला था । लेकिन पेट के लिए दुखदायी था । उसके बाप ने कई बार उसे मना किया । वह सुनने को राजी न था । वह चोरी से खाने लगा । तो बाप एक दिन एक टोकरी भर कर फल ले आया और उसने इसे बिठा लिया अपने पास और रख लिया हाथ में डंडा और कहा : 'तू खा !'
गुरजिएफ तो समझा नहीं कि मामला क्या है । पहले तो बड़ा प्रसन्न हुआ कि बाप को हुआ क्या, दिमाग फिर गया है ! क्योंकि हमेशा मना करते हैं, घर में फल आने नहीं देते हैं । मगर बाप डंडा ले कर बैठा था तो उसे खाना पड़ा । पहले तो रस लिया-दो-चार आठ-दस फल-इसके बाद तकलीफ होनी शुरू हुई । मगर बाप है कि डंडा लिये बैठा है, वह कहता है कि यह टोकरी पूरी खाली करनी पड़ेगी । उसकी आख से आंसू बहने लगे, और खाया नहीं जाता । अब वमन की हालत आने लगी और बाप डंडा लिये बैठा है और वह कहता है कि फोड़ दूंगा, हाथ-पैर तोड़ दूंगा, यह टोकरी खाली करनी है ! उसने टोकरी खाली करवा कर छोड़ी ।
पंद्रह दिन गुरजिएफ बीमार रहा, उल्टी हुई, दस्त लगे; लेकिन उसने बाद में लिखा है कि उस फल से मेरा छुटकारा हो गया । फिर तो उस फल को मैं वृक्ष में भी देखता तो मेरे पेट में दर्द होने लगता । बाजार में बिकता होता तो मैं आँख बचा कर निकल जाता । रस की तो बात दूर, विरस पैदा हुआ ।
नकल
कथा :
एक चोर भागा । सिपाहियों ने उसका पीछा किया । कोई रास्ता न देख कर एक नदी के किनारे पहुंच कर,वह तैरना जानता नहीं था, नदी गहरी, वह घबड़ा गया । पास में ही एक साधु महाराज धूनी जमाए बैठे थे । आख बंद किये बैठे थे । वह भी जल्दी से पानी में डुबकी ले कर धूल शरीर पर डाल कर बैठ गया आख बंद करके । वे जो सिपाही उसका पीछा करते आ रहे थे अचानक आ कर उसके पैर छुए । वह बड़ा हैरान हुआ कि हद नासमझी हमने भी की, अब तक चोरी करते रहे नाहक, यह तो सब कुछ बिना ही उसके हो सकता है ! वह बैठा ही रहा । सिपाहियों ने बहुत कुछ प्रश्न उठाये, मगर उसने कोई उत्तर... उत्तर उसके पास कोई था भी नहीं । लेकिन सिपाहियों ने समझा कि बड़ा मौनी बाबा है । गांव में खबर ले गये कि एक मौनी बाबा आये हैं । लोग आने लगे । संख्या बढ़ने लगी । राजमहल तक खबर पहुंची । खुद राजा आया । उसने चरण छुए और कहा : 'महाराज कब से मौन लिए हो ?' मगर वे बैठे हैं । वे उत्तर देते ही नहीं ।
वह चोर मन में सोचने लगा कि हद हो गई, इन्हीं के घर से मैं ठीकरे चुरा-चुरा कर काम चलाता था, और अब तो हीरे-जवाहरात चरणों में आने लगे, लोग सोने के आभूषण चढ़ाने लगे, रुपये चढ़ाने लगे । ये वे ही लोग हैं जो उसे पकड़वा देते ।
जब सम्राट आया तो उससे न रहा गया । उसने कहा कि नहीं, मेरे पैर मत छुए ! मैं चोर हूं ! और एक सीमा होती है । लेकिन एक बात पक्की है कि अब मैं चोर होने वाला नहीं । क्योंकि मैं बिलकुल पागल था । किसी ने मुझे बताई नहीं यह तरकीब पहले । यह तो अचानक हाथ लगी । और मैं बिलकुल झूठा संन्यासी हूं और इतना समादर, इतना आदर मिल रहा है-काश मैं सच्चा होता !
जिस आदमी के जीवन में आभार हो, वह आदमी धार्मिक । जिसके जीवन में शिकायत हो, वह अधार्मिक ।
चार्ली चैपलिन के जन्मदिन पर इंग्लैंड में एक समारोह आयोजित किया गया। और सारे इंग्लैंड से अभिनेता बुलाये गये, जो चार्ली चैपलिन का अभिनय करें। और तीन पुरस्कार थे। बड़े पुरस्कार थे। खुद सम्राट उन पुरस्कारों को बांटेगा। लाखों रुपये उनके साथ थे। चार्ली चैपलिन को मजाक सूझी। उसने कहा, मैं भी इसमें किसी और नाम से सम्मिलित क्यों न हो जाऊं! और मुझे तो प्रथम पुरस्कार निश्चित है। मैं खुद ही चार्ली चैपलिन हूं। किसी ने यह सोचा भी नहीं था कि चार्ली चैपलिन इसमें सम्मिलित हो जायेगा। वह एक दूसरे गांव से सम्मिलित हो गया। सौ लोग चुने गये, उनमें एक वह भी था। फिर सौ की अंतिम प्रतियोगिता हुई। और वह हैरान हुआ। घटना तो तब खुली। जब सारी दुनिया हंसी। वह नंबर तीन आया! खुद चार्ली चैपलिन, चार्ली चैपलिन का अभिनय करने में नंबर तीन आया। नकलची बाजी मार ले गये। मार ही ले जायेंगे हमेशा। क्योंकि नकलची बंधी हुई लीक से चलेगा। चार्ली चैपलिन सहज रहा होगा। सहज में कुछ नया आ जायेगा। लीक पर चलने वाला सदा पुराने को पकड़े रहेगा।
सभी परंपरायें समय के साथ सड़ जाती हैं। लेकिन अंधों को दिखाई नहीं पड़ता। वे लीक की तरह चलते चले जाते हैं।
एक आदमी बुलबुल-जैसी आवाजें निकालने में इतना कुशल हो गया था कि मनुष्य की बोली उसे भूल ही गई थी। उस व्यक्ति की बडी ख्याति थी और लोग, दूर-दूर से उसे देखने और सुनने जाते थे। वह अपने कौशल का प्रदर्शन बादशाह के सामने भी करना चाहता था। बडी कठिनाई से वह बादशाह के सामने उपस्थित होने की आज्ञा पा सका। उसने सोचा था कि बादशाह उसकी प्रशंसा करेंगे और पुरस्कारों से सम्मानित भी। अन्य लोगों द्वारा मिली प्रशंसा और पुरस्कारों के कारण उसकी यह आशा उचित ही थी। लेकिन बादशाह ने उससे कहा -- महानुभाव, मैं बुलबुल को ही गीत गाते सुन चुका हूं, मैं आपसे बुलबुल के गीतों को सुनने की नहीं, वरन उस गीत को सुनने की आशा और अपेक्षा रखता हूं, जिसे गाने के लिए आप पैदा हुए हैं। बुलबुलों के गीतों के लिए बुलबुलें ही काफी हैं। आप जाएं और अपने गीत को तैयार करें और जब वह तैयार हो जाए तो आवें। मैं आपके स्वागत के लिए तैयार रहूंगा और आपके लिए पुरस्कार भी तैयार रहेंगे।
निश्चय ही जीवन दूसरों की नकल के लिए नहीं, वरन स्वयं के बीज में जो छिपा है, उसे ही वृक्ष बनाने के लिए है। जीवन अनुकृति नहीं, मौलिक सृष्टि है।
तत्त्वबोध
कथा :
भर्तृहरि चले गए जंगल में, बैठ गये एक वृक्ष के नीचे, छोड दिया संसार । और उनका छोड़ना ठीक था; जिसको विरस कहें वह उन्हें पैदा हुआ होगा । भर्तृहरि ने दो शास्त्र लिखे सौंदर्य-शतक और वैराग्य-शतक । सौंदर्य-शतक सौंदर्य की अपूर्व महिमा है । शरीर-भोग का ऐसा रसपूर्ण वर्णन न कभी हुआ था न फिर कभी हुआ है । खूब भोगा शरीर को और एक दिन सब छोड़ दिया । उसी भोग के परिणाम में योग फला । फिर दूसरा शास्त्र लिखा -- वैराग्य-शतक । वैराग्य की भी फिर महिमा ऐसी किसी ने कभी नहीं लिखी और फिर दुबारा लिखी भी नहीं गई । और एक ही आदमी ने दोनों शतक लिखे -- सौंदर्य का और वैराग्य का । एक ही आदमी लिख सकता है । जिसने सौंदर्य नहीं जाना, रस नहीं जाना शरीर में उतरने का, गया नहीं कभी शरीर के खाई-खंदकों में, वह कैसे वैराग्य को जानेगा ! जो गया गहरे में । उसने पाया वहां कुछ भी नहीं, थोथा है । सब दूर के ढोल सुहावने थे, पास जा कर सब व्यर्थ हो गये । मृगजाल सिद्ध हुआ, मृगमरीचिका सिद्ध हुई ।
तो बैठे हैं भर्तृहरि एक वृक्ष के नीचे । अचानक आँख खुली । सूरज निकला है वृक्षों के बीच से, उसकी पड़ती किरणें, सामने एक हीरा जगमगा रहा है राह पर पड़ा । बैठे रहे । बहुमूल्य हीरा है, पारखी थे, सम्राट थे, हीरों को जानते थे । बहुत हीरे देखे थे, लेकिन ऐसा हीरा कभी नहीं देखा था । भर्तृहरि के खजाने में भी न था । एक क्षण पुरानी आकांक्षा ने, पुरानी आदतों ने बल मारा होगा । एक क्षण मन हुआ कि उठा लें, फिर हंसी आई कि यह भी क्या पागलपन है, अभी सब कुछ छोड़ कर आया, और सब देख कर आया कि कुछ भी नहीं है ! मुस्कुराए । आँख बंद करने जा ही रहे थे कि दो घुड़सवार भागते हुए आये, दोनों की नजर एक साथ हीरे पर पड़ी । दोनों ने तलवारें निकाल लीं । दोनों दावेदार थे कि मैंने पहले देखा । देखा तो भर्तृहरि ने था । मगर उन्होंने तो कोई दावा किया नहीं, वे गैर-दावेदार रहे ।
अगर इन दो सिपाहियों को पता चल जाता कि तीसरा आदमी वृक्ष के नीचे बैठा है और घंटे भर से इसको देख रहा है तो वे क्या कहते ? वे कहते. 'हद आलस्य ! अरे उठा नहीं लिया ! इतना बहुमूल्य हीरा ! तुम्हारी बुद्धि में तमस भरा है ? तुम्हारी बुद्धि खो गई है ? जड़ हो गये हो ? उठते नहीं बनता, लकवा लग गया है ? मामला क्या है ? होश है कि नहीं, कि शराब पीये बैठे हो ?'
लेकिन उन्हें तो फुरसत भी नहीं थी देखने की । वह तो झगड़ा बढ़ गया, तलवारें खिंच गईं, तलवारें चल गईं, हीरा वहीं का वहीं पड़ा रहा । थोड़ी देर बाद दो लाशें वहाँ पडी थीं । दोनों ने एक दूसरे की छाती में तलवार भोंक दी । हीरा जहां का तहां, दो आदमी मर मिटे । भर्तृहरि ने आंखें बंद कर लीं । अब भर्तृहरि जैसे आदमियों के पास जाने से तुम डरोगे अगर महत्वाकांक्षा अभी बची है । तो तुम हजार-हजार उपाय खोजोगे ।
'यह तत्वबोध बोलने वाले को चुप कर जाता है; बुद्धिमान को जड़ बना देता है; महाउद्योगी को आलसी जैसा कर देता है ।'
मांगती हैं भूखी इंद्रियां
भूखी इंद्रियों से भीख !
और किससे तुम मांगते हो भीख, यह भी कभी तुमने सोचा ? -जो तुमसे भीख मांग रहा है । भिखारी भिखारी के सामने भिक्षा-पात्र लिए खड़े हैं । फिर तृप्ति नहीं होती तो आश्चर्य कैसा ? किससे तुम मांग रहे हो ? वह तुमसे मांगने आया है । तुम पत्नी से मांग रहे हो, पत्नी तुमसे मांग रही है; तुम बेटे से मांग रहे हो, बेटा तुमसे मांग रहा है । सब खाली' हैं, रिक्त हैं । देने को कुछ भी नहीं है; सब मांग रहे हैं । भिखमंगों की जमात है ।
चमन को देख, फिर फूल-पात को न देख
पहचान खिलाड़ी को, बस बिसात न देख
मेरी डोली की गरीबी पर ओ हंसनेवाले!
मेरी दुल्हन को देख, लौटती बारात न देख
एक झेन फकीर जंगल से गुजर रहा था । पाई चान उसका नाम था । एक लोमड़ी बीच रास्ते पर आ गयी और उसने कहा कि रुकें महाराज! फकीर बडा हैरान हुआ, लोमड़ी बोली! लोमड़ी ने कहा, ऐसा हुआ, कोई पांच सौ साल हो गये मैं भी एक धार्मिक पुरोहित था । एक मंदिर में बड़ा पुजारी था । और एक आदमी ने मुझसे सवाल पूछा कि जो लोग बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाते हैं, उन पर कार्य-कारण का नियम काम करता है या नहीं? और मैंने कहा, नहीं । और उसकी वजह से मैं यह फल भोग रहा हूं । पांच सौ साल से लोमड़ी बना हूं । मेरा पतन हो गया । और मुझे यह सजा मिली है कि जब तक मैं ठीक उत्तर न खोज लूं तब तक मैं इस पशुभाव से मुक्त न हो सकूंगा । आप महाज्ञानी हैं, मुझे ठीक उत्तर बता दें ।
पाई चान ने कहा, तू बोल, तू पूछ, फिर से पूछ । क्या प्रश्न है? तो उस के पुरोहित ने जो पांच सौ साल से लोमड़ी बना बैठा है, उसने कहा कि प्रश्न यह है कि बुद्धपुरुष, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हो गये, क्या कार्य-कारण के नियम के बाहर हो जाते हैं? तो पाई चान ने कहा, कार्य-कारण के नियम में वे अवरोध नहीं बनते ।
समझना, बड़ी अनूठी बात कही । कार्य-कारण के नियम में वे अवरोध नहीं बनते । जो होता है, उसे होने देते हैं । न तो बाधा डालते, न सहयोग देते, जो होता है, होने देते हैं । और कथा कहती है कि लोमड़ी का सदभाग्य हुआ, ज्योति की किरण उस पर उतरी, वह फिर मनुष्य हो गयी ।
इस कहानी को तथ्य की तरह मत पकड लेना, यह तो एक बोधकथा है । लोमड़ी और आदमी का सवाल नहीं है, पशुभाव और मनुष्यभाव का सवाल है । जो व्यक्ति गलती में जी रहा है, वह पशुभाव में जीता है । जो समझ में जीने लगा, उसका मनुष्यभाव पैदा हो गया । अब तुम हो, न मालूम कितने जन्मों से लोमड़ी बने हो । अभी पशुभाव से छुटकारा नहीं हुआ ।
जैसे-जैसे मेरे का भाव गिरेगा वैसे ही वैसे तुम्हें मैं का अनुभव होगा कि मैं कौन हूं। तुम्हें अभी इसका कुछ भी पता नहीं। तुम्हें बिलकुल पता है कि मेरे कौन हैं। मैं कौन हूं, इसका कोई भी पता नहीं।
तुमसे अगर कोई पूछे आप कौन हैं, तो तुम बताते हो मैं फलां का बेटा हूं। यह भी कोई बात हुई! वह पूछता है, आप कौन हैं, आप पिता की बता रहे हैं। वह पूछता है, आप कौन हैं, आप कहते हैं, मैं डाक्टर हूं! डाक्टरी आपका धंधा होगी, आप डाक्टर नहीं हो सकते। वह पूछता है, आप कौन हैं, आप कहते हैं, मैं ब्राह्मण हूं, हिंदू हूं, मुसलमान हूं, ईसाई हूं, जैन हूं। यह आपकी पैदाइश का संयोग होगा, आप नहीं। कुछ अपनी कहो! मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि हमें तो कुछ पता ही नहीं।
हम देखते हैं एक दफा बीज को, लेकिन उसी वक्त हम वृक्ष को नहीं देख सकते । वृक्ष को देखने में हमें बीस साल ठहरना पड़ेगा । बीस साल बाद हम वृक्ष को देखेंगे । लेकिन तब बीज न दिखाई पड़ेगा । हम एक बच्चे को देखते हैं पैदा होते हुए, तब हम बूढ़े को नहीं देख सकते । बूढ़े के लिए हमें सत्तर साल रुकना पड़ेगा । लेकिन जब हम बूढ़े को देखेंगे, तब तक बच्चा खो गया होगा । हम दोनों को साथ न देख सकेंगे ।
चमत्कार लाओत्से उसे कहता है कि उस रहस्य के जगत में जब गहन होता रहस्य और अहंकार शून्य हो जाता, तो बच्चे में बूढ़ा दिखाई पड़ता है; बूढ़े में बच्चा दिखाई पड़ता है; जन्म में मौत दिखने लगती है; बीज में पूरा वृक्ष दिखाई पड़ता है । जो फूल अभी नहीं खिले, वे खिले हुए दिखाई पड़ते हैं । जो अभी नहीं हुआ, वह होता हुआ मालूम पड़ता है । जो हो चुका, वह मौजूद मालूम पड़ता है । जो होगा, वह भी मौजूद मालूम पड़ता है । अतीत और भविष्य समाप्त हो जाते हैं । एक ही क्षण रह जाता है । सारा अस्तित्व एक क्षण की eternity में, सनातन में खड़ा हो जाता है ।
तो जो कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से कि ये जिन्हें तू सोचता है कि तू मारेगा, मैं इन्हें मरा हुआ देख रहा हूं अर्जुन! ये मर चुके हैं, अर्जुन! ये सिर्फ तुझे खड़े दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि तुझे भविष्य दिखाई नहीं देता ।
यह चमत्कार है ।
चमत्कार का अर्थ है, कार्य-कारण जहां भिन्न न रह जाएं । वे भिन्न हैं भी नहीं, हमारे देखने के ढंग में भूल है ।
Oxford University की एक प्रयोगशाला में बहुत हैरानी की आकस्मिक घटना घट गई । उससे इस चमत्कार को समझने में आसानी मिलेगी । कुछ वैज्ञानिक एक कली का चित्र ले रहे थे । और चित्र कली का नहीं आया, फूल का आ गया । जिस फिल्म का उपयोग किया जा रहा था, वह अधिकतम sensitive जो फिल्म आज संभव है, वह थी । अभी सामने कैमरे के कली ही थी; अंदर जो चित्र आया, वह फूल का आया ।
स्वभावतः, लगा कि कोई भूल हो गई । कली अभी भी कली थी, चित्र फूल का आ गया । लेकिन सुरक्षित रखा गया । समझा गया कि कोई भूल-चूक हो सकती है । पहले से कोई exposure हो गया हो । कोई किरण प्रवेश कर गई हो, कोई गड़बड़ हो गई हो । कोई केमिकल भूल-चूक हो गई हो, कुछ न कुछ गड़बड़ हो गई है ।
उस चित्र को रखा गया सम्हाल कर । और जब कली फूल बनी, तब उसके दूसरे चित्र लिए गए । और बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि वह चित्र वही था । जो बाद में चित्र आए वे चित्र वही थे, जो चित्र पहले आ गया था । उस प्रयोग को दुबारा दुहराया नहीं जा सका है अब तक । लेकिन इस बात की संभावना प्रकट हो गई है और जिस वैज्ञानिक के द्वारा यह घटना घटी है, उसको यह आस्था गहन हो गई है कि हम किसी न किसी दिन इतनी सेंसिटिव फिल्म तैयार कर लेंगे कि जब बच्चा पैदा हो, तो हम उसके बुढ़ापे का चित्र ले लें । क्योंकि जो होने वाला है, वह सूक्ष्म के जगत में अभी हो ही गया है । जो कल होने वाला है, उसकी होने की सारी प्रक्रिया सूक्ष्म के जगत में अभी शुरू हो गई है । यह और गहन जगत में हो गई होगी; हम तक खबर पहुंचने में देर लगेगी । हमारी इंद्रियां जब तक पकड़ेंगी, उसमें देर लगेगी । अगर हम बिना इंद्रियों के पकड़ पाएं, तो शायद अभी पकड़ लें ।
शायद टाइम का जो गैप है, कली जब फूल बनती है तो कली और फूल के बीच समय का जो फासला है, वह कली और फूल के बीच नहीं, वह हमारी इंद्रियों और फूल के बीच है । अगर हमारी इंद्रियां बीच से हट जाएं, तो हम कली में फूल को देख सकते हैं । और तब चमत्कार घटित होता है । और उस चमत्कार की जो दुनिया है, उस चमत्कार की दुनिया में प्रवेश ही धर्म के विज्ञान का लक्ष्य है ।
सावधान हो, नहीं तो कहीं अहं की चिंता में देव-ज्ञान की भूमि पर तेरी आत्मा के पैर न उखड़ जाएं!
एक रात, अंधेरी अमावस की रात में, एक छोटे-से झोपड़े में जिब्रान बैठा था, मिट्टी का एक दीया जलाकर। टिमटिमाती थोड़ी-सी रोशनी थी। द्वार के बाहर भी अंधकार था। भवन के पीछे के द्वार के बाहर भी अंधकार था। सब ओर अंधकार था। केवल उस छोटे-से झोपड़े में उस दीए की थोड़ी-सी रोशनी थी।
और एक रात का पक्षी फड़फड़ाता हुआ झोपड़े के द्वार से प्रविष्ट हुआ, उसने दो या तीन चक्कर झोपड़े के भीतर टिमटिमाती रोशनी में लगाए, और पीछे के द्वार से बाहर हो गया। जिब्रान ने उस रात अपनी डायरी में लिखा कि उस पक्षी को अंधेरे से प्रकाश में दो क्षण के लिए आते देखकर, फिर प्रकाश में दो क्षण फड़फड़ाते देखकर और फिर गहन अंधकार में खो जाते देखकर मुझे लगा कि जीवन भी ऐसा ही है।
आओ। डरकर मत आस्तिक बनो। और नास्तिकता से भयभीत मत होओ।
पाम्पेई का जब विस्फोट हुआ, ज्वालामुखी फूटा, तो सारा गांव भागा। आधी रात थी। गांव में एक फकीर भी था। कोई अपनी सोने की तिजोरी, कोई अपनी अशर्फियों का बंडल, कोई फर्नीचर, कोई कुछ, कोई कुछ, जो जो बचा सकता है, लोग लेकर भागे। फकीर भी चला भीड़ में; चला, भागा नहीं।
भागने के लिए या तो पीछे कुछ होना चाहिए या आगे कुछ होना चाहिए। भागने के लिए या तो पीछे कुछ होना चाहिए,जिससे भागो; या आगे कुछ होना चाहिए, जिसके लिए भागो।
सारा गांव भाग रहा है, फकीर चल रहा है। लोगों ने उसे धक्के भी दिए और कहा कि यह कोई चलने का वक्त है! भागो। पर उसने कहा, किससे भागूं और किसके लिए भागूं? लोगों ने कहा, पागल हो गए हो! यह कोई वक्त चलने का है। कोई टहल रहे हो तुम! यह कोई तफरीह हो रही है!
उस आदमी ने कहा, लेकिन मैं किससे भागूं! मेरे पीछे कुछ नहीं, मेरे आगे कुछ नहीं। लोगों ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा और उससे कहा कि कुछ बचाकर नहीं लाए! उसने कहा, मेरे सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैंने कभी कोई चीज बचाई नहीं, इसलिए खोने का उपाय नहीं है। मैं अकेला काफी हूं।
कोई रो रहा है कि मेरी तिजोरी छूट गई। कोई रो रहा है कि मेरा यह छूट गया। कोई रो रहा है कि मेरा वह छूट गया। सिर्फ एक आदमी उस भीड़ में हंस रहा है। लोग उससे पूछते हैं, तुम हंस क्यों रहे हो? क्या तुम्हारा कुछ छूटा नहीं? वह कहता है कि मैं जितना था, उतना यहां भी हूं। मेरा कुछ भी नहीं छूटा है।
उस अशांत भीड़ में अकेला वही आदमी है, जिसके पास कुछ भी नहीं है। बाकी सब कुछ न कुछ बचाकर लाए हैं, फिर भी अशांत हैं। और वह आदमी कुछ भी बचाकर नहीं लाया और फिर भी शांत है। बात क्या है?
युक्त पुरुष शांत हो जाता है, अयुक्त पुरुष अशांत होता है। ज्ञानी युक्त होकर शांति को उपलब्ध हो जाता है।
एक रात को कुछ शराबी एक नदी पर गए थे। और उन्होंने सोचा कि पूर्णिमा की रात है, वे नाव में बैठ कर यात्रा करें। वे नाव में बैठे, उन्होंने पतवार चलाई और उन्होंने समझा कि नाव चलनी शुरू हो गई है। वे रात भर नाव चलाते रहे। उन्होंने सोचा कि बड़ी यात्रा हो गई। सुबह जब ठंडी हवाएं चलने लगीं और उनका नशा थोड़ा उतरा, तो उनमें से एक ने कहा कि हम देखें तो कि कितनी दूर निकल आए? अब वापस लौटें। वे घाट पर उतरे और उन्होंने देखा कि अरे, रात भर मेहनत व्यर्थ गई। वे नाव को छोड़ना भूल गए थे। वह नाव वहीं खूंटे से बंधी हुई थी। चलाई उन्होंने रात भर और समझा कि यात्रा हो रही है, लेकिन नाव कोखूंटे से छोड़ना भूल गए थे।
कौन है जो इस पृथ्वी और देवताओं सहित यमलोक का साक्षात्कार कर लेगा ? कौन कुशल भली प्रकार उपदिष्ट धर्म के पदों का पुष्प की भांति साक्षात्कार कर पाएगा ?
एक गांव में एक आदमी से गांव परेशान हो गया था। परेशान इसलिए हो गया था कि न तो वह कमाता, न कुछ पैदा करता। फिर गांव यह भी नहीं देख सकता था कि वह भूखा मरता रहे। तो गांव को उसे देना पड़ता था। वह अपने वृक्ष के नीचे, या अपने झोपड़े में पड़ा रहता था। वृक्ष के नीचे भी मुहल्ले के लोग उसे ले आते थे, तो आ जाता था। और वृक्ष के पास से, बाहर से उसको झोपड़े के भीतर लोग ले जाते थे, तो चला जाता था। अगर किसी दिन पड़ोस के लोग उसको झोपड़े के बाहर न निकालते, तो वह झोपड़े के भीतर से ही नाराजगियां जाहिर करता था।
फिर गांव परेशान हो गया, और गांव ने सोचा कि इस आदमी को कब तक ढोएंगे? फिर अकाल पड़ा और गांव ने सोचा कि अब तो इसको जिंदा या मुर्दा दफना देना चाहिए। वैसे इसके जीने से कोई फर्क भी नहीं पड़ता। पर उन्होंने सोचा, क्या वह राजी होगा? उन्होंने कहा, चलकर हम देख लें।
वे गांव के लोग उसके पास गए और उससे पूछा कि हमने यह तय किया है कि हम तुम्हें दफना दें। क्योंकि तुम्हारे होने, न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। एक दिन तो दफनाना ही पड़ेगा, जब तुम मरोगे। लेकिन हमारे लिए तुम मरे ही जैसे हो। और तुम्हारे लिए भी, जीते हुए हो, ऐसा हमारा अनुभव नहीं। क्या तुम राजी हो?
उसने कहा, मैं राजी हो सकता हूं। लेकिन मरघट तक ले कौन चलेगा? मुझे कोई दिक्कत नहीं है। बाकी ले जाना तुम्हीं को पड़ेगा। उन्होंने कहा, हमने तो यह सोचा भी नहीं था कि तुम इतने जल्दी राजी हो जाओगे!
उन्होंने अर्थी बनाई। उस आदमी को अर्थी पर रखा। वे उसको लेकर चले। वह आदमी अर्थी में लेट गया। थोड़े वे भी चिंतित हुए। इतना भरोसा न था उसका।
गांव में कोई परदेशी आया हुआ था। उसे यह खबर मिली कि गांव में कौन-सी घटना घट रही है कि जिंदा आदमी को लोग ले जा रहे हैं दफनाने! उसने बीच रास्ते पर आकर रोका कि भाइयो, यह क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा, हम परेशान हो गए हैं। अब और कोई उपाय नहीं बचा। हम इसे जिंदा ही दफनाने जा रहे हैं। हमारे पास न दाना है इसको देने को, न अनाज है। उस आदमी ने कहा, रुको। अगर तुम मेरी मानो, तो मैं सालभर के लिए अनाज इसको दिए देता हूं। तुम इसे छोड़ दो।
इसके पहले कि गांव के लोग कुछ बोलते, अर्थी से आवाज आई कि पहले बात साफ हो जानी चाहिए। अनाज साफ-सुथरा है न? नहीं तो पीछे कौन झंझट करेगा! पहले कुछ निर्णय करें गांव के लोग, अर्थी से आवाज आई, साफ कर लेना। अनाज साफ-सुथरा है? एक, और दूसरी बात कि ये लोग मुझे यहीं छोड़कर चले जाएंगे, तो मुझे घर कौन पहुंचाएगा?
जिस आदमी के बाबत यह कहानी है, वह एक सूफी फकीर था। वह कोई साधारण आदमी नहीं था। जब उसकी अर्थी नीचे उतारी और अजनबी आदमी ने जब उसकी यह बात सुनी, तो उसने सोचा कि आदमी तो असाधारण है, उसके दर्शन करने चाहिए। उसको देखा तो उस अजनबी ने कहा, हैरान करते हो तुम मुझे!
तो उस आदमी ने कहा कि तुम थोड़ा मेरी आंखों में झांककर समझ पा रहे हो, इसलिए मैं तुमसे राज की बात कहता हूं। ये सारे लोग समझते हैं कि मैं आलसी हूं। लेकिन मैं उस यात्रा पर निकल गया, जो कठिनतम है। और ये सारे लोग समझते हैं कि बड़े श्रमी हैं। लेकिन ये जो भी कर रहे हैं, दो कौड़ी का कर रहे हैं। तुम सोचते होगे कि मैं एक कदम घर जाने को राजी नहीं। मैं तुमसे कहता हूं, ये भी कोई अपने असली घर जाने को एक कदम राजी नहीं। और जिस घर तुम मुझे ले जा रहे हो, वह मेरा कोई असली घर नहीं है। इसलिए मैं कब्र में भी जाने को राजी हूं। क्योंकि मेरे लिए कब्र और वह घर बराबर है। और जिस शरीर को बचाने की तुम बात कर रहे हो, इसलिए मैंने पूछा कि अनाज साफ-सुथरा है न! क्योंकि इसको बचाने के लिए इतनी मेहनत करने की मैं कोई जरूरत नहीं समझता। लेकिन मैं एक और घर को बचाने में लगा हूं। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम सब आलसी हो। और तुम सब समझते हो कि मैं आलसी हूं। और ध्यान रखो, तुम मुझे जिंदा दफना रहे हो। जब तुम दफना दिए जाओगे, तब मैं तुम्हें बताऊंगा। तब तुम मुझसे मिलना। और तब मैं तुम्हें बताऊंगा कि असली आलसी कौन था।
पता नहीं, उस गांव के लोग समझे या नहीं समझे, लेकिन आपसे मैं कहता हूं, एक कदम भी हम उस दिशा में उठाने की हिम्मत नहीं करते हैं।
तुम एक कबाड़ी की दूकान हो, जहां कुछ पूरा नहीं है। सब अधूरा है। फिर तुम अशांत न होओगे, तो क्या होगा?
बुद्ध परम-ज्ञान को उपलब्ध हुए, उसके पहले की घटना है। वह एक गांव से गुजर रहे थे। एक भिक्षु आनंद साथ था। अचानक वे रुक गये बीच रास्ते पर। आनंद हैरान हुआ कि क्या हुआ? आनंद देखता रहा। उन्होंने धीरे से अपना हाथ उठाया, अपने माथे पर ले गये और कुछ उड़ाया माथे से। पर वहां कुछ था नहीं। आनंद देख रहा है, वहां कोई मक्खी नहीं बैठी है। लेकिन उन्होंने ऐसा उड़ाया, जैसे कोई मक्खी बैठी हो। आनंद ने पूछा, आप यह क्या कर रहे हैं? बुद्ध ने कहा, 'मैं तुझसे बातचीत में लगा था, तब एक मक्खी बैठ गई और मैंने बिना होशपूर्वक उसे उड़ा दिया। अब मैं उस तरह उड़ा रहा हूं, जैसे मुझे उड़ाना चाहिए था: होशपूर्वक, मूर्च्छित नहीं।' बुद्ध ने कहा, 'एक पाप हो गया।'
मक्खी मरी नहीं है। मक्खी को चोट भी नहीं लगी है। मक्खी से कोई लेना-देना नहीं है पाप का। लेकिन बुद्ध ने कहा, मूर्च्छा में जो कृत्य हो, वह पाप है। मैंने बेहोशी में उड़ा दिया। मेरी चेतना पूरी की पूरी हाथ में मौजूद न थी। मेरी पूरी आत्मा वहां मौजूद न थी। कृत्य हो गया, जैसे किसी ने नींद में किया हो।
नींद में जो जी रहा है, वही संसारी है। जाग कर जो जी रहा है, वही संन्यासी है।
अकबर को आदत थी, कोई भी फकीर आये तो वह झुककर, सिर झुकाकर नमस्कार करता था। वजीरों को बुरा लगता था। कोई भी ऐरा-गैरा फकीर, पता-ठिकाना नहीं, और यह सिर झुकाता था। आखिर उसके बड़े वजीर ने कहा कि यह अशोभन है, और आप सम्राट हैं। आपकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं। ऐरे-गैरे भिखमंगे!
अकबर ने कहा, 'तुम एक काम करो। एक आदमी को फांसी लगने वाली है कल, उसका सिर कटेगा; तुम उस सिर को लेकर बाजार में जाओ, कोई खरीददार मिलता है या नहीं! और मिल जाये तो कितना दाम देने को तैयार है उसकी खबर करो।'
आज्ञा हुई तो वजीर लेकर सिर गया, पूरे बाजार में घूमा। जहां भी गया--छिप कर गया था। क्योंकि वजीर के हैसियत से जायेगा तो शायद खुशामदी लोग खरीद ही लें लाखों में, क्योंकि पीछे मतलब निकाल लेंगे--छिप कर गया था। न मालूम कितनी! जिस दूकान पर गया उसी पर लोगों ने कहा, 'भाग, हट यहां से; पागल हो गया है? इसका क्या करेंगे?'
सांझ को वह लौटा और उसने कहा कि क्षमा करें, कोई खरीददार नहीं मिलता। उलटे लोग नाराज होते हैं। जिससे भी कहो कि भई खरीद लो, कुछ भी चार पैसे दे दो। वह भी कहता है, 'भागो यहां से, हटो। यहां मत लाओ, क्या करेंगे इसका?
तो अकबर ने कहा 'यही मेरे सिर की हालत होगी। कोई खरीददार न मिलेगा। चार पैसे कोई देने को राजी न होगा। और इसको मैं झुकाता हूं तो तुम नाराज होते हो, जिसका कोई भी मूल्य नहीं है!'
मौत की जिसे याद आई, वह साक्षी बन जाता है।
झेन फकीर रिंझाई एक रास्ते से गुजर रहा था। एक आदमी आया और उसने जोर से लात उसकी पीठ में मारी। तो फकीर गिर गया, और वह आदमी तो भाग कर चला गया। फकीर के साथ एक मित्र और थे। रिंझाई उठा और जहां से बात टूट गई थी, वहीं से उसने फिर शुरू कर दी, वह फिर चलने लगा। वह आदमी बहुत हैरान हुआ, जो साथ था। उसने कहा, 'सुनिए, मैं तो भूल ही गया कि हम क्या बात कर रहे थे। और अब मैं उसमें उत्सुक भी नहीं हूं। पहले मुझे यह बताइये, यह क्या हुआ? यह आदमी आपको लात मार कर गिरा गया, आपने कुछ कहा नहीं!'
रिंझाई ने कहा, 'यह उसकी समस्या है। इससे अपने को क्या लेना-देना? यह उसकी कुछ परेशानी है भीतरी, वह जाने! इतना पक्का है कि कोई लात मारेगा तो बूढ़ा आदमी हूं, शरीर गिर जाएगा। ऐसा वस्तुओं का स्वभाव है। वह जवान था, मैं बूढ़ा हूं। उसने लात मारी, मैं गिर गया। लात क्यों मारी यह वह सोचे, यह उसकी चिंता है। वह अपनी रात खराब करे। इससे मेरा कुछ लेना-देना नहीं। इतना मैं कहता हूं कि शरीर कमजोर हो गया। शरीर कमजोर हो जाता है।'
ऐसी भाव-दशा का नाम तथाता है।
अशांत होने का मतलब ही यह होता है कि तुम स्वीकार नहीं करते।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात एक कुएं के पास से गुजर रहा है। रमजान के दिन हैं। और उसने नीचे कुएं में झांककर देखा। वहां चांद का प्रतिबिंब दिखाई पड़ा। गहरा कुआं है। हवा की कोई लहर भी वहा नहीं है, चांद बिलकुल साफ दिखाई पड़ रहा है।
अकेला था। मरुस्थल का रास्ता था। आस-पास कोई दिखाई भी नहीं पड़ता था। नसरुद्दीन ने कहा, यह तो बड़ी मुसीबत हो गई। यह चांद यहां कुएं में उलझा है। और जब तक यह आकाश में दिखाई न पड़े, लोग मर जाएंगे भूखे रह-रहकर। रमजान का महीना है। इसे बाहर निकालना एकदम जरूरी है। यहां कोई दिखाई भी नहीं पड़ता जो सहायता करे।
बेचारा ढूंढ-ढांढकर कहीं से रस्सी लाया। रस्सी का फंदा बनाकर नीचे डाला। कुएं में चांद को रस्सी में फंसाने की कोशिश की। चांद तो नहीं फंसा, कुएं के किनारे पर कोई चट्टान का टुकड़ा होगा, वह फंस गया। उसने बड़ी ताकत लगाई। खींच रहा है। बड़ी मुश्किल में पड़ा है। और अकेला है। कोई और है भी नहीं कि कोई साथ भी दे दे। और चांद वजनी मालूम पड़ता है। और चाद भी हद्द कर रहा है कि बिलकुल रस्सी को पकड़े हुए है और उठ भी नहीं रहा है।
बड़ी ताकत लगाने से रस्सी टूट गई। मुल्ला भड़ाम से कुएं के नीचे गिरा। सिर में चोट भी आई। एक क्षण को आंख भी बंद हो गई। फिर आंख खुली, तो देखा, चांद आकाश में है। मुल्ला ने कहा, चलो भला हुआ। निकल तो आए। अब लोग नाहक रमजान में भूखे तो न रहेंगे। सिर में थोड़ी चोट लग गई; कोई हर्ज नहीं। रस्सी भी टूट गई; कोई हर्ज नहीं। लेकिन चांद को कुएं से मुक्त कर लिया।
आत्म-भाव का अर्थ है कि हम चांद को आकाश में ही देखें, कुओं में नहीं। आत्म-भाव का अर्थ है कि मेरी चेतना मेरे भीतर है। और किसी और वस्तु से बंधी नहीं है, कहीं भी छिपी नहीं है। मैं कहीं और नहीं हूं मुझमें ही हूं।
बुद्ध से कोई पूछता है कि ज्ञान प्राप्त होने पर आपको क्या मिला? तो बुद्ध कहते हैं, मिला कुछ भी नहीं। इतना ही पता चला कि कभी खोया ही नहीं था।
प्रार्थना
कथा :
अकबर शिकार को गया था । जंगल में राह भूल गया, साथियों से बिछड़ गया । सांझ होने लगी, सूरज ढलने लगा, अकबर डरा हुआ था । कहाँ रुकेगा रात ! जंगल में खतरा था, भाग रहा था । तभी उसे याद आया कि सांझ का वक्त है, प्रार्थना करनी जरूरी है । नमाज का समय हुआ तो चादर बिछाकर अपनी नमाज पढ़ने लगा । जब वह नमाज पढ़ रहा था तब एक अल्हड़ स्त्री भागती हुई, उसके नमाज के वस्त्र पर पैर रखती हुई, उसको धक्का देती हुई निकली । वह झुका था, गिर पड़ा । वह भागती हुई निकल गई ।
अकबर को बड़ा क्रोध आया । सम्राट नमाज पढ़ रहा है और इस अभद्र युवती को इतना भी बोध नहीं है ! जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की, भागा घोड़े पर, पकड़ा स्त्री को । कहा : 'बदतमीज है ! कोई भी नमाज पढ़ रहा हो, प्रार्थना कर रहा हो तो इस तरह तो अभद्र व्यवहार नहीं करना चाहिए । फिर मैं सम्राट हूं ! सम्राट नमाज पढ़ रहा है और तूने इस तरह का व्यवहार किया ।'
उसने कहा -- 'क्षमा करें, मुझे पता नहीं कि आप वहाँ थे । मुझे पता नहीं कि कोई नमाज पढ़ रहा था । लेकिन सम्राट, एक बात पूछनी है । मैं अपने प्रेमी से मिलने जा रही हूं तो मुझे कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है । मेरा प्रेमी राह देखता होगा तो मेरे तो प्राण वहाँ अटके हैं । तुम परमात्मा की प्रार्थना कर रहे थे, मेरा धक्का तुम्हें पता चल गया ! यह कैसी प्रार्थना ? यह तो अभी प्रेम भी नहीं है, यह प्रार्थना कैसी ? तुम लवलीन न थे, तुम मंत्र-मुग्ध न थे, तुम डूबे न थे, तो झूठा स्वांग क्यों रच रहे थे ? जो परमात्मा के सामने खड़ा हो, उसे तो सब भूल जाएगा । कोई तुम्हारी गर्दन भी उतार देता तलवार से तो भी पता न चलता तो प्रार्थना । मुझे तो कुछ भी याद नहीं । क्षमा करें !'
अकबर ने अपनी आत्म-कथा में घटना लिखवाई है और कहा है कि उस दिन मुझे बड़ी चोट पड़ी । सच में ही, यह भी कोई प्रार्थना है ? यह तो अभी प्रेम भी नहीं ।
जब कोई तुम्हें गाली देता है और तुम्हें दिखाई पड़ता है कि यह आदमी दुष्ट है, तब तुम जरा गौर से देखना । 'इसकी दुष्टता में तुम्हारा ही कुछ तो दिखाई नहीं पड़ा है ? तुम्हारा अहंकार ही तो नहीं इसको चोट कर गया, तिलमिला गया ? यह तुम्हारे अहंकार की ही लौटती हुई प्रतिध्वनि तो नहीं है ?'
सूफी फकीर हसन परमात्मा से प्रार्थना किया करता था कि हे परमात्मा! और कुछ भी करना, लेकिन थोड़ा दर्द बनाये रखना, थोड़ा दुख देते रहना। एक दिन किसी ने सुन लिया। यह कैसी प्रार्थना कर रहा है! पूछा कि हसन, प्रार्थनाएं हमने बहुत सुनीं, लोग करते हैं प्रार्थना सुख की, सुख के लिए, यह कैसी प्रार्थना! तुम्हारा दिमाग ठीक है? या मैंने गलत सुना? मुझे लगा कि तुम कह रहे हो, हे परमात्मा! रोज मुझे थोड़ा दुख जरूर देते रहना।
हसन ने कहा, गलत नहीं सुना। लेकिन दुख में जब मैं होता हूं, तब प्रार्थना सुगम होती है। इसलिए दुख की प्रार्थना करता हूं, क्योंकि दुख की छाया में ही मैं प्रार्थना कर पाता हूं। अभी मैं इतना योग्य नहीं कि सुख में प्रार्थना कर सकूं। सुख में भूल जाता हूं। दुख में याद बनी रहती है। तो थोड़ा दुख देते रहता। ऐसा न हो कि सुख ज्यादा दे दो, और मैं तुम्हें ही भूल जाऊं। क्योंकि तुम्हें ही भूल गया, तो सुख का क्या करूंगा? तुम याद रहे, थोड़ा दुख भी रहा तो ठीक है। तुम्हारी याद के साथ दुख झेलना बेहतर। तुम्हारी याद के बिना सुख में उतरना खतरनाक।
स्वर्ग भी नर्क हो जाता है, अगर परमात्मा का स्मरण न रहे। नर्क भी स्वर्ग हो सकता है, अगर उसकी याद बनी रहे। वस्तुतः तो उसी की याद में स्वर्ग है। स्मरण में, बोध में, ध्यान में।
एक स्त्री के पास एक तोता था, नर तोता; लेकिन वह गाली-गलौज सीख गया था। जिससे खरीदा था, वह एक होटल थी और वहां सब तरह के लोग आते-जाते थे। वह गाली-गलौज सीख गया था। वह स्त्री बड़ी परेशान थी, क्योंकि घर में मेहमान आते और वह बेहूदी बातें बोल देता। उसने अपने पड़ोस के पादरी को, चर्च के पादरी को कहा कि कुछ उपाय करो। तुम तो सब कुछ जानते हो। आदमियों तक को बदल देते हो, तो यह तो तोता है। इसे थोड़ा उपदेश दो कि यह बदल जाए।
पादरी ने कहा, यह तो मेरी भाषा न समझेगा, लेकिन मेरे पास एक मादा तोता है। वह दिन-रात प्रार्थना किया करती है। चौबीस घंटे चर्च में उसकी प्रार्थना गूंजती रहती है। तुम इसे ले आओ; दोनों को सत्संग में रख दें।
खैर, स्त्री को बात जंच गई। वह अपने नर तोते को ले आई। एक ही पिंजरे में दोनों को बंद कर दिया। दोनों दूर बैठ गए; देखें कि क्या चर्चा चलती है! मादा तोता थोड़ी देर चुपचाप बैठी रही; नर तोता भी थोड़ी देर चुपचाप बैठा रहा। फिर उस नर तोते ने कहा, मुझसे प्रेम के बारे में क्या खयाल है? उस मादा तोते ने कहा, बिलकुल ठीक। क्या सोचते हो तुम, मैं प्रार्थना किसलिए कर रही थी इतने वर्षों से? एक तोता मिल जाए।
सत्संग का असर तो पड़ता ही है। निश्चित पड़ता है। लेकिन किस तरफ से पड़ेगा, कहना मुश्किल है। गुरु शिष्य को ले जाएंगे स्वर्ग की तरफ, कि शिष्य गुरु को ले जाएंगे नर्क की तरफ, कहना मुश्किल है! प्रभाव तो जरूर पड़ता है।
यदि हाथ में घाव न हो तो हाथ में विष को लिया जा सकता है, घाव-रहित के विष नहीं चढ़ता; अन्दर में पाप न हो तो कर्म करने वाले को पाप नहीं लगता ।
मुल्ला नसरुद्दीन रोज सुबह जोर-जोर से प्रार्थना करता था । परमात्मा सुनता था कि नहीं, पड़ोस के लोग सुन लेते थे कि 'सौ रुपए से कम न लूंगा; निन्यानबे भी देगा, नहीं लूंगा। जब भी दे, सौ पूरे देना'।
आखिर पड़ोसी सुनते-सुनते परेशान हो गए। एक पड़ोसी ने तय किया कि इसको एक दफा निन्यानबे रुपए देकर देखें भी तो सही। वह कहता है कि निन्यानबे कभी न लूंगा, सौ ही लूंगा। उसने एक दिन सुबह जैसे ही मुल्ला प्रार्थना कर रहा था, एक निन्यानबे की थैली उसके झोपड़े के आगन में फेंक दी।
मुल्ला ने पहला काम रुपए गिनने का किया। वह आधी प्रार्थना आधी रह गई; वह पूरी नहीं कर पाया, नमाज पूरी नहीं हो सकी। उसने जल्दी से पहले गिनती की। निन्यानवे पाकर उसने कहा, वाह रे परमात्मा, एक रुपया थैली का तूने काट लिया!
उसने निन्यानवे स्वीकार कर लिए ।
हमारी बनाई हुई प्रार्थना; हमारी प्रार्थना; और हम हिसाब लगा रहे हैं । वहां कोई है या नहीं, इससे बहुत प्रयोजन नहीं है। इसलिए अगर आपको पक्का हो जाए कि परमात्मा नहीं है, तो आपकी प्रार्थना टूट जाएगी ।
पूजा चित्त की एक दशा है। बुद्ध किसी भगवान को मानते नहीं, फिर भी उनकी आराधना में रत्तीभर कमी नहीं है। किसी परमेश्वर की उनके मन में कोई धारणा नहीं है, लेकिन बुद्ध से ज्यादा प्रार्थनापूर्ण हृदय आप खोज पाइएगा?
H. G. Wells -- बुद्ध जैसा ईश्वर-रहित और ईश्वर-जैसा व्यक्ति खोजना कठिन है— so godless and so godlike.
तीन चार कदम
कथा :
एक आदमी तीर्थ-यात्रा को जा रहा था । कई वर्षों से योजना करता था, लेकिन बहाने आ जाते थे, अड़चनें आ जाती थीं, नहीं निकल पाता था । फिर हिम्मत कर के एक रात को निकल पड़ा । ज्यादा दूर भी न था तीर्थ, दस ही मील था-पहाड़ी पर । और सुबह-सुबह जल्दी निकलना पड़ता था, ताकि धूप चढ़े, चढ़ते-चढ़ते आदमी पहुंच जाए । तो वह तीन बजे रात निकल पड़ा । गांव के बाहर अपनी लालटेन को लेकर पहुंचा । गांव के बाहर जाकर दिखाई पड़ा-दूर तक फैला हुआ भयंकर अंधकार ! उसे एक शंका उठी कि यह छोटी-सी लालटेन, तीन-चार कदम इससे रोशनी पड़ती है, दस मील के अंधेरे को यह काट सकेगी ? वह बैठ गया । उसने कहा -- 'यह तो खतरा लेना है । दस मील लंबा अंधेरा है, सारे पहाड़ अंधेरे से भरे हैं ! मैं इस छोटी-सी लालटेन के भरोसे निकल पड़ा हूं । यह हो नहीं सकता ।’ उसने गणित .बिठाया । दूकानदार था, गणित लगाना आता था । उसने कहा : 'तीन-चार कदम रोशनी पड़ती है, दस मील का अंधेरा है -- सोचो भी तो यह हल कैसे होगा ?'
वह उदास बैठा था, तभी उससे भी छोटी रोशनी लिए हुए एक आदमी पास से निकला । उसने कहा -- 'भाई, कहां जाते हो ? भटक जाओगे, और तुम्हारी रोशनी तो मुझसे भी छोटी है, छोटी-सी लालटेन लिए हो । अंधेरा तो देखो कितना है, मीलों तक फैला हुआ है; और तुम्हारी रोशनी तो दो कदम पड़ती है !' उस आदमी ने कहा -- 'पागल हुए हो ! दो कदम चल लिए, तब दो कदम और आगे रोशनी पड़ जाएगी । ऐसे-ऐसे तो हजार मील पार हो जाएंगे । यह गणित करके बैठे हो ? यह गणित भ्रांत है । कोई दस मील लंबी रोशनी ले कर चलेंगे, तब पहुंचेंगे ? तो चलना ही मुश्किल हो जाएगा । इतना बड़ा रोशनी का इंतजाम.. चलना असंभव हो जाएगा । दो कदम पर्याप्त हैं । दो कदम दिख जाता है, दो कदम चल लेते हैं; फिर दो कदम दिखने लगता है, फिर दो कदम चल लेते हैं ।
ध्यान को तुम स्वीकार बनाओ । तुम्हारा ध्यान अस्वीकार है, तो हर जगह अड़चन आएगी ।
खोज
कथा :
एक लकड़हारा रोज जंगल में लकड़ी काटता था । एक सूफी फकीर बैठता था ध्यान करने, उसने इसे देखा : जन्मों-जन्मों से यह काटता रहा हो, ऐसा मालूम पड़ता है । जीर्ण-शीर्ण देह, का हो गया । और इससे एक दफा रोटी भी मुश्किल से मिल पाती होगी । तो उससे कहा -- 'देख, तू इस जंगल में रोज आता है, तुझे कुछ पता नहीं । तू थोड़ा आगे जा ।' उसने कहा : 'आगे क्या है ?' उसने कहा -- 'तू थोड़ा आगे जा, खदान मिलेगी ।' वह आगे गया, वहां एक तांबे की खदान मिली । वह बड़ा हैरान हुआ । उसने कहा : मैं सदा यहां आता रहा, जरा आगे न बढ़ा, बस, लकड़ियां काटीं और जाता रहा । जरा ही कुछ थोड़े ही कदम चल कर खदान थी । तांबा ले गया, तो लकड़ी के बेचने से तो एक दफे रोटी मिलती थी, एक दफा तांबा बेचने से इतना पैसा मिलने लगा कि महीने भर का भोजन चल जाए । जब दुबारा फिर आया तो उस फकीर ने कहा कि देख, अटक मत जाना; थोड़ा और आगे । तो उसने कहा -- 'अब आगे और क्या करना है जा कर ?' उसने कहा: 'तू जा तो ! सुन, मेरी सीख मान । मैं यह पूरा जंगल जानता हूं ।'
वह और थोड़े आगे गया तो चांदी की खदान मिल गई । वह बोला. 'मैं भी खूब पागल था । उस फकीर की सलाह न मानता तो अटक जाता तांबे पर ।' चांदी बेच दी तो साल भर के लायक भोजन मिलने लगा, बड़ा मस्त था । एक दिन फकीर ने कहा कि देख, ज्यादा मस्त मत हो, और थोड़ा आगे । उसने कहा : 'अब छोड़ो भी, अब मुझे कहीं न भेजो । अब बस काफी है, बहुत मिल गया ।' फकीर ने कहा -- 'वैसे तेरी मर्जी है, लेकिन पछताएगा ।' बात मन में चोट कर गई । थोड़ा और आगे गया, सोने की खदान मिल गई । अब तो एक दफा ले आया तो जन्म भर के लिए काफी था । फिर तो उसने जंगल आना ही बंद कर दिया ।
फकीर एक दिन उसके घर पहुंचा, पूछा : 'पागल, मैं तेरी राह देखता हूं अभी थोड़ा और आगे ।' उसने कहा -- 'अब छोड़ो, अब तुम मुझे मत भरमाओ ।' उसने कहा : 'तू पिछले अनुभव से तो कुछ सीख । जितना आगे गया उतना मिला । थोड़ा और आगे ।' रात भर सो न सका । कई दफे सोचा : 'अब जाने में सार क्या है ! और आगे हो भी क्या सकता है ! सोना-आखिरी बात आ गई ।' पर नींद भी न लगी; सोचा कि फकीर शायद कुछ कहता हो, शायद कुछ और आगे हो । तो और आगे गया । हीरों की खदान मिल गई । सोचा कि बुरा होता हाल मेरा अगर न आता ।
अब तो वह एक दफे ले आया तो जन्मों-जन्मों के लिए काफी था । फिर तो कई दिन दिखाई ही न पड़ता था वह । घर भी फकीर आता तो मिलता नहीं था । कभी होटल में, कभी सिनेमागृह में । वह कहॉ अब, उसका पता कहां चले ! अब तो वह भागा-भागा था । फकीर उसको खोजता फिरे, उसका पता न चले । एक दफे मिल गया वेश्यालय के द्वार पर । उसने कहा -- ' अरे पागल, बस तू यहीं रुक जाएगा ? अभी थोड़ा और आगे ।' उसने कहा -- 'अब क्षमा करो, मैं मजे में हूं । अब मुझे और झंझट में न डालो ।’ पर फकीर ने कहा : 'एक बार और मान ले । रुक मत ।'
वह और आगे गया । अब तुम सोचो : और आगे क्या मिला होगा ? और आगे फकीर मिला, वह बैठा था ध्यान में । उस आदमी ने पूछा : 'अब यहां तो कुछ और दिखाई नहीं पड़ता ।' उसने कहा : 'यहां खदान भीतरी है । अब तू मेरे पास बैठ जा । अब जरा आख बंद कर । अब जरा शांत हो कर बैठ । अब यहां ध्यान की खदान है । अब यहां परमात्मा मिलेगा, पागल ! अब बाहर की चीज हो चुकी बहुत, अब भीतर खोद !'
संत अगस्तीन -- हे प्रभु, जो मुझे करना चाहिए वह मैं कर नहीं पाता और जो मुझे नहीं करना चाहिए वही मैं करता हूं । और मैं जानता हूं भलीभांति कि क्या नहीं करना चाहिए, फिर भी वही करता हूं । ऐसा भी नहीं कि मुझे पता नहीं है; मुझे सब मालूम है कि ठीक क्या है, वही नहीं होता । और जो ठीक नहीं है, वही होता है ।
एक आंग्ल-भारतीय विचारक आबरी मेनन ने एक छोटी-सी किताब लिखी है। उसके पिता तो भारतीय थे, उसकी मां अंग्रेज थी। आबरी मेनन ने एक छोटी-सी किताब लिखी है, The space of the inner heart, अंतर-हृदय का आकाश। किताब बहुत मधुर संस्मरण से शुरू की है।
वेटिकन के पोप से मिलने गया था मेनन; तो वेटिकन के पोप के चरणों में सिर झुकाकर आशीर्वाद लेने को झुका। तभी वेटिकन के पोप ने अपने साथ खड़े हुए महासचिव को पूछा, किस जाति का व्यक्ति है यह, कौन है? साथ खड़े हुए सेक्रेटरी ने वेटिकन के पोप को कहा, अंग्रेज है, आंग्ल है। वेटिकन के पोप ने मेनन के चेहरे पर हाथ फेरा और कहा, नहीं। इसके चेहरे का ढंग भारतीय है।
झुका हुआ मेनन अपने मन में सोचने लगा, सच में मैं कौन हूं? उसको एक सवाल उठा कि मैं भारतीय हूं या अंग्रेज हूं? लेकिन अंग्रेज होना और भारतीय होना चमड़ी से ज्यादा गहरी बात नहीं है। भीतर मैं कौन हूं? चमड़ी तो मेरी दोनों की है। अंग्रेज की भी है थोड़ी चमड़ी मेरे पास और एक भारतीय की भी चमड़ी है थोड़ी मेरे पास। खून भी मेरे पास भारतीय का है और अंग्रेज का भी है। फिर मैं कौन हूं? क्या यही चमड़ी और खून का जोड़ मैं हूं? या मैं कुछ और भी हूं? वह झुका हुआ मेनन नीचे सोचने लगा।
उठकर खड़ा हुआ, वेटिकन के पोप ने फिर पूछा कि कहो, कौन हो तुम? तो उसके मन में हुआ कि वेटिकन के पोप के संबंध में कहा जाता है कि वह इनफालिबल है, वह कभी भूल नहीं करता। ईसाई मानते हैं कि उनका जो बड़ा पुरोहित है, वह कभी भूल नहीं करता। मधुर मान्यता है। मेनन को खयाल आया कि अगर मैं कहूं कि आंग्ल-भारतीय हूं, आधा भारतीय आधा अंग्रेज हूं, तो कहीं पोप को दुख न हो। वह यह न सोचे कि मैंने उसे फालिबल सिद्ध किया, मैंने कहा कि वह भी गलती कर सकता है। तो मेनन ने कहा कि हां, आप ठीक कहते हैं महानुभाव! मैं भारतीय हूं।
पोप बहुत खुश हुआ। मेनन ने अपनी किताब में लिखा है कि इसलिए नहीं खुश हुआ कि मैं भारतीय था और भारतीय से मिलकर उसे खुशी हुई। इसलिए भी खुश नहीं हुआ कि मैं कोई खास आदमी था और मुझसे मिलकर खुशी हुई। खुश इसलिए हुआ कि पोप इनफालिबल है, उससे कभी भूल नहीं होती।
पर मेनन ने लिखा है कि मेरे चित्त में एक चक्कर चल पड़ा उस दिन से कि मैं कौन हूं? क्या मैं यह हड्डी और मांस और चमड़ी का जोड़ मैं हूं? मैं कौन हूं? अगर सच में यह पोप मेरी आंखों में झांककर कहता और कहता कि ठीक है, मैं समझ गया; तुम्हारा शरीर तो भारतीय है या अंग्रेज, पर तुम कौन हो? क्या तुम शरीर ही हो? तो वह बड़ी खोज में लग गया कि मैं कहां पाऊं कि मैं कौन हूं?
उसने बहुत खोजा, बहुत खोजा, और आखिर में हम सोच भी नहीं सकते कि उसे अपना उत्तर छांदोग्य उपनिषद से मिला। छांदोग्य उपनिषद पढ़ते वक्त उसे यह शब्द सुनाई पड़ा, खयाल आया, हृदय की गुफा, दि इनर स्पेस आफ दि हार्ट, वह अंतर-हृदय का आकाश। उसने कहा कि अगर मैं कोई भी हूं, तो मेरे हृदय की गुफा में ही भीतर प्रवेश करूं तो जान पाऊंगा, अन्यथा नहीं जान पाऊंगा।
फिर उसने एक कमरे में अपने को बंद कर लिया महीनों के लिए। रोटी सरका जाता कोई समय पर, वह रोटी खा लेता। पानी सरका जाता, वह पानी पी लेता। और वह आंख बंद करके बस एक ही चिंतन में लग गया, एक ही ध्यान में कि मैं कौन हूं?
शरीर मैं नहीं हूं। उसने एक महीने तक इसका ही निरंतर ध्यान किया कि शरीर मैं नहीं हूं, शरीर मैं नहीं हूं। एक महीने तक इस एक शब्द के सिवा उसने कोई उपयोग न किया कि शरीर मैं नहीं हूं। सोते-जागते, उठते-बैठते, होश में, बेहोशी में, जानता रहा, दोहराता रहा, समझता रहा, स्मरण करता रहा--शरीर मैं नहीं हूं। एक महीने के बाद उसने आंख खोलकर अपने शरीर को देखा और पाया कि निश्चित ही शरीर मैं नहीं हूं। एक यात्रा का पड़ाव पूरा हो गया।
और उसने लिखा है कि जिस दिन मैंने पाया कि मैं शरीर नहीं हूं, फिर मैंने आंख बंद की और मैंने कहा कि अब मैं जानने चलूं कि मैं कौन हूं! एक बात तो पूरी हुई कि क्या मैं नहीं हूं। अब मैं जानूं कि मैं कौन हूं!
और जब मैंने भीतर झांका, तो मुझे छांदोग्य की बात समझ में आई कि भीतर एक अंतर-गुफा है हृदय की, जहां मैं हूं, जो मैं हूं। और जैसे-जैसे उस अंतर-गुफा में मैंने प्रवेश किया, तो मैंने पाया, आश्चर्य! इतना बड़ा आकाश भी नहीं है, जितनी बड़ी वह अंतर-गुफा है। और जैसे-जैसे मैं उसमें भीतर गया, वैसे-वैसे एक रहस्य उदघाटित हुआ कि जैसे-जैसे चला भीतर, वैसे-वैसे मैं मिटता गया। खाली, शून्य ही रह गया। एकांत ही रह गया। सिर्फ एकांत, मैं भी न रहा। मेरी मौजूदगी भी तो एकांत में बाधा है।
गुलशन-परस्त हूं, गुल ही नहीं अजीज ।
कांटों से भी निबाह किए जा रहा हूं मैं ॥
क्षमता
कथा :
जुन्नैद, एक बूढ़े फकीर के पास आया । वह उससे कहने लगा, 'मैंने सुना है आप जानते हैं । मुझे राह दिखाइए ।' बूढ़े आदमी ने उत्तर दिया, 'तुमने सुना है कि मैं जानता हूं । तुम नहीं जानते कि मैं जानता हूं ।' जुन्नैद ने कहा, ' आपके प्रति मुझे कुछ अनुभूति नहीं हो रही, लेकिन बस एक बात करें, मुझे वह राह दिखायें जहां मैं अपने गुरु को पा सकूं ।' वह बूढ़ा आदमी बोला, 'पहले मक्का जाओ; तीर्थ-यात्राएं करो; और ऐसे-ऐसे आदमी को खोजो । वह पेड़ के नीचे बैठा होगा । उसकी आंखें ऐसी होगी कि जो रोशनी फेंकती होंगी । तुम उसके आसपास कस्तूरी-सुगन्ध महसूस करोगे । जाओ और उसे खोजो ।'
जुन्नैद बीस वर्ष तक यात्रा ही यात्रा करता रहा । जहां कहीं सुना कि कोई गुरु है, वहां गया । लेकिन उसे न तो वह पेड मिला, न सुगन्ध, न कस्तूरी; और न ही वे आंखें जिनका वर्णन बूढ़े आदमी ने किया था । जिस व्यक्तित्व की खोज कर रहा था वह मिलने वाला ही नहीं था । और उसके पास एक बना-बनाया फार्मूला था, जिससे वह तुंरत ही निर्णय कर लेता. 'यह मेरा गुरु नहीं है' और वह आगे बढ़ जाता । बीस वर्ष पश्चात वह एक खास वृक्ष तक पहुंचा । गुरु वहां था । कसूरी की गंध धुंध की भांति उस व्यक्ति के आस-पास हवा में बह रही थी । उसकी आंखें प्रज्वलित थीं, और लाल प्रकाश उनसे छलक रहा था । यही था वह व्यक्ति । जुन्नैद गुरु के चरणों पर गिर पड़ा और बोला, 'गुरुदेव, मैं बीस वर्ष से आपको खोज रहा था ।
गुरु ने उत्तर दिया, 'मैं भी बीस वर्ष से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था । फिर से मेरी ओर देखो । जुन्नैद ने देखा, यह वही व्यक्ति था जिसने बीस वर्ष पहले उसे गुरु को खोजने का मार्ग दिखाया था । जुन्नैद रोने लगा और बोला, ' आपने ऐसा क्यों किया ? क्या आपने मेरे साथ मजाक किया ? बीस वर्ष बेकार हो गये हैं ! आप क्यों नहीं कह सके कि आप मेरे गुरु हैं ?'
बूढ़े आदमी ने जवाब दिया, 'उससे मदद न मिलती, उसका कुछ उपयोग न हुआ होता । क्योंकि जब तक तुम्हारे पास आंखें नहीं हैं देखने के लिए, कुछ नहीं हो सकता । इन बीस वर्षों ने तुम्हारी मदद की है मुझे देखने में । मैं वही व्यक्ति हूं जैसा कि तब था, लेकिन बीस वर्ष पहले तुमने मुझसे कहा था कि तुम्हें मेरे प्रति कोई अनुभूति नहीं होती । मैं तो वही हूं लेकिन अब तुम अनुभूति पाने में सक्षम हो गये हो । तुम बदल गये हो, इन पिछले वर्षों ने तुम्हें जोर से मांझ दिया । सारी धूल छंट गयी, तुम्हारा मन निर्मल है । कस्तूरी की यह सुगन्ध उस समय भी थी, लेकिन इसे सूंघने की तुममें क्षमता न थी । तुम्हारी नाक बन्द थी, तुम्हारी आंखें कार्य नही कर रही थीं, तुम्हारा हृदय सचमुच स्पंदित नहीं हो रहा था । इसलिए संयोग सम्भव नहीं था तब ।' सत्य को संपत्ति की भांति हस्तांतरित नहीं किया जा सकता ।
समझ के द्वारा मन गिर जाता है । अचानक तुम्हें होश आ जाता है कि कोई दूसरा तुम्हारे दुख के लिए जिम्मेवार नहीं था । तुम सतत इसे निर्मित कर रहे थे, क्षण-प्रतिक्षण तुम्हीं इसे रचने वाले थे । तुम दुख को निर्मित कर रहे थे और तुम पूछ रहे थे इसके पार कैसे जायें ? कैसे हो कि दुखी न बनें ? आनंद कैसे पायें, समाधि कैसे पायें ? और जब तुम पूछ रहे थे, तब तुम दुख का निर्माण किये जा रहे थे । यह पूछना कि 'समाधि कैसे प्राप्त करें' ? दुख निर्मित करता है क्योंकि तब तुम कहते हो, मैंने इतना अधिक प्रयत्न किया और समाधि अब तक उपलब्ध नहीं हुई ! सब कुछ जो किया जा सकता है मैं कर रहा हूं और समाधि अब भी नहीं मिली है ! मैं बुद्ध कब होऊंगा ! जब तुम संबोधि को भी इच्छा का लक्ष्यबिंदु बना लेते हो, जो असंगत है, तब तुम नये दुख का निर्माण कर रहे होते हो । कोई इच्छा परितृप्ति नहीं पा सकती । इसे जब तुम जान लेते हो, इच्छाएं गिर जाती हैं । तब तुम प्रबुद्ध होते हो । इच्छा-विहीन तुम प्रबुद्ध हो जाते हो । लेकिन इच्छाओं के साथ, दुख के एक चक्र में घूमते चले जाते हो ।
निक्षेप
कथा :
पति-पत्नी की शादी को 10 साल हो गए । पत्नी मायके गई हुई थी । पति घर में शाम को पत्नी की कागज की तस्वीर को लकड़ी की अलमारी के ऊपर चिपकाकर, उसपर दूर से चक्कू मार रहा है । 5-6 बार में निशाना लग नहीं रहा, इतने में पत्नी का फोन आया । पत्नी ने पूछा -- डार्लिंग, क्या कर रहे हो? पति ने कहा -- कुछ नहीं तुम्हें 'miss' कर रहा हूँ ।
निक्षेप प्रसंग (context) को स्पष्ट करता है ।
समाधान
कथा :
जवाहरलाल नेहरू प्रघान-मंत्री थे । उन्होंने विज्ञान कांग्रेस को सन्देश दिया कि वैज्ञानिक पृथ्वीतल से भूख मिटायें । मनुष्य-मनुष्य के बीच बैर मिटायें । एक वैज्ञानिक को विनोद सूझा । विज्ञान कांग्रेस में उसके भाषण का सार यह था -- हम दोनो कामों के लिए इसी क्षण तैयार हैं । पूरी पृथ्वी से कृषि समाप्त कीजिए, न भोजनालय, न रसोई । पूरी भूमि अन्य उपयोगों के लिए रहे । हम समुद्र गर्भ से पौष्टिक सामग्री लेकर ऐसी गोलियों बना देंगे जो एक गोली खाकर मनुष्य पूरे सप्ताह स्वस्थ रहेगा ! यह रहा फार्मूला, बाकी संभालें आप । हम बिल्ली को चूहाप्रेमी बना चुके हैं तो मनुष्य का भी स्वभाव बदल देंगे । आप सब राजनेता यह तय कर बता दें कि हम सब मनुष्यों को क्या बना दें, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट या पूंजीवादी ? हिन्दू-मुसलमान ईसाई या नास्तिक ? एक इंजेक्शन यह काम कर देगा । अब निर्णय आप करें । बाद में पत्रकारों ने नेहरू को घेरा उन्होंने हंसते हुए कहा -- वैज्ञानिक हमारी बात को इतनी गम्भीरता से न लें । वे अपना काम करें, हमें अपना काम करने दें ।
मौत का डर नहीं है, अपना बनाया हुआ संसार दूसरों के हाथों में सौंपने की बेबसी आ गई है, इस बात का डर है ।
पश्चिम में मन विक्षिप्त हुआ जा रहा है । जरूरत ! बहुत-से लोग डूब रहे हैं, मन की बीमारी में डूब रहे हैं । बहुत-से लोग उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं । मैं बड़े से बड़े मनोवैज्ञानिकों का जीवन बहुत गौर से देखता रहा हूं, मैं बहुत हैरान हुआ हूं ! खुद सिग्मंड फ्रायड मानसिक रूप से रुग्ण मालूम होता है, स्वस्थ नहीं मालूम होता । जन्मदाता मनोविज्ञान का ! कुछ चीजों से तो वह इतना घबडाता था कि अगर कोई किसी की मौत की बात कर दे तो वह कंपने लगता था । यह कोई बात हुई ! अगर कोई कह दे कि कोई मर गया.. उसने कई दफा चेष्टा करके अपने को सम्हालने की कोशिश की, मगर नहीं, दो दफे तो वह बेहोश हो गया । यह बात ही कि कोई मर गया कि वह घबड़ा जाये ! मौत इतना डराये तो मन बड़ा रुग्ण है ।
चरणदास -- गुरु कहै सो कीजिए करै सो कीजै नाहिं। -- गुरु जो कहे वैसा करो जो करे वैसा नहीं। क्यों क्योंकि गुरु जो कर रहा है वह तो उसकी आत्मदशा है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने कुत्ते को डाक्टर के यहां ले गया और कहा -- इसकी पूंछ काट दो। उस डाक्टर ने कहा: तुम पागल हो गए हो? सुंदर कुत्ता है, इसकी पूंछ क्यों काटते हो? मुल्ला से कहा -- मेरी सास आने वाली है। और मैं नहीं चाहता कि घर में किसी तरह का स्वागत का आयोजन हो। और यह मूरख पूंछ हिलाएगा, काट दो पूंछ।
अबाबीलों से मेरे आवारा विचार, न जाने किस प्रदेशों से आते हैं, मेरी छत के शहतीरों में तिनके सजाते हैं।
मैं चाहता हूं वे यहीं बस जाएं, मैं उन्हें पाल लूं मन के पींजरे में सहेज सम्हाल लूं
जब चाहूं--वहां से उतार लूं, अपने कुछ एकांत क्षण उनके साथ गुजार लूं, पर वे नहीं रुकते उड़ जाते है।
सिर्फ उनकी आमद के मटमैले निशान, उनकी याद दिलाते हैं, मन को और भी उदास बनाते हैं।
अबाबीलों से मेरे आवारा विचार, ये न जाने किधर से आते हैं, और कहां उड़ जाते हैं
ज्ञान-मद
कथा :
जब श्वेतकेतु वापिस लौटा गुरु के घर से सब जान कर-मेरे जानने के अर्थ में नहीं; जानने का जैसा अर्थ शब्दकोश में लिखा है वैसे अर्थ में-सब जान कर, पारंगत हो कर, वेद को कंठस्थ करके जब लौटा तो स्वभावत: उसे अकड़ आ गई । बाप इतना पढ़ा-लिखा न था । जब बेटे विश्वविद्यालय से लौटते हैं तो उनको पहली दफा दया आती है बाप पर कि बेचारा, कुछ भी नहीं जानता ! ऐसा ही उद्दालक को देख कर श्वेतकेतु को हुआ होगा । श्वेतकेतु सारे पुरस्कार जीतकर लौट रहा है गुरुकुल से । उसको ऐसी भीतर अकड़ आ गई कि उसने अपने बाप के पैर भी न छुए । उसने कहा -- 'मैं और पैर छुऊं इस बूढ़े अज्ञानी के जो कुछ भी नहीं जानता !' बाप ने यह देखा तो उसके आंखों में आँसू आ गये । नहीं कि बेटे ने पैर नहीं छुए, बल्कि यह देख कर कि यह तो कुछ भी जान कर न लौटा । इतना अहंकारी हो कर जो लौटा, वह जान कर कैसे लौटा होगा !
तो जो पहली बात उद्दालक ने श्वेतकेतु को कही कि सुन, तू वह जान लिया है या नहीं जिसे जानने से सब जान लिया जाता है ? श्वेतकेतु ने कहा -- 'यह क्या है ? किसकी बात कर रहे हो ? मेरे गुरु जो सिखा सकते थे, मैं सब सीख आया हूं । मेरे गुरु जो जानते थे, मैं सब जान आया हूं । इसकी तो कभी चर्चा ही नहीं उठी, उस एक को जानने की तो कभी बात ही नहीं उठी, जिसको जानने से सब जान लिया जाता है । यह एक क्या है ?'
तो उद्दालक ने कहा -- 'फिर तू वापिस जा । यह तू जान कर अभी आ गया, इससे तू ब्राह्मण नहीं होगा । और हमारे कुल में हम जन्म से ही ब्राह्मण नहीं होते; हमारे कुल में हम जान कर ब्राह्मण होते रहे हैं । तू जा । तू जान कर लौट । ऐसे न चलेगा । तू शास्त्र सिर पर रख कर आ गया है, बोझ तेरा बढ़ गया है । तू निर्भार नहीं हुआ है, शून्य नहीं हुआ, तेरे भीतर ब्रह्म की अग्नि नहीं जली, अभी तू ब्राह्मण नहीं हुआ । और ध्यान रख, हमारे कुल में इस तरह हम ब्राह्मण होने का दावा नहीं करते कि पैदा हो गये तो बस ब्राह्मण हो गये; अब ब्राह्मण घर में पैदा हो गये तो ब्राह्मण हो गये ! ब्रह्म को जान कर ही हमारे पुरखे दावे करते रहे हैं । और जब तक यह जानना न हो जाए, लौटना मत अब ।'
गया श्वेतकेतु वापिस । बड़ी कठिन-सी बात मालूम पड़ी । क्योंकि गुरु जो जानते थे, सब जान कर ही आ गया है । जब गुरु को जाकर उसने कहा कि मेरे पिता ने ऐसी उलझन खड़ी कर दी है कि वे कहते हैं, उस एक को जान कर आ, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है; और जिसे बिना जाने सब जानना व्यर्थ है । वह एक क्या है ? आपने कभी बात नहीं की !
तो गुरु ने कहा -- उसकी बात की भी नहीं जा सकती । शब्द में उसे बांधा भी नहीं जा सकता । लेकिन अगर तू तय करके आया है कि उसे जानना है तो उपाय हैं । शब्द उपाय नहीं है । शास्त्र उपाय नहीं, सिद्धांत उपाय नहीं । वह तो मैंने तुझे सब समझा दिया । तू सब जान भी गया । तू उतना ही जानता है जितना मैं जानता हूं । लेकिन अब तू जो बात उठा रहा है, यह बात और ही तल की है, और ही आयाम की है । एक काम कर, जा गौओं को गिन ले आश्रम में कितनी गौएं हैं, इनको ले कर जंगल चला जा । दूर से दूर निकल जाना; जहां आदमी की छाया भी न पड़े, ऐसी जगह पहुंच जाना । आदमी की छाया न पड़े, ताकि समाज का कोई भी भाव न रहे ।
जहां समाज छूट जाता है वहां अहंकार के छूटने में सुविधा मिलती है । जब तुम अकेले होते हो तो अकड़ नहीं होती । तुम अपने बाथरूम में स्नान कर रहे हो तब तुम भोले- भाले होते हो; कभी मुंह भी बिचकाते हो आईने के सामने; छोटे बच्चे जैसे हो जाते हो । अगर तुम्हें पता चल जाए, कोई कुंजी के छेद से झांक रहा-तुम सजग हो गये, अहंकार वापिस आ गया ! अकेले तुम जा रहे हो सुबह रास्ते पर, कोई भी नहीं, सन्नाटा है, तो अहंकार नहीं होता । अहंकार के होने के लिए 'तू का होना जरूरी है । 'मैं' खड़ा नहीं होता बिना 'तू' के ।
तो गुरु ने कहा -- दूर निकल जाना जहां आदमी की छाया न पड़ती हो । गौओं के ही साथ रहना, गौओं से ही दोस्ती बना लेना । यही तुम्हारे मित्र, यही तुम्हारा परिवार ।
निश्चित ही गौएं अदभुत हैं । उनकी आंखों में झांका ! ऐसी निर्विकार, ऐसी शांत !
कभी संबंध बनाने की आकांक्षा हो श्वेतकेतु तो गौओं की आंखों में झांक लेना । और तब तक मत लौटना जब तक गौएं हजार न हो जाएं । बच्चे पैदा होंगे, बड़े होंगे ।
चार सौ गौएं थीं आश्रम में, उनको सबको ले कर श्वेतकेतु जंगल चला गया । अब हजार होने में तो वर्षों लगे । बैठा रहता वृक्षों के नीचे, झीलों के किनारे, गौएं चरती रहती; सांझ विश्राम करता, उन्हीं के पास सो जाता । ऐसे दिन आए, दिन गये; रातें आईं, रातें गईं; चांद उगे, चांद ढले; सूरज निकला, सूरज गया । समय का धीरे-धीरे बोध भी न रहा, क्योंकि समय का बोध भी आदमी के साथ है । कैलेंडर तो रखने की कोई जरूरत नहीं जंगल में । घड़ी भी रखने की कोई जरूरत नहीं । यह भी चिंता करने की जरूरत नहीं कि सुबह है कि सांझ है कि क्या है कि क्या नहीं है । और गौएं तो कुल साथी थीं, कुछ बात हो न सकती थी । गुरु ने कहा था, कभी-कभी उनकी आंख में झांक लेना तो झांकता था, उनकी आंखें तो कोरी थीं, शून्यवत ! धीरे-धीरे श्वेतकेतु शांत होता गया, शांत होता गया ! कथा बड़ी मधुर है । कथा है कि वह इतना शांत हो गया कि भूल ही गया कि जब हजार हो जाएं तो वापिस लौटना है । जब गौएं हजार हो गईं तो गौओं ने कहा : 'श्वेतकेतु, अब क्या कर रहे हो ? हम हजार हो गये । गुरु ने कहा था... । अब वापिस लौट चलो आश्रम । अब घर की तरफ चलें ।' गौओं ने कहा, इसलिए वापिस लौटा । कथा बड़ी प्यारी है ! गौओं ने कहा होगा, ऐसा नहीं । लेकिन इतनी बात की सूचना देती है कि ऐसा चुप हो गया था, मौन कि अपनी तरफ से कोई शब्द न उठे; खयाल भी न उठा । अतीत जा चुका । मन के साथ ही गया अतीत-मन के साथ ही चला जाता है । इस मौन क्षण में एक जाना जाता है ।
लौटा ! गुरु द्वार पर खड़े थे । देखते थे, गुरु ने अपने और शिष्यों से कहा : 'देखते हो ! एक हजार एक गौएं लौट रही हैं ।'
एक हजार एक ! क्योंकि गुरु ने श्वेतकेतु को भी गौओं में गिना । वह तो गऊ हो गया । ऐसा शांत हो गया जैसे गाय । वह उन गऊओं के साथ वैसा ही चला आ रहा था जैसे और गायें चली आ रही थीं । गऊओं और उसके बीच इतना भी भेद नहीं था कि मैं मनुष्य हूं और तुम गाय हो ।
भेद गिर जाते हैं शब्द के साथ; अभेद उठता है निःशब्द में । जब वह आकर गुरु के सामने खड़ा हो गया और उसने कहा कि अब कुछ आज्ञा ? तो गुरु ने कहा -- 'अब क्या ? तू तो जान कर ही लौटा, अब क्या समझाना है ! तेरी मौजूदगी कह रही है कि तू जान कर ही लौटा है, अब तू अपने घर लौट जा सकता है । अब तेरे पिता प्रसन्न होंगे, तू ब्राह्मण हो गया है ।'
जीसस - धन्य हैं वे जो अंत में खड़े हैं, क्योंकि वे ही मेरे प्रभु के राज्य में प्रथम हो जाएंगे । जो अंतिम हैं वे प्रथम हो जाएंगे और जो प्रथम हैं वे अंतिम हो जाएंगे ।
विश्वामित्र अपने को ब्रह्म-ऋषि घोषित करना चाहते थे । क्षत्रिय थे । और जब तक वशिष्ठ उन्हें ब्रह्म-ऋषि स्वीकार न करें तब तक कोई उनको स्वीकार करने को राजी न था । और वशिष्ठ उन्हें हमेशा राज-ऋषि कहते थे, कभी ब्रह्म -ऋषि नहीं कहते थे ।
बात बिगड़ती चली गयी । फिर तो बात यहां तक बन गयी- थे तो क्षत्रिय, और इसीलिए तो वशिष्ठ उन्हें ब्रह्म-ऋषि नहीं कहते थे-एक दिन तलवार लेकर, पूर्णिमा के चांद की रात है, पहुंच गये वशिष्ठ के आश्रम कि आज फैसला ही कर लेंगे । या तो मुझे ब्रह्म-ऋषि कहे या गर्दन अलग कर दूंगा । क्षत्रिय तो क्षत्रिय, बुद्धि तो वही थी तलवार वाली । वह लेकर पहुंच गये । वहां वशिष्ठ अपने शिष्यों को लेकर-पूर्णिमा की रात है-ब्रह्मचर्चा हो रही है ।
वह छिपे बैठे हैं एक झाड़ी में कि जब मौका मिले तो निकलकर इसका फैसला ही कर दें । किसी ने पूछा वशिष्ठ को कि विश्वामित्र इतनी चेष्टा कर रहे हैं और इतने साधुपुरुष, आप उनको ब्रह्म-ऋषि कह क्यों नहीं देते? क्यों उन्हें दुख दे रहे हैं ? वशिष्ठ ने कहा कि विश्वामित्र अपूर्व व्यक्ति है, अनूठा व्यक्ति है, अद्वितीय व्यक्ति है और इसीलिए रुका हूं, क्योंकि मुझे आशा है वह ब्रह्म-ऋषि हो जाएगा । हो जाए, तभी कहूं; अभी कह दूंगा तो रुक जाएगी बात । थोड़ी अकड़ क्षत्रिय की अभी उसमें शेष रह गयी है । अभी तलवार उसके हाथ से छूटी नहीं है । तलवार छूट जाए तो जरूर कहूंगा । है योग्य । और होकर रहेगा यह भी पक्का है । लेकिन प्रतीक्षा कर रहा हूं ठीक समय की । अभी कह दूंगा तो बात अटक जाएगी, फिर कभी होने का उपाय न रहेगा । मैं उसका दुश्मन नहीं हूं ।
विश्वामित्र ने झाड़ी में छिपे हुए यह बात सुनी । भरोसा न आया कि वशिष्ठ और मेरे प्रेम में इतनी बात कह रहे हैं । वहीं तलवार फेंक दी । दौड़ कर वशिष्ठ के पैर पर गिर पडे । वशिष्ठ ने उठाया तो कहा, उठो ब्रह्मर्षि! आख से आंसू बहने लगे । विश्वामित्र ने कहा, अब आप कहते ब्रह्मर्षि! अब किसलिए कहते हैं! मत कहें, मैं इस योग्य नहीं हूं, आपको पता नहीं है मैं क्या करने आया था । वशिष्ठ ने कहा, उसकी फिक्र छोड़ो तुम क्या करने आए थे । तुमने जो किया, कि तुम चरण में झुक गये, यह झुक जाने की कला ही तो ब्राह्मण होने की कला है । अब यह बड़ी मुश्किल बात । इसीलिए तो रोका था अब तक कि कब तुम झुको कि तुम्हें कह दूं । तुम्हारी अकड़ गयी, अब क्षत्रिय न रहा । अब तुम सच में ब्राह्मण हुए ।
एक मित्र मुझे पत्र लिखते थे, त्रिवेदी हैं । मैं भूल से-कुछ चूक हो गयी होगी-उनको पत्र लिखा तो द्विवेदी लिख दिया । वह बड़े नाराज हो गये । पत्र आ गया उनका कि आपने यह क्या किया! मैं त्रिवेदी हूं, तीन वेदों के ज्ञाता को आपने एक क्षण में दो वेदों का ज्ञाता बना दिया! तो मैंने उन्हें पत्र लिखा, उसमें चतुर्वेदी लिख दिया । अब और क्या करूं! फिर उनका पत्र आया कि आप बात क्या है, आप भूल क्यों करते हैं? मैंने कहा, भूल नहीं कर रहा, जुर्माना भर रहा हूं । एक वेद छीन लिया था, एक जोड़ दिया, लेन-देन बराबर हो गया ।
ब्राह्मण को तो बोध है कि मैं जानता हूं । और ज्ञान से बड़ी अकड़ कहीं कोई दूसरी होती है!
तुम्हारा विश्वास तो तुम्हें तोड़ रहा है दूसरे से। यह विश्वास फिर ज्ञान नहीं हो सकता। यह तुम्हारी धारणा जोड़ नहीं रही। और महावीर कहते हैं ज्ञान की यह कसौटी है कि वह जोड़ेगा। उससे प्रभाव बढ़ेगा प्रेम का। उससे मैत्री सघन होगी। उससे तुम बेशर्त मैत्री में उतर जाओगे। तुम्हारी कोई शर्त न रहेगी कि तुम कौन हो। यहां हिंदू हैं मेरे पास संन्यासी, मुसलमान हैं मेरे पास संन्यासी, ईसाई हैं, यहूदी हैं, पारसी हैं, जैन हैं, बौद्ध हैं, सिक्ख हैं; दुनिया का ऐसा कोई धर्म नहीं है जिस धर्म से मेरे पास संन्यासी न हों। शायद ऐसा कहीं भी आज घट नहीं रहा है। यह अभूतपूर्व है। लेकिन यह घटना चाहिए सभी जगह। क्योंकि ज्ञान की किरण उतरे और इतना भी न कर पाये, कि अंधविश्वासों की और विश्वासों की दीवाल न गिरा पाये, तो ऐसे ज्ञान का क्या करोगे? दो कौड़ी का है। दीया पैदा हो जाए और अंधेरा न हटे, तो ऐसे दीये को क्या करोगे? वह बुझा है। उसे फेंको। उसे व्यर्थ मत ढोओ।
मैत्रीभाव बढ़े, उसी को जिन-शासन ने ज्ञान कहा है।
एक जलसे में मैं था। वहां कोई तीस-चालीस साधु अलग-अलग तरह के निमंत्रित, आमंत्रित थे। उस समारोह को करने वालों की इच्छा थी कि सारे लोग एक ही मंच पर बैठें। लेकिन नहीं बैठ सके। क्योंकि कोई शंकराचार्य थे, उनको तो सिंहासन चाहिए, उस पर ही बैठेंगे। और जब शंकराचार्य सिंहासन पर बैठेंगे, तो दूसरा साधु उनके नीचे पैरों में कैसे बैठने को राजी हो सकता है? उसने कहा, मैं भी सिंहासन पर बैठूंगा। फिर यह भी डर है कि सिंहासन किसका ऊंचा-नीचा होगा?
यह सोचते हैं आप, ये पागल हैं या साधु हैं? ये विनम्र हैं या अहंकार की अत्यंत अंतिम चरम सीमा हैं ये? यह अहमता का सूक्ष्मतम रूप है। इसलिए दुनिया में साधु लड़ते हैं और लड़ाते हैं। क्योंकि अहंकार जहां भी हो, वहीं संघर्ष और द्वंद्व और लड़ाई खड़ा कर देता है।
कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे वन माहि
ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।
अशांति
कथा :
बोधिधर्म चीन गया तो चीन के सम्राट ने कहा कि मैं बड़ा अशांत रहता हूं, महामुनि, मुझे शांति का कोई उपाय बतायें ! बोधिधर्म बड़ा अनूठा संन्यासी था । उसने कहा -- 'शांत होना है ? सच कहते हो, शांत होना है ?' सम्राट थोड़ा बेचैन हुआ कि यह भी कोई बात पूछने की है; मैंने कहा आपसे कि बहुत अशांत हूं शांति का कोई मार्ग बतायें !
तो बोधिधर्म ने कहा -- 'ऐसा करो रात तीन बजे आ जाओ । अकेले आना ! और खयाल रखना, अशांति ले कर आना । खाली हाथ मत चले आना ।' सम्राट समझा कि यह तो आदमी पागल मालूम होता है । अशांति ले कर आना ! खाली हाथ मत आ जाना ! रात तीन बजे आना ! अकेले में आना ! और यह बोधिधर्म एक बड़ा डंडा भी लिए रहता था । और इस एकांत में इसके इस मंदिर में, और पता नहीं यह क्या उलटा-सीधा करना करवाने लगे !
रात भर सम्राट सो न सका । लेकिन फिर उसको आकर्षण भी मालूम होता था इस आदमी में, इसमें थी तो कुछ खूबी ! इसके पास कुछ तरंग थी, कोई ज्योति थी । इसके पास ही जाते से कुछ प्रफुल्लता प्रगट होती थी, कुछ उत्सव आने लगता था । तो सोचा क्या करेगा, बहुत-से-बहुत दो चार डंडे मारेगा, मगर यह कोशिश करके देख लेनी ही चाहिए; कौन जाने, आदमी अनूठा है, शायद कर दे ! अब तक कितनों से ही पूछा, ऐसा जबाब भी किसी ने नहीं दिया । और यह जबाब भी बड़ा अजीब है । उसने कहा कि ले ही आना तू अशांति अपनी, शांत कर ही दूंगा, मगर अकेला मत आ जाना । तो किसी ने दावा किया है कि कर दूंगा शांत, ले आना । चलो देख लें ।
वह आया डरते-डरते, झिझकते-झिझकते । बोधिधर्म बैठा था वहां डंडा लिए अंधेरे में । उसने कहा -- 'आ गये ! अशांति ले आये ?' सम्राट ने कहा -- 'क्षमा करिये, यह भी कोई बात है ! अशांति ले आये ! अब अशांति कोई चीज है ?'
'तो क्या है अशांति ?' बोधिधर्म ने पूछा ।' शांत करने के पहले आखिर मुझे पता भी तो होना चाहिए, किस चीज को शांत करूं ! क्या है अशांति ?'
उन्होंने कहा -- 'सब मन का ऊहापोह है, मन का जाल है ।' तो बोधिधर्म ने कहा -- 'ठीक, तू बैठ जा, आंख बंद कर ले और भीतर अशांति को खोजने की कोशिश कर; जैसे ही मिल जाये, वहीं पकड़ लेना और मुझसे कहना मिल गई । उसी वक्त शांत कर दूंगा ।' और डंडा लिए वह बैठा है सामने । सम्राट ने आंख बंद कर ली । वह खोजने लगा । कोने-कोने देखने लगा । कहीं अशांति मिले न । वह जैसे-जैसे खोजने लगा, वैसे-वैसे शांत होने लगा । क्योंकि अशांति है कहां, मान्यता है ! तुम खोज थोड़े ही पाओगे । सूरज उगने लगा, सुबह हो गई । घंटे बीत गये । सूरज की रोशनी में सम्राट का चेहरा ऐसा खिल आया जैसे कमल हो ।
बोधिधर्म ने कहा -- 'अब बहुत हो गया, आंख खोलो । मिलती हो तो कहो; न मिलती हो तो कहो ।' वह चरणों पर झुक गया । उसने कहा कि नहीं मिलती । बहुत खोजता हूं कहीं नहीं मिलती, और आश्चर्य कि खोजता अशांति को हूं और मैं शांत होता जा रहा हूं । यह क्या चमत्कार तुमने किया है ?
बोधिधर्म ने कहा -- 'एक बात और पूछनी है, तुम भीतर गये, इतनी खोज-बीन की, तुम मिले ?' उसने कहा कि वह भी कहीं कुछ मिलता नहीं । जैसे-जैसे खोज गहरी होती गई वैसे-वैसे पाया कि कुछ भी नहीं है । एक शून्य सन्नाटा है !
तो बोधिधर्म ने कहा -- 'अब दुबारा यह सवाल मत उठाना । शांत कर दिया । और जब भी अशांति पकड़े, भीतर खोजना कहां है । और जब भी अहंकार पकड़े, भीतर खोजना कहां है । खोजोगे, कभी न पाओगे । माने बैठे हो ।'
रस्किन बांड - मैंने जितने आदमी सुखी देखे, वे वे ही लोग थे जो इतनी बुरी तरह उलझे थे काम में कि उन्हें फुरसत ही न थी जानने की कि सुखी हैं कि दुखी हैँ ।
इसको ध्यान रखें कि आपको शांत रहना है। घर लौटे हैं, तो दरवाजे पर दो क्षण रुक जाएं, क्योंकि पत्नी कुछ कहेगी। वह दिनभर से अशांत है, वह अशांति आप पर फेंकेगी। दो क्षण रुक जाएं, तैयार हो जाएं। तैयारी का मतलब यह कि मैं शांत रहूंगा, चाहे पत्नी कुछ भी कहे, मैं इसको नाटक से ज्यादा नहीं समझूंगा। दया करूंगा, क्योंकि बेचारी परेशान है।
अकर्ता या आलसी
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक दफ्तर में काम करता है । मालिक ने उससे कहा कि नसरुद्दीन, तुमने सुना, अब दुनिया में ऐसी-ऐसी मशीनें बन गई हैं जो एक साथ दस आदमियों का काम कर सकती हैं ! क्या तुम्हें यह सुन कर डर नहीं लगता ? नसरुद्दीन ने कहा : 'बिलकुल नहीं सरकार ! क्योंकि आज तक कोई मशीन ऐसी नहीं बनी जो कुछ न करती हो । आदमी का कोई मुकाबला ही नहीं है । जो कुछ न करती हो, ऐसी कोई मशीन बनी ही नहीं है ।’
नसरुद्दीन से मैंने एक दिन कहा कि तू कभी छुट्टी पर नहीं जाता, क्या दफ्तर में तेरी इतनी जरूरत है ? उसने कहा कि अब सच बात आपसे क्या छिपानी । दफ्तर में मेरी जरूरत बिलकुल नहीं है, इसीलिए तो छुट्टी पर नहीं जाता, छुट्टी पर गया तो उनको पता चल जायेगा कि इसके बिना सब ठीक चल रहा है, कोई जरूरत ही नहीं है । मैं छुट्टी पर जा ही नहीं सकता, तो ही भ्रम बना रहता है कि मेरी वहां जरूरत है ।
आदमी कर्म छोड़ दे तो आलसी; और कर्तापन छोड़ दे तो आलसी-शिरोमणि ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दोपहर एक वृक्ष के नीचे, झील के किनारे मछली की वंशी को पानी में लटका कर आराम से लेटा था। वंशी का कार्क जोर से उछल रहा था। मछली फंसी थी, वह देख रहा था, लेकिन कौन उठे! एक आदमी पास से गुजर रहा था, उसने भी देखा। उसने कहा कि हद्द हो गई। ऐसा आलसी मछलीमार हमने नहीं देखा। उठते क्यों नहीं? उसने कहा, 'भाई, अब तुम आ ही गये हो तो जरा इतना सा कर दो। तुम खड़े ही हो, कुछ ज्यादा नहीं, दो कदम चल जाओ, जरा पकड़ दो।' उस आदमी ने मछली पकड़ दी। मुल्ला ने कहा कि अब फिर से आटा लगा कर कांटे को जरा डाल दो। उसने वह भी डाल दिया। चलते वक्त उसने कहा कि अच्छा हो नसरुद्दीन कि दो-चार बच्चे पैदा कर लो, तो वे तुम्हारे इस तरह के सब काम करते रहेंगे। तुम महान आलसी हो। नसरुद्दीन ने कहा कि अगर कोई गर्भवती स्त्री कहीं हो तो खबर देना। उतनी मेहनत कौन करेगा?
एक जमाना था, अगर किसी को नाचना हो, तो वह नाचता था। अब अगर तुम्हें नाचने का खयाल आ जाये, तो तुम जाकर किसी का नाच देख आते हो। तुम खाली बैठे रहते हो, नाचता कोई और है। जमाना था कि किसी को गीत गाना हो, तो गीत गाता था। अब तुम रिकार्ड लगा कर गीत सुन लेते हो। या रेडियो से गीत सुन लेते हो। जमाना था कि गांव-गांव में अभिनय की छोटी-छोटी मंडलियां थीं, नाटक के घर थे। जिनको रस आता, वे रामलीला खेलते, या रासलीला करते। अब वे ही लोग सिनेमागृह में सिर्फ खाली बैठे रहते हैं। सब तरफ जिंदगी पैसिव हो गई है। सब तरफ जिंदगी निष्क्रिय हो गई है।
परम्परा सस्ती मालूम पड़ती है। मुफ्त मिल जाता है सब।
मुल्ला नसरुद्दीन एक डाक्टर के पास गया। डाक्टर ने पूछा कि क्या तकलीफ है?
मुल्ला ने कहा, अब आप ही बताइए। आप डाक्टर कि मैं डाक्टर?
तो उस डाक्टर ने कहा, आप ऐसा करिए, वेटनरी डाक्टर के पास जाइए। क्योंकि वेटनरी डाक्टर ही आपका इलाज कर सकता है। जानवर कुछ बताते तो हैं नहीं, डाक्टरों को ही अनुमान करना पड़ता है। मैं आदमियों का डाक्टर हूं, आप गलत जगह आ गए।
गणित ज्ञान से उपजा वैराग्य झूठा है।
एक सुस्त आदमी अपने मित्र से कह रहा था कि देखो ईश्वर भी कैसे-कैसे चमत्कार करता है और कैसे-कैसे मेरी मदद करता है! मुझे कुछ पेड़ काटने थे और तूफान ने आकर मेरी समस्या हल कर दी। फिर मुझे कूड़े-करकट का एक ढेर जलाना था और बिजली गिरी, वह भी समाप्त हो गया।
यह सुन कर उसका मित्र बोला: 'भैया, अब आपका अगला प्रोग्रेम क्या है?' वह व्यक्ति बोला: 'इस बार मैंने आलू की खेती करवायी है, अतः उन्हें निकलवाने के लिए भूचाल का इंतजार कर रहा हूं।'
दो आदमी एक झाड़ के नीचे सोए हुए थे..रहे होंगे शुद्ध भारतीय, आर्यसमाजी। जामुन का झाड़, एक जामुन गिरी। दोनों पड़े आवाज सुनते रहे। आखिर एक ने कहा कि भई, यह कैसी दोस्ती? अरे, दोस्त वह जो वक्त पर काम आए। जामुन गिरी और तुझसे इतना भी नहीं हो सकता कि उठा कर मेरे मुंह में डाल दे! उसने कहा, अब तुम्हें याद आई कि दोस्ती क्या! और जब वह कुत्ता अभी-अभी मेरे कान में 'जीवनजल' छिड़क रहा था, तब तुमने भगाया भी नहीं।
एक आदमी ने ये बातें सुनीं। उसने कहा, हद हो गई! बड़े पहुंचे हुए महात्मा मालूम होते हैं। उसने दो जामुन उठा कर दोनों के मुंह में डाल दीं। महात्माओं की सेवा तो करनी ही चाहिए! जाने को ही था कि उन्होंने कहा, ठहर भाई, गुठली कौन निकालेगा? तू कहां चला? जरा, गुठली तो निकालता जा!
निर्भर
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक बार घर लौटा यात्रा से । उसकी पत्नी ने पूछा, सफर कैसा कटा ? मुल्ला ने कहा; सफर में बेहद तकलीफ रही । ट्रेन में ऊपर वाली बर्थ पर जगह मिली थी और पेट खराब होने के कारण बार-बार नीचे उतरना पड़ता था ।
तो श्रीमती ने कहा -- 'तो आप नीचे वाले यात्री से कह कर बर्थ क्यों न बदल लिए ?'
उसने कहा -- 'सोचा तो मैंने भी था, पर नीचे वाली बर्थ पर कोई था ही नहीं, पूछता किससे ?'
कुछ लोग हैं जो सदा पूछने को उत्सुक हैं -- किसी से पूछ लें । और अगर कोई नहीं है तो बड़ी मुश्किल ! भीतर से कुछ बोध जैसे उठता ही नहीं ! शास्त्र में खोज ले, स्वयं में खोजने की आकांक्षा ही नहीं उठती है ।
मुल्ला नसरुद्दीन की दुर्घटना हो गई, कार टकरा गई एक ट्रक से, बड़ी चोट लगी । अस्पताल में भर्ती हुआ । डाक्टर ने मरहम-पट्टी की और कहा कि 'घबरा मत नसरुद्दीन, कल सुबह तक बिलकुल ठीक हो जाओगे । बड़े मियां, सुबह तशरीफ ले जाना ।' लेकिन दूसरे दिन सुबह डाक्टर भागा हुआ अंदर आया और बोला कि बड़े मियां, रुको-रुको, कहां जा रहे हो ? अभी- अभी अखबार में मैंने पढ़ा है कि आपका जबर्दस्त ऐक्सीडेन्ट हुआ है, मुझे दुबारा देखना पड़ेगा ।
अखबार में जब पढ़ा तब बात और हो गई !
मुल्ला नसरुद्दीन, चुनाव आया तो बड़ा नाराज हुआ । उसकी पत्नी का नाम वोटर-लिस्ट में नहीं था । लिया पत्नी को साथ और पहुंचा चुनाव आफिसर के पास । उसने कहा कि देखें, मेरी पत्नी जिंदा है और वोटर-लिस्ट में लिखा है कि मर गई । झगड़ने को तैयार .था । पत्नी भी बहुत नाराज थी । आफिसर ने वोटर-लिस्ट देखी और कहा, भई लिखा तो है कि मर गई । तो पत्नी बोली कि जब लिखा है तो ठीक ही लिखा होगा । अरे लिखनेवाले गलत थोड़े ही लिखेंगे! घर चलो । जब लिखा है तो ठीक ही लिखा होगा!
कुछ लोग लिखे पर बिलकुल दीवाने की तरह भरोसा करते हैं ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक मकान बेचना चाहता था। एक एजेंट को बुलाया। नदी के किनारे एकांत में बना उसका मकान है। कभी-कभी गर्मी के दिनों में वहां रुकता था। कहा, इसे बेच देना है। एजेंट ने विज्ञापन दिया पत्रों में। दूसरे दिन सुबह जब मुल्ला ने विज्ञापन पढ़ा, तो बड़ा चकित हो गया। सुंदर नदी का वर्णन था। उस दृश्य का जो मकान को घेरे हुए है। मकान की ऐसी महिमा का बखान था कि उसने कहा अरे, इसी मकान की तो मैं जीवनभर से तलाश कर रहा हूं! उसने फोन किया एजेंट को कि बेचना नहीं है। भूलकर नहीं बेचना है--एजेंट ने पूछा, इतनी जल्दी आप बदल गये? कल...कल ही तो आपने बेचने के लिए कहा था। बदलाहट का कारण क्या है? मुल्ला ने कहा, तुमने जो विज्ञापन दिया है, उसने मुझे भरोसा दिला दिया। इसी मकान की तो मैं जिंदगीभर से खोज कर रहा हूं। मुझे अब तक पता ही न था।
जब तक हम दूसरे से भरोसा न पा लें, तब तक हमें भरोसा नहीं आता। और ऐसा भरोसा दो कौड़ी का है, जो दूसरे के कारण मिलता है।
एक अंग्रेज विचारक भारत आया था, कुछ योगियों, साधुओं के संबंध में चमत्कार की बातों का पता लगाने। एक योगी के संबंध में सुना कि उसकी उम्र नौ सौ वर्ष है। तो वह बहुत चकित हुआ। मिरेकल था, चमत्कार था। नौ सौ वर्ष! बात झूठ होनी चाहिए।
गया, वहां बड़ी भीड़— भाड़ थी। बड़े भक्त थे। बड़ा उत्सव चल रहा था। उसकी हिम्मत न पड़ी। एक आदमी के पास बैठकर उसने थोड़ा मित्राचार, थोड़ी दोस्ती बढ़ाई। फिर जब बातचीत शुरू हो गई, तो उसने पूछा कि क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि आप इनके शिष्य हैं? उसने कहा, ही। क्या मैं पूछ सकता हूं कि इनकी उम्र कितनी है? मैंने सुना, नौ सौ वर्ष है! उस शिष्य ने कहा, मैं कुछ ज्यादा नहीं कह सकता। मैं सिर्फ पांच सौ वर्ष से इन्हें जानता हूं।
तब उसने अपना सिर पीट लिया कि अब मुसीबत खड़ी हुई। अब मैं किससे पता लगाऊं कि इनकी उम्र कितनी है! और इसका अंत कहां होगा?
जब भी हम कोई indirect witness, परोक्ष गवाही की तलाश में जाते हैं, तब हम भ्रांति में जा रहे हैं।
सुकरात - वो सबसे धनवान है जो कम से कम में संतुष्ट है, क्योंकि संतुष्टि प्रकृति कि दौलत है ।
बड़ा दुःख
कथा :
बर्नार्ड शा को हार्ट अटैक का हृदय पर दौरा पड़ा, ऐसा खयाल हुआ तो घबरा गया । डाक्टर को तत्क्षण फोन किया और लेट गया बिस्तर पर । डाक्टर आया, सीढिया चढ़ कर हाँफता और आ कर कुर्सी पर बैठ कर उसने एकदम अपना हृदय पकड़ लिया । डाक्टर ! डाक्टर ने और कहा कि मरे, मरे, गये ! घबड़ा कर बर्नार्ड शा उठ आया बिस्तर से । वह भूल ही गया वह जो खुद का हृदय का दौरा इत्यादि पड़ रहा था । भागा, पानी लाया, पंखा किया, पसीना पोंछा । वह भूल ही गया । पांच-सात मिनट के बाद जब डाक्टर स्वस्थ हुआ तो डाक्टर ने कहा, मेरी फीस । तो बर्नार्ड शा ने कहा, फीस मैं आपसे मांगू कि आप मुझसे ! डाक्टर ने कहा, यह तुम्हारा इलाज था । मैंने एक उलझन तुम्हारे लिए खड़ी कर दी, तुम भूल गये तुम्हारा दिल का दौरा इत्यादि । यह कुछ मामला न था; यह नाटक था, यह मजाक की थी डाक्टर ने और ठीक की ।
बर्नार्ड शा बहुत लोगों से जिंदगी में मजाक करता रहा । इस डाक्टर ने ठीक मजाक की । बर्नार्ड शा बैठ कर हंसने लगा । उसने कहा : यह भी खूब रही । सच बात है कि मैं भूल गया । ये पांच-सात मिनट मुझे याद ही न रही । वह कल्पना ही रही होगी ।
बड़ा दुख पैदा हो जाये तो छोटा भूल जाता है ।
वैराग्य का मतलब है, यह बोध कि जहां —जहां मुझे सुख का खयाल होता है, वहा सुख नहीं है। यह शास्त्र से पढ़कर नहीं आ जाएगा। संसार को ही उसके पूरे तत्व में समझने से आएगा।
मैं एक नदी के किनारे बैठा था । सांझ का वक्त था और एक आदमी वहा कुछ चने खा रहा था मछलियों को । हम दोनों ही थे और एक लड़का किनारे पर ही तैर रहा था । वह जरा दूर निकल गया और चिल्लाया कि मरा, डूबने लगा ! तो वह जो आदमी चने खा रहा था, एकदम छलांग लगा कर कूद गया । इसके पहले कि मैं कूदू वह कूद गया । मैंने कहा, जब वह कूद गया तब ठीक है । मगर कूद कर ही वह चिल्लाने लगा कि बचाओ -बचाओ ! तो मैं बड़ा हैरान हुआ । मैंने कहा, मामला क्या है ? उसने कहा कि मुझे तैरना आता ही नहीं । और एक झंझट खड़ी हो गई -- उन दो को बचाना पड़ा । जब मैं निकाल कर उनको किसी तरह बाहर ले आया तो मैंने पूछा कि कुछ होश से चलते हो, जब तुम्हें तैरना ही नहीं आता.. ! तो उन्होंने कहा, याद ही न रही । जब वह बच्चा डूबने लगा तो यह मैं भूल ही गया कि मुझे तैरना नहीं आता । यह मामला इतनी जल्दी हो गया । डूबते देख कर कूद पड़ा बस । पर कूदने के पहले यह तो सोच लेना चाहिए कि तुम्हें तैरना आता है !
सिग्मंड फ्रायड -- आदमी, सभी आदमी, पागल क्यों नहीं हैं-यह आश्चर्य है ! होने चाहिए सभी पागल । अगर देखें आदमी के मन की हालत तो होने चाहिए सभी पागल । कुछ लोग कैसे अपने को सम्हाले हैं और पागल नहीं हैं; यह चमत्कार है ।
अनवस्था
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन को उसके मालिक ने एक दिन कहा कि जरा बाहर जा कर देख, सूरज निकला कि नहीं ? वह बाहर गया, फिर भीतर आया और कुछ करने लगा जा कर कमरे में । मालिक ने पूछा 'क्या हुआ ? सूरज निकला कि नहीं ?' उसने कहा 'मैं लालटेन जला रहा हूं । बाहर बहुत अंधेरा है, दिखाई कुछ पड़ता नहीं ।'
दूसरे से न तो सुख मिलता है, न दूसरे से ज्ञान मिलता है । दूसरे से मिल सकता है सुख का आभास, और अंततः दुख। दूसरे से मिल सकती हैं सूचनाएं, अंततः अज्ञान को छिपाने वाली; और कुछ भी नहीं। दूसरे से Informationमिल सकती है , knowledge नहीं।
एक शराबी कहा करता था कि मैंने कभी एक प्याली से ज्यादा शराब नहीं पी। जो मित्र उसको जानते थे, उन्होंने कहा, हमसे झूठ बोलते हो? आंखों से हमने देखा है तुम्हें प्यालियों पर प्याली ढालते! उसने कहा, मैंने एक प्याली से ज्यादा कभी नहीं पी। मैं यह बाइबिल पर हाथ रखकर कसम खाकर कह सकता हूं। मित्रों को भरोसा न हुआ! बाइबिल उठा लाया। उसने बाइबिल पर हाथ रखकर कसम खा ली, एक प्याली से ज्यादा मैंने कभी नहीं पी। उन मित्रों ने कहा, हद हो गई! झूठ की भी एक सीमा होती है! तुम बाइबिल को भी झूठ में घसीट रहे हो। आज सांझ को देखेंगे।
सांझ को देखा, जैसा कि वह रोज पीता था, प्याली पर प्याली ढालता गया। मित्रों ने कहा, यह क्या कर रहे हो? उसने कहा, मैं फिर भी कहता हूं कि मैंने एक प्याली से ज्यादा नहीं पी। उन्होंने कहा, तुम्हारा मतलब क्या है? तब इसका मतलब है कि हमारी भाषाएं अलग-अलग हैं! उस आदमी ने कहा, निश्चित। एक प्याली तो मैं पीता हूं, फिर दूसरी प्याली पहली प्याली पीती है। फिर एड इनफिनिटम, फिर तीसरी प्याली चौथी प्याली पीती है। फिर चौथी प्याली पांचवीं प्याली! मैं एक ही प्याली पीता हूं। बाकी प्याली के लिए मेरा कोई जिम्मा नहीं। मैं तो कसम खाकर आता हूं कि एक से ज्यादा न पीऊंगा। लेकिन कसम खाने वाला एक पीकर ही बेहोश हो जाता है। फिर प्याली पर प्याली पीती चली जाती हैं।
दुख की खोज को हम तप कहते हैं। तपश्चर्या का अर्थ है, अब मैं सुख में नहीं खोजता; सुख में खोजा और नहीं पाया, अब मैं दुख में खोजूंगा। क्योंकि अगर सुख में खोजने से दुख मिला, तो संभावना है कि शायद दुख में खोजने से सुख मिल सके। विपरीत यात्रा करूंगा।
एक बहुत पुराने नगर में उतना ही पुराना एक चर्च था। वह चर्च इतना पुराना था कि उस चर्च में भीतर जाने में भी प्रार्थना करने वाले भयभीत होते थे। उसके किसी भी क्षण गिर पड़ने की संभावना थी। आकाश में बादल गरजते थे, तो चर्च के अस्थिपंजर कंप जाते थे। हवाएं चलती थीं, तो लगता था, चर्च अब गिरा, अब गिरा!
ऐसे चर्च में कौन प्रवेश करता, कौन प्रार्थना करता? धीरे-धीरे उपासक आने बंद हो गए। चर्च के संरक्षकों ने कभी दीवार का पलस्तर बदला, कभी खिड़की बदली, कभी द्वार रंगे। लेकिन न द्वार रंगने से, न पलस्तर बदलने से, न कभी यहां ठीक कर देने से, वहां ठीक कर देने से वह चर्च इस योग्य हुआ कि उसे जीवित माना जा सके। वह मुर्दा ही बना रहा। लेकिन जब सारे उपासक आने बंद हो गए, तब चर्च के संरक्षकों को भी सोचना पड़ा, क्या करें?
और उन्होंने एक दिन कमेटी बुलाई। वह कमेटी भी चर्च के बाहर ही मिली, भीतर जाने की उनकी भी हिम्मत न थी। वह किसी भी क्षण गिर सकता था। रास्ता चलते लोग भी तेजी से निकल जाते थे।
संरक्षकों ने बाहर बैठ कर चार प्रस्ताव स्वीकृत किए। उन्होंने पहला प्रस्ताव स्वीकृत किया बहुत दुख से कि पुराने चर्च को गिराना पड़ेगा। और हम सर्वसम्मति से तय करते हैं कि पुराना चर्च गिरा दिया जाए। लेकिन तत्क्षण उन्होंने दूसरा प्रस्ताव भी पास किया कि पुराना चर्च हम गिरा रहे हैं, इसलिए नहीं कि चर्च को गिरा दें, बल्कि इसलिए कि नया चर्च बनाना है। दूसरा प्रस्ताव किया कि एक नया चर्च शीघ्र से शीघ्र बनाया जाए। और तीसरा प्रस्ताव उन्होंने किया कि नए चर्च में पुराने चर्च की ईंटें लगाई जाएं, पुराने चर्च के ही दरवाजे लगाए जाएं, पुराने चर्च की ही शक्ल में नया चर्च बनाया जाए। पुराने चर्च के जो आधार हैं, बुनियादें हैं, उन्हीं पर नए चर्च को खड़ा किया जाए--ठीक पुरानी जगह पर, ठीक पुराना, ठीक पुराने सामान से ही वह निर्मित हो। इसे भी उन्होंने सर्वसम्मति से स्वीकृत किया। और फिर चौथा प्रस्ताव उन्होंने स्वीकृत किया, वह भी सर्वसम्मति से, और वह यह कि जब तक नया चर्च न बन जाए, तब तक पुराना न गिराया जाए!
वह पुराना चर्च अब भी खड़ा है। वह पुराना चर्च कभी भी नहीं गिरेगा। लेकिन उसमें कोई उपासक अब नहीं जाते हैं। उस रास्ते से भी अब कोई नहीं निकलता है। उस गांव के लोग धीरे-धीरे भूल ही गए हैं कि कोई चर्च भी है।
भारत इसी अर्थों में धार्मिक है, जिस अर्थों में वह नगर धार्मिक था, क्योंकि उस नगर में एक चर्च था। भारत धार्मिक है, क्योंकि भारत में बहुत मंदिर हैं, मस्जिद हैं, गुरुद्वारे हैं। भारत इसी अर्थों में धार्मिक है जिस अर्थों में उस गांव के लोग धार्मिक थे। इसलिए नहीं कि वे मंदिर जाते थे, बल्कि वे मंदिर जाने से बचने की कोशिश करते थे। भारत इसी अर्थों में धार्मिक है कि हर आदमी धर्म से बचने की चेष्टा कर रहा है। हमसे ज्यादा अनैतिक लोग, हमसे ज्यादा चरित्र में गिरे हुए लोग, हमसे ज्यादा ओछे, हमसे ज्यादा संकीर्ण, हमसे ज्यादा क्षुद्रता में जीने वाले लोग और कहीं मिलने कठिन हैं। और साथ ही हमें धार्मिक होने का भी सुख है कि हम धार्मिक हैं। ये दोनों बातें एक साथ चल रही हैं।
एक आदमी ने अहमक अहमदाबादी से पूछा: 'इस खतरनाक मोड़ पर कोई साइनबोर्ड नहीं है' ? अहमक अहमदाबादी ने कहा: 'लगातार तीन साल तक जब कोई दुर्घटना नहीं हुई तो इस जगह लगे साइनबोर्ड को म्युनिसिपल कमेटी ने निकाल लिया, क्योंकि बेकार साइनबोर्ड लगाने से क्या फायदा, जब दुर्घटना होती ही नहीं।'
रात का समय, मुल्ला नसरुद्दीन अपनी कार से गुजर रहा था। रास्ते में एक गांव पड़ा। गांव के किनारे की ओर सड़क पर पत्थरों का एक बड़ा ढेर लगा हुआ था और उस ढेर पर एक जलती हुई लालटेन रखी हुई थी। मुल्ला ने देखा तो उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ। वह बड़ी देर तक वहां रुका रहा। आखिर एक गांव का किसान जब उधर से निकला तो मुल्ला ने उसे बुलाया और पूछा, क्यों भैया, यह क्या मामला है? यह लालटेन इस ढेर के ऊपर क्यों रख छोड़ी है?
वह व्यक्ति बोला, अरे बड़े मियां, तुम्हें इतना भी नहीं मालूम? अरे यह इसलिए रखी है ताकि आने-जाने वाले लोगों को यह पत्थर का ढेर दिखता रहे।
मुल्ला बोला, अच्छा, यह बात है! लेकिन यह तो बताओ कि यह पत्थरों का ढेर यहां क्यों लगा रखा है?
उस व्यक्ति ने बड़ी ही हिकारत से कहा, बड़े मियां, हम तो सुनते थे शहर के लोग बड़े ही बुद्धिमान होते हैं, मगर तुम तो बिलकुल मूर्खता की बातें कर रहे हो। और यदि पत्थरों का ढेर नहीं लगाएंगे तो लालटेन किस चीज के ऊपर रखेंगे? इस लालटेन को रखने के लिए इस प्रकार पत्थरों का ढेर लगाया गया है।
तुम जरा गौर करना अपने मन के तर्कों पर। वे एक चक्कर में घूमते हैं।
बदलते चेहरे
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन के पास एक आदमी मिलने आया । नसरुद्दीन को पता नहीं, कौन हैं । तो उसने यह भी नहीं कहा कि बैठिए । हर किसी से तो कोई नहीं कह देता कि बैठिए । लोग तो हिसाब से चलते हैं । उस आदमी ने कहा, शायद आपको पता नहीं कि मैं कांग्रेस का नेता हूं एम. पी हूं । मुल्ला ने कहा : 'अरे बैठिए, कुर्सी पर बैठिए ।' उठ कर खड़ा हो गया ।' आइये, बड़ी खुशी हुई !' वह आदमी बोला कि आपको यह भी पता नहीं कि शीघ्र ही मैं कैबिनेट में लिया जाने वाला हूं । तो मुल्ला ने कहा -- 'अरे दो कुर्सी पर बैठिए ! एक से कैसे काम चलेगा !'
आदमी को देख कर चौबीस घंटे हम चेहरे बदलते हैं ।
मद्रास में एक मजिस्ट्रेट था अंग्रेज। वह अपनी अदालत में एक ही कुर्सी रखता था, खुद के बैठने के लिए। बाकी कुर्सियां थीं, लेकिन वह बगल के कमरे में रखता था। नंबर डाल रखे थे। क्योंकि वह कहता था, आदमी देखकर कुर्सी देनी चाहिए। तो एक नंबर का एक मोढ़ा था छोटा-सा, बिलकुल गरीब आदमी आ जाए--बहुत गरीब आ जाए, तब तो खड़े-खड़े चल जाए--बाकी थोड़ा, जिसको एकदम गरीब न भी कहा जा सके, उसको नंबर एक का मोढ़ा। फिर नंबर दो का मोढ़ा, फिर नंबर तीन की कुर्सी, फिर चार की--ऐसे सात नंबर की कुर्सियां थीं।
एक दिन बड़ी मुश्किल हो गई। एक बड़ा धोखे से भरा आदमी आ गया। आदमी आया तो मजिस्ट्रेट ने देखा उसको, तो सोचा कि खड़े-खड़े चल जाएगा।
सोचना पड़ता है, कौन आदमी आया! आपको भी सोचना पड़ता है, कहां बिठाएं! क्या करें! क्या न करें! आदमी देखकर जगह बनानी पड़ती है। आदमी के लिए कोई जगह नहीं बनाता; जैसा दिखाई पड़ता है, उसके लिए जगह बनानी पड़ती है।
पर जैसे ही पास आया और जैसे ही उसने ऊपर आंख उठाई, तो देखा कि एक कीमती चश्मा लगाए हुए है। उसने कहा कि जाओ, नंबर एक; चपरासी को कहा कि नंबर एक। चपरासी भीतर भागा गया। वह बूढ़ा पास आकर खड़ा हुआ। जब उसने सिर ऊंचा किया--झुकी है कमर उसकी--तो देखा, गले में सोने की चेन है। तब तक मोढ़ा लिए चपरासी आता था। उसने कहा, रुक-रुक! नंबर दो ला। तब तक उस बूढ़े ने कोट उठाकर घड़ी देखी। तब तक चपरासी नंबर दो लाता था। मजिस्ट्रेट ने कहा, रुक-रुक...।
उस बूढ़े ने कहा, मैं बूढ़ा आदमी हूं, जो आखिरी नंबर हो, वही बुला लो। क्योंकि अभी और भी बहुत बातें हैं। तुम्हें शायद पता नहीं कि सरकार ने मुझे राय-बहादुर की पदवी दी है। और तुम्हें शायद यह भी पता नहीं कि मैं यहां आया ही इसलिए हूं कि कुछ लाख रुपया सरकार को दान करना चाहता हूं। नंबर आखिरी कुर्सी जो हो, तू बुला ले। बार-बार चपरासी को दिक्कत दे रहे हो। और मैं बूढ़ा आदमी हूं।
इस लोक में कभी भी बैर से बैर शांत नहीं होते, बल्कि अबैर से शांत होते हैं, यही सनातन धर्म है ।
हमारे भीतर दो आदमी हैं। एक आदमी वह, जो साधारण स्थितियों में काम करता है। रास्ते पर आप जा रहे हैं, बड़े भले आदमी मालूम पड़ रहे हैं। वह आपका एक आदमी है। किसी आदमी ने एक धक्का दे दिया; वह जो बाहर आदमी था, भीतर चला गया; जो भीतर आदमी था, वह बाहर आ गया। यह दूसरा आदमी है। यह असली आदमी है। यही असली आदमी है। वह जो नकली आदमी सड़क पर चला जा रहा था बिलकुल मुस्कुराता हुआ, एकदम सज्जन मालूम पड़ रहा था, वह असली आदमी नहीं है। वह तो बेकाम है। वह तो सिर्फ एक चेहरा है, जिसका उपयोग हम करते रहते हैं, एक मास्क, एक मुखौटा। असली आदमी भीतर बैठा है।
वह असली आदमी तभी निकलता है, जब कोई जरूरत होती है, नहीं तो वह भीतर रहा आता है। जब जरूरत चली जाती है, वह पुनः भीतर चला जाता है। यह नकली आदमी फिर ऊपर आकर बैठ जाता है। असली आदमी क्रोध करता है, नकली आदमी माफी मांग लेता है। असली आदमी क्रोध करता है, नकली आदमी कसमें खाता है कि क्रोध नहीं करूंगा। असली आदमी क्रोध करता चला जाता है, नकली आदमी गीता पढ़ता चला जाता है; सोचता रहता है, क्रोध का निरोध कैसे करें! असली आदमी गीता नहीं पढ़ता, वह जो भीतर बैठा है। यह नकली आदमी क्रोध नहीं करता। और नकली आदमी कसमें खाता है।
ऐसे दोहरे तल पर, समानांतर रेखाओं की तरह दो आदमी हमारे भीतर हो जाते हैं। वे कहीं मिलते हुए मालूम नहीं पड़ते। रेल की पटरियों की तरह दिखाई पड़ते हैं कि आगे मिलते हैं, मिलते कहीं भी नहीं--पैरेलल। बस, चलते चले जाते हैं। पूरी जिंदगी ऐसे ही बीत जाती है। काम जब पड़ता है, असली आदमी निकल आता है। जब कोई काम नहीं रहता, नकली आदमी अपने बैठकखाने में बैठा रहता है।
'मैं' को मुक्त नहीं करना है, 'मैं' से मुक्त होना है।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मरने के करीब थी। दोनों बैठे बात कर रहे थे। नसरुद्दीन की पत्नी ने कहा कि तुम्हें आत्मा में विश्वास नहीं, लेकिन मुझे है। और अब मैं मर रही हूं तो मैं वायदा करती हूं कि मरने के बाद तुम्हें दर्शन दूंगी।
पत्नी तो जब मरेगी, मरेगी, मुल्ला के प्राण—पखेरू आधे उसी वक्त उड़ गए। उसने कहा कि फिर दो बात का खयाल रखना. एक— रात कभी दर्शन मत देना; और तू दे भी दर्शन तो रात को घर में मैं रहूंगा भी नहीं। तेरी ही वजह से लौटता हूं। फिर घर लौटने की जरूरत भी क्या है मुझे! और रात तो तू दर्शन देना ही नहीं, दर्शन देना हो तो दिन में देना। और तब देना जब दस—पांच आदमी मेरे साथ हों, अकेले में मत देना। क्योंकि तू जानती है कि मैं हृदय—दुर्बलता से पीड़ित हूं। और अच्छा तो यह हो कि दर्शन देना ही मत, मैं बिलकुल मान लेता हूं कि आत्मा होती है, कोई मुझे झगड़ा नहीं है।
जीसस -- जो तुम बांट दोगे वह बच गया और जो तुमने नहीं बांटा वह खो जाएगा ।
मूल्य
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक सम्राट के घर नौकरी पर था । कमरा साफ कर रहा था सम्राट का । उसकी सुंदर शैया देखकर कई दफे मन लुभा जाता था उसका, कि एक दफा तो लेटकर देख लें ! कैसा मजा सम्राट न लेता होगा ! ऐसी गुदगुदी थी, मखमली थी, बहुमूल्य थी ! सोने-चांदी से जड़ी थी ! हीरे-जवाहरात लटके थे चारों तरफ । और उस दिन सम्राट दरबार में व्यस्त था तो उसने सोचा कि एक पांच मिनट लेट लें । लेट गया । लेटा तो झपकी लग गई । सम्राट आया कमरे में तो उसे बिस्तर पर लेटे देखा तो वह बहुत नाराज हुआ । उसे पचास कोड़े मारने का हुक्म दिया गया । कोड़े पड़ने लगे । हर कोड़े पर मुल्ला खूब जोर से खिलखिला कर हंसने लगा ।
सम्राट बड़ा हैरान हुआ कि यह पागल है या क्या मामला है ! होना चाहिए पागल । एक तो बिस्तर पर लेटा, जानते हुए कि यह अपराध है; और अब हंस रहा है ! कोड़े पड़ने लगे और खून की धारें बहने लगीं, चमड़ी उखड़ने लगी और वह खिलखिला कर हंस रहा है ! आखिर सम्राट ने पूछा कि 'रुको, मामला क्या है ? कोड़े पड़ते हैं, तू हंसता क्यों है ?'
उसने कहा कि मैं इसलिए हंस रहा हूं कि मैं तो मुश्किल से पंद्रह मिनिट सोया, आपकी क्या गति होगी ! पंद्रह मिनिट में पचास कोड़े ! हिसाब तो लगाओ, मैं वही हिसाब लगा रहा हूं भीतर कि इस बेचारे की तो सोचो, आखिर में इसकी क्या गति होगी !
वैराग्य अनुभव है वासना की विफलता का। और जैसे ही यह अनुभव गहरा हो जाता है, यह अनुभव शस्त्र बन जाता है।
अभाव
कथा :
एक गुफा एक पहाड़ की कंदरा में छिपी थी-सदियों से, सदियों-सदियों से; अनंतकाल से । गुफाओं की आदत छिपा होना होता है । अंधेरे में ही रही थी । कुछ ऐसी आड में छिपी थी पत्थरों और चट्टानों के, कि सूरज की एक किरण भी कभी भीतर प्रवेश न कर पाई थी । सूरज रोज द्वार पर दस्तक देता लेकिन गुफा सुनती न । सूरज को भी दया आने लगी कि बेचारी गुफा जन्मों-जन्मों से बस अंधेरे में रही है । इसे रोशनी का कुछ पता ही नहीं । एक दिन सूरज ने जोर से आवाज दी । ऐसी सूरज की आदत नहीं कि जोर से आवाज दे । लेकिन बहुत दया आ गई होगी । जन्मों-जन्मों से गुफा अंधेरे में पड़ी है । तो सूरज ने कहा, बाहर निकल पागल! देख, बाहर कैसी रोशनी है । फूल खिले, पक्षी गीत गाते, किरणों का जाल फैला है । और मैं तेरे द्वार पर खड़ा हूं और बार-बार दस्तक देता हूं । तू बहरी है? बाहर आ ।
गुफा ने कहा, मुझे विश्वास नहीं आता । किस गुफा को कब विश्वास आया सूरज की आवाज पर? जब मैं तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता हूं तुम भी कहते हो विश्वास नहीं आता । कौन जाने कोई धोखा देने आया हो, कोई लूटने आया हो । गुफा के पास कुछ है भी नहीं और लूटे जाने का डर है!
लेकिन सूरज रोज दस्तक देता रहा । आखिर एक दिन गुफा को आना ही पड़ा । सोचा, एक दिन चल कर जरा झांक कर देख लें । न तो फूलों का भरोसा था कि फूल हो सकते हैं; क्योंकि जो देखा न हो उसका भरोसा कैसे? न रोशनी का भरोसा था;क्योंकि रोशनी जानी ही न थी । तो रोशनी का अनुभव न हो, आभास भी न हुआ हो तो प्रत्यभिज्ञा कैसे हो? पहचान कैसे हो? आकांक्षा कैसे जगे? उसी को तो हम चाहते हैं जिसका थोड़ा स्वाद लिया हो । न भरोसा था कि पक्षियों के गीत होते हैं । पक्षियों का ही पता न था । गुफा तो बस अपने अंधेरे... अपने अंधेरे... अपने अंधेरे में डूबी रही थी । उस दिन बाहर आई डरती-डरती, सकुचाती ।
तुम्हें जब मैं देखता हूं संन्यास में उतरते तो मुझे उस गुफा की याद आती है -- डरते-डरते, सकुचाते । ऐसे आते हो कि अगर जरा लगे कि बात गड़बड़ है तो खिसक जाओ । सम्हाल-सम्हाल कर कदम रखते हो । लौटने का उपाय तोड़ते नहीं । लौटने की पूरी व्यवस्था रखते हो कि अगर कुछ धोखाधड़ी हो तो लौट जाएं ।
ऐसी गुफा आई, आई तो चौंक गई । आई तो रोने लगी । आई तो आंख आंसुओ से भर गई । छाती पीटने लगी कि जनम-जनम मैंने अंधेरे में गुजारा । तुमने दया पहले क्यों न की? तुमने पहले क्यों न पुकारा?
देखते हो? सूरज रोज दस्तक दे रहा था, अब गुफा सूरज को ही उत्तरदायी ठहराती हे कि पहले क्यों न पुकारा?
सूरज ने कहा, छोड़, जो गया सो गया । बीता सो बीता । अभी भी बहुत पड़ा है । अनंतकाल बाकी है, तू सुख से जी । अब बाहर आ । गुफा ने कहा, आऊंगी बाहर लेकिन तुम भी कभी मेरे भीतर आओ । जैसे मैंने प्रकाश नहीं जाना, हो सकता है, जिस अंधेरे को मैंने जाना, तुमने न जाना हो । सूरज ने उसका निमंत्रण माना, वह उसकी गुफा में गया । गुफा तो चौंक कर रह गई । वहां अंधेरा था नहीं ।
गुफा कहने लगी, यह हुआ क्या? यह हुआ कैसे? क्योंकि अंधेरा सदा था । एक दिन, दो दिन की बात नहीं, जन्मों-जन्मों से मैंने अंधेरा जाना । यह हुआ क्या? आज अंधेरा गया कहां? सूरज जब बाहर विदा हो गया तब फिर अंधेरा था । गुफा ने फिर उसे निमंत्रण दिया । सूरज ने कहा, पागल! तू मुझे अंधेरे से मुकाबला न करवा सकेगी, क्योंकि जहां मैं हूं वहां अंधेरा नहीं है । मैं आया कि अंधेरा गया । अंधेरा कुछ है थोड़े ही, मेरा अभाव है । तो मेरा भाव और मेरा अभाव साथ-साथ थोड़े ही हो सकते हैं । अंधेरा मेरी अनुपस्थिति है । तो मेरी उपस्थिति और मेरी अनुपस्थिति साथ-साथ थोड़े ही हो सकती है । मैं जब भी आऊंगा, अंधेरा नहीं होगा ।
वासना बोध की अनुपस्थिति है ।
मेरे दो हाथ हैं, दो पैर हैं, इन पर मेरा ध्यान नहीं है । एक अंगुली मेरी टूट जाए, बस मेरी जिंदगी बेकार हुई । हालांकि उसके होने से, जब तक वह थी, मुझे कोई मतलब न था । मैंने उसका कोई उपयोग न किया था । अंगुली थी मेरे पास, तब मैंने कभी भगवान को धन्यवाद न दिया था कि यह अंगुली आपने दी है । कोई प्रयोजन न था । जब तक थी, तब तक पता ही न चला । जब न रही, टूट गई, तब से मुझे पता चला । और तब से दुखी हूं, और तब से परेशान हूं, और तब से निंदा कर रहा हूं । तब से भगवान से विवाद चल रहा है कि मेरी अंगुली तोड़ कर बहुत अन्याय हो गया । देकर कभी कोई धन्यता न हुई थी; लेकर बड़ा अन्याय हो गया है ।
और थी, तब मैंने उससे कुछ किया न था । उस अंगुली से मैंने कोई चित्र न बनाए थे । न कोई वीणा पर संगीत छेड़ा था । न उस अंगुली से किसी गिरते को सहारा दिया था । उस अंगुली से मैंने कुछ भी न किया था । वह थी या न थी, बराबर थी । मुझे पता ही न था उसके होने का । वह तो जिस दिन नहीं रही, उस दिन मैंने जाना कि बड़ा अभाव हो गया । और मजे की बात है, जिस अंगुली से मैंने कभी कुछ न किया था, उसके न होने से मैं परेशान क्यों हूं? क्योंकि कुछ भी तो खतम नहीं हो रहा, कुछ भी तो बंद नहीं हो रहा, कुछ तो छिन नहीं रहा है । लेकिन हमारे मन का ढंग यह है: जो नहीं है, वह हमें दिखाई पड़ता है बहुत भारी होकर; और जो है, वह हमें दिखाई नहीं पड़ता ।
पांच पहर धंधा किया,
तीन पहर गए सोए ।
एक घड़ी ना सत्संग किया,
तो मुक्ति कहाँ से होए ॥
गरिमा
कथा :
जीसस को बहुत बार उनके दुश्मन पकड़ने आये । लेकिन पास आ कर बदल गये । एक बार पुरोहितो ने आदमी भेजे, दुष्ट से दुष्ट आदमी भेजे कि जीसस को पकड़ लाओ । वे आकर उनकी बात सुनने लगे, मंत्रमुग्ध हो गये । जब लौट कर आये और पुरोहितो ने पूछा : तुम लाये नहीं ? तो उन्होंने कहा, बड़ा मुश्किल है । यह आदमी बड़ा अदभुत है । इसके पास एक गरिमा है, कि हम एकदम दब गये । यह बादशाहत है इसके पास कोई, कि हम एकदम दीन-हीन मालूम होने लगे । कैसे तो इसके हाथ में हथकड़ियां डालें ? हमने अपनी हथकड़ियां छुपा लीं । यह आदमी बहुत अदभुत है । ऐसा आदमी कभी हुआ नहीं ।
इसलिए फिर जीसस को अंधेरी रात में पकड़ा । दिन में पकड़ने की फिर कोशिश नहीं की; क्योंकि दिन में कोशिशें कीं, वे व्यर्थ गयीं ।
जो मृत्यु से बचता है, वही मरता है। जो मृत्यु का साक्षात कर लेता है, उसकी कोई मृत्यु नहीं है।
किसी गांव में शेखचिल्ली रहता था। वह सब कुछ जानता था। बड़े अच्छे लोग होंगे जिन्होंने कहा कि वह शेखचिल्ली था क्योंकि जो सब कुछ जानता है वह शेखचिल्ली होगा ही, वह पागल होगा ही। वह सब कुछ जानता था, ऐसी कोई बात न थी जो उसे ज्ञात न हो। उस गांव के राजा के भवन में चोरी हो गई। सारी राज्य की शक्ति लग गई चोरी की खोज में, लेकिन चोर का कोई पता नहीं चल सका। कोई सूत्र हाथ में नहीं आते थे कि चोर का पता चल जाए। सारे जासूस थक गए और परेशान हो गए, और तब गांव के लोगों ने कहा कि अब और कोई रास्ता नहीं है, हमारे गांव में एक ज्ञानी है उससे पूछ लिया जाए, ऐसी तो कोई बात ही नहीं है जो उसे ज्ञात न हो। उस शेखचिल्ली को बुलाने के लिए राजदूत भेजा गया। वह राजा का राजदूत गया और उसने कहा कि चोरी हो गई है भवन में पता है? उसने कहा ऐसा क्या है जो मुझे पता न हो? राजदूत उसे सम्मान से राजमहल ले गए। राजा ने पूछा पता है भवन में चारी हो गई है, बहुत बहुमूल्य सामान चोरी चले गए हैं। और राज्य के सारे जासूस और खोज-बीन करने वाले पता नहीं पा सके हैं। उसने कहा, क्या है जो मुझे ज्ञात न हो? राजा प्रसन्न हुआ और उसने कहा, फिर बताओ किसने चोरी की है? उस शेखचिल्ली ने कहा एकांत में बताऊंगा। अकेले में। द्वार बंद कर लें, क्योंकि खतरा है मैं नाम लूं किसी का और बताऊं , फिर कल मैं मुसीबत में पड़ जाऊं । तो द्वार बंद कर लें। द्वार बंद कर लिए गए। राजा अकेला रह गया, फिर भी दीवालें सुन सकती हैं, इस डर से उसने राजा के कान के पास मुंह रखा जैसे गुरु कान में मंत्र देते हैं ना चुपचाप कि कोई सुन न ले, कोई देख न ले, किसी को पता न चल जाए। वैसे उस शेखचिल्ली ने कान के पास मुंह रखा और कहा, बता दूं, देखिए किसी को बताइएगा तो नहीं, मुझे झंझट में तो नहीं डालिएगा? बता दूं...? राजा ने कहाः बताओ भी। उसने बहुत धीरे से कान में कहा, मालूम होता है किसी चोर ने चोरी की है।
उपवास
कथा :
एक जैन मुनि का आगमन हुआ । वह यमुना के उस पार ठहरे । यमुना में बाढ़ आयी है । और रुक्मिणी ने कृष्ण से पूछा कि मुनि ठहरे हैं उस पार, नाव लगती नहीं, कौन उन्हें भोजन पहुंचायेगा ? भोजन हमें पहुंचाना चाहिए ।
कृष्ण ने कहा, तो पहुंचाओ । रुक्मिणी ने पूछा -- पार कैसे जायें ? नाव लगती नहीं ।
उन्होंने कहा : इतना ही कह देना कि अगर मुनि सदा से उपवासे हैं तो यमुना राह दे दे । अगर मुनि उपवासे हैं तो यमुना राह दे देगी ।
बड़ी मीठी कहानी है । रुक्मिणी ने थाल सजाये । वह अपनी सखियों के साथ पहुंची । उसने जा कर कहा नदी को कि हे नदी, मुनि उस तरफ भूखे हैं और अगर वे सदा के उपवासे हों तो तू राह दे दे । और कहते हैं, नदी ने राह दे दी । चकित, नदी से रुक्मिणी गुजर गयी । उस तरफ जा कर मुनि को भोजन कराया । तब याद आयी कि यह तो बड़ी मुश्किल हो गयी । लौट कर नदी से क्या कहेंगे ? क्योंकि अब तो मुनि ने भोजन कर लिया । अब तो वे उपवासे नहीं हैं । और कृष्ण से हमने पूछा ही नहीं । आने की बात तो पूछ ली थी, जाने की नहीं पूछी । आने तक तो ठीक था कि मुनि सदा के उपवासे हैं - तो रहे होंगे, नदी ने राह दे दी । प्रमाण हो गया । लेकिन अब तो मुनि को हमने अपनी आंख के सामने खुद ही भोजन करवा दिया है । अब कैसे उपवासे हैं ? और वे बहुत थाल सजा कर लायी थीं । मुनि सारे थाल समाप्त कर गये । अब वे बड़ी घबड़ाने लगीं । उन्हें बेचैन देख कर मुनि ने कहा, तुम बड़ी चिंतित मालूम पड़ती हो, बात क्या है ? उन्होंने कहा कि ऐसा-ऐसा मामला है । कृष्ण ने कहा था, यह सूत्र बोल देना । हमने बोला भी, काम भी पड़ गया । नदी ने राह भी दे दी । अब हम क्या करें ? हम लौटने की बात पूछना भूल गये ।
मुनि ने कहा -- पागल हुई हो ! वही बात फिर कहना नदी से कि मुनि अगर सदा के उपवासे हों तो राह दे दो ।
अब तो उन्हें भरोसा भी नहीं था इस बात पर । भरोसा होता भी कैसे ? लेकिन कोई चारा भी न था । जाकर कहा, गैर-भरोसे से कहा, लेकिन नदी ने फिर राह दे दी । कृष्ण से आकर उन्होंने पूछा कि अब हमारे बिलकुल सूझ-बूझ के बाहर बात हो गयी । तो कृष्ण ने कहा -- मुनि सदा ही उपवासा है । भोजन करने न करने से कोई संबंध नहीं । उपवास का अर्थ जानती हो ? उपवास का अर्थ होता है, जो अपने भीतर विराजमान है । अपने पास बैठा -- उपवास । इसका भोजन लेने-देने से संबंध ही नहीं । भोजन नहीं किया, तो अनशन । उपवास का क्या संबंध है ? उपवास का अर्थ होता है : जो अपने पास है, जो अपने निकटतम बैठा है; जो वहां से हटता नहीं । यह मतलब है उपवास का ।
जो अपने भीतर विराजमान हो गया है, वह भोजन करते हुए भी भोजन नहीं करता है; क्योंकि भोजन तो शरीर में ही जाता, उसमें नहीं जाता । वह साक्षी ही बना रहता है । वह चलते हुए चलता नहीं, क्योंकि चलता तो शरीर है ।
बिना भोजन के आदमी चालीस दिन जी सकता है; बिना पानी के तीन दिन; बिना श्वास के आठ मिनट, बिना आशा के एक सेकेंड भी नहीं ।
दृष्टि
कथा :
बुद्ध ने जब अपना राजमहल छोड़ा और उनका सारथी उन्हें समझाने लगा कि आप कहां जाते हैं ? कहां भागे जाते हैं ? पीछे लौट कर देखें महल, ये स्वर्णमहल, यह सब सुख-शांति, यह तृप्ति का साम्राज्य, यह सुंदर पत्नी, यह बेटा, यह पिता -- ये कहाँ मिलेंगे ? ये सब सुख-चैन ! बुद्ध ने लौट कर देखा और कहा : मैं तो वहां केवल लपटों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखता हूं । सब जल रहा है । न कोई स्वर्ण-महल है, न कोई पत्नी है, न कोई पिता है । सब जल रहा है । सिर्फ लपटें ही लपटें हैं ! सारथी, बुद्ध ने कहा, तुम लौट जाओ । मैं अब इन लपटों में वापिस न जाऊंगा ।
सारथी ने बड़ी कोशिश की । बूढ़ा आदमी था और बचपन से बुद्ध को जाना था, बड़े होते देखा था; लगाव भी था । समझाया-बुझाया, चुनौती दी । आखिर में कुछ न बना तो उसने चोट की । उसने कहा -- यह पलायन है । यह भगोड़ापन है । कहां भागे जा रहे हो ? यह कोई क्षत्रिय का गुण-धर्म नहीं । बुद्ध हंसे और उन्होंने कहा -- घर में आग लगी हो तो घर के बाहर जाते आदमी को तुम भगोड़ा कहोगे ? और वह जो आग के बीच में बैठा है उसको तुम बुद्धिमान कहोगे ?
तो उस सारथी ने कहा : लेकिन आग लगी हो तब न ?
बुद्ध ने कहा -- वही कठिनाइ है, मुझे दिखाई पड़ता है कि आग लगी है; तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता आग लगी है । हमारी भाषाएं अलग हैं । मैं कुछ कह रहा हूं तुम कुछ समझ रहे हो । तुम कुछ कहते हो, उससे मेरे संबंध टूट गये हैं । अज्ञानी जो भाषा समझ सकते हैं वह सत्य की भाषा नहीं और सत्य की जो भाषा है वह अज्ञानी के समझ में नहीं आती ।
संसार में तृप्ति नहीं हो सकती है, इसलिए धर्म की सार्थकता है ।
अलबर्ट आइंस्टीन की पत्नी ने विवाह के बाद अपनी कुछ कविताएं अलबर्ट आइंस्टीन को दिखायीं। वह कुछ कविता करती थी। अब आइंस्टीन तो गणितज्ञ, भौतिकशास्त्री! तथ्य पर उसका जोर! तथ्य और काव्य का क्या मिलना! जमीन-आसमान का फर्क! उसने पहली ही कविता देखी, वह सिर हिलाने लगा। उसकी पत्नी ने पूछा कि क्या मामला है? उसने कहा, यह हो ही नहीं सकता, यह कभी हो ही नहीं सकता, बिलकुल गलत है। बात क्या है?
कविता में पत्नी ने लिखा है--प्रेम की कविता है, प्रेमी के लिए लिखी है--कि मेरे प्रेमी का जो चेहरा है वह चांद-जैसा सुंदर है। आइंस्टीन ने कहा, हो ही नहीं सकता! चांद-जैसा! हो ही नहीं सकता। क्योंकि चांद बहुत बड़ा है। कहां आदमी का सिर, और कहां चांद! फिर चांद सुंदर भी नहीं है। बड़े खाई-खड्ड हैं। इससे कोई तुलना बैठती ही नहीं।
अब यह दो अलग भाषाएं हैं। आइंस्टीन गणित की भाषा बोल रहा है।
बोकोजू से कोई मिलने आया । उसने जोर से दरवाजे को धक्का दिया । क्रोधी आदमी रहा होगा, कृष्ण लेश्या का आदमी रहा होगा । फिर जूते उतारकर फेंके । बोकोजू के पास आकर बोला, शांति की आकांक्षा करता हूं । कोई ध्यान का मार्ग दें । बोकोजू ने कहा, यह बकवास पीछे । पहले जाकर दरवाजे से क्षमा मांगो, जूते को सिर झुकाकर नमस्कार करो ।
उस आदमी ने कहा, क्या मतलब? दरवाजे से क्षमा? जूते से नमस्कार? ये तो मृत चीजें हैं, जड़ चीजें हैं । इनसे क्या क्षमा और क्या नमस्कार!
बोकोजू ने कहा, क्रोध करते वक्त न सोचा कि जड़ चीजों पर क्रोध कर रहे हो? जूते को जब क्रोध से फेंका, तब न सोचा कि जूते पर क्या क्रोध करना! दरवाजे को जब धक्का दिया, बेहूदगी और अशिष्टता की, तब न सोचा । जाओ वापस, अन्यथा मेरे पास आने की कोई सुविधा नहीं है । मैं तुमसे बात ही तब करूंगा, जब तुम दरवाजे से क्षमा मांगकर आ जाओ ।
अब यह जो आदमी है, कृष्ण लेश्या से दबा होगा । ऐसा नहीं कि उसने जानकर कोई क्रोध किया । क्रोध उसका अंग बन गया है । वह क्रोध से ही दरवाजा खोल सकता है ।
जो व्यक्ति दूसरों से लेकर ही आनंदित होता है, वह केवल सुख ही जानता है, आनंद नहीं जानता । और सब सुख के पीछे दुख छिपा है । क्योंकि जब तुम दूसरों से छीनते हो, तुम दूसरों को छीनने के लिए निमंत्रण दे रहे हो । तुम शत्रुता खड़ी करते हो,जब तुम छीनते हो । जब तुम देते हो, तब तुम मित्रता खड़ी करते हो । देने में आनंद है, और आनंद के पीछे कोई दुख नहीं है ।
नानक गए मक्का। सो गए रात। पुजारी बहुत नाराज हुए। नानक को पकड़ा और कहा कि बड़े मूढ़ मालूम पड़ते हो! पवित्र मंदिर की तरफ, परमात्मा की तरफ पैर करके सोते हो? तो नानक ने कहा कि मैं बड़ी मुसीबत में था; मैं भी बहुत सोचा, कोई उपाय नहीं मिला। तुम्हीं को मैं स्वतंत्रता देता हूं, तुम मेरे पैर उस तरफ कर दो, जहां परमात्मा न हो।
मनुष्य अगर मूर्च्छित है तो उससे पाप होगा ही। पाप मूर्च्छा का सहज परिणाम है।
किसी ने माइकल एंजलो से पूछा-क्योंकि एक चर्च के बाहर एक पत्थर बहुत दिन से पड़ा था, उसे अस्वीकार कर दिया गया था, चर्च के बनाने वालों ने उपयोग में नहीं लिया था, वह बड़ा अनगढ़ था, माइकल एंजलो ने उस पर मेहनत की और उससे एक अपूर्व क्राइस्ट की प्रतिमा निर्मित की-किसी ने पूछा कि यह पत्थर तो बिलकुल व्यर्थ था, इसे तो फेंक दिया गया था,इसे तो राह का रोड़ा समझा जाता था, तुमने इसे रूपांतरित कर दिया! तुम अनूठे कलाकार हो!
माइकल एंजलो ने कहा, नहीं, तुम गलती कर रहे हो। जो मैंने पत्थर से प्रगट किया है, वह पत्थर में छिपा ही था, सिर्फ मैंने पहचाना। और जो व्यर्थ टुकड़े पत्थर के आसपास थे उनको छांटकर अलग कर दिया। यह प्रतिमा तो मौजूद ही थी। मैंने बनाई नहीं। मैंने सिर्फ सुनी आवाज। मैं गुजरता था यहां से, यह पत्थर चिल्लाया और इसने कहा कि कब तक मैं ऐसे ही पड़ा रहूं? कोई पहचान ही नहीं रहा है। तुम मुझे उठा लो, जगा दो। बस, मैंने छेनी उठाकर इस पर मेहनत की। जो सोया था उसे जगाया।
कर्म नहीं होते पाप और पुण्य, चेतना की अवस्था होती है।
राबिया अपने घर में बैठी थी। हसन नाम का फकीर उसके घर मेहमान था। सुबह का सूरज निकला, हसन बाहर गया। बड़ी सुंदर सुबह थी। आकाश में रंगीन बादल तैरते थे और सूरज ने सब तरफ किरणों का जाल फैलाया था। हसन ने चिल्लाकर कहा, राबिया! भीतर बैठी क्या करती है? बाहर आ, बड़ी सुंदर सुबह है। परमात्मा ने बड़ी सुंदर सुबह को पैदा किया है। और आकाश में बड़े रंगीन बादल तैरते हैं। पक्षियों के गीत भी हैं। किरणों का जाल भी है। सब अनूठा है। स्रष्टा की लीला देख, बाहर आ! राबिया खिलखिलाकर हंसी और उसने कहा, हसन! तुम ही भीतर आ जाओ। क्योंकि हम उसे ही देख रहे हैं जिसने सुबह बनाई, जिसने सूरज को जन्म दिया, जिसके किरणों के जाल को देखकर तुम प्रसन्न हो रहे हो, भीतर आओ, हम उसे ही देख रहे हैं।
दुख का एक ही अर्थ है आध्यात्मिक भाषा में, कि आप जो हैं, वह नहीं हो पा रहे हैं। और आनंद का एक ही अर्थ है कि आप जो हो सकते हैं, वह हो गए हैं।
जनक ने एक बड़ी शास्त्रार्थ-सभा बुलाई थी। बड़े-बड़े पंडितों को निमंत्रण दिया था। वे सब विवाद के लिए आ गए थे। एक ब्राह्मण को निमंत्रण नहीं दिया गया था, क्योंकि वह सभा के योग्य न था।
हमारे पास शब्द है, सभ्य या सभ्यता। वह सभा से ही बना है। सभ्य का मतलब होता है, सभा में बैठने योग्य। और सभ्यता का मतलब होता है, जो सभा में बैठने योग्य है, वह सभ्यता को उपलब्ध हो गया।
एक ब्राह्मण भर को राजधानी में छोड़ दिया था, निमंत्रण न दिया था। वह था अष्टावक्र। उसका शरीर आठ जगह से तिरछा था। अब आठ जगह से तिरछे आदमी को सभा में बुलाकर क्या और हंसी करवानी? वह चलता, तो लोग हंसने लगते। उसका सारा व्यक्तित्व एक व्यंग्य था। वह कार्टून ज्यादा रहा होगा, बजाय आदमी के। आठ जगह से तिरछा! एकाध जगह से तिरछा होना ही काफी उपद्रव कर देता है, आठ स्थानों से तिरछा था। कैसे चलता था, वह भी एक चमत्कार रहा होगा। उसकी चाल ऊंट जैसी रही होगी। उस पर अगर तुम सवारी करते, तो मुश्किल में पड़ जाते। जैसा ऊंट पर बैठना मुश्किल हो जाता है। बड़े अभ्यास की जरूरत हैं।
लेकिन उसे तो कुछ पता ही नहीं था कि यह सभा हो रही है और विवाद हो रहा है। उसे तो कुछ काम आ गया और पिता को कुछ बात कहनी थी। खोजा, तो पिता घर में न मिले। पूछा, तो पता चला, वे राज—दरबार गए हैं। तो वह पिता को मिलने राज—दरबार पहुंच गया। ऐन वक्त पर उसको छोड़ दिया था, वह ऐन वक्त पर हाजिर हो गया। संयोग की बात।
बड़ा विवाद चल रहा था, ब्रह्मज्ञान की चर्चा चल रही थी। सब रुक गई। लोग हंसने लगे। जैसे ही वह राज—दरबार में प्रविष्ट हुआ, जनक तक को हंसी आ गई। और लोग तो मुंह रोक लिए। उस अष्टावक्र ने चारों तरफ देखा और वह भी खिलखिलाकर हंसा। वह आदमी गजब का था। उस जैसे गजब के आदमी जमीन पर बहुत थोडे हुए हैं, अंगुलियों पर गिने जा सकें।
उसके हंसने से सन्नाटा छा गया दरबार में। क्योंकि किसी ने यह न सोचा था कि वह हंसेगा। जनक ने पूछा, हम क्यों हंसते हैं, वह तो साफ है। तुम क्यों हंस रहे हो? उसने कहा, मैं इसलिए हंसता हूं कि मैंने घर में सुना, मां ने कहा कि पंडितों की बड़ी सभा है, ब्राह्मणों की, ब्रह्मज्ञानियों की। यहां सब चमार इकट्ठे हैं। क्योंकि जिनको चमडी दिखाई पड़ती है, वे चमार हैं। इनमें से आत्मा किसी को दिखाई नहीं पडती। मेरा शरीर आठ जगह से झुका है, यह सच है। लेकिन इनमें एक भी ब्रह्मज्ञानी नहीं है। इन मूढ़ों के साथ क्यों समय खराब कर रहे हो! अगर इनमें एक भी ब्रह्मज्ञानी होता, तो वह मुझे देखता, मेरे शरीर को नहीं।
जनक चरणों पर गिर पड़े अष्टावक्र के। और बात सच थी। ज्ञानी कहीं शास्त्रार्थ के लिए सभाओं में इकट्ठे होते हैं? कि विवाद करने आते हैं? कि प्रतियोगिता जीतने आते हैं? ज्ञानी को अब जीतने को कुछ बचा? और ज्ञानी को कोई पुरस्कार शेष रहा जो जनक दे सकते हैं? जनक के पास क्या रखा है? जिनको दिखाई पड़ता है जनक के पास कुछ है, वे अज्ञानी हैं, तभी दिखाई पड़ता है।
अष्टावक्र तो चला गया, लेकिन जनक के मन में एक आग की लपट छोड़ गया। अष्टावक्र का पीछा किया जनक ने। और जनक की जिज्ञासाओं से इस पृथ्वी पर एक श्रेष्ठतम ग्रंथ का जन्म हुआ, वह है अष्टावक्र-गीता। कृष्ण की गीता भी फीकी है। कारण है, क्योंकि कृष्ण तो एक अज्ञानी से बात कर रहे हैं, अर्जुन से। लेकिन अष्टावक्र ने जो बात की है, वह जनक से है। वह अर्जुन से बहुत ऊंची अवस्था का व्यक्ति है। तभी तो पंडितों की सभा छोड्कर अष्टावक्र के चरणों का दास हो गया। बात समझ में आ गई, एक क्षण में समझ में' आ गई। एक बिजली कौंधी और दृश्य दिखाई पड़ गया कि बात सच है। सब चमार इकट्ठे हैं। फिजूल इनके साथ समय गंवा रहा हूं। बोध जग गया।
चाहना
कथा :
शेख फरीद एक नदी के किनारे बैठा था और एक आदमी ने उससे आकर पूछा कि परमात्मा को कैसे खोजें ? फरीद ने उस आदमी की तरफ देखा । फरीद थोड़ा अजीब फकीर था । उसने कहा, मैं स्नान करने जा रहा हूं तू भी स्नान कर ले । या तो स्नान के बाद तुझे बता देंगे, अगर मौका लग गया तो स्नान में ही बता देंगे ।
वह आदमी थोड़ा डरा भी, स्नान में बता देंगे ! यहां तक तो बात समझ में आती है कि स्नान के बाद बता देंगे, स्नान कर लो, फिर जिज्ञासा करना, मगर स्नान में बता देंगे ! उसने सोचा कि फकीरों की बातें हैं, सधुक्कड़ी भाषा है, कुछ मतलब होगा । उतर पड़ा वह भी । फरीद तो मजबूत आदमी था । जैसे ही उसने नदी में डुबकी लगायी फरीद ने उसकी गर्दन पानी के भीतर पकड़ ली और छोड़े न । वह आदमी बड़ी ताकत लगाने लगा । फरीद से बहुत कमजोर था, लेकिन एक ऐसा वक्त आया कि उसने इतनी जोर से ताकत लगायी कि वह फरीद के फंदे के बाहर हो गया । बाहर निकल कर तो वह आगबबूला हो गया । उसने कहा -- हम आये ईश्वर को खोजने, आत्महत्या करने नहीं । तुम हमें मारे डालते हो !
फरीद ने कहा -- यह बात पीछे, एक सवाल पूछना है । जब पानी में मैंने तुझे डुबा दिया, तो कितनी वासनाएं तेरे मन में थीं ?
उसने कहा -- कितनी वासना ! एक ही वासना बची थी कि एक श्वास हवा किसी तरह मिल जाये । फिर तो वह भी खो गयी । फिर तो उसका भी होश न रहा । फिर तो मुझमें और मेरी श्वास को पाने की आकांक्षा में भेद ही न रहा । मैं ही वही आकांक्षा हो गया । उसी वक्त तो मैं तुम्हारे पंजे के बाहर निकल पाया ।
फरीद ने कहा बस यह मेरा उत्तर है । जिस दिन परमात्मा को इस भांति चाहेगा कि चाहने वाले में और चाह में भेद न रह जायेगा, उसी दिन मिलना हो जायेगा । अब तू जा ।
लंका में एक बौद्ध भिक्षु हुआ । उसके बड़े भक्त थे, हजारों भक्त थे । जब वह मरने को हुआ, आखिरी दिन उसने खबर भेज दी अपने सारे भक्तों को कि तुम आ जाओ, अब मैं जाने को हूं । काफी उम्र, नब्बे वर्ष का हो गया था । कोई बीस हजार उसके भक्त इकट्ठे हुए । और उसने खड़े होकर पूछा कि देखो, अब मैं जाने को हूं अब दुबारा मेरा-तुम्हारा मिलना न होगा, इसलिए अगर कोई मेरे साथ निर्वाण में जाना चाहता हो तो खड़ा हो जाए । लोग एक-दूसरे की तरफ देखने लगे । जो जिसको निर्वाण में भेजना चाहता था उसकी तरफ देखने लगा । लोग इशारा करने लगे कि चले जाओ । जो जिसको हटाना चाहता था, उससे कहने लगा : ' अब क्या बैठे देख रहे हो! भई हमें तो अभी दूसरी झंझटें हैं, अभी और काम हैं; मगर तुम क्या कर रहे हो! तुम चले जाओ!'
कोई उठा नहीं । सिर्फ एक आदमी ने हाथ उठाया । वह भी उठा नहीं, हाथ उठाया । तो उस बौद्ध भिक्षु ने पूछा कि मैंने कहा, उठ कर खड़े हो जाएं, हाथ उठाने को नहीं कहा ।
उसने कहा : 'इसी डर से तो मैं सिर्फ हाथ उठा रहा हूं । मैं सिर्फ यह पूछना चाहता हूं कि रास्ता क्या है स्वर्ग जाने का, मोक्ष जाने का या निर्वाण जाने का? रास्ता बता दें आप । क्योंकि अभी इसी वक्त जाने की मेरी तैयारी नहीं है । मगर रास्ता पूछ लेता हूं क्योंकि दुबारा आप मिलें न मिलें । रास्ता काम आएगा; जब जाना चाहूंगा, रास्ते का उपयोग कर लूंगा ।'
उस बौद्ध भिक्षु ने कहा कि रास्ता तो मैं आज कोई पचास साल से बता रहा हूं कोई चलता नहीं । इसलिए मैंने सोचा कि अब जाते वक्त अगर कोई जाने को राजी हो तो लेता जाऊं । अब भी कोई राजी नहीं है ।
तुम कहते हो : परमात्मा से मिलना है, प्यास है!
अभ्यास
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे बहुत परेशान थी । रोज पी कर चला आए । एक दिन सब समझा कर हार चुकी थी तो मधुशाला पहुंच गयी, सिर्फ डराने । मुल्ला भी घबराया, क्योंकि वह यहां कभी नहीं आयी थी । घर ही घर बात करती थी । आ गयी मधुशाला, आकर उसकी टेबल पर बैठ गई और कहा -- आज तो मैंने भी तय किया कि मैं भी पीना शुरू करती हूं । तुम तो रुकते नहीं, मैं भी शुरू करती हूं । मुल्ला थोड़ा घबराया भी कि यह क्या मामला हो रहा है ! एक ही पीने वाला घर में काफी है ।
अब उसको यह भी डर लगा कि कहीं यह भी पीने लगे तो जो बदतमीजी मैं इसके साथ करता रहा, वही बदतमीजी अब यह मेरे साथ करेगी । मगर अब कोई यह भी नहीं कह सकता कि मत पीओ, क्योंकि अब किस मुंह से कहे मत पीओ ! यही तो पत्नी समझाती रही ।
और इसके पहले कि वह कुछ कहे पत्नी ने अपनी गिलास में शराब डाल ली । पहला ही घूंट लिया कि हाथ से गिलास पटक दिया और उसने कहा -- अरे, यह तो जहर है ! थू-थू किया । मुल्ला ने कहा -- देखो ! और तुम समझती थी कि मैं मजे लूट रहा हूं ! हजार बार समझाया कि यह बड़ी कठिन चीज है । और तुम यही सोचती थी सदा कि मैं बड़े मजे लूट रहा हूं !
अभ्यास करो तो दुख सुख जैसा मालूम होने लगता है । चाह पैदा हो जाए तो दुख सुख हो जाता है ।
एक बार ऐसा हुआ कि एक गरीब दर्जी को लॉटरी मिल गई । हमेशा भरता रहता था लाटरी । हर महीने एक रुपया तो लॉटरी में लगाता ही था वह । ऐसा वर्षों से कर रहा था । वह उसकी आदत हो गई थी । उसमें कुछ चिंता की बात भी न थी । हर एक तारीख को एक रुपये की टिकट खरीद लेता था । ऐसा वर्षों से किया था । एक बार संयोग लग गया और मिल गई लाटरी, कोई दस लाख रुपये । जब लाटरी की खबर मिली और आदमी दस लाख रुपये लेकर आया तो उसने कहा, बस अब ठीक । उसने उसी वक्त दुकान में ताला लगाया, चाबी कुएं में फेंक दी । दस लाख रुपये लेकर वह तो कूद पड़ा संसार में । अब कौन दर्जी का काम करे ! साल भर में दस लाख तो गए ही, स्वास्थ्य भी गया । पुरानी गरीब की जिंदगी की व्यवस्था, वह भी सब अस्त-व्यस्त हो गई । पत्नी से भी संबंध छूट गया, बच्चे भी नाराज हो गए । और उसने तो वेश्यालयों में और शराबघरों में और जुआघरों में.. सोचा कि सुख ले रहा है । जब साल भर बाद आखिरी रुपया भी हाथ से चला गया तब उसे पता चला कि इस साल मैं जितना दुखी रहा, इतना तो पहले कभी भी न था । यह भी खूब रहा । ये दस लाख तो जैसे जन्मों-जन्मों के दुख उभार कर दे गए । ये दस लाख तो ऐसे अब दुख-स्वप्न हो गया ।
किसी तरह जाकर फिर चाबी वगैरह बनवाई । अपनी दुकान खोल कर बैठा । लेकिन पुरानी आदत, तो एक रुपया महीने की लॉटरी फिर लगाता रहा । संयोग की बात ! एक साल बाद फिर वह लॉटरी वाला आदमी खड़ा हो गया । उस दर्जी ने कहा, अरे नहीं, अब नहीं । अब क्षमा करो । क्या फिर मिल गई? उस आदमी ने कहा, चमत्कार तो हम को भी है, हम भी हैरान हैं कि फिर मिल गई । उसने कहा, मारे गए! अब रुक भी नहीं सकता वह, दस लाख फिर मिल गए । लेकिन कहा कि मारे गए । घबड़ा गया कि फिर मिल गई, अब फिर उसी दुख से गुजरना पड़ेगा । अब फिर वेश्यालय, फिर शराबघर, फिर जुआघर, फिर वही परेशानी । अब दिन सुख के कटने लगे थे, फिर से अपनी दुकान चलाने लगा था । अब यह फिर मुसीबत आ गई ।
आदमी अगर अज्ञानी हो तो जो भी आए वही मुसीबत है ।
मुल्ला नसरुद्दीन रास्ते पर चलता था तो पता नहीं, किसके लिए गालियां देता चलता था । और ऐसे कष्ट से चलता था कि जो भी उसे देखे, उसको भी दया आ जाए, पूछे मुल्ला बात क्या है और किसको कोस रहे हो? मुल्ला कहता है मेरे जूते जो हैं वे चुस्त हैं, और पैर ऐसा फंसा है कि निकाल भी पाऊंगा इससे, कि नहीं । और जूते काट रहे हैं । तो लोगों ने कहा -- यह भी कोई बात हुई, मत पहनो इन जूतों को, अलग कर दो इन जूतों को । तो मुल्ला कहता, एक ही तो मेरे पास राहत का उपाय है, उसको भी तुम छीनना चाहते हो? दिन भर का थका-मांदा, परेशान जब घर लौटूंगा, तो पत्नी ऐसी वाणी बोलती है कि जैसे उसने जहर में बुझा-बुझा कर दिन भर तैयार की है । बच्चे चीख-पुकार मचाते हैं, धन पास नहीं है, व्यवसाय सब असफल होता जा रहा है । घर रोटी भी आज मिलेगी कि नहीं, उसका भी कोई पक्का नहीं है । भूखा सोऊंगा कि खाकर सोऊंगा, उसका भी कोई पक्का नहीं है । कर्ज बढ़ता चला जा रहा है; कर्जदार सुबह-शाम द्वार पर खड़े रहते हैं, उनकी वजह से ही बाजार की तरफ निकल आता हूँ; कोई काम नहीं है बाजार में । तो जब रात थका-मांदा दिन भर का और इन जूतों से परेशान घर पहुंचता हूं, और जूता निकाल कर पटकता हूं, तो कहता हूं, हे भगवान, तेरा धन्यवाद । यह जूता निकालने से ऐसी राहत मिलती है । यह एक ही तो राहत है मेरे पास । यह भी तुम छीन लेना चाहते हो!
एक अभाव की राहत है, जो मिलती है । जब आप दुख के बाद, पीड़ा के बाद बाहर आते हैं, बीमारी के बाद स्वस्थ होते हैं, तब मिलती है । लेकिन वह कितनी देर टिकेगी? संसार है एक रोग ।
आपने खयाल न किया होगा, जब आप डाक्टर की तरफ जाते हैं सोचकर कि बड़ी बीमारी पकड़ गई है, और डाक्टर कहता है कुछ भी नहीं है, तो आपको अच्छा नहीं लगता। मन में थोड़ी—सी चोट लगती है; शक होता है कि शायद यह डाक्टर ठीक नहीं है। मुझ जैसे आदमी को और छोटी—मोटी बीमारी या कुछ भी नहीं! यह उलटा मालूम पड़ता है, लेकिन भीतर यह लगता है कि बेकार आना जाना हुआ।
तो जो बेईमान डाक्टर हैं या कुशल, वे आपको देखकर बड़ा गंभीर चेहरा बना लेंगे। उससे आपका चित्त प्रसन्न होता है। और जब आपका हाथ हाथ में लेते हैं, तो ऐसा लगता है कि बहुत गंभीर स्थिति है। आपको कोई बीमारी न भी हो, तो भी वे बीमारी को बढ़ा—चढ़ाकर खड़ा करते हैं। उससे मरीज प्रसन्न होता है।
किसी मरीज को कह दें कि आपको मानसिक खयाल है, बीमारी है नहीं। वह आपका दुश्मन हो जाता है।
कोई यह बात मानने को राजी नहीं है कि हम दुख को भी पकड़ते हैं, लेकिन हम पकड़ते हैं। दुख को भी हम बड़ा करते हैं। फिर वह दुख बड़ा होकर हमारे सिर पर पत्थर की तरह, छाती पर पत्थर की तरह सवार हो जाता है। फिर हम उसको ढोते हैं।
मौत सामने खड़ी है, इसके दुख को भोगो। न भजन—कीर्तन करके अपने को समझाओ, न गीता पढ़कर अपने मन को यहां—वहा लगाओ। दुख सामने खड़ा है, दुख को सीधा भोगो। दुख को ही तुम्हारा ध्यान बन जाने दो।
नदी में बाढ़ आई हुई थी। वर्षा के दिन। पहली—पहली बाढ़। मुल्ला नसरुद्दीन और कुछ लोग नदी के किनारे खड़े बाढ़ को बढ़ता देख रहे थे, तभी एक आदमी चिल्लाया. अरे देखते हो, कंबल बहा जा रहा है!
मुल्ला को तो लालच आ गया। आव देखी न ताव, कूद पड़ा। ज्यादा दूर भी नहीं था, एक पांच—सात हाथ के ही फासले पर था। कंबल को पकड़ लिया। फिर चिल्लाया, बचाओ! तो लोगों ने किनारे से कहा. इसमें बचाना क्या है? अगर कंबल नहीं खींच सकते हो तो छोड़ दो। उसने कहा अब मुश्किल है मामला। यह भालू है, कंबल नहीं है। अब इसने भी मुझे पकड़ लिया।
पहले तुम पकड़ते हो। मगर हमेशा पहले तुम पकड़ते हो, खयाल रखना। फिर कभी—कभी भालू मिल जाते हैं। दिख रही होगी पीठ कंबल जैसी सुंदर। जिंदा था भालू वह बहा जा रहा था। अब मुश्किल पड़ी। अब चिल्ला रहे हैं कि बचाओ।
तुम आदतों को पहले पकड़ते हो, फिर धीरे— धीरे उनका अभ्यास तुम्हीं करते हो। और बहुत अभ्यास के बाद वे तुम्हें पकड़ लेती हैं। फिर तुम पूछते हो, कैसे बचें?
पकड़ो मत आदतों को! उपयोग करो। मस्तिष्क का उपयोग करो। बुद्धि का उपयोग करो। तर्क का उपयोग करो। गणित का उपयोग करो। लेकिन बस उपयोग कर दिया और सरका कर रख लिया।
एक आदमी निरंतर रोता था जा कर मस्जिद में कि हे प्रभु, मुझे इतना दुःखी क्यों बनाया? आखिर मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है? यह अन्याय हो रहा है। और मैं तो सुनता थाः तू बड़ा न्यायी है, रहीम है, रहमान है, कृपालु है, महाकरुणावान है! मगर सब धोखे की बातें हैं। मुझे इतना दुःख क्यों दिया? सब मजे में हैं। मगर सब धोखे की बातें हैं। मुझे इतना दुःख क्यों दिया? सब मजे में हैं। सब आनंद कर रहे हैं। मैं ही दुःख में पड़ा सड़ा जा रहा हूं। कुछ कृपा कर! अगर सुख न दे सके तो कम से कम इतना तो कर कि किसी और का दुःख मुझे दे दे, यह मेरा दुःख किसी और को दे दो। इतना तो कर!
उसने एक रात सपना देखा कि कोई आवाज आकाश से कह रही है कि सब लोग अपने-अपने दुःख लेकर मस्जिद पहुंच जाएं। वह तो बड़ी जल्दी तैयार हो गया। उसने जल्दी से अपना दुःख बांधा, पोटली उठाई, भागा मस्जिद की तरफ। खुद भी भागा, उसने देखा, बड़ा हैरान हुआ कि पूरे गांव के लोग अपनी-अपनी पोटलियां लिए जा रहे हैं। वह तो सोचता था जिनके जीवन में कोई भी दुःख नहीं है...राजा भी भागा जा रहा है! वजीर भी भागे जा रहे हैं। नेता भी भागे जा रहे हैं, पंडित-पुरोहित भी भागे जा रहे हैं! उसने मौलवी को भी देखा, वह भी अपना गट्ठर लिए चला जा रहा है। सबके गट्ठर हैं। और एक और बात हैरानी की मालूम हुईः किसी के पास छोटी-मोटी पोटली नहीं। क्योंकि वह सोचने लगा कि किससे बदलना जब बदलने का मौका आ जाए। मगर सब बड़ी-बड़ी पोटलियां लिए हुए हैं। ये तो पोटलियां कभी दिखाई भी नहीं पड़ी थीं उसको। अभिनय चलता है। मस्जिद में पहुंच गए। बड़ा उत्तेजित ! सारे लोग उत्तेजित हैं, क्योंकि कुछ होने वाला है। और फिर एक आवाज हुई कि सब लोग मस्जिद की खूंटियों पर अपनी-अपनी पोटलियां टांग दें। सबने जल्दी से टांग दीं। सभी छुटकारा पाना चाहते हैं। और फिर एक आवाज हुई कि अब जिसको जिसकी पोटली चुननी हो चुन लें, बदल लें। और वह आदमी भागा और सारे लोग भागे। मगर चकित होने की बात तो यह थी कि उस आदमी ने भागकर अपनी पोटली फिर से उठा ली, कि कोई दूसरा न उठा ले। और यही हालत सबकी थी--सबने अपनी-अपनी उठा ली।
वह बड़ा हैरान हुआ, लेकिन अब बात उसके खयाल में आ गई। उसने अपनी क्यों उठाई? सोचा कि अपने दुःख कम से कम परिचित तो हैं; दूसरे का बड़ा पोटला है और पता नहीं, इसके भीतर क्या हो! अपने दुःख कम से कम जाने-माने तो हैं, उनके साथ जीते तो रहे हैं जिंदगी भर, धीरे-धीरे अभ्यस्त भी हो गए हैं। और अब धीरे-धीरे उतना उनसे दुःख भी नहीं होता।
कांटा गड़ता ही रहा हो, गड़ता ही रहा हो, गड़ता रहा हो तो धीरे-धीरे चमड़ी भी मजबूत हो जाती है; उस जगह कांटा गड़ते-गड़ते, फिर चमड़ी में उत्ता दर्द भी नहीं होता। सिरदर्द जिंदगीभर होता ही रहा तो धीरे-धीरे आदमी भूल ही जाता है; सिरदर्द और सिर में कोई फर्क ही नहीं रह जाता। एक अभ्यास हो जाता है।
और तब उसे समझ में आया कि सबने अपने-अपने उठा लिए; सब डर गए हैं कि कहीं दूसरे का न उठाना पड़े; पता नहीं दूसरे की अपरिचित पोटली, भीतर कौन-से सांप-बिच्छू समाए हों! प्रत्येक ने अपनी-अपनी पोटलियां उठा लीं और सब बड़े खुश हैं कि अपनी पोटली वापिस मिल गई। और सब अपने घर की तरफ भागे जा रहे हैं। सुबह जब उसकी नींद खुली, तब उसे सच्चाई समझ में आई : ऐसा ही है। यहां सब दुःखी हैं। मगर एक अभिनय चल रहा है।
झेन फकीर -- अगर बुद्ध का नाम भी स्मरण आ जाए तो कुल्ला करके मुंह साफ कर लेना। (ज्ञान मार्ग)
आकांक्षा
कथा :
टेलिफोन की घंटी बजी । रिसीवर उठाया तो दूसरी ओर से आवाज आयी : 'बहन कैसी तबीयत है ?' बेहद परेशान हूं-जवाब मिला । मेरे सिर में दर्द हो रहा है । टांगों और कमर में तीव्र पीड़ा है । घर में सभी चीजें बिखरी पड़ी हैं । बच्चों ने मुझे पागल बना दिया है ।'
'सुनो'-दूसरी ओर से आवाज आयी -- 'तुम लेट जाओ, मैं तुम्हारे पास आ रही हूं । दोपहर का खाना तैयार कर दूंगी । घर साफ कर दूंगी और बच्चों को नहला भी दूंगी । तुम थोड़ी देर आराम करना । पर महेश आज कहा है ?'
'महेश ? कौन महेश ? ' -- जवाब मिला ।
'तुम्हारा पति, महेश ।'
'मेरे पति का नाम महेश नहीं ।'
पहली महिला ने लंबी सांस ली और बोली. 'फिर नंबर गलत मिल गया । क्षमा करें ।' काफी देर खामोशी रही । फिर दूसरी महिला ने उदास स्वर में कहा : 'तो तुम अब न आओगी ?'
आदमी जो नहीं हो सकता, उसकी भी आकांक्षा करता है ।
एक आदमी था, उसका जहांज डूब गया । वह बड़ा आर्किटेक्ट था । वह एक जंगली टापू पर लग गया । वहाँ कोई भी न था । यहूदी था वह आर्किटेक्ट । वर्षों बीत गये । कुछ काम तो था नहीं वहाँ । लकड़ियां खूब उपलब्ध थीं, पत्थर के खूब ढेर लगे थे -- तो उसने कई मकान बना डाले । बैठे-बैठे करता क्या ? वही कला जानता था । सड़क बना ली ।
कोई बीस वर्ष बाद कोई जहाज किनारे लगा । उस आदमी को देख कर उन्होंने कहा कि तुम आ जाओ, हम तुम्हें ले चलें वापिस । उसने कहा, इसके पहले कि आप मुझे ले चलें, मैं सभी को निमंत्रित करता हूं कि मैंने जो बीस वर्षों में बनाया उसे देख तो लें ! उसे देखने फिर कभी कोई नहीं आयेगा । वे सब देखने गये ।
वे बड़े चकित हुए । उसने एक मंदिर बनाया -- सिनागॉग । उसने कहा कि यह मंदिर है जिसमें मैं रोज प्रार्थना करता हूं । और सामने एक मंदिर और था । तो उन यात्रियों ने पूछा कि यह तो ठीक है; तुम अकेले ही हो इस द्वीप पर; तुमने एक मंदिर बनाया; पूजा करते हो । यह दूसरा मंदिर क्या है ? उसने कहा : 'यह वह मंदिर है जिसमें मैं नहीं जाता ।’
अब अकेला मंदिर जिसमें हम जाते हैं, उसमें तो कुछ मजा ही नहीं । मस्जिद भी तो चाहिए न, जिसमें तुम नहीं जाते ! गिरजा भी तो चाहिए, जिसमें तुम नहीं जाते ! उसने वह मंदिर भी बना लिया है, जिसमें नहीं जाता है ! काम पूरा कर लिया है । जाने के लिए भी मंदिर बना लिया है; न जाने के लिए भी मंदिर बना लिया है ।
न जाने के लिए मंदिर ! लगेगा व्यर्थ तुमने श्रम किया, लेकिन तुम अपने मन में तलाश करना । तुम वे भी योजनाएं करते हो जो तुम्हें करना है, तुम उनकी भी योजनाएं करते हो जो तुम्हें नहीं करना है । तुम नहीं करने की भी योजना करते हो । तुम उन चीजों से भी जुड़े हो जो तुम्हारे पास हैं । तुम उनसे भी जुड़े हो जो तुम्हारे पास नहीं हैं । दूसरे के पास हैं जो चीजें, उनसे भी तुम जुड़े हो । पड़ोसी के गैरेज में जो कार रखी है उससे भी तुम जुड़े हो । उससे तुम्हारा कुछ लेना-देना नहीं है; उससे भी तुम जुड़े हो । उससे भी तुमने नाता बना लिया है । और अप्राप्त के कारण भी तुम बड़े सुख-दुख पाते हो ।
जो अपने को बचाता है, वह खोता है और जो खोता है, वह सदा के लिए बचा रहता है।
अकबर एक दिन तानसेन को कहा है, तुम्हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा खयाल उठता है कि तुम जैसा बजानेवाला शायद ही पृथ्वी पर हो! आगे भी कभी होगा, यह भी भरोसा नहीं आता। क्योंकि इससे ऊंचाई और क्या हो सकेगी, इसकी धारणा भी नहीं बनती है। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्हें विदा किया था, सोने गया था, तो मुझे खयाल आया, हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा हो, कोई तुम्हारा गुरु हो। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं कि तुम्हारा कोई गुरु है? तुमने किसी से सीखा है?
तो तानसेन ने कहा, मैं कुछ भी नहीं हूं गुरु के सामने; जिससे सीखा है, उसके चरणों की धूल भी नहीं हूं। इसलिए वह खयाल मन से छोड़ दें। शिखर! भूमि पर भी नहीं हूं। लेकिन आपने मुझे ही जाना है, इसलिए आपको शिखर मालूम पड़ता हूं। ऊंट जब पहाड़ के करीब आता है, तब उसे पता चलता है, अन्यथा वह पहाड़ होता ही है। पर, तानसेन ने कहा कि मैं गुरु के चरणों में बैठा हूं; मैं कुछ भी नहीं हूं। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्यता भी हो जाए, तो समझूंगा बहुत कुछ पा लिया।
तो अकबर ने कहा, तुम्हारे गुरु जीवित हों तो तत्क्षण, अभी और आज उन्हें ले आओ, मैं सुनना चाहूंगा। पर तानसेन ने कहा, यही कठिनाई है। जीवित वे हैं, लेकिन उन्हें लाया नहीं जा सकता।
अकबर ने कहा, जो भी भेंट करनी हो, तैयारी है। जो भी! जो भी इच्छा हो, देंगे। तुम जो कहो, वही देंगे। तानसेन ने कहा, वही कठिनाई है, क्योंकि उन्हें कुछ लेने को राजी नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह कुछ लेने का प्रश्न ही नहीं है। अकबर ने कहा, कुछ लेने का प्रश्न नहीं है! तो क्या उपाय किया जाए? तानसेन ने कहा, कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़े। तो उन्होंने कहा, मैं अभी चलने को तैयार हूं। तानसेन ने कहा, अभी चलने से तो कोई सार नहीं है। क्योंकि कहने से वे बजाएंगे, ऐसा नहीं है। जब वे बजाते हैं, तब कोई सुन ले, बात और है। तो मैं पता लगाता हूं कि वे कब बजाते हैं। तब हम चलेंगे।
पता चला--हरिदास फकीर उसके गुरु थे, यमुना के किनारे रहते थे--पता चला, रात तीन बजे उठकर वे बजाते हैं, नाचते हैं। तो शायद ही दुनिया के किसी अकबर की हैसियत के सम्राट ने तीन बजे रात चोरी से किसी संगीतज्ञ को सुना हो। अकबर और तानसेन चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठे रहे। पूरे समय अकबर की आंखों से आंसू बहते रहे। एक शब्द नहीं बोला।
संगीत बंद हुआ। वापस होने लगे। सुबह फूटने लगी। राह में भी तानसेन से अकबर बोला नहीं। महल के द्वार पर तानसेन से इतना ही कहा, अब तक सोचता था कि तुम जैसा कोई भी नहीं बजा सकता। अब सोचता हूं कि तुम हो कहां! लेकिन क्या बात है? तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं बजा सकते हो?
तानसेन ने कहा, बात तो बहुत साफ है। मैं कुछ पाने के लिए बजाता हूं, और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है, इसलिए बजाते हैं। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्य है, जो मुझे मिले, उसमें मेरे प्राण हैं। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो सकते। बजाने में मैं सदा अधूरा हूं, अंश हूं। अगर बिना बजाए भी मुझे वह मिल जाए जो बजाने से मिलता है, तो बजाने को फेंककर उसे पा लूंगा। बजाना मेरे लिए साधन है, साध्य नहीं है। साध्य कहीं और है--भविष्य में, धन में, यश में, प्रतिष्ठा में--साध्य कहीं और है, संगीत सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्मा नहीं बन पाती; साध्य में ही आत्मा अटकी होती है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साधन को छोड़ दूं अभी। लेकिन नहीं मिलता साधन के बिना, इसलिए साधन को खींचता हूं। लेकिन दृष्टि और प्राण और आकांक्षा और सब घूमता है साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे हैं, संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी नहीं है, जिसे पाने को वे बजा रहे हैं। बल्कि पीछे कुछ है, जिससे उनका संगीत फूट रहा है और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है, वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्य, कोई परमात्मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है, ओवर फ्लोइंग है।
अकबर बार-बार पूछने लगा, किसलिए? किसलिए?
तानसेन ने कहा, नदियां किसलिए बह रही हैं? फूल किसलिए खिल रहे हैं? सूर्य किसलिए निकल रहा है?
किसलिए, मनुष्य की बुद्धि ने पैदा किया है। सारा जगत over-flowing है, आदमी को छोड़कर। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है, सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहा है, खिलने में ही आनंद है। सूर्य निकल रहा है, निकलने में ही आनंद है। हवाएं बह रही हैं, बहने में ही आनंद है। आकाश है, होने में ही आनंद है। आनंद आगे नहीं, अभी है, यहीं है।
मरने के बहुत पहले बहुत लोग मर जाते हैं।
किसी एक महानगरी के एक बड़े राजपथ पर एक भिखारी भीख मांगता रहता था। सुबह जब वह आता, तब वह कुछ अपने बगल में छिपाए रहता। दोपहर तक नहीं निकालता था। एक तख्ती छिपाए रखता था अपने कपड़ों में। दोपहर तक मांगता रहता लोगों से चिल्ला-चिल्लाकर; फिर दोपहर तक थक जाता। तो वह तख्ती निकालकर अपने सामने रखकर पीछे चुप बैठ जाता। तख्ती पर लिखा होता था, आई एम डेफ एंड डंब, मैं गूंगा और बहरा हूं। थक जाता दोपहर तक। फिर चिल्लाने की ताकत न रहती, तो गूंगा और बहरा हो जाता। शराब पीने की उसे आदत थी।
सभी भिखारियों को होती है। सिर्फ सम्राट बच सकते हैं। और अगर सम्राट भी पीते हों, तो जानना कि भिखारी हैं। और अगर भिखारी भी न पीते हों, तो जानना कि सम्राट हैं। असल में जो आदमी दुखी है, वह अपने को बेहोश करने से नहीं बच सकता। और दुखी कौन होता है इस जगत में? दुखी वही होता है, जिसकी आकांक्षाएं बहुत हैं। आकांक्षाएं तृप्त नहीं होतीं; दुख आता है।
भिखारी की बड़ी आकांक्षाएं हैं। दोपहर तक बहुत मांगता। रोज इरादे करके आता था कि आज करोड़ मांग लूंगा, कि अरब रुपए मांग लूंगा। कि आज तो कोई सम्राट निकलेगा, और सोने-चांदी की बरसा हो जाएगी। लेकिन कुछ न होता, वही तांबे के ठीकरे दो-चार गिरते। परेशान हो जाता दोपहर तक; शराब पीना शुरू कर देता। सांझ होते-होते, सूरज ढलते-ढलते तक, वह इतना बेहोश होने लगता कि आखिरी होश में, आखिरी वक्त वह अपनी तख्ती उलटी करके रख देता।
रिवर्सिबल साइनबोर्ड था वह! उस पर दोनों तरफ लिखा हुआ था। दूसरी तरफ लिखा हुआ था, आई एम पैरालाइज्ड, मुझे लकवा लग गया है। बेहोश होकर गिर जाता। सुबह मांगता रहता; दोपहर गूंगा-बहरा हो जाता; सांझ नशे में डूब जाता। आखिरी काम वह इतना कर देता नशे में गिरने के पहले, तख्ती उलटकर रख देता।
करीब-करीब जिंदगी ऐसी ही बीतती है। बचपन बड़ी आशाओं से भरा हुआ है। बड़ी आशाओं से भरा हुआ है, सब मिल जाएगा। बड़े कल्पना के फूल और सपनों के गीत। और फिर जवानी आती है। और तब एक-एक चीज डिसइलूजन होने लगती है, एक-एक चीज का भ्रम टूटने लगता है। बुढ़ापा आने के पहले-पहले आदमी की सारी इंद्रियां गूंगी और बहरी हो जाती हैं। फिर बेहोशी और तंद्रा पकड़नी शुरू कर देती है। मरने के पहले अधिकतम लोग पैरालाइज्ड हो जाते हैं, पैरालाइज्ड सब अर्थों में।
कृतज्ञता
कथा :
एक सूफी फकीर रोज कहता था । हे प्रभु, धन्यवाद ! मेरी जो जरूरत होती है तू सदा पूरी कर देता है, तेरा बड़ा अनुगृहीत हूं ! शिष्यों को जंचती नहीं थी यह बात, क्योंकि कई बार अनुगृहीत होने का कोई कारण ही न था । उनको लगता था, पुरानी आदत हो गयी है की, कहे चला जाता है ।
एक दिन तो ऐसा हुआ कि शिष्यों से बर्दाश्त न हुआ । तीन दिन से भूखे थे । हज की यात्रा पर जा रहे थे । राह में कोई भोजन देने वाला न मिला । जिन गांवों में गये, वे दूसरे संप्रदाय के गांव थे । उन्होंने इंकार कर दिया, ठहरने भी न दिया । भूखे-प्यासे तीसरे दिन एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं । और सुबह की जब उसने नमाज पढ़ी, फकीर ने, तो उसने कहा -- हे प्रभु ! उसी प्रफुल्लता से कहा -- धन्यभाग, हमारी जो भी जरूरत होती है, तू सदा पूरी कर देता है ।
फिर शिष्यों से न रहा गया । उन्होंने कहा : रुको, हर चीज की सीमा होती है । तीन दिन से भूखे मर रहे हैं; पानी तक मुश्किल से मिलता है । छप्पर मिला नहीं सोने को; धूप में मर रहे हैं; गर्मी भारी है । रात जंगल में सोना पड़ता है, जंगली जानवरों का डर है । अब किस बात का धन्यवाद दे रहे हो ? तीन दिन से भिखमंगे की तरह भटक रहे हैं और तुम्हें धन्यवाद देने की सूझी है ! और तुम कह रहे हो -- जो मेरी जरूरत होती है, सदा दे देता है !
वह फकीर हंसने लगा । उसने कहा -- पागलों, तीन दिन से मेरी यही जरूरत थी कि भूखा रहूं पानी न मिले, छप्पर न मिले । जो मेरी जरूरत है, वह सदा पूरी कर देता है । जो वह पूरी करता है, वही मेरी जरूरत होनी चाहिए । उसमें, दोनों में, भेद ही नहीं है ।
अगर तीन दिन उसने भूखा रखा तो मेरी जरूरत न होती तो क्यों रखता ? कैसे रखता ? जो मिला है उसमें भी आनंदित है; जो नहीं मिला है उसमें भी आनंदित है । दोनों में आनंदित है ।
भार
कथा :
झेन फकीर रिंझाई अपने गुरु के पास पहुंचा तो गुरु ने जो उससे पहली बात पूछी, उसने पूछा : तू किस गांव से आता है ? तो रिंझाई ने अपने गांव का नाम दिया कि फला-फलां गांव से आता हूं । उसके गुरु ने पूछा : वहां चावल के दाम कितने हैं ?
रिंझाई हंसा और उसने कहा -- जिसे मैं पीछे छोड़ आया, पीछे छोड़ आया, और जो अभी आया नहीं, आया नहीं; मुझसे अभी की बात करो । गुरु हंसने लगा । उसने कहा -- तूने ठीक किया । अगर तू चावल के दाम बता देता, निकाल तुझे आश्रम के बाहर कर देता । ऐसे आदमी की क्या जरूरत ? जिस गांव को छोड़ आया, वहा चावल के क्या दाम हैं, उनकी याद रखे हुए है ! बात गयी सो गयी, हुई सो हुई ।
सत्य कुछ बाहरी नही है जिसे खोजा जाना है, ये कुछ अंदरूनी है जिसका एहसास किया जाना है ।
भोग
कथा :
रामकृष्ण के पास एक आदमी आया और उसने उनके सामने हजारों रुपये की ढेरी लगा दी और कहा - यह आप स्वीकार कर लें । रामकृष्ण ने कहा : बड़ी मुश्किल है । मैं स्वीकार न कर सकुंगा । तू ऐसा कर, इन्हें गंगा में फेंक आ । उस आदमी ने कहा -- आप महात्यागी ! रामकृष्ण ने कहा -- यह झूठ मत बोल । त्यागी तू है, भोगी हम हैं । वह आदमी बोला -- हम समझे नहीं । आप पहेली बुझा रहे हैं ! रामकृष्ण ने कहा -- हमने संसार छोड़ा और परमात्मा पाया । तुमने परमात्मा छोड़ा और संसार पाया । इसमें भोगी कौन है ? इसमें होशियार कौन है ? हमने शाश्वत भोगा; तुम क्षणभंगुर में मरे जा रहे हो । भोग कहां रहे हो ? फांसी लगी है । जरा मेरी शक्ल देख, अपनी शक्ल देख । भोगी हम, त्यागी तुम ! परमात्मा को छोड़ बैठे हो, इससे बड़ा त्यागी और कोई मिलेगा संसार में ? सबको जिसने छोड़ दिया और क्षुद्र को पकड़ लिया !
नहीं, ज्ञानी भोग की कला जानता है । जो है और जो नहीं है... ।
मजा
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन का एक बगीचा है । उसमें सेव और नासपतियां और अमरूद इतने लगते हैं कि वह बेच भी नहीं पाता । क्योंकि गांव में उतने खरीददार भी नहीं हैं । सड़ जाते हैं वृक्षों पर, या खुद मोहल्ले-पड़ोस में मुफ्त बांट देता है । एक दिन मैंने देखा कि पांच-सात बच्चे उसके बगीचे में घुस गये हैं और वह उनके पीछे गाली देता हुआ और बंदूक लिये दौड़ रहा है । मैंने कहा कि नसरुद्दीन, तुम वैसे ही इतने फलों का कुछ उपयोग नहीं कर पाते, न कोई खरीददार है, न तुम्हें जरूरत है बेचने की, तुम बांटते हो; इन बच्चों ने अगर दो-चार-दस फल तोड़ भी लिये तो ऐसी क्या परेशानी ? बंदूक ले कर कहाँ दौड़े जा रहे हो ? उसने कहा, अगर बंदूक ले कर न दौड़ूंगा तो ये दुबारा फिर आएंगे ही नहीं । यह तो निमंत्रण है । बंदूक ले कर दौड़ता हूं; तुम कल देखना ।
आज पांच-सात हैं, कल चौदह-पंद्रह होंगे । कल तो मैं हवाई फायर भी करूंगा । फिर ये पूरे स्कूल को ले आएंगे । छोटा बच्चा भी, जहाँ नहीं जाना चाहिए, वहाँ जाने में आतुर हो जाता है; जो नहीं करना चाहिए उसे करने में उत्सुक हो जाता है ।
भटकने में मजा है अहंकार का ।
सूत्र
कथा :
एक सम्राट ने अपने सारे बुद्धिमानों को बुलाया और उनसे कहा - मैं कुछ ऐसे सूत्र चाहता हूं, जो छोटा हो, बडे शास्त्र नहीं चाहिए, मुझे फुर्सत भी नहीं बडे शास्त्र पढने की । वह ऐसा सूत्र हो जो एक वचन में पूरा हो जाये और जो हर घडी में काम आये । दुख हो या सुख, जीत हो या हार, जीवन हो या मृत्यु सब में काम आये, तो तुम लोग ऐसा सूत्र खोज लाओ । उन बुद्धिमानों ने बडी मेहनत की, बडा विवाद किया कुछ निष्कर्ष नहीं हो सका । वे आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा -- हम बडी मुश्किल में पडे हैं बड़ा विवाद है, संघर्ष है , कोई निष्कर्ष नहीं हो पाया, हमने सुना हैं एक सूफी फकीर गांव के बाहर ठहरा है वह प्रज्ञा को उपलब्ध संबोधी को उपलब्ध व्यक्ति है, क्यों न हम उसी के पास चलें ? वे लोग उस सुफी फकीर के पास पहुंचे । उसने एक अंगुठी पहन रखी थी अपनी अंगुली में वह निकालकर सम्राट को दे दी और कहा -- इसे पहन लो । इस पत्थर के नीचे एक छोटा सा कागज रखा है, उसमें सूत्र लिखा है, वह मेरे गुरू ने मुझे दिया था, मुझे तो जरूरत भी न पडी इसलिए मैंने अभी तक खोलकर देखा भी नहीं । उन्होंने एक शर्त रखी थी कि जब कुछ उपाय न रह जाये, सब तरफ से निरूपाय हो जाओ, तब इसे खोलकर पढना, ऐसी कोई घडी न आयी उनकी बडी कृपा है इसलिए मैंने इसे खोलकर पढा नहीं, लेकिन इसमें जरूर कुछ राज होगा आप रख लो । लेकिन शर्त याद रखना इसका वचन दे दो कि जब कोई उपाय न रह जायेगा सब तरफ से निरूपाय असहाय हो जाओगे तभी अंतिम घडी में इसे खोलना ।
क्योंकि यह सूत्र बडा बहुमूल्य है अगर इसे साधारणतः खोला गया तो अर्थहीन होगा । सम्राट ने अंगूठी पहन ली, वर्षों बीत गये, कई बार जिज्ञासा भी हुई फिर सोचा कि कही खराब न हो जाए, फिर काफी वर्षों बाद एक युद्ध हुआ जिसमें सम्राट हार गया, और दुश्मन जीत गया । उसके राज्य को हडप लिया । वह सम्राट एक घोडे पर सवार होकर भागा अपनी जान बचाने के लिए । राज्य तो गया, संगी-साथी, दोस्त, परिवार सब छुट गये, दो-चार सैनिक और रक्षक उसके साथ थे वे भी धीरे-धीरे हट गये क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं था तो रक्षा करने का भी कोई सवाल न था । दुश्मन उस सम्राट का पीछा कर रहा था, तो सम्राट एक पहाडी घाटी से होकर भागा जा रहा था । उसके पीछे घोडों की आवाजें आ रही थी टापें सुनाई दे रही थीं । प्राण संकट में थे, अचानक उसने पाया कि रास्ता समाप्त हो गया, आगे तो भयंकर गड्ढा है वह लौट भी नही सकता था, एक पल के लिए सम्राट स्तब्ध खडा रह गया कि क्या करें, फिर अचानक याद आयी, खोली अंगुठी पत्थर हटाया निकाला कागज उसमें एक छोटा सा वचन लिखा था -- यह भी बीत जायेगा । सुत्र पढते ही उस सम्राट के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी उसके चेहरे पर एक बात का खयाल आया -- सब तो बीत गया, मैं सम्राट न रहा, मेरा साम्राज्य गया, सुख बीत गया, जब सुख बीत जाता है तो दुख भी स्थिर नहीं हो सकता । शायद सूत्र ठीक कहता है, अब करने को कुछ भी नहीं है । लेकिन सूत्र ने उसके भीतर कोई सोया तार छेड दिया । कोई साज छेड दिया । यह भी बीत जायेगा -- ऐसा बोध होते ही जैसे सपना टूट गया । अब वह व्यग्र नहीं, बैचेन नहीं, घबराया हुआ नहीं था । वह बैठ गया । संयोग की बात थी, थोडी देर तक तो घोडे की टाप सुनायी देती रहीं फिर टाप बंद हो गयी, शायद सैनिक किसी दूसरे रास्ते पर मुड गये । घना जंगल और बिहड पहाड, उन्हें पता नहीं चला कि सम्राट किस तरफ गया है । धीरे-धीरे घोड़ों की टाप दूर हो गयी, अंगुठी उसने वापस पहन ली । कुछ दिनों बार दोबारा उसने अपने मित्रों को वापस इकठ्ठा कर लिया, फिर उसने वापस अपने दुश्मन पर हमला किया, पुनः जीत हासिल की फिर अपने सिंहासन पर बैठ गया । जब सम्राट अपने सिंहासन पर बैठा तो बडा आनंदित हो रहा था । तभी उसे फिर पुनः उस अंगुठी की याद आयी उसने अंगुठी खोली कागज को पढा फिर मुस्कुराया दोबारा सारा आनन्द विजयी का उल्लास, विजय का दंभ, सब विदा हो गया । उसके वजीरों ने पूछा -- आप बडे प्रसन्न् थे अब एकदम शांत हो गये क्या हुआ ? सम्राट ने कहा -- जब सभी बीत जायेगा तो इस संसार में न तो दुखी होने को कुछ हैं और न ही सुखी होने को कुछ है ।
जो चीज तुम्हें लगती हैं कि बीत जायेगी उसे याद रखना, अगर यह सूत्र पकड में आ जाये, तो और क्या चाहिए ? तुम्हारी पकड ढीली होने लगेगी । तुम धीरे-धीरे अपने को उन सब चीजों से दूर पाने लगोगे जो चीजें बीत जायेगी ।
क्या अकडना, कैसा गर्व, किस बात के लिए इठलाना, सब बीत जायेगा । यह जवानी बीत जायेगी ।
याद बन-बन के कहानी लौटी, सांस हो-हो के विरानी लौटी ।
लौटे सब गम जो दिये दुनिया ने, मगर न जाकर जवानी लौटी ।
यह सब बीत जायेगा । यह जवानी, यह दो दिन की इठलाहट, यह दो दिन के लिए तितलियों जैसे पंख यह सब बीत जायेंगे । यह दो दिन की चहल-पहल फिर गहरा सन्नाटा, फिर मरघट की शान्ति ।
आस्था
कथा :
एक नाव डूबी-डूबी हो रही थी और मुल्ला नसरुद्दीन और उसका मित्र दोनों कंप रहे हैं । नसरुद्दीन का मित्र घुटने टेक कर बैठ गया, नमाज पढ़ने लगा । उसने कहा, 'हे अल्लाह, हे परम पिता, अगर तूने मुझे बचा लिया तो मैं अब कभी भी शराब न पीऊंगा । अगर तूने मुझे आज बचा लिया तो मैं कभी धूम्रपान न करूंगा ।' वह बड़े त्याग करने लगा । आखिर में वह यह कहने ही जा रहा था कि अगर तूने मुझे बचा लिया तो मैं संन्यासी हो जाऊंगा, फकीर हो जाऊंगा-तभी मुल्ला बोला, 'ठहर-ठहर ! रुक ! इतनी जल्दी मत कर, किनारा दिखाई पड़ रहा है ।' और वह आदमी उठ कर खड़ा हो गया और भूल गया सब बकवास ।
जब किनारा ही दिखाई पड़ रहा है तो फिर कौन फिक्र करता है !
मुल्ला एक बार चढ़ रहा था वृक्ष पर, खजूर लगे थे । लंबा वृक्ष । पैर खिसके, तो कहने लगा, 'हे प्रभु अगर आज वृक्ष तक पहुंचा दो, खजूर तोड़ लूं तो पूरा नगद एक रुपया चढ़ाऊंगा । पक्का मानो । हालांकि अतीत में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया कि तुम भरोसा करो, मगर इस बार करो ।' चढ़ गया । जब खजूर के बिलकुल पास पहुंचने लगा, तो उसने सोचा -- यह तो तुम भी मानोगे कि इतने से खजूर के लिए एक रुपया ज्यादा है । जब खजूर पर हाथ ही रख दिया तो उसने कहा कि चढ़े तो हम और पैसा तुम्हें चढ़ायें ! इसी बीच पैर खिसका और धड़ाम से जमीन पर गिरा । खजूर भी छूट गये । नीचे गिरा, जल्दी कपड़े झाड कर ऊपर देख कर बोला, 'यह भी क्या बात हुई । अरे जरा मजाक भी नहीं समझे ! अगर आज गिराया न होता तो एक नगद कलदार चढ़ाते ।'
हमारा आस्तिक मंदिर में जाकर फूल तो चढ़ा देता है, लेकिन फूल में कोई आनंद नहीं ले पाता। फूल तोड़ते वक्त उसे ऐसा नहीं लगता कि परमात्मा को तोड़ रहा है। पत्थर की एक मूर्ति के लिए एक जिंदा फूल को तोड़कर चढ़ा देता है। यह आदमी गहरे में नास्तिक है। मैं इसका अस्तित्व के प्रति कोई स्वीकार-भाव नहीं है। और न अस्तित्व में इसे परमात्मा की कोई प्रतीति है। इसे कोई प्रतीति नहीं है। इसकी पत्थर की मुर्ति को कोई तोड़ दे, तो यह हत्या पर उतारू हो जाता है, जिंदा मूर्तियों को तोड़ देता है। इसके मन में आस्तिकता का कोई संबंध नहीं है। इसकी आस्तिकता आत्मवंचना है।
अगर तुम फूल से प्यार करते हो तो उसे मत तोड़ो, अगर तोड़ोगे तो वह मर जाएगा फिर तुम उसे प्यार नही कर सकते, अगर प्यार करते हो तो फूल को लगा रहने दो, प्यार कब्जा करने का नाम नहीं है प्यार सराहना करने का नाम है…
ईश्वर बच्चों का खेल नहीं है। ईश्वर किताबों में पढ़े हुए पाठ से संबंधित नहीं है। ईश्वर का माँ-बाप द्वारा सिखाए गए सिद्धातों से क्या वास्ता है? ईश्वर तो जीवन की बड़ी प्राणवंत खोज और पीड़ा है; बड़ी anguish है। बड़े विषाद से उपलब्ध होगा। बड़े श्रम से, बढ़ी तपश्चर्या से, बड़े इनकार से गुजरने पर, बड़ी पीड़ा, बड़े खालीपन से गुजरने पर, बड़ी मुश्किल से, शायद जन्मों की यात्रा, जन्मों-जन्मों की यात्रा और खोज और जन्मों की भटकन और जन्मों की असफलता और विफलता, तब शायद इस सारी प्रसव-पीडा के बाद, वह अनुभव आता है, जो व्यक्तित्व को आस्तिकता देता है --तब।
सिर्फ आपके पाप ही आपको दुखी कर सकते है. जो आपको अपने आप से दूर ले जाने की कोशिश करते है, ऐसी चीजों को अनदेखा करना ही बेहतर होगा ।
फकीर जुन्नैद से ईश्वर ने कहा एक स्वप्न में कि 'तू क्या बनना चाहता है? तू आस्तिक बनना चाहता है कि नास्तिक?' जुन्नैद ने कहा कि 'तू मुझे नास्तिक बना दे, क्योंकि आस्तिक तो तुझे कभी-कभी भूल भी जाते हैं। नास्तिकों को मैंने तुझे कभी भूलते न देखा।' होशियार आदमी है जुन्नैद। बात उसने ठीक कहीः आस्तिक कभी-कभी भूल भी जाए, नास्तिक कभी नहीं भूलता। वह चौबीस घंटे लगा रहता है कि 'ईश्वर नहीं है, नहीं है, नहीं है।' 'अगर तेरे स्मरण से ही तेरा द्वार खुलता है, तो मुझे नास्तिक बना दे। क्योंकि उस भांति मैं तेरा ज्यादा स्मरण कर सकूंगा।'
बहस 'कौन' सही है पता लगाने के लिए की जाती है विचार-विमर्श 'क्या' सही है इसलिए किया जाता है
मौत का भय
कथा :
सुकरात मरता था, एक शिष्य ने पूछा, आप भयभीत नहीं हैं ? तो सुकरात ने आंख खोली और उसने कहा, भय ? दो ही संभावनायें हैं : अगर नास्तिक सही हैं, कि आत्मा समाप्त हो जायेगी मृत्यु में, कुछ भी न बचेगा, तो भय क्या ? जैसे जन्म के पहले नहीं थे वैसे फिर नहीं हो गये, बात खतम हो गई, आई-गई हो गई । एक लहर उठी, खो गई । अगर आस्तिक सही हैं और आत्मा बचेगी, तो फिर भय कैसा ? शरीर ही गया, हम तो बचे ही रहे । हम तो शरीर थे ही नहीं ।
ध्यान और समाधि स्वेच्छा से मृत्यु के अनुभव में प्रवेश है।
एक रोमन सम्राट ने अपने एक वजीर को दोपहर के समय खबर भेजी कि तुम अपने महल में ही कैद कर लिए गए हो । तुम्हारे महल पर चारों तरफ सैनिक खड़े कर दिए गए हैं । अब तुम वजीर नहीं हो, और न ही तुम स्वतंत्र हो, और यह भी तुम जान रखो कि सांझ सूरज होने के पहले तुम्हारा सिर कटवा कर, तुम्हारी लाश रोम के चौराहे पर लटका दी जाएगी । कुछ बात हो गई थी वजीर से और राजा नाराज हो गया था । खाने को जाने को था वजीर, तब यह खबर मिली । उसने अपने कुछ मित्रों को आमंत्रित किया था । यह खबर उसने सुनी और उसने अपने मित्रों से कहा कि चलो हम भोजन पर बैठें और भोजन करें ।
उसके मित्र तो एकदम उदास हो गए थे । यह खबर इतनी अनहोनी, इतनी खतरनाक, इतनी बड़ी दुर्घटना होने की, इतने बड़े दुर्भाग्य की । उसके मित्रों की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने कहा कि चलो, अभी सांझ को बहुत देर है । और जो भोजन सामने लग गया है, उसे छोड़ना नासमझी होगी, अभी हम भोजन करें । वे गए और सारे मित्र तो उदास थे, लेकिन वह उसी भांति भोजन कर रहा था वजीर, जैसे रोज करता था । उसके मित्रों ने उससे कहा, हमें बड़ी हैरानी है! सांझ मृत्यु होने को है और आप अभी भी जी रहे हैं, अभी भी भोजन कर रहे हैं । उस वजीर ने कहा -- मौत एक दफा आती है, लेकिन जो आदमी पहले से ही भयभीत होता है उसे कई बार मरना पड़ता है । तो मैं अभी से नहीं मरना चाहता, सांझ को इकट्ठा मर जाएंगे, अभी जब तक जिंदा हूं, तब तक जिंदा हूं । और जो क्षण मेरे हाथ में हैं, उन्हें मैं जीऊं । भोजन के बाद वह सोने चला गया, उसके मित्र तो हैरान थे । वह जाकर सो गया जैसे रोज सोता था, सोने के बाद उठा और उसने कुछ संगीतज्ञों को आमंत्रित कर रखा था, उस दिन के लिए वे आए थे । और वह उनके गीत सुनने बैठ गया ।
राजा को यह खबर मिली कि वह भोजन कर रहा है, सो रहा है और गीत सुन रहा है । और उसकी आंखें उदास नहीं हैं । और उसके ओंठों की मुस्कुराहट समाप्त नहीं हुई है । और वह अभी भी जी रहा है, और सूरज ढल रहा है और सांझ करीब आ रही है । राजा उसे देखने आया । वह देख कर हैरान हुआ, वह बैठा हुआ संगीत सुन रहा था । और संगीत की तारीफ कर रहा था । उस राजा ने कहा -- तुम पागल हो! सांझ करीब आ रही है, सूरज ढलने को है । उसने कहा -- सांझ आएगी, चाहे मैं जीऊं और चाहे मैं जीना बंद कर दूं । और मौत आएगी चाहे मैं जीऊं और चाहे मैं जीना बंद कर दूं । तो जितने क्षण मेरे हाथ में हैं, मैं उन्हें खोने को राजी नहीं हूं, जो मेरे हाथ में हैं उन्हें मैं जीऊंगा ।
राजा ने कहा -- तुम्हारी फांसी की सजा मैंने समाप्त कर दी । क्योंकि जो आदमी मौत से डरता नहीं है, उसे मारने से कोई फायदा नहीं है । और जो आदमी आखिरी क्षण तक जीने में समर्थ है, उसकी मृत्यु से कोई मतलब नहीं होता, उसे कोई मतलब नहीं होता, उसे कोई प्रयोजन नहीं उसको मारने से ।
क्षण में जो जीता है, कल का जिसे हिसाब नहीं है, बीते कल का; आने वाले कल की जिसे अपेक्षा नहीं है; जो अभी और यहीं है, हियर एंड नाउ, उसकी स्वच्छता का कोई अंत नहीं है। वह पवित्रतम है।
इसलिए अगर बुद्ध की आंखों में पवित्रता दिखाई पड़ती है ऐसी, कि जिससे झीलें भी झेंप जाएं। कि बुद्ध के चेहरे पर रेखाएं दिखाई पड़ती हैं ऐसी, कि छोटे बच्चे भी, नवजात शिशु भी शर्माएं। कि बुद्ध के चलने में चारों तरफ हवा बहती है स्वच्छता की, निर्मल, कि मलय पर्वत से उठी हुई सुगंधित हवाएं भी फिर से विचार करें कि वे मलय पर्वत से आती हैं या कहीं और से! अगर महावीर की नग्नता में भी पवित्रतम के दर्शन होते हैं, तो उसका कारण है। अगर जीसस सूली पर लटके हैं और मृत्यु के क्षण में भी उनके भीतर से जीवन की ऊर्जा ही झलकती और प्रकट होती है।
अगर मंसूर के हाथ-पैर काटे जा रहे हैं। हाथ से गिरते लहू में भी, पैर से टपकते लहू में भी मंसूर हाथ के पंजों को लहू में लगा लेता; फिर दोनों बाजुओं पर लगाता है। लोग भीड़ में खड़े हैं जो पत्थर फेंक रहे हैं; वे पूछते हैं कि मंसूर यह तुम क्या कर रहे हो? तो मंसूर कहता है, मैं वजू कर रहा हूं। नमाज के पहले जैसे मुसलमान हाथ धो डालता है। खून से वजू कर रहा है। अपने ही खून से! हंसता है और कहता है, यह खून भी परमात्मा की नसों में बहता हुआ पानी है। वह नदियों में बहता हुआ पानी भी परमात्मा की नसों में बहता हुआ खून है। यह भी उसकी ही धारा है; वह भी उसकी ही धारा है। सौभाग्य मेरा कि तुमने आज इतने निकट की धारा तोड़ दी और वजू करने मुझे दूर नहीं जाना पड़ रहा है। वहीं खून से वजू कर रहा है; हंस रहा है; मुस्कुरा रहा है।
लोग पत्थर फेंक रहे हैं और वह हंस रहा है। और मरते दम किसी ने उससे पूछा कि मंसूर, हम तुम्हें काट रहे हैं और तुम हम पर प्रेम बरसा रहे हो; मत झेंपाओ हमें, मत शर्माओ इतना। तो मंसूर ने कहा, अगर मुझे कांटा जाता तो मैं रोता। लेकिन मुझे नहीं कांटा जा रहा है। और जिसे तुम काट रहे हो नासमझों, वह मैं नहीं हूं। और मैं तुम पर इसलिए हंस रहा हूं कि जब तुम मेरे शरीर को मंसूर समझकर काट रहे हो, तो तुम दुखी होकर ही मरोगे, क्योंकि तुम अपने शरीर को भी स्वयं ही समझते रहोगे कि तुम वही हो। तुम मेरे साथ जो कर रहे हो, वह तुम्हारी अपने साथ की गई गलती की ही पुनरुक्ति है। अगर तुम्हें पता चल गया होता कि तुम शरीर से अलग हो, तो शायद तुम मेरे शरीर को काटने की कोशिश न करते। क्योंकि तुम जानते कि मैं तो कुछ और हूं? शरीर कुछ और है; और शरीर को काटने से मंसूर नहीं कटता। मैं अभी भी प्रेम बरसाता हूँ इसलिए ताकि तुम याद रख सको कि प्रेम को पत्थरों से पीड़ित नहीं किया जा सकता है। और आत्माओं को छुरों से, तलवारों से भोंका नहीं जा सकता है। और प्रार्थना को दुनिया की कोई भी गाली अपवित्र नहीं कर सकती है। ताकि तुम स्मरण रखो।
साक्रेटीज ने कहा है, knowledge is virtue, ज्ञान ही एकमात्र सदगुण है। कृष्ण कहते हैं, ज्ञान से ऊपर कुछ भी नहीं।
चंगीजखान की मृत्यु हुई। वह मृत्यु महत्वपूर्ण है। चंगीजखान जैसा आदमी स्वभावतः मृत्यु से भयभीत हो जाएगा। और अपनी मृत्यु न आए, इसके लिए उसने लाखों लोगों को मारा। लेकिन जितने लोगों को वह मारता गया, उतना ही भयभीत होता गया कि अब कोई न कोई उसे मार डालेगा। अपनी रक्षा के लिए उसने जितने लोगों की हत्या की, उतने शत्रु पैदा कर लिए। रात वह सो नहीं सकता था। क्योंकि रात अंधेरे में कुछ भी हो सकता है। और संदेह उसके इतने घने हो गए कि अपने पहरेदारों पर भी वह भरोसा नहीं कर सकता था। तो पहरेदारों पर पहरेदार, और पहरेदारों पर पहरेदार, ऐसी उसने सात पर्तें बना रखी थीं। उसके तंबू के बाहर सात घेरों में एक-दूसरे पर पहरा देने वाले लोग थे। और जब किसी पहरेदार पर इतना भी भरोसा न किया जा सके और उसके ऊपर भी बंदूक रखे हुए दूसरा आदमी खड़ा हो और उस दूसरे आदमी पर भी तीसरा आदमी खड़ा हो, तो ये पहरेदार मित्र तो नहीं हो सकते हैं। यह चंगीजखान को भी समझ में आता था। लेकिन तर्क जो करता है, वह यही कि वह पहरेदारों की संख्या बढ़ाए चला जाता था कि अगर इतने से नहीं हो सकता, तो और बढ़ा दो।
और एक रात, दिन भर का थका-मांदा, उसे झपकी लग गई। रात सोता नहीं था। अपनी तलवार हाथ में लिए बैठा रहता था। कभी भी खतरा हो सकता था। चंगीज सिर्फ दिन में सोता था, भरी दुपहरी में। जब रोशनी होती चारों तरफ, तब सो पाता था। उस दिन झपकी लग गई। पास में बंधे हुए घोड़ों में से कोई घोड़ा छूट गया रात। भाग-दौड़ मची। लोग चिल्लाए। घबरा कर चंगीज उठा। अंधेरे में उसने समझा कि दुश्मन ने हमला कर दिया। तंबू के बाहर भागा। तंबू की खूंटी में पैर फंस कर गिरा। तंबू की खूंटी ही उसके पेट में धंस गई।
यह तंबू सुरक्षा के लिए था! यह खूंटी रक्षा के लिए थी! ये पहरेदार, ये घोड़े, यह सब इंतजाम था, व्यवस्था थी। कोई मारने नहीं आया था। किसी ने मारा भी नहीं चंगीज को। चंगीज मरा अपने ही भय से। सुरक्षा के उपाय के लिए भागा था।
पूरे जीवन में ऐसी घटना घटती है। आदमी मकान बनाता है; फिर मकान पर पहरेदार बिठाने पड़ते हैं। धन इकट्ठा करता है; फिर धन की सुरक्षा करनी पड़ती है। और यह जाल बढ़ता चला जाता है। और यह बात ही भूल जाती है कि मैंने जिस आदमी के लिए यह सब इंतजाम किया था, वह अब सिर्फ एक पहरेदार रह गया है, और कुछ भी नहीं।
जो स्वयं में 'उसे' जान लेता है, वह सबके भीतर उसे जानने में समर्थ हो जाता है।
स्टैलिन का नाम ही उसको स्टैलिन इसलिए दिया -- man of steel, लौहपुरुष। नाम नहीं है उसका असली वह, दिया हुआ नाम है--लौहपुरुष, steelman, स्टील का आदमी। लेकिन ख्रुश्चेव ने अभी संस्मरण लिखे हैं। तो उसमें लिखा है कि वह इतना भयभीत आदमी था, जिसका कोई हिसाब नहीं। और एक दिन तो ख्रुश्चेव से उसने कहा कि अब तक तो मैं दूसरों से डरता था, अब तो मैं अपने से भी डरने लगा हूं। डर भारी था।
स्टैलिन कभी भी भोजन नहीं कर सकता था सीधा, जब तक कि दो-चार को खिलाकर न देख ले। अपनी लड़की पर भी भरोसा नहीं था, कि जो खाना बना है, उसमें जहर तो नहीं है! ख्रुश्चेव ने लिखा है, हम सब को उसका भोजन पहले चखना पड़ता था। हम भी कंपते हुए चखते थे कि जिससे स्टैलिन घबड़ा रहा है, लौहपुरुष, वह हमको चखना पड़ रहा है! लेकिन मजबूरी थी। पहले चार को भोजन करवा लेता सामने बिठाकर। जब देख लेता कि चारों जिंदा हैं, तब भोजन करता। भोजन करना भी निश्चिंतता न रही।
घर से बाहर नहीं जाता था। समझा तो यह जाता है कि उसने एक डबल आदमी रख छोड़ा था, अपनी शकल का एक आदमी और रख छोड़ा था, जो सामूहिक जलसों में सम्मिलित होता था। हिटलर ने भी एक डबल रख छोड़ा था। सामूहिक जलसे में कहां-कब गोली लग जाएगी! सब इंतजाम है, फिर भी डर है। इंतजाम भारी था। स्टैलिन और हिटलर के पास जैसा इंतजाम था, ऐसा पृथ्वी पर किसी आदमी के पास कभी नहीं रहा। एक-एक आदमी की तलाशी ले ली जाती थी। हजारों सैनिकों के बीच में थे। सब तरह का इंतजाम था। लेकिन फिर भी आखिरी इंतजाम यह था कि जो आदमी सलामी ले रहा है जनता की, वह असली स्टैलिन नहीं है। वह एक नकली अभिनेता है, जो स्टैलिन का काम कर रहा है। स्टैलिन तो अपने घर में बैठा हुआ देख रहा है, खबर सुन रहा है कि क्या हो रहा है।
मृत्यु का स्मरण एक दिन अमृत का दर्शन बन जाता है।
संत अगस्तीन एक चर्च बनवा रहा था। उसने एक बहुत बड़े चित्रकार को बुलाया और कहा कि इस चर्च के प्रथम द्वार पर मृत्यु का चित्र अंकित कर दो। क्योंकि जो मृत्यु को नहीं समझ पाता, वह मंदिर में प्रवेश भी कैसे कर पाएगा!
अगस्तीन ने चर्च के द्वार पर मृत्यु का चित्र बनवाया। जब चित्र बन गया, तो अगस्तीन उसे देखने आया। पर उसने कहा कि और तो सब ठीक है, लेकिन यह जो मृत्यु की काली छाया है, इसके हाथ में तुमने कुल्हाड़ी क्यों दी है?
चित्रकार ने मृत्यु की काली छाया बनाई है, एक भयंकर विकराल रूप और उसके हाथ में एक कुल्हाड़ी दी है।
उस चित्रकार ने कहा, यह प्रतीक है कि मृत्यु की कुल्हाडी सभी को काट डालती है, तोड़ डालती है। अगस्तीन ने कहा, और सब ठीक है, कुल्हाड़ी अलग कर दो और हाथ में चाबी दे दो।
चित्रकार ने कहा, कुछ समझ में नहीं आया! चाबी से क्या लेना-देना? अगस्तीन ने कहा, जो हमारा अनुभव है, वह यह है कि मृत्यु सिर्फ एक नया द्वार खोलती है, किसी को मिटाती-करती नहीं।
रास्ते पर चलें, तो होश से। भोजन करें, तो होश से। किसी से बात करें, तो होश से। एक बात सतत बनी रहे कि मेरे द्वारा मूर्च्छा में कुछ न हो। कोई गाली दे, तो पहले होश को सम्हाले, फिर उत्तर दें।
मेरे एक मित्र हैं। मिलिट्री में मेजर हैं। उनकी पत्नी मेरे पड़ोस में रहती थीं। वे तो कभी-कभी आते थे। जगह-जगह उनकी बदलिया होती रहती थीं। पत्नी उनकी एक कालेज में प्रोफेसर थीं।
जब भी मित्र आते, तो पत्नी थोड़ी परेशान हो जाती। क्योंकि और तो सब ठीक था, बहुत प्यारे आदमी हैं, लेकिन रात में धुर्राते बहुत थे। और पत्नी अकेली रहने की आदी हो गई थी वर्षों से। तो जब भी साल में महीने, दो महीने के लिए आते, तो उसकी नींद हराम हो जाती थी।
उसने मुझे एक दिन कहा कि बड़ी अजीब हालत है। कहते भी अच्छा नहीं मालूम पड़ता; वे कभी आते हैं। लेकिन मेरी नींद मुश्किल हो जाती है। या मैं यह कहूं कि मैं दूसरे कमरे में सोऊ, तो भी अशोभन मालूम पड़ता है, इतने दिन के बाद पति घर आते हैं। और रात में तो सो ही नहीं पाती।
मैंने उनसे पूछा कि मुझे पूरा ब्यौरा दो।
तो उसने कहा कि जब भी वे बाएं सोते हैं, तो घुर्राते हैं। जब दाएं बदल लेते हैं करवट, तो ठीक सो जाते हैं। पर रात में उनको सोते में करवट कौन बदलवाए! और वजनी शरीर है, भारी, सैनिक हैं। और बदलाओ उनको करवट, तो नींद टूट जाएगी।
तो मैंने उसको कहा कि मैं तुझे एक मंत्र देता हूं; उनके कान में अभ्यास करना। दूसरे दिन उसने अभ्यास करके मुझे कहा कि अदभुत मंत्र है!
छोटा—सा मंत्र था। मैंने कहा, उनके कान में कहना -- Right Turn ! मिलिट्री के आदमी। जिदगीभर का अभ्यास। मंत्र काम कर गया। जैसे ही उसने कहा राइट टर्न, उन्होंने नींद में अपनी करवट बदल ली।
मौत के क्षण में तो आप तभी होश रख पाएंगे, जब जिंदगीभर अभ्यास किया हो। और वह इतना गहरा हो गया हो कि मौत भी सामने खड़ी हो, तो भी चित्त बेहोश न हो। अचेतन तक, unconcious तक पहुंच जाना जरूरी है।
जीवन को केवल वही जी सकता है, जिसके सामने से मृत्यु की छाया विदा और विलीन हो गई है। कंपता हुआ मन कैसे जीएगा?
किसी दूर पहाड़ की तलहटी के पास एक फकीर का निवास था। बहुत लोग उसके पास बहुत-सी बातें पूछने चले जाते थे। एक बार एक आदमी उससे पूछने गया कि हमें जीवन और मृत्यु के संबंध में कुछ बताएं। उस फकीर ने कहा, अगर जीवन के संबंध में जानना हो तो स्वागत है तुम्हारा, आओ द्वार खुले हैं। लेकिन अगर मृत्यु के संबंध में जानना हो तो कहीं और जाओ, क्योंकि मैं न तो कभी मरा हूं और न कभी मर सकता हूं। मृत्यु का मुझे कोई अनुभव नहीं है। अगर मृत्यु के संबंध में जानना है तो उनसे पूछो जो मर चुके हैं, उनसे पूछो जो मर गए हैं। लेकिन तब वह फकीर हंसने लगा और उसने कहा कि उनसे तुम पूछोगे कैसे जो मर ही चुके हैं! उनसे पूछने का भी तो कोई उपाय नहीं है। और उस फकीर ने यह भी कहा कि अगर तुम मुझसे यह पूछो कि किसी मरे हुए का पता—ठिकाना दे दूं र तो भी मैं नहीं दे सकता। क्योंकि जब से मुझे यह पता चला है कि मैं नहीं मर सकता हूं, तब से मुझे यह भी पता चल गया है कि कोई कभी नहीं मरता है। कोई मरा ही नहीं है, उस फकीर ने कहा।
पुराने जमाने में रेलगाड़ियां न थीं, लोग घोड़ों की गाडियों से यात्रा करते थे। तो एक गांव से दूसरे गांव जाते थे, फिर वहां घोड़े बदल लेते थे, क्योंकि घोड़े थक जाते थे। घोड़े बदल कर वापस कर देते, दूसरे घोड़े उस सराय से ले लेते थे। फिर आगे के गांव में घोड़े बदल लेते थे। लेकिन उन घोड़े बदलनेवालों को ऐसा नहीं लगता था कि हम मर गए, हमारा फिर जन्म हुआ है। क्योंकि वे होश में बदलते थे।
लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि कोई घोड़ेवाला शराब पीकर यात्रा करता था। तो जब घोड़े तो बदल जाते थे, जैसे ही घोड़ा बदलता था, जब वह फिर गौर से देखता था तो वह कहता था, अरे! यह सब बदल गया, यह सब दूसरा हो गया।
मैंने सुना है कि कभी कोई शराब पीने वाले घुड़सवार ने यह भी कहा था कि कहीं मैं भी तो नहीं बदल गया! यह वह घोड़ा नहीं है, यह वह घोड़ा नहीं मालूम होता है जिस पर मैं था, तो मैं कहीं दूसरा आदमी तो नहीं हो गया हूं।
जन्म और मृत्यु सिर्फ वाहन बदलने के स्थान हैं, जहां पुराना वाहन छोड़ दिया जाता है। थके घोड़े छोड़ दिए जाते हैं और ताजे घोड़े ले लिये जाते हैं। लेकिन ये दोनों कृत्य हमारी बेहोशी में हो जाते हैं। और जिसका जन्म और मृत्यु बेहोशी में है, उसका जीवन भी होश में नहीं हो सकता है। उसका जीवन भी करीब-करीब अर्द्ध-बेहोशी में, अर्द्ध-मूर्च्छित ही रह जाता है।
मृत्यु से न तो मुक्त होना है और न मृत्यु को जीतना है। मृत्यु को जानना है। जानना ही मुक्ति बन जाता है, जानना ही जीत बन जाता है। इसलिए ज्ञान शक्ति है, ज्ञान मुक्ति है, ज्ञान विजय है।
एक गांव में एक बार एक आदमी को एक बड़ा पागलपन सवार हो गया। वह एक रास्ते से गुजर रहा था। भरी दोपहरी थी, अकेला रास्ता था, निर्जन था। तेजी से चल रहा था कि निर्जन में कोई डर न हो जाए। वह आदमी अकेला था और डर गया और भागने लगा। और सन्नाटा था, सुनसान था, दोपहर थी, कोई भी न था। जब वह तेजी से भागा, तो उसे अपने ही पैरों की आवाज पीछे से आती हुई मालूम पड़ी। और वह डरा कि शायद कोई पीछे है। फिर उसने डरे हुए, चोरी की आख से पीछे झांककर देखा, तो एक लंबी छाया उसका पीछा कर रही थी। वह उसकी अपनी ही छाया थी। लेकिन यह देखकर कि कोई लंबी छाया पीछे पड़ी हुई है, वह और भी तेजी से भागा। फिर वह आदमी कभी रुक नहीं सका मरने के पहले। क्योंकि वह जितनी तेजी से भागा, छाया उतनी ही तेजी से उसके पीछे भागी। फिर वह आदमी पागल हो गया।
लेकिन पागलों को पूजनेवाले भी मिल जाते हैं। जब वह गांव से भागता हुआ निकलता और लोग देखते कि वह भागा जा रहा है, तो लोग समझते कि वह बड़ी तपश्चर्या में रत है। वह कभी रुकता नहीं था। वह सिर्फ रात के अंधेरे में रुकता था, जब छाया खो जाती थी। तब वह सोचता था कि अब कोई पीछे नहीं है। सुबह हुई और वह भागना शुरू कर देता था। फिर तो बाद में उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया। उसे ऐसा समझ में आया कि जब तक मैं विश्राम करता हूं? मालूम होता है, जितना दूर भागकर दिन भर में मैं दूर निकलता हूं, उतनी देर में छाया फिर वापस आ जाती है, सुबह फिर मेरे पीछे हो जाती है।
तब उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया। फिर वह पूरा पागल हो गया। फिर वह खाता भी नहीं, पीता भी नहीं। भागते हुए लाखों की भीड़ उसको देखती, फूल फेंकती। कोई राह चलते उसके हाथ में रोटी पकड़ा देता, कोई पानी पकड़ा देता। उसकी पूजा बढ़ती चली गई। लाखों लोग उसका आदर करने लगे।
लेकिन वह आदमी पागल होता चला गया। और अंततः वह आदमी एक दिन गिरा और मर गया। गांव के लोगों ने, जिस गांव में वह मरा था, उसकी कब्र बना दी एक वृक्ष के नीचे छाया में। और उस गांव के एक बूढ़े फकीर से उन्होंने पूछा कि हम इसकी कब्र पर क्या लिखें? तो उस फकीर ने एक लाइन उसकी कब पर लिख दी -- यहां एक ऐसा आदमी सोता है, जो जिंदगी भर अपनी छाया से भागता रहा है । इस आदमी को इतना भी पता नहीं था, जितना उसकी कब्र को पता है। क्योंकि कब्र छाया में है और भागती नहीं, इसलिए कब्र की कोई छाया ही नहीं बनती है। इसके भीतर जो सोया है उसे इतना भी पता नहीं था, जितना उसकी कब्र को पता है।
मृत्यु और जन्म बीच में आए हुए पड़ाव से ज्यादा नहीं हैं, जहां हम वस्त्र बदल लेते हैं या घोड़े बदल लेते हैं।
शेख फरीद के पास कभी एक आदमी गया। और उस आदमी ने पूछा कि सुनते हैं हम कि जब मसूर के हाथ काटे गये, पैर काटे गये, तो मंसूर को कोई तकलीफ न हुई, लेकिन विश्वास नहीं आता। पैर में काटा गड़ जाता है, तो तकलीफ होती है। हाथ —पैर काटने से तकलीफ न हुई होगी? यह सब कपोल—कल्पित कहानियां मालूम होती हैं। और उस आदमी ने कहा, यह भी हम सुनते हैं कि जब जीसस को सूली पर लटकाया गया, तो वे जरा भी दुखी न हुए। और जब उनसे कहा गया कि अंतिम कुछ प्रार्थना करनी हो तो कर सकते हो। तो सूली पर लटके हुए, काटो से छिदे हुए, हाथों में खीलों से बिंधे हुए, लहू बहते हुए उस नंगे जीसस ने अंतिम क्षण में जो कहा वह विश्वास के योग्य नहीं है, उस आदमी ने कहा। जीसस ने यह कहा कि क्षमा कर देना इन लोगों को, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।
यह वाक्य आपने भी सुना होगा। और सारी दुनिया में जीसस को मानने वाले लोग निरंतर इसको दोहराते हैं। यह वाक्य बड़ा सरल है। जीसस ने कहा कि इन लोगों को क्षमा कर देना परमात्मा, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। आमतौर से इस वाक्य को पढनेवाले ऐसा समझते हैं कि जीसस ने यह कहा कि ये बेचारे नहीं जानते कि मुझ अच्छे आदमी को मार रहे हैं, इनको पता नहीं है।
नहीं, यह मतलब जीसस का न था। जीसस का मतलब यह था कि इन पागलों को यह पता नहीं है कि जिसको ये मार रहे हैं, वह मर ही नहीं सकता है। इनको माफ कर देना, क्योंकि इन्हें पता नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं। ये एक ऐसा काम कर रहे हैं, जो असंभव है। ये मारने का काम कर रहे हैं, जो असंभव है।
उस आदमी ने कहा कि विश्वास नहीं आता कि कोई मारा जाता हुआ आदमी इतनी करुणा दिखा सकता हो। उस वक्त तो वह क्रोध से भर जाएगा।
फरीद खूब हंसने लगा। और उसने कहा कि तुमने अच्छा सवाल उठाया। लेकिन सवाल का जवाब मैं बाद में दूंगा, एक छोटा—सा मेरा काम कर लाओ। पास में पड़ा हुआ एक नारियल उठाकर दे दिया उस आदमी को, और कहा कि इसे फोड़ लाओ। लेकिन ध्यान रहे, इसकी गिरी को पूरा बचा लाना, गिरी टूट न जाये। लेकिन वह नारियल था कच्चा। उस आदमी ने कहा, माफ करिए, यह काम मुझसे न हो सकेगा। नारियल बिलकुल कच्चा है। और अगर मैंने इसकी खोल तोड़ी, तो गिरी भी टूट जाएगी। तो उस फकीर ने कहा, उसे रख दो। दूसरा नारियल उसने दिया जो कि सूखा था और कहा कि अब इसे तोड़ लाओ। इसकी गिरी तो तुम बचा सकोगे? उस आदमी ने कहा, इसकी गिरी बच सकती है।
तो उस फकीर ने कहा कि मैंने तुम्हें जवाब दिया, कुछ समझ में आया? उस आदमी ने कहा, मेरी कुछ समझ में नहीं आया। नारियल से और मेरे जवाब का क्या संबंध है? मेरे सवाल का क्या संबंध है? उस फकीर ने कहा, यह नारियल भी रख दो, कुछ फोड़ना—फाड़ना नहीं है। मैं तुमसे यह कह रहा हूं कि एक कच्चा नारियल है, जिसकी गिरी और खोल अभी आपस में जुड़ी हुई है। अगर तुम उसकी खोल को चोट पहुचाओगे तो उसकी गिरी भी टूट जाएगी। फिर एक सूखा नारियल है। सूखे नारियल और कच्चे नारियल में फर्क ही क्या है? एक छोटा—सा फर्क है कि सूखे नारियल की गिरी सिकुड़ गई है भीतर और खोल से अलग हो गई है। गिरी और खोल के बीच में एक फासला, एक डिस्टेंस हो गया है, एक दूरी हो गई है। अब तुम कहते हो कि इसकी हम खोल तोड़ देंगे तो गिरी बच सकती है। तो मैंने तुम्हारे सवाल का जवाब दे दिया।
उस आदमी ने कहा, मैं फिर भी नहीं समझा। तो उस फकीर ने कहा, जाओ, मरो और समझो। इसके बिना तुम समझ नहीं सकते। लेकिन तब भी तुम समझ नहीं पाओगे, क्योंकि तब तुम बेहोश हो जाओगे। खोल और गिरी एक दिन अलग होंगे, लेकिन तब तुम बेहोश हो जाओगे। और अगर समझना है, तो अभी खोल और गिरी को अलग करना सीखो। अभी, जिंदा में। और अगर अभी खोल और गिरी अलग हो जाएं, तो मौत खतम हो गई। वह फासला पैदा होते से ही हम जानते हैं कि खोल अलग, गिरी अलग। अब खोल टूट जाएगी तो भी मैं बचूंगा, तो भी मेरे टूटने का कोई सवाल नहीं है, तो भी मेरे मिटने का कोई सवाल नहीं है। मृत्यु घटित होगी, तो भी मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकती है, मेरे बाहर ही घटित होगी। यानी वही मरेगा, जो मैं नहीं हूं। जो मैं हूं, वह बच जाएगा।
एक बूंद हजार बूंदों के बीच में पड़ी है। सूरज की किरण आई और उस एक बूंद पर जोर से पड़ी और वह बूंद भाप बनकर उड़ गई। आसपास की बूंदों ने समझा कि वह मर गई, वह खतम हो गई। और ठीक ही सोचा उन बूंदों ने, क्योंकि उन्हें दिखाई पडा कि अब तक थी, अब नहीं है। लेकिन वह बूंद अब भी बादलों में है। यह वे बूंदें कैसे जानें जो खुद भी बादल न हो जाएं। या बूंद अब सागर में जाकर फिर बूंद बन गई होगी, यह भी बूंदें कैसे जानें, जब तक कि वे खुद उस यात्रा पर न निकल जाएं।
सुकरात मर रहा है, आखिरी क्षण है। जहर पीसा जा रहा है उसे मारने के लिए। और वह बार—बार पूछता है कि बड़ी देर हो गई, जहर कब तक पिस पाएगा! उसके मित्र रो रहे हैं और कह रहे हैं कि आप पागल हो गए हैं। हम तो चाहते हैं कि थोड़ी देर और जी लें। तो हमने जहर पीसने वाले को रिश्वत दी है, समझाया-बुझाया है कि थोड़े धीरे-धीरे पीसना। वह सुकरात बाहर उठकर पहुंच जाता है और जहर पीसनेवाले से पूछता है कि बड़ी देर लगा रहे हो, बड़े अकुशल मालूम होते हो, नए-नए पीस रहे हो? पहले कभी नहीं पीसा? पहले किसी फांसी की सजा दिए हुए आदमी को तुमने जहर नहीं दिया है?
वह आदमी कहता है, जिंदगी भर से दे रहा हूं। लेकिन तुम जैसा पागल आदमी मैंने नहीं देखा। तुम्हें इतनी जल्दी क्या पड़ी है? और थोड़ी देर सांस ले लो, और थोड़ी देर जी लो, और थोड़ी देर जिंदगी में रह लो। तो मैं धीरे पीस रहा हूं। और तुम खुद ही पागल की तरह बार-बार पूछते हो कि बड़ी देर हुई जा रही है। इतनी जल्दी क्या है मरने की?
सुकरात कहता है कि बड़ी जल्दी है, क्योंकि मैं मौत को देखना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं कि मौत क्या है। और मैं यह भी देखना चाहता हूं कि मौत भी हो जाए और फिर भी मैं बचता हूं या नहीं बचता हूं। अगर नहीं बचता हूं, तब तो सारी बात ही समाप्त हो जाती है। और अगर बचता हूं तो मौत समाप्त हो जाती है। असल में मैं यह देखना चाहता हूं कि मौत की घटना में कौन मरेगा, मौत मरेगी कि मैं मरूंगा। मैं बचूंगा या मौत बचेगी, यह मैं देखना चाहता हूं। तो बिना जाए कैसे देखूं।
फिर सुकरात को जहर दे दिया गया। सारे मित्र छाती पीटकर रो रहे हैं, वे होश में नहीं हैं, और सुकरात क्या कर रहा है? सुकरात उनसे कह रहा है कि मेरे पैर मर गए, लेकिन अभी मैं जिंदा हूं। सुकरात कह रहा है, मेरे घुटने तक जहर चढ़ गया है, मेरे घुटने तक के पैर बिलकुल मर चुके हैं। अब अगर तुम इन्हें काटो, तो भी मुझे पता नहीं चलेगा। लेकिन मित्रो, मैं तुमसे कहता हूं कि मेरे पैर तो मर गए हैं, लेकिन मैं जिंदा हूं। यानी एक बात पक्की पता चल गई कि मैं पैर नहीं था। मैं अभी हूं मैं पूरा का पूरा हूं। मेरे भीतर अभी कुछ भी कम नहीं हो गया है। फिर सुकरात कहता है कि अब मेरे पूरे पैर ही जा चुके, जांघों तक सब समाप्त हो चुका है। अब अगर तुम मेरी जांघों तक मुझे काट डालो, तो मुझे कुछ भी पता नहीं चलेगा, लेकिन मैं हूं! और वे मित्र हैं कि रोए चले जा रहे हैं।
और सुकरात कह रहा है कि तुम रोओ मत, एक मौका तुम्हें मिला है, देखो। एक आदमी मर रहा है और तुम्हें खबर दे रहा है कि फिर भी वह जिंदा है। मेरे पैर तुम पूरे काट डालो तो भी मैं नहीं मरा हूं? मैं अभी हूं। और फिर वह कहता है कि मेरे हाथ भी ढीले पड़े जा रहे हैं, हाथ भी मर जाएंगे। आह, मैंने कितनी बार अपने हाथों को स्वयं समझा था, वे हाथ भी चले जा रहे हैं, लेकिन मैं हूं। और वह आदमी, वह सुकरात मरता हुआ कहता चला जाता है। वह कहता है, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे सब शांत हुआ जा रहा है, सब डूबा जा रहा है, लेकिन मैं उतना का ही उतना हूं। और सुकरात कहता है, हो सकता है थोड़ी देर बाद मैं तुमको खबर देने को न रह जाऊं, लेकिन तुम यह मत समझना कि मैं मिट गया। क्योंकि जब इतना शरीर मिट गया और मैं नहीं मिटा, तो थोड़ा शरीर और मिट जाएगा, तब भी मैं क्यों मिटुंगा! हो सकता है, मैं तुम्हें खबर न दे सकूं, क्योंकि खबर शरीर के द्वारा ही दी जा सकती है। लेकिन मैं रहूंगा। और फिर वह आखिरी क्षण कहता है कि शायद आखिरी बात तुमसे कह रहा हूं। जीभ मेरी लड़खड़ा गई है। और अब इसके आगे मैं एक शब्द नहीं बोल सकूंगा, लेकिन मैं अभी भी कह रहा हूं कि मैं हूं। वह आखिरी वक्त तक यह कहता हुआ मर गया है कि मैं हूं।
कठोर वाणी का केवल इतना ही अर्थ है कि भीतर पथरीला हृदय है, भीतर आप कठोर हैं। मधुर वाणी का इतना ही अर्थ है कि जहां से हवाएं आ रही हैं, वहां शीतलता है, वहां माधुर्य है।
चाल
कथा :
ईश्वरचंद्र विद्यासागर को गवर्नर जनरल ने एक उपाधि देने का आयोजन किया था । तो गरीब आदमी थे और दीन-हीन वस्त्र थे उनके । मित्रों ने कहा कि वायसराय के भवन में जाओगे, स्वागत-समारोह होगा, बड़े-बड़े लोग होंगे, पदाधिकारी होंगे-इन कपड़ों में ? नहीं, यह ठीक नहीं । हम तुम्हें अच्छे कपड़े बना देते हैं ।
ईश्वरचंद्र ने बहुत मना किया कि मेरे ही कपड़े, जैसे भी हैं, मेरे ही हैं, तुम्हारे बनाये उधार होंगे । लेकिन मित्र न माने तो वे राजी हो गये । एक ही दिन पहले सांझ को घूमने निकले थे और सामने ही एक मुसलमान लखनवी कपड़े पहने हुए, हाथ में छड़ी लिए हुए, लखनवी चाल से चलता हुआ टहल रहा था-आगे ही उनके । और तभी एक आदमी भागा हुआ आया और उसने कहा उस मुसलमान को कि मीर साहिब, आपके मकान में आग लग गई, चलिए, जल्दी चलिए ! सब जला जा रहा है !
यह सुन कर विद्यासागर तक उत्तेजित हो गये और भागने को खड़े हो गये कि कहां लग गई आग ! लेकिन वह आदमी वैसा ही चलता रहा जैसा चल रहा था । उस नौकर ने फिर कहा -- मालिक सुना नहीं, आप होश में हैं ? मकान में आग लग गई है, सब जला जा रहा है ! और आपकी चाल वही चले जा रहे हैं आप ! लखनवी चाल का यह मौका नहीं ।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने लिखा है कि उस आदमी ने मुस्कुरा कर कहा -- चाल मेरी जिंदगी भर की है, मकान के जलने न जलने से चाल को नहीं बदल सकता । फिर जो जल रहा है, जल रहा है; मेरे दौड़ने से भी क्या होगा ! यह मेरी जिंदगी भर की चाल है, इसको इतनी आसानी से नहीं बदल सकता । तुझे भागना हो, तू भाग; मैं आता हूं । यह मेरे टहलने का समय है । फिर मकान जल ही रहा है; मेरे भागने से क्या होगा ! मेरे भागने से कुछ बचने वाला नहीं है ।
और वह आदमी उसी चाल से चलता रहा । विद्यासागर ने लिखा है कि मुझे होश हुआ । मैंने कहा, हद हो गई बात, यह एक आदमी है जिसे कोई फर्क न पड़ा । और एक मैं हूं कि वायसराय की सभा में जा रहा हूं पुरस्कार लेने, तो मित्रों के उधार कपड़े ले लिए ! और यह आदमी अपनी चाल नहीं बदल रहा है, मकान में आग लग गई तो भी ! और मैं अपने कपड़े बदल रहा हूं !
वे दूसरे दिन अपने पुराने गरीब के कपड़े ही पहने हुए वायसराय के भवन में पहुंच गये । वायसराय भी थोड़ा चिंतित था । उसने पूछा भी कि ईश्वरचंद्र मैंने तो सुना था मित्रों ने कपड़ों की व्यवस्था कर दी । उन्होंने कहा -- कर दी थी, लेकिन इन मीर साहिब ने सब गड़बड़ कर दी । नहीं; इतनी आसानी से क्या जिंदगी भर की चालें बदली जाती हैं !
तमोगुण ज्ञान को आच्छादन करके अर्थात ढंककर प्रमाद में लगाता है; रजोगुण कर्म और उसके फल की आसक्ति में लगाता है; सत्वगुण सुख की आसक्ति और ज्ञान के अभिमान में लगाता है।
भिखमंगापन
कथा :
बुद्ध एक गांव में आए । उस गांव के राजा से उस गांव के मंत्री ने कहा कि बुद्ध आते हैं, हम उनके स्वागत को चलें । राजा अकड़ीला था । उसने कहा, हम क्यों जाएं ? है क्या बुद्ध के पास ? भिखारी ही हैं न आखिर ! और मैं कोई उनसे पीछे तो हूं नहीं, तो मैं जाऊं क्यों ? आना होगा, खुद आ जायेंगे महल । मिलना होगा, खुद मिल जायेंगे ।
उस मंत्री ने कहा, तो मेरा इस्तीफा लें । वह मंत्री बड़ा उपयोग का था । उसके हाथ में सारी कुंजियां थीं राज्य की । राजा घबराया । वह तो लंपट किस्म का राजा था । उसको तो कुछ पता भी न था, कैसे राज्य चलता है, क्या होता है । वह तो सिर्फ नाम-मात्र को था; असली तो वजीर था । उस वजीर ने कहा, फिर मुझे छोड़ें । वह राजा कहने लगा, इसमें नाराज होने की बात क्या है ? छोड़ने की जरूरत क्या है ।
उसने कहा कि नहीं, अब आपके पास बैठना ठीक नहीं है । गांव में बुद्ध आते हों और जो उनको नमस्कार करने न जाये, उसके पास बैठना ठीक नहीं है । इसके पास रहने में तो खतरा है । यह तो बीमारी लगने का डर है । मैं अब आपके पास रुक नहीं सकता । अब आप चाहे चलो भी तो भी नहीं रुक सकता । याद रखना कि बुद्ध के पास यह राज्य था और उन्होंने छोड़ दिया; तुम्हारी अभी भी छोड़ने की हिम्मत नहीं पड़ी है । वे तुमसे आगे हैं । यह बुद्ध का भिखमंगापन साधारण भिखमंगापन नहीं है । यह बुद्ध का भिखमंगापन बड़ा समृद्ध है; साम्राज्यों से ऊपर है, सम्राटों से पार है । और अगर तुम यहां नमन करने को नहीं जाते तो 'तुम्हारे जीवन में फिर नमन कहां से आयेगा ? और जिसके जीवन में नमन नहीं है, नमस्कार नहीं है, उसके पास रुकना ठीक नहीं । क्योंकि उसके जीवन में सिवाय अहंकार के, जहर के और कुछ भी नहीं हो सकता ।
रथचाइल्ड, यहूदी धनपति, एक भिखमंगे को वह रोज हर महीने पहली तारीख को सौ डालर देता था । वह भिखमंगा उसे जंच गया । एक दिन बगीचे में उसी बेंच पर आकर बैठ गया था । दया आ गई । कोई रथचाइल्ड के पास कमी न थी । उसने कहा कि तू सौ डालर हर महीने एक तारीख को आकर ले जाया कर । वह भिखमंगा इस तरह से उसके दफ्तर में आने लगा, जैसे लोग अपनी तनख्वाह लेने जाते हैं । अगर दस-पांच मिनट भी उसको रुकना पड़ता तो वह नाराज हो जाता, चीख-पुकार मचाने लगता ।
कोई दस साल तक ऐसा चला । एक दिन आया लेने तो जो क्लर्क उसे देता था--और भी भिखमंगों को रथचाइल्ड बांटता था । बहुत धन उसने बांटा--उसने कहा कि इस तारीख से अब तुम्हें पचास डालर ही मिल सकेंगे । उसने पूछा, क्यों? सदा मुझे सौ मिलते रहे । सालों से मिलते रहे । यह फर्क कैसा! उस क्लर्क ने कहा कि ऐसा करें, मालिक का धंधा बहुत लाभ में नहीं चल रहा है । और उनकी लड़की की शादी हो रही है । और उस लड़की की शादी में बहुत खर्च है । तो उन्होंने सभी दान आधा कर दिया है ।
वह तो एकदम टेबल पीटने लगा । उसने कहा बुलाओ रथचाइल्ड को, कहां है! मेरे पैसे पर अपनी लड़की की शादी? एक गरीब आदमी का पैसा काटकर लड़की की शादी में मजा, गुलछर्रे उड़ाएगा? बुलाओ, कहां है!
रथचाइल्ड ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं गया और मुझे बड़ी हंसी आयी । लेकिन मुझे एक बात समझ में आयी कि यही तो मैं परमात्मा के साथ करता रहा हूं ।
यही तो हम सबने परमात्मा के साथ किया है । जो मिला है उसका हम धन्यवाद नहीं देते । उस दस साल में उसने कभी एक दिन धन्यवाद न दिया । लेकिन पचास डालर कम हुए तो वह नाराज था, शिकायत थी । और आगबबूला हो गया । उसके पचास डालर काटे जा रहे हैं?
अगर तुमने मांगा तो पहली तो बात, मिलेगा नहीं । और शुभ है कि नहीं मिलता क्योंकि तुम जो भी मांगते हो, गलत मांगते हो । तुम सही मांग ही नहीं सकते । तुम गलत हो । गलत से गलत मांग ही उठ सकती है । नीम में केवल नीम की निबोरियां ही लग सकती हैं, आम के सुस्वादु फलों के लगने की कोई संभावना नहीं है । जो तुम्हारी जड़ में नहीं है, वह तुम्हारे फल में न हो सकेगा । तुम गलत हो तो तुम जो मांगोगे वह गलत होगा ।
यह विरोधाभासी लगेगा । लेकिन यह परम सत्यों में एक है कि जब तुम किसी चीज का त्याग कर देते हो, उसी दिन तुम उसके मालिक हुए । जब तक त्याग करने की क्षमता न थी, तब तक गुलाम थे ।
सम्राटों की एक परंपरा में एक बेटा भिखारी है । कई पीढ़ियों से भीख मांगी जा रही है । लेकिन परंपरा सम्राटों की है । घर में कथा है कि कभी बाप-दादे किसी पीढ़ी में बड़े सम्राट थे, बड़े खजाने थे उनके पास । पर यह कुछ पता नहीं चलता कि वे खजाने कहां खो गए । कभी वे हारे, इसका पता नहीं चलता । कभी लूटे गए, इसका पता नहीं चलता । फिर यह भिखमंगापन कैसे आया? हुआ क्या? कुछ पता नहीं चलता । पीढ़ियों तक पता नहीं चला । फिर एक पीढ़ी में एक दिन अचानक एक फकीर घर पर आया और उसने उस घर के जवान लड़के को कहा कि अब तुम वह आदमी हो, जिसको खजानों की खबर दी जा सकती है । we are the guardians!
उस युवक ने कहा, तुम कौन से guardians हो, हमें कुछ पता नहीं ।
हमारे पास तुम्हारे बाप-दादे छोड़ गए हैं । हमारे पास, मतलब हमारे गुरु के पास, उनके गुरु के पास, फकीरों के पास छोड़ गए हैं कि जब हमारे घर में ऐसा आदमी पैदा हो, जो धन को प्रदर्शन करने में उत्सुक न हो, तब यह खजाना वापस सौंप देना । तो तुम वह आदमी हो । मैं तुम्हें खजाना सौंपने आया हूं ।
उस युवक ने कहा, लेकिन मुझे कुछ सोचने का मौका दें ।
उस फकीर ने कहा कि बिलकुल ठीक, तुम्हीं वह आदमी हो, जिसकी तलाश थी ।
धन के खजाने की कोई खबर देता, तो आप बैठे रहते? आप खड़े हो गए होते--कहां है? भीख मांग रहा था परिवार । उस युवक ने कहा, सोचने का मौका दें । जिम्मेवारी भारी है । और गरीबी में जीना उतना जटिल नहीं, धन पास हो और बिना प्रदर्शन किए रह जाना बहुत मुश्किल है । थोड़ा सोचने का मौका दें । ऐसी जल्दी भी क्या है? इतने दिन से आप सम्हाल ही रहे हैं, और थोड़े दिन सम्हालें । उस फकीर ने कहा, उठो! क्योंकि हम भी कब तक सम्हालते रहें? और तुम्हीं वह आदमी हो, क्योंकि लक्षण पूरे हो गए । क्योंकि हमारे पास जो दस्तावेज है उसमें कहा गया है कि जब भी कोई परिवार का हमारा आदमी कहे, सोचने का मौका दो, उसे तुम दे आना । हम हर पीढ़ी में आते रहे । लेकिन जिससे भी हमने पूछा, वह उठ कर खड़ा हो गया ।
वह धन उसे सौंप दिया गया । सारे गांव में, आस-पास, दूर-दूर तक खबर पहुंच गई कि धन वापस मिल गया है । लेकिन भीख मांगनी तो जारी रही । सम्राट ने बुलाया उस युवक को और कहा कि पागल तो नहीं हो? या तो अफवाह है यह! हमने सुना है कि तुम्हें पुश्तैनी धन वापस मिल गया है । खजाना सौंप दिया गया है । फिर यह भीख क्यों मांग रहे हो? उस युवक ने कहा कि पहले तो भीख मांगना एक मजबूरी थी, अब एक कर्तव्य है । Now it is a duty, क्योंकि इसी शर्त पर वह धन मुझे सौंपा गया है कि उसका प्रदर्शन न हो । और आज मैं घर बैठ जाऊं और भीख मांगने न जाऊं, तो इससे बड़ा प्रदर्शन और क्या होगा? उसने कहा कि यानी मामला ही खतम हो गया, और प्रदर्शन और ज्यादा क्या हो सकता है? लोग अगर मुझे घर में बैठा देख लें कि आज भीख मांगने नहीं गया--क्योंकि रोज जो मिलता है, उसी से तो काम चलता है--तो प्रदर्शन तो हो जाएगा ।
धन जब प्रदर्शन बनता है, तो स्पृहा पैदा होती है । लेकिन धन तो हम कमाते ही इसलिए हैं कि प्रदर्शन कर सकें । अगर प्रदर्शन ही न करना हो, तो कमाने की जरूरत क्या है? जो वस्त्र पहनने ही न हों, उनको बनवाने की क्या जरूरत है? और जिन मकानों में रहना ही न हो, उनको खड़ा क्या करना है? जिसका कभी प्रदर्शन ही न करना हो, उसको रखने का भी क्या उपयोग है? हम कहेंगे ऐसा ।
लाओत्से -- अगर हम लोगों के ध्यान आकर्षित न करें, तो लोग परम शांति में जी सकते हैं ।
एक ऊंटनी और उसका बच्चा एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे। बच्चे ने पूछा, 'माँ, हम ऊँटों का ये कूबड़ क्यों निकला रहता है?'
'बेटा हम लोग रेगिस्तान के जानवर हैं, ऐसी जगहों पर खाना-पानी कम होता है, इसलिए भगवान् ने हमें अधिक से अधिक फैट स्टोर करने के लिए ये कूबड़ दिया है…जब भी हमें खाना या पानी नहीं मिलता हम इसमें मौजूद फैट का इस्तेमाल कर खुद को जिंदा रख सकते हैं।' ऊंटनी ने उत्तर दिया।
बच्चा कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, ' अच्छा, हमारे पैर लम्बे और पंजे गोल क्यों हैं?'
'इस तरह का आकार हम ऊँटों को रेत में आराम से लम्बी दूरी तय करने में मदद करता है,इसलिए।' माँ ने समझाया।
बच्चा फिर कुछ देर सोचता रहा और बोला, 'अच्छा माँ ये बताओ कि हमारी पलकें इतनी घनी और लम्बी क्यों होती हैं?'
'ताकि जब तेज हवाओं के कारण रेत उड़े तो वो हमारी आँखों के अन्दर ना जा सके।' माँ मुस्कुराते हुए बोली।
बच्चा थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला,' अच्छा तो ये कूबड़ फैट स्टोर करने के लिए है… लम्बे पैर रेगिस्तान में तेजी से बिना थके चलने के लिए हैं… पलकें रेत से बचाने के लिए हैं…लेकिन तब हम इस चिड़ियाघर में क्या कर रहे हैं?'
जो तुम्हें धोखा दे, समझना की बड़ा गरीब है, तुमसे ज्यादा गरीब है, तुमसे ज्यादा बड़ा भिखारी है, उस पर दया करना इसलिए नहीं कि तुम्हारी दया से वह बदल जाएगा, वो बदले ना बदले लेकिन तुम बदल जाओगे।
मुल्ला नसरुद्दीन रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते के किनारे बैठे एक आदमी ने पुकार दी कि बड़े मियां, मुझ अंधे पर भी कुछ दया करो, दो आने मिल जाएं! नसरुद्दीन ने गौर से देखा और कहा कि तुम अंधे! तुम्हारी एक आंख तो बिलकुल ठीक मालूम होती है। तो उसने कहा मालिक, एक ही आना मिल जाए! मगर कुछ तो मिल जाए।
सदगुरु का काम है तुम्हारे भीतर सोए हुए गुरु को जगा देना, बस।
मुल्ला जा रहा था सिनेमा देखने। सिनेमा के बाहर ही एक भिखमंगे ने हाथ फैलाया और कहा कि सूरदास को कुछ मिल जाए। मुल्ला जल्दी में था, कौन झंझट करे, कौन बकवास करे! उसने एक दस पैसे का सिक्का डाल दिया। उस अंधे ने सिक्के को गौर से देखा और कहा, सिक्का नकली है। मुल्ला ने कहा हद हो गई! तुम अंधे हो और तुम्हें सिक्का नकली है यह भी पता चल गया! उसने कहा. अब आपसे क्या छिपाना! असल में आज मैं अपने मित्र की जगह बैठा हुआ हूं। मेरा मित्र अंधा है। तो मुल्ला ने पूछा : तेरा मित्र कहां है? उसने कहा वह सिनेमा देखने गया है। मैं तो असल में बहरा हूं।
ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है जिसको धोखा दिया जा सके और ईश्वर तुमसे बाहर नहीं है जो धोखा खा सके। वह तो धोखा देने वाले के भीतर बैठा हंस रहा है।
एक करोड़पति मैंने सुना है, बहुत अड़चन में था। करोड़ों का घाटा लगा था। और सारी जीवन की मेहनत डूबने के करीब थी। नौका डगमगा रही थी। कभी मंदिर नहीं गया था, कभी प्रार्थना भी न की थी। फुरसत ही न मिली थी। ऐसे उसने पुजारी रख छोड़े थे। और मंदिर भी बनवा दिया था, जहां वे उसके नाम से पूजा किया करते थे।
लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में कांपते हाथों वह भी मंदिर गया। सुबह जल्दी गया, ताकि परमात्मा से पहली मुलाकात उसी की हो, पहली प्रार्थना वही कर सके। कोई दूसरा पहले ही मांग कर परमात्मा का मन खराब न कर चुका हो। लेकिन देख कर हैरान हुआ कि गांव का भिखारी उससे पहले मौजूद था। अंधेरा था अभी। वह भी पीछे खड़ा हो गया, पता लगाने कि भिखारी क्या मांग रहा है।
धनी आदमी देखता है, कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं; भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं? और भिखारी सोचता है, देखता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं। धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी? दोनों मुसीबत में जीते हैं। अपने-अपने ढंग की मुसीबतें हैं; मुसीबतें जरूर हैं।
उसने सुना, कि भिखारी कह रहा है, हे परमात्मा! अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जाएगा। आत्महत्या कर लूंगा। ये तो चाहिए ही। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बिलकुल आवश्यक हैं। मेरा जीवन संकट में है।
सेठ ने अपने खीसे से पांच रुपए निकाल के उस भिखारी को दिए और कहा, कि ये पांच रुपए तू ले और जा। फिर उसने परमात्मा से कहा -- अब आप अनबटा ध्यान मेरी तरफ दे सकते हैं। यह भिखारी से छुटकारा हुआ। मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है।
अहंकार ध्यान मांगता है और निरहंकार ध्यान देता है।
कारण-विपर्यय
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन पकड़ लिया गया; हवालात में बंद कर दिया गया । मैं गया उसे देखने । मैंने कहा -- बड़े मियां, यह मामला क्या है ? कैसे पकड़े गये ? उसने कहा, सर्दी-जुकाम के कारण । मैंने कहा -- सर्दी-जुकाम के कारण ? सर्दी-जुकाम से तो मैं परेशान हूं; मुझे पकड़ा जाना था । तुम्हें किसने पकड़ा ? उसने कहा कि अब समझो बात पूरी । एक आदमी की जेब में मैंने हाथ डाला, सर्दी-जुकाम के कारण पड़ाक से छींक आ गयी । धरपकड़ा; वहीं पकड़ा गया ।
चोरी के कारण नहीं पकड़ा गया है वह ! सर्दी-जुकाम के कारण !
आस्तिक कहता है, बिलकुल है; जान लगा दूंगा अपनी। और कई आस्तिकों ने, जिन्हें बिलकुल पता नहीं था, जान लगा दी। और अपनी तो कम लगाई, दूसरों की ज्यादा लगवा दी! कई नास्तिक जान लगा दिए हैं। अपनी कम, दूसरों की ज्यादा लगा दिए हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी अपने वकील के पास गयी थी । और उससे बोली कि अब बहुत हो चुका, और अब आगे सहना असंभव है । अब तलाक का इंतजाम करवा ही दें ।
उसके वकील ने पूछा कि ऐसा क्या कारण आ गया है? उसने कहा कि मुल्ला नसरुद्दीन विश्वासघाती है । उसने मुझे धोखा दिया है । निश्चित ही उसके दूसरी स्त्रियों से संबंध हैं । और, अब और सहना असंभव है ।
वकील ने पूछा, 'कोई प्रमाण ? क्योंकि प्रमाण की जरूरत होगी । और कैसे तुम्हें पता चला, इसका कोई ठीक-ठीक सबूत, कोई गवाह?'
उसकी पत्नी ने कहा, 'किसी गवाह की कोई जरूरत नहीं है । I am pretty sure that he is not the father of my child--पूर्ण निश्चय है मुझे कि मेरे बच्चे का पिता मुल्ला नसरुद्दीन नहीं है ।'
हमारा जैसा मन है, उसमें हम सदा दूसरे को ही जिम्मेवार ठहराते हैं ।
मुल्ला अपने घर के बाहर पाउडर छिड़क रहा था । एक आदमी वहां से निकल रहा था । उसने पूछा -- मुल्ला, क्या कर रहे हो, पाउडर क्यों छिड़कते हो ? मुल्ला ने कहा -- बाघों को दूर भगाने के लिए । उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - लेकिन यहाँ 50 किलोमीटर तक कोई बाघ नहीं है । मुल्ला ने कहा -- मेरे इस पाउडर की वजह से, तारीफ़ के लिए धन्यवाद !!
मुझे तो याद नहीं है कोई खुशी ऐसी
शरीक जिसमें किसी तरह का मलाल न था
श्रद्धा
कथा :
रामकृष्ण के पास केशवचंद्र मिलने गये । और केशवचंद्र ने कहा कि मेरा ईश्वर पर भरोसा नहीं है ! मैं विवाद करने आया हूं । मैं आपके भरोसे को खंडित कर दूंगा । आप मेरी चुनौती स्वीकार करें । रामकृष्ण ने कहा -- बहुत मुश्किल है । तुम यह कर न पाओगे । तुम्हारी हार निश्चित है । नहीं कि मैं विवाद कर सकता हूं । नहीं कि मेरे पास कोई तर्क है । मेरे पास कोई तर्क नहीं, लेकिन मैंने प्रभु को जाना है । तुम लाख खंडन करो, क्या फर्क पड़ता है ? मैं फिर भी जानता हूं कि परमात्मा है । यह मेरा अपना निजी अनुभव है, तुम इसे छीन न सकोगे । यह मेरी श्वास-श्वास में समाया है । यह मेरे हृदय की धड़कन- धड़कन में व्यापा है । यह मेरे रोएं-रोएं की पुकार है, इसे तुम छीन न सकोगे । तुम्हारे तर्क का उत्तर मैं न दे पाऊंगा, केशवचंद्र । तुम बुद्धिमान हो, शास्त्रज्ञ हो, ज्ञानी हो, पंडित हो; मैं अनपढ़ गंवार हूं-रामकृष्ण ने कहा । लेकिन उलझोगे तो गंवार से जीतोगे नहीं, क्योंकि मेरे कोई सिद्धांत थोड़े ही हैं, कोई विश्वास थोड़े ही हैं । ऐसा मेरा अनुभव है । तुम मेरे अनुभव को कैसे खंडित करोगे ? जो मैंने जाना है उसे तुम कैसे अनजाना करवा दोगे ? मैंने इन आंखों से देखा है । लाख दुनिया कहे सारी दुनिया एक तरफ हो जाये और कहे कि ईश्वर नहीं है, तो भी मैं कहता रहूंगा, है । क्योंकि मैंने तो जाना है !
केशव तो नहीं माने, उन्होंने तो बड़ा विवाद किया । और रामकृष्ण उनके विवाद को सुनते रहे एक भी तर्क का उत्तर न दिया । बीच-बीच में जब केशवचंद्र कोई बहुत गंभीर तर्क उठाते तो वे खड़े हो-हो कर केशवचंद्र को गले लगा लेते । केशवचंद्र बहुत बेचैन होने लगे, वह जो भीड़ इकट्ठी हो गयी थी देखने, केशवचंद्र के शिष्य आ गये थे कि बड़ा विवाद होगा, वे भी जरा बेचैन होने लगे । और केशवचंद्र को भी पसीना आने लगा । और केशवचंद्र ने कहा, यह मामला क्या है ? आप होश में हैं ? मैं आपके विपरीत बोल रहा हूं !
रामकृष्ण ने कहा कि तुम सोचते हो कि मेरे विपरीत बोल रहे हो । तुम्हें देख कर मुझे परमात्मा पर और भरोसा आने लगा है । जब ऐसी प्रतिभा हो सकती है संसार में तो बिना परमात्मा के कैसे होगी ? तुम्हारी प्रतिभा अनूठी है । तुम्हारे तर्क बहुमूल्य हैं-बड़ी धार है तुम्हारे तर्कों में । यह प्रमाण है कि प्रभु है । यह तुम्हारा चैतन्य, यह तुम्हारा तर्क, ये तुम्हारे विचार, यह तुम्हारी प्रणाली-इस बात का सबूत है कि परमात्मा है । जब फूल लगते हैं तो सबूत है कि वृक्ष होगा । फूल लाख उपाय करें, वृक्ष को खंडित न कर पायेंगे । उनका होना ही वृक्ष का सबूत हो जाता है । फूल लाख गवाही दें अदालत में जा कर कि वृक्ष नहीं होते हैं, लेकिन फूलों की गवाही ही बता देगी कि वृक्ष होते हैं, अन्यथा फूल कहां से आयेंगे ?
रामकृष्ण ने कहा -- मैं तो गंवार हूं मेरे पास तो कोई प्रतिभा का फूल नहीं है; तुम्हारे पास तो प्रतिभा का कमल है । मैं हजार-हजार धन्यवाद से भरा हूं । इसलिए उठ-उठ कर तुम्हें गले लगता हूं कि हे प्रभु, तूने खूब किया, केशवचंद्र को मेरे पास भेजा ! तेरी एक झलक और मिली ! तुझसे मेरी एक पहचान और हुई ! एक नये द्वार से तुझे फिर देखा ! अब तो कोई लाख उपाय करे केशव, तुम्हें देख लिया, अब तो कभी मान न सकूंगा कि ईश्वर नहीं है ।
केशवचंद्र ने अपने स्मरणों में लिखा है कि जिस एक आदमी से मैं हार गया, वे रामकृष्ण हैं । इस आदमी से जीतने का उपाय न था । उस रात मैं सो न सका और बार-बार सोचने लगा, जरूर इस आदमी को कोई अनुभव हुआ है । कोई ऐसा प्रगाढ़ अनुभव हुआ है कि कोई तर्क उसे डगमगाते नहीं । इतना प्रगाढ़ अनुभव हुआ है कि तर्कों के माध्यम से भी, जो विपरीत तर्क हैं उनसे भी वही अनुभव सिद्ध होता है । नहीं, इस आदमी के चरणों में बैठना होगा । इस आदमी से सीखना होगा । इसे जो दिखाई पड़ा है वह मुझे भी देखना होगा । इसके पास आंख है, मेरे पास तर्क है । तर्क काफी नहीं । तर्क से कब किसी की भूख मिटी है ! और तर्क से कब किसका कंठ तृप्त हुआ ! निश्चित जानने का अर्थ है रामकृष्ण की भांति जानना ।
निश्चित जानने का अर्थ है-विश्वास नहीं; अनुभव से आती है जो श्रद्धा, वही ।
तिब्बत का एक फकीर अपने गुरु के पास गया। गुरु की बड़ी ख्याति थी। और यह फकीर बड़ा श्रद्धालु था। और गुरु जो भी कहता, सदा मानने को तैयार था। इसकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। और शिष्यों को पीड़ा हुई। उन्होंने एक दिन इससे छुटकारा पाने के लिए-एक पहाड़ी के ऊपर बैठे थे-इससे कहा कि अगर तुम्हें गुरु में पूरी श्रद्धा है तो कूद जाओ। तो वह कूद गया। उन्होंने तो पक्का माना कि हुआ खतम। नीचे जाकर देखा तो वह पद्मासन में बैठा था। और ऐसा सौंदर्य और ऐसी सुगंध उन्होंने कभी किसी व्यक्ति के पास न देखी थी, जो उसके चारों तरफ बरस रही थी। वे तो बड़े हैरान हुए। सोचा संयोग है।
संदेह ज्यादा से ज्यादा संयोग तक पहुंच सकता है, कि संयोग की बात है कि बच गया। कोई फिकर नहीं। एक मकान में आग' लगी थी, उन्होंने कहा कि चले जाओ, अगर गुरु पर पूरा भरोसा है। वह चला गया भीतर। मकान तो जलकर राख हो गया। जब वे भीतर गए तो आशा थी कि वह भी जलकर राख हो चुका होगा। वह तो वहां ऐसे बैठा था, जल में कमलवत। आग ने छुआ ही नहीं। उन्होंने सुनी थीं अब तक ये बातें कि ऐसे लोग भी हुए हैं-जल में कमलवत, पानी में होते हैं और पानी नहीं छूता। आज जो देखा, वह अदभुत चमत्कार था! आग में था और आग ने भी न छुआ। पानी न छुए, समझ में आता है!
अब संयोग कहना जरा मुश्किल मालूम पड़ा। गुरु के पास ये खबरें पहुंची। गुरु को भी भरोसा न आया, क्योंकि गुरु खुद ही इतनी श्रद्धा का आदमी न था। गुरु ने सोचा कि संयोग ही हो सकता है, क्योंकि मेरे नाम से हो जाए! अभी तो मुझे ही भरोसा नहीं कि अगर मैं जलते मकान में जाऊं तो बचकर लौटूंगा, कि मैं कूद पड पहाड़ से और कोई हाथ मुझे सम्हाल लेंगे अज्ञात के। तो गुरु ने कहा कि देखेंगे। एक दिन नदी के तट से सब गुजरते थे। गुरु ने कहा कि तुझे मुझ पर इतना भरोसा है कि आग में बच गया, पहाड़ में बच गया, तू नदी पर चल जा। वह शिष्य चल पड़ा। नदी ने उसे न डुबाया। वह नदी पर ऐसा चला जैसे जमीन पर चल रहा हो। गुरु को लगा कि निश्चित ही मेरे नाम का चमत्कार है। अहंकार भयंकर हो गया। कुछ था तो नहीं पास।
उसने सोचा, जब मेरा नाम लेकर कोई चल गया, तो मैं तो चल ही जाऊंगा। वह चला, पहले ही कदम पर डुबकी खा गया। किसी तरह बचाया गया। उसने पूछा कि यह मामला क्या है मैं खुद डूब गया! वह शिष्य हंसने लगा। उसने कहा, मुझे आप पर श्रद्धा है, आपको अपने पर नहीं। श्रद्धा बचाती है।
अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतना-रहित होकर निरर्थक काठ के टुकडे की भांति पृथ्वी पर पड रहेगा ।
संत थेरेसा, एक ईसाई फकीर औरत हुई। वह एक बहुत बड़ा चर्च बनाना चाहती थी; बहुत बड़ा, कि जमीन पर इतना बड़ा कोई चर्च न हो। उसके शिखर आकाश को छुएं, और उसके शिखर स्वर्णमंडित हों, और स्वर्ण में हीरे जड़े हों। वह दिन-रात उसी की कल्पना करती थी। फिर एक दिन उसने गांव में आकर कहा कि मुझे कोई कुछ दान कर दो। मैं एक बहुत बड़ा चर्च, मंदिर बनाना चाहती हूं प्रभु के लिए।
लेकिन जैसे कि सब गांव के लोग होते हैं, वैसे ही उस गांव के लोग भी थे। उसने बहुत, अगर उसके पास डब्बा रहा होगा, तो बहुत बजाया। तीन नए पैसे लोगों ने दिए। लेकिन थेरेसा नाचने लगी, और लोगों से बोली कि अब चर्च बन जाएगा। लोगों ने कहा, डब्बा तो इतना छोटा है, चर्च बहुत बड़ा। क्या डब्बा पूरा भर गया? तो भी क्या होगा?
डब्बा खोला। भरा तो क्या था, कुल तीन पैसे थे! फिर भी संत थेरेसा ने कहा कि नहीं, बन जाएगा चर्च। लोगों ने कहा, तू पागल तो नहीं हो गई। तीन पैसे में उतना बड़ा चर्च बनाने का इरादा रखती है! एक ईंट भी न आएगी! तू है दुबली-पतली गरीब औरत, और ये तीन पैसे हैं। तू + तीन पैसे! कितना बड़ा चर्च बनाने का इरादा है? हिसाब क्या है?
संत थेरेसा ने कहा -- तुम, एक और मौजूद है हम दोनों के बीच, उसे नहीं देख रहे हो। मैं , परमात्मा, तीन पैसे--जोड़ो। चर्च बन जाएगा। जोड़ो! मुझमें तो कुछ भी नहीं है; मुझसे क्या होगा! तीन पैसे में क्या रखा है, उससे क्या होगा! लेकिन हम दोनों की जितनी ताकत थी, वह हमने पूरी लगा दी। अब परमात्मा बीच में है, वह सम्हाल लेगा।
और जिस जगह पर संत थेरेसा ने यह कहा था, उस जगह पर संत थेरेसा का कैथेड्रल है--जमीन पर श्रेष्ठतम मंदिरों में से एक। वह अब भी खड़ा है। उस चर्च के नीचे पत्थर पर यह लिखा है कि हम हार गए इस गांव के लोग इस गरीब औरत से, जिसने कहा, तीन पैसे, मैं और धन एक और, जो तुम्हें नहीं दिखाई पड़ता, मुझे दिखाई पड़ता है।
श्रद्धा का इतना ही अर्थ है। श्रम आपका, शक्ति आपकी, लेकिन काफी नहीं; तीन पैसे से ज्यादा नहीं पड़ेगी। योग आपका, लेकिन तीन पैसे से ज्यादा का नहीं हो पाएगा।
डर विश्वास से विपरीत होता हैं जब हमें डर लगता हैं तब हम भगवान् तक ये संदेश भेजते हैं की हम उसपर विश्वास नहीं करते हैं ।
क छोटी—सी नदी सागर से मिलने को चली है। नदी छोटी हो या बड़ी, सागर से मिलने की प्यास तो बराबर ही होती है, छोटी नदी में भी और बड़ी नदी में भी। छोटा—सा झरना भी सागर से मिलने को उतना ही आतुर होता है, जितनी कोई बड़ी गंगा हो। नदी के अस्तित्व का अर्थ ही सागर से मिलन है।
नदी भाग रही है सागर से मिलने को, लेकिन एक रेगिस्तान में भटक गई, एक मरुस्थल में भटक गई। सागर तक पहुंचने की कोशिश व्यर्थ मालूम होने लगी, और नदी के प्राण संकट में पड़ गए। रेत नदी को पीने लगी। दो—चार कदम चलती है, और नदी खोती है, और सिर्फ गीली रेत ही रह जाती है।
नदी बहुत घबड़ा गई। सागर तक पहुंचने के सपने का क्या होगा? नदी ने रोकर, चीखकर रेगिस्तान की रेत से पूछा कि क्या मैं सागर तक कभी भी नहीं पहुंच पाऊंगी? क्योंकि रेगिस्तान मालूम पड़ता है अनंत, और चार कदम मैं चलती नहीं हूं और रेत में मेरा पानी खो जाता है, मेरा जीवन सूख जाता है! मैं सागर तक पहुंच पाऊंगी या नहीं?
रेत ने कहा कि सागर तक पहुंचने का एक उपाय है। ऊपर देख, हवाओं के बवंडर जोर से उड़े चले जा रहे हैं। रेत ने कहा कि अगर तू भी हवाओं की तरह हो जा, तो सागर तक पहुंच जाएगी। लेकिन अगर नदी की तरह ही तूने सागर तक पहुंचने की कोशिश की, तो रेगिस्तान बहुत बड़ा है, यह तुझे पी जाएगा। और हजारों—हजारों साल की कोशिश के बाद भी तू एक दलदल से ज्यादा नहीं हो पाएगी, सागर तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। तू हवा की यात्रा पर निकल।
उस नदी ने कहा कि रेत, तू पागल तो नहीं है? मैं नदी हूं मैं आकाश में उड़ नहीं सकती! रेत ने कहा कि तू अगर मिटने को राजी हो, तो आकाश में भी उड़ने का उपाय है। अगर तू तप जाए, वाष्पीभूत हो जाए, तो तू हवाओं पर सवार हो सकती है, हवाएं तेरे वाहन बन जाएंगी और तुझे सागर तक पहुंचा देंगी।
उस नदी ने कहा, मिटने को! मैं स्वयं रहते ही सागर से मिलने की आकांक्षा रखती हूं, मिटकर नहीं। मिटकर मिलने का मजा ही क्या? अगर मैं मिट गई और सागर से मिलना भी हो गया, तो उसका सार क्या है? मैं बचते हुए, रहते हुए सागर से मिलना चाहती हूं।
नदी की बात को सुनकर रेत ने कहा, तब फिर कोई उपाय नहीं है। आज तक सागर से मिलने जो भी चला है, मिटे बिना नहीं मिल पाया है। और जिसने अपने को बचाने की कोशिश की है, वह मरुस्थल में खो गया है। मैंने और नदियों को भी मरुस्थल में खोते देखा है, और मैंने कुछ नदियों को आकाश पर चढ़कर सागर तक पहुंचते भी देखा है। तू मिटने को राजी हो जा। तुझे अभी पता नहीं कि मिटकर ही तू वस्तुत: सागर हो पाएगी।
लेकिन नदी को भरोसा कैसे आए! नदी ने कहा, यह मेरा अनुभव नही है। मिटने की हिम्मत नहीं जुटती। और फिर अगर मैं सागर से मिल भी गई मिटकर, तो सागर में मेरा होना रहेगा! मैं बचूंगी! क्या भरोसा? कैसे श्रद्धा करूं? जो मेरा अनुभव नहीं है, उसे कैसे मानूं?
तो उस मरुस्थल की रेत ने कहा, दो ही उपाय हैं। या तो अनुभव हो, तो मानना आ जाता है; और या मानना हो, तो अनुभव की यात्रा शुरू होती है। अनुभव तुझे नहीं है, और बिना यह माने कि मिटकर भी तू बचेगी, तुझे अनुभव भी कभी नहीं होगा। इसे तू श्रद्धा से स्वीकार कर ले।
भगवान् के सामने जो इन्सान झुकता हैं वो सबको अच्छा लगता हैं, लेकिन जो सब के सामने झुकता हैं वो इन्सान भगवान् को अच्छा लगता हैं ।
एक गांव में बुद्ध ठहरे, और एक अंधे आदमी को लोग उनके पास लाए। और उन .लोगों ने कहा कि यह अंधा मित्र है हमारा, बहुत घनिष्ठ मित्र है। लेकिन यह बड़ा तार्किक है। और हम पांच आंख वाले भी इसको समझा नहीं पाते कि प्रकाश है। और यह हंसता है और हमारे तर्क सब तोड़ देता है। और कहता है कि तुम मुझे अंधा सिद्ध करने के लिए प्रकाश का सिद्धांत गढ़ लिए हो।
यह अंधा आदमी कहता है कि प्रकाश वगैरह है नहीं। तुम सिर्फ मुझे अंधा सिद्ध करना चाहते हो, इसलिए प्रकाश का सिद्धांत गढ़ लिए हो, तुम सिद्ध करो। अगर प्रकाश है, तो मैं उसे छूकर देखना चाहता हूं। क्योंकि जो भी चीज है, वह छूकर देखी जा सकती है। अगर तुम कहते हो, छूने में संभव नहीं है, तो मैं चखकर देख सकता हूं। अगर तुम कहते हो, उसमें स्वाद नहीं है, तो मैं सुन सकता हूं। तुम प्रकाश को बजाओ। मेरे कान सुनने में समर्थ हैं। अगर तुम कहते हो, वह सुना भी नहीं जा सकता, तो तुम मुझे प्रकाश की गंध दो, तो मैं सूंघ लूं।
मेरे पास चार इंद्रियां हैं। तुम इन चारों में से किसी से प्रकाश से मेरा मिलन करवा दो। और अगर तुम चारों से मिलन करवाने में असमर्थ हो, तो तुम झूठी बातें मत करो। न तो तुम्हारे पास आंख है और न मेरे पास आंख है। लेकिन तुम चालाक हो और मैं सीधा—सादा आदमी हूं। और तुमने मुझे अंधा सिद्ध करने के लिए प्रकाश का सिद्धांत गढ़ लिया है।
उन पाचों मित्रों ने कहा कि इस अंधे को हम कैसे समझाएं? न हम चखा सकते, न स्पर्श करा सकते, न कान में ध्वनि आ सकती। प्रकाश को कैसे बजाओ? तो हम आपके पास ले आए हैं। और आप हैं बुद्ध पुरुष, आप हैं परम ज्ञान को उपलब्ध। इतना ही काफी होगा कि हमारे अंधे मित्र को आप प्रकाश के संबंध में कुछ समझा दें।
बुद्ध ने कहा, तुम गलत आदमी के पास आ गए। मैं तो समझाने में भरोसा ही नहीं करता। तुम किसी वैद्य के पास ले जाओ इस अंधे आदमी को। इसकी आंख का इलाज करवाओ। समझाने से क्या होगा? तुम पागल हो? अंधे को समझाने बैठे हो। इसमें तुम्हारा पागलपन सिद्ध होता है। तुम इसकी चिकित्सा करवाओ। तुम इसे वैद्य के पास ले जाओ। इसकी आंख अगर ठीक हो जाए, तो तुम्हारे बिना तर्क के भी, तुम्हारे बिना समझाए यह प्रकाश को जानेगा। और तुम अगर इनकार करोगे कि प्रकाश नहीं है, तो यह सिद्ध करेगा कि प्रकाश है। आंख के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं है।
संयोग की बात थी कि वे उसे वैद्य के पास ले गए। उन्हें यह कभी खयाल ही नहीं आया था। वे सभी पंडित थे, सभी ब्राह्मण थे, सभी ज्ञानी थे। सब तरह से तर्क लगाकर समझाने की कोशिश कर ली थी। यह उन्हें खयाल ही चूक गया था कि आंख न हो तो प्रकाश को समझाया कैसे जाए! प्रकाश कोई समझाने की बात नहीं, अनुभव की बात है।
चिकित्सक ने कहा कि पहले क्यों न ले आए? इस आदमी की आंख अंधी नहीं है, केवल जाली है। और छ: महीने की दवा के इलाज से ही जाली कट जाएगी। यह आदमी देख सकेगा। तुम इतने दिन तक कहां थे?
उन्होंने कहा, हम तो तर्क में उलझे थे। हमें न इस अंधे आदमी की आंख से कोई प्रयोजन था। हमें तो अपने सिद्धांत समझाने में रस था। वह तो बुद्ध की कृपा कि उन्होंने कहा कि चिकित्सक के पास ले जाओ।
छ: महीने बाद उस आदमी की आंख ठीक हो गई। तब तक बुद्ध तो बहुत दूर जा चुके थे। लेकिन वह आदमी बुद्ध को खोजता हुआ उनके गांव तक पहुंचा। उनके चरणों पर गिर पड़ा। बुद्ध को तो खयाल भी नहीं रहा था कि वह कौन है। बुद्ध ने पूछा, तू इतना क्यों आनंदित हो रहा है? तेरी क्या खुशी? इतना उत्सव किस बात का? तू किस बात का धन्यवाद देने आया है? मेरे चरणों में इतने आनंद के आंसू क्यों बहा रहा है? उसने कहा कि तुम्हारी कृपा। मैं यह कहने आया हूं कि प्रकाश है।
प्रकाश तभी है, जब आंखें हैं ।
संसार में अहंकार महत्वाकांक्षा, संघर्ष आधार है, । अध्यात्म में निरअहंकारिता, महत्वाकांक्षा से शून्य हो जाना, एक गहरी विनम्रता, कोई दौड़ नहीं, कोई पागलपन नहीं, कोई यात्रा नहीं।
उधार की बेहोशी
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन अपने एक मित्र के साथ, कड़ी धूप है और वृक्ष की छाया में बैठा है । झटके से उठ कर बैठ गया और कहने लगा कि प्रभु करे कभी वे दिन भी आएं । आएंगे जरूर । देर है, अंधेर तो नहीं है । जब अपना भी महल होगा, सुंदर झील होगी, घने वृक्षों की छाया होगी । विश्राम करेंगे वृक्षों की छाया में । झील पर तैरेंगे । और ढेर की ढेर आइसक्रीम !
मित्र भी उठ कर बैठ गया । उसने कहा, एक बात बड़े मियां, अगर मैं आऊं तो आइसक्रीम में मुझे भी भागीदार बनाओगे या नहीं ? मुल्ला ने कहा, इतना ही कह सकते हैं कि अभी कुछ न कह सकेंगे । अभी कुछ नहीं कह सकते । अभी तुम बात मत उठाओ । उस आदमी ने कहा, चलो छोड़ो आइसक्रीम । वृक्ष की छाया में तो विश्राम करने दोगे, झील पर तो तैरने दोगे । मुल्ला सोच में पड़ गया । उसने कहा कि नहीं, अभी तो इतना ही कह सकते हैं कि अभी हम कुछ नहीं कह सकते ।
वह आदमी बोला, अरे हद हो गई ! वृक्षों की छाया में विश्राम भी न करने दोगे ? नसरुद्दीन ने कहा, आदमी कैसे हो ? आलस्य की भी सीमा होती है । अरे, अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाओ, मेरे घोड़ों पर क्यों सवार होते हो ? न कोई महल है, न कोई झील है, अपने घोड़े भी नहीं दौड़ा सकते ? इसमें भी उधारी ? इसमें भी तुम मेरे घोड़ों पर सवार हो रहे हो ?
आदमी पर खुद की कल्पना तो चढ़ ही जाती है, दूसरों की भी चढ़ जाती है । आदमी इतना बेहोश है ।
तुम जरा कभी सोचना कि 'मैं कौन हूं', जो भी उत्तर आयें तुम हैरान होओगे, ये बाहर से दिये गये उत्तर हैं । कोई तुम्हारी मां ने दिया था, कोई तुम्हारे पिता ने, कोई तुम्हारे मित्र ने, कोई तुम्हारी पत्नी ने, कोई तुम्हारे शत्रु ने, कोई अपनों ने, कोई परायों ने । इन सबको इकट्ठा कर के तुमने एक घास-फूस की झूठी प्रतिमा खड़ी कर ली है । और निश्चित ही यह प्रतिमा प्रतिपल घबड़ायी रहती है, क्योंकि यह बिलकुल झूठी है । यह कभी भी गिर सकती है और बिखर सकती है । इसमें कोई बल नहीं है, कोई प्राण नहीं है ।
ठीक से जो अपने को समझेगा, वह शून्य समझेगा। गलत जो अपने को समझेगा, वह अपने को बहुत कुछ समझेगा।
एक दिन अहमक अहमदाबादी सुबह-सुबह उदास सिर झुकाए बैठे थे, तभी उनके एक दोस्त ने पूछा: 'भाई, क्या बात है, क्यों उदास हो?' उन्होंने उत्तर दिया: 'पहले पंद्रह रुपए किलो घी मिलता था और अब दस रुपए किलो हो गया है।' यह सुन कर दोस्त ने कहा: 'फिर तो तुम्हें खुश होना चाहिए। एक किलो घी लेने पर पांच रुपए बचेंगे।' उन साहब ने कहा: 'यही तो दुख है। पहले में घी न खा कर पंद्रह रुपए बचाता था, अब सिर्फ दस रुपए बचेंगे।'
मान्यता का असर
कथा :
बगदाद के बाहर खलीफा उमर शिकार को गया था । और उसने एक बड़े अंधड़ की तरह एक काली छाया को आते देखा । तो उसने रोका । उसने कहा, रुक ! मैं खलीफा उमर हूं । और बगदाद में प्रवेश के पहले मेरी आज्ञा चाहिए । तू है कौन ? उसने कहा, क्षमा करें मैं मृत्यु हूं । और पांच हजार लोगों को मरना है बगदाद में । और मृत्यु किसी की आज्ञा नहीं मानती । खलीफा आप होंगे । क्षमा करें । पांच हजार लोग मरने को हैं, इतना आपको कह देती हूं ।
महाप्लेग फैली । और कहते हैं, पचास हजार लोग मरे । खलीफा बहुत नाराज हुआ । वह बाहर राह देखता रहा । जब प्लेग खतम होने लगी और गांव से बीमारी समाप्त होने लगी तो वह बाहर आकर खड़ा रहा । फिर अंधड़ की तरह निकली मौत और उसने पूछा, रुक । आज्ञा न मान, ठीक; लेकिन मौत होकर झूठ बोलना कब से सीखा ? तूने कहा, पांच हजार मारने हैं, पचास हजार मर गए । उसने कहा, क्षमा करें, मैंने पांच हजार ही मारे । बाकी पैंतालीस हजार अपने ही भय से मर गए । मैंने उनको मारा ही नहीं है ।
आदमी की हजार बीमारियों में नौ सौ निन्यानवे अपनी ही पैदा की होती हैं । मान लेता है ।
मान लेता है तो घटना घट जाती है ।
एक मनोवैज्ञानिक रूस में एक छोटा सा प्रयोग कर रहा था। वह इस बात का पता लगाना चाहता था कि क्या कोई बात कठिन और कठिन और कठिन दोहराए जाने से कठिन हो जाती है? विश्वविद्यालय की एक गणित की कक्षा--तीस विद्यार्थियों पर उसने एक प्रयोग किया। पंद्रह विद्यार्थियों को एक कमरे में ले गया, पंद्रह को दूसरे कमरे में ले गया। एक ही कक्षा के विद्यार्थी, एक ही बुद्धि के, एक ही बुद्धिमत्ता के। पहले पंद्रह विद्यार्थियों के सामने उसने तख्ते पर उसने गणित का एक सवाल लिखा और लिख कर कहा कि यह सवाल मैं आशा नहीं करता हूं कि तुममें से कोई भी हल कर सकेगा। यह बहुत कठिन है। यह इतना कठिन है कि जमीन पर मुश्किल से दस-पांच गणितज्ञ हैं, जो इसे हल कर सकते हैं। तुम्हारी कोई सामर्थ्य नहीं। लेकिन तुम पूछोगे कि फिर तुम्हें हल करने को दिया क्यों जा रहा है? यह इसलिए दिया जा रहा है कि हम इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि क्या विश्वविद्यालय के इस कक्षा के वर्ग के विद्यार्थी इस सवाल को हल करने की दिशा में एकाध-दो कदम भी ठीक उठा सकते हैं या नहीं। पूरे सवाल के ठीक होने की तो कोई संभावना ही नहीं। लेकिन अगर एकाध-दो कदम भी तुम ठीक उठा लो, ठीक दिशा में, तो भी बड़े गौरव की बात होगी। देखो, कोशिश करो, शायद एकाध व्यक्ति ठीक दिशा में एकाध-दो कदम उठा सके। सवाल बहुत कठिन है। आशा कोई भी नहीं है। तुमसे बड़ी कक्षा के विद्यार्थी भी असफल हो गए हैं, लेकिन शायद!
उन विद्यार्थियों ने जब यह बात सुनी, तो उनके हाथ ढीले पड़ गए। उनके प्राणों में जो ऊर्जा उठती सवाल को हल करने के लिए, वह सो गई। जो शक्ति जगती और चुनौती को स्वीकार करती, उसने पहले ही स्वीकार कर लिया कि हल नहीं हो सकता है। जो बात हल नहीं हो सकती, फिर प्राण उससे संघर्ष लेना बंद कर देते हैं।
वे सवाल को मुर्दा, उदास, सुस्त हाथों से हल करने लग गए। पहले ही निश्चय है कि सवाल हल नहीं हो सकता। पहले से ही परिणाम जाहिर है कि असफलता होनी है।
और जब पहले ही असफलता पता हो, तो क्या सफलता की दिशा में आपके कदमों में प्राण हो सकते हैं, गति हो सकती है, शक्ति हो सकती है? वे सवाल को हल करने में लग गए हैं, जानते हुए कि सवाल हल नहीं होगा।
और वह मनोवैज्ञानिक दूसरे पंद्रह विद्यार्थियों के पास गया। तख्ते पर उसने वही सवाल लिख दिया है और उन विद्यार्थियों से कहा कि यह सवाल बहुत सरल है। यह इतना सरल है कि तुमसे नीचे की कक्षाओं के विद्यार्थी इसे पूरा का पूरा हल कर लिए हैं। लेकिन तुम पूछोगे कि फिर हमें यह सवाल क्यों दिया जा रहा है, जब इतना सरल है? उसने कहा कि मैं कोई शोधकार्य कर रहा हूं और पता लगाना चाहता हूं कि क्या इस ऊंची कक्षा में एकाध भी ऐसा विद्यार्थी आ गया है, जो इस सवाल को हल न कर सके? हम उस विद्यार्थी का पता लगा रहे हैं कि क्या हमारी परीक्षाओं को पार करके ऐसे विद्यार्थी भी आ जाते हैं, जो इतना सरल सवाल हल न कर सकें? कोई भी नहीं असफल होगा। तुमसे नीची कक्षाओं के विद्यार्थी सफल हो गए हैं। पूरा सवाल हल कर लिया है। सवाल बहुत सरल है।
वे पंद्रह विद्यार्थी भी सवाल हल करने में लग गए हैं। लेकिन उनकी हालत बहुत जुदा और भिन्न है। वे जानते हैं कि सवाल हल होगा। वे जानते हैं कि सवाल हल होना ही है। वे जानते हैं कि नीचे की कक्षाओं में सवाल हल हो गया, तो क्या हम हार जाएंगे! इतना सरल सवाल है। उनके प्राण की ऊर्जा जग गई है और वे प्रफुल्लता से, आनंद से सवाल हल करने में लग गए। सवाल वही है। और घंटे भर बाद जब उनका सवाल पूरा हो चुका, तो पहली कक्षा में, जहां कहा गया था, सवाल कठिन है, केवल तीन विद्यार्थी सवाल हल कर पाए, बारह विद्यार्थी असफल हो गए। और दूसरी कक्षा में एक विद्यार्थी असफल हुआ, चौदह विद्यार्थी सफल हो गए।
सवाल वही था, विद्यार्थी एक ही वर्ग के थे। क्या हो गया? एक भावदशा निर्मित हो गई कि कठिन है। एक भावदशा निर्मित हो गई कि सरल है। और जिस भावदशा को लेकर हम पहला कदम रखते हैं, उसी भावदशा पर अंतिम कदम पूरा हो जाता है।
पांच हजार वर्षों का इतिहास ईश्वर को कठिन, कठिन, कठिन दोहरा रहा है। फिर बात इतनी कठिन हो गई कि मनुष्य ने उस दिशा में देखना भी बंद कर दिया है। जो हमारे सामर्थ्य के बाहर है। वह हमारी आकांक्षा नहीं बन सकता है। जो हमारी शक्ति के बाहर है, हमारी अभीप्सा नहीं बन सकता। ठीक है कि कभी मंदिर में हम फूल चढ़ा दें; ठीक है कि कभी किसी व्रत-त्यौहार पर उसका स्मरण कर लें। लेकिन हमारी सामर्थ्य के बाहर है, हमसे बहुत दूर है।
समर्पण के द्वार के अतिरिक्त सत्य कभी किसी और द्वार से न आया है, न आ सकता है।
जापान में कोई तीन सौ वर्ष पहले एक छोटे से राज्य पर पड़ोस के बड़े राजा ने हमला बोल दिया। राजा बड़ा है हमलावर। आक्रामक बहुत शक्तिशाली है। कोई दस गुनी ताकत है उसके पास, और राज्य छोटा है जिस पर हमला हुआ है, बहुत गरीब है। न सैनिक हैं, न युद्ध का सामान है, न सामग्री है। सेनापति घबड़ा कर राजा से बोला है कि मेरी सामर्थ्य के बाहर है कि मैं युद्ध पर जाऊं। कैसे जाऊं, यह जानते हुए कि अपने सैनिकों की हत्या करवानी है। और हार निश्चित है। मैं इनकार करता हूं, मुझे क्षमा कर दें। मैं इस युद्ध में नहीं जा सकूंगा। कोई मौका ही नहीं है जीतने का। दस गुने सिपाही हैं इसकी तरफ। दस गुनी युद्ध की सामग्री है। आधुनिक उपाय हैं और हमारे पास कुछ भी नहीं। हार निश्चित है, इसलिए हार ही जाना उचित है। व्यर्थ लोगों को कटवाने से क्या प्रयोजन?
राजा भी डर रहा है। वह भी जानता है कि बात सच है। सेनापति को कायर कहना उचित नहीं है। उसने और युद्ध लड़े हैं। आज पहली दफा वह इनकार कर रहा है और इनकार करने में कायरता नहीं काम कर रही है; सीधी बात है। साफ गणित जैसी बात है; दो और दो चार जैसी बात है। हार निश्चित है। लेकिन राजा का मन नहीं मानता कि बिना हारे और हार जाएं। वह रात भर बेचैन रहा है। सुबह उसने अपने वजीर को पूछा है, क्या करना है, दुश्मन रोज आगे बढ़ आते हैं?
उस वजीर ने कहा कि मैं एक फकीर को जानता हूं। जब भी मेरे जीवन में कोई उलझन आई है, उसी के पास गया हूं। आज तक बिना सुझाव के वापस नहीं लौटा। सुबह है, आप चले चलें। पूछ लें उससे।
वे फकीर के दरवाजे पर पहुंच गए हैं। सेनापति भी साथ है। फकीर हंसने लगा। उसने कहा कि छोड़ो, इस सेनापति को छोड़ो। क्योंकि जो जाने के पहले कहता है कि हार जाना निश्चित है, उसके जीत की तो कोई संभावना नहीं रह गई। मैं चला जाता हूं सेनापति की जगह सेनाओं को लेकर।
राजा और भी डरा। सेनापति अनुभवी है। अनेक युद्धों में लड़ा और जीता है। यह फकीर, जो तलवार पकड़ना भी नहीं जानता है! लेकिन फकीर ने कहा, बेफिक्र रहो, आठ-दस दिन के भीतर हम जीत कर वापस लौट आएंगे। फकीर सेनाओं को लेकर रवाना हो पड़ा। सेनाएं घबड़ा रही हैं, उनके हाथ-पैर कंप रहे हैं सैनिकों के। जब सेनापति इनकार कर दिया, तो एक अजनबी, अनुभवी नहीं है जो, ऐसा फकीर!
लेकिन फकीर गीत गाते हुए चला जा रहा है। फिर वे उस नदी के पास पहुंच गए जिसके उस तरफ दुश्मन का डेरा था। फकीर ने सैनिकों को एक मंदिर के पास रोका और कहा कि रुको। दो क्षण को जरा मैं जाकर मंदिर के देवता से पूछ लूं कि हम जीतेंगे या हारेंगे? मेरी हमेशा की यह आदत रही है। जब भी मुश्किल में पड़ा हूं, इसी मंदिर के देवता से पूछ लेता हूं!
सैनिकों ने कहा, लेकिन देवता--कैसे कहेगा--हम कैसे समझेंगे कि क्या कहा देवता ने? उसने कहा, रास्ता है। मंदिर को घेर कर सैनिक खड़े हो गए हैं। उस फकीर ने अपने खीसे से एक सोने का चमकता हुआ सिक्का निकाला। और कहा कि हे प्रभु! अगर हम जीत कर लौटते हों, तो सिक्का सीधा गिरे। अगर हम हार कर लौटते हों, तो सिक्का उलटा गिरे।
सिक्के को ऊपर फेंका है, हवा में, आकाश में। सूरज की रोशनी में सोने का सिक्का चमक रहा है और सारे सैनिकों के प्राण अवरुद्ध हो गए हैं, श्वास बंद हो गई अब। ठगे हुए देख रहे हैं कि क्या होता है! रुपया नीचे गिरा है। सिक्का सीधा गिरा है। फकीर ने कहा कि देख लो! जीत निश्चित है। सिक्का खीसे में रख लिया है और सैनिक एक नये उत्साह से, एक नये जीवन से युद्ध में कूद पड़े हैं। दस दिन बाद वे जीत कर वापस लौट रहे हैं।
मंदिर के पास आकर सैनिकों ने उस फकीर को कहा कि शायद आप भूल गए! मंदिर के देवता को धन्यवाद तो दे लें! वह फकीर हंसने लगा। उसने कहा, रहने दो। कोई खास जरूरत नहीं है। पर सैनिकों ने कहा, कैसी आप बात करते हैं! कम से कम अनुग्रह तो मान लें! जिसने जीत का संदेश दिया...! उस फकीर ने कहा कि छोड़ो, उस देवता का इसमें कोई संबंध नहीं। धन्यवाद देना हो तो मुझे दे दो। उन सैनिकों ने कहा, तुम्हें! उस फकीर ने खीसे से सिक्का निकाला और कहा, इस सिक्के को देखो। वह दोनों तरफ सीधा था। वह सिक्का उलटा था ही नहीं। उसमें दोनों तरफ ही सीधा था। उस फकीर ने कहा, धन्यवाद देना हो, तो मुझे दे दो। देवता का इसमें कोई हाथ नहीं है।
कैसे जीत कर लौट आए वे सिपाही? क्या हो गया उनके प्राणों को? क्या आप सोचते हैं कि इस फकीर के बिना भी वे जीत कर लौट सकते थे? क्या आप सोचते हैं, अपने सेनापति के साथ वे जीत कर लौट सकते थे? क्या आप सोचते हैं कि एक सिक्के के बिना वे जीत कर लौट सकते थे? क्या आप सोचते हैं कि बिना एक आशा के और इस विश्वास के कि जीत निश्चित है, जीत हो सकती थी?
लेकिन ईश्वर के संबंध में यही हो गया है। उस फकीर का सिक्का दोनों तरफ सीधा था, हमारा सिक्का दोनों तरफ उलटा हो गया है। फेंकते हैं, हमेशा हार! दोनों तरफ उलटा है। और मैं आपसे कहता हूं कि यह दोनों तरफ जो उलटा सिक्का है, यह धर्मगुरुओं ने निर्मित किया है। क्यों? आप कहेंगे, धर्मगुरुओं का इसमें क्या प्रयोजन हो सकता है? उन्हें क्या हित? उन्हें क्या लाभ हो सकता है कि आदमी और ईश्वर में दूरी हो जाए?
अगर आपको थोड़े भी व्यवसाय के नियम याद हैं, तो आपको समझ में आ जाएगा। अगर परमात्मा, आदमी को पाना बहुत सरल है, तो धर्मगुरु की कोई भी जरूरत बीच में नहीं रह जाती। अगर परमात्मा को पाना अति सरल है, तो बीच के दलाल की कोई गुंजाइश, कोई जरूरत नहीं रह जाती। परमात्मा को पाना जितना कठिन है, उतना ही बीच का मीडिएटर, बीच का एजेंट, बीच का दलाल, बीच का व्यवसायी उपयोगी और जरूरी हो जाता है। परमात्मा को पाना कठिन है, तो फिर बीच में गुरु जरूरी है। क्योंकि उस कठिन को पाने के लिए गुरु के बिना ज्ञान कौन बताएगा, रास्ता कौन बताएगा? जो कठिन है, उसको पाने का रास्ता भी दुर्गम है, पहाड़ पर चढ़ने जैसा है, तलवार की धार पर चलने जैसा है। तो उसे बताने के लिए कोई चाहिए रास्ता, कोई हाथ पकड़ कर ले जाने के लिए चाहिए।
ईश्वर को कठिन बता कर धर्मगुरु ने अपनी जरूरत निश्चित कर ली है। और ईश्वर जितना कठिन होता गया, धर्मगुरु का व्यवसाय उतना ही फैलता चला गया, बड़ा होता चला गया।
प्रेम तब खुश होता है जब वो कुछ दे पाता है; अहंकार तब खुश होता है जब वो कुछ ले पाता है ।
एक आदमी भूला-भटका गलती से स्वर्ग पहुंच गया। थका-मांदा था, एक वृक्ष के नीचे लेटा। उसे क्या पता कि यह कल्पवृक्ष है! जब लेटने लगा, कंकड़-पत्थर थे, ऊबड़-खाबड़ जमीन थी--सोचा कि इतना थका हूं कि इस समय अगर सोने के लिए एक सुंदर शय्या मिल जाती, ठीक से विश्राम हो जाता! ऐसा उसका सोचना ही था कि एकदम जैसे शून्य से एक सुंदरतम शय्या प्रकट हुई! सम्राट जिसको देख कर तरस जाएं! वह इतना थका-मांदा था कि उसने यह सोचा भी नहीं कि यह कहां से आई, कैसे आई। वह तो गिर पड़ा और सो गया। जब दो घंटे, तीन घंटे बाद सुस्ता लिया, आंख खुली, बहुत भूख लगी थी, सोचा कि इस समय अगर सुस्वादु भोजन कहीं मिल जाए, कहीं कोई पास में होटल-रेस्तरां इत्यादि होता...यहां कोई दिखाई भी नहीं पड़ता। ऐसी भूख मेरे जीवन में कभी लगी न थी! उसका ऐसा सोचना था कि एकदम थालियों पर थालियां लिए अप्सराएं उपस्थित हो गईं। थोड़ा संदेह तो हुआ, मगर भूख इतनी थी कि जल्दी से वह भोजन करने में लग गया। जब भोजन कर चुका, विश्राम कर चुका, तब उसे खयाल आया कि यह मामला क्या है? यह कहां से बिस्तर आया? और कहां से यह भोजन? और कहां से ये सुंदर स्त्रियां? एकदम आकाश से उतर आईं! कहीं कोई भूत-प्रेत तो नहीं है? और एकदम भूत-प्रेत मौजूद हो गए। भूत-प्रेतों को देख कर उसने कहा, मारे गए! अब मारे गए! और वे झपट पड़े और उन्होंने उसकी गर्दन दबा दी और उस आदमी को मार डाला।
मान्यता का सुख
कथा :
एक अमीर आदमी अपनी तिजोड़ी में सोने की ईंट रखे था । रोज खोल कर देख लेता था । अंबार लगा रखा था सोने की ईंटों का । फिर बंद कर देता था । बड़ा प्रसन्न था । उसका बेटा यह देखता था । सारा घर परेशान था । लोग जरूरत की चीजें भी पा नहीं सकते थे और वह ईटं जमाए बैठा था । घर के लोग ही दरिद्रता में जी रहे थे ।
आखिर बेटे ने धीरे- धीरे करके एक-एक ईंट खिसकानी शुरू कर दी और सोने की ईंट की जगह पीतल की ईंटें रखता गया । बाप की प्रसन्नता जारी रही । धीरे-धीरे सब ईंट नदारद हो गईं । लेकिन बाप रोज खोल लेता तिजोड़ी, देखता ईंटें रखी हैं, प्रसन्न होकर ताला बंद कर देता । जिस दिन मर रहा था, उस दिन बेटे ने कहा -- पिताजी, एक बात आपसे कहनी है । यह मजा आप भीतर ही भीतर का ले रहे हैं । ईंट वहां हैं नहीं, क्योंकि ईंट तो हम खिसका चुके हैं बहुत पहले । तत्क्षण बाप दुखी हो गया, छाती पीटने लगा । जिंदगी गुजर गई मजे में, अब यह मरते वक्त दुखी हो गया ।
सोने की ईंट में सुख है या तुम्हारी मान्यता, कि सोने की ईंट है, बहुमूल्य है, अपनी है, मैं मालिक, अपने पास है, इसमें सुख है ।
एक तारों वाला वाद्य उठा लाया था फकीर नसरुद्दीन। पर उस वाद्य की गर्दन पर एक ही जगह उंगली रख कर, और रगड़ता रहता था तारों को। पत्नी परेशान हुई। एक दिन, दो दिन, चार दिन, आठ दिन। उसने कहा, क्षमा करिए, यह कौन सा संगीत आप पैदा कर रहे हैं? मोहल्ले के लोग भी बेचैन और परेशान हो गए। आधी-आधी रात और वह एक ही तूंत्तूं, एक ही बजती रहती थी।
आखिर सारे लोग इकट्ठे हो गए। कहा, नसरुद्दीन, अब बंद करो! बहुत देखे बजाने वाले, तुम भी एक नए बजाने वाले मालूम पड़ते हो! हमने बड़े-बड़े बजाने वाले देखे। आदमी हाथ को इधर-उधर भी सरकाता है, कुछ और आवाज भी निकालता है। यह क्या तूंत्तूं तुम एक ही लगाए रखते हो; सिर पका जा रहा है। मोहल्ला छोड़ने का विचार कर रहे हैं। या तो तुम छोड़ दो, या हम! मगर इतना तो बता दो कि तुम जैसा बुद्धिमान आदमी और यह एक ही आवाज? ऐसा तो हमने कोई संगीतज्ञ नहीं देखा।
नसरुद्दीन ने कहा कि वे लोग अभी ठीक स्थान खोज रहे हैं, मैं पहुंच गया हूं।
ट्रेन में तीन महिलाएं बैठी हुई थीं। आपस में गपशप चल रही थी। उनमें से एक स्त्री, जो कि देखने-दिखाने में साठ साल से कम नहीं लगती थी, बड़े ही मोहक स्वर में बोली, अरे, मेरी उम्र कोई कह नहीं सकता कि मैं चालीस साल की हूं। अभी भी मेरा शरीर-विन्यास अच्छे-अच्छे युवकों को दिल थामने पर मजबूर कर देता है।
उसकी बात सुन कर दूसरी महिला, जो कि चालीस साल की रही होगी, आंखें मटकाती हुई बोली, अरे, यह तो कुछ भी नहीं। मैं खुद तीस साल की हूं, लेकिन लोग मुझे बाईस का समझते हैं। और मुझे देख कर युवक तो युवक किशोर तक दीवाने हो जाते हैं।
यह सब सुन कर तीसरी कैसे चुप रह सकती थी! वह बोली, अरे, यह सब तो कुछ भी नहीं। लोग तो मुझे अभी सोलह साल की ही समझते हैं, जब कि मेरी वास्तविक उम्र बीस साल है। और युवक और किशोरों की तो छोड़ो, छोटे-छोटे बच्चे भी मुझे देख अपना कलेजा थाम लेते हैं।
और उस युवती की उम्र रही होगी कोई तीस साल। मगर स्त्रियां तो स्त्रियां!
मुल्ला नसरुद्दीन ऊपर की बर्थ पर लेटा हुआ था। उनकी बातें सुन कर वह धड़ाम से नीचे आ गिरा। महिलाएं तो एकदम घबड़ा गईं। एकदम बोलीं, अरे आप कहां से आ टपके?
मुल्ला बोला, मैं सीधा परमात्मा के यहां से चला आ रहा हूं, अभी-अभी पैदा हुआ हूं।
सहज बोध
कथा :
जापान में एक साधारण सी चिड़िया होती है, घरों के बाहर, आम गांव में। भूकंप आता है, तो चौबीस घंटे पहले वह चिड़िया गांव को खाली कर देती है। अभी तक वैज्ञानिकों ने भूकंप को पकड़ने के लिए जो यंत्र तैयार किए हैं, वे भी छह मिनट से पहले भूकंप की खबर नहीं देते। और छह मिनट पहले मिली हुई खबर का कोई उपयोग नहीं हो सकता। लेकिन जापान की वह साधारण सी चिड़िया चौबीस घंटे पहले किसी न किसी तरह जान लेती है कि भूकंप आ रहा है। जापान में हजारों साल से उस चिड़िया पर ही अंदाज रखा जाता है। जब वह चिड़िया गांव में नहीं दिखाई पड़ती--और बहुत कामन है, बहुत ज्यादा संख्या में है--जैसे ही गांव में चिड़िया दिखाई नहीं पड़ती, गांव को लोग खाली करना शुरू कर देते हैं। क्योंकि चौबीस घंटे के भीतर भूकंप अनिवार्य है।
लेकिन उस चिड़िया को भूकंप का पता कैसे चलता है? क्योंकि उसके पास कोई तर्क की व्यवस्था नहीं हो सकती। उसके पास कोई गणित नहीं है।
शांति, परम शांति वह है, जहां कोई उत्तेजना नहीं है--न सुख की, न दुख की।
अमरीका में एक आदमी था, Edgar Cayce (1877 – 1945)। वह बेहोश हो जाता था। और किसी भी मरीज को उसके पास बिठा दिया जाए, तो वह बेहोशी में उसकी बीमारी का निदान कर देता था। न तो वह चिकित्सक था, न उसने कोई मेडिकल अध्ययन किया था। और होश में वह किसी तरह की बात नहीं कर सकता था दवा या इलाज के बाबत। लेकिन उसने अपने जीवन में चालीस हजार मरीजों का निदान किया, diagnosis की। बस वह आंख बंद करके ध्यानस्थ हो जाता था। मरीज को बिठा दें, फिर वह बोलना शुरू कर देता था कि इसे क्या बीमारी है। और न केवल यह, वह बोलना शुरू करता था, कौन सी दवा से यह आदमी ठीक होगा। उन दवाओं का उसे होश में पता भी नहीं था। और उसका निदान सदा ही सही निकला। होश में आने पर वह खुद भी कहता था कि मैं नहीं जानता कि इस दवा से फायदा होगा कि नहीं; मैंने इस दवा का नाम कभी सुना नहीं।
कई बार तो ऐसा हुआ कि...एक बार तो उसने एक दवा का नाम एक मरीज के लिए कहा। वह पूरे अमरीका में खोजी गई, वह दवा नहीं मिली। एक वर्ष बाद वह दवा मिल सकी, क्योंकि तब दवा कारखाने में बनाई जा रही थी, अभी बाजार में आई ही नहीं थी। और उसका नाम भी अभी तक तय नहीं हुआ था। और कायसी ने उसका नाम पहले ले दिया था--साल भर पहले। साल भर बाद वह दवा मिली और तभी वह मरीज ठीक हो सका।
एक दवा के लिए सारी दुनिया में खोज की गई, वह कहीं भी नहीं मिल सकी। तब सारे दुनिया के अखबारों में विज्ञापन दिए गए कि इस नाम की दवा दुनिया के किसी भी कोने में उपलब्ध हो, तो एक मरीज बिलकुल मरणासन्न है और कायसी कहता है, इसी दवा से ठीक हो सकेगा। स्वीडन से एक आदमी ने पत्र लिखा कि ऐसी दवा मौजूद नहीं है, लेकिन मेरे पिता ने छब्बीस साल पहले इस तरह की दवा पेटेंट कराई थी। यद्यपि कभी बनाई नहीं और बाजार में वह कभी गई नहीं; लेकिन फार्मूला मेरे पास है। वह फार्मूला मैं भेज सकता हूं, आप चाहें तो बना लें। वह दवा बनाई गई और वह मरीज ठीक हुआ।
कायसी को जो प्रतीति होती थी, वह इंटयूटिव है; यह स्त्रैण-चित्त का लक्षण है। सोच-विचार से नहीं, निर्विचार में निष्कर्ष का प्रकट हो जाना! समस्त ध्यान की प्रक्रियाएं इसी दिशा में ले जाती हैं।
लाओत्से कहता है, सोचोगे तो भटक जाओगे। मत सोचो, और निष्कर्ष आ जाएगा। सोचना छोड़ दो और प्रतीक्षा करो, निष्कर्ष आ जाएगा। तुम सिर्फ प्रतीक्षा करो; प्रश्न तुम्हारे भीतर हो और तुम प्रतीक्षा करो; उत्तर मिल जाएगा। सोचो मत। क्योंकि जब तुम सोचोगे, तुम क्या पा सकोगे? तुम्हारी सामर्थ्य कितनी है? जैसे कोई एक लहर सोचने लगे जगत की समस्याओं को, क्या सोच पाएगी? अच्छा है कि सागर पर छोड़ दे और प्रतीक्षा करे कि सागर ही उत्तर दे दे।
स्त्रैण-चित्त का लाओत्से से प्रयोजन है, छोड़ दो तुम और अस्तित्व को ही उत्तर देने दो। तुम अपने को बीच में मत लाओ। क्योंकि तुम जो भी लाओगे, उसके गलत होने की संभावना है। अस्तित्व जो देगा, वह गलत नहीं होगा।
लुकमान के संबंध में कहा जाता है कि वह--जैसा मैंने कहा कायसी के बाबत कि वह मरीज के पास बेहोश हो जाता था और दवा बता देता था--लुकमान पौधों के पास जाकर ध्यान लगा कर बैठ जाता था और कह देता था पौधों से कि तुम किस काम में, किस बीमारी के काम में आ सकते हो, वह तुम मुझे बता दो! लुकमान ने कोई एक लाख पौधों के संबंध में वक्तव्य दिया है। कोई बड़ी प्रयोगशाला नहीं थी, जिसमें लुकमान जांच-पड़ताल कर सके।
आयुर्वेद के ग्रंथों को भी जब निर्माण किए गए, तब भी कोई बड़ी प्रयोगशालाएं नहीं थीं कि जिनके माध्यम से इतने बड़े निर्णय लिए जा सकें। लेकिन निर्णय आज भी सही हैं। वे निर्णय intuitive हैं। वे निर्णय किसी व्यक्ति के ध्यान में लिए गए निर्णय हैं। सर्पगंधा आयुर्वेद की एक पुरानी जड़ी है। कोई पांच हजार वर्षों से आयुर्वेद का साधक सर्पगंधा का उपयोग करता रहा है नींद लाने के लिए। अभी पश्चिम को प्रयोगशालाओं में सिद्ध हुआ कि सर्पगंधा से बेहतर नींद लाने के लिए कोई tranquilizer नहीं हो सकता है। अब जो पश्चिम में सर्पेन्टिना नाम से चीज उपलब्ध है, वह सर्पगंधा का ही अर्क है। लेकिन अब तो हमारे पास बहुत सूक्ष्म साधन हैं, जिनसे हम जान सकें। लेकिन जिस दिन सर्पगंधा खोजी गई थी, इतने सूक्ष्म साधन नहीं मालूम पड़ते हैं कि थे। उसकी खोज का रास्ता कुछ और रहा होगा।
यहां जो भी घटित होता है समय के भीतर, वह परिवर्तन है।
एक व्यक्ति है अमेरिका मे, नाम है, Ted Serios (1918 – 2006)। हम यहां बैठकर यह जो चर्चा कर रहे हैं, न्यूयार्क में बैठे हुए टेड सीरियो को अगर कहा जाए कि अहमदाबाद में इस मैदान पर क्या हो रहा है; तो वह पांच मिनट आंख बंद करके बैठा रहेगा, फिर आंख खोलेगा, और उसकी आंख में आप सबकी--बैठी हुई--तस्वीर दूसरे देख सकते हैं। और उसकी आंख में जो तस्वीर बन रही है, उसका कैमरा फोटो भी ले सकता है। हजारों फोटो लिए गए हैं, हजारों चित्र लिए गए हैं और टेड सीरियो की आंख कितनी ही दूरी पर, किसी भी तरह के चित्र को पकड़ने में समर्थ है; न केवल देखने में, बल्कि चित्र को पकड़ने में भी।
टेड सीरियो की घटना ने दो बातें साफ कर दी हैं। एक तो संजय कोई सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि टेड सीरियो बहुत साधारण आदमी है, कोई आत्मज्ञानी नहीं है। टेड सीरियो को आत्मा का कोई भी पता नहीं है। टेड सीरियो की जिंदगी में साधुता का कोई भी नाम नहीं है, लेकिन टेड सीरियो के पास एक शक्ति है--वह दूर देखने की। विशेष है शक्ति।
कृत्य तो लहरों की भांति हैं--ऊपर-ऊपर। आत्मा तो गहरे सागर की भांति है--भीतर। सागर हो सकता है बिना लहर के, लहर बिना सागर के नहीं।
हेलेन केलर है। वह अंधी है, बहरी है, गूंगी है। वस्तुतः सिवाय स्पर्श के उसके पास कोई अनुभव की इंद्रिय नहीं है। इसलिये उसके सारे जीवन की ऊर्जा उसके हाथों में आ गई है। उसकी उंगलियां आंख का भी काम करती हैं। उसकी उंगलियां कान का भी काम करती हैं। उसकी उंगलियों जैसी संवेदनशील उंगलियां पृथ्वी पर दूसरी नहीं हैं। क्योंकि आंख, कान, सभी का काम उंगलियों को करना पड़ रहा है। वह लोगों को स्पर्श से याद रखती है। दस-दस साल, बीस-बीस साल बाद जब वह लोगों के हाथ छूती है, तो तत्क्षण याद कर लेती है कि आप वही हैं। वह लोगों के चेहरे को छूती है और उससे ही तय करती है।
नेहरू के चेहरे को छू कर उसने कहा कि यह चेहरा सुंदर है। बहुत सुंदर है। यह ठीक वैसा ही है, जैसी यूनान की संगमर्मर की प्रतिमा है। इसमें वही स्पर्श है। अगर तुम गौर से देखोगे तो नेहरू के चेहरे में निश्चित वही कटाव है, जो संगमर्मर की यूनानी प्रतिमाओं में होता है। वे एक सुंदरतम व्यक्ति थे। लेकिन हेलेन केलर उन्हें छू कर कहती है, तुम्हें शायद देख कर भी एकदम याद न आती यूनानी मूर्तियां। लेकिन स्पर्श ही जिसका सब कुछ है...।
कल्पित-बंधन
कथा :
एक बौद्ध भिक्षु हुआ बहुत अनूठा, नागार्जुन। नागार्जुन के पास एक युवक आया। और उस युवक ने कहा कि मैं भी चाहता हूं कि जान लूं उसको, जो कभी लिप्त नहीं होता। जान लूं उसको, जो अकर्ता है। जान लूं उसको, जो परम आनंदित है, सच्चिदानंदघन है। कोई रास्ता?
नागार्जुन बहुत अपने किस्म का अनूठा गुरु था। उसने कहा कि पहले मैं तुझसे पूछता हूं कि तुझे किसी चीज से लगाव, कोई प्रेम तो नहीं है? उस युवक ने कहा कि कोई ज्यादा तो नहीं है, सिर्फ एक भैंस है मेरे पास, पर उससे मुझे लगाव है। तो नागार्जुन ने कहा कि बस इतना काफी है। इससे काम हो जाएगा। साधना शुरू हो जाएगी।
उस युवक ने कहा कि भैंस से और साधना का क्या संबंध? और मैं तो डर भी रहा था कि यह अपना लगाव बताऊं भी कि नहीं! कोई स्त्री से हो, किसी मित्र से हो, तो भी कुछ समझ में आता है। यह भैंस वाला लगाव! मैंने सोचा था कि इसकी तो चर्चा ही नहीं उठेगी। लेकिन आपने पूछा.।
नागार्जुन ने कहा, बस, तू एक काम कर। यह सामने मेरी गुफा के जो दूसरी गुफा है, उसमें तू चला जा; और एक ही भाव कर कि मैं भैंस हूं। जो तेरा प्रेम है, उसको तू आरोपित कर। बस, तू अपने को भैंस का रूप बना ले। और तू लौटकर मत आना। जब जरूरत होगी, तो मैं आऊंगा। तू तो बस, इतना ही भाव कर, एक ही भाव कि मैं भैंस हूं।
उस युवक ने साधना करनी शुरू की। एक दिन बीता, दो दिन बीता, तीसरे दिन उसकी गुफा से भैंस की आवाज आनी शुरू हो गई। नागार्जुन ने अपने शिष्यों से कहा कि अब चलने का वक्त आ गया। अब चलो, देखो, क्या हालत है।
वे सब वहां अंदर गए। वह युवक दरवाजे के पास ही सिर झुकाए खड़ा था। दरवाजा काफी बड़ा था। बाहर निकल सकता था। लेकिन सिर झुकाए खड़ा था जैसे कोई अड़चन हो। भैंस की आवाज कर रहा था। नागार्जुन ने कहा कि बाहर आ जाओ। उसने कहा कि बाहर कैसे आ जाऊं! मेरे सींग दरवाजे में अड़ रहे हैं। आंखें उसकी बंद हैं।
नागार्जुन के बाकी शिष्य तो बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहा कि सींग दिखाई तो पड़ते नहीं! नागार्जुन ने कहा कि जो नहीं दिखाई पड़ता, वह भी अड़ सकता है। जो नहीं है, वह भी अड़ सकता है। अडूने के लिए होना जरूरी नहीं है, सिर्फ भाव होना जरूरी है। इसका भाव पूरा है।
नागार्जुन ने उसे हिलाया और कहा, आंख खोल। उसने घबड़ाकर आंख खोली, जैसे किसी गहरी नींद से उठा हो। तीन दिन की लंबी नींद, आत्म—सम्मोहन, सेल्फ हिप्नोसिस, तीन दिन तक निरंतर कि मैं भैंस हूं। जैसे बड़ी गहरी नींद से जगा हो। एकदम तो पहचान भी न सका कि क्या मामला है।
नागार्जुन ने कहा कि घबड़ा मत। कहां हैं तेरे सींग? उसने सिर पर हाथ फेरा। उसने कहा कि नहीं, सींग तो नहीं हैं। लेकिन अभी अड़ रहे थे। उसने कहा, वह भी मुझे खयाल है। मैं तीन दिन से निकलने की कोशिश कर रहा हूं। और तुमने कहा था, निकलना मत। मैं तीन दिन से कोशिश करके भी निकल नहीं पा रहा हूं। वे सींग अड़ जाते हैं बीच में। बड़ी तकलीफ भी होती है। टकराता हूं; तकलीफ होती है।
तो नागार्जुन ने कहा, कहां हैं सींग? कहां है तेरा भैंस होना? नागार्जुन ने कहा कि तुझे अब मैं कुछ और सिखाऊं कि बात तू सीख गया? उसने कहा, मैं बात सीख गया। तीन दिन का मुझे मौका और दे दें।
नागार्जुन और उसके शिष्य वापस लौट आए। शिष्यों ने कहा, हम कुछ समझे नहीं। यह क्या वार्तालाप हुआ? नागार्जुन ने कहा, तीन दिन बाद।
तीन दिन तक वह युवक फिर उस कोठरी में बंद था। और जैसे तीन दिन उसने अपने को भैंस होना स्वीकार कर के भैंस बना लिया था, वैसे तीन दिन उसने अस्वीकार किया कि मैं शरीर नहीं हूं मैं मन नहीं हूं। और तीन दिन बाद जब नागार्जुन और उसके शिष्य वहां पहुंचे, तो वह जो व्यक्ति उन्होंने देखा था, वहां जैसे सिर्फ रस्सी की राख रह गई थी, जली हुई।
उस व्यक्ति ने आंख खोली और नागार्जुन ने अपने शिष्यों से कहा, इसकी आंखों में झांको। उन आंखों में जैसे गहरा शून्य था। और नागार्जुन ने पूछा कि अब तुम कौन हो? तो उस व्यक्ति ने कहा कि सिर्फ आकाश। अब मैं नहीं हूं। सब समाप्त हो गया। और जो मैं चाहता था जानना, वह मैंने जान लिया! और जो मैं चाहता था होना, वह मैं हो गया हूं।
जो भी आप सोच रहे हैं कि आप हैं, यह आपकी मान्यता है। यह आटो—हिप्नोसिस है। यह आत्म—सम्मोहन है। और यह सम्मोहन इतना गहरा है, बचपन से डाला जाता है, कि इससे आपको खयाल भी नहीं है कभी कि यह अपनी ही मान्यता है, जो हम अपने चारों तरफ खड़ी कर लिए हैं।
हम अपने बंधन स्वयं माने बैठे हैं ।
अंधेरी रात थी, और कोई आधी रात गए एक रेगिस्तानी सराय में सौ ऊंटों का एक बड़ा काफिला आकर ठहरा । यात्री थके हुए थे और ऊंट भी थके हुए थे । काफिले के मालिक ने खूंटियां गड़वाईं और ऊंटों के लिए रस्सियां बंधवाईं, ताकि वे रात भर विश्राम कर सकें । लेकिन खूंटियां गाड़ते समय पता चला, ऊंट सौ थे, एक खूंटी कहीं खो गई थी । खूंटियां निन्यानबे थीं । एक ऊंट को खुला छोड़ना कठिन था । रात उसके भटक जाने की संभावना थी ।
उन्होंने सराय के मालिक को जाकर कहा कि यदि एक खूंटी और रस्सी मिल जाए, तो बड़ी कृपा हो । हमारी एक खूंटी और रस्सी खो गई है । सराय के मालिक ने कहा -- खूंटियां और रस्सियां तो हमारे पास नहीं हैं । लेकिन तुम ऐसा करो, खूंटी गाड़ दो और रस्सी बांध दो और ऊंट को कहो कि सो जाए ।
वह काफिले का मालिक बहुत हैरान हुआ । उसने कहा -- अगर खूंटी और रस्सी हमारे पास होती, तो हम खुद ही बांध देते । कौन सी खूंटी गाड़ दें और कौन सी रस्सी बांध दें?
उस मालिक ने कहा -- जरूरी नहीं है कि असली खूंटी से ही ऊंट बांधा जाए; नकली खूंटी से भी ऊंट बांधा जा सकता है । तुम एक झूठी खूंटी ही ठोक दो और तुम एक झूठी रस्सी ही ऊंट के गले पर बांधो और उससे कहो कि वह सो जाए ।
कोई रास्ता न था, उन्हें विश्वास तो न आया कि यह बात हो सकेगी । लेकिन उन्होंने झूठी खूंटी गाड़ी जो खूंटी नहीं थी, उसके ऊपर उन्होंने चोटें कीं । ऊंट ने चोटें सुनीं और समझा होगा कि खूंटी गाड़ी जा रही है । और जो रस्सी नहीं थी, उससे उन्होंने ऊंट के गले को बांधा और उसके गले पर हाथ फेरा । ऊंट ने समझा होगा कि रस्सी बांधी जा रही है । और फिर उन्होंने जैसे और सारे ऊंटों को कहा था कि सो जाओ, उसको भी कहा । ऊंट बैठ गया और सो गया ।
सुबह जब काफिला रवाना होने लगा उस सराय से, तो उन्होंने निन्यानबे ऊंटों की खूंटियां उखाड़ीं और रस्सियां खोलीं । सौवें ऊंट की तो कोई खूंटी थी नहीं, न कोई रस्सी थी । इसलिए न तो उन्होंने खूंटी उखाड़ी और न रस्सी खोली । निन्यानबे ऊंट तो उठ कर खड़े हो गए लेकिन सौवें ऊंट ने उठने से इनकार कर दिया ।
वे बहुत परेशान हुए । उन्होंने जाकर फिर उस सराय के बूढ़े मालिक को कहा कि तुमने कौन सा मंत्र किया है, हमारा ऊंट तो जमीन में बंधा रह गया, वह उठ नहीं रहा? सारे ऊंट उठ कर जाने को तैयार हो गए हैं, लेकिन सौवां ऊंट जमीन नहीं छोड़ता है, बैठा हुआ है ।
उस बूढ़े मालिक ने कहा सराय के, पहले जाकर उसकी खूंटी उखाड़ो और उसकी रस्सी खोलो । उन्होंने कहाः लेकिन न तो कोई खूंटी है और न रस्सी है । उस मालिक ने कहाः तुम्हारे लिए नहीं होगी, लेकिन ऊंट के लिए है । जाओ, खूंटी उखाड़ो और रस्सी खोल दो ।
वे गए, उन्होंने उस झूठी खूंटी को उखाड़ा, जो कि नहीं थी और वे रस्सियां खोलीं, जिनका कोई अस्तित्व न था । ऊंट उठ कर खड़ा हो गया और बाकी साथियों के साथ चलने को तैयार हो गया ।
वे बहुत हैरान हुए! और उन्होंने उस मालिक को पूछा कि यह क्या रहस्य है इस बात का? उसने कहाः न केवल ऊंट बल्कि आदमी भी ऐसी खूंटियों से बंधे होते हैं जिनका कोई अस्तित्व नहीं है और ऐसी रस्सियों से परतंत्र होते हैं जिनकी कोई सत्ता नहीं है ।
मैं बाहर हूं, भीतर हूं और जो कुछ प्रतीत होता है वह मैं हूं, इस भ्रम और भावना से मुक्त होकर बारंबार यह विचार करो कि मैं अविचल, ज्ञान-स्वरूप और अकेला हूं ।
एक दोपहर मैं एक जंगल में एक बहेलिए के साथ थोड़ी देर को रुका । उससे मैंने यह बात पूछी थी कि जिन तोतों को तुम पकड़ते हो, उन्हें तुम पकड़ते हो या कि तोते खुद तुम्हारे जाल में फंस जाते हैं? उस बहेलिए ने कहा था, मेरे साथ आओ और तोतों को पकड़ने की मेरी तरकीब समझ लो । उसने एक रस्सी बांध रखी थी दो दरख्तों के बीच में और उस रस्सी पर कुछ लकड़ियां बांध रखी थीं । तोते उन लकड़ियों पर आकर बैठते, उनके वजन से लकड़ियां घूम जातीं, तोते उलटे लटक जाते । वे उन लकड़ियों को इतने जोर से पकड़ लेते कि कहीं गिर न जाएं । गिरने के भय के कारण वे उन लकड़ियों को पकड़ लेते । और उनको छोड़ने की सामर्थ्य और साहस उनमें न रह जाता । वे लकड़ियां जिनमें वे बंधे हुए नहीं थे और जिनको छोड़ने से वे गिरने वाले भी नहीं थे, क्योंकि सैकड़ों बार उन्होंने आकाश में उड़ कर देखा था । और जिसके पास पंख हैं उसे गिरने का कोई भय नहीं होना चाहिए । लेकिन उन तोतों को भय था गिरने का । और वे उन लकड़ियों से बंध जाते थे जिनसे बिलकुल बंधे हुए नहीं थे, और बहेलिया उनको पकड़ लेता था ।
उसने मुझसे कहा कि देखें, ये तोते अपने हाथ से चिल्ला रहे हैं, अपने हाथ से बंधे हुए हैं और छूटने की साहस और छूटने की सामर्थ्य उनमें खो गई ।
उस बहेलिए ने जो बात मुझसे कही कि तोते खुद अपने हाथ से फंस जाते हैं । असल में तो जो फंसने को राजी नहीं है उसे कोई फांस नहीं सकता और जो परतंत्र नहीं होना चाहता इस जमीन पर कोई उसे परतंत्र करने में समर्थ नहीं हैं । कहीं न कहीं हम खुद परतंत्र होना चाहते हैं, इसलिए परतंत्रता हमें पकड़ लेती है ।
सुख में भी उत्तेजना है, दुख में भी उत्तेजना है। इसलिए शांति सुख और दुख के पार है।
एक बहुत बड़ा लोहार था । बडा प्रसिद्ध लोहार था । वह जो भी बनाता था, सारे संसार में उसकी बनाई गई चीजों की ख्याति थी । वह जो भी बनाता था उस पर अपने हस्ताक्षर कर देता था । फिर एक बार उसकी राजधानी पर हमला हुआ । वह पकड़ लिया गया । गांव के सभी प्रमुख प्रतिष्ठित लोग पकड़ लिए गए, उनमें वह भी पकड़ लिया गया । उसके हाथों में जंजीरें डाल दी गईं, पैर में बेड़ियां डाल दी गईं और पहाड़ी खंदकों में उसे फिंकवा दिया गया और प्रतिष्ठित नागरिकों के साथ ।
और सब तो बडे रो रहे थे और घबडा रहे थे लेकिन वह निश्चिन्त था । उस नगर के वजीर ने उससे कहा कि भाई, हम सब घबडा रहे हैं कि अब क्या होगा, लेकिन तू निश्चिन्त है ? उसने कहा, मैं लोहार हूं । जीवन भर हथकड़ियां मैंने डालीं; तोड़ भी सकता हूं । ये हथकड़ियां मुझे कुछ रोक न पाएंगी । आप घबडाएं मत । अगर मैंने अपनी हथकड़ियां तोड़ लीं तो तुम्हारी भी तोड़ दूंगा । एक दफा इनको हमें फेंक कर चले जाने दें ।
वजीर भी हिम्मत से भर गया, राजा भी हिम्मत से भर गया । जब दुश्मन उन्हें खंदकों में फेंक कर लौट गए तो वजीर ने कहा, अब क्या विचार है ? अचानक लोहार उदास हो गया और रोने लगा । उसने कहा, क्या मामला है ? तू अब तक तो हिम्मत बांधे था, अब क्या हुआ ? उसने कहा, अब मुश्किल है । मैंने हथकड़ी गौर से देखी, इस पर तो मेरे हस्ताक्षर हैं । यह तो मेरी ही बनाई हुई है । यह नहीं टूट सकती । यह असंभव है । मैंने कमजोर चीज कभी बनाई ही नहीं । मैं हमेशा मजबूत से मजबूत चीज ही बनाता रहा हूं । वही मेरी ख्याति है । यह किसी और की बनाई होती तो मैंने तोड़ दी होती । अब यह टूटनेवाली नहीं । क्षमा करें । इस पर मेरे हस्ताक्षर हैं ।
तुम्हारी हर हथकड़ी पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं । कोई और तो डालेगा भी कैसे ? और मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि रोने की कोई जरूरत नहीं है । कितनी ही मजबूत हो, तुम्हारी ही बनाई हुई है । और बनानेवाले से बनाई गई चीज कभी भी बड़ी नहीं होती । हो नहीं सकती ।
महावीर कहते हैं, एक क्षण में भी घट सकती है घटना, त्वरा चाहिए, तीव्रता चाहिए; अग्नि की प्रगाढ़ता चाहिए--एक क्षण में सारा अतीत भस्म हो सकता है । और तुम ऐसे ताजे हो सकते हो, जैसे तुम पहले क्षण जन्मे, जैसे इसके पहले तुम कभी थे ही नहीं । तुम्हारा सारा इतिहास ध्यान की एक गहरी झलक में विलीन हो सकता है, विदा हो सकता है । जन्मों-जन्मों की जमी धूल तुम्हारे दर्पण पर, हवा के एक झोंके में बिखर सकती है । झोंका बलशाली चाहिए!
काया, वचन, मन । इन तीनों को थिर करना पड़े । इस चेष्टा में लग जाओ । यह चेष्टा शुरू में बड़ी कठिन होती है । ऐसे जैसे आंखें कमजोर हों और कोई आदमी सुई में धागा डाल रहा हो । बस ऐसी ही कठिनाई है । आंखें हमारी कमजोर हैं । दृष्टि हमारे पास नहीं है, हाथ कंपते हैं । सुई में धागा डाल रहे हैं, कंप-कंप जाता है । सुई का छेद छोटा है, धागा पतला है । मगर अगर चेष्टा जारी रहे, तो आज नहीं कल, कल नहीं परसों धागा पिरोया जा सकता है । कठिन होगा, असंभव नहीं ।
अध्यात्म का अर्थ है, इस सारे सम्मोहन को तोड़कर उसके प्रति जग जाना, जिसका कोई भी सम्मोहन नहीं है।
अमेजान में एक छोटी—सी कौम है। जब बच्चा होता है किसी स्त्री को, तो पति को भी प्रसव की पीड़ा होती है। एक खाट पर पड़ती है स्त्री, दूसरी खाट पर लेटता है पति। और दोनों तड़पते हैं। आप कहेंगे, यह पति बनता होगा। क्योंकि आखिर इधर भी तो इतने बच्चे पैदा होते हैं!
नहीं, पति बनता बिलकुल नहीं। और जब पहली दफा ईसाई मिशनरियों ने यह चमत्कार देखा, तो वे बड़े हैरान हुए कि ये पति भी क्या ढोंग कर रहे हैं! पति को कहीं प्रसव पीड़ा होती है! पत्नी को बच्चा हो रहा है, तुम क्यों तकलीफ पा रहे हो? और पत्नी से भी ज्यादा शोरगुल पति मचाता है, क्योंकि पति पति है। पत्नी तो थोड़ा—बहुत मचाती है। पति बहुत उछल—कूद करता है। गिर—गिर पड़ता है, रोता है, पीटता है। जब तक बच्चा नहीं हो जाता, तब तक तकलीफ पाता है। बच्चा होते ही से वह बेहोश होकर गिर जाता है।
तो पादरियों ने समझा कि यह भी एक खेल है। इन्होंने बना रखा है। बाकी इसमें कोई हो तो नहीं सकती सचाई। तो जब चिकित्सकों ने जांच की, तो उन्होंने पाया कि यह बात सच नहीं है। दर्द होता है। तकलीफ होती है। पेट में बहुत उथल—पुथल मच जाती है, जैसे बच्चा होने वाला हो। हजारों साल की उनकी मान्यता है कि जब दोनों का ही बच्चा है, तो दोनों को तकलीफ होगी।
और आप यह भी जानकर हैरान होंगे कि ऐसी भी कौमें हैं, इस मुल्क में भी ऐसी ग्रामीण और आदिवासी कौमें हैं, जहां स्त्री को बच्चा बिना तकलीफ के होता है। जैसे गाय को होता है, ऐसे स्त्री को होता है। वह जंगल में काम कर रही है, खेत में काम कर रही है, बच्चा हो जाता है। बच्चे को उठाकर खुद ही अपनी टोकरी में रखकर वृक्ष के नीचे रख देती है, और फिर काम करना शुरू कर देती है।
हमारी स्त्रियां सोच भी नहीं सकतीं कि खुद को बच्चा हो, न नर्स हो, न अस्पताल हो, न डाक्टर हो, और खुद ही को बच्चा हो, और उठाकर टोकरी में रखकर और काम शुरू! काम में कोई अंतराल ही नहीं पड़ता। वह भी मान्यता है। स्त्रियों को जो इतनी तकलीफ हो रही है, वह भी मान्यता है। स्त्रियों को तकलीफ न हो, वह भी मान्यता है।
लोझेन करके एक फ्रेंच चिकित्सक है, उसने एक लाख स्त्रियों को बिना दर्द के प्रसव करवाया है। और सिर्फ करता इतना ही है कि वह उनको कहता है कि दर्द होता ही नहीं। यह समझाता है पहले, दर्द तुम्हारी भांति है। उनको कान में मंत्र डालता है कि दर्द होता ही नहीं। सम्मोहित करता है; समझा देता है। एक लाख स्त्रियां बिना दर्द के...।
लोझेन का शिष्य है, वह और एक कदम आगे बढ़ गया है। वह कहता है कि दर्द की तो बात ही गलत है, जब बच्चा पैदा होता है, तो स्त्री के जीवन में सबसे बड़ा सुख होता है। और उसने कोई पांच सौ स्त्रियों को सुख करवाकर भी बता दिया। वे स्त्रियां कहती हैं कि जो समाधि का आनंद हमने जाना है बच्चे के होने में, वह तो कभी जाना ही नहीं।
वह भी उनको समझाता है कि यह परम अनुभव का क्षण है। बच्चा जब पैदा होता है, तो स्त्री के जीवन का यह शिखर है आनंद—अनुभव का। अगर इसमें वह चूक गई, तो उसे जीवन में कभी आनंद ही नहीं मिलेगा। उसका शिष्य समझाकर आनंद भी करवा देता है!
आदमी बहुत अदभुत है। आदमी सेल्फ हिप्नोसिस करने वाला प्राणी है। वह अपने को जो भी मान लेता है, वैसा कर लेता है। आपकी सारी व्यक्तित्व की परतें आपकी मान्यताओं की परतें हैं।
आप जो हैं, वह आपका सम्मोहन है।
अगर कोई आदमी एक कुत्ते को रोज अपने घर में बांधे रहे और रोज खाना खिलाए और फिर एक दिन अचानक उसको घर के बाहर निकालने लगे, और कुत्ता चारों तरफ से घूमकर वापस आने लगे, तो कुत्ते का क्या कसूर है? अचानक आप ध्यान करने लगें और कुत्ते से कहें, हटो यहां से। और कल तक उसको रोटी दी, आज सुबह तक रोटी दी, आज सुबह तक चूमा, पुचकारा, उसकी पूंछ हिलाने से आनंदित हुए, घंटी बांधी गले में, पट्टा बांधा, घर में रखा -- अचानक आपका दिमाग हो गया कि ध्यान करें। उस कुत्ते को क्या पता? वह बेचारा घूमकर लौट आता है वापिस। वह कहता है, कोई खेल हो रहा होगा। और जब आप उसको और भगाते हैं तो वह और खेल में आ जाता है। वह और रस लेने लगता है कि कोई मामला जरूर है। मालिक आज कुछ बड़े आनंद में मालूम पड़ते हैं। तब मुझसे आप आकर कहते हैं कि विचार नहीं जाते हैं।
वे जाएंगे कैसे? उन्हीं विचारों को पोसा है आपने, खून पिलाया है अपना। उनको बांधे फिरते हैं, उनके गले पर पट्टे बांधे हुए हैं अपने-अपने नाम के। विचार को हम पोस रहे हैं। अतीत के विचार को पालते चले जा रहे हैं, बांधते चले जा रहे हैं। अचानक एक दिन आप कहते हैं, हटो। एक दिन में नहीं हट जाएगा। उसका पोषण बंद करना पड़ेगा, उसको पालना बंद करना पड़ेगा।
मन का होना ही कनफ्यूजन है। मन का होना ही अस्वास्थ्य है, बीमारी है।
मेरी बीबी मुझे आदमी नहीं, जानवर भी नहीं, बल्कि कीड़ा-मकोड़ा समझती है--मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन मुझसे कह रहा था। वह अक्सर मुझे मक्खी, मच्छर, तिलचट्टा, भुनगा आदि भी कहती है। और कभी-कभी बहुत गुस्से में तो चींटा, जुआं, दीमक तक कह बैठती है। और आजकल इतना ही नहीं, वह मुझे पिस्सू तक कहने लगी है।
अरे बड़ी दुष्ट स्त्री है--मैंने उससे कहा--ऐसी बुरी स्थिति में आखिर तुम करते क्या हो?
मैं क्या करूंगा भला--नसरुद्दीन ने भयभीत स्वर में जवाब दिया--बस इतना ही करता हूं कि डी.डी.टी., फ्लिट वगैरह घर में नहीं रखता कि कहीं मुझ पर छिड़क कर प्राण ही न ले ले। और मलेरिया वाले जब छिड़काव के लिए आते हैं तो उन्हें बाहर से ही दस-पांच रुपये देकर भगा देता हूं।
अब अगर बीबी जनम भर से यही कह रही हो कि तुम तिलचट्टा हो, भुनगा हो, सुनते-सुनते भरोसा आ गया होगा। सम्मोहित हो गया होगा। किसी चीज की पुनरुक्ति बार-बार की जाए तो हमें उस पर भरोसा आने लगता है।
एक बार मेरे पास एक आदमी को लाया गया। उसका मस्तिष्क कुछ विक्षिप्त जैसा हो गया था। उसे यह भ्रांति हो गई थी कि दो मक्खियां उसके भीतर घुस गई हैं, क्योंकि वह मुंह खोल कर सोता है और दो मक्खियां एकदम भीतर चली गईं, अब वे निकलती ही नहीं हैं। वे भीतर भनभन-भनभन- भनभन कर रही हैं। पेट में जाती हैं, कभी सिर में चली जाती हैं, कभी पैर में घुस जाती हैं। अब मक्खियों का क्या! डाक्टरों के पास ले जाया गया, बहुत चिकित्सा की गई। उसकी क्या चिकित्सा हो सकती है? कोई बीमारी हो तो चिकित्सा हो जाए! माया कोई बीमारी नहीं है कि उसकी चिकित्सा हो जाए। इसलिए माया की कोई औषधि नहीं है। परेशान हो गए घर के लोग। उसकी पत्नी उसे मेरे पास ले आई, कहा कि हम आपके सिवाय अब कहां जाएं? हम परेशान हो गए हैं। आप ही कुछ करो।
मैंने कहा कि यह मेरा धंधा ही है। तू ठीक जगह आ गई। इतने दिन तू भटकी क्यों? लोगों को मक्खियों से छुड़ाना, यही मेरा काम है।
उसने कहा, क्या और लोग भी इस तरह के हैं? मैं तो सोचती थी यह बीमारी मेरे पति को ही हुई है।
मैंने कहा, तू फिक्र छोड़। यह सभी पतियों को है। पत्नियों को भी है। पहले इसकी छुड़ा दूंगा, फिर तेरी छुड़ा दूंगा।
लेकिन मुझे--उसने कहा--है ही नहीं।
मैंने कहा, तू समझी नहीं बात। अलग-अलग तरह की मक्खियां हैं। बीमारी बहुत ढंग से आती है यह।
उसने कहा, होगा। आप आध्यात्मिक बातें न करें, मेरे पति का किसी तरह ये दो मक्खियों से छुटकारा दिलवा दें बस।
पति ने कहा कि बहुत मुश्किल है। कितना तो इलाज करवा चुके। कितनी दवा पी चुका। दवा पी-पी कर परेशान हो गया। क्योंकि मैं दवा पीता हूं, दवा पेट में गई, मक्खियां सिर में चली जाती हैं। आखिर मक्खियों का दवा कैसे पीछा करे!
मैंने कहा कि तू घबड़ा मत। उसे मैंने कहा, तू लेट जा बिस्तर पर, आंख बंद कर ले। ये मक्खियां हैं, मेरी समझ में आ रही हैं।
उसने कहा, आप पहले आदमी हैं। अब तक जितने डाक्टरों के पास गया, वे सब कहते हैं, यह सब मन का खयाल है।
मैंने कहा, गधे हैं। अरे मक्खियां कहीं मन का खयाल! और यह तो साफ दिखाई पड़ रही हैं कि तेरे भीतर घूम रही हैं!
उसने कहा, हाथ में हाथ दीजिए। आप पहले आदमी हैं जिस पर मुझे भरोसा आया। आप शायद कुछ कर पाएं। क्योंकि मुझे उन पर शक पहले ही हो जाता, जब वे कहते हैं कि ये मक्खियां हैं ही नहीं, ये क्या खाक मेरा इलाज करेंगे! जो बीमारी ही नहीं मान रहे, जो मुझ पर संदेह कर रहे हैं, जो मेरा प्राण लिए ले रही हैं मक्खियां--न सो सकता, न बैठ सकता, न काम कर सकता--क्योंकि भनभन-भनभन, उनका चक्कर जारी है। इधर मैं इतना परेशान हो रहा हूं और इन सज्जनों को सूझी हैं ज्ञान की बातें कि मक्खियां हैं ही नहीं, बस मन का खयाल है। अरे मन का खयाल, मैं क्या कोई पागल हूं!
पागल कभी नहीं मानते कि वे पागल हैं।
मैंने कहा, तुम और पागल! तुम बिलकुल समझदार आदमी हो। तुम गिनती तक ठीक कर रहे हो। दो मक्खियां, बिलकुल दो हैं। तुम लेट जाओ बिस्तर पर, आंख बंद कर लो।
उसकी आंख पर मैंने पट्टी बांध दी और मैंने कहा कि तुम विश्राम करो, मैं जरा मक्खियों को पकड़ने की कोशिश करता हूं। कभी मैंने उसका पैर दबाया, कभी उसका पेट दबाया। वह बड़ा प्रसन्न था कि एक आदमी तो मिला जो मानता है। कभी उसके सिर पर हाथ रखा।
उसने कहा, हां, बिलकुल यहीं हैं।
फिर मैं भागा घर में। मैंने फिक्र की कि किसी तरह दो मक्खियां पकड़ लूं। अब कभी मक्खियां पकड़ी नहीं थीं पहले, बामुश्किल...पड़ोसी के पास गया, पड़ोसी के घर में मिल गईं मक्खियां। और वे भी मिलीं ऐसे कि उनकी तेल की बोतल, खोपड़े के तेल की बोतल, वह कभी-कभी मैं देखता था धूप में रखी पिघलने के लिए सर्दी के दिनों में, उसमें मुझे मक्खियां दिखाई पड़ती थीं। तो मैंने उनसे कहा कि तुम्हारी बोतल आज काम आ जाएगी, वे दो मक्खियां उसमें से निकाल दो।
वे दो मक्खियां निकाल कर लाया, एक शीशी में बंद कीं। जंतर-मंतर जो भी करने थे वे किए। आखिर उस आदमी की आंख खोलीं। बोतल उसके हाथ में थमा दी। उसने कहा कि यह कोई बात हुई! ये रहीं मक्खियां! उसने कहा, बुलाओ मेरी पत्नी को! मूरख मेरा तीन साल से प्राण खाए जा रही है कि छोड़ो, ये मक्खियां हैं ही नहीं, तुम नाहक...! अब ये मक्खियां कहां से आईं?
उसकी पत्नी को मैंने कहा कि अब तू मत कहना कुछ और, तू मान लेना कि हां, हमारी गलती थी। वह आदमी ठीक हो गया। वे मक्खियां गईं। वह भनभन गई। वह झंझट उसकी समाप्त हुई।
बहुत बार बुद्धपुरुषों को तुम्हारे लिए न मालूम कितने उपाय ईजाद करने पड़े हैं, क्योंकि तुम्हारी बीमारी मौलिक रूप से व्यर्थ है और झूठी है। इसलिए कोई उपाय वस्तुतः सत्य नहीं है। इसलिए सारे बुद्धों ने कहा है: एक दिन उपाय भी छोड़ देना। क्योंकि उपाय सिर्फ तुम्हारी झूठी बीमारी को अलग करने के लिए है। जैसे एक कांटे से दूसरा कांटा निकाल लें, फिर दोनों को फेंक दें।
संसार मूर्च्छा नहीं है। मूर्च्छा संसार है।
नास्तिकता
कथा :
विवेकानंद अमरीका में एक जगह बोलते थे । उन्होंने बाइबिल का उल्लेख किया, जिसमें जीसस ने कहा है, अगर श्रद्धा हो तो पहाड़ भी हट जाएं । अगर श्रद्धा से कह दो, 'हट जाओ पहाड़ों' तो पहाड़ भी हट जाएं ।
एक की औरत सामने ही बैठी थी, वह भागी । वह अपने घर भागी । उसके पीछे एक छोटी पहाड़ी थी, जिससे वह बहुत परेशान थी । उसने कहा अरे, इतनी सरल तरकीब ! और मुझे अब तक पता नहीं थी । और बाइबिल मेरे घर में पड़ी है । ईसाई थी । और उसने कहा, मैं तो ईसाई हूं और मुझमें श्रद्धा भी है ईसा पर । जाकर अभी निपटा देती हूं इस पहाड़ी को । खिड़की खोल कर उसने आखिरी बार देख ली पहाड़ी कि एक बार और देख लूं । फिर तो यह चली जाएगी । खिड़की बंद करके उसने कहा, हट जा पहाड़ी ! श्रद्धा से कहती हूं । ऐसा तीन बार दोहराया । फिर खिड़की खोल कर देखी, हंसने लगी । कहा, मुझे पता ही था, ऐसे कहीं हटती है ! पता ही था, ऐसे कहीं हटती है । यह कोई मजाक है कि कह दो, पहाड़ी हट जाए ।
मगर अगर पता ही था तो नहीं हटती । भीतर तुम पहले से ही जान रहे हो कि नहीं होने वाला, नहीं होनेवाला । यह अपने से नहीं हो सकता है । तो फिर नहीं होगा ।
हे पुत्र! तू देह की अहंता-ममता के बंधन में अनादिकाल से बंधा है । 'मैं सबसे सर्वथा भिन्न वह सत्ता हूं जिसमें सबका बोध होता है'; इस स्वरूपज्ञान रूपी तलवार से देहाभिमान-बंधन को काटकर उसे निकाल दे और सुखी हो जा ।
पश्चिम में एक बहुत बड़ा नास्तिक हुआ--वोल्तेयर। उसने जिंदगीभर ईश्वर, आत्मा, धर्म, इनका खंडन किया। फिर वह बीमार पड़ा, हृदय का दौरा पड़ा। तब वह घबड़ा गया। तब एकदम उसने अपनी पत्नी को कहा, अपने मित्रों को कहा कि जल्दी ही किसी धर्मगुरु का बुलाओ। पर उन्होंने कहा, धर्मगुरु! क्या तुम भूल गये अपने सिद्धांत? उसने कहा छोड़ो सिद्धांत, इधर मैं मर रहा हूं, तुम्हें सिद्धांत की पड़ी है। अभी तक तो जिंदा था, तो कभी मैंने सोचा न था। लेकिन कौन जाने, यह धर्मगुरु ठीक ही हों! मरते वक्त मुझे आगे का इंतजाम कर लेने दो। धर्मगुरु बुलाया गया। संयोग की बात वह ठीक हो गया।
जब वह फिर स्वस्थ हो गया, तो उसने फिर अपने पुराने राग शुरू कर दिये। फिर नास्तिकता! फिर ईश्वर, फिर आत्मा का खंडन! मित्रों ने कहा यह तुम क्या कर रहे हो? उसने कहा वह सिर्फ मौत के भय के कारण, वह कोई असली बात न थी। वह तो सिर्फ भावावेश था। फिर वह अपनी बुद्धि में प्रवेश कर गया--बहुत बड़ा बुद्धिमान आदमी था। बहुत तर्कशील आदमी था। तो उसने उसके लिए भी तर्क खोज लिया कि वह तो भय के कारण जरा कंप गया था। उसको तुम कुछ गौर मत दो।
लेकिन फिर दस-पंद्रह साल बाद वह दौरा पड़ा। तब वह फिर घबड़ाया। उसने कहा, बुलाओ धर्मगुरु को। लेकिन मित्रों ने कहा, अब तुम्हारे भय के कारण हम धोखे में न पड़ेंगे। कहते हैं मित्र घेरा बांधकर खड़े हो गये। उन्होंने कहा, न तो हम धर्मगुरु को भीतर आने देंगे, न तुमको बाहर जाने देंगे। अब धोखा न चलेगा। रोने लगा वोल्तेयर। छाती पीटने लगा कि यह तुम क्या कर रहे हो, मैं मरा जा रहा हूं। इधर मौत खड़ी है, तुम्हें सिद्धांतों की पड़ी है। छोड़ो मैंने क्या कहा था। मैं क्या कहता हूं उसे सुनो। लेकिन मित्रों ने कहा कि अब नहीं। फिर वह ठीक नहीं हुआ, मर गया। लेकिन उसकी अवस्था को हम थोड़ा सोचें।
बुद्धि कहीं भी ले जाती नहीं। जब सब ठीक चल रहा है, तब तो शायद तुम्हें परमात्मा की याद भी नहीं आती। तब धर्म की तुम्हें याद भी नहीं आती। मंदिर के पास से तुम ऐसे गुजर जाते हो जैसे मंदिर है ही नहीं। जब चीजें गड़बड़ हो जाती हैं, हाथ-पैर डांवांडोल होने लगते हैं, मौत करीब आने लगती है, तब तुम्हें धर्म की याद आती है।
समय है मन और क्षेत्र है शरीर। जिसके दोनों ही शांत हो गये वह कहां है?
एक बड़ा नास्तिक था। उस नास्तिक ने अपनी दीवाल पर एक वचन लिख रखा था, 'God is nowhere।' फिर उसको एक बच्चा हुआ। और बच्चे ने भाषा सीखनी शुरू की और बच्चे को अभी बड़े अक्षर पढ़ने कठिन थे, छोटे-छोटे अक्षर तोड़-तोड़ कर बच्चा पढ़ता था। तो एक दिन बच्चा पढ़ रहा था दीवाल पर लिखे अक्षर को, तो 'nowhere' बड़ा अक्षर था, तो उसे बच्चे ने तोड़ कर पढ़ा: 'God is now here'। वह नास्तिक बड़ा हैरान हुआ। क्योंकि उसने दीवाल पर इसीलिए रख छोड़ा था ताकि हर आदमी देखे और समझे कि परमात्मा कहीं भी नहीं है। और यह उसने कभी सोचा ही नहीं था कि अपना ही बेटा, उसमें से बिलकुल उलटी बात पढ़ेगा।
जब तुम मरते हो तब तुम्हारा जीवन-वृक्ष सारे अनुभव को निचोड़ कर तुम्हारे अहंकार में रख देता है। वह अहंकार फिर नया गर्भ ले लेता है।
मुल्ला नसरुद्दीन नास्तिक है। ईश्वर को मानता नहीं, पूजा—प्रार्थना को मानता नहीं। कभी मस्जिद नहीं गया; कभी कुरान उठाकर नहीं पढ़ी।
एक यात्रा में एक मौलवी का साथ हो गया। सर्द ठंडे दिन थे और मौलवी पांच बजे सुबह प्रार्थना करने को उठा कंपकंपाता हुआ; दाँत काँप रहे थे, हाथ काँप रहे थे। बड़ी सर्द रात। मुल्ला अपने बिस्तर में दबा है। मौलवी को उठता देखकर उसने भी जरा-सा रजाई से झांककर देखा और कहा कि धन्यवाद भगवान का कि हम आस्तिक नहीं हैं।
इसके भगवान शब्द का क्या अर्थ होगा? धन्यवाद भगवान का कि हम आस्तिक नहीं हैं! नहीं तो पांच बजे रात, इस सर्द सुबह में उठकर प्रार्थना करनी पड़ती। यह भी भगवान शब्द का उपयोग करता है, लेकिन इसका कोई प्रयोजन नहीं है। यह अर्थहीन शब्द है।
इजिप्त में फकीरों का एक पुराना वचन -- जिसे अपने घर आना हो, उसे बहुत दूसरों के घरों पर दस्तक देनी पड़ती है।
समर्पण
कथा :
Emanual Kant जर्मनी का बहुत बड़ा विचारक हुआ; वह अकेला रहा जिंदगी भर, शादी नहीं की । लेकिन एक नौकर को अपने पास रखता था । वह धीरे-धीरे नौकर उसका मालिक हो गया । क्योंकि नौकर पर निर्भर रहना पड़ता । और एमेन्युएल कांट बिलकुल पागल था समय के पीछे । मिनट-मिनट, सेकेंड-सेकेंड का हिसाब रखता था । अगर ग्यारह बजे खाना खाना है तो ग्यारह ही बजे खाना खाना । दो मिनट देर हो गई तो मुश्किल । रात दस बजे सोना है तो दस बजे सो जाना है । कभी-कभी तो ऐसा हुआ कि कोई मिलने आया था, वह बात ही कर रहा है और वह उचक कर अपना कंबल ओढ़ कर सो गया । क्योंकि दस बज गया । घड़ी में देखा । वह इतना भी नहीं कह सकता कि अब मेरे सोने का वक्त हो गया, क्योंकि इसमें भी तो समय लग जाएगा । वह सो ही गया । नौकर आकर कहेगा, अब आप जाइए । मालिक सो गए ।
और सुबह तीन बजे उठता था । और तीन बजे उठने में उसे बड़ी अड़चन थी । मगर जिद्दी था । उठता भी था और अड़चन भी थी । अड़चन इतनी थी कि नौकर से मार-पीट हो जाती थी । नौकर उठाता था; और मार-पीट हो जाती । तो नौकर टिकते नहीं थे । क्योंकि नौकर कहते यह भी अजीब बात है । आप कहते हैं कि तीन बजे उठाना । हम उठाते हैं, आप गाली बकते हो । मारने को खड़े हो जाते हो । मगर वह कहता कि यही तो तुम्हारा काम है । तुम चाहो मुझे मारो, तुम चाहो मुझे गाली दो, मगर उठाना । छोड़ना मत, चाहे कुछ भी हो जाए ।
तो एक ही नौकर टिकता था उसके पास । वह उसका मालिक हो गया था । वह तो उसकी पिटाई भी कर देता था ।
गुरु तो केवल एक उपाय है । कभी जरूरत होगी तो वह तुम्हारी पिटाई भी करेगा । कभी खींचेगा भी नींद से ।
समर्पण का इतना ही अर्थ है कि तुम गुरु से कहते हो कि मुझे पक्का पता है कि मैं तीन बजे उठ न सकूंगा । और मुझे यह भी पता है कि तीन बजे मैं करवट लेकर सो जाऊंगा । मुझे यह भी पता है कि तुम भी उठाओगे तो मैं नाराज होऊंगा । फिर भी तुम कृपा करना और उठाना ।
समर्पण का और क्या अर्थ है ? समर्पण का इतना-सा सीधा-सा अर्थ है कि मैं तुम्हारे चरणों में निवेदन करता हूं कि मुझसे तो उठना हो नहीं सकता । और यह भी मुझे पक्का है कि तुम भी मुझे उठाओगे तो मैं बाधा डालूंगा । यह भी मैं नहीं कहता कि मैं बाधा नहीं डालूंगा । मैं सहयोगी होऊंगा यह भी पक्का नहीं है । मगर प्रार्थना है मेरी : तुम मेरी बाधाओं पर ध्यान मत देना । मेरी नासमझियों का हिसाब मत रखना । मैं गाली-गलौज भी बक दूं कभी, क्षमा कर देना । यह मैं तुमसे प्रार्थना कर रहा हूं लेकिन मुझे उठाना । मुझे उठना है । और तुम्हारे सहारे के बिना न उठ सकूंगा ।
समर्पण का इतना ही अर्थ है कि तुम अपना अहंकार किसी के चरणों में रख देते हो और उससे निवेदन कर देते हो कि वह तुम्हें खींच ले, उठा ले, जगा ले । तुम्हारी नींद गहरी है; जन्मों-जन्मों की ।
गुरजिएफ का एक शिष्य था--बेनेट। उसने संस्मरण लिखा है कि गुरजिएफ ने मुझे कहा कि जाकर दरवाजे के पास बगीचे में एक गड्ढा खोद। और जब तक मैं न रोकूं, रुकना मत। खोदते ही जाना। दुपहर हो गयी। बेनेट खोदता रहा, खोदता रहा पसीने से लथपथ। सांझ हो गयी। गुरजिएफ का कोई पता नहीं। सोचने लगा भूल गया, या किसी काम में उलझ गया, अब मैं बंद करूं कि नहीं, अब तो हाथ-पैर लड़खड़ाने लगे। अब तो कुदाली उठे ही न। और तब गुरजिएफ आया। सूरज ढल रहा था और उसने कहा कि ठीक है, अब इस गड्ढे को पूर दे। स्वभावतः मन में सवाल उठेगा, यह क्या मूढ़तापूर्ण बात हुई! दिनभर गड्ढा खुदवाया, टूट गया शरीर पूरा, टूट-टूट भर गयी शरीर में और अब कहते हो, पूर दे।
लेकिन बेनेट ने गड्ढे को पूरना शुरू कर दिया। बड़ा थका-मांदा है। मिट्टी उठा-उठाकर भरना, जब सूरज बिलकुल ढलता था, तब वह गङ्ढे को पूर कर निपट पाया; गुरजिएफ आया और उसने कहा कि ऐसा कर, वह सामने जो वृक्ष है, उसको काटना है पूरे चांद की रात है, काटने में लग जा। दिनभर का थका हुआ, अब वृक्ष काटना है! न भोजन मिला, न विश्राम मिला! और बेनेट वृक्ष को काटने चला। वह वृक्ष पर चढ़ा काट रहा है, एक ऐसा क्षण आया कि हाथ से उसकी कुल्हाड़ी गिर गयी। इतना सुस्त हो गया है। और ऐसे एक वृक्ष की शाखा का सहारा लेकर नींद लग गयी। बस में ही न रहा।
गुरजिएफ आया, उसने नीचे से खड़े होकर बेनेट को सोये हुए देखा, खुद चढ़ा, हिलाया, बेनेट ने आंख खोली और बेनेट ने अपने संस्मरणों में लिखा है, ऐसी शुद्ध आंख मैंने कभी जानी ही न थी कि मेरे पास हो सकती है। ऐसी निर्मल आंख! आंख खुलते ही सारा जगत और मालूम पड़ा। जैसे मैं बिलकुल नया-नया आया हूं, अभी-अभी अवतरित हुआ हूं। जैसे अभी मेरा जन्म हुआ। इतनी ताजगी, और ऐसा निर्भार चित्त!
पूछा बाद में उसने गुरजिएफ से कि ऐसा कैसे हुआ, तो उसने कहा, अगर तू एक बार भी इनकार करता, या तर्क उठाता,तो यह घड़ी न आती। जानता था, यह बिलकुल स्वाभाविक था, दिनभर गड्ढा खोदने के बाद फिर मिट्टी भरने के लिए कहना बिलकुल व्यर्थ बात है, कठोर बात है, सारहीन है। कोई भी पूछेगा, इसका मतलब क्या है? गड्ढा किसलिए खुदवाया? गुरजिएफ ने कहा इतना अगर तू पूछ लेता, तो यह घड़ी न आती। फिर तूने गड्ढा भी भर दिया। फिर तू बिलकुल थका-मांदा था, फिर भी तूने इनकार न किया, मैंने कहा लकड़ी काट, तो तूने यह न कहा, यह अब न हो सकेगा, कल सुबह करूंगा। यह तेरा जो सहज समर्पण था, यह तुझे उस जगह ले गया; जहां तक तेरी सामर्थ्य थी तूने किया, और जहां तेरी समार्थ्य समाप्त हो गयी, वहीं तेरा अहंकार भी समाप्त हो गया। वहीं तुझे गहरी तंद्रा आ गयी। ऐसी तंद्रा समाधि की पहली झलक है। ऐसी तंद्रा में पहली दफा आदमी को पता चलता है कि समाधि जब पूरी होगी तो कैसी होगी।
एक बूंद टपकती है अमृत की, सागर का फिर हम अनुमान लगा सकते हैं।
एक मित्र ने आज ही पूछा है कि आप कहते हैं कि परमात्मा की तरफ हाथ जोड़ कर सिर झुका दें, मुझे पता नहीं कि कौन परमात्मा है, किसके प्रति सिर झुकाऊं? और जिसका मुझे पता ही नहीं है और फिर वह परमात्मा मेरी मदद करेगा क्या?
सवाल इसका नहीं है कि परमात्मा का पता है या नहीं, सवाल सिर्फ इसका है कि आपने हाथ जोड़े और सिर झुकाया । यह बात मूल्यवान नहीं है कि किसके लिए झुकाया; वह गौण है, वह बहाना है सिर्फ । आप झुके, यही मूल्यवान है । परमात्मा आपकी मदद नहीं करेगा, क्योंकि वह ही मदद करता होता, तो कभी का कर देता । आप ही अपनी मदद करेंगे । लेकिन जितना आप झुकते हैं, उतनी आप अपनी मदद कर रहे हैं । और आप झुक नहीं सकते बिना परमात्मा की धारणा के, इसलिए कहता हूं झुको । नहीं पता है उसका, तो अज्ञात के लिए झुको । यह भी पता नहीं है, तो सिर्फ झुको, भूल जाओ, उसकी बात ही भूल जाओ, सिर्फ झुको ।
समर्पण किसके प्रति, इसका मूल्य नहीं है । समर्पण का मूल्य है । झुक जाने का मूल्य है ।
झुका हुआ आदमी अनेक शक्तियों को पाने का हकदार हो जाता है; अकड़ा हुआ आदमी अपने ही हाथ से बंद हो जाता है, उसे कोई शक्ति उपलब्ध नहीं होती । परमात्मा तो बहाना है, शब्द है । तुम्हें झुकाना असली बात है । किस बहाने तुम झुक जाते हो, यह गौण है । कोई बहाना खोज लो और झुको ।
एक जिंदा आदमी नदी में डूब सकता है, अगर उसे तैरना न आता हो; लेकिन मुर्दा बिना तैरे ही नदी पर तैर जाता है । मुर्दा आदमी को कौन सी कला आती है, जो कि जिंदा आदमी को नहीं आती थी । मुर्दा डूबता नहीं, नदी खुद उसे ऊपर उठा लेती है । निश्चित ही जिंदा आदमी कोई भूल कर रहा है, जो मुर्दा नहीं कर रहा है । जिंदा आदमी कोई गलती कर रहा था, जो मुर्दा नहीं कर रहा है । क्योंकि मुर्दा कुछ ठीक तो नहीं कर सकता, मुर्दा कुछ कर ही नहीं सकता । इतना ही हो सकता है कि जिंदा आदमी जो कर रहा था, वह मुर्दा न कर रहा हो, और इसलिए नदी पर तैर गया ।
जिंदा आदमी नदी से लड़ रहा था, जिंदा आदमी नदी को दुश्मन समझ रहा था, जिंदा आदमी नदी के विपरीत अपनी आकांक्षाओं के बल पर कुछ करने की कोशिश कर रहा था । नदी ने उसे डुबा दिया, तोड़ डाला । उल्टी हो गई बात; चाहता था बचना और मिट गया । और मुर्दा अपने को बचाना नहीं चाहता, क्योंकि मुर्दे के पास अब बचाने को कुछ है भी नहीं । बचाने का उपाय भी नहीं है, शक्ति भी नहीं है, जीवन भी नहीं है । जो मुर्दा अपने को बचाना नहीं चाहता, नदी खुद ही उसे ऊपर तैरा देती है और बचा लेती है ।
फ्रांस के एक बहुत बड़े मनसविद कुए ने इस नियम को ‘Law of reverse effect’ कहा है, उल्टे परिणाम का नियम । जो आप चाहते हैं, उससे उल्टा हो जाता है । आपके चाहने के कारण ही उल्टा हो जाता है । और हमारी पूरी जिंदगी इसी नियम से भरी हुई है । सुख चाहते हैं, दुख मिलता है । सफलता चाहते हैं, असफलता हाथ लग जाती है । जीतना चाहते हैं, हार के सिवाय कुछ भी नहीं होता! हर जगह जो हम चाहते हैं, उल्टा होता हुआ दिखाई पड़ता है । फिर हम चीखते हैं, चिल्लाते हैं, रोते हैं । और प्रार्थना भी करते हैं कि हे परमात्मा, क्या भूल हो रही है, कौन सा कसूर है; कौन से कर्म का फल है कि जो भी मैं चाहता हूं, वह नहीं होता है और उल्टा हो जाता है! और जो मैं कभी नहीं चाहता, वह हो जाता है! और जो मैं सदा चाहता हूं और जिसके लिए श्रम किया हूं, वह नहीं हो पाता!
इस नियम को ठीक से समझें । जब भी आप अस्तित्व के सामने अपनी चाह रखते हैं, तभी आप उसके विपरीत हो जाते हैं । अस्तित्व की मर्जी के खिलाफ आप कुछ भी करेंगे, उसमें हारेंगे और टूटेंगे । और सभी चाह उसके खिलाफ हैं । ऐसी कोई चाह नहीं है, जो अस्तित्व के खिलाफ न हो । होगी ही । हम तो परमात्मा से भी प्रार्थना करते हैं मंदिर में, उसके ही खिलाफ । घर में कोई बीमार है, हम परमात्मा से कहते हैं कि इसे ठीक कर दे । अगर परमात्मा ही सब कुछ करता है, तो यह बीमारी भी उसके द्वारा है । और जब हम कहते हैं कि इसे ठीक कर दे, तो हम यह कह रहे हैं कि हम तुमसे ज्यादा समझदार हैं और तूने हमसे सलाह क्यों नहीं ले ली इस आदमी को बीमार करने के पहले । इसे बदल दे । हमारी सब मांग, हमारी सब प्रार्थनाएं, अस्वीकृतियां हैं । जो है, उसका हमें स्वीकार नहीं है । और ध्यान रहे, जो है, उसका जब तक हमें स्वीकार नहीं है, तब तक जो भी हम चाहेंगे, उससे उल्टा होगा । और जिस दिन जो भी है, उसका हमें पूरा स्वीकार है--तो इस स्वीकार को ही मैं आस्तिकता कहता हूं । आस्तिकता का अर्थ ईश्वर को मान लेना नहीं है, क्योंकि ईश्वर को बिना माने भी कोई आस्तिक हो सकता है । और ईश्वर को मानते हुए भी लाखों लोग नास्तिक हैं, करोड़ों लोग नास्तिक हैं ।
आस्तिकता का अर्थ है: सर्व स्वीकार का भाव--जो है, उसके साथ राजी होना ।
शत्रु के लिए अस्तित्व का रहस्य खुल भी नहीं सकता है । दुश्मनी से इस दुनिया में क्या खुला है? सब चीजें बंद हो जाती हैं । अस्तित्व के साथ अस्तित्व के हृदय को खोलने के लिए वही कुंजी काम आती है, जो किसी भी व्यक्ति के हृदय को खोलने के काम आती है । जब हम किसी व्यक्ति को स्वीकार कर लेते हैं प्रेम के किसी क्षण में, उसका हृदय अपनी सब सुरक्षा हटा लेता है, उसका हृदय खुल जाता है; अब हम उसके हृदय में प्रवेश कर सकते हैं । अब हमसे उसे कोई भी भय नहीं है । प्रार्थना का यही अर्थ है । श्रद्धा का यही अर्थ है । गहरे प्रेम का यही अर्थ है ।
बहुत कुछ बंद है, हमारे चारों तरफ दीवालें हैं, द्वार नहीं । और वे दीवालें हमारे कारण हैं, क्योंकि हम इतने जोर से संघर्ष कर रहे हैं उन्हें खोलने का ।
स्वामी राम कहा करते थे, एक बार अमरीका के एक दफ्तर में उनसे बड़ी भूल हो गई । संन्यासी थे, द्वार-दरवाजों का कुछ पता नहीं था । जिस झोपड़ी में रहते आए थे हिमालय में, उसमें कोई द्वार-दरवाजा भी न था । एक दफ्तर में प्रवेश करने के लिए बड़े जोर से उन्होंने धक्का दिया--बिना देखे कि दरवाजे पर 'pull' लिखा है या 'push', अपनी तरफ खीचों या धकाओ क्या लिखा है, यह देखा नहीं--और जोर से धक्का दिया । दरवाजा नहीं खुला, दरवाजा सख्त दीवाल हो गया । तब उन्होंने नीचे देखा, लिखा था, खींचो, पुल । खींचते ही द्वार खुल गया । फिर वे बहुत बार कहा करते थे कि परमात्मा के द्वार पर भी push नहीं लिखा है, pull लिखा है । 'धक्का दो' नहीं लिखा है--खींचो अपनी ओर । अपनी ओर खींचने की कला क्या है?
अपनी ओर खींचने की कला समर्पण है ।
वाचस्पति मिश्र का विवाह हुआ। पिता ने आग्रह किया, वाचस्पति की कुछ समझ में न आया; इसलिए उन्होंने हां भर दी। सोचा, पिता जो कहते होंगे, ठीक ही कहते होंगे। वाचस्पति लगा था परमात्मा की खोज में। उसे कुछ और समझ में ही न आता था। कोई कुछ भी बोले, वह परमात्मा की ही बात समझता था। पिता ने वाचस्पति को पूछा, विवाह करोगे? उसने कहा, हां।
उसने शायद सुना होगा, परमात्मा से मिलोगे? जैसा कि हम सब के साथ होता है। जो धन की खोज में लगा है, उससे कहो, धर्म खोजोगे? वह समझता है, शायद कह रहे हैं, धन खोजोगे? उसने कहा, हां। हमारी जो भीतर खोज होती है, वही हम सुन पाते हैं। वाचस्पति ने शायद सुना; हां भर दी।
फिर जब घोड़े पर बैठ कर ले जाया जाने लगा, तब उसने पूछा, कहां ले जा रहे हैं? उसके पिता ने कहा, पागल, तूने हां भरा था। विवाह करने चल रहे हैं। तो फिर उसने न करना उचित न समझा; क्योंकि जब हां भर दी थी और बिना जाने भर दी थी, तो परमात्मा की मर्जी होगी।
वह विवाह करके लौट आया। लेकिन पत्नी घर में आ गई, और वाचस्पति को खयाल ही न रहा। रहता भी क्या! न उसने विवाह किया था, न हां भरी थी। वह अपने काम में ही लगा रहा। वह ब्रह्मसूत्र पर एक टीका लिखता था। वह बारह वर्ष में टीका पूरी हुई। बारह वर्ष तक उसकी पत्नी रोज सांझ दीया जला जाती, रोज सुबह उसके पैरों के पास फूल रख जाती, दोपहर उसकी थाली सरका देती। जब वह भोजन कर लेता, तो चुपचाप पीछे से थाली हटा ले जाती। बारह वर्ष तक उसकी पत्नी का वाचस्पति को पता नहीं चला कि वह है। पत्नी ने कोई उपाय नहीं किया कि पता चल जाए; बल्कि सब उपाय किए कि कहीं भूल-चूक से पता न चल जाए, क्योंकि उनके काम में बाधा न पड़े।
बारह वर्ष जिस पूर्णिमा की रात वाचस्पति का काम आधी रात पूरा हुआ और वाचस्पति उठने लगे, तो उनकी पत्नी ने दीया उठाया--उनको राह दिखाने के लिए उनके बिस्तर तक। पहली दफा बारह वर्ष में, कथा कहती है, वाचस्पति ने अपनी पत्नी का हाथ देखा। अब मन बंधा नहीं था किसी काम से। हाथ देखा, चूड़ियां देखीं, चूड़ियों की आवाज सुनी। लौट कर पीछे देखा और कहा, स्त्री, इस आधी रात अकेले में तू कौन है? कहां से आई? द्वार मकान के बंद हैं, कहां पहुंचना है तुझे, मैं पहुंचा दूं!
उसकी पत्नी ने कहा, आप शायद भूल गए होंगे, बहुत काम था। बारह वर्ष आप काम में थे। याद आपको रहे, संभव भी नहीं है। बारह वर्ष पहले, खयाल अगर आपको आता हो, तो आप मुझे पत्नी की तरह घर ले आए थे। तब से मैं यहीं हूं।
वाचस्पति रोने लगा। उसने कहा, यह तो बहुत देर हो गई। क्योंकि मैंने तो प्रतिज्ञा कर रखी है कि जिस दिन यह ग्रंथ पूरा हो जाएगा, उसी दिन घर का त्याग कर दूंगा। तो यह तो मेरे जाने का वक्त हो गया। भोर होने के करीब है; तो मैं जा रहा हूं। पागल, तूने पहले क्यों न कहा? थोड़ा भी तू इशारा कर सकती थी। लेकिन अब बहुत देर हो गई।
वाचस्पति की आंखों में आंसू देख कर पत्नी ने उसके चरणों में सिर रखा और उसने कहा, जो भी मुझे मिल सकता था, वह इन आंसुओं में मिल गया। अब मुझे कुछ और चाहिए भी नहीं है। आप निश्चिंत जाएं। और मैं क्या पा सकती थी इससे ज्यादा कि वाचस्पति की आंख में मेरे लिए आंसू हैं!
वाचस्पति ने अपने ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामति रखा है। भामति का कोई संबंध टीका से नहीं है। ब्रह्मसूत्र से कोई लेना-देना नहीं है। यह उसकी पत्नी का नाम है। यह कह कर कि अब मैं कुछ और तेरे लिए नहीं कर सकता, लेकिन मुझे चाहे लोग भूल जाएं, तुझे न भूलें, इसलिए भामति नाम देता हूं अपने ग्रंथ को। वाचस्पति को बहुत लोग भूल गए हैं; भामति को भूलना मुश्किल है। भामति लोग पढ़ते हैं। अदभुत टीका है ब्रह्मसूत्र की।
श्रद्धा को उपलब्ध हुआ आदमी ऐसा है, जैसे खिला हुआ फूल--प्रकाश को सब तरफ से झेलता हुआ; निःसंशय; सूर्य के साक्षात्कार में तत्पर; खोज को निकला; सूर्य के सामने नग्न उघाड़ा।
एक स्त्री की सड़क पर कार रुक गई है और वह उसे स्टार्ट नहीं कर पा रही है। पीछे का आदमी आकर हॉर्न बजा रहा है। तो वह स्त्री बाहर निकली, उसने उस आदमी से जाकर कहा, महानुभाव, गाड़ी मेरी स्टार्ट नहीं होती; आप जरा स्टार्ट करिए; हॉर्न बजाने का काम मैं किए देती हूं।
जल्दबाजी नहीं है; व्यक्तित्व में नहीं है।
लाओत्से कहता है, स्त्रैण-चित्त का यह जो रहस्य है--यह गैर-जल्दबाजी, अधैर्य बिलकुल नहीं, समय का बिलकुल बोध नहीं--ये सत्य की दिशा में बड़े सहयोगी कदम हैं।
स्पेस में जीती है स्त्री। उसका चित्त जो है, वह स्थान में जीता है। स्थान अभी और यहीं फैला हुआ है। समय भविष्य और अतीत में फैला हुआ है। स्थान वर्तमान में फैला हुआ है, अभी और यहीं! इसलिए स्थान का स्त्री को बहुत बोध है। और स्त्री ने जो कुछ भी थोड़ा-बहुत काम किया है, वह सब स्थान में है। चाहे वह घर बनाए, चाहे फर्नीचर सजाए, चाहे कमरे की सजावट करे, चाहे शरीर पर कपड़ा डाले, चाहे गहने पहने--यह सब spacial है, यह सब स्थान में है। इनका रूप-आकार स्थान में है। समय में इनकी कोई स्थिति नहीं है।
पुरुष इन बातों में बहुत रस नहीं ले पाता। ये उसे trivial, क्षुद्र बातें मालूम पड़ती हैं। उसका रस समय में है। वह सोचता है, communism कैसे आए! अब मार्क्स सौ साल पहले बैठ कर ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है--इस खयाल में कि कभी कम्युनिज्म कैसे आए! मार्क्स उसे देखने को नहीं बचेगा। कोई कारण नहीं है उसके बचने का। लेकिन वह योजना बनाता है कि कम्युनिज्म कैसे आए! कोई और लाएगा, कोई और देखेगा; आएगा, नहीं आएगा; इससे मतलब नहीं है। लेकिन मार्क्स इतनी मेहनत करता है, कोई स्त्री नहीं कर सकती।
मार्क्स ब्रिटिश म्यूजियम से तब हटता था, जब बेहोश हो जाता था पढ़ते-पढ़ते और लिखते-लिखते। अक्सर उसे बेहोश घर ले जाया गया है। और उसकी पत्नी हैरान होती थी कि तुम पागल हो! तुम कर क्या रहे हो? इसे लिख कर होगा क्या? उसकी किताब भी कोई छापने को तैयार नहीं था। स्त्री सोच ही नहीं सकती थी, इससे फायदा क्या है! यह किताब बिक भी नहीं सकती। उलटे महंगा पड़ रहा था। मार्क्स ने The Capitol लिखी, तो जितने में उसकी किताब बिकी, उससे ज्यादा की तो वह सिगरेट पी चुका था उसे लिखने में। तो मंहगा पड़ रहा था। और बेहोश घर उठा कर लाया जाता। लाइब्रेरी से धक्के देकर निकाला जाता; क्योंकि लाइब्रेरी बंद हो गई और वह हटता ही नहीं है, वह अपनी कुर्सी पकड़े हुए बैठा है। चपरासी कह रहे हैं, हटिए! और वह कह रहा है, थोड़ा और लिख लेने दो।
यह किसलिए? यह भविष्य की कोई कल्पना है कि कहीं किसी दिन साम्यवाद आएगा! इसमें कोई स्पेसियल बोध नहीं है, स्थान का कोई बोध नहीं है। कोई स्त्री यह नहीं कर सकती। अभी और यहीं! यहीं कुछ हो सकता हो, तो! उसके अंतर में ही समय की प्रतीति नहीं है।
समय की प्रतीति खो जाए, तो आप स्त्रैण-चित्त के हो जाएंगे। इसलिए दुनिया के समस्त साधकों ने यह कहा है कि जब समय मिट जाएगा, तभी ध्यान उपलब्ध होगा।
उन्नीस सौ दस में एक वैज्ञानिकों का अन्वेषक-मंडल उत्तरी ध्रुव पर यात्रा पर गया। उत्तरी ध्रुव में तीन महीने तक वे लोग फंस गए बर्फ में और लौट न सके। भोजन चुक गया। बड़ी मुश्किल थी, बड़ी कठिनाई थी।
लेकिन सबसे बड़ी कठिनाई तब हुई, जब सिगरेट चुक गई। लोग कम रोटी लेने को राजी थे, लेकिन कम सिगरेट लेने को राजी नहीं थे। लोग कम पानी पीने को राजी थे, लेकिन कम सिगरेट लेने को राजी नहीं थे। लेकिन कोई उपाय न था। नावें फंसी थीं बर्फ में। और तीन महीने से पहले निकलने की संभावना न थी। और तीन महीने सब चलाना था। नहीं माने। तो भोजन तो किसी तरह चला थोड़ा-थोड़ा देकर, लेकिन सिगरेट सबसे पहले चुक गई। क्योंकि कोई सिगरेट कम करने को राजी न था।
फिर एक बड़ा खतरा आया। और वह खतरा यह आया कि लोगों ने नावों की रस्सियां काट-काटकर सिगरेट बनाकर पीना शुरू कर दिया। तब तो जो जहाज का कप्तान था, उसने कहा कि तुम क्या कर रहे हो यह? अगर नावों की रस्सियां कट गईं, तो फिर तीन महीने के बाद भी छुटकारा नहीं है। क्योंकि फिर ये नावें चलेंगी कैसे? पर लोगों ने कहा कि तीन महीना! तीन महीने के बाद छुटकारा होगा कि नहीं होगा, यह कुछ भी पक्का नहीं है। सिगरेट अभी चाहिए। और हम बिना सिगरेट के तीन महीने बचेंगे, यह कहां पक्का है? और तीन महीने तड़पना और रस्सियां बंधी हैं पास में जिनको पीया जा सकता है। सिगरेट तो नहीं होतीं, लेकिन फिर भी धुआं तो निकाला ही जा सकता है। तो नहीं, असंभव है। बहुत समझाया, तो रात चोरी से रस्सियां कटने लगीं।
फिर जब वह नाव लौटी, तो उसके कप्तान ने जो वक्तव्य दिया, उसने कहा कि सबसे कठिन कठिनाई जो तीन महीने में आई, वह यह थी कि लोग सिगरेट की जगह रस्सियां पी गए, कपड़े जलाकर पी गए, किताबें जलाकर पी गए। जो भी मिला, उसको पीते चले गए।
एक स्टुअर्ट पैरी नाम का आदमी अखबार में यह पढ़ रहा था। पढ़कर उसे खयाल आया-- वह भी चेन स्मोकर था, जब पढ़ रहा था, तब सिगरेट पी ही रहा था--उसे खयाल आया कि मेरी भी यही हालत होती क्या? क्या मैं भी रस्सी पी जाता? उसने कहा कि नहीं, मैं कैसे रस्सी पी सकता था? आप भी कहेंगे कि मैं कैसे रस्सी पी सकता था? पर उसने कहा कि वहां भी तीस-चालीस लोग थे, कोई हिम्मत न जुटा पाया, सबने पी! क्या मैं भी पी जाता!
उसकी आधी जली हुई सिगरेट थी। उसने ऐश-ट्रे पर नीचे रख दी और उसने कहा कि परमात्मा, अब तू सम्हाल। अब यह सिगरेट आधी रखी है नीचे। और अब मैं इसे उसी दिन उठाऊंगा, जिस दिन मेरा तुझ पर भरोसा खो जाए। और जब मैं इसे उठाने लगूं, तो मेरी तो कोई ताकत नहीं है, क्योंकि मैं अपने को अच्छी तरह जानता हूं, कि मैं तो एक सिगरेट से दूसरी सिगरेट जलाता हूं। मैं अपने को भलीभांति जानता हूं, जैसा मैं आज तक रहा हूं, मैं भलीभांति जानता हूं कि यह सिगरेट नीचे नहीं रह सकती, मैं इसे उठा ही लूंगा। मैं अपनी कमजोरी से परिचित हूं। मेरे भीतर मुझे कोई सुरक्षा का उपाय नहीं है। मेरे भीतर मेरे परिचय में मेरे पास कोई संकल्प नहीं है जो मैं सिगरेट से बच सकूं। लेकिन मेरे मन को पीड़ा भी बहुत है। और मैं यह भी नहीं सोच पा सकता कि इतना कमजोर, इतना दीन हूं कि सिगरेट भी नहीं छोड़ सकूंगा, तो फिर मैं और क्या छोड़ सकता हूं। मैं तेरे ऊपर छोड़ता हूं। अब तू ही खयाल रखना। जब तू ही साथ छोड़ देगा, तो ही सिगरेट उठाऊंगा। हां! उठाने के पहले एक दफे तेरी तरफ आंख उठा लूंगा!
फिर तीस साल बीत गए। उस आदमी ने उन्नीस सौ चालीस में वक्तव्य दिया है कि तीस साल बीत गए--सिगरेट आधी वहीं रखी है। जब भी उठाने का स्टुअर्ट पैरी का मन होता है, तभी ऊपर की तरफ देखता हूं कि क्या इरादे हैं? सिगरेट वहां रह जाती है, पैरी यहां रह जाते हैं। तीस साल हो गए, अभी उठाई नहीं। और अब तीस साल काफी वक्त है, स्टुअर्ट पैरी ने कहा, अब मैं कह सकता हूं कि जो भरोसा, जो ट्रस्ट मैंने परमात्मा पर किया था, वह पूरा हुआ है।
लगेगा बहुत कि ज्ञान का बड़ा लाभ हो रहा है, लेकिन लाभ होगा नहीं; मृत्यु तुम्हारे लाभ की सारी भ्रांति तोड़ देगी।
किसी समय एक आदमी के पास बहुत से पशु-पक्षी थे। उसने सुना कि हजरत मूसा पशु-पक्षियों की भाषा समझते हैं। वह उनके पास गया और बहुत हठ करके उसने उनसे वह कला सीखी। तब से वह आदमी अपने पशु-पक्षियों की बातचीत सुनने लगा।
एक दिन मुर्गे ने कुत्ते से कहा कि घोड़ा शीघ्र ही मर जायेगा। यह सुनकर उस व्यक्ति ने घोड़े को बेच दिया ताकि हानि से वह बच जाये। कुछ दिनों के बाद उसने उसी मुर्गे को कुत्ते से कहते सुना कि जल्द ही खच्चर मरने वाला है। मालिक ने खच्चर को भी बेच दिया। फिर मुर्गे ने कहा कि अब गुलाम की मृत्यु होनेवाली है। और मालिक ने गुलाम को भी वैसे ही बेच डाला और बहुत खुश हुआ कि ज्ञान का इतना-इतना फल प्राप्त हो रहा है। तब एक दिन उसने मुर्गे को कुत्ते से कहते सुना कि यह आदमी खुद मर जानेवाला है। अब तो वह भय से कांपने लगा। वह दौड़ता हुआ मूसा के पास पहुंचा और पूछा कि अब मैं क्या करूं?
मूसा ने कहा, 'जाओ और अपने को भी बेच डालो।'
मौत को जो भूला, वह कर्ता बन जाता है।
बल्ख का एक बादशाह हुआ इब्राहिम; फिर बाद में वह फकीर हो गया। उसने एक नया गुलाम खरीदा। गुलाम एक फकीर था--एक सूफी फकीर। जो रेगिस्तान में यात्रा पर निकला था कि कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया। फकीर सुंदर था, स्वस्थ था, बलवान था। और लोगों ने पकड़ लिया तो उसने इंकार न किया, क्योंकि वह सहज जीवन की धारा में बह रहा था--जो हो! उसने हाथ फैला दिए, उन्होंने जंजीरें डाल दीं। वे भी थोड़े चौंके, क्योंकि वह आदमी मजबूत था और चाहता तो चार को जमीन पर बिछा देता। फिर उसने कहा, किस तरफ चलना है? तो वह उनके साथ हो लिया। रास्ते में उन्होंने पूछा कि मामला क्या है? न तुम लड़े, न तुम झगड़े। हम तुम्हें गुलाम बना लिए हैं, कुछ समझे कि नहीं? दिमाग दुरुस्त है कि पागल हो?
उस फकीर ने कहा कि 'अगर तुम्हारा दिमाग दुरुस्त है तो हम पागल हैं। और अगर हमारा दुरुस्त है तो तुम पागल हो। दोनों तो एक जैसे नहीं हैं। अब यहां कौन निर्णय करे? निर्णय की कोई जरूरत भी नहीं, लेकिन तुम नाहक ही हथकड़ी का बोझ ढो रहे हो। मैं साथ चलने को तैयार हूं क्योंकि साथ चलना ही मेरी जीवन की प्रक्रिया है।'
वे कुछ समझे नहीं। लेकिन उन्होंने पाया कि आदमी सीधा-साधा है। उन्होंने जंजीर भी निकाल ली। वह उनके साथ-साथ गया। बाजार में जब उनकी बिक्री हुई तो इब्राहिम ने खरीद लिया। इब्राहिम गया था गुलामों की तलाश में, उसका निकट का गुलाम मर गया था। वह फकीर बड़ा सुंदर था, शानदार था। उसको खरीद कर घर ले आया। फकीर नंगा था। इब्राहिम ने कहा कि तुम कैसे वस्त्र पहनना पसंद करोगे? उस फकीर ने कहा, 'गुलाम की क्या मरजी! मालिक जो कहे।' इब्राहिम ने कहा, 'तुम कैसा भोजन पसंद करते हो?' 'गुलाम की क्या अभिलाषा! मालिक जो कहे।' इब्राहिम ने पूछा, 'कुछ भी तुम्हें कहना हो तो कह दो, ताकि वैसी व्यवस्था तुम्हारे लिए हो जाये। तुम्हारे साथ आते-आते महल तक, मुझे तुमसे लगाव हो गया है। तुम आदमी बड़े अदभुत मालूम होते हो। तुम जैसा चाहो वैसा इंतजाम हो जायेगा।' उसने कहा, 'जैसा आप चाहें वैसा इंतजाम कर दें, क्योंकि मैंने तो उसकी मरजी के साथ बहने के सिवाय और कोई मरजी नहीं रखी। मालिक जो चाहे। आप मालिक हैं, मैं गुलाम हूं।'
कहते हैं इब्राहिम उठा, इस आदमी के चरणों पर गिर पड़ा। और उसने कहा कि तुम मेरे गुरु बन जाओ। क्योंकि जो तुम मेरे साथ कर रहे हो काश! मैं भी वह परमात्मा के साथ कर पाऊं। बस! यही तो सार-सूत्र है, इसी की मैं तलाश में था। और एक गुलाम से यह सार-सूत्र मिलेगा, यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था। मैं अहंकारियों के पीछे भटकता रहा। उनको मैं गुरु समझ रहा था। एक गुलाम से यह सूत्र मिलेगा, यह मैंने कभी सोचा ही नहीं था। फिर इब्राहिम तो एक खुद बड़ा फकीर हुआ, लेकिन यह गुलाम उसका पहला गुरु था।
बहो, तैरो मत। मंजिल ज्यादा दूर नहीं है। मगर पहले सहज हो जाओ।
मूढ़ता
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उसे मनोचिकित्सक के पास ले गई और उसने कहा, मेरे पति को हमेशा कुछ न कुछ भूल आने की आदत है । कभी छाता, कभी फाउंटेन पेन, कभी जूते.. .बात यहां तक हो जाती है कि अगर चश्मा और रूमाल ये ही चीजें भूलते रहें तो भी ठीक है, कभी-कभी मुझे तक भूल आते हैं । साथ ले जाते हैं क्लब में और खुद नदारद हो जाते हैं, घर पहुंच जाते हैं । फिर पीछे कहते हैं, मुझे याद ही न रही ।
मनोचिकित्सक ने कहा, घबड़ाओ मत, इलाज हो जाएगा । फिर उसने मुल्ला की तरफ गौर से देखा । मुल्ला को जानता है भलीभांति । उसने कहा, लेकिन एक बात खयाल रखना कि इलाज के बाद कहीं प्रवृत्ति उलट न जाए और यह कहीं कुछ का कुछ घर लाना शुरू न कर दे । छाता ले आए, किसी दूसरे के जूते उठा लाए । पत्नी ने थोड़ा सोचा, फिर बोली तो फिर रहने दें, ऐसे ही ठीक है । अगर दूसरे की पत्नी ले आए! अभी जो भूल आता है, वहां तक ठीक है ।
मूढ़ व्यक्ति जो भी करेगा उसमें कुछ न कुछ मूढ़ता रहेगी ही ।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन ने मुझसे पूछा कि आपकी घड़ी में कितने बजे हैं? मैंने कहा, ग्यारह । ग्यारह बजे थे । उसने बहुत हैरानी से मेरी तरफ देखा, अपने माथे पर जोर से हाथ मारा और कहा कि लगता है मैं पागल हो जाऊंगा । मैं भी थोड़ा हैरान हुआ । मैंने कहा, इसमें पागल होने की क्या बात है? ग्यारह बजने से तेरे पागल होने का क्या संबंध? उसने कहा, है! संबंध क्यों नहीं है? आज दिन भर से पूछ रहा हूं, न मालूम कितने लोगों से पूछ चुका, सबने अलग-अलग समय बतलाया । मैं पागल हो जाऊंगा अगर.. कोई एक समय बतलाता ही नहीं । कोई दस बतलाता, कोई नौ, कोई आठ, कोई साढ़े आठ! आखिर आदमी पागल न हो जाए तो करे क्या?
मंदमति यथार्थ तत्व को सुन कर भी मूढ़ता को ही प्राप्त होता है ।
अगर तुम जीवन को गौर से पढ़ो, जीवन के पाठ को ठीक से पढ़ो, तो जीवन रोज तुम्हारे अहंकार को तोड़ रहा है । क्योंकि जीवन को तुम्हारे चुनावों से कुछ लेना-देना नहीं । तुम्हारे चुनाव व्यक्तिगत हैं; इस समग्र को उनसे कोई प्रयोजन नहीं है । तुम्हारे चुनाव अगर कभी-कभी हल भी हो जाते हैं तो संयोग समझना । यह संयोग की बात है कि तुमने कुछ ऐसी बात चुन ली जिस तरफ अस्तित्व अपने आप जा रहा था, बस । भाग्यवशात! बिल्ली निकलती थी और छींका टूट गया । यह संयोग की बात समझना; कोई बिल्ली के लिए छींका नहीं टूटता है । यह बिलकुल सांयोगिक था कि तुमने चुन ली ऐसी बात जो होने जा रही थी । लेकिन जब तुम्हारी चुनी हुई बात हो जाती है, तब तुम बड़ी अकड़ से भर जाते हो कि देखा, करके दिखा दिया! और जब तुम्हारी बात टूटती है... और तुम्हारी बात सौ में निन्यानवे मौकों पर टूटती है! क्योंकि संयोग तो कभी सौ में एकाध हो सकते हैं, अपवाद हो सकते हैं । उन निन्यानवे मौकों पर तुम कुछ न कुछ तर्कजाल फैला कर अपने को समझा लेते हो । कहीं दोष देकर किसी तरह अपने को निवृत्त कर लेते हो ।
जीसस के जीवन में एक उल्लेख है, एक लंगड़ा आया जो बैसाखी पर चलता आया । और कहते हैं, जीसस ने उसे छुआ और लंगड़ा स्वस्थ हो गया । जब वह जाने लगा तो भी वह अपनी बैसाखी साथ ले जाने लगा, तो जीसस ने कहा, अरे पागल, बैसाखी तो छोड़! अब यह बैसाखी कहां ले जा रहा है? लोग हंसेंगे ।
पुरानी आदत । न-मालूम कितने वर्षों से बैसाखी लेकर चलता था, आज ठीक भी हो गया तो भी बैसाखी लिये जा रहा है ।
जो अभिवादनशील है, नित्य बड़े-बूढों की सेवा करता है, उसकी चार बातें बढती हैं - आयु, वर्ण, सुख और बल ।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्र के साथ ज्यादा देर तक गपशप में लगा रहा । रात बहुत बीत गयी । चौंककर उठा, उसने कहा बहुत देर हो गयी, अब घर जाऊं । मित्र ने कहा, आज भाभी तो बहुत इत्र-पान करेंगी । मुल्ला ने कहा तूने मुझे समझा क्या है? अगर घर जाते ही पहला शब्द पत्नी से प्रीतम न निकलवा लूं, तो मेरा नाम बदल देना । या तेरी जिंदगी भर गुलामी कर दूंगा । मित्र भलीभांति मुल्ला की पत्नी को जानता है, उसने कहा कोई फिक्र नहीं, दो मील चलना पड़ेगा--इस अंधेरी रात में--लेकिन मैं आता हूं, शर्त रही!
नसरुद्दीन घर गया । उसने जाकर द्वार पर दस्तक दी और जोर से बोला, 'प्रीतम आ गये हैं ।' पत्नी चिल्लायी अंदर से, 'प्रीतम जाएं भाड़ में ।' उसने मित्र से कहा, 'देखा, कहलवा लिया न! पहला शब्द प्रीतम!'
अगर कोई धारणा है, अगर पहले से कोई पक्षपात है, तो तुम कुछ का कुछ सुन लोगे । तुम सत्य को अपने हिसाब से ढाल लोगे । तुम उसे असत्य कर लोगे ।
एक राजा ने रात सपना देखा और वह घबड़ा गया और उसकी नींद टूट गई । और उसने सारे महल को जगा दिया, और उसने सारी राजधानी में खबर पहुंचा दी कि मैंने एक सपना देखा है और जो लोग भी मेरे सपने का अर्थ कर सकें, उसकी व्याख्या कर सकें, वे शीघ्र चले आएं । गांव में जो भी विचारशील लोग थे, समझदार लोग थे, ज्ञानी थे, वे भागे हुए राजमहल आए । उन्होंने राजा से पूछा कि कौन सा सपना देखा कि आधी रात में और हमारी जरूरत पड़ गई? उस राजा ने कहा -- मैंने सपने में देखा, मौत मेरे कंधे पर हाथ रख कर खड़ी है, और मुझसे कह रही है, आज सांझ ठीक समय पर, और ठीक जगह पर मुझे मिल जाना । मेरी कुछ समझ में नहीं आता है, इस सपने का क्या अर्थ है? तुम मुझे समझाओ ।
वे विचार में पड़ गए और इस सपने का अर्थ करने लगे । क्या होगी इसकी सूचना, क्या है लक्षण और तभी उस राजा के बूढ़े नौकर ने कहा, इनके अर्थ और इनकी व्याख्याएं, और इनके शास्त्र बहुत बड़े हैं, सांझ जल्दी होे जाएगी । और मौत ने कहा है कि सांझ होते-होते, सूरज ढलते-ढलते मुझे ठीक जगह पर मिल जाना; मैं तुम्हें लेने आ रही हूं । उस नौकर ने कहा कि उचित तो यह होगा कि आपके पास जो तेज घोड़ा हो, उसको लेकर इस महल से जितनी दूर निकल सकें, निकल जाएं । इस महल में एक क्षण भी रुकना खतरनाक है । जितने दूर जा सकें चले जाएं । मौत से बचने का इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं है । और अगर इन पंडितों की व्याख्या के लिए बैठे रहे कि ये क्या कहेंगे और क्या अर्थ? तो उस बूढ़े ने कहा, मैं आपसे कहे देता हूं, पंडित आज तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं । कोई निष्पत्ति, कोई समाधान पर नहीं पहुंचे हैं; हजारों साल से विचार कर रहे हैं, और अभी तक वह जीवन का ही कोई अर्थ नहीं निकाल पाए, तो मौत का क्या अर्थ निकाल पाएंगे । सांझ बहुत जल्दी हो जाएगी, इनका अर्थ न निकल पाएगा, आप भागें । उचित यही है कि इस महल को छोड़ दें ।
राजा को बात समझ में आई, उसने अपना तेज से तेज घोड़ा बुलाया और बैठा और भागा । दिन भर उस दिन वह भागता रहा । न उसने धूप देखी न छाँव, न उस दिन उसे प्यास लगी न भूख; जितने दूर निकल सके, निकल जाना था, मौत पीछे पड़ी थी । महल जितना दूर छूट जाए, उतना अच्छा था । मौत के पंजे के बाहर जितना हो जाए, उतना अच्छा । सांझ होते-होते वह सैकड़ों मील दूर निकल गया । उसने एक बगीचे में जाकर अपने घोड़े को रोका, वह प्रसन्न था । वह काफी दूर आ गया था । सूरज ढल रहा था, उसकी आखिरी किरण डूबने लगी, वह घोड़ा बांध रहा था, उसे अनुभव हुआ कि पीछे किसी ने कंधे पर आकर हाथ रख दिया है । उसने पीछे लौट कर देखा, जो काली छाया सपने में उसको दिखाई पड़ी थी, वही खड़ी थी । वह घबड़ा गया, उसके सारे प्राण कंप गए । उसने कहा तुम? तुम कौन हो ? उस मृत्यु ने कहा -- मैं हूं तुम्हारी मृत्यु । क्या भूल गए, सुबह ही आज ही रात, बीती रात ही तो मैंने तुम्हें स्मरण दिलाया था कि सांझ होने के पहले सूरज ढलने के पहले ठीक जगह मिल जाना । मैं तो बहुत घबड़ाई हुई थी, क्योंकि तुम जहां थे वहां से इस झाड़ के नीचे तक आने में बड़ी कठिनाई थी, लेकिन तुम्हारा घोड़ा बहुत तेज था, तुम ठीक जगह आ गए हो । मैं तुम्हारे घोड़े को धन्यवाद देती हूं, इस जगह तुम्हें मरना था । और मैं चिंतित थी कि तुम आ पाओगे ठीक जगह कि न आ पाओगे ।
दिन भर की दौड़ सांझ को मौत में ले गई । सोचा था बचने के लिए भाग रहा है, वह राजा । उसे पता भी न था कि बचने के लिए नहीं भाग रहा था, जिससे बचना चाह रहा था, प्रतिक्षण उसी के मुंह में चला जा रहा था । हम सब भी अपने-अपने घोड़ों पर सवार और हम सब भी मौत के मुंह में चले जा रहे हैं । और हम जो भी करेंगे वह शायद हमें ठीक जगह पहुंचा देगा, जहां मौत है । और हम जिस रास्ते पर भी चलेंगे, वो हमें मौत के अतिरिक्त और कहीं नहीं ले जाएगा, आज तक यही होता रहा है । सोया हुआ आदमी जो कुछ भी करेगा, वह मौत में ले जाता है ।
विश्वास -- संदेह को हल किए बिना हल को ऊपर से आरोपित कर लेना । श्रद्धा -- संदेह के गिर जाने पर फलित होना ।
एक सूफी फकीर हुआ है, जलालुद्दीन । वह अपने ध्यान में बैठा है । और उसके एक शिष्य ने आकर उससे कहा -- उठिए, उठिए, बड़ी मुश्किल हो गई! एक बंदर के हाथ में तलवार पड़ गई है; कुछ न कुछ खतरा होकर रहेगा । जलालुद्दीन ने कहा -- बहुत परेशान मत हो, आदमी के हाथ में तो नहीं पड़ी है न! फिर कोई फिक्र की बात नहीं है, फिर कोई चिंता की बात नहीं है । आदमी के हाथ में पड़ गई हो, तो फिर उठना पड़े । फिर कुछ उपद्रव होकर रहेगा ।
जंगल में इतना संघर्ष नहीं है, जैसा हमें खयाल है । और हम सबको खयाल है कि जंगल एक संघर्ष है, conflict है, हिंसा है । बड़ा सहयोग है । लेकिन आदमी ने जो जंगल बनाया है, जिसका नाम सभ्यता है, समाज है, वह बिलकुल संघर्ष है । और दिखाई बिलकुल नहीं पड़ता । और पूरे समय एक-दूसरे की दुश्मनी में सारा का सारा जाल फैलता चला जाता है ।
अज्ञानी के हाथ में सारे जगत का ज्ञान दे दें, तो खतरा ही है।
नादिरशाह ने एक दफा एक ज्योतिषी से पूछा कि मैंने एक किताब पढ़ी है--धर्मग्रंथ! उसमें लिखा है, ज्यादा देर सोना अच्छा नहीं। लेकिन मैं सुबह दस बजे सोकर उठता हूं। आपका क्या खयाल है? किताब ठीक कि मैं ठीक? ज्योतिषी ने कहा, किताब ठीक नहीं है; आप ही ठीक हैं। और मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप चौबीस घंटे सोए रहें, तो बहुत अच्छा है! नादिरशाह ने कहा, तुम्हारा मतलब? हिम्मत का आदमी रहा होगा वह ज्योतिषी। उसने कहा, मेरा मतलब यह कि किताब अच्छे आदमियों को ध्यान में रखकर लिखी गई है, बुरे आदमियों को ध्यान में रखकर नहीं। अच्छा आदमी जितना जागे, उतना अच्छा; बुरा आदमी जितना सोए, उतना अच्छा। क्योंकि वह जितनी देर सोए, उतनी देर दुनिया के लिए वरदान है। जितनी देर जागे, उतनी देर उपद्रव; होगा ही कुछ!
इंद्रियां हार जाती हैं ज्ञान से; इंद्रियां प्रबल हो जाती हैं अज्ञान से।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर लौट रहा था। सांझ का धुंधलका था। और मोटर साइकिल पर दो बैठे हुए आदमी एक वृक्ष से टकरा गए थे। अकेला नसरुद्दीन ही वहां था, वह उनके पास गया। एक तो मर ही चुका था। लेकिन दूसरे को नसरुद्दीन ने सहायता की।
नसरुद्दीन को लगा कि चोट खाने से उसका सिर उलटा हो गया है; पीठ की तरफ मुंह हो गया है। तो उसने बड़ी मेहनत से घुमा-फिरा कर--वह आदमी चीखा भी, चिल्लाया भी--उसका बिलकुल ठीक सिर कर दिया, जिस तरफ होना चाहिए था। तभी पुलिस भी आ गई। और पुलिस ने पूछा कि क्या ये दोनों आदमी मर चुके?
नसरुद्दीन ने कहा, एक तो पहले ही मरा हुआ था; दूसरे को मैंने सुधारने की बड़ी कोशिश की। पहले तो इसमें से चीख-पुकार निकलती थी, फिर पीछे वह भी बंद हो गई।
गौर से देखा तो पाया कि ठंडी सांझ थी और वह जो आदमी मोटर-साइकिल के पीछे बैठा था, उसने उलटा कोट पहन रखा था, ताकि आगे से सीने पर हवा न लगे। और उलटा कोट देख कर नसरुद्दीन ने समझा कि इसका सिर उलटा हो गया है, तो उसने घुमा कर उसका सिर सीधा कर दिया। उसी में वे मारे गए। वे जिंदा थे, न सुधारे जाते तो बच जाते।
करीब-करीब ऐसा हमने किया है प्रकृति के साथ। और जहां प्रकृति के साथ हमने बहुत छेड़खानी की है वहां सब चीजें अस्त-व्यस्त हो गई हैं।
पश्चिम में बड़ा आंदोलन है ecology का। पश्चिम के विचारशील लोग कह रहे हैं वैज्ञानिकों को कि अब तुम कृपा करो, अब और सुधार न करो। वैसे ही तुमने सब नष्ट कर दिया है। क्योंकि सब चीजें गुंथी हैं।
जीवन में शोरगुल बहुत है हमारे, वैसा ही जैसे हजार छिद्रों वाली बाल्टी में पानी भरने पर कुएं में होता है।
मुल्ला नसरुद्दीन को सुबह-सुबह घर के बाहर निकलते ही डाक्टर मिल गया। और डाक्टर ने पूछा नसरुद्दीन से कि नसरुद्दीन, पत्नी की तबीयत अब कैसी है? नींद आई?
नसरुद्दीन ने कहा, क्या गजब की दवा दी आपने! बहुत अच्छी नींद आई और बड़ी तबीयत ठीक है।
डाक्टर ने पूछा, और कुछ तो नहीं पूछना?
नसरुद्दीन ने कहा, यही पूछना है कि नींद कब खुलेगी? क्योंकि पांच दिन हो गए हैं; बड़ी शांति है, और बड़ी स्वतंत्रता है, पत्नी बिलकुल सो रही है।
डाक्टर ने कहा, पांच दिन हो गए हैं! पागल, तूने खबर क्यों न की? क्या दवा ज्यादा दे दी?
नसरुद्दीन ने कहा, ज्यादा बिलकुल नहीं दी। आपने कहा था, चवन्नी पर रख कर देना। घर में चवन्नी न थी, चार इकन्नियां थीं; उन पर रख कर दे दी। बड़ी शांति है, और बड़ी स्वतंत्रता है। कहीं आओ-जाओ, सब सन्नाटा है। विवाह के बाद ऐसी शांति और स्वतंत्रता मैंने नहीं जानी। पत्नी सो रही है।
हम जीवन को तो अध्ययन नहीं करते, हम शास्त्रों को अध्ययन करते हैं।
एक गुरु के दो शिष्य थे। गर्मी की दोपहर थी, गुरु विश्राम कर रहा था, और दोनों उसकी सेवा कर रहे थे। गुरु ने करवट बदली-तो दोनों शिष्यों ने आधा-आधा गुरु को बांट रखा था सेवा के लिए, बायां पैर एक ने ले रखा था, दायां पैर एक ने ले रखा था-गुरु ने करवट बदली तो बायां पैर दाएं पैर पर पड़ गया। स्वभावत: झंझट खड़ी हो गई।
गुरु तो एक है। शिष्य दो थे। तो उन्होंने हिदुस्तान-पाकिस्तान बांटा हुआ था। तो जब दाएं पैर पर बायां पैर पड़ा, तो जिसका दायां पैर था उसने कहा, हटा ले अपने बाएं पैर को। मेरे पैर पर पैर! सीमा होती है सहने की। बहुत हो चुका, हटा ले। तो उस दूसरे ने कहा, देखूं किसकी हिम्मत है कि मेरे पैर को और कोई हटा दे! सिर कट जाएंगे, मगर मेरा पैर जहां रख गया रख गया। यह कोई साधारण पैर नहीं, अंगद का पैर है। भारी झगड़ा हो गया, दोनों लट्ठ लेकर आ गए।
गुरु यह उपद्रव सुनकर उसकी नींद खुल गई, उसने देखी यह दशा। उसने जब लट्ठ चलने के ही करीब आ गए-लट्ठ चलने वाले थे गुरु पर! क्योंकि जिसका दायां पैर था वह बाएं पैर को तोड़ डालने को तत्पर हो गया था। और जिसका बायां पैर था वह दाएं पैर को तोड़ डालने को तत्पर हो गया था। गुरु ने कहा, जरा रुको, तुम मुझे मार ही डालोगे। ये दोनों पैर मेरे हैं। तुमने विभाजन कैसे किया?
अज्ञानी बांट लेता है और भूल ही जाता है। भूल ही जाता है कि जो उसने बांटा है वे एक ही व्यक्ति के पैर हैं, या एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं।
शून्य में जो खड़ा है, वही बुद्धिमान है।
एक सम्राट का बेटा था, जो मूढ़ था। और सम्राट परेशान हो गया। बुद्धिमानों से सलाह ली, तो उन्होंने कहा कि यहां तो कोई उपाय नहीं है। दूर देश किसी और राजधानी में एक विश्वविद्यालय है, वहां भेजो। भेज दिया गया।
वर्षों की शिक्षा के बाद बेटे ने खबर भेजी कि अब मैं बिलकुल निष्णात हो गया, दीक्षित हो गया। सब शिक्षा मैंने पा ली। अब मुझे वापस लौटने की आज्ञा दे दी जाए। सम्राट ने उसे वापस बुला लिया। सम्राट भी खुश हुआ। वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता होकर आ गया। वह ज्योतिष भी जानता है। वह भविष्यवाणी भी कर सकता है। वह लोगों के पीछे अतीत में भी देख सकता है। उन दिनों जो-जो विज्ञान था, वह सब जानकर आ गया।
सम्राट बहुत खुश हुआ। उसने देश के सभी बुद्धिमानों को स्वागत के लिए बुलाया। अपने बेटे के स्वागत का समारंभ किया। बड़े-बड़े बुद्धिमान आए। एक बूढ़ा भी आया। उस बूढ़े ने उस बेटे से कई सवाल पूछे। पूछा कि तुमने क्या-क्या अध्ययन किया? तो वह करिक्युलम लाया था अपने विश्वविद्यालय का। उसने निशान लगा रखे थे कि मैंने क्या-क्या पढ़ा। उसने सब बताया।
परीक्षा के लिए बूढ़े ने--क्योंकि उसने कहा कि मैं अदृश्य चीजों को भी देख पाता हूं, उनका भी अंदाज लगा पाता हूं, उनका भी अनुमान कर पाता हूं--उस बूढ़े ने बातचीत करते-करते अपने हाथ का छल्ला निकालकर अपनी मुट्ठी में अंदर कर लिया। बंद मुट्ठी उस लड़के के सामने की और कहा कि मुझे बताओ, इस मुट्ठी के भीतर क्या है?
उस लड़के ने एक सेकेंड आंख बंद की और कहा कि एक ऐसी चीज है जो गोल है और जिसमें बीच में छेद है। बूढ़ा हैरान हुआ। बूढ़े ने समझा कि लड़का सचमुच ही बुद्धिमान होकर लौट आया है। सब शास्त्र उसने जान लिए हैं। फिर भी उसने एक सवाल और पूछा कि कृपा करके उस चीज का नाम भी तो बताओ!
तो उस युवक ने आंखें बंद कीं, बहुत देर तक नहीं खोलीं। और फिर कहा कि मैंने जो शास्त्रों का अध्ययन किया, उसमें नाम बताने का कहीं भी कोई आधार नहीं मिलता है। फिर भी मैं अपने common-sense से, अपनी बुद्धि से कहता हूं कि आपके हाथ में गाड़ी का चाक होना चाहिए।
वह जो बेचारा पहले बताया था, वह शास्त्र था। अब जो बता रहा है, वह खुद है!
you can educate a fool, but you cannot make him wise--मूढ़ को भी शिक्षित किया जा सकता है, लेकिन बुद्धिमान नहीं बनाया जा सकता।
एक बेल एक भवन पर चढ़ती थी। लेकिन एक दिन एक नास्तिक से उस बेल का मिलना हो गया और उस नास्तिक ने कहा कि यह तेरी मजबूरी है कि तुझमें फूल आते हैं। यह कोई तेरा गौरव नहीं है।
बेल को तो पता ही न था। वह तो फूल खिलते थे, तो आनंद से नाचती थी; पक्षियों को निमंत्रण देती थी। सूरज की किरणें आती थीं, तो सुगंध बिखेरती थी। उस नास्तिक ने कहा, पागल, यह तेरी कोई गरिमा और कोई गौरव नहीं है। तू तो मजबूर है बढ़ने को। फूल खिलाने के लिए मजबूरी है तेरी। यह तेरी गुलामी है। तू चाहे तो भी फूल खिलना रुक नहीं सकता।
जैसा कि सार्त्र ने कहा है। सार्त्र का प्रसिद्ध वचन है, Man is condemned to be free। शायद स्वतंत्रता के साथ कंडेम्ड का प्रयोग दुनिया में किसी दूसरे आदमी ने इसके पहले नहीं किया था। सार्त्र कह रहा है, मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए बाध्य है। या कहना चाहिए, मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए निंदित है। उसे स्वतंत्र होना ही पड़ेगा। स्वतंत्रता उसकी गुलामी है। कोई उपाय नहीं है; स्वतंत्र होना ही पड़ेगा। जबर्दस्ती स्वतंत्र किया जा रहा है।
ऐसा उस नास्तिक ने कहा, you are condemned to grow and to flower। तुम निंदित हो कि तुममें फूल खिलें और तुम बढ़ो। इसमें तुम्हारा कोई गौरव नहीं है।
निश्चित ही, बेल को बड़ी तकलीफ हुई। फूल तो उसकी छाती पर अब भी खिले थे, लेकिन बेकार हो गए। पहली बार अहंकार जागा। और उसने आकाश की तरफ सिर उठाकर परमात्मा से कहा कि बस, अब मैं बढ़ने से इनकार करती हूं। अब मैं इनकार करती हूं; ठीक से सुन लो कि अब मैं नहीं बढूंगी। और अब मैं इनकार करती हूं कि अब मैं फूल नहीं खिलाऊंगी। और अब मैं इनकार करती हूं कि मुझमें फल नहीं लगेंगे।
परमात्मा ने कहा, जैसी तेरी मर्जी। क्योंकि प्रेम का अर्थ ही यह है कि वह आपको अपनी मर्जी पर पूरी तरह छोड़ दे। प्रेम का अर्थ ही यह है कि वह अपनी मर्जी आपके ऊपर न थोपे। परमात्मा ने कहा, जैसी तेरी मर्जी।
लेकिन उसी दिन से बेल बड़ी बेचैन हो गई। क्योंकि भीतर तो प्राणों की ऊर्जा बढ़ना चाहती थी। भीतर तो रस चल रहा था। जमीन से रस अपशोषित किया जा रहा था। सूरज से किरणें पीयी जा रही थीं। हवाओं से आक्सीजन लिया जा रहा था। पानी की धार भीतर बह रही थी। यह सब जारी था। और बेल ने कहा, मैं बढूंगी नहीं।
समझ सकते हैं, मुसीबत शुरू हो गई। भीतर से बढ़ने का धक्का प्राणों में, और बेल अपने को बाहर से रोके। भीतर तो सुगंध जमीन से इकट्ठी होने लगी और फूल खिलने को मचलने लगे, और बेल ने इनकार किया कि फूल मैं खिलने न दूंगी।
जिस बेल में बड़ी बढ़ती होती थी और जो आकाश की तरफ उठती थी, वह जमीन की तरफ झुक गई। उसमें गांठें पड़ गईं। जो शक्ति बीज बन सकती थी, वह गांठ बन गई। और जिससे फूल पैदा होते, उससे बेल सिर्फ बेचैन, परेशान हो गई। रात की नींद खो गई, सुबह का आनंद खो गया। पक्षी अब भी गीत गाते, तो बेल को बुरे मालूम पड़ते। क्योंकि पक्षियों के गीत वसंत की याद दिलाते, जब फूल खिलते थे। और जब सूरज निकलता, तो बेल बेचैन होती, उसे याद आती उन दिनों की, जब बेल बढ़ती थी। और जब आकाश में बादल घूमते, तो बेल कष्ट पाती, क्योंकि इन बादलों से उस सब की याद जुड़ी थी, जब इनसे बरसा होती थी और बेल तृप्त होती थी।
अब बेल बिलकुल पागल हो गई। एक दिन घबड़ाकर उसने परमात्मा से कहा कि मैं बिलकुल पागल हुई जा रही हूं। परमात्मा ने कहा, जैसी तेरी मर्जी। मैंने तुझे कभी पागल होने को नहीं कहा। तू अपने ही हाथ से और तू अपने ही आंतरिक स्वभाव से लड़ रही है। क्योंकि परमात्मा से लड़ना, अपने ही स्वभाव से लड़ना है।
जब भी कोई आदमी परमात्मा के खिलाफ खड़ा होता है, तो किसी गहरे अर्थों में अपने खिलाफ खड़ा हो जाता है। वह उन्हीं शाखाओं को काटने लगता है, जो उसके प्राण हैं। और जब भी कोई व्यक्ति परमात्मा के विपरीत पीठ करता है, तो वह अपने से ही अजनबी हो जाता है। क्योंकि वह अपने ही तरफ पीठ कर रहा है।
परमात्मा ने कहा कि तू अपने हाथ से मुसीबत में पड़ गई है। ये जो गांठें तुझे दर्द दे रही हैं, ये तेरे भीतर बीज बन सकती थीं। और ये जो पत्ते कुम्हलाकर जमीन की तरफ झुक गए हैं, ये आकाश में खिले हुए फूल बन सकते थे। और आज पक्षियों के गीत कष्ट देते हैं, और सुबह की सूरज की किरणें भी प्राणों में भालों की तरह छिद जाती हैं। और आकाश में बादल उठते हैं, पहले भी उठते थे, तब तू नाचती थी मोरों के साथ; लेकिन अब तू नाचती नहीं, तू अपने को सम्हालकर खड़ी रहती है। तू अपने ही खिलाफ हो गई है! यह अपने से विरोध छोड़। क्योंकि परमात्मा से विरोध अपने से ही विरोध है।
हजारों हजार मनुष्यों को संग्राम में जीतने वाले से भी एक अपने आपको जीतने वाला कहीं उत्तम संग्राम-विजेता होता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक राह से गुजरता था और पानी भरने को कुएं पर झुका। भूल-चूक हो गई और कुएं में गिर गया। बड़ी देर तक हाथ. पैर मारे, बड़ी देर तक चिल्लाया। और तब राह से कोई ग्रामीण, कोई बुद्ध बिलकुल गंवार। झांककर उसने नीचे देखा। उसने कहा, अच्छा! अरे! तो तुम! तो मैं तुम्हें अभी निकाले देता हूं। लेकिन नसरुद्दीन ने कहा कि तुम्हारा बोलना बिलकुल असंस्कृत है। मैं तू करके अजनबियों से बात की जाती है? तो उस आदमी ने कहा, रुको। मैं महीने, पंद्रह दिन में वापस लौटूंगा सुसंस्कृत होकर! नसरुद्दीन ने कहा कि मैं रुक सकता हूं महीने, पंद्रह दिन। लेकिन जिस आदमी को शब्दों का भी ठीक-ठीक बोध नहीं, बोलचाल की भाषा भी ठीक नहीं आती, उसके हाथ से निकाला जाना पसंद नहीं कर सकता हूं।
शब्द से घिरे हुए लोग, संसार में नसरुद्दीन जैसा कुएं में पड़ा है, ऐसे पड जाते हैं।
चरित्र का पता जो आप के लिए कुछ नहीं कर सकते उनके प्रति आपके व्यवहार से चलता है ।
एक आदमी था, बहुत अद्भुत आदमी था -- लारेंस। वह बहुत दिन तक अरब में आकर रहा। अरब की क्रांति में उसने भाग लिया और धीरे-धीरे अरब लोगों के साथ उसका इतना प्रेम हुआ कि वह करीब-करीब अरबी हो गया।
फिर अपने कुछ अरब मित्रों को लेकर वह पेरिस गया दिखाने। पेरिस में एक बड़ा मेला भरा हुआ था तो उसने कहा कि चलो तुम्हें पेरिस दिखा लाऊं।
एक बड़े होटल में ठहराया। जाकर पेरिस घुमाया-एफिल टावर दिखाया, म्युजियम दिखाया, सब बड़ी-बड़ी चीजें दिखाईं।
लेकिन अरबों को किसी चीज में रस न था। उनको रस एक अजीब चीज में था, जिसकी आप सोच ही नहीं सकते।
लारेंस उनको मेले दिखाने ले गया। एग्जिबिशन दिखाई -- बड़ी-बड़ी चीजें थीं। वे कहते कि जल्दी वापस चलो और जल्दी से जाकर बाथरूम में घुस जाते। इसने कहा, मामला क्या है ?
सिनेमा में ले जाएं तो वे बीच में कहें कि जल्दी वापस चलो और जाकर सबके सब, जो आठ-दस साथी थे, सब अपने-अपने बाथरूम के अंदर हो जाते। उसने सोचा कि मामला बहुत गंभीर लगता है।
पता चला कि मामला यह था -- उनके लिए सबसे चमत्कार की चीज थी -- टोंटी नल की!
रेगिस्तान में रहने वाले लोग थे, उनके लिए इतना बड़ा चमत्कार था यह कि टोंटी खोलो और पानी बाहर! उनके लिए तो बस बाथरूम ही इतना बड़ा चमत्कार था–क्योंकि उनके देश में पानी की बड़ी तकलीफ थी और उनकी समझ में नहीं आता था कि यह क्या होता है औऱ यह होता कैसे है?
वे तो बार-बार दिन में बीस दफा अंदर बाथरूम में जाकर टोंटी खोल कर देखते कि फिर पानी गिर रहा है।
जिस दिन जाने का वक्त आया, सब वापस लौटने को थे। कार बाहर आ गई। सामान रखा गया, सब अरब एकदम नदारद हो गए।
तो उसने खोजवाया कि वे कहां गए? मैनेजर से पूछा कि सब साथी कहां गए? अभी तो यहां थे, पता नहीं कहीं बाहर तो नहीं निकल गए? होटल के आस-पास दिखवाया, कहीं भटक न जाएं, भाषा नहीं जानते! लेकिन वे कहीं न मिले! फिर उसे ख्याल आया कि कहीं वे बाथरूम में न चले गए हों, जाने का वक्त है।
वह गया। अंदर जाकर देखा तो वे सब अपने-अपने बाथरूम में नल की टोंटी निकालने की कोशिश कर रहे थे। उसने पूछाः यह तुम क्या कर रहे हो पागलों?
उन्होंने कहा -- इस टोंटी को हम घर ले जाना चाहते हैं। ये बड़ी अदभुत हैं। बस खोलो और पानी निकलता है।
उसने कहा कि पागलों, टोंटी ले जाने से कुछ भी न होगा, क्योंकि टोंटी के पीछे बड़ा जाल है, बड़ा रिजर्वायर है पानी का। उधर से यहां तक आई हुई नालियां पड़ी हैं, उनसे पानी आ रहा है। टोंटी से कोई मतलब नहीं है।
और वे बेचारे यही समझते थे कि इतनी सी टोंटी, इसको खोल कर ले चलें घर, अरब में मजा आ जाएगा! जो भी देखेगा, वही चमत्कृत होगा। खोली टोंटी और पानी निकल आएगा ।
हिटलर -- मुझे यह समझ में नही आता की मनुष्य प्रकृति की तरह ही क्रूर क्यों नहीं होता ।
मुल्ला नसरुद्दीन भारत आया। जब उसने कश्मीर में प्रवेश किया, तो उसे बड़ी भूख लगी थी और बड़ी प्यास लगी थी। और पहाड़ी रास्ता था और उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था, कोई आदमी नहीं मिल रहा था। और फिर उसे एक वृक्ष के नीचे एक गांव के बाहर एक आदमी फल बेचता हुआ दिखाई पड़ा। लाल सुर्ख फल थे; नसरुद्दीन ने कभी देखे नहीं थे। उसके मुल्क में होते भी नहीं थे।
उसने एक रुपया निकालकर उस आदमी को दिया कि कुछ फल मुझे दे दो। मैं बहुत प्यासा और भूखा हूं। उस आदमी ने पूरी ही टोकरी उसे उठाकर दे दी। नसरुद्दीन तो बहुत आनंदित हुआ। सोचा भी नहीं था कि एक रुपए में इतने फल मिल जाएंगे।
वह आदमी तो फल देकर चला गया। नसरुद्दीन उसकी जगह बैठ गया और एक फल उसने मुंह में रखा, तो आख से आंसू झरने लगे। वह लाल मिर्च थी। आग लगने लगी मुंह में, लेकिन चबाए चला गया। गटके चला गया! भीतर पेट तक आग की लपटें फैलने लगीं।
और तब एक आदमी पास से निकला। उसने नसरुद्दीन की आख से बहते हुए आंसू और लाल आंखें और कंपता हुआ शरीर देखा। उसने पूछा कि तू यह पागल क्या कर रहा है! यह मिर्च है। खाना मत। रुक। अन्यथा मौत हो जाएगी। नसरुद्दीन ने कहा कि मिर्च खा कौन रहा है? अब तो मैं अपने पैसे खा रहा हूं। मिर्च का खाना तो पहली मिर्च पर ही समाप्त हो गया। लेकिन पैसे खर्च किए हैं।
हममें से भी बहुत लोगों की आंखों में जो आंसू हैं, वे पैसे खाने की वजह से हैं। सब जला जा रहा है बाहर-भीतर, लेकिन पैसे तो खाने ही पड़ेंगे! आदमी की जिंदगी में इतनी जो पीड़ा और परेशानी और कठिनाई है......। जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनके पास पैसे न होने से कठिनाई है, लेकिन वह कठिनाई बहुत बड़ी नहीं है। असली कठिनाई खोजनी हो, तो उन आदमियों को देखो जो पैसे खा रहे हैं! उनकी कठिनाई का कोई हिसाब नहीं है; उनकी कठिनाई का कोई अंत नहीं है।
मेरे ज्ञान ने मुझे सभी चीज़ों से मुक्ति दिलवाई जिसमें स्वयं ज्ञान भी शामिल है ।
विक्टोरिया के महल के नीचे एक आदमी तीस साल तक खड़ा रहा पहरे पर। फिर वह रिटायर हो गया। अवकाश प्राप्त हो गया, तो उसके बेटे को वही नौकरी मिल गई। वह भी बीस साल तक वहां खड़ा रहा। और तब खोजबीन हुई कि इस आदमी को यहां खड़ा किसलिए किया गया है? क्योंकि कुछ काम तो इसके पास है नहीं। तब पता चला कि पचास साल पहले जब इसका बाप नौकर था, तो सीढ़ियों पर पेंट किया गया था। और कोई आदमी सीढ़ियों को न छूये इसलिए इसके बाप को खड़ा किया गया था। वह पेंट तो कभी का सूख चुका। वह तो दो चार दिन में सूख गया, लेकिन वह आदमी खड़ा ही रहा। क्योंकि आज्ञा कभी दी नहीं गई कि यहां से हटे। तीस साल उसने नौकरी पूरी की। बीस साल उसके बेटे ने भी नौकरी की। वह तो जल्दी हुई कि पकड़ गया। नहीं तो सदियों तक कोई न कोई आदमी वहां खड़ा ही रहता। अब उस बेटे को भी पता नहीं था कि मैं किसलिए खड़ा हूं। वह अपनी तनख्वाह ले लेता था हर महीने जा कर और हर महीने सुबह वक्त पर आकर खड़ा हो जाता, सांझ विदा हो जाता। यह तो इतिहासज्ञों को खोजबीन करनी पड़ी कि यह आदमी ऐसा पहली दफा खड़ा क्यों किया गया था? तब पता चला कि कभी पेंट किया गया था सीढ़ी-दरवाजों पर, और कोई आदमी छू कर कपड़े खराब न कर ले, तो एक आदमी खड़ा किया था कि लोगों को सावधान कर दे।
मेरे एक मित्र हैं, वे एक शोध के सिलसिले में तिब्बत गये। ब्राह्मण हैं, तो नियम से ब्रह्म-मुहूर्त में उठना और स्नान करना, पूजा-पाठ करना, फिर भोजन करना। तिब्बत में बड़ी मुश्किल में पड़ गये। क्योंकि जानलेवा ठंड! तिब्बत के धर्मग्रंथों में तो लिखा है कि हर आदमी को कम से कम साल में एक बार स्नान जरूर करना चाहिए। बस, इतना ही नियम है, क्योंकि ठंड ऐसी है। और प्रयोजन भी नहीं है। क्योंकि न पसीना है, न धूल है, न गंदगी है, तो रोज सुबह शरीर को अकारण कष्ट देना। और खतरनाक है सुबह शरीर को खोलना पांच बजे। कि उससे तो हृदय की धड़कन ही बंद हो जाये, खून जम जाये, बर्फीली सर्दी है।
वे तीन दिन रुके और भाग खड़े हुए। क्योंकि उन्हें रोज तो...! वह शोध कार्य पूरा नहीं हो सका। क्योंकि यह कैसे हो सकता है? जो सदा से चला आया, कि सुबह पांच बजे स्नान करके पूजा-पाठ करके, फिर ही कुछ भोजन किया जा सकता है। वह तो पूरा करना ही पड़ेगा। वे बड़े विद्वान हैं। लेकिन जब वे लौट आये और मैंने पूछा कैसे इतनी जल्दी लौट आये? क्योंकि कम से कम एक वर्ष उन्हें वहां रहना था। तो मैंने कहा कि मुझे तुम्हारी बुद्धि पर भी शक होता है। तुम बुद्धिमान तो हो ही नहीं, तुममें बुद्धि नाम मात्र को भी है, इस पर भी मुझे शक होता है।
लेकिन ऐसा कुछ उन्होंने ही किया ऐसा नहीं है। मैं बोधगया में था, तो तिब्बती लामा मुझसे मिलने आते। उनके पास बैठना असंभव है, क्योंकि ऐसी भयंकर दुर्गंध आती है। वे भी वही नियम पालन कर रहे हैं कि साल में एक दफा स्नान करना काफी है--हिंदुस्तान में! न वे कपड़े बदलते हैं। और कपड़े भी वे कई पहने रहते हैं एक के ऊपर एक। वे भी अपने नियम से चल रहे हैं।
अगर तुम अपने जीवन के नियमों की खोज करो, तो तुम उनमें से नब्बे प्रतिशत ऐसे ही नियम पाओगे जो कभी के व्यर्थ हो गये हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन रोज शराब घर जाता, लेकिन पीने के पहले एक क्रियाकांड करता था। आखिर शराब घर के मालिक का कुतूहल न रुका। रोज अपने खीसे से एक मेंढक निकाल कर अपने टेबल पर रख लेता। शराब पीता, पीता रहता, फिर मेंढक को उठाकर खीसे में रखकर चला जाता। ऐसा रोज होता। स्वभावतः शराबगृह के मालिक ने एक दिन कहा कि नसरुद्दीन, इसका राज हमें भी समझाओ। यह मेंढक का रोज निकालना, फिर खीसे में रखना, इसका मतलब क्या है? नसरुद्दीन ने कहा, मेंढक को निकाल कर रखता हूं फिर मैं पीना शुरू करता हूं। जब एक मेंढक की जगह मुझे दो दिखाई पड़ने लगते हैं, तब मैं समझ लेता हूं अब कुछ करना जरूरी है। तो उस मालिक ने पूछा फिर क्या करते हो? उसने कहा, फिर दोनों को उठा कर खीसे में रख लेता हूं और घर चला जाता हूं।
जितनी तुम्हारी मूर्च्छा होगी उतनी चीजें जैसी हैं वैसी दिखाई नहीं पड़ेंगी।
नानक एक गांव में ठहरे। गांव बड़े भले लोगों का था, बड़े साधुओं का था, बड़े संत—सज्जन पुरुष थे। नानक के शब्द—शब्द को उन्होंने सुना, चरणों का पानी धोकर पीया। नानक को परमात्मा की तरह पूजा। और जब नानक उस गांव से विदा होने लगे, तो वे सब मीलों तक रोते हुए उनके पीछे आए और उन्होंने कहा, हमें कुछ आशीर्वाद दें। तो नानक ने कहा, एक ही मेरा आशीर्वाद है कि तुम उजड़ जाओ।
सदमा लगा। नानक के शिष्य तो बहुत हैरान हुए, कि यह क्या बात कही! इतना भला गांव। लेकिन अब बात हो गई और एकदम पूछना भी ठीक न लगा। सोचेंगे, विचार करेंगे, फिर पूछ लेंगे। फिर दूसरे गांव में पड़ाव हुआ। वह दुष्टों का गांव था। सब उपद्रवी जमीन के वहा इकट्ठे थे। उन्होंने न केवल अपमान किया, तिरस्कार किया, पत्थर फेंके, गालियां दीं, मार—पीट की नौबत खड़ी हो गई; रात रुकने भी न दिया।
जब गांव से नानक चलने लगे, तो वे तो आशीर्वाद मांगने वाले थे ही नहीं। शोरगुल मचाते, गालियां बकते नानक के पीछे गांव के बाहर तक आए थे। गांव के बाहर आकर नानक ने अपनी तरफ से आशीर्वाद दिया कि सदा यहीं आबाद रहो।
तब शिष्यों को मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा कि अब तो पूछना ही पड़ेगा। यह तो हद हो गई। कुछ भूल हो गई आपसे। पिछले गांव में भले लोग थे, उनसे कहा, बरबाद हो जाओ! उजड़ जाओ! और इन गुंडे—बदमाशों को कहा कि सदा आबाद रहो, खुश रहो, सदा बसे रहो!
नानक ने कहा कि भला आदमी उजड़ जाए, तो बंट जाता है। वह जहां भी जाएगा, भलेपन को ले जाएगा। वह फैल जाए सारी दुनिया पर। और ये बुरे आदमी, ये इसी गांव में रहें, कहीं न जाएं। क्योंकि ये जहां जाएंगे, बुराई ले जाएंगे।
जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से वर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को और न सुख को ही प्राप्त होता है।
एक दिन ढब्बू जी ने देखा कि चंदूलाल अपनी प्यारी-प्यारी कोमल-कोमल श्वेत शुभ्र बिल्ली को साबुन लगा-लगा कर, अच्छा मल-मल कर स्नान करवा रहे हैं। और बिल्ली भाग निकलने की पूरी चेष्टा कर रही है। मगर चंदूलाल हैं कि लगे हैं पूरे प्राणपण से। जब ढब्बूजी ने देखा यह सब, तो वे चंदूलाल से बोले कि चंदूलाल, क्या आज मार ही डालोगे इसे? अरे, ये ठंड के दिन और तुम इसे नहला रहे हो!
चंदूलाल बोले कि तुम चिंता मत करो, आज इसे अच्छी तरह नहलाना है। और यह पानी कोई साधारण नहीं, गंगा का है, सो इसके जन्म-जन्म के पाप भी कट जाएंगे। अरे, गंगाजल में तो मुर्दे जिंदा हो जाते हैं, पापी पुण्यात्मा हो जाते हैं! और यह बिल्ली है, न मालूम कितने चूहे खा चुकी है, मैं इसका भविष्य सुधार रहा हूं। खुद भी चंदूलाल गंगा की यात्रा करते हैं, स्नान कर आते हैं..और पानी भी ले आते हैं दूसरों की सहायता के लिए।
आखिर चंदूलाल नहीं माने। और एक घंटे बाद जब ढब्बू जी लौट कर आए तो देखा कि बिल्ली मर चुकी है और उसके पास चंदूलाल बैठे हैं। बिल्ली को मरा देख ढब्बू जी बोले कि देखो, आखिर मार डाला न तुमने इसे! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि इतनी ठंड में इसे मत नहलाओ, मगर तुम ठहरे पंडित, तुम मानो कैसे!
चंदूलाल ने कहा: स्नान करने से यह मरी नहीं, स्नान करने से यह मर सकती नहीं। ..यह गंगाजल है, शुद्ध गंगाजल! वह तो स्नान कराने के बाद जब मैंने इसे निचोड़ा, तब मरी।
जीवेषणा
कथा :
सिग्मंड फ्रायड ने अपने जीवन के प्राथमिक वर्षो में जो पहली महत्वपूर्ण खोज की थी, वह थी लिबिडो की खोज। लिबिडो का अर्थ होता है: जीवेषणा। कि मनुष्य के भीतर जीवन की महत आकांक्षा है। मनुष्य जीना चाहता है। हर कीमत पर जीना चाहता है। और यह सच है। भिखमंगा भी जी रहा है। सड़क पर घिसट रहा है, रहने को जगह नहीं है, खाने को भोजन नहीं है, नालियों में पड़ा है, अपंग है, कोढ़ी है, मगर फिर भी जीना चाहता है। दो-दो कौड़ी मांगता फिरता है, घसिटता फिरता है, लेकिन जीना चाहता है। जीने की जरूर गहन आकांक्षा होगी।
इजिप्त की एक पुरानी कथा है।
एक विराट आश्रम था। उस आश्रम की यह व्यवस्था थी कि जब भी कोई संन्यासी मर जाए, तो आश्रम के नीचे ही भूमिगर्भ में छिपा हुआ एक बड़ा कब्रिस्तान था, पत्थर हटाया जाता था, कब्रिस्तान का मुंह खुल जाता था, मर गए संन्यासी की लाश को उस गड्ढे में गिरा दिया जाता था, पत्थर फिर बंद कर दिया जाता था। वह नीचे एक लंबी गुफा थी, जिसमें सदियों से न मालूम कितने संन्यासी मरे और उनकी लाशें उतार दी गई थीं। यह संयोग की बात थी कि इस बार जो संन्यासी मरा वह वस्तुतः मरा नहीं था सिर्फ बेहोश था और जल्दबाजी में उस को गड्ढे में उतार दिया। गड्ढे में उतरा, कोई घड़ी-दो घड़ी बाद उसे होश आ गया। होश आया तो बहुत घबड़ाया। चिल्लाया। मगर कौन सुनता! पत्थर बंद हो चुका था। कोई संभावना न थी कि कोई सुन ले। चिल्ला-चिल्ला कर थक गया ।
तुम भी होते उसकी जगह तो क्या करते फिर? तुम शायद सोचोगे, आत्महत्या कर लेते, पत्थरों से सिर मार कर फोड़ लेते, मर जाते। नहीं, उस आदमी ने जीवन की व्यवस्था की। वह वहां भी जीने लगा। बड़ा अजीब, बड़ा गर्हित जीवन रहा होगा। जो लाशें सड़ी हुई पड़ी थीं, उनका ही मांस खाने लगा जो कीड़े मकोड़े पैदा हो गये थे लाशों में उन कीड़े मकोडों को पकड़-पकड़ कर खाने लगा पानी की बड़ी असुविधा थी। आश्रम की नालियों में से जो पानी रिस-रिस कर नीचे कब्रिस्तान में पहुंच जाता था, उसी को दीवालों से चाट-चाट कर पीने लगा। और रोज प्रार्थना करता था, एक ही प्रार्थना, कि कोई मर जाए संन्यासी, तो फिर से चट्टान उठे तो मैं बाहर निकल आऊं।
बारह वर्ष वह आदमी जिंदा रहा। उस की प्रार्थना बारह वर्ष बाद सुनी गई। बारह वर्ष बाद कोई मरा, फिर क्रबिस्तान का द्वार खुला..और उस आदमी ने आवाज दी। जो लाश को उतारने आए थे, उनकी भी छाती कंप गईः कौन बुला रहा है अंदर से? भूत-प्रेत? क्या मामला है? लेकिन रस्सी डालनी पड़ी, वह आदमी निकाला गया। उसके बाल इतने बड़े हो गए थे, उसकी दाढ़ी इतनी बड़ी हो गई थी बारह वर्षो में कि जमीन छूती थी। और सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह थी, बारह वर्ष अंधेरे में रहने के कारण वह अंधा भी हो गया था, लेकिन साथ में एक पोटली लिए हुए आया। तो उन्होंने पूछा, यह पोटली क्या है? तो उसने खोल कर दिखा दी। इजिप्त में रिवाज था कि जब कोई मर जाए तो उसके साथ परलोक की यात्रा के लिए..टिकट इत्यादि के लिए कम से कम..कुछ पैसे रख दो, कुछ कपड़े रख दो..रास्ते में बदलने का कम से कम एकाध जोड़ा। सो उसने मुर्दो के कपड़े और पैसे इकट्ठे कर लिए थे, इस आशा में कि जब बाहर निकलूंगा तो सब लेता जाऊंगा। वह पोटली में सारे कपड़े और पैसे बांध कर ले आया था।
ऐसी जीवेषणा है आदमी की!
लेकिन मरने के पहले फ्रायड जीवन के अंतिम वर्षो में दूसरी खोज भी किया। क्योंकि उसने देखा कि अगर जीवेषणा ही अकेली एकमात्र वृत्ति है, तो कुछ लोग आत्महत्या कैसे करते हैं? फिर आत्महत्या को कैसे समझाओगे? फिर आत्महत्या का क्या कारण होगा? और कभी-कभी तो बड़ी अच्छी हालतों में रहने वाले लोग आत्महत्या करते हैं..अक्सर तो अच्छी हालतों में जो लोग हैं, वही आत्महत्या करते हैं। गरीब देशों में कम लोग आत्महत्या करते हैं, अमीर देशों में ज्यादा। जितना समृद्ध वर्ग होता है, उतनी आत्महत्या बढ़ जाती है। तो जिनके पास सब है, ऐसे लोग आत्महत्या क्यों कर लेते हैं? फ्रायड पुनः खोज में लगा जीवन के अंतिम वर्षो में। उसने दूसरी वृत्ति भी खोजी और सिद्धांत पूरा हुआ। पहली विधि को लिबिडो कहा था..जीवेषणा..और दूसरे सिद्धांत को थानाटोस कहा..मृत्यु की आकांक्षा। और सिद्धांत तब पूरा हुआ। ये सिक्के के दोनों पहलू हैं।
हज़रते ईसा से पूछा किसी ने जो था हुशियार
इस हस्ती में चीज़ क्या है सबसे ज़्यादा दुश्वार
बोले ईसा सबसे दुश्वार ग़ुस्सा ख़ुदा का है प्यारे
कि जहन्नुम भी लरज़ता है उनके डर के मारे
पूछा कि खुदा के इस क़हर से जां कैसे बचायें ?
वो बोले अपने ग़ुस्से से इसी दम नजात पायें
-- मौलाना रूमी, 13वीं शती
तन्मयता
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात ऐसा ही हारमोनियम बजा रहा था । आखिर पड़ोसी के बरदाश्त के बाहर हो गया तो पड़ोसी ने खिड़की खोली और उसने कहा कि नसरुद्दीन, अब बंद करो नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगा । मुल्ला ने कहा, भाई, अब व्यर्थ है बकवास करना । घंटा भर हुआ मुझे बंद किए । पागल तुम हो चुके!
एक युवा संन्यासी ने अपने गुरु को पूछा, यह संसार है क्या? गुरु ने कहा, तू ऐसा कर, तू आज गांव में जा, फला-फलां द्वार पर भिक्षा मांग लेना । लौट कर जब आएगा तब संसार क्या है, बता दूंगा । युवक तो भागा । ऐसी शुभ घड़ी आ गई कि गुरु ने कहा कि संसार क्या है, बता दूंगा । तू भिक्षा मांग ला ।
उसने जाकर द्वार पर दस्तक दी । एक सुंदर युवती ने द्वार खोला । अति सुंदर युवती थी । युवक ने ऐसी सुंदर स्त्री कभी देखी न थी । उसका मन मोह गया । वह यह तो भूल ही गया कि गुरु के लिए भिक्षा मांगने आया था, गुरु भूखे बैठे होंगे । उसने तो युवती से विवाह का आग्रह कर लिया । उन दिनों ब्राह्मण किसी से विवाह का आग्रह करे तो कोई मना कर नहीं सकता था । युवती ने कहा, मेरे पिता आते होंगे । वे खेत पर काम करने गए हैं । हो सकेगा । घर में आओ, विश्राम करो ।
वह घर में आ गया । वह विश्राम करने लगा । पिता आ गए, विवाह हो गया । वह भिक्षा मांगने आया था, यह तो बात ही भूल गया । उसके बच्चे हो गए, तीन बच्चे हो गए । फिर गांव में बाढ़ आई, नदी पूर चढ़ी । सारा गांव डूबने लगा । वह भी अपने तीन बच्चों को और अपनी पत्नी को लेकर भागने की कोशिश कर रहा है । और नदी विकराल है । और नदी किसी को छोड़ेगी नहीं । सब डूब गए हैं, वह किसी तरह बचने की कोशिश कर रहा है । एक बच्चे को बचाने की कोशिश में दो बच्चे बह गए । इधर हाथ छूटा, दो बह गए । पत्नी को बचाने में बच्चा भी बह गया । फिर अपने को बचाने की ही पड़ी तो पत्नी भी बह गई । किसी तरह खुद बच गया, किसी तरह लग गया किनारे, लेकिन इस बुरी तरह थक गया कि गिर पड़ा । बेहोश हो गया ।
जब आंख खुली तो गुरु सामने खड़े थे । गुरु ने कहा, देखा संसार क्या होता है? ओर तब उसे याद आया कि वर्षों हो गए, तब मैं भीक्षा मांगने निकला था । गुरु ने कहा, कुछ भी नहीं हुआ है सिर्फ तेरी झपकी लग गई थी । जरा आंख खोल कर देख । वह भिक्षा मांगने भी नहीं गया था । सिर्फ झपकी लग गई थी । वह गुरु के सामने ही बैठा था । कुछ घटना घटी ही न थी । वह जो सुंदर युवती थी, सपना थी । वे जो बच्चे हुए, सपने थे । वह जो बाढ़ आई, सपना थी । वे जो वर्ष पर वर्ष बीते, सब सपना था । वह अभी गुरु के सामने ही बैठा था । झपकी खा गया था । दोपहर रही होगी, झपकी आ गई होगी ।
साधारण आदमी व्यक्ति को भी वस्तु बना देता है। और झेन की धारणा है कि संन्यासी को वस्तु को भी व्यक्ति बना लेना चाहिए, जैसे उसका भी व्यक्तित्व है।
अमेरिका में लिंकन का एक आदमी ने पार्ट किया एक साल तक। क्योंकि लिंकन की कोई शताब्दी मनाई जाती थी और उसकी शक्ल लिंकन से मिलती—जुलती थी, तो अमेरिका के सभी बड़े नगरों में उसे लिंकन का पार्ट करने के लिए जाना पड़ा। एक सालभर तक वह लिंकन की तरह चलता, लिंकन की छड़ी हाथ में रखता, लिंकन के कपड़े पहनता, लिंकन की तरह हकलाता, लिंकन की तरह बोलता, सब लिंकन की तरह करता।
सालभर लंबा वक्त था। वह आदमी भूल गया। सालभर के बाद जब वह घर आया, तो वह सीधा न चल सके, जैसा वह पहले चलता रहा था। कोशिश करे, तो थोड़ी देर सीधा चले, नहीं तो फिर वह लिंकन की तरह चलने लगे। बोले भी, तो लिंकन की तरह बोले। जहां लिंकन अटकता था, वहीं वह भी अटके।
घर के लोगों ने कहा कि अब छोड़ो भी, अब बात खतम हो गई! लेकिन एक साल का नशा उस पर ऐसा छा गया—जगह—जगह सम्मान, स्वागत, सत्कार—कि उस आदमी ने कहा, क्या छोड़ो! मैं अब्राहम लिंकन हूं। तुम किस भ्रांति में पड़े हो? लोगों ने समझा, वह मजाक कर रहा है थोड़े दिन। लेकिन वह मजाक नहीं कर रहा था। वह अब्राहम लिंकन हो ही गया था।
उसे बहुत समझाया—बुझाया। मित्रों ने कहा कि तुम पागल तो नहीं हो गए हो? लेकिन उसे पक्का भरोसा आ गया था। सालभर लंबा वक्त था। उसे जितना लोगों ने समझाया, उसकी मजबूती बढ़ती चली गई। वह लोगों से कहने लगा, तुम पागल तो नहीं हो गए हो? मैं लिंकन हूं। जितना ही लोगों ने कहा कि तुम नहीं हो, उतनी ही उसकी जिद्द बढ़ती चली गई। फिर तो यहां तक हालत पहुंच गई कि मनोवैज्ञानिकों के पास ले जाकर इलाज करवाना पड़ा। तो मनोवैज्ञानिक ने कहा कि यह आदमी कितना ही बोल रहा हो, लेकिन भीतर तो यह गहरे में तो जानता ही होगा कि मैं लिंकन नहीं हूं। तो अमेरिका में उन्होंने lie detector एक छोटी—सी मशीन बनाई है, अदालत में काम लाते हैं झूठ पकड़ने के लिए। उस मशीन पर आदमी को खड़ा कर देते हैं। उससे पूछते हैं। जो बात वह सच बोलता है, तो उसके हृदय की धड़कन अलग होती है। आप भी जब सच बोलते हैं, तो धड़कन अलग होती है। जब आप झूठ बोलते हैं, तो एक धक्का लगता है। हृदय की धड़कन में फर्क हो जाता है।
किसी ने आपसे पूछा, आपकी घड़ी में कितने बजे हैं? आप कहते हैं, आठ। किसी ने पूछा कि सामने जो किताब रखी है, इसका क्या नाम है? आपने पढ़कर बता दिया। आपके हृदय में कहीं कोई झटका नहीं लगता। फिर किसी ने पूछा, आपने चोरी की? तो भीतर से तो आप कहते हैं कि की; और ऊपर से आप कहते हैं, नहीं की। तो rythm, भीतर की लय टूट जाती है। वह लय का टूटना मशीन पकड़ लेती है कि आपके हृदय की गति में फर्क पड़ गया। ग्राफ टूट जाता है।
तो उस आदमी को, अब्राहम लिंकन को, बने हुए अब्राहम लिंकन को खड़ा किया गया लाइ डिटेक्टर पर। वह भी परेशान हो गया था। जो देखे, वही समझाए कि अरे, क्यों पागल हो रहे हो? होश में आओ। यह नाटक था। वह भी घबड़ा गया। उसने सोचा कि इससे कैसे छुटकारा हो!
मनोवैज्ञानिक ने बहुत-\से सवाल पूछे। फिर पूछने के बाद उसने पूछा कि क्या तुम अब्राहम लिंकन हो? तो उसने सोचा, यह झंझट खतम ही करो, कह दो कि नहीं हूं। तो उसने कहा कि नहीं, मैं अब्राहम लिंकन नहीं हूं। मनोवैज्ञानिक बड़ा खुश हुआ। लेकिन नीचे मशीन ने ग्राफ बताया कि यह आदमी झूठ बोल रहा है। इतना गहरा उसको खयाल चला गया है कि मैं अब्राहम लिंकन हूं। वह खुद ही मना कर रहा है। लेकिन उसका हृदय जानता है कि मैं हूं।
अब क्या करिएगा! एक साल का नाटक अगर ऐसी स्थिति बना देता हो, तो आपने शरीर के साथ बहुत जन्मों में नाटक किया है। कितनी—कितनी लंबी यात्रा है शरीर के साथ एक होने की। मन के साथ कितने समय से आप अपने को एक बनाए हुए हैं। इसलिए कठिनाई है। इसलिए तोड्ने में अड़चन मालूम पड़ती है। इतना लंबा हो गया है यह सब कि आप जन्मों-जन्मों से लिंकन का पार्ट कर रहे हैं। और अब कोई आपसे पूछता है, तो आप कितना ही कहें, मैं शरीर नहीं हूं लेकिन भीतर !
शास्त्र प्रतिध्वनि है, किसी को अनुभव हुए सत्य की।
प्रतिभा
कथा :
मैं विश्वविद्यालय में शिक्षक था; एक परीक्षा चल रही थी, मैं निरीक्षक था । तो मैंने देखा, सब तो लिख रहे हैं, एक विद्यार्थी बैठा है, बड़ा बेचैन है, कुछ नहीं लिख रहा । तो मैं उसके पास गया, मैं चिंतित हो गया । मैंने पूछा कि क्या बात है, कुछ समझ में नहीं आता? उत्तर पकड़ में नहीं आ रहे? प्रश्न समझ में नहीं आ रहे? क्या अड़चन है? तू पसीना-पसीना हुआ जा रहा है, कुछ लिख भी नहीं रहा । उसने कहा, अब आपसे क्या छिपाना! उत्तर तो मैं रखे हूं मगर किस खीसे में किस प्रश्न का उत्तर है यह भूल गया । दोनों खीसे में रखे हैं उत्तर । प्रतिभा न हो तो खीसे में उत्तर हों तो भी क्या काम आता है!
अगर तीस विद्यार्थियों की कक्षा में शिक्षक बोलता है तो तुम सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली किसे कहते हो? जो सुन कर ही समझ गया । जो सुन कर नहीं समझा, फिर उसको तख्ते पर लिख-लिख कर, कर-कर के समझाना पड़ता है । जो उससे भी नहीं समझा उसको घर पर ट्यूटर भी लगाना पड़ता है । जो उससे भी नहीं समझा वह परीक्षा में उत्तर चोरी करके ले जाता है । मगर प्रतिभा न हो तो कुछ भी काम नहीं आता । सब गड़बड़ हो जाता है ।
दुख को बहुत सहेज कर रखना पड़ा हमें
सुख तो किसी कपूर की टिकिया सा उड़ गया
अब सबसे पूछता हूं बताओ तो कौन था
वह बदनसीब शख्स जो मेरी जगह जीया!
मुर्दे
कथा :
जीसस ने एक सुबह झील पर एक मछुए के कंधे पर हाथ रखा और कहा कि कब तक मछलियां पकड़ता रहेगा? अरे, कुछ और भी पकड़ना है कि मछलियां ही पकड़ते रहना है? मेरे पास आ, मेरे साथ चल । मैं तुझे कुछ बड़े फंदे फेंकना सिखा दूं जिनमें मछलिया तो क्या, आदमी फंस जाए । आदमी तो क्या, परमात्मा फंस जाए ।
मछुआ भोला-भाला आदमी था; न पढ़ा न लिखा । उसने जीसस की आंखों में देखा, भरोसा आ गया । पढ़ा-लिखा होता तो संदेह उठता । सोच-विचार का आदमी होता तो कहता विचारूंगा, यह क्या बात है, कंधे से हाथ हटाओ! ऐसे कहीं कोई किसी के पीछे चलता? लेकिन जीसस की आंखों में झांका सरलता से; भरोसा आ गया । ये आंखें झूठ बोल नहीं सकती । यह चेहरा प्रमाण था । जाल फेंक दिया वहीं । जीसस के पीछे हो लिया ।
वे गांव के बाहर भी न निकले थे कि एक आदमी भागा हुआ आया और उसने मछुए से कहा, पागल! कहां जा रहा है ? तेरे पिता की मृत्यु हो गई । पिता बीमार थे, कभी भी जा सकते थे । उस आदमी ने जीसस से कहा, क्षमा करें, मैं तो आता था लेकिन भाग्य ने अड़चन डाल दी । मुझे थोड़े दिन की आज्ञा दे दें -- एक सप्ताह, आधा सप्ताह । पिता का अंतिम संस्कार कर आऊं और आ जाऊं । जीसस ने कहा, छोड़ । गांव में काफी मुर्दे हैं, वे मुर्दे को जला लेंगे । तू मेरे पीछे आ ।
'मैनें पाप किया है' इससे यहाँ संतप्त होता है और दुर्गति को प्राप्त होकर संतप्त होता है, पापी दोनों जगह संतप्त होता है ।
एक चर्च में एक पादरी बोल रहा है। एक आदमी जोर से घुर्राटे लेने लगा, सो गया है। पादरी उसके पास आया और कहा कि भाई जान, थोड़ा धीरे से घुर्राटे लें, क्योंकि दूसरे लोगों की नींद न टूट जाए! पूरा चर्च ही सो रहा है।
मंदिरों में लोग सो रहे हैं। धर्मसभाओं में लोग सो रहे हैं। ऊबे हुए हैं; जम्हाइयां ले रहे हैं। कैसे, फिर कैसे होगा?
अथक! बिना ऊबे श्रम करना पड़ेगा योग का।
महावीर जब पैर फूंककर रखते हैं, तो किसी भय के कारण नहीं कि चींटी मर न जाये। बल्कि किसी गहरे सम्मान के कारण।
मुल्ला नसरुद्दीन के गांव कोई मित्र मिलने आया । मुल्ला उसे नगर का दर्शन कराने ले गया। विश्वविद्यालय की भव्य इमारत को देखकर मित्र ने मुल्ला से कहा -- नसरुद्दीन, क्या विश्वविद्यालय है? सुंदर है, भव्य है! हौ - मुल्ला ने उत्तर दिया। फिर गांधी मैदान आया, विशाल मैदान! मित्र ने कहा: यही है गांधी मैदान? मुल्ला ने कहा हौ! हर बात के उत्तर में हौ शब्द सुनकर मित्र ने पूछा: यह हौ क्या होता है? हौ -- मुल्ला ने कहा -- यहां का आंचलिक शब्द है। बिना पढ़े-लिखे लोग हां को हौ बोलते हैं। मित्र ने कहा -- लेकिन नसरुद्दीन, तुम तो पढ़े-लिखे हो । उसने कहा -- हौ
पढ़े-लिखे होने से क्या होगा? शास्त्र ऊपर ही ऊपर रह जाते हैं; अंतर को नहीं छू पाते।
गुरु
कथा :
सूफी फकीर हुआ हसन; मरते वक्त किसी ने पूछा कि तेरे गुरु कौन थे? उसने कहा, मत पूछो । वह बात मत छेड़ो । तुम समझ न पाओगे । अब मेरे पास ज्यादा समय भी नहीं है । मैं मरने के करीब हूं ज्यादा समझा भी न सकूंगा । उत्सुक हो गए लोग । उन्होंने कहा, अब जा ही रहे हो, यह उलझन मत छोड़ जाओ, वरना हम सदा पछताएंगे । जरा से में कह दो । अभी तो कुछ सांसें बाकी हैं ।
उसने कहा, इतना ही समझो कि एक नदी के किनारे बैठा था और एक कुत्ता आया । बड़ा प्यासा था, हांफ रहा था । नदी में झांक कर देखा, वहां उसे दूसरा कुत्ता दिखाई पड़ा । घबड़ा गया । भौंका, तो दूसरा कुत्ता भौंका । लेकिन प्यास बड़ी थी । प्यास ऐसी थी कि भय के बावजूद भी उसे नदी में कूदना ही पड़ा । वह हिम्मत करके.. .कई बार रुका, कंपा, और फिर कूद ही गया । कूदते ही नदी में जो कुत्ता दिखाई पड़ता था वह विलीन हो गया । वह तो था ही नहीं, वह तो केवल उसकी ही छाया थी ।
नदी के किनारे बैठे देख रहा था, मैंने उसे नमस्कार किया । वह मेरा पहला गुरु था । फिर तो बहुत गुरु हुए । उस दिन मैंने जान लिया कि जीवन में जहां-जहां भय है, अपनी ही छाया है । और प्यास ऐसी होनी चाहिए कि भय के बावजूद उतर जाओ ।
ज्ञानियों में आपस में विरोध सिर्फ ऊपर-ऊपर से दिखता है
एक नगर में दो हलवाइयों में झगड़ा हो गया । आमने-सामने दुकान थी । हलवाई तो हलवाई! लड्डू और बर्फी एक-दूसरे पर फेंकने लगे ।
लूट मच गई । लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई । लोग लड्डू और बर्फियां बीच में पकड़ने लगे । और लोग बोले कि ऐसी लड़ाई तो रोज हो । मजा आ गया ।
दो हलवाई लड़ेंगे, तुम लड्डू-बर्फी पकड़ लेना । तुम इसकी फिकर छोड़ना कि हलवाई लड़ रहे हैं । वे शायद इसीलिए लड़ रहे हैं कि तुम्हें थोड़े लड्डू और बर्फियाँ मिल जाएं ।
तुम हो कौन निर्णय करने वाले! शिष्य और निर्णय करे कि कौन सदगुरु है, कौन सदगुरु नहीं है? बात ही मूढ़ता की है ।
यह तो अंधा निर्णय करने लगा कि किसको दिखाई पड़ता और किसको नहीं दिखाई पड़ता । अंधा कैसे निर्णय करेगा, किसको दिखाई पड़ता है, किसको नहीं दिखाई पड़ता? अंधे को इतना ही जानना चाहिए कि मुझे दिखाई नहीं पड़ता । अब मुझे जिससे दोस्ती बन गई हो, उसका हाथ पकड़ कर चल जाना चाहिए और अपने अनुभव से देख लेना चाहिए कि इस आदमी के साथ चलने से गड्ढों में गिरना तो नहीं होता । इस आदमी के साथ चलने से रास्ते पर टकराहट तो नहीं होती? इस आदमी के साथ चलने से हाथ-पैर तो नहीं टूटते?
ऐसा अनुभव में आने लगे तो समझना कि इस आदमी के पास आंखें होंगी, यह तुम्हारा अनुमान ही होगा । लेकिन यह अनुमान धीरे-धीरे तुम्हारे अनुभव से प्रमाणित होता जाएगा । और ऐसे साथ-साथ चल कर एक दिन तुम्हारी अपनी आंख भी खुल जाएगी ।
अश्रद्धावान आदेश देता है अस्तित्व को; श्रद्धावान अपना हाथ पकड़ा देता अस्तित्व को
रिंझाई जब सबसे पहले अपने गुरु के पास गया, तो उसका गुरु बहुत ही कठोर आदमी था, ऐसी लोगों में खबर थी। लोगों की खबरें आमतौर से गलत होती हैं। न उन्हें इसका पता है कि संत सदय होते हैं या कठोर होते हैं। उन्हें संत का ही पता नहीं है। रिंझाई जब जाने लगा, तो गांव के लोगों ने कहा कि मत जाना उस बूढ़े के पास, वह आदमी कठोर है। रिंझाई ने कहा, लोगों ने मुझसे कहा फलां संत बहुत दयावान है, मैं उनके पास भी जाकर देखा। मैंने पाया, उनमें कोई दया नहीं। अब तुम कहते हो, यह आदमी कठोर है; इसके पास भी जाकर देखूं। बहुत संभावना यही है कि तुम भी गलत होओगे। तुम सदा ही गलत होते हो। उस आदमी ने हंस कर कहा, लौट कर तुम खुद ही कहोगे। यह तुम पहले आदमी नहीं हो, जिसको मैंने यह खबर दी है। और जिनको भी मैंने खबर दी, उन्होंने लौट कर कहा कि ठीक कहते थे, अच्छा होता हम न गए होते।
रिंझाई गया। उसका गुरु द्वार पर बैठा था हाथ में एक डंडा लिए। झेन फकीर एक डंडा अपने हाथ में रखते रहे हैं सदा से। पता नहीं, शंकर ने अपने संन्यासियों को डंडा क्यों दिया? कम से कम हिंदुस्तान को तो पता नहीं है। शायद उसका ठीक-ठीक डंडे का कभी उपयोग शंकर के संन्यासी ने किया नहीं। क्योंकि हिंदुस्तान में संन्यासी के बाबत हमारी धारणा सदय होने की है। वह दंडीधारी संन्यासी तो कहलाता है, लेकिन उस डंडे का उपयोग सिर्फ एक फकीरों के वर्ग ने किया है जापान में, झेनफकीरों ने। गुरु डंडा लिए बैठा था। रिंझाई उसके सामने जाकर झुकता था।
गुरु ने कहा, रुक! मैं सभी को पैर नहीं छूने देता। पहले मेरी बात का जवाब दे दे, फिर तू पैर छू सकता है।
रिंझाई ने कहा, क्या है सवाल?
उसके गुरु ने कहा, सवाल पीछे बताऊंगा, पहले तुझे यह बता दूं कि तू हां में जवाब दे, तो भी यह डंडा तेरे सिर पर पड़ेगा; तू न में जवाब दे, तो भी यह डंडा तेरे सिर पर पड़ेगा। असल में, तू कोई भी जवाब दे, डंडा तो पड़ेगा ही। तू पहले सोच ले।
रिंझाई ने कहा, तो मैं पहले पैर पड़ लूं और आप डंडा मार लें; जवाब-सवाल पीछे हो जाएगा। जब डंडा पड़ना ही है, तो इसकी चिंता को निपटा देना उचित है। इसे पहले निपटा लें, पीछे हम बात कर लेंगे। उसने सिर चरणों में रखा ।
उसके गुरु ने डंडा नीचे रख दिया और उसने कहा, तो शायद तुझे मारने की जरूरत मुझे नहीं पड़ेगी।
रिंझाई ने पूछा, बात क्या है?
उसके गुरु ने कहा, जो भी मेरे पास दया की भीख मांगते आते हैं, मेरा अस्तित्व उनके प्रति कठोर हो जाता है। मैं नहीं होता, बस ऐसा हो जाता है। उस तरफ भीख, और इधर मैं कठोर हो जाता हूं! उस तरफ मालकियत, इधर मैं सदय हो जाता हूं! लेकिन असली बात यह है, उस बूढ़े फकीर ने कहा कि मैं दोनों के बाहर हो गया हूं। अपनी तरफ से कुछ भी नहीं होता। जो हो जाता है, उसके लिए मैं राजी हो जाता हूं। अगर मेरा हाथ डंडा उठा लेता है, तो मैं डंडा मारता हूं। अभी हाथ ने डंडा छोड़ दिया,तो मैंने डंडा छोड़ दिया है।
इस जीवन में सभी कुछ नियम से नहीं घटता है; नहीं तो जीवन दो कौड़ी का हो जाएगा। इस जीवन में कुछ है जो नियम छोड़ कर भी घटता है। सच तो यह है, इस जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, वह नियम छोड़ कर घटता है। जो भी गैर-महत्वपूर्ण है, वह नियम से घटता है। इस जीवन में जो भी गहरी अनुभूतियां हैं, वे किसी नियम से नहीं आतीं--अकारण, अनायास, अनायाचित द्वार पर दस्तक दे देती हैं।
बुद्ध का जन्म हुआ, तो हिमालय से एक महा तपस्वी उतर कर बुद्ध के घर आया। बुद्ध के पिता उसे स्वागत से भीतर ले गए। उन्होंने लाकर एक छोटे से बच्चे को, नवजात बच्चे को उसके चरणों में रखा। वह महा तपस्वी कोई सौ वर्ष का बूढ़ा था। उसकी आंख से झर-झर आंसू गिरने लगे।
बुद्ध के पिता बहुत घबड़ा गए। उन्होंने कहा, आप हैं महा तपस्वी, आप रोते हैं मेरे बेटे को देख कर। कोई अपशकुन! यह आप क्या कर रहे हैं? यह खुशी का क्षण है, आप आनंदित हों और आशीर्वाद दें। आपको कुछ दुर्घटना दिखाई पड़ती है?
उस बूढ़े तपस्वी ने कहा, नहीं, इस बच्चे के लिए नहीं; दुर्घटना मेरे लिए है। क्योंकि यह बच्चा बुद्ध होने को पैदा हुआ है। लेकिन मैं तब इसके संसर्ग को मौजूद न रहूंगा। यह मैं रो रहा हूं अपने लिए कि यह बच्चा बुद्ध होने को पैदा हुआ है और इसके चरणों में एक क्षण बैठ कर भी मैं वह पा लेता, जो मैंने अनंत जन्मों में चल कर नहीं पाया। लेकिन वह क्षण मुझे नहीं मिलेगा। मेरे मरने की घड़ी तो करीब आ गई। और इसके बुद्धत्व के फूल खिलने में अभी तो वक्त लग जाएगा, कोई चालीस साल लग जाएंगे। जब इसका फूल खिलेगा, तब मैं मौजूद नहीं रहूंगा। इसलिए मैं रो रहा हूं।
लेकिन यह एक आदमी है, जो बुद्ध को देख कर रोता है कि चालीस साल बाद मौजूद नहीं रहेगा। ऐसे लोग थे कि बुद्ध उस गांव में जाएं, तो वे गांव छोड़ कर भाग जाएं। गांव छोड़ कर भाग जाएं! गौतमी नाम की एक महिला की कथा है कि वह बुद्ध जिस गांव में जाएं, वहां से भाग जाती थी। क्योंकि वह कहती थी, इस आदमी के संसर्ग में न मालूम कितने लोग बिगड़ गए। जो भी इसकी बातों में पड़ता है, झंझट में आ जाता है। न मालूम कितने लोग संन्यासी हो गए, न मालूम कितने लोग भिक्षु हो गए, न मालूम कितने लोग आंख बंद करके ध्यान में डूब गए। धन की फिक्र छोड़ दी, पद की फिक्र छोड़ दी। लोग न मालूम पागल हो जाते हैं! यह आदमी हिप्नोटिक है, यह आदमी सम्मोहक है। इससे बचना चाहिए।
लेकिन एक दिन बड़ी भूल हो गई। बुद्ध अचानक एक गांव में पहुंच गए। और कृशा गौतमी रास्ते से गुजर रही थी। उसे कुछ पता न था। बुद्ध का मिलना हो गया। भागती थी वर्षों से। बुद्ध के ही उम्र की थी और बुद्ध के ही गांव की थी। भागती थी वर्षों से; जहां बुद्ध जाएं, वहां छाया से बचती थी। लेकिन इतना जो भागता है, उसका रस तो है ही। इतना जो बचता है, उसका भय तो है ही। और बुद्ध की प्रतिभा का खयाल भी तो है ही। वह अचानक रास्ते पर बुद्ध का आगमन हो गया। वह निकलती थी, उसने खड़े होकर देखा। एक क्षण रुकी और उसने कहा, क्या तुम कोई दूसरे बुद्ध आ गए? क्योंकि तुम मुझे खींचे लिए ले रहे हो! बुद्ध ने कहा, मैं वही हूं, जिससे तू भागती फिरती है। आज अचानक मिलना हो गया। वह उसी क्षण चरणों में गिर पड़ी, उसी क्षण उसने दीक्षा ली। बुद्ध ने कहा, लेकिन तू इतने दिन से भागती थी! उसने कहा, भाग-भाग कर भी मन में एक खयाल तो बना ही था कि एक बार इस आदमी को देख लूं। शायद इसीलिए भागती थी कि डरती थी कि देखा कि मैं गई। और आज आकस्मिक हो गया है।
बुद्ध को भी भागने वाले लोग हैं। महावीर को सुनते कान में आवाज न पड़ जाए, तो कान में अंगुलियां डाल कर गुजरने वाले लोग हैं। जीसस को मार डालो, ताकि जीसस की बात लोगों तक न पहुंचे, ऐसे लोग हैं।
संसर्ग की श्रेष्ठता पुण्यात्माओं के साथ रहने में है। और पुण्यात्मा कौन है? किसे कहें पुण्यात्मा?कौन है पुण्यात्मा? क्या हमारे पास कोई कसौटी है कि हम नाप सकें कि कौन पुण्यात्मा है और कौन पापी है? नहीं, बस एक ही कसौटी है: जिसके पास, जिसके संसर्ग में आप अपने को खुला छोड़ कर बैठ पाएं और जिसके पास आनंद और जिसके पास शांति और जिसके पास प्रकाश की प्रतीति होती हो, वही पुण्यात्मा है!
सीढ़ी पर बैठ जाओ तो तुम्हारी भूल है। सीढ़ी का कोई कसूर नहीं।
एक सूफी फकीर हुआ बहाउद्दीन। उसकी बड़ी ख्याति थी। उसके शब्द बड़े गहरे थे। उसका व्यक्तित्व बड़ा अनूठा था। दूर-दूर से लोग यात्रा करके उसके पास आते। लेकिन सभी ठीक कारणों से आते थे, ऐसा नहीं। क्योंकि कारण तो तुम्हारे भीतर होता है।
एक आदमी उसके पास इसीलिए आ गया था और शिष्य हो गया था, कि कैसे मैं भी इतना प्रभावशाली हो जाऊं, जैसा बहाउद्दीन है। बहाउद्दीन ने उसे देखते ही से कहा कि तुम गलत कारण से सही जगह आ गए हो। उस आदमी न कहा, क्या मतलब? बहाउद्दीन ने कहा कि तुम अपने को बदलने नहीं आए हो, अपने को सजाने आ गए हो। और तुम मेरे पास ध्यान करने नहीं आए हो, तुम्हारी उत्सुकता अभी भी पर में है। तुम दूसरों को प्रभावित करना चाहते हो। और यही तो ध्यान के विरोध में है। तुम सोच-समझकर आओ। उस आदमी को बात तो सही लगी कि वह आया तो इसीलिए है कि दूसरे उससे कैसे प्रभावित हों, कैसे वह भी एक गुरु हो जाए।
गुरु होने की आकांक्षा कामवासना है, बहाउद्दीन ने कहा। क्योंकि तुम्हारी नजर इस पर है कि दूसरे मुझे कैसे मानें, कैसे पूजें? ध्यानी इस बात की चिंता करता है कि कैसे मैं स्वयं हो जाऊं। कोई पूजेगा, नहीं पूजेगा, यह उसके विचार में भी नहीं आता। कोई पूजेगा या पत्थर मारेगा, ये दूसरे समझें। ध्यानी अपने में डूबता है।
उसको बात तो लगी। अब उसको बहाउद्दीन के सामने आना भी मुश्किल हो गया। तो वह छिपकर आने लगा यह देखने कि जरूर कोई तरकीब होगी इस आदमी की जिसकी वजह से इतने लोग प्रभावित हैं।
एक दिन बहाउद्दीन ने अपने खीसे से एक हीरा निकाला और कहा कि यह हीरा ऐसा ही मूल्यवान है जैसा सत्य मूल्यवान होता है, और यह हीरा बड़ा चमत्कारी है। उस आदमी ने सोचा कि मिल गयी बात, यह इसी हीरे की वजह से यह आदमी इतना प्रभावी है। रात छिप गया वह। जब सब सो गए, वह अंदर गया। खीसे में से बहाउद्दीन के हीरा निकालकर भाग खड़ा हुआ।
लेकिन हीरा लेकर उसने बड़ी कोशिश की, कोई प्रभावित न हुआ। हाथ में रखकर बैठा रहे, कोई पूजा न करे। वह बड़ा परेशान हुआ कि मामला क्या है? हीरा तो वही है।
ऐसे वर्ष बीत गए। एक दिन बहाउद्दीन उसके द्वार पर आया और उसने कहा कि अब बहुत हो गया, अब वह हीरा वापस लौटा। उस आदमी ने कहा, लेकिन मैं इसी हीरे के बल पर बड़ा प्रभाव पैदा करने की कोशिश कर रहा हूं, कोई प्रभावित ही नहीं होता। मामला क्या है?
बहाउद्दीन ने कहा, जब तक तू हीरा न हो जाए, तब तक तेरे हाथ में आया हीरा भी पत्थर हो जाएगा। और तू अगर हीरा हो गया, तो तेरे हाथ में आया हुआ पत्थर भी हीरा हो जाता है। तू कब तक बाहर की चीजों में परेशान रहेगा? इस हीरे में कुछ भी नहीं रखा है। तू इसे अब वापस लौटा दे। उस दिन जानता था कि तू छिपा है, इसलिए हीरा निकाला था, ताकि तुझसे छुटकारा हो। जब तू रात निकालकर ले गया जेब से, तब भी मैं जागा था। क्योंकि योगी कहीं सोता है? इसीलिए तो मुझे पता है कि हीरा कहां है। और तूने अब काफी दिन प्रयोग कर लिया, अब लौटा दे। और अब तो समझ, बाहर से नजर को भीतर हटा। हीरा मांगने नहीं आया हूं, तुझे बुलाने आया हूं कि अब तुझमें अकल आ जानी चाहिए।
अगर कभी तुम्हें किसी सदगुरु की भनक पड़ जाए तो सौभाग्य समझना! अहोभाग्य समझना!!
एक सूफी कथा है। गजनी के महमूद के दरबार में एक आदमी आया। वह अपने बेटे को साथ लाया था। उसने बेटे को बड़े ढंग से बड़ा किया था, बड़े संस्कारों में ढाला था, बड़ा परिष्कृत किया था। सदा से उसकी यही आकांक्षा थी कि उसका एक बेटा कम से कम महमूद के दरबार में हिस्सा हो जाए। उसने उसके लिए ही उसे बड़ी मेहनत से तैयार किया था। उसे पक्का भरोसा था, क्योंकि उसने सभी परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कर ली थीं और जहां-जहां, जहां-जहां उसे पढ़ने-लिखने भेजा था, गुरुओं ने बड़े प्रमाण-पत्र दिए थे और उसकी बड़ी प्रशंसा की थी। वह बड़ा बुद्धिमान युवक था। सुंदर था, दरबार के योग्य था। आशा थी बाप को कि कभी न कभी वह बड़ा वजीर भी हो जाएगा।
महमूद से आकर उसने कहा कि मेरे पांच बेटों में यह सबसे ज्यादा सुंदर, सबसे ज्यादा स्वस्थ, सबसे ज्यादा बुद्धिमान है। यह आपके दरबार में शोभा पा सकता है, आप इसे एक मौका दें। और जो भी जाना जा सकता है, इसने जान लिया। महमूद ने सिर भी ऊपर न उठाया। उसने कहा, एक साल बाद लाओ।
सोचा बाप ने, शायद अभी कुछ कमी है, क्योंकि सम्राट ने चेहरा भी उठाकर न देखा। उसे एक साल के लिए और अध्ययन के लिए भेज दिया। सालभर के बाद जब वह और अध्ययन करके लौट आया--अब अध्ययन को भी कुछ न बचा, वह आखिरी डिग्री ले आया--फिर लेकर पहुंचा। महमूद ने उसकी तरफ देखा; लेकिन कहा, ठीक है, लेकिन इसकी क्या विशेषता है? किसलिए तुम चाहते हो कि यह दरबार में रहे? तो उसके बाप ने कहा, इसे मैंने सूफियों के सत्संग में बड़ा किया है। सूफी-मत के संबंध में जितना बड़ा अब यह जानकार है, दूसरा खोजना मुश्किल है। यह आपका सूफी सलाहकार होगा। रहस्य-धर्म का कोई न कोई जानने वाला दरबार में होना चाहिए, नहीं तो दरबार की शोभा नहीं है। सब हैं आपके दरबार में--बड़े कवि हैं, बड़े पंडित हैं, बड़े भाषाविद हैं, कोई सूफी नहीं। महमूद ने कहा, ठीक है। एक साल बाद लाओ।
एक साल बाद फिर लेकर उपस्थित हुआ। अब तो बाप भी थोड़ा डरने लगा कि यह तो हर बार एक साल...!
महमूद ने कहा कि ऐसा करो, तुम्हारी निष्ठा है, तुम सतत पीछे लगे हो, इसलिए मुझे भी लगता है कुछ करना जरूरी है। तुम हार नहीं गए हो, हताश नहीं हो गए हो! अब ऐसा करो--इस युवक को उसने कहा--कि तुम जाओ और किसी सूफी को अपना गुरु मान लो, और किसी सूफी को खोज लो जो तुम्हें अपना शिष्य मानने को तैयार हो। तुम्हारा गुरु मान लेना काफी नहीं है। कोई गुरु तुम्हें शिष्य भी मानने को तैयार हो। फिर सालभर बाद आ जाना।
वह युवक गया। एक गुरु के चरणों में बैठा। सालभर बाद बाप उसको लेने आया। वह गुरु के चरणों में बैठा था, उसने बाप की तरफ देखा ही नहीं। बाप ने उसे हिलाया कि नासमझ, क्या कर रहा है? उठ, साल बीत गया, फिर दरबार चलना है। उसने बाप को कोई जवाब भी न दिया। वह अपने गुरु के पैर दबा रहा था, वह पैर ही दबाता रहा। बाप ने कहा कि व्यर्थ गया; काम से गया, निकम्मा सिद्ध हो गया। इसीलिए हमने तुझे पहले किसी सूफी फकीर के पास नहीं भेजा था। हम सूफी पंडितों के पास भेजते रहे; यह महमूद ने कहां की झंझट बता दी कि कोई गुरु खोज, और फिर कोई गुरु जो तुझे शिष्य की तरह स्वीकार करे! तू सुनता क्यों नहीं? क्या तू पागल हो गया है, कि बहरा हो गया है? मगर वह युवक चुप ही रहा। साल बीत गया, बाप दुखी होकर घर लौट गया। महमूद ने पुछवाया कि लड़का आया क्यों नहीं? बाप ने कहा कि व्यर्थ हो गया, निकम्मा साबित हो गया। क्षमा करें, मेरी भूल थी, मैंने पत्थर को हीरा समझा।
लेकिन महमूद ने अपने वजीरों से कहा कि तैयारी की जाए, उस आश्रम में जाना पड़ेगा। महमूद खुद आया। द्वार पर खड़ा हुआ। गुरु लड़के को हाथ से पकड़कर दरवाजे पर लाया और महमूद से उसने कहा कि अब तुम्हारे यह योग्य है; क्योंकि पहले तो यह तुम्हारे पास जाता था, अब तुम इसके पास आए। बाप की दृष्टि में यह निकम्मा हो गया, किसी काम न रहा! अब यह परमात्मा की दुनिया में काम का हो गया है। अगर यह राजी हो, और तुम ले जा सको, तो तुम्हारा दरबार शोभायमान होगा। यह तुम्हारे दरबार की ज्योति हो जाएगा। कहते हैं, महमूद ने बहुत हाथ-पैर जोड़े, पर उस युवक ने कहा कि अब इन चरणों को छोड़कर कहीं जाना नहीं है। दरबार मिल गया!
ये जिंदगी गुजार रहा हूं तेरे बगैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूं मैं
सूफी फकीर हुआ, हसन। जब वह मरने लगा, किसी ने उससे पूछा, तुम्हारा गुरु कौन था? उसने कहा, फेहरिस्त बड़ी लंबी है, सांसें बहुत कम बची हैं। अगर मैं अपने सारे गुरुओं की बात करूं तो मुझे उतनी ही बड़ी जिंदगी चाहिए पड़ेगी, जितनी बड़ी जिंदगी मैं जीया। क्योंकि क्षण-क्षण उनसे मुलाकात हुई, जगह-जगह वे मिले।
फिर भी उस आदमी ने जिद की कि तुम पहले सदगुरु का बता दो सिर्फ, जिससे तुम्हें पहली झलक मिली। उसने कहा, मैं एक गांव से गुजरता था। और तब मैं बड़ा अकड़ा हुआ था, क्योंकि मैंने फलसफा पढ़ा था, दर्शनशास्त्र पढ़ा था, शास्त्र कंठस्थ कर लिए थे, तर्क सीख लिए थे; बड़ी अकड़ थी। एक छोटे से बच्चे को मैंने मस्जिद की तरफ जाते देखा; एक हाथ में दीया लिए हुए था। मैंने उससे पूछा कि सुन, दीया तूने ही जलाया? उसने कहा, मैंने ही जलाया। तो मैंने उससे पूछा, तू मुझे यह बता-एक दार्शनिक प्रश्न पूछा-कि जब तूने ही दीया जलाया तो तुझे पता होगा कि ज्योति कहां से आई? कहीं से तो आई होगी। और जब तूने ही जलाया तो जरूर देखी होगी; ज्योति आई कहाँ से? उस बच्चे ने कहा, ठहरो। उसने एक फूंक मारकर दीया बुझा दिया और उसने कहा, ज्योति गई। तुम बता सकते हो, कहाँ गई? तुम्हारे सामने ही गई है।
हसन ने कहा, मेरी अकड़ टूट गई। झुककर मैंने उसके पैर छू लिए। एक छोटे बच्चे ने मेरा सारा दर्शनशास्त्र कूड़ा-करकट में डाल दिया; आंख खोल दी। एक छोटे बच्चे को भी मैं सिखाने की चेष्टा कर रहा था, कुछ जो मुझे ही पता नहीं था। मेरे गुरु होने की चेष्टा उसने तोड़ दी और गुरु हो गया।
व्यक्ति जब भी अपने निज धर्म को भूलता है, तब ऐसी हालत हो जाती है, जैसे गुलाब का फूल कमल होना चाहे।
एक सूफी फकीर एक गांव में गया। लोगों ने उसका अपमान करने के लिए जूतों की माला बनाकर पहना दी। वह बड़ा प्रसन्न हुआ, उसने माला को बड़े आनंद से सम्हाल लिया। लोग बड़े हैरान हुए। क्योंकि वे आशा कर रहे थे कि वह नाराज होगा, गाली देगा, झगड़ा खड़ा करेगा। इच्छा ही यह थी कि झगड़ा खड़ा हो जाए। बड़े झुक—झुककर उसने नमस्कार किया; और जैसे कि फूलों की माला हो, गुलाब पहनाए हों। आखिर एक आदमी से न रहा गया। उसने पूछा, मामला क्या है? तुम्हें होश है? यह जूतों की माला है। उसने कहा, माला है, यही क्या कम है? जूतों की फिक्र तुम करो, हम माला की फिक्र कर रहे हैं। और चमारों का गांव है, करोगे भी क्या तुम? फूल तुम लाओगे कहां से? यह कोई मालियों की बस्ती तो है नहीं; चमारों की बस्ती है। मगर धन्यभाग कि तुम माला तो लाए! इसे सम्हालकर रखूंगा। फूलों की तो बहुत मालाएं देखीं, यह अनूठी है। तुमने अपने संबंध में सब कुछ कह दिया।
गली-गली को जल बहि आयो, सुरसरी जाय समायो ।
संगति के परताप महातम, नाम गंगोदक पायो ॥
जीसस से किसी ने कहा कि तुम्हारे पास हम देखते हैं जुआरी भी आकर बैठ जाते हैं, शराबी भी आकर बैठ जाते हैं, गांव की वेश्या भी तुम्हारे पास आकर बैठ जाती है, तुम इन्हें भगाते नहीं, हटाते नहीं?
जीसस ने कहा यह तो ऐसा ही होगा कि प्रकाश अंधेरे से डर जाए। यह तो ऐसे ही होगा कि चिकित्सक बीमारों को अपने पास न आने दे। मैं हूं किसके लिए? मैं इन्हीं के लिए हूं! जिसने शराब पी है उसे परमात्मा पिलाऊंगा। और जो वेश्या है, जिसने अभी तन को ही जाना है और तन को ही पहचाना है और तन के पार जिसके जीवन में अभी प्रेम का कोई अनुभव नहीं है — उसे तन के पार का प्रेम अनुभव कराऊंगा। और जो जुआरी है, है तो हिम्मतवर, दांव तो लगाना जानता है— उसे मैं असली दांव लगाना सिखाऊंगा।
स्वाति बूंद बरसै फनि ऊपर, सोहि विषै होई जाई ।
ओहि बूंद कै मोती निपजै, संगति की अधिकाई ॥
विवेकानंद अमरीका गए, उसके पहले की घटना है। राजस्थान में एक राजा के घर मेहमान थे। राजा तो राजा! विवेकानंद की विदाई के लिए उसने बड़ा समारोह किया। वे अमरीका जाने की तैयारी में थे विश्व— धर्म—सम्मेलन में भाग लेने, तो राजा ने बड़ा समारोह किया। और राजा जैसे समारोह कर सकता था वैसा किया। उसने काशी की सबसे प्रसिद्ध वेश्या भी बुलवा ली। उसको यह खयाल भी न आया, खयाल आने का कहां सवाल! रात भर पीए और दिन भर सोए। उसे होश कहां कि विवेकानंद के स्वागत में वेश्या को बुलाना चाहिए या नहीं, यह गणित का खयाल ही नहीं बैठा। और अच्छा ही हुआ कि खयाल नहीं बैठा; बैठ जाता तो यह अपूर्व घटना घटने से रह जाती।
दिन आ गया उत्सव का, तब विवेकानंद को पता चला, सांझ जब उनको जाना था उत्सव में, तब पता चला कि काशी की बहुत प्रसिद्ध वेश्या नृत्य करेगी वहां!
विवेकानंद— पुराने ढब के संन्यासी। कलकत्ते में भी उनके संबंध में कहा जाता था कि जिस मोहल्ले में वेश्या रहती हों, उससे गुजरते नहीं थे वे। चाहे उनको चार मील का चक्कर लगाना पड़े, तो वे चार मील का चक्कर लगा कर घर आते, मगर उस रास्ते से नहीं गुजरते थे जहां कोई वेश्या रहती हो। तो वे कहीं जाने वाले थे उत्सव में! आखिरी वक्त जब पता उनको चला तो उन्होंने राजा के वजीर को कहा कि फिर मैं नहीं आ सकूंगा। लेकिन राजा तो फिर मैंने कहा न राजा ही! उसने कहा अब नहीं आते तो नहीं आएं, अब समारोह तो होगा ही! और फिर इतने दूर से वेश्या आई है, उसका गीत—गान, नृत्य तो होगा ही। चलने दो, उत्सव शुरू होने दो। मैं तो हूं ही।
लेकिन वेश्या को बहुत चोट लगी और उसने एक भजन गाया। भजन, जिसका अर्थ होता है कि पारस पत्थर को जरा भी भेद नहीं होता कि जिस लोहे को वह सोना बना रहा है वह पूजा—घर में रखा जाने वाला लोहा है या कसाई के घर पशुओं की हत्या जिससे की जाती है वह लोहा है। पारस तो दोनों को ही सोना बना देता है।
पास ही विवेकानंद का कमरा है। वे सब सुन रहे हैं। यह गीत जब उन्होंने सुना तब उन्हें बड़ी चोट पड़ी। लगा कि अभी मैं दमन से ही भरा हुआ हूं। अभी भी डर है मेरे भीतर। सच तो है, पारस को क्या फिकर? लोहा कहां से आया है, कसाई के घर से आया है कि पूजा—गृह से आया है, यह तो पारस पूछता ही नहीं। उसको तो जो लोहा छू ले वही सोना हो जाता है।
वह वेश्या रो रही है और गा रही है। विवेकानंद बीच में पहुंच गए और कहा : मुझे क्षमा करो, मुझसे भूल हो गई। मुझे बड़े—बड़े इतनी जो न समझा सके, वह तूने समझा दिया। तू मेरी गुरु है।
विवेकानंद ने बड़े आदर से स्मरण किया है इस घटना का कि उस घटना के बाद मेरे जीवन में क्रांति हो गई। मुझे जो भय था, स्त्रियों का जो डर था, वह गल गया और बह गया। मैंने कहा यह भी क्या बात है! बात तो ठीक है। इतने भय से, इतनी भीरुता से कहीं संन्यास का जन्म होगा?
संन्यास का अर्थ है : खुली हुई मुट्ठीवाला जीवन, जहां हम कुछ भी बांधना नहीं चाहते, जहां जीवन एक प्रवाह है और सतत नये की स्वीकृति और कल जो दिखाएगा उसके लिए भी परमात्मा को धन्यवाद का भाव।
जब ज़ेन मास्टर बनकेइ ने ध्यान करना सिखाने का कैंप लगाया तो पूरे जापान से कई बच्चे उनसे सीखने आये . कैंप के दौरान ही एक दिन किसी छात्र को चोरी करते हुए पकड़ लिया गया . बनकेइ को ये बात बताई गयी , बाकी छात्रों ने अनुरोध किया की चोरी की सजा के रूप में इस छात्र को कैंप से निकाल दिया जाए .
पर बनकेइ ने इस पर ध्यान नहीं दिया और उसे और बच्चों के साथ पढने दिया .
कुछ दिनों बाद फिर ऐसा ही हुआ , वही छात्र दुबारा चोरी करते हुए पकड़ा गया . एक बार फिर उसे बनकेइ के सामने ले जाया गया , पर सभी की उम्मीदों के विरूद्ध इस बार भी उन्होंने छात्र को कोई सजा नहीं सुनाई .
इस वजह से अन्य बच्चे क्रोधित हो उठे और सभी ने मिलकर बनकेइ को पत्र लिखा की यदि उस छात्र को नहीं निकाला जायेगा तो हम सब कैंप छोड़ कर चले जायेंगे .
बनकेइ ने पत्र पढ़ा और तुरंत ही सभी छात्रों को इकठ्ठा होने के लिए कहा . . 'आप सभी बुद्धिमान हैं .' बनकेइ ने बोलना शुरू किया , 'आप जानते हैं की क्या सही है और क्या गलत . यदि आप कहीं और पढने जाना चाहते हैं तो जा सकते हैं , पर ये बेचारा यह भी नहीं जानता की क्या सही है और क्या गलत . यदि इसे मैं नहीं पढ़ाऊंगा तो और कौन पढ़ायेगा ? आप सभी चले भी जाएं तो भी मैं इसे यहाँ पढ़ाऊंगा'
यह सुनकर चोरी करने वाला छात्र फूट -फूट कर रोने लगा . अब उसके अन्दर से चोरी करने की इच्छा हमेशा के लिए जा चुकी थी ।
महायज्ञ की जरूरत तुम्हारे भीतर है। और वहां किसी अग्नि में घी डालने से काम न चलेगा, वहां तो परमात्मा की अग्नि में तुम्हें स्वयं को ही डालना पड़ेगा।
झेन फकीर बाशो की कविता -- झील के ऊपर उड़ते हुए बगुलों की कतार! न तो झील उत्सुक है प्रतिबिंब बनाने को और न बगुले उत्सुक हैं अपना प्रतिबिंब देखने को, पर प्रतिबिंब बनता है। न तो बगुले उत्सुक हैं कि देखें झुककर नीचे कि झील में प्रतिबिंब बनता है या नहीं। न झील आतुर है कि बगुले उड़े और मैं प्रतिबिंब बनाऊं। पर प्रतिबिंब बनता है। न तो बगुलों के चित्त में कोई वासना है, न झील के चित्त में कोई वासना है। बस, निकटता से ही प्रतिबिंब बन जाता है।
गुरु और शिष्य की निकटता में ही, वह जो अत्यंत गोपनीय है, वह सवांदित हो जाता है, उसका लेन-देन हो जाता है। न गुरु देना चाहता है, न शिष्य लेना चाहता है। घटना घटती है।
जिस व्यक्ति ने सत्य को पा लिया है, सत्य उससे बहना चाहता है । उसकी आकांक्षा नहीं कि सत्य बहे । उससे सत्य वैसे ही बहता है, जैसे फूल से गंध बहती है, दीए से प्रकाश बहता है; नदियां सागर की तरफ बहती हैं । ऐसा ही स्वाभाविक है ।
बोधिधर्म सैकड़ों साल पहले भारत से बाहर, चीन गया । वह सदा दीवार की तरफ मुंह करके बैठता था । वह कहता था, जब ठीक आदमी आएगा, तभी मैं उसकी तरफ देखूंगा । हर एक की तरफ देखने से क्या फायदा! क्यों अपनी आंखें गंवाऊं? क्यों? क्या जरूरत देखने की? दीवार में क्या खराबी है?
वह कहता, अभी तो लोग ऐसे ही हैं, जैसे दीवार। कुछ है नहीं; सपाट है। दरवाजा तक नहीं है उनके भीतर, जिसमें से प्रवेश कर सको। प्रवेश का उपाय ही नहीं है जिनके भीतर।
फिर उसका पहला शिष्य आया, हुई-नेंग। उसने कहा -- बोधिधर्म, मुड़ता है इस तरफ कि नहीं ! गरदन काटकर रख दूंगा। बोधिधर्म एक क्षण को तो रुका। उतने में ही उस हुई-नेंग ने अपना एक हाथ काटकर उसके सामने रख दिया। और उसने कहा, मुड़! अन्यथा गरदन गिरेगी।
बोधिधर्म एकदम घूमा तेजी से। उसने कहा, आ गया भाई! तेरी मैं नौ सालों से प्रतीक्षा कर रहा था। कोई गरदन कांटने की जरूरत नहीं। क्योंकि मैं कोई हत्यारा नहीं हूं। लेकिन गरदन काटने की तैयारी काफी है। तैयारी चाहिए। तू कटने को तैयार है, तो तू मूल्य चुकाने को तैयार है। तो जो मेरे पास संपदा है , वह मैं तुझे देने को राजी हूं।
मुफ्त किसी को दे दो संपदा, वह व्यर्थ चली जाती है। उसका मूल्य ही नहीं हो पाता।
तपरहित मनुष्य के प्रति नहीं कहना, न भक्तिरहित के प्रति कहना ।
क्योंकि जो भक्ति ही न हो, तो गोपनीय बात नहीं कही जा सकती। अत्यंत निकटता चाहिए ।
हे योगी ! यदि तू परलोक चाहता है तो ख्याति, लाभ, पूजा और सत्कार आदि क्यों चाहता है ? क्या इनसे तुझे परलोक का सुख मिलेगा ?
वासना
कथा :
एक बड़े पागलखाने में एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए गया है। चिकित्सक ने पागलखाने के, उसे पागलों को दिखाया है। एक कोठरी में एक पागल बंद है, जो हाथ में एक तस्वीर लिए है। छाती से लगाता है; फिर देखता है;फिर आंसू टपकाता है। रोता है, चिल्लाता है। पूछा उस मनोवैज्ञानिक ने चिकित्सक को पागलखाने के कि क्या हो गया? क्या कारण है इसके पागलपन का? चिकित्सक ने कहा, हाथ में जो तस्वीर लिए है, वही कारण है। इस स्त्री को प्रेम करता था। यह इसे मिल नहीं पाई। इसलिए दुखी और पीड़ित है। दिन-रात छाती पीटता रहता है।
फिर वे आगे बढ़े और दूसरी कोठरी के सामने एक दूसरे आदमी को बाल नोचते, चेहरे को लहूलुहान करते देखा। पूछा मनोवैज्ञानिक ने, इस आदमी को क्या हुआ है? उस चिकित्सक ने कहा, इस आदमी को वह स्त्री मिल गई, जो उस आदमी को नहीं मिल पाई। यह उसकी वजह से पागल हो गया! एक पागल है इसलिए कि जो उसने चाहा था, वह नहीं मिला। एक पागल है इसलिए कि जो उसने चाहा, वह मिल गया है!
असफल होकर तो करती ही नहीं; सफल होकर भी वासना कहीं भी नहीं ठीक करती।
मुल्ला नसरुद्दीन एक व्याख्यान सुनने गया है । एक वैज्ञानिक बोल रहा है । वह मछलियों के संबंध में कुछ समझा रहा है । और वह कहता है कि मादा मछलियां अंडे रख देती हैं और फिर नर मछलियां उन अंडों के ऊपर से गुजरते हैं और उन अंडों को वीर्यकण दे देते हैं, और तब वह अंडा सजीव हो जाता है ।
नसरुद्दीन बड़ा बेचैन होता है । आखिर जब व्याख्यान खत्म हो जाता है, वह पहुंचता है वैज्ञानिक के पास और उससे कहता है, क्या आपका मतलब है कि मछलियां संभोग नहीं करतीं ?
उस वैज्ञानिक ने कहा, आप बिलकुल ठीक समझे । मादा अंडे दे देती है, पुरुष अंडों को आकर fertilize कर देता है । कोई संभोग नहीं होता ।
नसरुद्दीन थोड़ी देर चिंतित रहा और फिर उसके चेहरे पर चमक आ गयी! उसने कहा कि now I understand, why people call fishes -- poor fish--क्यों लोग मछली को गरीब मछली कहते हैं, मैं समझ गया । यही कारण है !
वह जो काम में डूबा हुआ है, उसके लिए सारा जीवन दीन-हीन है अगर कामवासना नहीं है ।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक दर्जी को कपड़े बनाने को दिये थे । बड़ी मुश्किल से सालों में पैसा इकट्ठा करके बड़ा बहुमूल्य कपड़ा खरीदा था । दर्जी ने कपड़े भी बना दिये, बड़ी देर लगायी, बड़े चक्कर कटवाए । आखिर एक दिन कपड़े बन कर तैयार हो गये । उत्सव का दिन कोई करीब आ रहा था और नसरुद्दीन बहुत खुश था । वह कपड़े लेने गया, लेकिन कपड़े पहन कर बड़ी मुश्किल में पड़ गया; बहुत उदास हो गया । उसने कहा, यह तुमने क्या किया? बरबाद कर दिया सारा कपड़ा । यह काँलर तो देखो कि मेरे सिर तक जा रही है ।
उस दर्जी ने कहा, इसमें काँलर का कसूर नहीं है, थोड़ा सिर को ऊंचा करो । उसने खींच कर नसरुद्दीन की गर्दन सीधी कर दी, गर्दन ऊपर हो गयी । लेकिन गर्दन तो ऊपर रह गयी, पर फंस गयी भीतर । अब वह नीचे न कर सका--क्योंकि वह कालर! उसने कहा एक हाथ छोटा और एक हाथ बड़ा! उसने कहा तुम्हारा शरीर ही गड़बड़ है, तो मैं क्या कर सकूंगा? जरा इस हाथ को आगे खींचो । तो उसने एक हाथ खींच कर आगे कर दिया । और नसरुद्दीन ने कहा कि यह नीचे जो कमीज है, यह नीचे तक पूरी नहीं पहुंच रही । तो उसने कहा, थोड़ा आगे झुको । तो नसरुद्दीन आगे झुक गया । पायजामे की टांग एक लंबी थी, एक छोटी थी । और वह ठीक करता गया और नसरुद्दीन बिगड़ता गया । कपड़ा ठीक होता चला गया, तो नसरुद्दीन की दशा बड़ी विकृत हो गयी । वह अष्टावक्र की हालत में हो गया, आठ जगह से झुक गया । और दर्जी ने कहा, जरा आइने में तो देखो, गांव की सारी सुंदरियां पागल हो जायेंगी! महीने भर की मेहनत है मेरी इन कपड़ों पर! नसरुद्दीन ने देखा, हालत बड़ी विचित्र थी; लेकिन इस आशा से कि सुंदरियां पागल हो जायेंगी, वह खुश हुआ । उसने कहा, क्या कहते हो! दर्जी ने कहा, मैंने इतनी मेहनत कभी किन्हीं वस्त्रों पर नहीं की ।
नसरुद्दीन निकला, तो अपनी मुद्रा और आसन को संभाले हुए--एक हाथ लंबा तो लंबा किये, गर्दन ऊंची किये, एक पैर छोटा तो भीतर सिकुड़े, एक पैर लंबा तो आगे किये, वस्त्र छोटे तो आगे झुके--इस आशा में कि सुंदरियां पागल हो जायेंगी!
सभी की गति ऐसी ही है, अपनी-अपनी मुद्रा संभाले हैं । वासना में जीनेवाला आदमी अष्टावक्र हो जाता है ।
नसरुद्दीन घर की तरफ चला इस आशा में कि अब देखें कि कौन सुंदरी पागल होगी । कई लोगों ने चौक कर जरूर देखा । स्त्रियों ने भी चौंक कर देखा । ऐसे विचित्र आदमी को कौन चौंक कर नहीं देखेगा! नसरुद्दीन समझा दर्जी ठीक ही कह रहा है । एक अजनबी आदमी ने जो नसरुद्दीन को नहीं जानता था क्योंकि बाकी गांव के लोग तो जानते थे कि इसमें कुछ अनूठा नहीं है, इस आदमी से ऐसी ही आशा है एक अजनबी, जो गांव में नया-नया आया था, उसने कहा कि ठहरो नसरुद्दीन, तुम्हारे दर्जी का पता क्या है? किसने बनाया है यह? नसरुद्दीन ने कहा, क्या! मेरे दर्जी का पता पूछकर क्या करोगे? उसको लगा कि यह आदमी प्रतियोगिता करना चाहता है । उस अजनबी ने कहा कि मैं जानना चाहता हूं तुम्हारे दर्जी का पता, क्योंकि तुम जैसे अष्टावक्र के लिए जिसने कपड़े बना दिये, उसकी प्रतिभा का मुकाबला नहीं--He must be genious । इतना इरछा-तिरछा शरीर और उसने कपड़े बिलकुल ठीक-ठीक बिठा दिये--आश्चर्य! उसके मैं दर्शन करना चाहता हूं । उसको पता नहीं है यह बेचारा अष्टावक्र नहीं है, कपड़ों की वजह से अष्टावक्र है ।
आपकी जो विकृत दशा है, वह वासनाओं का जो घेरा है चारों तरफ, उसके ही कारण है । कोई वासना टांग खींच रही है, कोई वासना सिर उठा रही है, कोई वासना एक हाथ खींच रही है; आप अपने को सम्हाले हैं बड़ी कठिन मुद्रा में । योगी भी क्या ऐसे आसन करेंगे, जो आप कर रहे हैं! और संभाले हैं इस आशा से कि कोई न कोई वासना इस ढंग से शायद पूरी होगी ।
इस जगत में सबसे कठिन बात यह भरोसा है कि मरकर भी मैं बचुंगा । यह बड़ी से बड़ी श्रद्धा है कि मरकर मैं बचुंगा । जिसको यह भरोसा आ गया, वही धार्मिक है । और जो इस भरोसे के सहारे पर चल पड़ा, साधक है । जो पहुंच गया, उसे हम सिद्ध कहते हैं ।
सिकंदर अफलातून (Plato) का शिष्य था । अफलातून से वह दर्शन सीखता था । लेकिन सिकंदर था सम्राट और अफलातून एक गरीब दार्शनिक था । एक दिन सिकंदर ने उससे कहा कि तुम घोड़ा बन जाओ, और मैं तुम्हारे ऊपर सवारी करना चाहता हूं । तो अफलातून को उसने घोड़ा बना दिया, जैसे बच्चे बना लेते हैं, और अफलातून पर सवारी की । उसके दस-पांच दरबारी जो मौजूद थे, उनको उसने कहा, देखो ज्ञानी की दशा! यह ज्ञानी मुझे सिखाने चला है । तो अफलातून ने कहा कि मेरी ही वासनाओं की वजह से यह मेरी दशा है, जो तुम्हारा घोड़ा बना हूं । मैं तुम्हें ज्ञान सिखाकर भी सौदा ही कर रहा हूं, उससे भी मैं कुछ पाना ही चाहता हूं । वह पाने की चाह ही इस हालत में ले आयी कि तुम मेरे सिर पर बैठ गये हो । मेरी चाह ने ही मुझे घोड़ा बना दिया, तुमने नहीं । तुम क्या कर सकते हो? मेरी वासना ने ही मुझे नीचे गिराया है, तुम मुझे नीचे नहीं गिरा सकते हो ।
इस जगत में जो भी आपकी दशा है, वह आपकी ही वासना के कारण है ।
वोल्तेयर ने लिखा है कि एक वक्त था कि रास्ते से मैं गुजरता था तो सोचता था कि कोई मुझे नमस्कार करे । पर लोग नहीं करते थे । लोग जानते ही नहीं थे । तो बड़ी पीड़ा होती थी । बड़ी मेहनत करके वोल्तेयर उस जगह पहुंचा, जहां कि गांव से निकलना मुश्किल हो गया । वोल्तेयर ने लिखा है कि दुष्टों ने नींद हराम कर दी है । अकेला घूमने नहीं निकल सकता हूं; कोई न कोई मिल जाएगा, नमस्कार करके, साथ होकर बात करने लगता है ।
वोल्तेयर ने अपनी डायरी में लिखा है कि अब मुझे खयाल आता है कि यह उपद्रव मैंने ही मोल लिया है । ये तो बेचारे पहले नमस्कार करते ही नहीं थे । मैं निकल जाता था, तब इसकी पीड़ा होती थी कि कोई नमस्कार करने वाला नहीं! और अब बाजार इकट्ठा हो जाता है जहां निकलता हूं, तो पीड़ा होती है कि ये दुष्ट पीछा कर रहे हैं ।
जिन्हें भीड़ नहीं मिली, वे परेशान हैं; जिन्हें भीड़ मिल गई, वे परेशान हैं ।
वासना वैसी ही है, जैसे कभी दांत टूट जाए, तो जीभ वहीं-वहीं जाती है, जहां दांत नहीं है। सब दांतों को छोड़ देती है। दिनभर वहीं कुरेदती चली जाती है, जहां दांत नहीं है। उस जीभ से पूछो कि तू पागल हो गई! दांत इतने दिन था, तब कभी तूने छुआ भी नहीं। आज तुझे क्या हो गया है? खाली गङ्ढे को छूने में तुझे क्या हो रहा है? जो नहीं है, उसमें बड़ा रस है। जो है, उससे कोई प्रयोजन नहीं है।
वासना भी टूटे दांत को छूती रहती है दिन-रात, जो नहीं है। और बहुत कुछ है, जो नहीं है। अनंत है विस्तार जीवन का। सभी कुछ मेरे पास नहीं है। यद्यपि मेरे पास जो है, वह सभी कुछ से जरा भी कम नहीं है। लेकिन उसको देखे कौन? उसकी तरफ नजर कौन उठाए?
सुना है मैंने, एक आदमी रो रहा था रास्ते पर खड़ा हुआ। और एक फकीर से उसने कहा कि मुझे तो भगवान उठा ही ले, तो अच्छा। मेरे पास कुछ भी नहीं है। आज सुबह की चाय पीने के लिए पैसे भी नहीं हैं। उस फकीर ने कहा, घबड़ा मत। मैं समझता हूं, तेरे पास बहुत कुछ है; मैं बिक्री करवा देता हूं। उसने कहा, मेरे पास कुछ भी नहीं है इस चीथड़े के सिवा, जो मेरे शरीर पर अटका हुआ है। इसकी क्या बिक्री होगी, खाक! अगर होती हो, तो मैं बेचने को तैयार हूं। फकीर ने कहा, तू मेरे साथ आ।
वह उसे सम्राट के पास ले गया गांव के। दरवाजे पर उसने कहा कि मित्र, पहले तुझे बता दूं; ऐसा न हो कि बाद में तू बदल जाए। दाम अच्छे मिल जाएंगे। लेकिन बेचने की तैयारी है? उसने कहा, तू पागल तो नहीं है! मेरे पास कुछ है नहीं, जो बेचने योग्य हो। और इस महल में इन चीथड़ों को खरीदेगा कोई? चीथड़ों की वजह से मुझे भी निकालकर वे बाहर फेंक देंगे। भीतर प्रवेश भी मुश्किल है। है क्या मेरे पास? उस फकीर ने कहा कि देख, बाद में बदल मत जाना; दाम अच्छे मिल जाएंगे। वह आदमी हंसने लगा। उसने कहा कि व्यर्थ मेरी सुबह खराब हुई तुम्हारे साथ आकर। तुम पागल मालूम पड़ते हो! फकीर ने कहा, तेरी मर्जी। अंदर चल!
सम्राट के पास जाकर कहा कि यह आदमी मैं ले आया। इस आदमी की दोनों आंखें आप खरीद लें। क्या दाम दे देंगे? आदमी घबड़ाया। उसने कहा, आंख! तुम बात क्या कर रहे हो? सम्राट ने कहा, लाख-लाख रुपया मैंने तय कर रखा है; जो भी आदमी आंख बेचे। वजीर को कहा, दो लाख रुपए ले आओ। और उस आदमी से कहा, सौदे में कोई तुम्हें एतराज तो नहीं है? कम तो नहीं हैं?
वह भिखारी एकदम भिखारी न रहा, एक क्षण में। क्योंकि भिखारी था वह टूटे हुए दांत पर जीभ मारने की वजह से। भिखारी न रहा। क्योंकि अब उसकी उन दांतों पर जीभ पड़ी, जो थे। उसने कहा, आप बात क्या करते हैं? आंखें मुझे बेचनी नहीं हैं। उस फकीर ने कहा, दो लाख मिलते हैं पागल! तू कहता था, कुछ भी मेरे पास नहीं है। भगवान को कोस रहा था। सुबह-सुबह दो लाख का सौदा करवाए देते हैं। तेरी ज्यादा मर्जी हो, तो ज्यादा बोल। कुछ ज्यादा भी मिल सकता है। उस आदमी ने कहा कि मुझे बाहर जाने का रास्ता बताओ। मुझे आंख बेचनी नहीं है। उस फकीर ने कहा, लेकिन लाखों की आंख तेरे पास हैं, कभी तूने भगवान को धन्यवाद दिया है?
लेकिन लाखों की आंख देखे कौन? आंखें तो कौड़ियों की इच्छाओं को देख रही हैं। आंखें तो कौड़ी भर इच्छा के पीछे दौड़ रही हैं। लाखों की आंख कौड़ियों की इच्छा करती है!
जो आदमी कहता है कल करेंगे, उससे ज्यादा भूल भरी बात और कोई भी नहीं कहता।
नादिरशाह ने एक दफे एक बहुत गहरा मजाक किया। गहरा कहना चाहिए। और कभी-कभी पाप में गहरे गए लोगों की बुद्धि भी पुण्य में गहरे गए लोगों की बुद्धि जैसी ही गहरी हो जाती है--उलटी होती है, लेकिन गहरी हो जाती है।
नादिरशाह किसी स्त्री के प्रति लोलुप है, लेकिन वह स्त्री उसके प्रति बिलकुल ही अनासक्त है, पर नादिरशाह के एक सैनिक के प्रति पागल है। स्वभावतः, नादिर के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया। पकड़वा भिजवाया दोनों को। पूछा अपनेवजीरों से कि कोई नई सजा खोजो, जो कभी न दी गई हो।
ऐसी कोई सजा है, जो कभी न दी गई हो! सब सजाएं चुक गई हैं। वजीर बड़ी मुश्किल में पड़े। नई-नई सजाएं खोजकरलाते, लेकिन नादिर कहता कि यह हो चुका; यह कई बार दी जा चुकी है। हम ही दे चुके हैं। दूसरे दे चुके हैं। नई चाहिए! और सच में ही एक बूढ़े वजीर ने नई सजा खोज ली। आप भी न सोच सकेंगे कि नई सजा क्या हो सकती थी!
नई सजा यह थी कि दोनों को नग्न करके, एक-दूसरे के चेहरों को आमने-सामने करके, दोनों को एक खंभे से बांध दिया गया। कभी सोचा भी नहीं होगा किसी ने! एक दिन, दो दिन, एक-दूसरे के शरीर से बास आने लगी, मल-मूत्र छूटने लगा। तीन दिन, एक-दूसरे के चेहरे को देखने की भी इच्छा न रही। चार दिन, एक-दूसरे पर भारी घृणा पैदा होने लगी। पांच दिन, नींद नहीं, मल-मूत्र, गंदगी; और बंधे हैं दोनों एक साथ--यही चाहते थे! पंद्रह दिन, दोनों पागल हो गए कि एक-दूसरे की गर्दन काट दें।
और नादिर रोज आकर देखता कि कहो प्रेमियो, इच्छा पूरी कर दी न! मिला दिया न दोनों को! और ऐसा मिलाया है कि छूट भी नहीं सकते। जंजीरें बंधी हैं। पंद्रह दिन बाद जब उन दोनों को छोड़ा, तो कथा है कि उन्होंने लौटकर एक-दूसरे को जिंदगी में न दुबारा देखा और न बोले। जो भागे एक-दूसरे से, तो फिर लौटकर कभी नहीं देखा!
जर्मन कवि हेन -- एक बार मुझे तीन दिन भूखा रह जाना पड़ा। जब तक मेरा पेट भरा था, तो चांद में मुझे अपनी प्रेयसी की तस्वीर दिखती थी। जब तीन दिन भूखा रहा, तो चांद मुझे ऐसा लगा जैसे रोटी आकाश में लटकी हुई है। तब मुझे पहली दफा पता चला कि चांद न तो प्रेयसी का चेहरा है, न रोटी है। मन में जो होता है, वह वहां दिखाई पडने लगता है।
एक इजिप्शियन फकीर से परमात्मा प्रसन्न हो गया। बहुत प्रसन्न हो गया, तो उस फकीर को कहा कि तुझे जो चाहिए वह मांग ले। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी हो! तो परमात्मा ने, कहते हैं, उसे एक फल दे दिया और कहा कि इसे जो खा लेगा, वह अमर हो जाएगा। लेकिन उस फकीर ने कहा कि दो आदमी खाएं, तो दो हो सकते हैं? परमात्मा ने कहा, नहीं, एक!
उस फकीर का अपने शिष्य से बड़ा प्रेम था। उसने सोचा कि अगर मैं अमर हो गया और शिष्य मर गया, कोई सार नहीं है। उसके बिना तो मेरा कोई सुख ही नहीं है। उसने शिष्य को कहा कि तू यह ले ले। तू अमर हो जा। पर उस शिष्य का एक लड़की से प्रेम था। उसने सोचा, मैं अकेला अमर हो गया, तो बिलकुल बेकार! वह उस लड़की को दे आया। पर उस लड़की का गांव के एक सिपाही से प्रेम था। उसने कहा कि मैं अमर हो गई! वह उस सिपाही को दे आई। लेकिन उस सिपाही का लगाव राजा की स्त्री से लगा हुआ था। वह रात जाकर उसको दे आया। उस स्त्री ने सोचा कि मैं अगर खाकर अमर हो जाऊं, तो मेरे बेटे का क्या होगा? उसका भारी लगाव, उसने बेटे को दे दिया। बेटे का अपने बाप से बहुत प्रेम था। उसने कहा, मैं तो ठीक, लेकिन पिता बुजुर्ग हुए। उनकी मौत करीब है। मैं तो अभी इसके बिना भी बहुत दिन जी लूंगा। उसने पिता को दे दिया। लेकिन पिता फकीर का भक्त था; उसी फकीर का। उसने सोचा कि हमारे रहने न रहने का क्या सवाल! वह फकीर रहे जमीन पर, तो हजारों के काम आएगा। वह जाकर फकीर के चरणों में फल रखा। फकीर ने फल देखा। उसने कहा, यह फल आया कैसे तुम्हारे पास!
सब दौड़ रहे हैं किसी और के लिए। सब भागे हुए हैं; कोई खड़ा हुआ नहीं है।
सच्चाई
कथा :
बुद्ध ने बारह वर्ष बाद घर लौटकर जब गांव के द्वार से प्रवेश किया, तो बुद्ध के पिता ने कहा, मैंने ही तुझे जन्म दिया। बुद्ध ने कहा, क्षमा करें। आप नहीं थे, तब भी मैं था। मेरी यात्रा बहुत पुरानी है। आपसे मेरा मिलन तो अभी-अभी हुआ, कुछ ही वर्ष पहले। मेरी यात्रा बहुत पुरानी है आपसे। आपकी भी यात्रा उतनी ही पुरानी है। आपने मुझे जन्म दिया, ऐसा मत कहें; ऐसा ही कहें कि आप एक चौराहे बने, जिससे मैं गुजरा और पैदा हुआ। लेकिन मैं गुजरा और पैदा हुआ, बुद्ध ने कहा, ऐसा भी कहना, ठीक नहीं; गुजारा गया और पैदा किया गया।
जैसे कोई चौराहे से गुजर जाए और चौराहा कहे कि मैंने ही तुम्हें पैदा किया; मेरे चौराहे से तुम गुजरे थे, अन्यथा हो न सकते थे! ऐसे ही मां-बाप एक चौराहे से ज्यादा नहीं हैं, जिनसे बच्चा पैदा होता है।
केवल प्रबुद्ध व्यक्ति की आवाज में ही एक-रसता हो सकती है।
झेन सदगुरु बांकेई के विहार के पास ही एक अंधा आदमी रहता था। बांकेई की मृत्यु हुई, तब उस अंधे व्यक्ति ने अपने एक मित्र से कहा:
'क्योंकि मैं अंधा हूं और किसी व्यक्ति के चेहरे का निरीक्षण नहीं कर सकता, इसलिये मुझे उसके चरित्र का निर्णय उसकी आवाज से ही करना होता है। आमतौर से जब मैं किसी को उसकी खुशी या सफलता के लिये दूसरे को बधाई देते सुनता हूं, तो उसमें ईष्या की प्रच्छन्न ध्वनि भी सुनता हूं। और जब दूसरे की विपत्ति में शोक प्रकट किया जाता है, तब मैं उसके भीतर प्रसन्नता और संतोष भी सुनता हूं। मानो शोक प्रगट करनेवाला सचमुच खुश है कि उसकी अपनी दुनिया में कोई उपलब्धि होनेवाली है।
'लेकिन मेरे पूरे अनुभव में बांकेई की आवाज में सदा सच्चाई ही झलकती थी। जब उन्होंने प्रसन्नता प्रगट की, तब मैंने प्रसन्नता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुना। और जब उन्होंने शोक प्रगट किया, तो मैंने शुद्ध शोक ही सुना।'
जो जागा हुआ है और जिसके भीतर सोये हुए मन का कोई भी हिस्सा नहीं बचा, जो परिपूर्ण चैतन्य से भरा है, और जिसकी अचेतना नष्ट हो गई, केवल उसकी आवाज में ही एक-स्वर सुना जा सकता है।
यूनान में एक सम्राट ने उन दिनों यूनान के एक महा मनीषी सोलन (Solon) को अपने राजमहल बुलाया। सोलन एक सुकरात जैसा मनीषी था। सम्राट ने बुलाया सिर्फ इसलिए कि सोलन की बड़ी ख्याति थी। उसके एक—एक शब्द का मूल्य अकूत था। तो कुछ उससे ज्ञान लेने नहीं बुलाया था। कुछ उससे सीखने नहीं बुलाया था। सिर्फ सोलन को बुलाया था कि देख मेरे महल को! मेरे साम्राज्य को! मेरी धन—संपदा को! और सम्राट चाहता था कि सोलन प्रशंसा करे कि आप जैसा सुखी और कोई भी नहीं है, तो इस वचन का मूल्य होगा। सारा यूनान, यूनान के बाहर भी लोग समझेंगे कि सोलन ने कहा है।
सोलन आया, महल घुमाकर दिखाया गया। अकूत संपदा थी सम्राट के पास, न मालूम कितना उसने लूटा था। बहुमूल्य पत्थरों के ढेर थे, स्वर्ण के खजाने थे, महल ऐसा सजा था, जैसे दुल्हन हो। फिर सम्राट उसे दिखा—दिखाकर प्रतीक्षा करने लगा कि वह कुछ कहे। लेकिन सोलन चुप ही रहा। न केवल चुप रहा, बल्कि गंभीर होता गया। न केवल गंभीर हुआ, बल्कि ऐसे उदास हो गया, जैसे सम्राट मरने को पड़ा हो और वह सम्राट को देखने आया हो। आखिर सम्राट ने कहा कि तुम्हारी समझ में आ रहा है कि नहीं? मैंने तो सुना है कि तुम बड़े बुद्धिमान हो! मुझ जैसा सुखी तुमने कहीं कोई और मनुष्य देखा है? मैं परम सुख को उपलब्ध हुआ हूं। सोलन, कुछ बोलो इस पर!
सोलन ने कहा कि मैं चुप ही रहूं वही अच्छा है, क्योंकि क्षणभंगुर को मैं सुख नहीं कह सकता। और जो शाश्वत नहीं है, उसमें सुख हो भी नहीं सकता। सम्राट, यह सब दुख है। बड़ा चमकदार है, लेकिन दुख है। तुम इसे सुख समझे हो, तो तुम मूढ़ हो।
सम्राट को धक्का लगा। जो होना था, वह हुआ। सोलन चुप ही रहता, तो अच्छा था। सोलन को उसी वक्त गोली मार दी गई। सामने महल के एक खंभे से लटकाकर, बंधवाकर सम्राट ने कहा, अभी भी माफी मांग लो। तुम गलती पर हो। अभी भी कह दो कि सम्राट, तुम सुखी हो।
सोलन ने कहा, झूठ मैं न कह सकूंगा। मृत्यु में कुछ हर्जा नहीं है, क्योंकि मरना मुझे होगा ही; किस निमित्त मरता हूं यह गौण है। तुमने मारा, कि बीमारी ने मारा, कि अपने आप मरा, यह सब गौण है। मौत निश्चित है। झूठ मैं न कहूंगा। शाश्वत सुख ही सुख है। क्षणभंगुर सुख दिखाई पड़ता है, लेकिन दुख है। सम्राट! तुम भूल में हो।
गोली मार दी गई।
फिर दस वर्षों बाद, यह सम्राट पराजित हुआ। विजेता ने इसे अपने महल के सामने एक खंभे पर बांधा। जब वह खंभे पर लटका था और गोली मारे जाने को थी, तब उसे अचानक सोलन की याद आई। ठीक दस वर्ष पहले ऐसा ही सोलन खंभे पर लटका था! तब उसे उसके शब्द भी सुनाई पड़े, कि जो शाश्वत नहीं, वह सुख नहीं। जो क्षणभंगुर है, उसका कोई मूल्य नहीं। यह चमकदार दुख है सम्राट! उसी चमकदार दुख को सुख मानकर यह सम्राट इस खंभे पर लटक गया।
सम्राट की आंखें बंद हो गईं। वह अपने को भूल ही गया, सोलन को देखने लगा। और जब उसे गोली मारी जा रही थी, तब उसके होंठों पर मुस्कुराहट थी। और आखिरी शब्द जो उसके मुंह से निकले, वे यह थे : सोलन, सोलन, मुझे क्षमा कर दो। तुम ही सही थे।
विजेता सम्राट सुनकर चकित हुआ; कौन सोलन? किसके वचन सही? और इस मरते सम्राट के होंठों पर मुस्कुराहट कैसी? उसने सारी खोज-बीन करवाई, तब यह पूरी कथा पता चली।
महत्वाकांक्षी अपने को साध्य मानता है, दूसरे को साधन। महत्वाकांक्षी कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता। Ambition, महत्वाकांक्षा इस जगत में सबसे अधार्मिक घटना है।
टोकियो में एक अजायबघर है। सारी दुनिया के पशु वहां इकट्ठे हैं। बड़ा अजायबघर है, बड़े से बड़ा अजायबघर है। खतरनाक से खतरनाक पशु -- सिंह, बर्बर सिंह, चीते, हाथी, गैंडे, जंगली जानवर, हिपोपोटैमस और सब तरह के जानवरों का बड़ा विस्तार है। पूरे अजायबघर को घूमने के बाद आखिरी जो कठघरा है, उस पर एक तख्ती लगी है—the most dangerous animal of all, सब जानवरों से खतरनाक जानवर। तुम एकदम तेजी से कदम बढ़ाओगे कि कौन-सा जानवर वहां बंद है। और वहां तुम सिर्फ एक दर्पण पाओगे, जिसमें तुम्हारी तस्वीर दिखाई पड़ेगी।
तू वही करता है जो तू चाहता है
लेकिन होता वही है जो मैं चाहता हूँ
इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूँ
फिर वही होगा जो तू चाहता है
जीत
कथा :
सिकंदर से जब किसी ने कहा--एक बहुत अदभुत आदमी ने--महावीर जैसा एक अदभुत आदमी हुआ यूनान में, डायोजनीज। डायोजनीज नग्न खड़ा था। सिकंदर से उसने कहा, सिकंदर! तू एक दफे यह भी तो सोच कि तू सारी दुनिया जीत लेगा, तो फिर क्या करेगा? क्योंकि दूसरी दुनिया नहीं है! कहते हैं, सिकंदर उदास हो गया। डायोजनीज खूब हंसने लगा। सिकंदर और उदास हो गया। और सिकंदर ने कहा, मेरी मजबूरी पर हंसो मत। सच ही दूसरी दुनिया नहीं है। यह मुझे खयाल ही नहीं आया कि अगर मैं पूरी दुनिया जीत लूंगा, तो फिर क्या होगा? और दूसरी तो दुनिया नहीं है।
अभी जीती नहीं है दुनिया, लेकिन जीतने के खयाल से उदासी आ गई। क्योंकि फिर मोह को फैलाने की और कोई जगह नहीं है। फिर क्या करूंगा! सिकंदर पूछने लगा, लेकिन डायोजनीज, तुम हंसते क्यों हो?
डायोजनीज बोला कि मैं हंसता इसलिए हूं कि तुझे पूरी दुनिया भी मिल जाए, तो भी उदासी ही हाथ में लगेगी। और हमारे पास कुछ भी नहीं है, और हम उदासी को खोजते फिरते हैं और हमें कहीं मिलती नहीं। हमारे पास कुछ भी नहीं है और हम आनंद में हैं। तेरे पास बहुत कुछ है और सब कुछ भी हो जाए, तो भी तू दुख में ही जाएगा।
अनुभव के अतिरिक्त सच को जानने का कोई उपाय भी नहीं है।
बचाना
कथा :
मोहम्मद रात सोते, तो सांझ घर में जो भी होता, सब बांट देते। एक पैसा भी न बचाते। कहते, कल सुबह जीए, तो ठीक है; और परमात्मा जिलाना चाहेगा, तो कल सुबह भी इंतजाम करेगा। आज इंतजाम किया था, कल भी इंतजाम किया था। जीवनभर का अनुभव कहता है कि अब तक जिलाना था, तो उसने इंतजाम दिया है। कल भी भरोसा रखें।
मोहम्मद कहते कि जो आदमी तिजोड़ी सम्हालकर रखता है, वह नास्तिक है। है भी। कहेंगे, नास्तिक की बड़ी अजीब परिभाषा है! हम तो नास्तिक उसको कहते हैं, जो भगवान को नहीं मानता। मोहम्मद नास्तिक उसको कहते हैं, जो धन को मानता है।
मरने के दिन, बीमार थे, तो चिकित्सकों ने मोहम्मद की पत्नी को कहा कि आज रात शायद ही कटे। तो उसने पांच दीनार बचाकर रख लिए। दवा की जरूरत पड़ जाए; पांच रुपए बचाकर रख लिए। रात क्या भरोसा! दवा, चिकित्सक, कुछ इंतजाम करना पड़े।
बारह बजे रात मोहम्मद करवट बदलते रहे। लगे कि बहुत बेचैन हैं। लगे कि बहुत परेशान हैं। अंततः उन्होंने आंख खोली और अपनी पत्नी से कहा कि मुझे लगता है, आज मैं अपरिग्रही नहीं हूं। आज घर में कुछ पैसा है। मत करो ऐसा, क्योंकि परमात्मा अगर मुझसे पूछेगा कि मोहम्मद, मरते वक्त नास्तिक हो गया? जिसने जिंदगीभर दिया, वह एक रात और न देता?निकाल! पत्नी ने कहा, तुम्हें पता कैसे चला कि मैंने बचाया होगा?
मोहम्मद ने कहा, तेरा डर कहता कि आज मोह से भरा हुआ है तेरा मन। तू आज मेरी आंखों के सामने नहीं देखती। कुछ तूने छिपाकर रखा है। निकाल ला और उसे बांट दे। बेचारी, पांच रुपए छिपा रखे थे बिस्तर के नीचे, उसने निकाल लिए। मोहम्मद ने कहा, जा सड़क पर, किसी को दे आ। पर उसने कहा, इतनी आधी रात सड़क पर मिलेगा भी कौन! मोहम्मद ने कहा, जिसने मुझे कहा है कि बांट दे, उसने उसको भी भेजा होगा, जो लेने को मौजूद होगा। वह बाहर गई और एक भिखारी खड़ा था! पैसे देकर वह भीतर आ गई। भरोसा गहरा हुआ।
भीतर लौटकर आई। मोहम्मद ने आंखें बंद कीं। मुस्कुराए। चादर ओढ़ ली और श्वास छूट गई।
संन्यास का अर्थ है, जीवन को एक काम की भांति नहीं वरन एक खेल की भांति जीना।
प्रार्थना
कथा :
एक अरेबियन कहानी है। एक लकड़हारा रोज लकड़ी काटता है। गांव में बेचता है। बूढ़ा हो गया है। एक दिन लौट रहा है, सिर पर भारी बोझ है। सुबह दोपहर बन रही है। पसीने से लथपथ बूढ़ा आदमी है; लकड़ियां ढोता हुआ गांव की तरफ जा रहा है। कमर झुकी जाती है; बोझ सहा नहीं जाता। अचानक मन से निकला, हे परमात्मा! इससे तो अच्छा है कि अब मौत से ही मिला दे।
ऐसा होता नहीं, जैसा उस कहानी में हो गया। मौत कहीं पास से गुजरती थी और उसने सुन लिया। उसने सोचा, बेचारा, सच में तकलीफ में है। ले ही जाऊं। मौत आ गई। मौत सामने आकर खड़ी हुई। लकड़हारे से कहा, तुमने याद किया; मैं आ गई। बोलो, क्या करूं?
लकड़हारे ने कहा, नहीं, और कुछ नहीं, सिर्फ जरा सिर से बोझ उतार दो। और किसी लिए याद नहीं किया; बोझ जरा सिर पर ज्यादा है; राह पर कोई दिखाई नहीं पड़ता है, इसे नीचे उतार दो। घबड़ा गया मौत को देखकर। जब पुकारा था, तब सोचा भी नहीं था...।
यह खयाल रख लें, अगर परमात्मा हमारी सारी प्रार्थनाएं सुन ले, तो हम प्रार्थना करना सदा के लिए बंद कर दें। नहीं सुनता है, इसलिए किए चले जाते हैं। शायद इसीलिए नहीं सुनता है, क्योंकि हम अपने ही खिलाफ प्रार्थनाएं किए चले जाते हैं।
आकाश की तरफ आख उठाकर शून्य से जो वार्तालाप करे, वह प्रार्थना है। और आख बंद करके भीतर के शून्य में जो ठहर जाए, वह ध्यान है।
कुतूहल
कथा :
मैं अभी बिहार में था कुछ समय पहले। रात दस बजे बोलकर लौटा। कलेक्टर उस गांव के आए। पढ़े-लिखे आदमी हैं। दस बजे आए। मैंने कहा, अब तो मेरे सोने का समय हुआ। आप सुबह आ जाएं, आठ बजे। उन्होंने कहा, आठ बजे तो मैं न आ पाऊंगा; क्योंकि आठ बजे तो मेरे नाश्ते का समय है।
लाए थे ब्रह्म-जिज्ञासा; कहने लगे, आठ बजे नाश्ते का समय है! मैंने कहा, तो फिर दस बजे आ जाएं, क्योंकि आठ से दस शिविरार्थियों के लिए दिया है। दस बजे आ जाएं।
दस बजे तो नहीं आ सकता। दफ्तर जाऊंगा।
ब्रह्म-जिज्ञासा! एक दिन की छुट्टी नहीं ली जा सकती! तो मैंने कहा, परसों आ जाएं। उन्होंने कहा, परसों! सुबह तो नहीं आ सकूंगा। कुछ मेहमान आते हैं। ब्रह्म-जिज्ञासा! मेहमान आ रहे हैं! मैंने कहा, सांझ आ जाएं। कहा कि थियेटर के टिकट ले रखे हैं! ब्रह्म-जिज्ञासा! थियेटर के टिकट ले रखे हैं!
तो फिर मैंने कहा कि हाथ जोड़कर दंडवत करूं आपके और पूछूं कि कब आज्ञा है कि आपके दरवाजे उपस्थित हो जाऊं! थोड़े घबड़ाए। विचलित हुए।
क्या, चाहते क्या हैं हम? चाहते भी हैं कुछ?
स्वभावतः, अगर ब्रह्म हमारे अनुभव से खो गया है, तो आश्चर्य नहीं है। पूछने वाले ही खो गए। सम्यकरूपेण जानने की आतुरता वाले ही खो गए। इतना-सा छोड़ने का मन नहीं है!
बुद्ध -- कई पात्र ठीक हैं बिलकुल, लेकिन उलटे रखे हैं। उन पर हम डालते हैं, बेकार चला जाता है। कई पात्र सीधे रखे हैं, लेकिन बिलकुल फूटे हैं। उन पर डालते हैं, बह जाता है। पात्र ऐसा चाहिए कि फूटा न हो और सीधा हो।
एक सम्राट ने अपने दरबार के बुद्धिमानों को कहा कि मैं जानना चाहता हूं कि ब्रह्म इस जगत में, कहते हैं लोग, इस भांति समाया है कि जैसे नमक सागर के जल में। दिखाओ मुझे, यह समाया हुआ ब्रह्म कहां है?
विद्वान थे दरबार में लोग। लेकिन दरबार में जैसे विद्वान हो सकते हैं, वैसे ही थे। दरबार में कोई ज्ञानी होगा, इसकी आशा तो मुश्किल है। दरबारी विद्वान थे। सब जगह मिलते हैं। अगर दिल्ली में जाइए तो बहुत हैं। तो दरबारी विद्वान! उनका काम दरबार की शोभा बढ़ाना। शृंगारिक उपयोग है उनका, डेकोरेटिव। तो सभी सम्राट अपने दरबार में विद्वान रखते थे, नहीं तो सम्राट मूढ़ समझा जाए। लेकिन मूढ़ के दरबार में जो विद्वान हों, वे कितने विद्वान होंगे, यह समझा जा सकता है।
विद्वान मुश्किल में पड़े। बहुत समझाने की कोशिश की। बड़े उद्धरण दिए। लेकिन सम्राट ने कहा, नहीं, मुझे दिखाओ निकालकर। जो सभी जगह छिपा हुआ है, थोड़ा-बहुत तो निकालकर कहीं से दिखाओ! हवा से निकाल दो, दीवाल से निकाल दो,मुझसे निकाल दो, खुद से निकाल दो! कहीं से तो निकालकर थोड़ी तो झलक दिखाओ! मुश्किल में पड़ गए। पर सम्राट ने कहा,नहीं बता सकोगे कल सुबह तक, तो छुट्टी! फिर लौटकर मत आना। बड़ी कठिनाई हो गई। बड़ी कठिनाई हो गई!
द्वारपाल भी खड़ा हुआ सुनता था। दूसरे दिन सुबह जब विद्वान नहीं आए, तो उस द्वारपाल ने कहा, महाराज! विद्वान तो आए नहीं; समय हो गया। और जहां तक मैं समझता हूं, वे अब आएंगे भी नहीं; क्योंकि उत्तर होता, तो कल सांझ को ही दे देते। रातभर में उत्तर खोजेंगे कैसे? कहीं उत्तर रखा हुआ थोड़े ही है कि वे उठाकर ले आएंगे, ढूंढ़ लेंगे, कि तैयार कर लेंगे। अगर अनुभव होता उन्हें, तो कल ही कह दिए होते। तो अगर हो इरादा, तो मैं उत्तर दूं।
राजा ने कहा, हद हो गई! तू द्वारपाल; सदा दरवाजे पर खड़ा रहा। विद्वान हार गए; तू उत्तर देगा! उसने कहा, मैं उत्तर दूंगा। राजा ने कहा, भीतर आ; उत्तर दे। उसने कहा, पहले नीचे उतरो सिंहासन से। मैं सिंहासन पर बैठता हूं। दंडवत करो नीचे। राजा ने कहा, पागल, किस तरह की बातें करता है! उसने कहा, तो फिर, फिर तुम्हें उत्तर कभी नहीं मिलेगा। जो तुम्हारे चरणों में बैठते हैं, उनसे तुम्हें उत्तर कभी भी नहीं मिलेगा। क्योंकि वे उत्तर देने योग्य होते, तो तुम्हें चरणों में बिठा लिया होता उन्होंने। उतरो नीचे, उस द्वारपाल ने कहा।
राजा एकदम घबड़ा गया! कोई था भी नहीं। दरबार में कोई था नहीं। कहा, उतर नीचे! जब प्रश्न पूछा है, तो उत्तर देकर रहेंगे। राजा घबड़ाकर नीचे बैठ गया। द्वारपाल सिंहासन पर बैठ गया। द्वारपाल ने कहा, दंडवत कर! सिर झुका! राजा ने सिर झुकाया। और जीवन में पहली बार उसे सिर झुकाने के आनंद का अनुभव हुआ--पहली बार!
सिर अकड़ाए रखने की बड़ी पीड़ा है। लेकिन जिंदगीभर अकड़ाए रखने से पैरालिसिस हो जाती है। अकड़ ही जाता है। फिर उसको झुकाना हो, तो बड़ी कठिनाई होती है।
बड़ी मुश्किल से तो झुकाया। लेकिन सिर झुकाकर जब उसके पैरों में पड़ रहा, तो उस द्वारपाल ने थोड़ी देर बाद कहा कि अब ऊपर भी उठा! पर सम्राट ने कहा, थोड़ी देर रुक। मैंने तो यह सुख कभी लिया नहीं। थोड़ा रुक। जल्दी नहीं है उत्तर की।
आधी घड़ी, घड़ी बीतने लगी। द्वारपाल ने कहा, अब सिर उठाओ। जवाब नहीं लेना है? उस सम्राट ने ऊपर देखा और उसने कहा, जवाब मुझे मिल गया। अकड़ा था, इसीलिए मुझे पता नहीं चला उस ब्रह्म का; आज झुका तो मुझे पता लगा कि कहां खोजता हूं बाहर! जब सब जगह है, तो भीतर भी तो होगा ही। झुके-झुके मैं उसी में खो गया। उत्तर मुझे मिल गया। तुम मेरे गुरु हो।
बिना कहे उत्तर मिल गया! बिना उत्तर दिए उत्तर मिल गया! हुआ क्या? हंबलनेस, ह्युमिलिटी, विनम्रता गहरे में उतार देती है और वहां से जो अंतर-ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं, वे उत्तर बन जाती हैं।
इसलिए कृष्ण कहते हैं, दंडवत करके प्रश्न पूछना ऐसे पुरुष से।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, ब्रह्म के संबंध में कुछ बताइए। मैं मिनट दो मिनट और कुछ बात करता हूं, जानकर ही। फिर वे घंटेभर बैठे रहते हैं, फिर दुबारा ब्रह्म की बात ही नहीं पूछते! कुतूहल था। घोड़े के कितने कान होते हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल नहीं था। सवाल महत्वपूर्ण दिखता था, ब्रह्म-जिज्ञासा का था। लेकिन कुतूहल था; बस, पूछ लिया था।
एक गांव में मैं ठहरा था। दो बूढ़े मेरे पास आए। एक जैन थे, एक हिंदू ब्राह्मण थे। दोनों पड़ोसी थे, बचपन के साथी थे। और निरंतर का विवाद था दोनों के बीच। क्योंकि हिंदू ब्राह्मण कहता था, ईश्वर ने सृष्टि बनाई; क्योंकि बिना बनाए कोई चीज कैसे हो सकती है! जैन कहता था, कोई बनाने वाला नहीं है; क्योंकि अगर कोई बनाने वाला है, तो फिर तो बनाने वाले का भी बनाने वाला होना चाहिए! और अगर ईश्वर बिना बनाए हो सकता है, तो सृष्टि ही को बनाने वाले की क्या जरूरत है? वह भी बिना बनाए हो सकती है।
तो सृष्टि अनादि है, जैन कहता। और हिंदू कहता कि उसका भी प्रारंभ है परमात्मा से। विवाद उनका लंबा था। कोई साठ के करीब दोनों की उम्र थी। उन्होंने मुझसे आकर कहा, हमारा लंबा विवाद है। अब तक हल नहीं हो पाया। अब तो हम मरने के करीब आ गए, यह विवाद हल होता भी नहीं। न मैं इनकी मानता, न ये मेरी मानते। आपको हम निर्णायक बनाते हैं। हम दोनों का विवाद हल करें।
मैंने कहा कि निर्णायक मैं बन जाऊं, लेकिन पहले मेरे दो-तीन सवालों का जवाब दे दें। उन्होंने कहा, क्या? मैंने कहा कि अगर यह तय हो जाए कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई, तो मैंने ब्राह्मण बूढ़े से पूछा कि फिर तुम क्या करोगे? उसने कहा, नहीं; करना क्या है! मैंने कहा कि अगर यह तय हो जाए कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई नहीं, वह है भी नहीं। और सृष्टि सदा से है, तो मैंने जैन बूढ़े से पूछा कि फिर तुम्हारे इरादे क्या हैं? उसने कहा, कोई और इरादे नहीं हैं, बस यह तय हो जाना चाहिए। मैंने कहा, तुम कितने दिन से इस पर विवाद करते हो? जिस विवाद के तय हो जाने का कोई जीवंत परिणाम होने वाला नहीं है, वह कुतूहल है। जिस विवाद के conslusive हो जाने पर तुम कहते हो, कोई और बात नहीं है, बस यह तय हो जाना चाहिए। प्रयोजन क्या है? होगा क्या? करोगे क्या?
इसलिए कृष्ण पहले ही कहते हैं, दंडवत करके; कुतूहल से नहीं। क्योंकि जो कुतूहल से पूछेगा, उसे कभी गहरे उत्तर नहीं मिल सकते हैं। आपकी आंखों में दिखा कुतूहल, और उत्तर देने वाला बचाव कर जाएगा। क्योंकि जो जानता है, वह हीरे उन्हीं के सामने रख सकता है, जो हीरों को पहचान सकते हों। हर किसी के सामने हीरे रख देना नासमझी है। अर्थ भी नहीं है, प्रयोजन भी नहीं है। तो जो जानता है, वह कुतूहल का उत्तर नहीं दे सकता है।
किसी के पैर मत छुओ का मतलब, औपचारिक मत छुओ, फार्मल मत छुओ, जानकर मत छुओ, कोशिश करके मत छुओ, चेष्टा करके मत छुओ, एफर्ट से मत छुओ, प्रयत्न-यत्न से मत छुओ; और दूसरे छू रहे हैं, इसलिए मत छुओ; कोई क्या कहेगा, इसलिए मत छुओ।
अब जब तुम दूसरे की प्रशंसा में लीन होओ, तब थोड़ा भीतर झांक कर देखना, कहीं निंदा तो नहीं छिपी है!
एक अमरीकी निर्जन रास्ते पर दो यात्री रुके। रुकना पड़ा, क्योंकि सामने ही बड़ी तख्ती लगी थी: 'द रोड इज क्लोज्ड।' रास्ता बंद है। लेकिन तख्ती के पास से ही उन्होंने देखा कि अभी-अभी गई गाड़ी के, कार के निशान हैं। तो फिर उन्होंने तख्ती की फिक्र न की। फिर उन्होंने उन निशानों का पीछा किया। वे आगे बढ़ गये। तीन मील बाद वह रास्ता टूट गया था, पुल गिर गया था, और उन्हें वापिस लौटने के सिवाय कोई उपाय न था। उनमें से एक ने दूसरे को कहा, हमने तख्ती पर भरोसा क्यों नहीं किया? दोनों वापिस लौटे तो तख्ती की दूसरी तरफ नजर पड़ी, जहां लिखा था, 'अब भरोसा आया न कि रास्ता बंद है?'
जब तुम दूसरे के दुख में दुख प्रगट करो और तुम्हारी आंखों में आंसू भी बहें और तुम वे शब्द भी बोलो जो दूसरे के लिए सांत्वना हैं, तब भी तुम गौर करना। और तुम पाओगे, भीतर तुम हंस रहे हो, भीतर तुम प्रसन्न हो। यह इतना दुखद है और अहंकार को इससे इतनी चोट लगती है कि मैं और ऐसा कर सकता हूं?
शिकायत
कथा :
एक फकीर बहुत दिनों तक एक बादशाह के साथ था। और बादशाह का बड़ा प्रेम उस फकीर पर हो गया। इतना प्रेम हो गया कि बादशाह सोता भी रात, तो फकीर को अपने कमरे में ही सुलाता। दोनों सदा साथ होते। एक दिन शिकार पर गए थे, भटक गए मार्ग। दिनभर के भूखे-प्यासे एक वृक्ष के नीचे पहुंचे। लेकिन एक ही फल वृक्ष में लगा था। बादशाह ने अपने घोड़े पर से हाथ बढ़ाकर फल तोड़ा। लेकिन जैसी उसकी आदत थी, पहले फकीर को खिलाता था कुछ भी--प्रेम से। फल की उसने फांकें काटीं, छह टुकड़े किए, एक फकीर को दिया।
फकीर ने खाया और उसने कहा कि बहुत स्वादिष्ट, अदभुत! ऐसा फल कभी खाया नहीं। एक फांक और दे दें। दूसरी फांक भी फकीर खा गया। कहा, बहुत अदभुत! सम्राट से कहा, एक फांक और दे दें। सम्राट को थोड़ी ज्यादती तो मालूम पड़ी। फल था एक, भूखे थे दोनों। लेकिन तीसरी फांक भी दे दी। फकीर ने कहा, बहुत खूब, एक फांक और! सम्राट को जरा कठिन मालूम पड़ा, लेकिन फिर भी एक फांक और दे दी। फिर आखिर में तो एक ही फांक बची। फकीर ने कहा, बस, एक और! सम्राट ने कहा, ज्यादती कर रहे हो। मैं भी भूखा हूं! फकीर ने हाथ से फांक छीन ली। सम्राट ने कहा, रुक जाओ। फांक वापस लौटा दो। यह सीमा के बाहर हो गया। मेरा तुम पर प्रेम है, इसका क्या मतलब, तुम्हारा मुझ पर जरा भी प्रेम नहीं?
सम्राट ने हाथ से फांक वापस छीन ली; मुंह में रखी। कड़वी जहर थी। थूक दी। कहा, पागल तो नहीं हो! तुम पांच फांकेंखा क्यों गए? और शिकायत क्यों न की? उस फकीर ने कहा कि जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, उनकी एक छोटे-से कड़वे फल की शिकायत? और इसीलिए सब फांकें लेता गया कि कहीं पता न चल जाए, अन्यथा शिकायत पहुंच ही गई। जिन हाथों से इतने मीठे फल खाने को मिले, उन हाथ से एक छोटी-सी कड़वी फांक की शिकायत!
ऐसा व्यक्ति संतुष्ट हो सकता है। संतोष की भी अपनी केमिस्ट्री है, अपनी कीमिया है, अपना गणित है।
अगर आप यह सोचते है की कोई और आपको प्रसन्न या अप्रसन्न कर सकता है तो यह सोच बहुत हास्यास्पद है ।
फकीर जुन्नैद एक रास्ते से गुजरता था। रास्ते में एक पत्थर जोर से पैर से टकराया। पैर लहूलुहान हो गया । जुन्नैद नीचे झुक गया और हाथ जोड़कर परमात्मा की तरफ धन्यवाद देने लगा। साथ में मित्र थे, उन्होंने कहा, जुन्नैद पागल तो नहीं हो गए! हमने कभी सुना नहीं कि किसी के पैर में पत्थर लगे, लहू गिरे, और वह परमात्मा को धन्यवाद दे! जुन्नैद ने कहा, फांसी भी लग सकती थी। धन्यवाद देते हैं परमात्मा को कि सिर्फ पैर में पत्थर लगा और निपटे।
जुन्नैद को अगर फांसी भी लग जाए, तो भी वह धन्यवाद दे पाता; क्योंकि फांसी से बड़े दुख भी हैं।
हमारी नींद आध्यात्मिक है। शारीरिक नींद तो दिन में टूट जाती है, लेकिन आध्यात्मिक नींद दिन में भी जारी रहती है।
तादात्म्य
कथा :
पावलव ने बहुत से प्रयोग किए। एक प्रयोग पावलव का सारी दुनिया में प्रसिद्ध है बच्चे भी जानते हैं। एक कुत्ते को वह खाना खिलाता है, साथ में घंटी बजाता है। पंद्रह दिन तक रोटी दी जाती। रोटी सामने आती; कुत्ते की लार टपकती; पावलव घंटी बजाता। फिर सोलहवें दिन रोटी नहीं आती; पावलव घंटी बजाता; कुत्ते के मुंह से लार टपकती। अब घंटी से लार टपकने का कोई नैसर्गिक संबंध नहीं है। घंटी से कहीं लार टपकती है किसी की? और कुत्ते को तो धोखे में डालना मुश्किल है। घंटी से क्या लेना-देना?
लेकिन पंद्रह दिन तक जब भी रोटी सामने आई, घंटी बजी; घंटी और रोटी साथ-साथ जुड़ गईं। घंटी और रोटी दो चीजें न रहीं, एक चीज हो गईं। अब आज सिर्फ घंटी बजी, तो रोटी का स्मरण आ गया; लार टपकने लगी! कुत्ते का शरीर भी प्रभावित हो गया, एसोसिएशन से।
हम भी ऐसे ही जीते हैं।
एक लोमड़ी सुबह-सुबह निकली अपनी गुफा से । उगता सूरज! उसकी बड़ी छाया बनी । लोमड़ी ने सोचा, आज तो नाश्ते में एक ऊंट की जरूरत पड़ेगी । छाया देखी अपनी तो स्वभावत: सोचा कि ऊंट से कम में काम न चलेगा । खोजती रही ऊंट को । ऊंट को खोजते-खोजते दोपहर हो गई । अब कहीं लोमडियां ऊंट को खोज सकती हैं! और खोज भी लें तो क्या करेंगी?
दोपहर हो गई, सूरज सिर पर आ गया तो उसने सोचा, अब तो दोपहर भी हुई जा रही है, नाश्ते का वक्त भी निकला जा रहा है । नीचे गौर से देखा, छाया सिकुड़ कर बिलकुल नीचे आ गई । तो उसने सोचा, अब तो एक चींटी भी मिल जाए तो भी काम चल जाएगा ।
ये छायाएं जो तुम्हारी वासना की बन रही हैं, ये बहुत बड़ी हैं । हाथी की तरह बड़ी हैं । और इनको तुम पूरा करने चले हो, ऊंट की तलाश कर रहे हो । एक दिन पाओगे, समय तो ढल गया, नाश्ता भी न हुआ, ऊंट भी न मिला । तब गौर से नीचे देखोगे तो पाओगे, छाया बिलकुल भी नहीं बन रही है ।
वासना सिर्फ एक भुलावा है, एक दौड़ है । दौड़ते रहो, दौड़ाए रखती है । रुक जाओ, गौर से देखो, थम जाती है । समझ लो, विसर्जित हो जाती है ।
एक रास्ते से मैं गुजर रहा था, अचानक एक भिखमंगे की आवाज मेरे कानों में पड़ी। बात ही कुछ ऐसी थी कि मैं रुक गया, और सुनने जैसी बात थी। एक सज्जन गुजर रहे थे, भिखमंगा उनसे भीख देने का आग्रह कर रहा था कि कुछ भी दे जाओ, दो पैसे सही। भले आदमी थे, खीसे में हाथ डाला, लेकिन घूमने निकले थे शाम को, कोई पैसे खीसे में थे नहीं। तो कहा, माफ करना, पैसे खीसे में हैं नहीं; दुबारा जब आऊंगा, तो खयाल से पैसे ले आऊंगा। तो उस भिखमंगे ने कहा, मार जा, तू भी मार जा मेरे पैसे! इसी तरह वायदा कर—करके लोग लाखों रुपए मार चुके हैं।
शरीर बांधता है, साधक अपने को शरीर से मुक्त करता है। वह निरंतर अनुभव करने की कोशिश करता है, क्या मैं शरीर हूं? क्या सच में ही मैं शरीर हूं या शरीर से भिन्न हूं?
ईमानदार
कथा :
गांधी की आत्मकथा काम की हो सकती है स्वाध्याय करने वाले को, क्योंकि उसमें असत्य की बहुत स्वीकृतियां हैं। उसमें भीतर के रोगों के बहुत स्वीकार हैं।
गांधी बता पाते हैं कि पिता मर रहे हैं, पैर दबा रहा हूं; चिकित्सकों ने कहा है, यह रात आखिरी होगी; लेकिन बारह बजे के करीब कामवासना भारी हो जाती है। कल भी भोगा था पत्नी को, परसों भी भोगा था, आज भी भोगने का मन है। बाप मर रहा है! बाप की मृत्यु भी वासना से नहीं छुड़ा पाती!
चकमा करके--कोई पूछता है कि बहुत थक गए होओगे, मैं हाथ-पैर दबा दूं? थके नहीं हैं, क्योंकि थका आदमी कामवासना के लिए आतुर नहीं होता। मौका पाकर कि किसी ने कहा कि मैं पैर दबा दूं, गांधी वहां से खिसक गए। एक ही दीवाल का फासला था। उस पार वह पत्नी के साथ संभोग में रत हो गए। और पत्नी गर्भिणी है, प्रेगनेंट है। चार ही दिन बाद उसको बच्चा हुआ, हालांकि मरा हुआ हुआ या होते ही मर गया। होने वाला था। यह मृत्यु भी, यह हिंसा भी कहीं न कहीं गांधी को जीवनभर पीड़ा देती रही।
जब वे संभोग में हैं, तभी पिता की मृत्यु हो गई। हाहाकार घर में मच गया, रोना-चिल्लाना। इसलिए जिंदगीभर फिर ब्रह्मचर्य की आकांक्षा रही।
काम के प्रति गांधी का जो इतना गहरा विरोध है, उसमें वह घटना भीतर बैठ गई मन में; वह गहरी उतर गई। बाप की हत्या जुड़ गई संभोग के साथ। और पिता फिर दुबारा नहीं मिल सके। मन पर अपराध का भाव, गिल्ट बैठ गई। गांधी उसगिल्ट से जिंदगीभर मुक्त नहीं हुए। गांधी जिंदगीभर अपराध-भाव से पीड़ित रहे। लेकिन आदमी ईमानदार थे; नीयत उनकी साफ थी; स्वीकार सब कर लिया।
आज से पचास साल पहले तक, अंग्रेज मजिस्ट्रेट्स ने बस्तर रियासत के अपने संस्मरणों में कहा है--पचास साल पहले के, उन्नीस सौ दस के संस्मरण में--कि बस्तर में अगर कोई आदमी किसी की हत्या कर दे, तो वह खुद अदालत में चला आता था, उन्नीस सौ दस तक! और आकर कह देता था कि मैंने हत्या कर दी है, मेरी क्या सजा है? मजिस्ट्रेट्स ने लिखा है कि हम मुश्किल में पड़ते थे कि इस आदमी को सजा दें तो कैसे दें! पुलिस भेजनी नहीं पड़ती थी। पुलिस भेजकर बहुत देर लगाती; वह खुद ही आ जाता था! कोई आदमी चोरी कर लेता, उन्नीस सौ दस तक भी बस्तर में, तो वह आकर अदालत में खड़ा हो जाता कि मैंने चोरी कर ली है; मेरी सजा क्या है?
एक मजिस्ट्रेट ने लिखा है कि मैंने एक चोर को कहा भी कि तुमको जब हमने पकड़ा नहीं, हमें पता नहीं चोरी का; चोरी की कोई रिपोर्ट नहीं की गई है, तो तुम किसलिए आए हो? उसने कहा, जिसकी चोरी की गई है, उसका इतना नुकसान नहीं हुआ है; कुछ पैसे ही चोरी गए हैं। मैंने चोरी की, मेरा बहुत नुकसान हो गया। और जब तक मुझे दंड न मिले, तब तक मैं बाहर कैसे होऊंगा उस नुकसान से!
अब ऐसे व्यक्ति अगर रहे हों, और थे, क्योंकि आज उन्नीस सौ दस में बस्तर जैसा था, कृष्ण के जमाने में पूरी पृथ्वी वैसी थी; तो उस दिन स्वाध्याय के सूत्र का सिर्फ उल्लेख किया है कृष्ण ने, चलते हुए। उसका कोई बहुत मूल्य नहीं था। हां,कोई जटिल, कोई बहुत चालाक, कोई बेईमान, कोई बहुत धोखेबाज आदमी सदा थे। उन आदमियों को स्वाध्याय की जरूरत पड़ सकती थी। आज वैसे लोग ही अधिक हैं। आज स्वाध्याय सर्वाधिक निकटतम प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति आगे जाएगा।
एक पति मरा-स्वभावत: घटना अमरीका की है - इश्योरेंस कंपनी का आदमी आया, उसने एक लाख डालर का चेक पत्नी को दिया । पति का बीमा था । पत्नी ने कहा, धन्यवाद । अगर मेरा पति मुझे वापस मिल जाए तो इसमें से आधी राशि मैं अभी भी लौटा सकती हूं -- आधी! वह भी पूरी न लौटा सकी । पति वापस मिलने को है भी नहीं, पति तो मर गया । इसमें से अभी भी आधी राशि वापस लौटा सकती हूं!
एक ईसाई फकीर रविवार को चर्च में बोलता था और उसने कहा, अगले रविवार को सत्य के ऊपर मैं व्याख्यान दूंगा, लेकिन सबसे मेरी प्रार्थना है कि ल्यूक का अड़सठवां अध्याय पढ़कर आना । और जब वह बोलने खड़ा हुआ दूसरे रविवार को तो उसने खडे होकर कहा कि भाइयों, जिन लोगों ने Luke का 68th अध्याय पढ़ लिया हो, वे सब हाथ उठा दें । एक को छोड़कर सब लोगों ने हाथ उठा दिये । उस फकीर की आंखों से आंसू गिरने लगे । उसने कहा, अब सत्य पर बोलने से क्या सार है? क्योंकि Luke का 68th अध्याय है ही नहीं, तुम पढ़ोगे कैसे! किसी ने Bible थोड़े ही उठायी, किसी ने खोली थोड़े ही । कौन इन पंचायतों में पड़ता है! अब सत्य पर, उसने कहा, क्या खाक बोलूं? अब असल पर ही बोलना ठीक है । मगर फिर भी धन्यभाग कि कम से कम एक आदमी तो हाथ नहीं उठाया । वह आदमी खडा हुआ, उसने कहा कि मैं जरा कम सुनता हूं, आपने क्या पूछा? आप उस 68th अध्याय के संबंध में तो नहीं पूछ रहे हैं? वह तो मैंने पढ़ा है ।
सत्य की चर्चा चलती है, जो असत्य में निष्णात हैं उनको समझाया जाता है । अहिंसा की बात उठती है, क्योंकि लोग हिंसा में डूबे हैं । लोग बेईमान हैं, ईमानदारी समझानी पड़ती है । लोग पापी हैं, इसलिए पुण्य का गुणगान गाना पड़ता है । अन्यथा इनकी क्या जरूरत!
लाओत्से के पास कथा है कि कनफ्यूशियस मिलने गया था । कनफ्यूशियस, इस पृथ्वी पर जो नैतिक विचारक हुए हैं, उनमें श्रेष्ठतम है । नैतिक विचारक, धार्मिक नहीं! कनफ्यूशियस कोई धार्मिक विचारक नहीं है, नैतिक विचारक, moral thinker । कनफ्यूशियस उन लोगों में से है, जिन्होंने सिर्फ, मनुष्य कैसे अच्छा हो, इस संबंध में गहनतम चिंतन और विचार किया है ।
स्वभावतः, कनफ्यूशियस लाओत्से से मिलने गया, यह सुन कर कि लाओत्से बहुत बड़ा धार्मिक व्यक्ति है, तो मैं लाओत्से से प्रार्थना करूं कि तुम भी लोगों को समझाओ कि वे अच्छे कैसे हो जाएं, ईमानदार कैसे हो जाएं, चोरी क्यों न करें, कैसे चोरी से बचें, कैसे अचोर बनें, कैसे क्रोध छोड़ें, कैसे क्षमावान बनें, हिंसा कैसे मिटे, अहिंसा कैसे आए, तुम भी लोगों को समझाओ ।
तो कनफ्यूशियस लाओत्से से मिलने गया । लाओत्से अपने झोपड़े के बाहर बैठा है । कनफ्यूशियस ने कहा, लोगों को समझाओ कि वे अच्छे कैसे हो जाएं । लाओत्से ने कहा, जब तक बुराई न हो, तब तक लोग अच्छे कैसे हो सकेंगे? बुराई होगी तो ही लोग अच्छे हो सकेंगे । तो मैं तो यह समझाता हूं कि बुराई कैसे न हो, अच्छे की मैं फिक्र नहीं करता हूं । मैं तो वह स्थिति चाहता हूं, जहां अच्छे का भी पता नहीं चलता है कि कौन अच्छा है ।
कनफ्यूशियस की समझ में कुछ भी न पड़ा । कनफ्यूशियस ने कहा, लोग बेईमान हैं, उन्हें ईमानदारी समझानी है । लाओत्से ने कहा कि जिस दिन से तुमने ईमानदारी की बात की, उसी दिन से बेईमानी प्रगाढ़ हो गई है । मैं वह दिन चाहता हूं जहां लोग ईमानदारी की बात ही नहीं करते ।
कनफ्यूशियस की फिर भी समझ में न आया । किसी नैतिक चिंतक की समझ में न आएगा यह सूत्र । क्योंकि नैतिक चिंतक ऐसा मानता है कि बुराई और भलाई विपरीत चीजें हैं; बुराई को काट दो, तो भलाई बच रहेगी ।
लाओत्से ऐसा मानता है कि बुराई और भलाई एक ही चीज के दो पहलू हैं । तुम एक को न काट पाओगे । अगर फेंको तो दोनों को फेंक दो; बचाओगे तो दोनों बच जाएंगी । अगर तुमने चाहा कि भलाई बच जाए, तो बुराई पीछे से मौजूद रहेगी । क्योंकि भलाई बुराई के बिना बच नहीं सकती । और तुमने चाहा कि हम ईमानदार को आदर दें, तो तुम तभी दे पाओगे, जब बेईमान मौजूद रहें ।
यह बहुत समझने जैसी बात है । सच में ही अगर कोई बेईमान न रह जाए, तो ईमानदार का कोई आदर होगा? कोई चोर न रह जाए, तो साधु की कोई प्रतिष्ठा होगी? इसका अर्थ यह हुआ कि अगर साधु को प्रतिष्ठित रहना हो, तो चोर को बनाए ही रखना पड़ेगा । और जीवन के रहस्यों में एक यही है कि साधु निरंतर चोर के खिलाफ बोल रहा है, लेकिन उसे पता नहीं है कि चोर की वजह से ही वह पहचाना जाता है । चोर की वजह से ही वह है । असाधु नहीं, तो साधु खो जाएगा । साधु का अस्तित्व असाधु के आस-पास ही हो सकता है, उसके बीच में ही हो सकता है ।
लाओत्से कहता है, धर्म तो तब था दुनिया में, जब साधु का पता ही नहीं चलता था । लाओत्से की बात बहुत गहरी है । वह यह कहता है, धर्म तो तब था दुनिया में, जब साधु का कोई पता ही नहीं चलता था । जब शुभ का कोई खयाल ही नहीं था कि अच्छाई क्या है । जब कोई समझाता ही नहीं था कि सत्य बोलना धर्म है । जब कोई किसी से कहता ही नहीं था कि हिंसा पाप है । जिस दिन अहिंसा को बनाओगे पुण्य, जिस दिन सत्य को कहोगे धर्म, उसी दिन उनसे विपरीत गुण अपनी पूरी सामर्थ्य से मौजूद हो जाते हैं ।
लाओत्से ने कनफ्यूशियस से कहा कि तुम सब भले लोग शांत हो जाओ, तुम दुनिया में भलाई की बातें बंद करो । और तुम पाओगे कि अगर तुम भलाई को बिलकुल छोड़ने में समर्थ हो, तो बुराई छूट जाएगी ।
लेकिन कनफ्यूशियस नहीं समझ पाएगा । न कोई और नैतिक व्यक्ति समझ पाएगा । वह कहेगा, यह तो और बुरा हो जाएगा । हम किसी तरह भलाई को समझा-बुझा कर, पकड़ कर, श्रम-चेष्टा करके, बचा कर रखते हैं । और लाओत्से यह कह रहा है कि तुम भलाई को बचाते हो, साथ ही बुराई बच जाती है । ये दोनों संयुक्त हैं । इनमें से एक को बचाना संभव नहीं है । या तो दोनों बचेंगे या दोनों हटा देने पड़ेंगे ।
लाओत्से कहता है, धर्म की अवस्था वह है, जहां दोनों नहीं रह जाते । इसको वह कहता था, सरल ताओ, स्वभाव का, धर्म का जगत । इसे वह कहता था, मनुष्य अगर अपने पूरे स्वभाव में आ जाए, तो न वहां बुराई है, न वहां भलाई है । वहां ऐसा मूल्यांकन नहीं है, valuation नहीं है । वहां न निंदा है, न प्रशंसा है । वहां न कुछ सुंदर है, न कुछ कुरूप है । वहां चीजें जैसी हैं वैसी हैं ।
इसलिए अक्सर ऐसा होता है, जो व्यक्ति जितना सौंदर्य के बोध से भर जाता है, उतनी कुरूपता उसे पीड़ित करने लगती है । क्योंकि संवेदनशीलता एक साथ ही बढ़ती है । मैंने कहा कि ऐसा होना सुंदर है, तो उससे विपरीत सब कुरूप हो जाएगा । मैंने जरा सा भी तय किया एक पक्ष में कि दूसरे पक्ष में भी उतना ही तय हो जाता है ।
तो लाओत्से कहता है, when people of earth know beauty as beauty, there arises the recreation of ugliness, जब पृथ्वी के लोग पहचानने लगते हैं कि सौंदर्य यह रहा, , उसी क्षण वह जो कुरूप है, वह जो विरूप है, उसकी प्रत्यभिज्ञा शुरू हो जाती है, उसकी पहचान शुरू हो जाती है । when people of earth know good as good, there arises the recreation of evil, और जब शुभ को शुभ पहचानने लगते हैं पृथ्वी के लोग, वहीं अशुभ की पहचान शुरू हो जाती है ।
बड़ा कठिन सूत्र है । इसका अर्थ यह है कि अगर पृथ्वी पर हम चाहते हैं कि सौंदर्य हो, तो सौंदर्य को सौंदर्य की तरह पहचानना उचित नहीं है । पहचानना ही उचित नहीं है, क्योंकि पहचानने में कुरूप के मूल्य का उपयोग करना पड़ता है । अगर कोई आपसे पूछे, सौंदर्य क्या है? तो आप यही कहेंगे न कि जो कुरूप नहीं है । सौंदर्य को पहचानने में बिना कुरूप के कोई उपाय नहीं है । अगर कोई आपसे पूछे कि साधु कौन है? तो आप यहीं कहेंगे न कि जो असाधु नहीं है । साधु को पहचानने में असाधु को परिभाषा के भीतर लाना पड़ता है । और सौंदर्य की पहचान में कुरूपता की सीमा-रेखा बनानी पड़ती है ।
तो लाओत्से कहता है, सौंदर्य को सौंदर्य की तरह जब नहीं पहचाना जाता--सौंदर्य तो होता ही है, लेकिन जब उसे कोई पहचानता नहीं--जब कोई उस पर लेबल नहीं लगाता, नाम नहीं देता कि यह रहा सौंदर्य, जब सौंदर्य अनाम है, तब कुरूपता पैदा नहीं होती । और जब कोई शुभ को शुभ का नाम नहीं देता, शुभ को कोई सम्मान नहीं मिलता, शुभ को कोई आदर नहीं देता, शुभ को कोई पहचानता भी नहीं, तब अशुभ का कोई उपाय नहीं है । द्वंद्व के बाहर भी एक शुभ है, द्वंद्व के बाहर भी एक सौंदर्य है । पर उस सौंदर्य को सौंदर्य नहीं कहा जा सकता, और उस शुभ को शुभ नहीं कहा जा सकता । उसे कुछ कहने का उपाय नहीं है । उस संबंध में मौन ही रह जाना एकमात्र उपाय है ।
लाओत्से ने कहा, कनफ्यूशियस वापस जाओ! और तुम नैतिक लोग ही इस जगत को विकृत करने वाले हो । You are the mischief makers । तुम जाओ । तुम कृपा करो, किसी को शुभ बनाने की तुम कोशिश मत करो । क्योंकि तुम्हारे शुभ बनाने की कोशिश से लोग सिर्फ अशुभ में उतरेंगे ।
पहला अपेक्षा है जिज्ञासा अनुभव की -- उत्तर की नहीं, फिलासफी की नहीं, दर्शन की नहीं, प्राणों की। सिर्फ जानने की नहीं, पाने की। सिर्फ पाने की भी नहीं, होने की। दूसरी अपेक्षा -- हम और कुछ खोने को सदा तैयार हैं, स्वयं को छोड़ने का साहस। तीसरी अपेक्षा -- प्रतीक्षा, अनंत प्रतीक्षा और धैर्य।
एक किशोर ऋषि हरिद्रुमत गौतम के आश्रम में पहुंचा। वह सत्य को जानना चाहता था। ब्रह्म के लिए उसकी जिज्ञासा थी। उसने ऋषि के चरणों में सिर रख कर कहाः 'आचार्य, मैं सत्य को खोजने आया हूं। मुझ पर अनुकंपा करें और ब्रह्मविद्या दें। मैं अंधा हूं और आंखें चाहता हूं।'
उस किशोर का नाम सत्यकाम था।
ऋषि ने उससे पूछाः 'वत्स, तेरा गोत्र क्या है? तेरे पिता कौन हैं? उनका नाम क्या है? '
उस किशोर को न अपने पिता का कोई ज्ञान था, न ही गोत्र का पता था। वह अपनी मां के पास गया और उससे पूछ कर लौटा। और उसकी मां ने जो उससे कहा, उसने जाकर ऋषि को कहा। वह बोलाः 'भगवन! मुझे अपने गोत्र का ज्ञान नहीं है। न ही मैं अपने पिता को जानता हूं। मेरी मां को भी मेरे पिता का ज्ञान नहीं है। उससे मैंने पूछा तो उसने कहा कि युवावस्था में वह अनेक भद्रपुरुषों में रमती और उन्हें प्रसन्न करती रही। उसे पता नहीं कि मैं किससे जन्मा हूं। मेरी मां का नाम जाबाली है। इसलिए, मैं सत्यकाम जाबाल हूं। ऐसा ही आपसे बताने को उसने मुझे कहा है।'
हरिद्रुमत इस सरल सत्य से अभिभूत हो उठे। उन्होंने उस किशोर को हृदय से लगा लिया और बोलेः 'मेरे प्रिय! तू निश्चय ही ब्राह्मण है। सत्य के लिए ऐसी आस्था ही ब्राह्मण का लक्षण है। तू ब्रह्म को जरूर पा सकेगा, क्योंकि जिसमें स्वयं के प्रति सच्चा होने का साहस है, सत्य स्वयं ही उसे खोजता हुआ उसके द्वार आ जाता है।'
स्वाध्याय
कथा :
मां अपने बेटे से कहती है कि बाहर जाओ और देखो कि पप्पू क्या कर रहा है। और जो भी कर रहा हो, कहो कि न करे। किसलिए? पप्पू गलत कर रहा हो, तब समझ में आ सकता है। लेकिन मां को पता भी नहीं कि पप्पू बाहर क्या कर रहे हैं। लेकिन वह भेज रही है कि जाकर कहो कि पप्पू जो भी कर रहा हो, न करे।
अक्सर लगता है कि मां बच्चे के ठीक-ठीक हित के लिए सब कर रही है। लेकिन थोड़ा स्वाध्याय करे, तो पता चलेगा, domination का मजा भी ले रही है, मालकियत का। इसलिए जब बच्चा पैदा हो जाता है किसी पति-पत्नी को, तो पति-पत्नी की कलह थोड़ी हलकी हो जाती है; क्योंकि diversion हो जाता है। बच्चे पर निकलने लगता है मां का, तो पति थोड़ा माफ हो जाता है।
अगर बच्चा बीच में न हो...। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चा scape goat का काम करता है। बाप भी अकड़ दिखा लेता है उसको, मां भी अकड़ दिखा लेती है उसको। वह किसी को अकड़ अभी दिखा नहीं सकता। दिखाएगा वक्त आने पर। लेकिन उसे प्रतीक्षा करनी पड़ेगी अभी। पत्नी पति को नहीं मार सकती, बेटे को पीट देती है।
यहां विश्लेषण और स्वाध्याय की जरूरत है कि यह मैंने, बेटे ने कसूर किया था, इसलिए मैंने मारा है, कि किसी और का चांटा इस पर पड़ा जा रहा है? आमतौर से आप भलीभांति जानते हैं, सब जानते हैं, और बच्चे तो बिलकुल भलीभांति जानते हैं। बच्चे बहुत ही भलीभांति जानते हैं कि मां-बाप में कोई गड़बड़ हो, तो वहां से खिसक जाओ। क्योंकि पति तो नहीं पिटेगा; बेटा पिट जाएगा!
एक स्त्री बहुत कुरूप थी। इसलिए वह किसी आईने के सामने नहीं जाती थी। और अगर कभी भूल-चूक से कोई लोग उसे चिढ़ाने को आईना, किसी का आईना सामने कर देते, तो वह आईने को तत्काल फोड़ देती थी। और कहती थी कि आईना बिलकुल गलत है। इसमें दिखाई पड़ती हूं मैं तो कुरूप हो जाती हूं; जब कि मैं सुंदर हूं। आईना खराब है। दुनिया के सब आईने खराब थे, क्योंकि वह स्त्री सुंदर थी! अपने मन में उसका एक image है।
हम कहेंगे, वह पागल थी। हम आईने नहीं फोड़ते, साधारण आईने हम नहीं फोड़ते। लेकिन बहुत गहरे में, असली जो आईना है स्वाध्याय का, वह हम कभी उठाकर नहीं देखते। क्योंकि वहां हमारा असली रूप प्रकट होगा, और जो बहुत ugly है, कुरूप, बहुत भयानक है।
तुम अगर चौबीस घंटे भी अपना अध्ययन करो तो तुम बड़े चकित हो जाओगे, कि तुम क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो? किसलिए इतना झूठ, किसलिए इतना पाखंड? किसलिए ये चेहरे-मुखौटे? इनसे क्या मिलेगा?
गैलीलियो के दूरदर्शक यंत्र से पोप ने झांकना मना कर दिया था। गैलीलियो कहता था कि यह पृथ्वी चक्कर लगती है सूरज का। और गैलीलियो कहता था कि सारे चांदत्तारे, जैसा शास्त्रों में वर्णित हैं वैसे नहीं हैं, बड़े भिन्न हैं। और इन चांदत्तारों पर देवताओं का वास नहीं है, ये शून्य पड़े हैं। उस पर नाराजगी थी पोप की कि ये गलत बातें हैं, क्योंकि शास्त्र इससे भिन्न बातें कहते हैं। तो वह अपने दूरदर्शक यंत्र को लेकर आया, और उसने पोप से कहा, आप इससे झांककर खुद देख लें। पोप ने कहा कि तू मुझे धोखा देने की कोशिश मत कर। जरूर इसमें कोई कारस्तानी होगी। और जब मेरे पास आंख खुद हैं, तो मैं इससे क्यों झांकूं?
पोप डरा कि हो सकता है इससे झांकने पर जो गैलीलियो कहता है वह सही हो। हम सब भी डरते हैं झांकने से। स्वाध्याय से हम बहुत भयभीत होते हैं।
जिंदगी के अंत में तुमको भी यह पता चलेगा। सब तुमने इकट्ठा कर लिया, सब लेबल लगा दिये--सब साज-सामान तैयार है--लेकिन तुम कहां हो?
एक आदमी के संबंध में मुझे मालूम है--एक बड़ा दार्शनिक था। पर करीब-करीब सभी दार्शनिक ऐसे होते हैं। उसकी बड़ी मुसीबत थी। और मुसीबत यह थी कि रात जब वह कपड़े उतारकर रख देता था तो दूसरे दिन सुबह पहनते वक्त भूल जाता था कि कौन सा कपड़ा कहां पहनना है--पाजामा नीचे पहनना कि ऊपर, कमीज नीचे डालना कि ऊपर--बायें, दायें? बंडी अंदर पहनना कि ऊपर--कोट? और कई कपड़े--ठंडे मुल्क का निवासी--मोजा कभी इस पैर का उस पैर में--हाथ का मोजा कभी इस हाथ में, उस हाथ में--सब गड़बड़ हो जाते! इसलिए अक्सर सब कपड़े पहने, मय जूते सोता था।
फिर उसके मित्रों ने कहा कि यह भी हद्द हो गई--इससे तुम सो भी नहीं पाते। उसने कहा, यही तो मुसीबत है; लेकिन अगर सबको उतारकर रख दें तो रात भर बेचैनी रहे--कि सुबह झंझट खड़ी होगी। उन मित्रों ने कहा, तुम ऐसा क्यों नहीं करते कि सभी चीजों पर लेबल लगा दो--ये दायें पैर का जूता, ये बायें पैर का जूता। उसने कहा, यह बात जंचती है कि पहले बंडी, फिर कमीज, फिर कोट--इस तरह, टाई बांधना इस तरह।
उसने एक रात बड़ी मेहनत से सब चीजें लिख कर रख दीं। और बड़ा प्रसन्न सोया, नग्न सोया उस रात। और बिलकुल आनंद से सोया कि अब कोई डर नहीं है।
सुबह सब चीजें ठीक थीं--सब उसने एक-एक चीजें देखी--सब लिखी हैं--सब बिलकुल ठीक हैं। तभी उसे अचानक खयाल आया कि एक बात तो मैं भूल गया--किसको पहनानी हैं ये?
अध्ययन करना अपना। शास्त्र के अध्ययन से कुछ न होगा। असली शास्त्र तुम हो।
होश
कथा :
स्वामी राम अमेरिका की एक सड़क से गुजर रहे हैं। कुछ लोगों ने गालियां दीं; और कुछ लोगों ने मजाक किया। हंसते हुए लौटे। जहां ठहरे थे, वहां खिलखिलाकर आकर हंसने लगे। तो घर के लोग चिंतित हुए। उन्होंने कहा, क्या हो गया? अकारण हंसते हैं! राम ने कहा, अकारण नहीं हंसता। आज बड़ा ही मजा आया। रास्ते में ऐसा हुआ कि कुछ लोग राम को मिल गए।
घर के लोग थोड़े हैरान हुए। वे राम की भाषा से परिचित न थे। राम को मिल गए! ऐसा खुद राम कह रहे हैं?
और फिर वे लोग राम को गालियां देने लगे और हंसी-मजाक करने लगे। राम बड़ी मुश्किल में पड़े। राम बड़ी दिक्कत में पड़ गए। उनकी हंसी-मजाक और उनकी गाली के बीच--ऐसा राम कहने लगे--कि राम बड़ी मुश्किल में पड़े। हम भी खड़े देखते थे। राम बड़ी मुश्किल में पड़े। वे लोग गाली देने लगे। तो घर के लोगों ने कहा, आप बातें कैसी कर रहे हैं! होश में तो हैं? नशा वगैरह तो नहीं किया है!
राम ने कहा, नशे में तुम हो! मैं होश में हूं, इसीलिए ऐसी बात कर रहा हूं। नशे में होता, तो मेरी आंख से आग निकल रही होती और मुंह से गालियां निकल रही होतीं। नशे में होता, तो मैं समझ जाता कि वे मुझे ही गाली दे रहे हैं, मुझ पर ही हंस रहे हैं। होश में था, इसलिए मैंने देखा, राम को गाली पड़ रही है, राम पर हंस रहे हैं। हम खड़े देखते रहे।
जागने वाले की रात लम्बी हो जाती है, थके हुए का योजन लंबा हो जाता है; सद्धर्म को न जानने वाले मूर्ख के लिए संसार लंबा हो जाता है ।
बुद्ध के जीवन में एक उल्लेख है । एक भिक्षु यात्रा को जा रहा है । उस भिक्षु ने बुद्ध को कहा कि प्रभु, मार्ग के लिए कोई निर्देश हों तो मुझे दे दें; क्योंकि महीनों दूर रहूंगा, पूछ भी न सकूंगा । तो बुद्ध ने कहा, एक काम करना । रास्ते पर स्त्री मिले तो देखना मत, आंख नीचे करके निकल जाना । वह भिक्षु बोला, जैसी आज्ञा ।
लेकिन बुद्ध का दूसरा शिष्य आनंद बैठा था । और आनंद की बड़ी कृपा है मनुष्य जाति पर । क्योंकि उसने बड़े अनूठे, वक्त-बेवक्त, बेबूझ, कभी असंगत-अनर्गल प्रश्न भी पूछे । उसने कहा, प्रभु रुकें । कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि देखना पड़े या देख कर ही तो पता चलेगा कि स्त्री है, फिर आंख झुकानी । पहले से तो पता कैसे चल जाएगा? आखिर.. पहले तो देख ही लेंगे कि स्त्री आ रही है । अब तो देख ही चुके । आप कहते हैं, स्त्री को देख कर आंख नीचे झुका लेना, मगर देख तो चुके ही, उस हालत में क्या करना?
तो बुद्ध ने कहा, अगर देख चुके हो, कोई हर्ज नहीं, छूना मत । आनंद ने कहा, और कभी ऐसा भी हो सकता है कि छूना पड़े । अब एक स्त्री गिर गई हो रास्ते पर और हमारे सिवाय कोई नहीं । उसे उठाएं, न उठाएं? आप कहते हैं, करुणा, दया-क्या हुआ करुणा-दया का? तो बुद्ध ने कहा, ठीक, ऐसी कोई घड़ी आ जाए तो छू लेना, मगर होश रखना ।
बुद्ध ने कहा, असली बात तो होश रखना है । यह भिक्षु कमजोर है, इससे मैंने कहा, देखना मत । थोड़ा हिम्मतवर आदमी हो तो उससे मैं यह भी नहीं कहता कि देखना मत । और थोड़ा हिम्मतवर हो, उससे मैं यह भी नहीं कहता कि छूना मत । और थोड़ा हिम्मतवर हो तो उसे मैं कुछ भी आज्ञा नहीं देता । लेकिन एक ही बात-होश रखना ।
ऐसा हुआ, एक बार वर्षाकाल शुरू होने के पहले एक भिक्षु राह से गुजर रहा था और एक वेश्या ने उससे निवेदन किया कि इस वर्षाकाल मेरे घर रुक जाएं । उस भिक्षु ने कहा, मैं अपने गुरु को पूछ लूं । उसने यह भी न कहा कि तू वेश्या है । उसने यह भी न कहा कि तेरे घर और मेरा रुकना कैसे बन सकता है? उसने कुछ भी न कहा । उसने कहा, मेरे गुरु को मैं पूछ आऊं । अगर आज्ञा हुई तो रुक जाऊंगा ।
वह गया और उसने भरी सभा में खड़े होकर बुद्ध से पूछा कि एक वेश्या राह पर मिल गई और कहने लगी कि इस वर्षाकाल मेरे घर रुक जाएं । आपसे पूछता हूं । जैसी आज्ञा! बुद्ध ने कहा, रुक जाओ । बड़ा तहलका मच गया । बड़े भिक्षु नाराज हो गए । यह तो कई की इच्छा थी । इनमें से तो कई आतुर थे कि ऐसा कुछ घटे । वे तो खड़े हो गए । उन्होंने कहा, यह बात गलत है । सदा तो आप कहते हैं, देखना नहीं, छूना नहीं और वेश्या के घर में रुकने की आज्ञा दे रहे हैं?
बुद्ध ने कहा, यह भिक्षु ऐसा है कि अगर वेश्या के घर में रुकेगा तो वेश्या को डरना चाहिए; इस भिक्षु को डरने का कोई कारण नहीं है । खैर, चार महीने बाद तय होगी बात, अभी तो रुक ।
वह भिक्षु रुक गया । रोज-रोज खबरें लाने लगे दूसरे भिक्षु कि सब गड़बड़ हो रहा है । रात सुनते हैं, दो बजे रात तक वेश्या नाचती थी, वह बैठ कर देखता रहा । कि सुनते हैं कि वह खान-पान भी सब अस्तव्यस्त हो गया है । कि सुनते हैं, एक ही कमरे में सो रहा है । ऐसा रोज-रोज बुद्ध सुनते, मुस्कुरा कर रह जाते । उन्होंने कहा, चार महीने रुको तो! चार महीने बाद आएगा ।
चार महीने बाद भिक्षु आया, उसके पीछे वेश्या भी आई । वेश्या, इसके पहले कि भिक्षु कुछ कहे, बुद्ध के चरणों में गिरी । उसने कहा कि मुझे दीक्षा दे दें । इस भिक्षु को भेज कर मेरे घर, आपने मेरी मुक्ति का उपाय भेज दिया । मैंने सब उपाय करके देख लिए इसे भटकाने के, मगर अपूर्व है यह भिक्षु । मैंने नाच देखने को कहा तो इसने इनकार न किया । मैं सोचती थी कि भिक्षु कहेगा, मैं संन्यासी, नाच देखूं? कभी नहीं! जो कुछ मैंने इसे कहा, यह चुपचाप कहने लगा कि ठीक । मगर इसके भीतर कुछ ऐसी जलती रोशनी है कि इसके पास होकर मुझे स्मरण भी नहीं रहता था कि मैं वेश्या हूं । इसकी मौजूदगी में मैं भी किसी ऊंचे आकाश में उड़ने लगती थी । मैं इसे नीचे न उतार पाई, यह मुझे ऊपर ले गया । मैं इसे गिरा न पाई, इसने मुझे उठा लिया । इस भिक्षु को मेरे घर भेज कर आपने मुझ पर बड़ी कृपा की । मुझे दीक्षा दे दें, बात खतम हो गई । यह संसार समाप्त हो गया । जैसी जागृति इसके भीतर है, जब तक ऐसी जागृति मेरे भीतर न हो जाए तब तक जीवन व्यर्थ है । यह दिया मेरा भी जलना चाहिए ।
बुद्ध ने अपने और भिक्षुओं से कहा, कहो क्या कहते हो? तुम रोज-रोज खबरें लाते थे । मैं तुमसे कहता था, थोड़ा धीरज रखो । इस भिक्षु पर मुझे भरोसा है । इसका जागरण हो गया है । यह जाग्रत रह सकता है ।
असली बात जागरण है । गहरी बात जागरण है । आखिरी बात जागरण है ।
लाओत्से ने अपने एक शिष्य को कुछ पत्ते तोड़ने भेजा, वह पूरी शाखा तोड़ कर ले आया । लाओत्से उसे कहता है, तुझे पता नहीं पागल, कि यह वृक्ष अधूरा हुआ, तो तू भी कुछ कम हुआ । यह यहां सामने खड़ा था पूरा का पूरा, तो हम कुछ और अर्थों में हरे थे । आज इसका घाव हमारे भीतर भी घाव बन गया ।
यदि विचरण करते हुए अपने से श्रेष्ठ या अपने सदृश न मिले, तो दृढ़ता के साथ अकेला ही विचरण करे । मूर्ख से सहायता नहीं मिल सकती ।
एक वृद्ध बुद्धिमान के संबंध में बड़ी खबर थी। एक विश्वविद्यालय के दो युवकों ने सोचा--पिछली कहानी में विश्वविद्यालय के युवक की परीक्षा बूढ़े ने की; इस कहानी में बूढ़े की परीक्षा दो विश्वविद्यालय के युवकों ने की। उन्होंने सुना है कि उस आदमी के पास जाओ, तो वह कुछ भी बता देता है। आपका नाम भी बता देता है। जैसे मुट्ठी में बंद चीज को बूढ़े ने जानना चाहा था, खबर थी कि वह बूढ़ा भी बता देता है; वह बड़ा बुद्धिमान है।
तो वे दोनों युवक एक कबूतर को अपने कोट के भीतर छिपाकर आए हैं। और उस बूढ़े के सामने आकर कहा, क्या आप बता सकते हैं कि हमारे कोट के भीतर क्या है? उसने कहा, मैं बता सकता हूं। वे तैयारी करके आए थे। हाथ भीतर रखा था। उन्होंने पूछा, क्या आप बता सकते हैं कि वह जिंदा है या मुर्दा?
उन्होंने सोचा था कि अगर वह कहे जिंदा, तो अंदर ही गर्दन मरोड़कर बाहर निकालना है। अगर वह कहे मुर्दा, तो जिंदा बाहर निकाल देना है। गर्दन पर हाथ था मजबूत।
बूढ़े ने एक क्षण आंख बंद की और कहा, इट डिपेंड्स। उसने कहा कि यह कई बातों पर निर्भर करेगा कि वह जिंदा है कि मुर्दा। उन्होंने कहा, क्या मतलब? उस बूढ़े ने कहा कि अगर मैं कहूं, वह जिंदा है, तो गर्दन दबाई जा सकती है। अगर मैं कहूं, वह मुर्दा है, तो उसे ऐसे ही बाहर निकाला जा सकता है। लेकिन तुम्हारी मैं फिक्र छोड़ता हूं; कबूतर की फिक्र करता हूं। मैं कहता हूं, वह मुर्दा है। बाहर निकालो। क्योंकि कबूतर न मर जाए नाहक। बूढ़े ने कहा कि मेरी तुम फिक्र छोड़ो। कबूतर की फिक्र करता हूं। मैं कहता हूं, वह मुर्दा है। बाहर निकालो।
यह wisdom है। यह बहुत और बात है। यह बुद्धि और बात है। यह केवल जानकारी नहीं है; यह जीवन के रहस्य का बोध है। यह केवल संग्रह नहीं है ऊपर से; यह भीतर से आया हुआ आविर्भाव है। यह अंतःजागरण है, अंतःस्फूर्ति है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि कल जो मैंने जाना था, उस पर निर्भर है। बल्कि आज भी मेरी चेतना जाग रही है और देख रही है; और जो कहेगी, वह मैं जानूंगा।
'मेरे पुत्र!', 'मेरा धन!' इसमें ही मूढ़ व्यक्ति व्याकुल बना रहता है; अरे, जब यह अपनापा ही अपना नहीं है, तो कहाँ 'मेरे पुत्र!'? कहाँ 'मेरा धन!'?
बांकेई एक दिन अपने बगीचे में गड्ढा खोद रहा था। और किसी ने उससे पूछा कि सदगुरु कहां हैं? अजनबी था आदमी और उसे पता न था कि बांकेई खुद गड्ढा खोद रहा है। और पता चल भी नहीं सकता था। क्योंकि बांकेई जब गड्ढा खोदता था, तब वह गड्ढा खोदने वाला ही हो जाता था। तब वह इतनी समग्रता से खोदता था, कि तुम पहचान ही नहीं सकते थे कि यह आदमी और सदगुरु होगा। वह समग्रता से गड्ढा खोदने वाला ही हो गया था। तो उसने कहा, 'भीतर जाओ। भीतर सदगुरु मिलेंगे।'
वह आदमी भीतर गया। वहां बैठ कर प्रतीक्षा करता रहा। कोई घंटे भर बाद बांकेई अंदर आया। उसकी चाल अलग थी, उसका ढंग अलग था, उसका चेहरा अलग था। उसकी जैसे सारी भाव-भंगिमा बदल गई थी। वह आकर बैठ गया अपने स्थान पर। और उसने कहा, 'अब बोलो। बांकेई आ गया। क्या चाहते हो सदगुरु से?'
वह आदमी थोड़ा बेचैन हुआ। उसने कहा कि अगर मैं किसी धोखे में नहीं पड़ रहा हूं, तो आप मुझे वही आदमी मालूम पड़ते हैं, जो गड्ढा खोद रहा था। लेकिन फिर भी कुछ फर्क हो गया। कुछ पक्का साफ नहीं होता कि क्या मामला है? क्या आप बाहर गड्ढा खोद रहे थे? बांकेई ने कहा, 'हां। तब मैं गड्ढा खोदने वाला था, अब सदगुरु हूं। पूछो, किसलिए आये हो?' उस आदमी ने कहा, 'तो उसी वक्त क्यों नहीं कहा कि तुम्हीं सदगुरु हो?'
बांकेई ने कहा, 'उस वक्त तो गड्ढा खोदने वाले के अतिरिक्त मेरे भीतर कोई भी नहीं था। उस समय शिक्षा देनी संभव न थी। इतना द्वैत मैं नहीं पालता। जब मैं गड्ढा खोदता हूं तो सिर्फ गड्ढा खोदता हूं। उस समय मैं भूल जाता हूं कि कुछ और है। सारा जगत खो जाता है। बस, गड्ढा खोदने की क्रिया ही रह जाती है।'
ऐसी क्रिया ही तो योग है, जिसमें तुम इतने संयुक्त हो गये कि कुछ न बचा बाहर। तुम पूरे डूब गये। तुम एक ऊर्जा हो गये जिससे गड्ढा खोदा जा रहा है। गड्ढा है, ऊर्जा है, खोदना है, लेकिन कोई और नहीं। इतनी एकतानता, इतनी लीनता!
हर आवाज पर खयाल करना, दोहरी तो नहीं है! और दोहरी हो, तो दोहरेपन को छोड़ना।
एक बार चंदूलाल और ढब्बूजी भंग पीकर घूमने निकले। दोनों इंडिया गेट के नजदीक से गुजर रहे थे। चंदूलाल बोले, अरे ढब्बू! आज यह इंडिया गेट इतना झुक गया! इतना कैसे झुक गया? देख, सम्हल कर निकलना, नहीं सिर फोड़ लेगा। यदि हम खड़े-खड़े इसके नीचे से निकलेंगे तो लगता है कि सिर में लगेगा ही। ऐसा करते हैं घुटने-घुटने चल कर इसके नीचे से निकलते हैं।
ढब्बू बोला, हां यार, लगता तो है कुछ दाल में काला है। इंडिया गेट इतना कैसे झुक गया! और दोनों घुटने-घुटने चलने लगे।
कुछ ही दूर पहुंचे होंगे कि चंदूलाल फिर बोले, लगता है ढब्बू, आज इंडिया गेट को कुछ हो गया! देख न, कितना नीचा हो गया! मुझे तो ऐसा लग रहा है कि घुटने-घुटने चलने के बावजूद भी सिर में लग सकता है। ऐसा करें, लेट कर पेट के बल खिसकते हैं।
ढब्बू बोले, हां चंदू, तुम ठीक कहते हो। पेट के बल ही घिसट कर इसे पार करना चाहिए। दोनों पेट के बल घिसटने लगे। भीड़-भाड़ का समय। एक पुलिसवाले ने आकर दोनों के सिर पर एक-एक बेंत रसीद की। चंदूलाल ने क्रोध और आश्चर्य के साथ ढब्बू से कहा, हद हो गई यार! पेट के बल घिसट कर निकल रहे थे, साला तब भी सिर में लग ही गया।
एक बेहोशी की दुनिया है, जहां कुछ भी करके निकलो, सिर फूटने ही वाला है!
औरंगजेब एक फकीर पर बहुत नाराज था। और एक दिन उसने फकीर को पकड़वा कर महल बुलवा लिया। और लोगों ने कहा था, इस फकीर को नाराज करना तक मुश्किल है। औरंगजेब ने कहा, देखेंगे। सर्द रात थी -- दिल्ली की सर्द रात। महल में राग-रंग चलता रहा और फकीर को नग्न करवाकर यमुना में खड़ा करवा दिया। और औरंगजेब ने कहा कि सुबह पूछेंगे।
रातभर फकीर नग्न बर्फीली नदी में खड़ा रहा। सुबह औरंगजेब ने पूछा, 'कहो, कैसी बात?' फकीर ने कहा, 'कुछ तुम जैसी, कुछ तुमसे अच्छी! 'औरंगजेब ने पूछा, 'मैं समझा नहीं', फकीर ने कहा, 'सपने आते रहे। उनमें मै सम्राट था। महलों में था, राग-रंग चल रहा था। उन सपनों में और तुम्हारे राग-रंग में जो महल में चल रहा था, जरा भी भेद नहीं है। मैंने उतना ही मजा लिया, जितना तुम लिये। तो कुछ तुम जैसी, कुछ तुमसे अच्छी; क्योंकि बीच-बीच में होश आ गया और सपना टूट गया। तुम्हें अभी होश जरा भी नहीं आया।'
एक नाव दूर-देश जा रही थी। और यात्रियों के साथ उसमें एक दरिद्र फकीर भी था। कुछ शरारती व्यक्ति उस फकीर को सब भांति परेशान कर रहे थे। वह जब परमात्मा की रात्रिकालीन प्रार्थना में बैठा था तो यह सोचकर कि अब तो वह कुछ भी नहीं कर सकेगा, उन्होंने उसके सिर पर जूते लगाने शुरू कर दिए। वह तो प्रार्थना में था और उसकी आंखों से प्रेम के आंसू बह रहे थे। तभी आकाशवाणी हुईः 'मेरे प्यारे! तू कहे तो नाव उलट दूं।' वे व्यक्ति घबडा गए। और यात्री भी घबडा गए। मनोविनोद तो महंगा पड रहा था। वे सब उस फकीर के पैरों पर गिर क्षमा मांगने लगे। फकीर की प्रार्थना पूरी हुई तो वह उठा और उन लोगों से बोलाः 'घबडाओ मत।' फिर उसने आकाश की ओर मुंह उठाया और कहाः 'मेरे प्यारे प्रभु! यह तू कैसी शैतान की भाषा में बोल रहा है? तू कुछ उलटने की ही लीला करना चाहता है, तो इनकी बुद्धि उलट दे। नाव उलटने से क्या होगा? ' फिर आकाश-घोषणा हुईः 'मैं बहुत खुश हूं। तूने ठीक पहचाना। वह वाणी मेरी नहीं थी। जो शैतान की भाषा पहचान लेता है, वही फिर मेरी भाषा पहचान सकता है।'
दर्द
कथा :
पिछले महायुद्ध में ऐसा हुआ कि फ्रांस में एक सैनिक के पैर में बहुत चोट लगी। वह बेहोश हो गया। चोट ऐसी थी कि पैर बचाया नहीं जा सका। रात बेहोशी में ही घुटने से नीचे का हिस्सा काट दिया गया। अंगूठे में बहुत तकलीफ थी, जब वह होश में था। सुबह जब वापस होश में आया, तो उसने कहा कि मेरे अंगूठे में बहुत तकलीफ है। पर अंगूठा तो अब था ही नहीं! पास की नर्स ने कहा, आप जरा फिर से सोचें। अंगूठे में तकलीफ है? मजाक में ही कहा। उसने कहा, बहुत तकलीफ है।
नर्स ने कंबल उठाकर बताया कि पैर के नीचे का हिस्सा तो अब है ही नहीं। जो अंगूठा नहीं है, उसमें तकलीफ कैसे हो सकती है? उस आदमी ने देखा और उसने कहा कि दिखाई पड़ रहा है मुझे भलीभांति कि पैर घुटने से नीचे का काट दिया गया है; नहीं है। लेकिन फिर भी मुझे अंगूठे में तकलीफ है। मैं भी क्या कर सकता हूं? उस सैनिक ने कहा, अगर अंगूठे में तकलीफ है, तो मैं भी क्या कर सकता हूं?
डाक्टर बुलाए गए। समझा कि कुछ भ्रम हो गया है उस आदमी को। बहुत तकलीफ थी; भूला नहीं है। अब तो हो नहीं सकती। समझाने-बुझाने की कोशिश की। लेकिन उस आदमी ने कहा, मैं पूरे होश में हूं। मुझे दिखाई पड़ रहा है कि अब पैर नहीं बचा, इसलिए तकलीफ होनी नहीं चाहिए। तर्कयुक्त मुझे भी मालूम पड़ती है बात। लेकिन मैं क्या कर सकता हूं! तकलीफ है!
फिर और खोजबीन की गई, तो पाया गया कि वह आदमी ठीक कहता था, तकलीफ थी। तो बहुत मुश्किल हो गई। जो अंगूठा नहीं है, उसमें तकलीफ कैसे हो सकती है? खोजबीन से पता चला कि अंगूठे की तकलीफ जिन तंतुओं के द्वारा मस्तिष्क तक पहुंचती है, वे अभी भी खबर दे रहे हैं। अंगूठा तो बहुत दूर है मस्तिष्क से, बीच में तो तारों का जाल है, जो खबर पहुंचाते हैं। वे कंपते हैं और कंपकर खबर पहुंचाते हैं। वे अभी भी कंप रहे हैं। मस्तिष्क के पास जो छोर है तंतु का, वह अभी भी कंपकर खबर दे रहा है कि दर्द है। अंगूठा नहीं है, और दर्द है!
असल में मस्तिष्क तक चेतना में कोई दर्द नहीं है। चेतना को सिर्फ पता चलता है। अगर पता चलता रहे, तो ऐसा दर्द भी मालूम पड़ेगा, जो नहीं है। और अगर पता न चले, तो ऐसा दर्द भी मालूम नहीं पड़ेगा, जो है।
चेतना सिर्फ ज्ञाता है, knower है, witnessing है। सिर्फ एक साक्षी-भाव है।
कुतूहली उत्तर चाहता है; जिज्ञासु समाधान चाहता है। इसलिए कुतूहली पांडित्य तक पहुंच जाएगा कभी, जिज्ञासु समाधि तक जाएगा।
व्यवस्था
कथा :
कणाद के जीवन में कथा है। कणाद ब्राह्मण का टाइप है। नाम ही कणाद पड़ गया इसलिए कि कभी इतना अनाज भी घर में न हुआ कि संग्रह कर सके; रोज खेत में कण-कण बीन ले; कणों को बीनने की वजह से नाम पड़ गया, कणाद। सम्राट को खबर लगी कि कणाद कण बीन-बीनकर खेतों के खा रहा है। सम्राट ने आज्ञा दी कि भरो रथों को धन-धान्य से! चलो कणाद के पास।
बहुत धन-धान्य को लेकर सम्राट पहुंचा। कणाद के चरणों में सिर रखा और कहा कि मैं बहुत धन-धान्य ले आया हूं। दुख होता है कि मेरे राज्य में आप रहें और आप कण बीन-बीनकर खाएं! आप जैसा महर्षि और कण बीने खेतों में, तो मेरा अपमान होता है।
तो कणाद ने कहा, क्षमा करें! खबर भेज देते; इतना कष्ट क्यों किया? मैं तुम्हारा राज्य छोड़कर चला जाऊंगा। सम्राट ने कहा, आप क्या करते हैं! कैसी बात कहते हैं? आप मेरी बात नहीं समझे! कणाद तो उठकर खड़े हो गए! ज्यादा तो कुछ था नहीं; जो दो-चार किताबें थीं, बांधने लगे।
सम्राट ने कहा, आप यह क्या करते हैं? कणाद ने कहा, तेरे राज्य की सीमा कहां है, वह बता। मैं सीमा छोड़ बाहर चला जाऊं। क्योंकि मेरे कारण तू दुखी हो, तो बड़ा बुरा है। सम्राट ने कहा, यह मेरा मतलब नहीं है। मैं तो सिर्फ यह निवेदन करने आया कि बहुत धन-धान्य लाया हूं, वह स्वीकार कर लें।
कणाद ने कहा, उसे तू वापस ले जा! उसे तू वापस ले जा, क्योंकि उस धन-धान्य की व्यवस्था और सुरक्षा और सुविधा कौन करेगा? उसकी देख-रेख कौन करेगा? हमें फुर्सत नहीं है; हम अपने काम में लगे हैं। थोड़ी-सी फुर्सत मिलती है; सुबह घूमने निकलते हैं; उसी में खेत से कुछ दाने बीन लाते हैं, उससे काम चल जाता है। कोई झंझट हमें है नहीं। तू अपना यह सब वापस ले जा। इसकी फिक्र कौन करेगा? और हम इसकी फिक्र करेंगे कि हम अपनी फिक्र करेंगे, जिस खोज में हम लगे हैं। तू जल्दी कर और वापस ले जा; और दोबारा इस तरफ मत आना। और अगर आना हो, तो खबर कर देना। हम राज्य छोड़कर चले जाएंगे। हम कण कहीं भी बीन लेंगे; सभी जगह मिल जाएंगे।
अब यह जो आदमी है, इसे कण बीनने में सुविधा मालूम पड़ती है, क्योंकि कोई व्यवस्था नहीं करनी पड़ती है; कोई मैनेजमेंट में नाहक समय जाया नहीं करना पड़ता है। नहीं तो बहुत-से मालिक घूम-फिरकर मैनेजर ही रह जाते हैं। लगते हैं कि मालिक हैं, होते कुल-जमा मैनेजर हैं।
आनन्द
कथा :
एक कवि अगर अपने जूते भी पहनता, तो इस भांति, जैसे जूते जीवित हों। अगर वह अपने सूटकेस को बंद करता, तो इस भांति, जैसे सूटकेस में प्राण हों। मैं उसका जीवन पढ़ रहा था। उसका जीवन लिखने वालों ने लिखा है कि हम सब समझते थे, वह पागल है। हम सब समझते थे, उसका दिमाग खराब है। वह दरवाजा भी खोलता, तो इतने आहिस्ते से कि दरवाजे को चोट न लग जाए। वह कपड़े भी बदलता, तो इतने प्रेम से कि कपड़ों का भी अपना अस्तित्व है, अपना जीवन है।
निश्चित ही पागल था, हम तो व्यक्तियों के साथ भी ऐसा व्यवहार नहीं करते कि वे जीवित हैं। आपने कभी अपने नौकर को इस तरह देखा कि वह आदमी है? नहीं देखते हैं। चारों तरफ जीवन है, उसको भी हम मुर्दे की तरह देखते हैं; लेकिन वह कवि, जिन्हें हम साधारणतया मुर्दा चीजें कहते हैं, उन्हें भी जीवन की तरह देखता। मित्र समझते कि पागल है। लेकिन अंत में मित्रों ने जब जीवन उसका उठाकर देखा, तो उन्होंने कहा कि अगर वह पागल था, तो भी ठीक था। और अगर हम समझदार हैं,तो भी गलत हैं। क्योंकि उसकी जिंदगी में दुख का पता ही नहीं है। पूरी जिंदगी में वह कभी दुखी नहीं हुआ।
यह तो बाद में पता चला कि उस आदमी की जिंदगी में दुख की एक भी घटना नहीं है। उस आदमी को कभी किसी ने उदास नहीं देखा। उस आदमी को कभी किसी ने रोते नहीं देखा। उस आदमी की आंखों से आंसू नहीं बहे।
पूरी जिंदगी इतने आनंद की जिंदगी कैसे हो सकी? जब उससे किसी ने पूछा, तो उसने कहा, मुझे पता नहीं। लेकिन एक बात मैं जानता हूं। मैंने अगर पत्थर को भी छुआ, तो इतने प्रेम से कि जैसे वह परमात्मा हो। बस, इसके सिवाय मेरी जिंदगी का कोई राज नहीं है। फिर मुझे सब तरफ से आनंद ही लौटा है।
अहंकार अंधापन है। और अहंकार के छूट जाते ही प्रज्ञा की आंख खुलती है, और जीवन जैसा है वैसा पहली बार दिखाई पड़ता है।
फकीर बोकोजू जंगल में था। उसके ज्ञान की खबर राजधानी तक पहुंच गई। सम्राट उससे मिलने आया। सम्राट आया था मिलने, तो सम्राट था, कुछ भेंट लानी चाहिए। तो एक बहुत बहुमूल्य, लाखों रुपए की कीमत का, एक कोट सिलवा लाया। उसमें लाखों रुपए के हीरे-जवाहरात लगा दिए। बड़ा कीमती वस्त्र था। शायद पृथ्वी पर वैसा खोजना दूसरा मुश्किल हो। सम्राट उसे बड़ी मेहनत से बनवाकर लाया था।
जब सम्राट फकीर के सामने मौजूद हुआ, तो फकीर एक चट्टान पर नग्न, एक वृक्ष से टिका हुआ बैठा है। सम्राट ने चरण छुए, भेंट रखी। फकीर भेंट को देखकर हंसा। फिर फकीर ने ऊपर वृक्ष की तरफ देखा। फिर आस-पास हिरण घूमते थे, उनकी तरफ देखा। फिर आकाश में चीले उड़ती थीं, उनकी तरफ देखा।
उस सम्राट ने कहा, आप क्या देख रहे हैं? तो उसने कहा, मैं यह देख रहा हूं कि तुम्हारा यह कोट मुझे बड़ी दिक्कत में डालेगा। क्योंकि अगर यह कोट तुमने मुझे राजधानी में दिया होता, तो राजधानी में सभी आदमी इस कोट की प्रशंसा करते और कहते कि मैं बहुत महान हो गया हूं, क्योंकि मुझे यह राजा का कोट मिल गया है। लेकिन यहां जंगल में बेपढ़े-लिखे जानवर हैं, असभ्य, इन को कुछ पता नहीं है। मैंने ऊपर देखा इसलिए कि वे जो तोते बैठे हैं, वे हंस रहे हैं। मैंने ऊपर देखा कि वह जो चील उड़ रही है, वह मजाक उड़ाएगी। मैंने हिरण की तरफ देखा, उसकी आंख में शरारत है। आपके जाते ही ये सब कहेंगे, बन गए बुद्ध! कैसे मुक्त थे, कैसे आनंद में थे, नग्न! कैसे स्वतंत्र थे, कैसे परमात्मा की हवाएं सीधा छूती थीं! पहन लिया कोट! और फिर यहां हीरे-जवाहरात का कोई पता रखने वाला भी नहीं है। तो मैं शान भी बघारूंगा, तो किसके सामने? और अकड़कर चलूंगा भी, तो कहां? यहां अगर अकड़कर चलूंगा, तो यह सारा जंगल मुझ पर हंसेगा। तो यहां मैं सम्राट के द्वारा सम्मानित कम और किसी सर्कस का जोकर ज्यादा मालूम पडूगा। यह कोट तुम ले जाओ, इतनी कृपा करो।
जंगल में आपके आस-पास ठंडक देने वाला कोई भी नहीं है, आपके अहंकार को ठंडा करने वाला कोई भी नहीं है, पिघल जाएगा आसानी से। इसलिए सदा से जंगल की ओर भागते रहे लोग।
एक चीनी बादशाह की मौत हुई। वो अपनी विधवा के लिये बैंक में 1.9 मिलियन डालर छोड़ कर गया। विधवा ने जवान नौकर से शादी कर ली । उस नौकर ने कहा -- मैं हमेशा सोचता था कि मैं अपने मालिक के लिये काम करता हूँ, अब समझ आया कि वो हमेशा मेरे लिये काम करता था ।
अस्वीकार की वृत्ति से अशांति पैदा होती है।
छल
कथा :
एक आदमी पर जुर्म था कि उसने गालियां दीं, अपमान किया, उसपर अदालत में मुकदमा चला। वकील ने उससे कहा कि तू बोलना ही मत। तू तो इस तरह की आवाजें करना कि पता चले, गूंगा है। जब मजिस्ट्रेट पूछे, तभी तू गूंगे की तरह आवाजें करना। कहना, आ आ आ। कुछ भी करना, लेकिन बोलना मत।
अदालत में वही किया। फिर मुकदमा जीत गया। मजिस्ट्रेट ने कहा, जो आदमी बोल ही नहीं सकता, वह गालियां कैसे देगा, अपमान कैसे करेगा! वह छूट गया। बाहर आकर वकील ने कहा, मुकदमा जीत गए। अब मेरी फीस चुका दो। उस आदमी ने कहा, आ आ आ! उसने उसी सिक्के में वापस फीस भी चुका दी। उस वकील ने कहा, बंद करो यह बात। यह अदालत के लिए कहा था। उस आदमी ने कहा, आ आ आ। उसने कहा, कुछ समझ आता नहीं कि आप क्या कह रहे हैं? हाथ से इशारा किया, आंख से इशारा किया।
जिंदगी भी उसी सिक्के में हमें लौटा देती है।
सपने में सुख तभी तक आता है, जब तक सत्य मानते रहें।
एक धर्मगुरु स्वर्ग जाने की टिकटें बेचता था-सभी धर्मगुरु बेचते हैं। स्वभावत:, कुछ अमीर खरीदते तो प्रथम श्रेणी की देता। गरीब खरीदते, द्वितीय श्रेणी के। तृतीय श्रेणी भी थी, और जनता-चौथी श्रेणी भी थी। सभी लोगों के लिए इंतजाम स्वर्ग में होना भी चाहिए। तरह-तरह के लोग हैं, तरह-तरह की सुविधाएं होनी चाहिए। काफी धन उसने इकट्ठा कर लिया था लोगों को डरा-डराकर नर्क के भय से। लोग खाना न खाते, पैसा इकट्ठा करते कि टिकट खरीदनी है।
एक रात एक आदमी उसकी छाती पर चढ़ गया जाकर, छुरा लेकर। और उसने कहा, निकाल, सब रख दे! उसने गौर से देखा, वह उसकी ही जाति का आदमी था। उसने कहा, अरे! तुझे पता है, नर्क में सड़ेगा। उसने कहा, छोड़ फिकर, पहली श्रेणी का टिकट पहले ही खरीद लिया है, सब निकाल पैसा। तुमसे ही खरीदा है टिकट।
अपनी हालत का खुद अहसास नहीं है मुझको
मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं ।
युद्ध के समय सेना में जबरदस्ती लोगों को भर्ती किया जा रहा था। उन्हीं लोगों में मुल्ला नसरुद्दीन को भी पकड़ लाया गया था। मुल्ला को सभी परीक्षणों से गुजारा गया और उसने सभी परीक्षणों से बचने की कोशिश की। गलत-सही जवाब दिए, उलटे-सीधे उत्तर लिखे, मगर फिर भी उसे खरा साबित कर दिया गया। उन्हें तो भर्ती करना ही था। मुल्ला परेशान था, क्योंकि वह सेना में भर्ती नहीं होना चाहता था। अंतिम परीक्षण नेत्र-परीक्षण था। मुल्ला को एक बड़े बोर्ड के समक्ष ले जाया गया, जिस पर वर्णमाला के अनेक अक्षर, अनेक चिह्न, अनेक प्रकार के निशान बने हुए थे ।
अच्छा यह तो बताओ जरा नसरुद्दीन कि यह कौन सा अक्षर है? चुनाव अधिकारी ने एक अक्षर की ओर इशारा करते हुए नसरुद्दीन से पूछा। मुल्ला ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा महोदय, मुझे कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा कि वह क्या है। अधिकारी ने पूछा कि तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है अक्षर? मुल्ला ने कहा अक्षर! मुझे बोर्ड नहीं दिखाई पड़ रहा। अधिकारी ने बड़े बोर्ड बुलवाए। बड़े-बड़े अक्षरों वाले बोर्ड। मगर वह हमेशा यही कहे, मुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा - कहां बोर्ड है? कहां अक्षर है?
हार कर अधिकारियों ने... कुछ सूझा नहीं तो अंततः एक थाली बुलवाई और चिढ़ कर मुल्ला से पूछा, नसरुद्दीन! हाथ में रखो, देखो इसको, अब तो बता दो कि यह क्या है? या कि इसे भी नहीं पहचानते? नसरुद्दीन ने गौर से देखा थाली को और कहा. अरे, यह मेरी अठन्नी कहां मिली आपको! इसे मैं तीन दिन से खोज रहा हूं।
सिर ठोक लिया अधिकारियों ने - कहा, ठीक है। छुट्टी पाई वहां से। नसरुद्दीन बाहर निकला प्रसन्नता में, पास ही जाकर एक मेटिनी शो में बैठ गया। जब इंटरवल हुआ और प्रकाश हुआ तो वह देख कर चकित हुआ कि बगल में वही अधिकारी बैठा हुआ है। उसके तो प्राण निकल गए! इसके पहले कि अधिकारी कुछ कहे कि नसरुद्दीन ने कहा कि महोदय, यह बस कहां जा रही है?
धोखा ही देने पर तुले हो तो बात दूसरी है। और दूसरों को दे रहे होते धोखा तो भी ठीक था अपने को ही दे रहे हो, और दिए चले जाते हो।
पूछना मत.. क्योंकि जिसको समझ में आ गया, दृष्टि मिल गई, वही दृष्टि उसे बताएगी कि क्या करना उचित है।
अपनी झगड़ालू बीवी से तंग आकर मुल्ला नसरुद्दीन ने एक दिन कहा तुमसे विवाह करके मुसलमान होते हुए भी मुझे हिंदुओं के धर्मग्रंथों में श्रद्धा उत्पन्न होने लगी है। श्री रामचरितमानस में बाबा तुलसीदास ने सच ही कहा है -- ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड्न के अधिकारी।
रामायण की इस चौपाई में मेरी भी पूरी श्रद्धा है, गुलजान बोली, क्योंकि पांच चीजों में से मैं तो सिर्फ नारी ही हूं बाकी चार तो आप हैं।
मूल ऊपर है, शाखाएं नीचे की तरफ हैं। जिसको आप विकास कह रहे हैं, वह पतन है।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर में बड़े चूहे थे। और वह परेशान था। और कंजूसी की वजह से चूहादान भी नहीं खरीद सकता था। लेकिन फिर हिम्मत की और खरीद लाया। चूहादान तो खरीद लिया, लेकिन अब मुसीबत यह थी कि उसमें एक रोटी का टुकड़ा भी रखना है। वह भी कंजूसी की वजह से मुश्किल है। तो उसने तरकीब निकाली। होशियार आदमी था, मौलवी था, मुल्ला था, जानता था शास्त्रों को। उसने एक अखबार में से रोटी की फोटो काटकर अंदर रख दी। और रात निश्चित सोया।
सुबह उसने अपना सिर पीट लिया। हुआ कुछ ऐसा कि जब उसने चूहादान खोला, तो रोटी की तस्वीर के पास एक कुतरा हुआ अखबार का टुकड़ा और पड़ा था, जिसमें एक चूहे की तस्वीर थी। अखबार में छपी रोटी ज्यादा से ज्यादा अखबार में छपे हुए चूहे को पकड़ सकती है, और तो कुछ उपाय नहीं।
औरों से परिचित हो जाते हैं, अपने से अपरिचित! कारण? कारण इतना ही है कि अपने से हमारी कोई दूरी नहीं है। वहां कौन बने जानने वाला और कौन बने ज्ञान का विषय? कौन हो ज्ञाता, कौन हो ज्ञेय? कौन हो द्रष्टा, कौन हो दृश्य? वहां तो दोनों एक हैं। वहां द्रष्टा ही दृश्य है। और इसीलिए मुश्किल है।
मुल्ला नसरुद्दीन फ्रांस गया था घूमने। पत्नी को साथ ले गया था। एक तो पेरिस जाना और पत्नी के साथ जाना, वैसे ही अड़चन की बात है। पेरिस और पत्नी के साथ जमता ही नहीं। पत्नी को साथ ले जाना हो, काशी, मक्का, मदीना ठीक है, तीर्थयात्रा! पत्नी मानी नहीं, पेरिस ले गया। पेरिस में देखी सुंदर स्त्रियां उपलब्ध; बड़ी बेचैनी होने लगी। और यह पत्नी पीछे लगी है। यह तो बोझ हो गई। आए, न आए, बराबर हो गया।
तो मुल्ला ने बीच सड़क पर रुककर कहा कि अगर हम दो में से किसी को कुछ हो जाए, तो फिर मैं पेरिस में ही रहूंगा।
फलाकांक्षी अपने को केंद्र मानकर सोचता है।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मेरे पास आई और उसने कहा, अब चलना होगा आपको। बहुत अड़चन हो गई है, मुल्ला आत्महत्या कर रहा है। मैंने कहा, तुम घबड़ाओ मत। जिसने कभी कुछ नहीं किया, वह आत्महत्या भी क्या करेगा! पर वह बोली कि नहीं, यह मामला ही और है। आप मजाक—हंसी मत समझें। वह गंभीर है। सब इंतजाम कर लिया है और दरवाजा बंद किए है। कहीं कुछ हो न जाए। आप चलो।
मैं गया। दरवाजा खटखटाया। मैंने पूछा कि सुना है नसरुद्दीन, आत्महत्या कर रहे हो? ऐसा शुभ अवसर हमें भी देख लेने दो। खोलो। रोकेंगे नहीं, क्योंकि रोकने का हम कोई कारण ही नहीं पाते, कि रोकने की कोई जरूरत पड़ेगी। कोई बाधा न डालेंगे। सिर्फ देखना है कि कैसे करते हो।
दरवाजा खोला। स्टूल पर खडे थे। छप्पर से रस्सी बांध रखी थी और कमर में बांध रहे थे। मैंने कहा, कमर में रस्सी बांध रहे हो। आत्महत्या करनी है, तो गले में बांधो। बोला कि पहले गले में बांधी, लेकिन बड़ी रुकावट मालूम पड़ती है, गला रुंधता मालूम पड़ता है, तकलीफ मालूम पड़ती है। इसलिए कमर में बांध रहे हैं।
दुनिया तुम्हें रोकना नहीं चाहती, तुम्हीं रुके हो।
एक आदमी घबड़ाया हुआ भागा हुआ अपने मालिक के पास आया और उसने कहा, बड़ी मुश्किल हो गई। उनका धंधा था जमीन लेना, जमीन बेचना। मालिक ने पूछा, क्या गड़बड़ हो गई? वह नया-नया एजेंट था, दलाल था, जो उनका काम करता था। उसने कहा कि हमने वह जो नई जमीन बेची थी, वह दस फीट पानी में डूबी हुई है। और हमने चकमा दिया उस आदमी को। जमीन और दिखाई थी, बेची और। लेकिन आखिर असलियत एक दिन खुलेगी न खुलेगी! अब उसको पक्का पता चल गया है कि यह जमीन मिली है और वह दस फीट पानी में दबी है। तो वह बहुत नाराज है। वह पैसे वापस चाहता है।
मालिक ने कहा कि तू अभी सिक्खड़ है। उसको ला! आया वह आदमी, बड़ा भनभनाता हुआ आया। मालिक ने उसकी भनभनाहट सुनी, उसे प्रेम से बिठाया, पान-सिगरेट, स्वागत-सत्कार...। और आखिर में जब वह आदमी गया तो एक मोटरबोट भी खरीद कर ले गया। मालिक ने कहा, यूं धंधा किया जाता है। जमीन तो बेची ही बेची, अब दस फीट पानी में डूबी है तो मोटरबोट भी बेच दो। ऐसे घबड़ा कर लौट नहीं आना पड़ता। हर मौके का उपयोग करो।
बुद्ध -- क्रोध करने से बड़ी मूढ़ता नहीं है। दूसरे के कसूर के लिए अपने को दंड देना, इससे बड़ी और क्या मूढ़ता होगी! किसी ने गाली दी, तुम क्रोधित हो गए। अंगारे तुमने अपनी छाती में भभका लिए। लपटें तुमने लगा लीं। कसूर उसका, दंड अपने को दे रहे हो!
समर्पित
कथा :
सुकरात एक सांझ अपने घर के बाहर गया। रात देर तक लौटा नहीं! घर के लोग परेशान। बहुत खोजा, मिला नहीं। फिर सुबह तक राह देखने के सिवाय कोई रास्ता न रहा।
सुबह सूरज निकला, तब लोग खोजने गए। देखा कि बर्फ जम गई है उसके घुटनों तक। रातभर गिरती बर्फ में खड़ा रहा। एक वृक्ष से टिका हुआ खड़ा है! आंखें बंद हैं। हिलाया! लोगों ने पूछा, यह क्या कर रहे हो? उसने आंख खोलीं; उसने कहा कि क्या हुआ? नीचे देखा। जैसे दूसरे लोग चकित थे, वैसा ही चकित हुआ। कहा कि अरे! बर्फ इतनी जम गई! रात गई? सूरज निकल आया? तो लोगों ने कहा कि तुम कर क्या रहे हो? होश में हो कि बेहोश? तुम रातभर करते क्या रहे?
उसने कहा, मैं कुछ भी न करता रहा। आज रात सांझ को जब यहां आकर खड़ा हुआ, तारों से आकाश भरा था, दूर तक अनंत रहस्य; मेरा मन समर्पित होने का हो गया। मैंने आंख बंद करके अपने को छोड़ दिया इस विराट के साथ। फिर मुझे पता नहीं क्या हुआ। करवाया होगा उसने, मैंने कुछ किया नहीं है।
Moulana Rumi -- Don’t grieve. Anything you lose comes round in another form.
ईसून करके एक फकीर औरत हुई जापान में--समर्पित जीवन की एक प्रतिमा। भोजन भी करती, तो पहले आंख बंद करके आकाश की तरफ, थाली सामने रखी हो, तो भी आंख बंद करके आकाश की तरफ देख लेती। कभी कहती कि ले जाओ। नहीं, आज भोजन नहीं होगा। लोग कहते, क्या बात है? अभी तक तो तुमने कुछ भी नहीं कहा था। पहले ही कह देना था। उसने कहा, जब तक भोजन सामने न आए, तब तक मैं प्रभु से पूछूं भी कैसे! मैं पूछी कि क्या करूं? क्या इरादे हैं? भोजन करूं, न करूं? आज हां में उत्तर नहीं आता। भोजन ले जाओ। किसी दिन भोजन कर लेती; कहती, हां में उत्तर आता है। मरने के एक दिन पहले आंख बंद कर आकाश की तरफ...।
पर लोगों को कभी भरोसा नहीं आया कि पता नहीं, ऊपर से कोई उत्तर आता है कि नहीं आता! यह अपने ही मन से उत्तर दे लेती है! कभी खाना हो, तो खा लेती हो; कभी न खाना हो, तो न खाती हो।
लेकिन उस ईसून ने साठ वर्ष की उम्र तक कभी यह नहीं कहा कि मैंने एक भी उपवास किया। क्योंकि वह अहंकार से तो उठता न था। मेरे का तो कोई सवाल न था। उसने कोई हिसाब भी न रखा; जैसा कि साधु रखते हैं कि उन्होंने इस बार इतने उपवास किए, उतने उपवास किए। इस चौमासे में फलाने ने इतने उपवास किए। इसका कुछ हिसाब न था। ये कोई खाते-बही नहीं हैं कि इनके हिसाब रखे जा सकें। लेकिन अहंकार खाते-बही रखता है।
साठ साल! कभी कोई उससे कहता भी कि तूने कितने उपवास किए! वह कहती कि मैंने? मैंने एक भी उपवास नहीं किया। हां, कभी-कभी प्रभु ने भोजन का आनंद दिया और कभी-कभी उपवास का आनंद दिया।
फिर साठ वर्ष उसके पूरे हुए। एक दिन उसने आकाश की तरफ--थाली सामने रखी थी--आकाश की तरफ देखकर कहा,भोजन ही नहीं; आज तो खबर आती है कि यह मेरा आखिरी दिन है। सांझ सूरज के ढलने के साथ मैं विदा हो जाऊंगी। और ठीक सांझ सूरज के ढलने के साथ वह विदा हो गई। सांझ सूरज ढला, वह आंख बंद करके बैठी थी और श्वास उड़ गई। तब लोगों को पता चला कि जो आवाज उसे आती थी, वह ऐसी ही नहीं थी, जैसा हम सोचते थे। क्योंकि भोजन के मामले में धोखा हो सकता है, मौत के मामले में तो धोखा नहीं हो सकता।
Moulana Rumi -- You have to keep breaking your heart until it opens.
तनाव
कथा :
एक फकीर के पास एक युवक सत्य की शिक्षा के लिए आया। पर उसने कहा, मुझे जल्दी है, मेरे पिता बूढ़े हो गए हैं। और घर मुझे जल्दी लौट जाना है। यह सत्य मैं कब तक जान लूंगा? उस गुरु ने उसे देखा नीचे से ऊपर तक और कहा, कम से कम तीन वर्ष तो लग ही जाएंगे। उस युवक ने कहा, तीन वर्ष! भरोसा नहीं, मेरे पिता बचें या न बचें। कुछ और जल्दी नहीं हो सकता है? मैं जितना आप कहेंगे, उतना श्रम करूंगा; सुबह से सांझ तक। गुरु ने कहा, तब तो शायद दस वर्ष लग जाएंगे। उस शिष्य ने कहा, आप पागल तो नहीं हो गए? मैं कहता हूं, मैं बहुत श्रम करूंगा। रात सोऊंगा भी नहीं, जब तक आप जगाएंगे जागूंगा। रात-दिन सतत, कभी इनकार न करूंगा। जो भी करने को कहेंगे, करूंगा। लेकिन कुछ जल्दी न हो सकेगा? गुरु ने कहा, बहुत मुश्किल है। तीस वर्ष से कम में होना मुश्किल है।
उस युवक ने कहा, आप क्या कह रहे हैं! मेरे पिता वृद्ध हैं और मैं जल्दी में हूं। इसके पहले कि वे जगत से विदा हों, मुझे घर लौट जाना है। उस गुरु ने कहा, फिर तू लौट ही जा अभी। क्योंकि पिता वृद्ध हैं, उनके लिए तो मैं कुछ नहीं कह सकता। लेकिन तू जब तक वृद्ध न हो जाए, तब तक यह सत्य नहीं मिलेगा। इसमें साठ-सत्तर वर्ष लग जाएंगे। उस युवक ने कहा, पुरानी बात पर वापस लौट आएं। वह तीन वर्ष वाली योजना ठीक है। गुरु ने कहा, अब लौटना बहुत मुश्किल है, क्योंकि जो इतनी जल्दी में है, उसे बहुत देर लग जाएगी।
वह शिष्य पूछने लगा, इतनी देर क्यों लग जाएगी जो जल्दी में है? तो गुरु ने कहा, जो जल्दी में है, उसके साथ तालमेल, उसके साथ एक आंतरिक संबंध बिठाना बहुत मुश्किल है। और संबंध न बैठे, तो मैं कह ही न सकूंगा। क्योंकि जो मुझे कहना है, वह तो एक क्षण में भी हो सकता है। लेकिन वह क्षण कब आएगा, सवाल यह है। वह क्षण--तीन वर्ष भी लग सकते हैं, तीस वर्ष भी लग सकते हैं। और अगर तू विश्राम चित्त से, सहजता से, चुपचाप प्रतीक्षा से मेरे पास है, तो शायद वह क्षण जल्दी आ जाए। और तू जल्दी में है, तो तू इतने तनाव और इतनी बेचैनी में है कि वह क्षण कभी भी न आए। क्योंकि बेचैन चित्त के साथ संबंध जोड़ना बहुत कठिन है।
मैं तो अब मुक्त हूँ
क्योंकि अपनी स्थिति का ज्ञान ही मुक्ति है,
पर देवता ! यदि तुम निरे पत्थर ही नहीं हो,
तो अपने इन पुजारियों से अपनी रक्षा करो !
मुल्ला बीमार था। डाक्टर उसको देखने आया। नब्ज देखी, छाती की धड़कन देखी, तापमान लिया और बोला कि ऐसा लगता है कि कम-से-कम तीस साल से कोई खतरनाक बीमारी तुम्हारे पीछे पड़ी है।
मुल्ला ने कहा: धीरे बोल भइया, वह बगल के कमरे में ही बैठी है! सुन लिया तो और मुसीबत हो जाएगी।
I am not this hair, I am not this skin.
I am the soul that lives within
-- Jalaluddin Muhammad Rumi (13th Centurary)
मांग
कथा :
एक आदमी अकेला था । ऊब गया अकेलेपन से तो उसने प्रभु से प्रार्थना की कि एक सुंदर स्त्री भेज दो । सच में सुंदर हो, साधारण स्त्री नहीं चाहिए । क्लियोपैट्रा हो कि मरलिन मनरो हो, सच में सुंदर हो । कि सोफिया लॉरिन हो, सच में सुंदर हो । लेकिन प्रभु ने भी खूब मजाक की । प्रभु ने कहा, फांसी का फंदा न भेज दूं? आदमी .नाराज हो गया, उसने कहा यह भी कोई बात हुई? हम मांगते हैं सुंदर स्त्री, तुम कहते तने, फांसी का फंदा । ऐसा न शास्त्रों में लिखा, न कभी तुमने ऐसा किसी भक्त को कहा । यह तुम बात क्या कहते हो? मैं तो कहता हूं सिर्फ सुंदर स्त्री भेज दो । फांसी का फंदा क्या करना? कोई मुझे फांसी लगानी!
खैर, सुंदर स्त्री आ गई । लेकिन तीन दिन के भीतर ही उस आदमी को पता चला कि यह तो फांसी का फंदा हो गया । प्रभु ठीक ही कहते थे । मैं मांग तो स्त्री रहा था, लेकिन मांग फांसी का फंदा ही रहा था । समझा नहीं । बात उन्होंने बड़ी सधुक्कड़ी भाषा में कही थी, उलटबासी कही थी । घबड़ाने लगा । सात दिन में ही परेशान हो गया । सात दिन बाद तो याद आने लगे वे दिन, जब अकेला था, कितने सुंदर थे! कितने सुखद थे!
आदमी अद्भुत है । जो खो जाता है वह सुंदर मालूम पड़ता है । जो नहीं मिलता वही सुंदर मालूम पड़ता है । जो मिल जाता है वह तो कांटे की तरह गड़ता है । आखिर उसने प्रभु से कहा क्षमा करें, भूल हो गई । अज्ञानी हूं माफ कर दें । एक तलवार भेज दें । सोचा मन में, इस स्त्री का खात्मा कर दूं तो फिर पुराने दिनों की शांति, वही एकांत, वही मौज, वही मस्ती । फिर निश्चित होकर रहेंगे ।
लेकिन फिर प्रभु ने कहा, तलवार? अरे तो फांसी का फंदा ही न भेज दूं? वह आदमी फिर नाराज हो गया । उसने कहा, यह एक भेज दिया फांसी का फंदा, अभी भी तुम्हारा मन नहीं भरा? मैं कहता हूं सिर्फ एक अच्छी तलवार भेज दो धारवाली ।
खैर नहीं माना, तलवार आ गई । उसने पत्नी को मार डाला । सोचता था वह तो, पत्नी की को मार कर आनंद से रहेगा लेकिन पकड़ा गया । फांसी की सजा हुई । जब फांसी के तख्ते पर उसे ले जाने लगे तब वह हंसने लगा खिलखिलाकर । जल्लादों ने पूछा, 'बात क्या है? दिमाग खराब हो गया? फांसी के तख्ते पर कोई हंसता है? उसने कहा, अरे हंस रहा हूं इसलिए कि यह भी खूब मजा रहा । परमात्मा तो पहले ही से कह रहा था बार-बार : फांसी का फंदा भेज दूं? फांसी का फंदा भेज दूं? मैंने समझा नहीं । मान लेता पहले ही तो इतनी झंझटों से तो बच जाता ।
तुमने माँगा और वहां फांसी का फंदा तैयार ।
जीसस को सूली हुई, आखिरी क्षण उन्होंने आकाश की तरफ मुंह उठाकर कहा कि हे परमात्मा, यह क्या दिखा रहा है! एक संदेह उठ आया होगा कि मैं तेरे लिए जीआ, तेरी प्रार्थना में जीआ, तेरी पूजा में जीआ, तेरे नाम को फैलाने के लिए जीआ और यह तू मुझे क्या दिखा रहा है! एक शिकायत आ गयी होगी -- हलकी-सी बदली, छोटी-सी बदली जीसस की छाती पर तैर गयी । एक क्षण को सूरज ढँक गया होगा । लेकिन जीसस तत्क्षण पहचान गए कि चूक हो गयी, भूल हो गयी । तत्क्षण कहा, क्षमा कर, यह मैंने क्या कहा! तेरी रज़ा पूरी हो! तू जो दिखा रहा है, वही ठीक है । तेरी रज़ा से ऊपर मेरी रज़ा नहीं है । तेरी इच्छा से ऊपर मेरी इच्छा नहीं है । तू जो चाहता है, वही मैं चाहूं, बस इतनी ही मेरी इच्छा है । यह मैंने कैसे कहा!
आदमी करीब-करीब इस हालत में है । परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है । और हम मांगे जा रहे हैं--दो-दो पैसे, दो-दो कौड़ी की बात । और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है ।
एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, portrait बनवाया । चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी । वह बहुत खुश थी । चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं? चित्रकार गरीब आदमी था । गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे?
हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से । हम जो मांग रहे हैं, वह क्षुद्र है । जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए ।
तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं । फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी । इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे । डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की । उसने कहा कि आपकी जो मर्जी । तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा -- अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो । यह बड़ी कीमती पर्स है ।
पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं । इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते । तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें । उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी । उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी ।
सुना है कि चित्रकार अब तक छाती पीट रहा है और रो रहा है--मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!
अरेबिक कहावत -- अगर परमात्मा सबकी आकांक्षाएं पूरी कर दे, तो लोग इतने दुख में पड़ जाएं, जिसका कोई हिसाब नहीं।
एक आदमी ने यह कहावत पढ़ ली कि परमात्मा आकांक्षाएं पूरी कर दे आदमियों की, तो आदमी बड़ी मुसीबत में पड़ जाएं। उसकी बड़ी कृपा है कि वह आपकी आकांक्षाएं पूरी नहीं करता। क्योंकि अज्ञान में की गई आकांक्षाएं खतरे में ही ले जा सकती हैं। उस आदमी ने कहा, यह मैं नहीं मान सकता हूं। उसने परमात्मा की बड़ी पूजा, बड़ी प्रार्थना की। और जब परमात्मा ने आवाज दी कि तू इतनी पूजा-प्रार्थना किसलिए कर रहा है? तो उसने कहा कि मैं इस कहावत की परीक्षा करना चाहता हूं। तो आप मुझे वरदान दें और मैं आकांक्षाएं पूरी करवाऊंगा; और मैं सिद्ध करना चाहता हूं, यह कहावत गलत है।
परमात्मा ने कहा कि तू कोई भी तीन इच्छाएं मांग ले, मैं पूरी कर देता हूं। उस आदमी ने कहा कि ठीक। पहले मैं घर जाऊं, अपनी पत्नी से सलाह कर लूं।
अभी तक उसने सोचा नहीं था कि क्या मांगेगा, क्योंकि उसे भरोसा ही नहीं था कि यह होने वाला है कि परमात्मा आकर कहेगा। आप भी होते, तो भरोसा नहीं होता कि परमात्मा आकर कहेगा। जितने लोग मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं, किसी को भरोसा नहीं होता। कर लेते हैं। शायद! परहेप्स! लेकिन शायद मौजूद रहता है।
तय नहीं किया था; बहुत घबड़ा गया। भागा हुआ पत्नी के पास आया। पत्नी से बोल कि कुछ चाहिए हो तो बोल। एक इच्छा तेरी पूरी करवा देता हूं। जिंदगीभर तेरा मैं कुछ पूरा नहीं करवा पाया। पत्नी ने कहा कि घर में कोई कड़ाही नहीं है। उसे कुछ पता नहीं था कि क्या मामला है। घर में कड़ाही नहीं है; कितने दिन से कह रही हूं। एक कड़ाही हाजिर हो गई। वह आदमी घबड़ाया। उसने सिर पीट लिया कि मूर्ख, एक वरदान खराब कर दिया! इतने क्रोध में आ गया कि कहा कि तू तो इसी वक्त मर जाए तो बेहतर है। वह मर गई। तब तो वह बहुत घबड़ाया। उसने कहा कि यह तो बड़ी मुसीबत हो गई। तो उसने कहा, हे भगवान, वह एक और जो इच्छा बची है; कृपा करके मेरी स्त्री को जिंदा कर दें।
ये उनकी तीन इच्छाएं पूरी हुईं। उस आदमी ने दरवाजे पर लिख छोड़ा है कि वह कहावत ठीक है।
अहंकार जीवन की मूलभूत समस्या है और प्रेम मूलभूत समाधान।
रूमी ने एक गीत में कहा है: प्रेयसी के द्वार पर किसी ने दस्तक दी। भीतर से आवाज आई, 'कौन है?' जो द्वार के बाहर खड़ा था उसने कहा, 'मैं हूं।' प्रत्युत्तर में उसे सुनाई पड़ा, 'यह घर मैं और तू, दो को नहीं संभाल सकता।' और बंद-द्वार बंद ही रहा। प्रेमी तब जंगल चला गया। वहां उसने तप किया, उपवास किये, प्रार्थनायें कीं। बहुत चांदों के बाद वह लौटा, और दुबारा उसने वे ही द्वार खटखटाये। और फिर वही प्रश्न: 'बाहर कौन है?' पर इस बार द्वार खुल गये। क्योंकि उसका उत्तर दूसरा था। उसने कहा था, 'तू ही है।'
खाली बर्तन कोलाहल करता है। आधा भरा, बड़ा उपद्रव मचाता है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात देर से घर लौटा। पत्नी ने शोरगुल शुरू कर दिया। और उसने कहा कि फिर देर से आए? और हजार बार कह दिया कि देर से आना बंद हो!
कहां थे? तो नसरुद्दीन ने कहा कि समझदार पत्नियां इस तरह के प्रश्न नहीं पूछतीं।
पत्नी आगबबूला थी, उसने कहा, और समझदार पति.......।
वह आगे कुछ कहे, उसके पहले ही नसरुद्दीन बोला कि ठहर! समझदार पति सदा कुंआरे रहते हैं।
जैसे आग गरम है, ऐसे हम निष्पाप हैं। चेतना का निष्पाप होना धर्म है।
दक्षिण में एक कथा है। दक्षिण का एक कवि हुआ, तेनालीराम। कुछ उलटी खोपड़ी का आदमी रहा होगा। कवि अक्सर होते हैं। पर भक्ति का भी भाव था। तो उसने बड़ी साधना की। काली का पूजक था। बड़ी साधना की। वर्षों के बाद काली का दर्शन हुआ, अनंत हाथों वाली, अनंत मुख वाली। सालों की मेहनत के बाद तेनालीराम ने पूछा क्या!
उसने पूछा कि बस, मुझे यही पूछना है; एक नाक हो, सर्दी हो जाए, तो आदमी पोंछ-पोंछकर थक जाता है। तुम्हारी क्या गति होती होगी?
काली भी चौंकी होगी। कहते हैं, काली ने कहा कि तेनालीराम, तुम्हें आज से विकट कवि कहा जाएगा। यह तुम्हारा नाम हुआ; और यही मेरा उत्तर है। तेनालीराम ने सुना तो उसने कहा कि बिलकुल ठीक। यह बिलकुल मुझसे मेल खाता है। 'विकट कवि' को उलटा पढ़ो या सीधा, एक-सा है। और मैं उलटा खड़ा होऊं या सीधा, बिलकुल एक-सा है।
यह वर्षों की साधना बस, इस चर्चा पर समाप्त हो गई!
अगर मन उलझा हो, क्या करने योग्य है, क्या करने योग्य नहीं है, इसका बोध भी न हो, तो आपके सामने परमात्मा भी खड़ा हो, तो भी हल न होगा। आप स्वर्ग में भी पहुंच जाएं, तो कोई न कोई उपद्रव खड़ा कर लेंगे। आप जहां भी होंगे, वहां गलती अनिवार्य है।
कुगुरु
कथा :
एक अंधी स्त्री न्यूयॉर्क के एक रास्ते पर रास्ता पार करने के लिए खड़ी थी । प्रतीक्षा कर रही थी कि कोई आ जाए और राह पार करवा दे । तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा । और जिसने कंधे पर हाथ रखा उसने कहा, क्या हम दोनों साथ-साथ रास्ता पार कर सकते हैं? उस स्त्री ने कहा, मैं प्रतीक्षा ही कर रही थी । आओ ।
दोनों ने हाथ में हाथ डाला और पार हुए । जब उस तरफ पहुंच गए तो स्त्री ने कहा, बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे रास्ता पार करवाया । वह आदमी घबड़ाया । उसने कहा, क्या मतलब? धन्यवाद तो मुझे देना चाहिए । मैं अंधा हूं रास्ता तो तुमने मुझे पार करवाया । तब तो दोनों घबड़ा गए, पसीना आ गया । रास्ता तो पार हो गए थे, लेकिन तब पता चला, दोनों अंधे थे ।
अंधों को पता भी कैसे चले कि हम किसी अंधे के पीछे चल रहे हैं? कतारें लगी हैं । क्यू लगे हुए हैं । तुम अपने आगे वाले को पकड़े हो, आगे वाला अपने आगेवाले को पकड़े हुए है । सबसे आगे कोई महाअंधा महात्मा की तरह चल रहा है । चले जा रहे हैं । न तुम्हें पता है, न तुम्हारे आगेवाले को पता है । अंधा अंधा ठेलिया, दोनों कूप पड़ंत ।
महर्षि महेश योगी के गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती जब युवा थे, प्रकट / प्रगाढ़ खोजी थे । गुरु की तलाश में थे । किसी व्यक्ति की खबर मिली कि वह ज्ञान को उपलब्ध हो गया है, तो वह भागे हिमालय पहुंचे । वह आदमी मृगचर्म बिछाये, बिलकुल जैसा योगी होना चाहिए वैसा योगी दिखायी पड़ता था । प्रभावशाली आदमी मालूम पड़ता था । सशक्त, बलशाली! इस युवा ने--ब्रह्मानंद ने--पूछा कि महाराज! यहां कहीं आपकी झोपड़ी में थोड़ी अग्नि मिल जाएगी? अग्नि! हिंदू संन्यासी अग्नि नहीं रखते अपने पास । न अग्नि जलाते हैं । उन्होंने कहा, तुझे इतना भी पता नहीं है कि संन्यासी अग्नि नहीं छूते । फिर भी उस युवा ने कहा, फिर भी महाराज! शायद कहीं छिपा रखी हो । वह जो योगी थे, बड़े आग हो गये, बड़े नाराज हो गये, चिल्लाकर बोले कि नासमझ कहीं का! तुझे इतनी भी अकल नहीं कि हम और अग्नि चुराकर रखेंगे! क्या समझा है तूने हमें? तो ब्रह्मानंद ने कहा, महाराज! अगर अग्नि नहीं है, नहीं छुपायी, तो ये लपटें कहां से आ रही हैं? लपटें तो आ गयीं ।
ऊपर से थोपकर कोई अभिनय कर सकता है । यह घटना मुझे प्रीतिकर लगी । अग्नि छुपाने का सूत्र भी इसमें साफ है । यह बाहर की अग्नि को छूने की बात नहीं, न बाहर की अग्नि रखने न रखने से कुछ फर्क पड़ता है, यह तो भीतर की आग संन्यासी न छुए । लेकिन ध्यान की जब तक वर्षा न हो जाए, भीतर की आग बुझती नहीं । जब तक ध्यान की रसधार न बहे, तब तक भीतर कुछ अंगारे-सा जलता ही रहता है, चुभता ही रहता है ।
महावीर - मूल धर्म है ध्यान । जिसने ध्यान साध लिया, सब साध लिया ।
स्वामी राम ने संस्मरण लिखा है कि वे जब जापान गए, तो उन्होंने वहां देवदार के आकाश को छूने वाले वृक्षों को एक-एक बालिश्त का देखा, एक-एक बित्ते का देखा । वह बहुत हैरान हुए । वृक्ष छोटे पौधे नहीं थे, सौ-सौ, डेढ़-डेढ़ सौ वर्ष पुराने थे । लेकिन उनकी ऊंचाई एक बालिश्त थी ।
उन्होंने मालियों से पूछा कि इसका राज क्या है?
मालियों ने गमले उलटा कर बताया । नीचे से गमले टूटे हुए थे । और नियमित रूप से वृक्षों की जड़ें काट दी जाती थीं । नीचे जड़ें नहीं बढ़ पाती थीं, ऊपर वृक्ष नहीं बढ़ पाता था । वृक्ष पुराना होता जाता, बूढ़ा हो जाता, लेकिन बालिश्त से ऊपर न उठ पाता । क्योंकि उठने के लिए जड़ों का नीचे जाना जरूरी है, जमीन में प्रवेश करना जरूरी है । वृक्ष उतना ही ऊपर जाता है, जितना नीचे उसकी जड़ें चली जाती हैं । अब अगर माली यह तय कर ले कि जड़ों को नीचे पहुंचने ही नहीं देना है, काटते चले जाना है, तो वृक्ष बूढ़ा होता जाएगा, लेकिन बड़ा नहीं होगा ।
मनुष्य को बड़ा करने की हमारी जो व्यवस्था है, वह जड़ों को काटने वाली है । इसलिए जितने लोग हमें दिखाई पड़ते हैं जमीन पर, वे बालिश्त भर ऊंचे उठ पाए । वे लोग आकाश को भी छू सकते थे । जहर हम जड़ों में डाल देते हैं ।
एक आदमी था, जो एक गुरु पर विश्वास करता था। लेकिन गांव में बहुत गुरु थे। तो उस गुरु ने उसके कान में घंटे बांध दिए थे। वह इसलिए कि कहीं चलते-फिरते, संयोग से भी किसी दूसरे गुरु की बात सुनाई न पड़ जाये। वे घंटे बजते रहते। उसको कुछ और सुनाई न पड़ता। लेकिन ध्यान रहे, उसको अपने गुरु की बात भी सुनाई पड़ना बंद हो गई। क्योंकि घंटे तब भी बजते रहते थे। घंटों को थोड़े ही पता है कि तुम अपने गुरु के पास गये हो कि दूसरे गुरु के पास गये हो। घंटे तो बजते ही रहते हैं।
ध्यान रखना, जो गुरु अपने पर रोकेगा, जो दूसरे, इस विराट जगत के चारों दिशाओं में जाने से बाधा डालेगा, शिष्य उसके पास भी आना बंद हो जायेगा। निकट बना रहे लेकिन घंटाकर्ण होगा।
भय घृणा पैदा कर सकता है, प्रेम कैसे पैदा करेगा?
एक दिन शैतान ने लौटकर अपनी पत्नी को कहा कि अब मैं बिलकुल बेकार हो गया हूं अब मुझे कोई काम ही न रहा। उसकी पत्नी बहुत हैरान हुई और पूछा, आप और बेकार! लेकिन आप कैसे बेकार हो गए? आपका काम तो शाश्वत है! लोगों को बिगाड़ने का काम तो सदा चलेगा; यह बंद तो होनेवाला नहीं। यह कैसे बंद हो गया? आप कैसे बेकार हो गए? उस शैतान ने कहा, मैं बेकार बड़ी मुश्किल से हो गया, बड़े अजीब ढंग से हो गया। अब मेरा जो काम था वह मंदिर और मस्जिद में, तथाकथित साधु, पंडित और पुजारी कर देते हैं; मेरी कोई जरूरत नहीं है। आखिर भगवान से ही लोगों को भटकाता था। अब भगवान की तरफ कोई जाता ही नहीं! बीच में मंदिर खड़े हैं, वहीं भटक जाता है। हम तक कोई आता ही नहीं मौका कि हम भगवान से भटकाएं।
यश की दौडवाला और तेजी से दौड़ने लगता है। वह अपने कान बंद कर लेता है कि सुनाई न पड़े कि कुछ भी नहीं मिला।
अहंकार
कथा :
रवींद्रनाथ ने एक कविता लिखी है, प्यारी है । लिखा है अपनी कविता में कि एक रात बजरे पर था । पूर्णिमा की रात, पूरा चांद आकाश में । बड़ी लुभावनी रात । चांद की बरसती रात । और वे अपनी नाव पर अपने बजरे में अंदर बैठे हैं । कोई किताब पढ़ रहे हैं । सौंदर्य के संबंध में सौंदर्य-शास्त्र की कोई किताब पढ़ रहे हैं । एक छोटी-सी मोमबत्ती जला रखी है, उसका पीला टिमटिमाता प्रकाश, उसी में वे पढ़ रहे हैं । आधी रात गए किताब पूरी हुई । फूंक मार कर मोमबत्ती बुझा दी । मोमबत्ती बुझाते ही चकित खड़े रह गए । द्वार से, खिड़की से, बजरे की रंध्र-रंध्र से, चांद की रोशनी भीतर आ गई । अपूर्व! नाच उठे । फिर रोने लगे । क्योंकि तब याद आया कि सौंदर्य बाहर बरस रहा है । चांद द्वार पर खड़ा है । और मैं इस मोमबत्ती को जलाए, इसके गंदे से प्रकाश में सौंदर्य-शास्त्र पढ़ रहा हूं । सौंदर्य द्वार पर खड़ा है और मैं किताब में सौंदर्य खोज रहा हूं । और इस मोमबत्ती के धीमे से प्रकाश ने चांद की रोशनी को भीतर आने से रोक दिया है ।
तुमने कभी देखा? छोटा सा प्रकाश मोमबत्ती का, चांद भीतर नहीं आता । मोमबत्ती बुझ गई, भर गया चांद भीतर, सब तरफ से दौड़ आया । रवींद्रनाथ ने लिखा है, वह घड़ी मेरे जीवन में बड़ी शुभ घड़ी हो गई । उस दिन मैंने जाना, ऐसी ही अहंकार की मोमबत्ती है । जब तक जलती रहती है तब तक प्रभु का प्रकाश द्वार पर खड़ा रहता है, भीतर नहीं आ पाता । फूंक मार कर बुझा दो यह मोमबत्ती, दौड़ा चला आता प्रभु । निर्बल के बल राम ।
इसका मतलब यह नहीं है कि जब तुम निर्बल हो जाते हो तो तुम भिखारी हो जाते हो । निर्बल होते ही तुम सम्राट हो जाते हो ।
जीसस -- 'Blessed are the meek, for they shall inherit the earth; for theirs is the kingdom of God' धन्यभागी हैं निर्बल । उन्हीं का है सारा जगत और वे ही हैं प्रभु के राज्य के मालिक । सम्राट हो जाता है आदमी निर्बल होकर ।
एक अंधा अपने मित्र के घर से विदा हो रहा था। तो मित्र ने कहा, रात में अंधेरा ज्यादा है, अमावस की रात है। रास्ते पर कोई दुर्घटना हो जाए, तुम यह हाथ में कंदील लिये जाओ। उस अंधे ने कहा, तुम पागल हुए हो! मुझे क्या फर्क पड़ता है, कंदील हाथ में हो, या न हो! अंधेरा अंधेरा है। मैं अंधा हूं, क्या तुम भूल गये? कंदील क्या करेगी!
लेकिन उस मित्र ने तर्क किया कि माना कि तुम अंधे हो और कंदील तुम्हारे लिए कुछ न कर सकेगी, लेकिन इतना तो करेगी कि दूसरा कोई तुमसे न टकरा सकेगा। रोशनी हाथ में रहेगी, तो दूसरा तुमसे न टकरा सकेगा। यह तर्क अंधे को भी जंचा, वह कंदील लेकर गया। कोई दस-पांच कदम ही गया था कि कोई उससे आ टकराया। उसने कहा, क्या मामला है? क्या तुम भी अंधे हो? हाथ में कंदील है मेरे, दिखायी नहीं पड़ती? उस दूसरे आदमी ने कहा कि महानुभाव, आपकी कंदील बुझी हुई है।
अंधे को पता कैसे चले कि कंदील बुझ गयी। अंधे को कंदील का जलना ही पता नहीं चलता, तो बुझना कैसे पता चलेगा? और कहते हैं, उस अंधे ने लौटकर अपने मित्र को कहा कि मैं वर्षों से चल रहा हूं, कभी मुझसे कोई भी न टकराया था। क्योंकि मैं खुद ही संभलकर चलता हूं, लकड़ी चोट करके चलता हूं, खबर करके चलता हूं कि भई, मैं अंधा हूं। तुम्हारी कंदील ने मुझे आश्वासन दे दिया कि आज तो कोई खबर रखने की जरूरत नहीं। आज तो लापरवाह चल सकता हूं। कंदील तो हाथ में है, कोई टकरायेगा नहीं। यह पहली दफे मेरी जिंदगी में कोई मुझसे टकराया है, तुम्हारी कंदील के कारण टकराया है। कंदील ने भरोसा दे दिया, आत्मविश्वास दे दिया। अन्यथा अंधा अपने अंधेपन के हिसाब से व्यवस्था करके चलता है। लकड़ी टटोलकर, आवाज करके। आज उसने अपनी सहज सावधानी को भी छोड़ दिया।
अगर तुम्हें पता हो कि तुम अज्ञानी हो, तो तुम टटोलकर चलोगे, आवाज करके चलोगे, लकड़ी बजाकर चलोगे; अकड़कर न चलोगे। लेकिन, अगर तुम्हारा अज्ञान शास्त्र-अध्ययन में ढंक गया, तो तुम्हें लगता है, तुम्हारे हाथ में कंदील आ गयी। तुम अकड़कर चलोगे। अज्ञानी के पास जब उधार ज्ञान हो जाता है, तो ज्ञान तो नहीं आता, सिर्फ अकड़ आती है। ज्ञान तो नहीं जलता, सिर्फ अहंकार प्रगाढ़ होता है।
इस अहंकार से चरित्र तो कैसे पैदा होगा! अहंकार तो सबसे बड़ी बाधा है चरित्र में। क्योंकि चरित्र की अगर कोई बुनियाद है, तो निर-अहंकारिता है।
अपने को बदलने को वही तैयार होता है, जो अपने दोष देखने को तैयार है।
एक बौद्ध भिक्षु हुआ -- आर्य असंग । बड़ा बहुमूल्य भिक्षु हुआ । उसके जीवन में बड़ी अनूठी कथा है । नालंदा में आचार्य था । संसार की व्यर्थता समझ आयी तो सब छोड़कर चला गया । तय कर लिया कि अब तो ध्यान में ही डूबूंगा, हो गया ज्ञान बहुत । जान लिया सब, और जाना तो कुछ भी नहीं । पढ़ डाले शास्त्र सब, हाथ तो कुछ भी न आया । सब-कुछ छोड़कर पहाड़ पर चला गया । एक गुफा में बैठ गया । तीन साल अथक ध्यान किया । लेकिन कहीं मंजिल करीब आती मालूम न पड़ी ।
हतोत्साह, हताशा से भरा गुफा से बाहर निकल आया । सोचा लौट जाऊं । तभी उसने क्या देखा कि एक चिड़िया वृक्षों से पत्ते तोड़-तोड़कर लाती है, पत्ते गिर-गिर जाते हैं, घोंसला बनता नहीं; मगर फिर चली जाती है, फिर ले आती है, फिर चली जाती है, फिर ले आती है । उसने सोचा क्या इस चिड़िया से भी कमजोर है मेरा साहस, मेरी आशा, मेरी आस्था? घोंसला बन नहीं रहा है, लेकिन इसकी कहीं भी आशा नहीं टूटती, हताशा नहीं आती । वह फिर वापस गुफा में चला गया । तीन साल तक कहते हैं, फिर उसने हिम्मत करके ध्यान किया । कुछ न हुआ । सब श्रम लगा दिया, लेकिन कुछ न हुआ । फिर घबड़ाकर एक दिन बाहर आ गया और कहा, अब बहुत हो गया!
फिर उस वृक्ष के नीचे बैठा था कि देखा एक मकड़ी जाला बुन रही है । गिर-गिर जाती है, जाले का धागा सम्हलता नहीं, फिर-फिर बुनती है । फिर उसे खयाल आया कि आश्चर्य की बात है, ऐसी चीजें मुझे बाहर आते ही से दिखायी पड़ जाती हैं । अभी मकड़ी भी नहीं हारी, मैं क्यों हारूं? एक बार और कोशिश कर लूं । कहते हैं, वह फिर तीन साल ध्यान किया । कुछ न हुआ । बहुत परेशान हुआ । अब उसने सोचा, अब बाहर निकलूंगा पता नहीं फिर कुछ हो जाए, तो अब की दफे आंख बंद करके ही चले जाना है । अब कुछ भी हो रहा हो बाहर--मकड़ी हो कि चिड़िया हो कि कुछ भी हो, परमात्मा कोई भी इशारे दे, अब बहुत हो गया, नौ साल कोई थोड़ा वक्त नहीं, सारा जीवन गंवा दिया!
वह आंख बंद करके भागा । वह जैसे ही पहाड़ से नीचे उतर रहा था, उसने देखा एक कुतिया, उसकी पीठ सड़ गयी है,उसमें कीड़े पड़ गये हैं--वह उसे दिखायी पड़ी । उससे न रहा गया । बैठा, उसके कीड़े अलग किये, जब वह उसके घाव धो रहा था, तभी ध्यान घटा । जो नौ साल में नहीं घटा था, वह घटा । अचानक, जैसे कुछ गहन में भीतर खींचे लिये चला गया । आंख बंद हो गयीं, वह भीतर पहुंच गया । जिसकी तलाश थी, वह रोशनी सामने खड़ी है । जिसकी तलाश थी, वह बुद्धत्व खिला । उसने कहा, हे प्रभु! इतने दिन तक खोजता था--नौ वर्ष अथक श्रम किये, तब तुम न दिखायी पड़े, तब यह रोशनी न मिली, अब! तो कहते हैं उस रोशनी से उत्तर आया कि मैं तो तब भी तेरे ही भीतर था, लेकिन तेरे ध्यान की चेष्टा बड़ी अहंकार-पूर्ण थी । तेरा अहंकार बाधा बन रहा था । इस कुतिया के घाव धोते वक्त एक क्षण को तेरा अहंकार मौजूद न रहा । करुणा हो, तो अहंकार मौजूद नहीं रहता । प्रेम हो, तो अहंकार समाप्त हो जाता है । मैं तो सदा से तेरे पास था -- नौ महीने से भी और नौ सालों से भी, नौ जन्मों से भी । मैं तो भीतर था ही, मैं तेरा स्वभाव हूं, लेकिन तू भीतर नहीं आ पाता था । ध्यान भी कर रहा था तू, तो उसमें अकड़ थी--मैं पाकर रहूंगा । वह अहंकार की उदघोषणा थी।
भीतर जाना है जिन्हें उन्हें बाहर की दौड़ छोड़नी है । और बाहर की दौड़ का जो सूक्ष्म सूत्र है--अहंकार--वह भी तोड़ना है । स्वयं को मिटाये बिना कोई ध्यान को उपलब्ध नहीं होता । और स्वयं को मिटाये बिना कोई स्वयं को उपलब्ध नहीं होता ।
एक सूफी फकीर जुन्नैद जिंदगी भर रोता रहा । अपने को पीटता था, रोता था । रास्तों से निकलता था, तो अपने को खुद चांटे मारता था । लोग उससे पूछते थे कि 'क्यों इतना पश्चात्ताप करता है? क्या पाप किया है तूने ? क्योंकि जितना हम तुझे जानते हैं, तुझसे ज्यादा पवित्र आदमी खोजना मुश्किल है । और अगर तू इतना दुखी है, पश्चात्ताप से भरा है, तो हमारी क्या गति होगी? और हम इतने पाप कर रहे हैं, हमें जरा भी पश्चात्ताप नहीं है । तूने पाप क्या किया है? यह गांव तुझे बचपन से जानता है--न तूने कभी चोरी की, न कभी क्रोध किया, न किसी को गाली दी,न किसी का अपमान किया । तुझसे ज्यादा पवित्र आदमी पृथ्वी पर भी शायद दूसरा न हो ।' लेकिन जुन्नैद अपने को सजा देता रहा ।
मरते वक्त, उसके शिष्य हजारों थे, वे इकट्ठे हुए, उन्होंने कहा, अब तो बता दो कि सजा किसको दे रहे थे? तो उसने कहा कि एक बार मेरे मन में ऐसा खयाल आ गया था कि मैं बड़ा पवित्र हूं; वही पाप हो गया । और परमात्मा के सामने खड़े होकर मैं अब आंखें भी न उठा सकूंगा, क्योंकि मैंने एक पाप किया है । कि मैं पवित्र हूं--यह खयाल मुझे एक बार आ गया था, उसकी ही सजा अपने को दे रहा हूं । लोगों ने कहा, पागल हो गये हो? अगर इतने से पाप से तुम परमात्मा के सामने आंखें न उठा सकोगे, तो हमारा क्या होगा? जुन्नैद ने कहा, तुम मजे से आंखें उठा सकोगे । तुम्हारे पाप इतने हैं कि तुम्हें शर्म भी न आयेगी । और शर्म भी कितनी करोगे? मैं भी तुम जैसा होता, तो कोई चिंता न थी; बस वह एक अटक गया है । शुभ्र वस्त्र पर वह काला दाग ऐसा दिखायी पड़ता है कि उसे मैं भूल नहीं पाता, उसकी ही पीड़ा है ।
इसे खयाल रखें कि जैसे-जैसे आप बढ़ते हैं अंतर्यात्रा में, वैसे-वैसे छोटी-छोटी चीजें बड़ी मूल्यवान हो जाती हैं ।
वह जो सब छोड़ दिया है, उसे एक नयी चीज पकड़ लेती है कि मैंने सब छोड़ दिया है । त्याग भी भोग बन जाता है, और विनम्रता अहंकार हो जाती है और पवित्रता भी पाप बन जाता है ।
विराग के क्षण में यह भाव पकड़ेगा कि 'मैंने छोड़ा, दूसरे नहीं छोड़ पा रहे हैं; मैंने त्यागा, दूसरे नहीं त्याग पा रहे हैं--मुझसे बड़ा त्यागी कौन! मैंने संसार को लात मार दी! जो इतना कठिन था, अति कठिन को मैंने पूरा किया है ।' यह 'मैं' निर्मित हुआ ।
जब ऋषि गिरता है, तो उसमें गति होती है--बड़ी ऊंचाई से गिरने की गति । और जब आप गिरते हैं तो जमीन पर धम्म से गिर जाते हैं, कोई गति नहीं होती; जहां खड़े थे, वहीं गिरते हो । आपका अभिशाप गतिहीन है ।
इसलिए दुर्वासा को खतरा है । और वह कुछ कहते हैं, तो फिर उससे बचने का कोई उपाय नहीं है । क्योंकि वह कुछ कह कर अपनी ताकत खो रहा है । वह ताकत कहां जायेगी? एक गोली की तरह उसकी ताकत आपकी तरफ आ रही है । इसलिए समस्त धर्मों ने कहा है कि इसके पहले कि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक ऊंचाइयों की तरफ बढ़े, उसे शील को साध लेना चाहिए; नहीं तो वह खतरनाक है ।
और वह जो नियम है, तू जान कि उस नित्य नियम में कोई छूट नहीं है ।
यह कभी मत सोचना कि तू छोड़ दिया जायेगा, तू अपवाद हो जायेगा । यह भ्रांति मन को पकड़ती है कि इतनी सी भूल है, परमात्मा क्षमा कर देगा । जितनी ऊंचाई हो, उतनी ही क्षमा असंभव हो जायेगी । आपको क्षमा किया जा सकता है । जीसस को या बुद्ध को क्षमा नहीं किया जा सकता । आप इतनी भूलें कर रहे हैं कि क्षमा न हों, तो आप जी ही नहीं सकते । क्षमा का मतलब केवल इतना ही है कि आप जहां खड़े हैं, वहां भूल से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता । आप जमीन पर ही खड़े हैं । बुद्ध आकाश में उड़ रहे हैं । वहां से गिरना खतरनाक है ।
एक बार समुद्र के किनारे मेला भरा था । उसमें आदमी भी गए देखने और कुछ नमक के पुतले और पुतलियां भी गए । सच तो यह है कि मेलों में आदमी तो शायद ही जाते हों, पुतले-पुतलियां ही ज्यादा जाते हैं । तो नमक के पुतले भी उसको देखने चले गए । और समुद्र के किनारे खड़े होकर विचार करने लगे कि कितना गहरा है यह समुद्र । एक नमक के पुतले ने कहा तुम ठहरो, मैं जाता हूं और अभी थाह का पता लगा कर आता हूं । वह नमक का पुतला उसी तरह का आदमी रहा होगा, जिस तरह आदमियों में नेतागण होते हैं । आगे चलने वाले लोग । वह भी पुतलियों का एक लीडर, एक नेता रहा होगा, वह कूद पड़ा । लेकिन मेला उजड़ गया, दिन आए और गए, और वह पुतला वापस नहीं लौटा । बाकी पुतले थक गए और लौट गए । वह पुतला वापस नहीं आया बताने कि समुद्र कितना गहरा है? नमक का पुतला था, समुद्र में गया तो खो गया । नमक पिघल गया और समुद्र के साथ एक हो गया । कौन लौटे और कहे कि मैंने जान ली समुद्र की गहराई, कि यह है गहराई!
जो लोग परमात्मा को खोजने जाते हैं, वे परमात्मा को तो नहीं पाते, खुद को जरूर खो देते हैं । और वह जो खो देना है, वही परमात्मा का पा लेना है, लेकिन तब घोषणा करने वाला कोई अहंकार नहीं रह जाता कि मैंने पा लिया है ।
लुकमान की एक छोटी कहानी है । और लुकमान ने कहानियों में ही अपना संदेश दिया है । ईसप की प्रसिद्ध कहानियां आधे से ज्यादा लुकमान की ही कहानियां हैं, जिन्हें ईसप ने फिर से प्रस्तुत किया है । लुकमान कहता है, एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी । हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी । मक्खी बहुत भिनभिनाई, आवाज की, और कहा, 'भाई!' मक्खी का मन होता है हाथी को भाई कहने का । कहा, 'भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना । वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी ।' लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा । फिर हाथी एक पुल पर से गुजरता था बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गड्ढा था, मक्खी ने कहा कि 'देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना । मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी ।' हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया । फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया । उसने कहा, 'यात्रा बड़ी सुखद हुई । तीर्थयात्रा थी, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं । कोई काम हो, तो मुझे कहना ।'
तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी । उसने कहा -- तू कौन है कुछ पता नहीं । कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका कोई हिसाब नहीं है । लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी ।
लुकमान कहता है, हमारा होना भी ऐसा ही है । इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता । इस बड़े अस्तित्व में हाथी और मक्खी के अनुपात से भी हमारा अनुपात छोटा है । क्या भेद पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं । वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी हाथी स्वीकार करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है ।
हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सकता है । दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है । इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो । हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों के लिये, स्नान करते हैं तो दूसरों के लिये, सजते-संवरते हैं तो दूसरों के लिये । धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों के लिये । दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो । तुम कोई साधारण नहीं । तुम कोई मिट्टी से बने पुतले नहीं हो । तुम कोई मिट्टी से आये और मिट्टी में नहीं चले जाओगे, तुम विशिष्ट हो । तुम्हारी गरिमा अनूठी है । तुम अद्वितीय हो ।
अहंकार सदा इस तलाश में है -- वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें ।
कनफ्यूशियस लाओत्से को मिलने आया, तो वहां कोई बैठने की जगह न थी, कोई कुर्सी न थी, कोई ऊंचा आसन न था। कनफ्यूशियस तो बहुत नियमविद आदमी था। उसने कमरे के चारों तरफ देखा बैठने के पहले, कहां बैठे। लाओत्से ने कहा, कहीं भी बैठ जाओ, कमरे को तुम्हारी कोई भी फिक्र नहीं है। कमरा कोई चिंता न लेगा; कहीं भी बैठ जाओ। मैं यहां बहुत देर से बैठा हूं; कमरे ने मेरी तरफ देखा ही नहीं।
कनफ्यूशियस बैठ तो गया। लेकिन बेचैन हो गया। कभी ऐसा जमीन पर नहीं बैठा था। लाओत्से ने कहा, शरीर तो बैठ गया है; तुम भी बैठ जाओ।
उपनिषद -- पति पत्नी को प्रेम नहीं करता; पत्नी के द्वारा अपने को ही प्रेम करता है। बाप बेटे को प्रेम नहीं करता; बेटे के द्वारा अपने को ही प्रेम करता है। मां बेटे को प्रेम नहीं करती; बेटे के द्वारा अपने को ही प्रेम करती है।
अकबर यमुना के दर्शन के लिए आया था। यमुना के तट पर जो आदमी उसे दर्शन कराने ले गया था, वह उस तट का बड़ा पुजारी, पुरोहित था। निश्चित ही, गांव के लोगों में सभी को प्रतिस्पर्धा थी कि कौन अकबर को यमुना के तीर्थ का दर्शन कराए। जो भी कराएगा, न मालूम अकबर कितना पुरस्कार उसे देगा! जो आदमी चुना गया, वह धन्यभागी था। और सारे लोग इर्ष्या से भर गए थे। भारी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।
अकबर जब दर्शन कर चुका और सारी बात समझ चुका, तो उसने सड़क पर पड़ी हुई एक फूटी-कौड़ी उठा कर पुरस्कार दिया उस ब्राह्मण को, जिसने यह सब दर्शन कराया था। उस ब्राह्मण ने सिर से लगाया, मुट्ठी बंद कर ली। कोई देख नहीं पाया। अकबर ने जाना कि फूटी-कौड़ी है और उस ब्राह्मण ने जाना कि फूटी-कौड़ी है। उसने मुट्ठी बंद कर ली, सिर झुका कर नमस्कार किया, धन्यवाद दिया, आशीर्वाद दिया।
सारे गांव में मुसीबत हो गई कि पता नहीं, अकबर क्या भेंट कर गया है। जरूर कोई बहुत बड़ी चीज भेंट कर गया है। और जो भी उस ब्राह्मण से पूछने लगा, उसने कहा कि अकबर ऐसी चीज भेंट कर गया है कि जन्मों-जन्मों तक मेरे घर के लोग खर्च करें, तो भी खर्च न कर पाएंगे।
फूटी-कौड़ी को खर्च किया भी नहीं जा सकता। खबर उड़ते-उड़ते अकबर के महल तक पहुंच गई। और अकबर से जाकर लोगों ने कहा कि आपने क्या भेंट दी है? दरबारी भी इर्ष्या से भर गए। क्योंकि ब्राह्मण कहता है कि जन्मों-जन्मों तक अब कोई जरूरत ही नहीं है; यह खर्च हो ही नहीं सकती। जो अकबर दे गया है, वह ऐसी चीज दे गया है, जो खर्च हो नहीं सकती।
अकबर भी बेचैन हुआ। क्योंकि वह तो जानता था कि फूटी कौड़ी उठा कर दी है। उसको भी शक पकड़ने लगा कि कुछ गड़बड़ तो नहीं है। उस फूटी कौड़ी में कुछ छिपा तो नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैंने सड़क से उठा कर दे दी; उसके भीतर कुछ हो! बेचैनी अकबर को भी सताने लगी। एक दिन उसकी रात की नींद भी खराब हो गई। क्योंकि सभी दरबारी एक ही बात में उत्सुक थे कि उस आदमी को दिया क्या है? उसकी पत्नियां भी आतुर हो गईं कि ऐसी चीज हमें भी तुमने कभी नहीं दी है। उस ब्राह्मण को तुमने दिया क्या है?
वह ब्राह्मण निश्चित ही कुशल आदमी था। आखिर अकबर को उस ब्राह्मण को बुलाना पड़ा।
वह ब्राह्मण बड़े आनंद से आया। उसने कहा कि धन्य मेरे भाग्य, ऐसी चीज आपने दे दी है कि कभी खर्च होना असंभव है। जन्मों-जन्मों तक हम खर्च करें, तो भी खर्च नहीं होगी। अकबर ने कहा कि मेरे साथ जरा अकेले में चल, भीतर चल! अकबर ने पूछा, बात क्या है? उसने कहा, बात कुछ भी नहीं है। आपकी बड़ी अनुकंपा है! अकबर कोशिश करने लगा तरकीब से निकालने की; लेकिन उस ब्राह्मण से निकालना मुश्किल था जो आधी कौड़ी पर इतना उपद्रव मचा दिया था। वह कहता कि आपकी अनुकंपा है, धन्य हमारे भाग्य! सम्राट बहुत हुए होंगे, लेकिन ऐसा दान कभी किसी ने नहीं दिया है। और ब्राह्मण भी बहुत हुए दान लेने वाले, लेकिन जो मेरे हाथ में आया है, वह कभी किसी ब्राह्मण के हाथ में नहीं आया होगा। यह तो घटना ऐतिहासिक है।
आखिर अकबर ने कहा, हाथ जोड़ता हूं तेरे, अब तू सच-सच बता दे, बात क्या है? तुझे मिला क्या है? मैंने तुझे फूटी-कौड़ी दी थी! उस ब्राह्मण ने कहा, अगर अहंकार कुशल हो, तो फूटी-कौड़ी पर भी साम्राज्य खड़े कर सकता है। हमने फूटी कौड़ी पर ही साम्राज्य खड़ा कर लिया। तुम्हारे मन में तुरंत ईष्या पैदा हो गई कि पता नहीं, क्या मिल गया है! और तुम भलीभांति जानते हो कि फूटी कौड़ी ही थी।
आदमी डरता है स्वतंत्र होने से।
मैं सूरज की रोशनी में आया, तब एक नई चीज पैदा होती है, वह मेरी छाया है। वह नहीं थी। जब मैं घर के भीतर था, वह नहीं थी। जब मैं घर के भीतर था, तब वह सूरज के नीचे भी नहीं थी। वह घर के भीतर भी नहीं थी, सूरज के नीचे भी नहीं थी। मैं सूरज के प्रकाश में आया, तो मेरे और सूरज के संबंध से पैदा हुई एक by-product है। वह मेरे पीछे बन गई छाया है। वह छाया मरणधर्मा है। जैसे ही मैं हट जाऊंगा या सूरज हट जाएगा, वह छाया खो जाएगी। अभी भी वह है नहीं। और अगर मैं समझ लूं कि मैं छाया हूं, तो मैं मुश्किल में पडूंगा; उसी मुश्किल में पडूंगा, जैसा मैंने सुना है कि एक लोमड़ी पड़ गई थी।
सुबह निकली थी। सूरज निकल रहा था। देखी उसने छाया, बड़ी लंबी थी! सोचा, आज भोजन के लिए कम से कम एक ऊंट की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि अपनी छाया को देख कर ही तो पता चलता है कि कितने बड़े हम हैं। और तो कोई उपाय भी नहीं है। लोमड़ी को पता भी कैसे चले कि कितनी बड़ी है। छाया! जब उसने देखा, इतनी बड़ी मेरी छाया है, तो मेरे बड़े होने में संदेह क्या! सोचा, एक ऊंट से कम में आज पेट न भरेगा। खोज पर निकली भोजन की। दोपहर होने आ गई। खोजती रही; ऊंट तो मिला नहीं। मिल भी जाता तो किसी प्रयोजन का न था। भूख बहुत बढ़ गई, भोजन मिला नहीं। दोबारा उसने झांक कर देखा कि छाया की क्या हालत है। सूरज सिर पर आ गया था। छाया सिकुड़ कर बहुत छोटी हो गई थी। उसने सोचा, अब तो, अब तो छोटा-मोटा एक खरगोश भी मिल जाए, तो काम चल सकता है। अब तो छोटे-मोटे खरगोश से भी काम चल सकता है।
छाया से जो जीएगा, वह ऐसी ही मुश्किल में पड़ता है। कभी छाया बहुत बड़ी मालूम पड़ती है, संयोग की बात है। जवानी में सभी को छाया बड़ी मालूम पड़ती है। तब सूरज निकल रहा होता है।
नसरुद्दीन कहता था कि मैं जब जवान था, मैंने तय किया था कि करोड़पति होकर रहूंगा। यह मेरा पक्का संकल्प था। लेकिन जब वह कह रहा था, तब वह एक भिखारी से कह रहा था, मित्र से। दोनों भीख मांगते थे। यह मेरा संकल्प था जवानी में कि करोड़पति होकर ही मरूंगा। उसके मित्र भिखारी ने गौर से देखा। उसने कहा, फिर क्या हुआ तुम्हारे संकल्प का? नसरुद्दीन ने कहा, बाद में मैंने पाया, करोड़पति होने की बजाय संकल्प को बदल लेना ज्यादा आसान है। संकल्प बदल लिया।
बाद में सभी ऐसा पाते हैं। उसका कारण यह नहीं है। छाया छोटी हो गई होती है। खरगोश से भी काम चल जाता है। बूढ़े होते-होते-होते-होते-होते आदमी पाता है कि ठीक है। जवानी में छाया बड़ी मालूम पड़ती है, वह सांयोगिक है। बुढ़ापे में सब सिकुड़ जाता है, छोटा हो जाता है। लेकिन जो जानते हैं, वे जवानी में भी जानते हैं कि छाया छाया है, वह मैं नहीं हूं।
ठीक ऐसी ही एक अंतर-छाया है, जिसका नाम अहंकार है। उसे हम कहें, inner shadow. जीवन के संबंधों से एक भीतर भी छाया निर्मित होती है, जो मेरा अहंकार है; जिससे मैं तौलता हूं कि मैं कौन हूं। और वह रोज हमें बदलना पड़ता है; क्योंकि वह भी संयोग पर निर्भर करता है।
परतंत्रता में एक सुविधा है कि दायित्व दूसरे पर चला जाता है।
नसरुद्दीन को हिंदुस्तान भेजा गया था; उसके सुलतान ने भेजा था। हिंदुस्तान के सम्राट के पास जाकर उसने कहा कि धन्य हैं आप, हे पूर्णमासी के चांद!
जब नसरुद्दीन वापस पहुंचा, तो सम्राट बहुत नाराज था। उसने कहा कि मैंने सुना है, तुमने कहा कि पूर्णमासी का चांद! मुझे छोड़ कर और भी कोई पूर्णमासी का चांद है?
नसरुद्दीन ने कहा, आप? आप दूज के चांद हैं। आप समझे नहीं, मैंने क्यों पूर्णमासी का चांद कहा। अब मौत करीब है उस आदमी की, मरेगा। आप दूज के चांद हैं!
वह यहां से भी सम्मान लेकर गया, पुरस्कार लेकर गया; उसने वहां भी सम्मान और पुरस्कार लिया। आदमी ऐसा कमजोर है कि दूज के चांद से भी फुसल जाता है और पूर्णमासी के चांद से भी फुसल जाता है। हम तैयार ही बैठे हैं कि कोई कहे। साधारण सी स्त्री को कोई कह देता है कि तुझसे सुंदर कोई भी नहीं है! फिर वह आईने में अपनी शक्ल ही नहीं देखती, वह भरोसा ही कर लेती है।
नसरुद्दीन अपनी प्रेयसी के पास बैठा है समुद्र के किनारे। उसकी प्रेयसी कहती है कि समुद्र और तुममें बड़ी समानता है। जब भी मैं समुद्र को देखती हूं, तुम्हारी याद आती है; और जब भी तुमको देखती हूं, समुद्र की याद आती है। नसरुद्दीन फूल गया। नसरुद्दीन ने कहा, निश्चित ही! निश्चित ही समानता इसीलिए मालूम पड़ती होगी, जैसा कि मैं हूं, ऐसा ही विस्तार यह सागर का, ऐसा ही जंगली इसका रुख, ऐसी ही कच्ची इसकी आवाजें और ऐसा ही रूमानी है! जरूर इसीलिए तुम्हें मेरी और इसके साथ याद आती होगी।
उसकी प्रेयसी ने कहा, क्षमा करो, you both make me sick! और कोई बात नहीं है।
किसी से भी कुछ कह दो, वह मानने को राजी है। कैसी-कैसी बातों पर लोग राजी हो गए हैं! स्त्रियां राजी हैं कि उनकी आंखें मछलियों की तरह हैं! किसी की आंखें नहीं हैं मछली की तरह। उनके ओंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह हैं! किसी के ओंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह नहीं हैं। उनके शरीर से इत्रों की सुगंध आती है! किसी के शरीर से कभी नहीं आती। मगर सब राजी हैं! कवि राजी हैं कहने को, सुनने वाले राजी हैं, स्वीकार करने वाले राजी हैं। कहानियां पुरानी, पिटी हुई, कविताएं पुरानी, मरी हुई रोज कही जाती हैं और चलती चली जाती हैं। क्यों? वह जो भीतर की अहंकार की छाया है, वह एकदम तृप्त होती है। कांटे से भी कहो कि तुम फूल हो, वह राजी हो जाता है।
एक हंसोड़ अमरीका का अभिनेता दूसरे महायुद्ध में युद्ध के मैदान पर गया--सैनिकों के मनोरंजन के लिए। बॉब उसका नाम है। जनरल मैकार्थर जहां मौजूद थे, वहां भी उसने आकर सैनिकों को हंसाने का कुछ कार्यक्रम किया। और वह बड़ा आनंदित हुआ कि उसे मैकार्थर के पास फोटो उतरवाने का मौका मिला। फोटो उतर जाने के बाद मैकार्थर ने उससे कहा -- बॉब, एक कापी मुझे भी भेज देना।
वह बॉब थोड़ा हैरान हुआ कि मैकार्थर को मेरे साथ के चित्र का क्या प्रयोजन होगा! लेकिन उसने कापी भेज दी। और बाद में उसने पत्र लिखा मैकार्थर को कि मैं जानना चाहता हूं कि मुझ गरीब अभिनेता के साथ उतरवाए चित्र का आपके लिए क्या मूल्य होगा! मैकार्थर ने कहा कि जब मेरे बेटे ने तुम्हारे साथ चित्र देखा, तो उसने कहा, पिताजी, पहली दफे आप किसी शानदार और जानदार और प्रसिद्ध आदमी के साथ खड़े हुए हैं। उसके बेटे ने कहा। क्योंकि बेटे को मैकार्थर का क्या मूल्य! बेटे को बाप का कोई मूल्य नहीं होता। लेकिन बॉब, फिल्म अभिनेता, उसके साथ मैकार्थर खड़ा है, तो बेटे ने कहा कि यह चित्र शानदार है आपका। मैंने बहुत चित्र देखे, न मालूम किस-किस के साथ आप खड़े रहते हैं। यह आदमी है, सेलिब्रिटी! यह है एक।
आपने कभी सोचा कि अगर आपको चित्र उतरवाने का मौका मिले, तो कभी मन में आंख बंद करके थोड़ा contemplate करना कि किसके साथ उतरवाना चाहेंगे? सौ में निन्यानबे मौके तो ये हैं कि वह कोई अभिनेत्री या अभिनेता होगा। सौ में दस मौके ये हैं कि वह कोई राजनैतिक नेता होगा। क्या कोई एकाध मौका भी ऐसा है कि कोई पुण्यात्मा होगा? संदेह है। भला ऊपर से आप कह दें कि नहीं-नहीं, मैं नहीं ऐसा करूंगा। लेकिन भीतर!
एक ज्योति का मुझे अपने भीतर अनुभव हो जाए तो सारा जीवन ज्योति का सागर हो जाता है। एक बिंदु को मैं जान लूं तो मैं पूरे सागर को पहचान लेता हूं।
अरबी में एक कहावत है कि परमात्मा जब भी किसी आदमी को बनाता है, तो दुनिया में धक्का देने के पहले उसके कान में एक मजाक कर देता है। उससे कह देता है, तुझसे अच्छा आदमी कभी भी नहीं बनाया। बस उस मजाक में सभी आदमी जीते हैं। जिंदगी भर कान में वह गूंजती रहती है परमात्मा की बात कि मुझसे अच्छा कोई भी नहीं! मगर वह दिल में ही रखनी पड़ती है, क्योंकि बाकी को भी यही कह दिया है उसने। उसको अगर जोर से कहिए, तो झगड़े के सिवाय कुछ हो नहीं सकता। इसलिए मन में अपने-अपने हर आदमी समझता है। दूसरे से शिष्टाचार की बातें करता है, मन में सत्य को जानता है, कि सत्य मुझे पता है।
लोग समानांतर हैं और सारी गलियां समानांतर हैं। कहीं कोई मिलता नहीं। इसलिए जीवन में तुम इतने अकेले हो।
मुल्ला नसरुद्दीन से किसी ने पूछा कि गली के कोने पर जो हमीद सुलतान नाम के सज्जन रहते हैं, आप उनके भाई हैं? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि भाई मैं नहीं, हमीद सुलतान मेरा भाई है। ऐसा अहंकार है!
तुम इतने अकेले मालूम पड़ते हो, अहंकार के कारण। अहंकार अकेला कर जाता है। और निरअहंकार जोड़ जाता है।
एक चर्च में एक युवक-युवती ने विवाह किया। और जैसे ही उन्होंने रजिस्टर में दस्तखत किये, उस युवती ने दस्तखत करने के बाद फाउंटेन पेन नीचे पटक दिया। और चर्च के पादरी से कहा, 'रुकें। मैं तलाक चाहती हूं।' पादरी हैरान हुआ, कि तलाक हमने बहुत देखे लेकिन इतनी जल्दी अभी तक नहीं देखा। हालीवुड में भी नहीं होता है ऐसा। इतनी जल्दी? अभी दस्तखत ही हुए हैं और कारण क्या आ गया? उसने कहा कि इस आदमी ने मुझसे बड़े दस्तखत किए। यह एक झंझट की बात है। यह आगे झंझट ही होने वाली है। यह अभी से दबाने की कोशिश कर रहा है।
जब भी तुम किसी की नकल करो तो समझना कि तुम बचकानी बात कर रहे हो। प्रौढ़ता का लक्षण है, अपने पैरों पर खड़े होना।
गांधी जी गोलमेज कांफ्रेंस में इंग्लैंड गए थे। गांधी जी के एक सेक्रेटरी बर्नार्ड शॉ से मिलने गए। बर्नार्ड शॉ से उन्होंने पूछा...।
शिष्य हमेशा ही ऐसा पूछते हैं। शिष्य हमेशा पूछते हैं कि हमारे महात्मा के बाबत क्या खयाल है? महात्मा की फिक्र नहीं होती, फिक्र इस बात की होती है कि अगर हमारा महात्मा बड़ा है तो हम बड़े महात्मा के बड़े शिष्य हैं! जो मजा...मजा बहुत दूसरा होता है।
सेक्रेटरी ने बर्नार्ड शॉ से पूछा कि महात्मा गांधी के बाबत आपका क्या खयाल है, आप उनको महात्मा मानते हैं? वह बर्नार्ड शॉ तो बहुत अदभुत आदमी था। उसने कहा, महात्मा? महात्मा मानता हूं, लेकिन नंबर दो; नंबर एक का तो मैं ही हूं।
सेक्रेटरी बहुत हैरान हुए होंगे कि कैसा आदमी है यह! यह कहता है कि नंबर एक का मैं हूं और नंबर दो के गांधी हैं! और दो ही महात्मा हैं दुनिया में, ज्यादा भी नहीं हैं; लेकिन वे नंबर दो, नंबर एक मैं हूं।
बहुत दुखी लौटे और गांधी को आकर कहा कि बर्नार्ड शॉ तो बहुत अजीब सा आदमी मालूम पड़ता है, बहुत अहंकारी मालूम पड़ता है। मैंने पूछा तो उसने यह कहा कि मैं नंबर एक हूं, आप नंबर दो। गांधी ने कहा कि वह ठीक कहता है, वह सच्चा आदमी है, सबके मन में खयाल तो यही रहता है कि नंबर एक हम हैं। लेकिन कहने की हिम्मत लोग कम जुटा पाते हैं। उसने ठीक बात कह दी।
और इस आदमी को चोट क्यों लगी गांधी के नंबर दो होने से? चोट लगी इसलिए कि नंबर दो महात्मा के शिष्य हो गए। जब आदमी के पास कुछ नहीं रह जाता तो झूठे सब्स्टीटयूट खोजता है ऊंचे होने की।
बुद्ध -- जिस तरह कोई मोमबत्ती बिना आग के नहीं जल सकती, उसी तरह मनुष्य भी बिना आध्यात्मिक ज्ञान के जीवन नहीं जी सकता ।
एक आदमी पेरिस विश्वविद्यालय में फिलासफी का प्रोफेसर था । एक दिन सुबह ही आकर उसने अपनी क्लास के विद्यार्थियों को कहा कि तुम्हें कुछ खबर मिली, मुझसे बड़ा आदमी इस दुनिया में दूसरा नहीं है। विद्यार्थी समझे कि दिमाग खराब हो गया। एक तो फिलासफी की तरफ दिमाग खराब लोग ही उत्सुक होते हैं और इनका डर रहता ही है कि कभी भी दिमाग खराब हो जाए। असल में जो दिमाग से काम करेगा उसी के तो खराब होने का डर रहता है। जो दिमाग से काम ही नहीं करेंगे उनका खराब कैसे होगा। लड़के समझे कि दिमाग गड़बड़ हो गया, बेचारा गरीब प्रोफेसर है, ये दुनिया का सबसे बड़ा आदमी कैसे हो गया।
राजनीतिज्ञ अगर दुनिया में कहते फिरते हैं कि हमसे बड़ा कोई भी नहीं है तो कोई नहीं फिक्र करता उनकी, क्योंकि उनका दिमाग खराब होता ही है। लेकिन दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर कहने लगे! तो लड़कों ने पूछा कि आप कह रहे हैं यह! आप दुनिया के सबसे बड़े आदमी हैं?
उसने कहा, न मैं केवल कह रहा हूं, मैं सिद्ध कर सकता हूं। क्योंकि मैं बिना सिद्ध किए कोई बात कहता ही नहीं हूं।
उन्होंने कहा, तो आप कृपा करें और सिद्ध कर दें।
लड़कों को बहुत कठिनाई थी कि वह कैसे सिद्ध करेगा! लेकिन उन्हें पता नहीं, उस प्रोफेसर ने बड़ा व्यंग्य किया, बड़ा मजाक किया। दुनिया में कुछ अच्छे लोग बड़े व्यंग्य कर जाते हैं, लेकिन फिर भी हमें पता नहीं चलता।
उस आदमी ने, उस प्रोफेसर ने उठ कर बोर्ड पर गया जहां दुनिया का नक्शा लटका हुआ था। और विद्यार्थियों को कहा कि इस बड़ी दुनिया में सबसे श्रेष्ठ देश कौन-सा है? सभी फ्रांस के रहने वाले थे, उन्होंने कहा, फ्रांस। स्वभावतः, फ्रांस में रहने वाला आदमी यही समझता है कि फ्रांस सबसे बड़ा देश है, क्योंकि फ्रांस में रहने वाला यह कैसे मान सकता है कि जहां वह रहता है वह देश बड़ा न हो! जहां वह रहता है वह देश तो बड़ा होना ही चाहिए। इतना बड़ा आदमी जहां रहता है! फ्रांस सबसे बड़ा देश है।
उस प्रोफेसर ने कहा, तो फिर बाकी दुनिया की बात खत्म हो गई। अब अगर मैं सिद्ध कर दूं कि फ्रांस में मैं सबसे बड़ा हूं तो मैं सिद्ध हो जाऊंगा कि दुनिया में सबसे बड़ा हूं। तब भी विद्यार्थी नहीं समझ पाए कि वह कहां ले जा रहा है।
फिर उसने कहा कि फ्रांस में सबसे श्रेष्ठ नगर कौन-सा है?
तब विद्यार्थियों को शक हुआ। वे सभी पेरिस के रहने वाले थे। उन्होंने कहा, पेरिस। तब उन्हें थोड़ा शक हुआ कि मामला गड़बड़ हुआ जा रहा है।
उस प्रोफेसर ने कहा, और पेरिस में सबसे श्रेष्ठ स्थान कौन-सा है? निश्चित ही, विद्या का केंद्र, विश्वविद्यालय, युनिवर्सिटी।
उसने कहा, अब युनिवर्सिटी ही रह गई सिर्फ। और युनिवर्सिटी में सबसे श्रेष्ठ सब्जेक्ट, सबसे बड़ा विषय कौन-सा है? फिलासफी, दर्शनशास्त्र।
और उसने कहा, मैं दर्शनशास्त्र का हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट हूं। मैं इस दुनिया का सबसे बड़ा आदमी हूं!
आदमी का अहंकार कैसे-कैसे रास्ते खोजता है! जब आप कहते हैं, हिंदू धर्म सबसे बड़ा है तो भूल कर यह मत सोचना कि आपको हिंदू धर्म से कोई मतलब है, आपको मतलब खुद से है। आप हिंदू हैं और हिंदू धर्म को महान कह कर अपने को महान कहने की तरकीब खोज रहे हैं। और जब आप कहते हैं कि हमारा भगवान सबसे बड़ा और हमारा महात्मा सबसे बड़ा, तो आपको न भगवान से कोई मतलब है, न महात्मा से कोई मतलब है। आप कहते हैं कि मेरा महात्मा, मैं इतना बड़ा आदमी हूं कि मेरा महात्मा छोटा कैसे हो सकता है?
बुद्ध -- वह व्यक्ति जो पचास लोगों से प्रेम करता है उसके पास पचास संकट हैं, और जो व्यक्ति किसी से भी प्रेम नहीं करता उसके पास कोई संकट नहीं है
एक कौवा भागा जा रहा था। एक कोयल ने पूछा कि चाचा, कहां भागे जा रहे हो, बड़ी तेजी में हो! उस कौवे ने कहा कि मैं पूरब की तरफ जा रहा हूं। यहां के लोग बेहूदे हैं, नासमझ हैं, शास्त्रीय संगीत समझते ही नहीं। मैं जब भी शास्त्रीय संगीत छेड़ता हूं, बस लोग भगाते हैं, ताली बजाने लगते हैं कि हटो, भागो! मैं पूरब की तरफ जा रहा हूं। मैंने सुना है कि पूरब के लोग शास्त्रीय संगीत के बड़े पारखी हैं। मैं तो अब पूरब में ही जाकर अपना गीत गाऊंगा।
कोयल ने कहा: चाचा, जैसी तुम्हारी मर्जी। जहां जाना हो जाओ, मगर खयाल रखो, लोग सब जगह एक जैसे हैं और तुम्हारा शास्त्रीय संगीत कहीं भी पसंद नहीं किया जायेगा। अच्छा तो यही हो कि तुम इसे संगीत समझना छोड़ो। अच्छा तो यही हो कि तुम जैसे हो वैसा अपने को स्वीकार करो।
तमसो मा ज्योतिर्गमय,--मुझे अंधेरे से प्रकाश की तरफ ले चलो। 'मृत्योर्मा अमृतं गमय'--मुझे मृत्यु से अमृत की तरफ ले चलो। 'असतो मा सद्गमय'--मुझे असत से सत्य की तरफ ले चलो।
मुल्ला नसरुद्दीन से कोई पूछ रहा है कि तेरे भाई में और तेरी उम्र में कितना फासला है? तो नसरुद्दीन ने कहाः मेरा भाई मुझसे तीन साल छोटा है और रोज छोटा होता जा रहा है। वह आदमी थोड़ा चौंका। आधी बात तो ठीक थी कि होगा तीन साल छोटा; लेकिन रोज छोटा होता जा रहा है... ! उसने कहाः मैं समझा नहीं। तुम किस हिसाब से कहते हो नसरुद्दीन? नसरुद्दीन ने कहाः रीजनिंग, तर्क। एक साल पहले मैंने सुना कि मेरा भाई किसी को कह रहा था कि वह मुझसे दो साल छोटा है। एक साल बीत गया। अब वह मुझसे तीन साल छोटा है। और ज्यादा देर न लगेगी कि मैं उसके पिता की उम्र का हो जाऊंगा। वह रोज छोटा होता जा रहा है। एक साल बीत गया है और मैं एक साल बड़ा हो गया हूं।
अहंकार के तर्क सिर्फ अपनी तरफ देखते हैं।
बोध की आवश्यकता
कथा :
बरसात की एक रात में रेल के फाटक पर पार करते वक्त एक व्यक्ति दुर्घटना से बाल-बाल बच गया । उसने गुस्से में आकर रेल्वे पर मुकदमा दायर कर दिया । सिग्नल-मैन ने गवाही में कहा, मैंने तो खूब बत्ती हिलाई थी । जब मुकदमा जीत कर सिग्नल-मैन बाहर आया तो स्टेशन-मास्टर ने उसकी पीठ ठोंकी और कहा, शाबास । मैंने तो समझा था कि तुम वकील की जिरह से घबड़ा जाओगे । लेकिन तुम गजब के हिम्मत के आदमी हो । तुम कहते ही गए बार-बार कि मैंने तो बत्ती खूब हिलाई थी, मैंने तो बत्ती खूब हिलाई थी । तुम डटे रहे अपनी बात पर । सिग्नल-मैन बोला, नहीं साहब । मैं जरा भी नहीं घबड़ाया यह बात तो ठीक है ।
हां, अगर वकील ने पूछा होता कि बत्ती जल रही थी या नहीं? तब उस समय जवाब देना मेरे लिए कठिन हो जाता ।
अब तुम बिना जली बत्ती हिलाते रहो, इससे कुछ होने वाला नहीं है । निरोध बिना जली बत्ती का हिलाना है । भीतर कुछ भी नहीं है । बोध में बत्ती हिलानी भी न पड़ेगी; प्रकाश काफी है ।
प्रकाश के साथ ही क्रांति घटती है । खाली निरोध से प्रकाश तो आता नहीं ।
एक ईसाई मिशनरी नया-नया अफ्रीका के एक आदिवासी कबीले में गया। वह डाक्टर भी था और उनकी सेवा करना चाहता था। पहला मरीज आया, तो उसने दवा का प्रिस्क्रिप्शन लिखा, सारी जांच पड़ताल की, मेहनत की, घंटा भर लगाया। प्रिस्क्रिप्शन लिखा, प्रिस्क्रिप्शन दिया। पंद्रह दिन बाद वह बाजार में उस आदमी को देखा, तो वह हैरान हुआ। उसने कहा कि 'यह तुमने क्या किया?' वह प्रिस्क्रिप्शन को गले में लटकाये घूम रहा था। क्योंकि वह समझा, यह ताबीज है। जंगली आदमी! वह समझा कि यह ताबीज है। इसको गले में लटकाने से सब ठीक हो जाएगा।
बंधे हुए उत्तरों का एक खतरा है कि वे आंखों को अंधा कर देते हैं।
एक धनपति बहुत व्यस्त था और उस दिन चाहता था, कि किसी से मिल-जुले न। कुछ बड़ा अहम सवाल था, उलझन थी। तो उसने अपने सेक्रेटरी को कहा कि कोई भी फोन करे, कहना कि मालिक आज न मिल सकेंगे। आज असंभव। शायद कोई यह भी कहे कि बहुत आवश्यक है मेरा काम। एकदम जरूरी है। तो कहना कि सभी यही कहते हैं। कोई कहे, 'मित्र हूं, प्रियजन हूं, फलां, ढिकां हूं, कहना कि सभी यही कहते हैं।' फोन आया। सेक्रेटरी इनकार करता गया कि 'नहीं, नहीं।' लेकिन दूसरी तरफ से महिला जिद करने लगी। और उसने कहा कि मुझे मिलना ही है। और जब वह नहीं माना, तो उसने कहा कि तुम समझते नहीं हो, मैं उनकी पत्नी हूं। उसने कहा, 'यह तो सभी कहती हैं। जो देखो वही यही कहती है।'
योग का अर्थ, अपने भीतर जुड़ जाना। जैसे ही तुम जुड़े, तुम परमात्मा हो गये।
पागलखाने में दो पागल करीब-करीब लगता था ठीक हो गये। तो हर वर्ष परीक्षण होता था। तो परीक्षा के लिए दोनों बुलाये गये। एक पागल भीतर गया, दूसरा बाहर बैठा रहा। उसने कहा कि जो कुछ भी उत्तर हो, तू लौटते में मुझे भी बता देना। आम आदमी संदिग्ध होता है और दूसरे से उत्तर जानना चाहता है, तो पागल तो बेचारा पागल है! किसी तरह जोड़त्तोड़ कर ऐसी हालत आई है कि परीक्षा का दिन आया है। अगर पास हो गये तो बाहर निकले, अन्यथा फिर पड़ गये कारागृह में।
एक आदमी भीतर गया। डाक्टर ने उससे पूछा कि अगर तुम्हारी आंखें निकाल ली जायें तो क्या होगा? तो उस आदमी ने कहा, आंखें अगर निकाल ली जायें? तो मुझे दिखाई पड़ना बंद हो जायेगा। वह बाहर निकला। उसने दूसरे से कहा ख्याल रखना, उत्तर है, दिखाई पड़ना बंद हो जायेगा। वह दूसरा भीतर गया। डाक्टर ने उससे पूछा, अगर तुम्हारे दोनों कान काट लिये जायें? उसने कहा साफ है, दिखाई पड़ना बंद हो जायेगा।
सदगुरु का इतना ही अर्थ है कि खोये भरोसे को जो जगा दे। और तुम्हें उस पीड़ा के मार्ग से गुजार दे साथ दे कर, जहां तुम अकेले न गुजर सकोगे।
महामहिम मटकानाथ ब्रह्मचारी, मुल्ला नसरुद्दीन, ढ़ब्बू जी और चंदूलाल एक बार चारों जुआ खेलते पकड़े गए। छापा मारने वाला पुलिस अफसर खुशी से फूला न समाया। चारों से उसने कहा कि चलो थाने, आज तुम्हें मजा चखाएं! वे चारों मजे से साथ हो लिए।
एक चौराहे पर पहुंच कर मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा माई—बाप, आधी फर्लांग की दूरी पर ही बढ़िया चाय—पान की दुकान है। कल हमें सजा हो जाएगी, फिर पता नहीं वह बढ़िया चाय पीने को हमें मिले या न मिले! और वे मीठे और जायकेदार पान फिर खाने को मिलें या न मिलें! यदि आप आज्ञा दें तो हम चारों जाकर आखिरी बार चाय—पान कर आएं, साथ में आपके लिए भी लेते आएंगे।
विचार तो बढ़िया है—पुलिस अफसर बोला—जाओ, जल्दी से वापस आना और मेरे लिए पान जरा बढ़िया लगवा कर लाना।
वे चारों गए सो गए। बेचारा पुलिस अफसर दों—तीन घंटे तक उनके लौटने की राह देखता रहा। एक वर्ष बाद दीवाली के दिन फिर वही घटना घटी। चारों के चार फिर जुआ खेलते पकड़े गए। पुलिस अफसर बोला बच्चू अब न छोडूंगा। बुरे फंसे हो इस बार। पिछली बार तो धोखा देकर निकल गए थे, अब चलो थाने, तुम्हें अच्छा मजा चखाता हूं।
चारों फिल्मी गाने की धुन गुनगुनाते हुए फिर साथ हो लिए। फिर रास्ते में वही चौराहा पड़ा। और नसरुद्दीन ने फिर वही पुरानी बात दोहराई. माई—बाप, जैसा कि आपको पता ही है, पास ही चाय—पान की दुकान है, यदि आज्ञा दें तो हम लोग जाते—जाते एक बार चाय—पान कर आएं और आपके लिए भी श्रेष्ठतम पान लगवा लाएंगे।
पुलिस अफसर तो क्रोध से लाल होकर बोला, चालबाजो, मैं तुम्हारी एक—एक चालबाजी से अच्छी तरह परिचित हूं। मुझसे फिर वही चालाकी करने की कोशिश! बदमाशो, क्या तुम सोचते हो कि मैं निरा मूर्ख हूं? अरे लोमड़ी की औलादो, मैंने भी घाट—घाट का पानी पीया है। बाल धूप में नहीं पकाए। तुम सब यहीं रुको, मैं खुद जाता हूं तुम्हारे लिए पान लेकर आता हूं।
तुम तो तुम्हीं हो! इधर से नहीं उधर से, भूल तुम वही करोगे। इस जन्म में जो की है वही अगले जन्म में करोगे, वही और अगले जन्म में करोगे।
दुखी जल्दी में होता है। सिर्फ जो आनंद में है, वह धीरे चलता है।
एक रात मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर वापस लौटा, बदहवास, पसीने से तरबतर, घबड़ाया हुआ। जल्दी से भीतर घुसकर दरवाजा बंद कर लिया।
पत्नी ने कहा, इतने घबडाए हुए हो! बात क्या है? कहां से आ रहे हो? उसने कहा कि दुकान से ही लौट रहा हूं। लेकिन एक बदमाश मिल गया। उसने मेरा चश्मा भी छीन लिया; फाउंटेन पेन भी खीसे से निकाल ली, रुपए भी खीसे से ले लिए; कोट भी उतार लिया। यहां तक कि मेरे जूते उतार लिए।
उसकी पत्नी ने कहा, और तुम तो पिस्तौल रखे हुए हो! तो नसरुद्दीन ने कहा, वह तो भाग्य की बात कहो कि बदमाश की नजर पिस्तौल पर नहीं पड़ी; नहीं तो क्या वह छोड़ देता!
हैरानी होती है! नास्तिक तो मिल जाएंगे जिनकी कोई शिकायत नहीं है, आस्तिक खोजना मुश्किल है बिना शिकायत के। और आस्तिक का लक्षण यह है कि जिसको कोई शिकायत न हो।
बुद्ध के पास कोई आता, तो बुद्ध कहते थे, एक साल तो बिना पूछे मेरे पास बैठ जाओ। एक साल बाद तुम पूछना शुरू करना। जो जल्दी में होता, वह कहता, तो फिर मैं एक साल बाद ही आ जाऊं! बुद्ध कहते, तब तुझे दो साल बिठाऊंगा। क्योंकि एक साल तो यह जो तूने गंवाया, और एक तो बाकी रहा ही।
स्थूल शरीर से हम परिचित हैं, सूक्ष्म शरीर से योगी परिचित होता है। और योग के भी जो ऊपर उठ जाते हैं, वे उससे परिचित होते हैं जो आत्मा है।
धर्मराज अच्छे मूड में थे। शायद लाटरी खुली होगी या रात जुए में जीत गए होंगे। एक व्यापारी से कह बैठे, चंदूलाल, जाओ तुम्हें तुम्हारी मर्जी पर छोड़ते हैं। स्वर्ग या नरक, जहां जाना चाहते हो वहीं भेज देंगे।
चंदूलाल खीसें निपोर कर बोले, भगवान, जहां दो पैसे कमाने की जुगत हो वहीं भेजो। स्वर्ग-नरक में क्या फर्क पड़ता है!
एक जहाज डूब रहा था। सामान फेंका गया जहाज के बाहर, ताकि वजन कम हो जाए। और डूब ही नहीं रहा था जहाज, एक बड़ी शार्क मछली जहाज का पीछा कर रही थी इस प्रतीक्षा में कि कब डूबे, कि उसके यात्रियों को सफा कर जाए। उसको भी किसी तरह से संतुष्ट करना पड़ रहा था। जो भी सामान था उसके मुंह में फेंका जा रहा था। भोजन फेंका; जहाज संतरों के पिटारे ढो रहा था, वे फेंके; टेबल, कुर्सी, जो मिल सका फेंका। मगर दस-पांच मिनट के बाद वह फिर शार्क मछली आ जाए। और जहाज डुबकी मारने के करीब है। आखिर यह हालत आ गई कि तय करना पड़ा कि अब कुछ लोग भी फेंकने पड़ेंगे। सारे लोग एक यहूदी को फेंकने के लिए राजी थे, क्योंकि वह यहूदी जहाज पर भी लोगों को लूट रहा था। अब अकेला यहूदी करे भी क्या! सबने मिल कर उसको फेंक दिया शार्क मछली के मुंह में!
लेकिन जहाज को डूबना था सो डूबा और अंततः शार्क मछली सारे यात्रियों को हड़प गई। यात्री जब शार्क मछली के पेट में पहुंचे तो बड़े हैरान हुए। यहूदी कुर्सी पर बैठा था, टेबल सामने लगा रखी थी, संतरे टेबल पर लगा रखे थे और दो-दो आने में बेच रहा था। पुराने लोग, जो शार्क मछली खा गई थी, खरीद रहे थे।
यहूदी और क्या करे! जहां मौका मिल जाएगा, अपनी पुरानी आदतों से जीएगा।
क्रोध, जलते हुए कोयले को किसी दूसरे व्यक्ति पर फेंकने की इच्छा से पकड़े रहने के समान है यह सबसे पहले आपका हाँथ ही जलाएगा ।
सड़क के किनारे दो व्यक्ति लड़ रहे थे। एक के हाथ में बड़ा डंडा था और दूसरे के हाथ में एक लंबा चाकू था और दोनों मारने-मरने पर उतारू थे, और अनेक लोग समझा रहे थे कि "भाई, लड़ो मत, क्या फायदा। तुम्हारे बाल बच्चे हैं, उसकी भी पत्नी है, घर द्वार है। तुम्हारे बूढ़े मां-बाप हैं। यह तुम क्या कर रहे हो? कोई मर-मरा गया तो क्या होगा?" बड़ी भीड़ समझा रही थी, लेकिन जितना लोग समझा रहे थे उतना ही उनका जोश बढ़ता जा रहा था। असल में भीड़ अगर न समझाए तो शायद जोश भी कम हो जाए। मगर जब भीड़ समझाने आ जाती है तो फिर जोश कम होता ही नहीं। अगर भीड़ खड़ी न हो तो शायद वे अपने-आप चुपचाप घर चले जाएं। लेकिन जब इतनी भीड़ देखनेवालों की इकट्ठी हो जाती है तो अहंकार और बल मारता है।
तभी एक आदमी अचानक भीड़ में से बाहर आया और उसने दोनों आदमियों के हाथ में एक-एक पर्चा दिया और पर्चा देकर वह तो भीड़ में नदारद भी हो गया। उन दोनों ने एक साथ पर्चा पढ़ा। पर्चे पर लिखा था : 'भाइयो, मेरे दवाखाने में गहरे से गहरे जख्म की मरहम-पट्टी का सुंदर प्रबंध है और मेरा दवाखाना यहां से चंद कदम ही दूर है, जरूरत हो तो चले आना।' लेकिन उसका यह पर्चा पढ़ते ही दोनों शांत हो गए। कुछ अपूर्व घटना घटी। दोनों ने सोचा होगाः यह भी हद हो गयी, हमारी यहां जान जोखिम में है, कोई अपने दवाखाने का विज्ञापन कर रहा है! उन दोनों ने अपने पर्चे गिरा दिए और अपने-अपने रास्ते घर चले गए वापिस। समझानेवालों से न समझे, लेकिन इस आदमी के दवाखाने के पर्चे ने काम कर दिया।
सत्य स्वयं से आवे तो मुक्त करता है और स्वयं से न आवे तो और भी गहरे बंधनों में बांध देता है।
एक पंडित एक चमार की दुकान पर जूते सुधरवाने गया था। जूते की हालत बड़ी बुरी थी। तो उस चमार ने कहा, दो-चार दिन लगेंगे। पंडित ने कहा, यह तो बड़ा मुश्किल होगा। दो-चार दिन मुझे बिना जूते के चलना पड़ेगा। जल्दी नहीं हो सकती? दो-चार घंटे में नहीं हो सकता? तो उस चमार ने कहा, ऐसा करो, यह एक जोड़ी सुधरी पड़ी है; यह तुम दो-चार दिन पहन लो। फिर तुम्हारी ठीक हो जाए, ले जाना; यह वापस कर जाना। पंडित ने वह जोड़ी देखी, वह किसी और की जोड़ी थी, जो उसने सुधारकर रखी थी। उसने कहा, सोच-समझकर बात कर, मैं और किसी दूसरे के जूते उधार पहनूंगा? किसी के पहने हुए जूते? तूने मुझे समझा क्या है? वह चमार हंसने लगा; उसने कहा कि मैंने तो सोचा, आप पंडित हैं; इतने उधार जूते पहने हुए हैं, एक और हो जाएगा तो क्या हर्ज है?
वस्तुतः चेतना का स्वयं से बाह्य होना ही अज्ञान और अंधकार है। फिर इससे कोई भेद नहीं पडता है, वह बाह्यता संसार को लेकर है, या संन्यास को।
एक सम्राट के बडे वजीर की मृत्यु हो गई थी। उसके समक्ष राज्य के सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति को चुन कर वजीर बनाने का जटिल सवाल था। फिर अनेक प्रकार की परीक्षाओं के द्वारा अंततः तीन व्यक्ति चुने गए। अब उन तीन में से भी एक को चुना जाना था। उसकी निर्णयात्मक-परीक्षा के एक दिन पूर्व ही यह अफवाह उडा दी गई थी कि सम्राट उन्हें एक ऐसे कक्ष में बंद करने को है, जिसके द्वार पर राज्य के कुशलतम यांत्रिकों द्वारा निर्मित एक ऐसा अदभुत ताला लगा हुआ है, जिसे जो गणित में सर्वाधिक प्रतिभाशाली होगा, केवल वही खोलने में समर्थ हो सकता है। उस रात्रि उन तीन व्यक्तियों में से दो तो चिंता और उत्तेजना के कारण सो ही नहीं सके। वे रात्रिभर तालों के संबंध में लिखे गए शास्त्रों को पढते रहे और गणित के नियमों और सूत्रों को समझते रहे। सुबह तक तो वे गणित से इतने ज्यादा भर गए थे कि दो-दो जोडना भी शायद उनसे संभव नहीं होता!
राजमहल जाते समय उन्होंने गणित की कुछ पुस्तकें भी अपने वस्त्रों में छिपा ली थीं, जिनकी किसी भी समय आवश्यकता पड सकती थी।
अपनी दृष्टि में वे सब भांति तैयार थे, यद्यपि शास्त्रों के साथ रात्रि-जागरण करने के कारण उनके मन ठिकाने नहीं थे और उनके पैर ऐसे पड रहे थे जैसे वे नशे में हों। शास्त्रों और ज्ञान का भी नशा तो होता ही है। लेकिन उन दो को वह तीसरा व्यक्ति निश्चय ही पागल मालूम हो रहा था, जो रात्रि भर शांति से सोया रहा था। उसकी निशिंचतता सिवाय पागलपन के और किस बात की द्योतक हो सकती थी? वे दोनों रात्रि में भी उसके ऊपर हंसते रहे थे और अब भी उसकी नासमझी पर हंस रहे थे। राजमहल पहुंच कर उन्हें ज्ञात हुआ कि निश्चय ही वह अफवाह सच थी। वहां पहुंचते ही उन्हें एक विशाल कक्ष में बंद कर दिया गया, जिसके द्वार पर वह बहुचर्चित ताला लगा हुआ था, जो उस समय की यांत्रिक प्रतिभा का अन्यतम आविष्कार था। उस ताले को गणित के आधार पर निर्मित किया गया था और वह एक अत्यंत कठिन पहेली की भांति था, जिसे गणित के द्वारा ही हल भी किया जा सकता था। ये सब बातें अफवाहों से भी ज्ञात थीं और उस ताले पर बने गणित-अंक और चिह्न भी इन्हीं की घोषणा कर रहे थे। उन तीनों व्यक्तियों को कक्ष में बंद कर सम्राट के निर्णय से अवगत करा दिया गया कि जो भी व्यक्ति उस कक्ष के ताले को खोल कर सबसे पहले बाहर निकलने में समर्थ होगा, उसे ही महामंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया जाएगा। वे दोनों व्यक्ति शीघ्र ही ताले पर बने चिह्नों का अध्ययन कर गणित के अंकों से जूझने में लग गए। वे बीच-बीच में साथ में लाए शास्त्रों को भी देखते जाते थे।
सर्दी की ऋतु थी और कक्ष के बडे-बडे झरोखों से सुबह की शीतल वायु भी भीतर आ रही थी। लेकिन उनके माथों से पसीने की धारें बह रही थीं। थोडा सा समय, और उस ताले को खोलने की कठिन समस्या थी। शीघ्र ही उनके जीवन का भाग्यनिर्णय होने वाला था। इससे उनकी बेचैनी और घबडाहट स्वाभाविक ही थी। उनके हाथ कंप रहे थे और श्वास बढ गई थी। वे लिखते कुछ थे और लिखा कुछ जाता था। लेकिन जो व्यक्ति रात भर सोया रहा था, उसने न तो ताले का ही अध्ययन किया और न कलम ही उठाई और न कोई गणित ही हल किया। वह तो शांति से आंखें बंद किए बैठा था। उसके चेहरे पर न कोई चिंता थी, न उत्तेजना थी। उसे देख कर ऐसा भी नहीं लगता था कि वह कुछ सोच रहा है। उसके भाव और विचार निर्वात गृह में स्थिर दीपशिखा की भांति मालूम होते थे। वह था एकदम शांत, मौन और शून्य। वह अचानक उठा और अत्यंत सहज और शांत भाव से धीरे-धीरे कक्ष के द्वार के पास पहुंचा। उसने अत्यंत आहिस्ते से द्वार का हत्था घुमाया और आश्चर्य कि द्वार उसके छूते ही खुल गया! वह खुला हुआ ही था! वह ताला और उसकी सारी कथा धोखा थी। लेकिन उसके जो दो मित्र गणित की पहेलियां बूझ रहे थे, उन्हें इसका कुछ भी पता नहीं चला। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि उनका एक साथी अब भीतर नहीं है। यह चैंकाने वाला सत्य तो उन्होंने तभी जाना जब सम्राट द्वार के भीतर आया और उसने उनसे कहाः 'महानुभावो, अब यह गणित बंद करो। जिसे निकलना था, वह निकल चुका है!' वे बेचारे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे! उनका वह सब भांति अयोग्य साथी सम्राट के पीछे खडा था। सम्राट ने उन्हें अवाक देख कर यह भी कहा थाः 'जीवन में भी सबसे पहले यही महत्वपूर्ण है कि देखा जाए कि समस्या वस्तुतः है भी या नहीं? ताला बंद भी है या नहीं? जो समस्या को ही नहीं खोजता और समाधान करने लग जाता है, वह स्वभावतः ही भूल में पडता है और सदा के लिए भटक जाता है।'
यह कथा अदभुत रूप से सत्य है।
सोचना मत--देखना। देखना समग्रता है। तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व आंख बन जाता है।
छोटे-छोटे बच्चे कुर्सी पर चढ़ जाते हैं और कहते हैं अपने पिता से, दद्दू, हम तुम से बड़े! कुर्सी पर चढ़े। जब कुर्सी पर चढ़े तो हम तुम से बढ़े। और ये बड़े-बड़े दद्दू, इनमें भी कोई फर्क नहीं है। ये चढ़ जाते हैं कुर्सी पर तो कहते हैं कि हम बड़े, सर्वोच्च, हमसे ऊपर कोई भी नहीं। वही अकड़, वही पागलपन, वही विक्षिप्तता।
एक बादल पराग का है, तुम्हारा अकेलापन
जो बरसेगा अगर पूरे मन से, तो गन्ध उठेगी वैसी
जैसी जेठ की तपी धरती से उठती है, आषाढ़ के बरसे
रुके रहा प्रार्थना में रत, कि अकेलेपन का यह परागघन
धाराहत करे, तुम्हारे मन का तप्त विस्तार
फुटे हरीतिया, उमड़े नदियां,
सदियाँ सोचें, लू ठीक है, पराग का यह बादल अलीक (बे-सिर पैर) है !
एक बादल पराग का है, तुम्हारा अकेलापन।
एक ट्रेन में एक औरत कोई नौ-दस बच्चों को लिए हुए सफर कर रही थी। वे बच्चे बड़ा उपद्रव मचा रहे थे। इधर से उधर दौड़ रहे थे, लोगों का सामान गिरा रहे थे। पूरे कमरे को उन्होंने अराजकता बना रखा था। आखिर एक आदमी से नहीं रहा गया। क्योंकि पहले उन बच्चों ने उसकी पेटी गिरा दी, फिर उसका अखबार फाड़ डाला। तो उसने उससे कहा कि बहन जी, इतने बच्चों को साथ ले कर सफर न किया करें तो अच्छा। आधों को घर छोड़ आया करें। उस स्त्री ने बड़े क्रोध से उस आदमी की तरफ देखा और कहा, क्या समझा है? क्या तुम मुझे बेवकूफ समझते हो? आधों को घर ही छोड़ आयी हूं।
सान्त्वना
कथा :
एक घर में कोई मर गया तो मैं गया । वहां मैंने देखा कि एक दूसरे पड़ोसी समझा रहे हैं लोगों को कि क्या रोते हो, क्या घबड़ाते हो? किसी की पत्नी मर गई है, वे समझा रहे हैं कि आत्मा तो अमर है । मैं बड़ा प्रभावित हुआ कि यह आदमी जानकार होना चाहिए । संयोग की बात, तीन-चार महीने बाद उनकी पत्नी चल बसी । पत्नियों का क्या भरोसा, कब चल बसें! तो मैं बड़ी उत्सुकता से उनके घर गया कि अब तो यह आदमी प्रसन्नता से बैठा होगा, या खंजड़ी बजा रहा होगा । पत्नी को विदा दे रहा होगा । लेकिन वे रो रहे थे सज्जन । मैंने कहा, भई बात क्या है? दूसरे की पत्नी मर गई तब तुम समझा रहे थे, आत्मा अमर है । वे कहने लगे अपने आसू पोंछ कर, अरे ये समझाने की बातें हैं । जब अपनी मर जाए तब पता चलता है ।
मैं बैठा रहा । थोड़ी देर बाद देखा कि जिन सज्जन की पत्नी मर गई थी पहले, वे आ गए और इनको समझाने लगे कि क्या रोते हो? आत्मा तो अमर है ।
ऐसा चलता लेन-देन । पारस्परिक सांत्वना! तुम हमको समझा देते, हम तुम्हें समझा देते । न तुम्हें पता, न हमें पता । लोग मान लेते हैं । लेकिन मान लेने का अर्थ निशंक हो जाना नहीं है ।
अति
कथा :
मथुरा के एक पंडे किसी के घर भोजन करने गए । इतना भोजन कर गए कि गाड़ी पर डाल कर उनको घर लाना पड़ा । जब घर आए तो उनकी पत्नी ने कहा कि चलो कोई बात नहीं । ऐसा तो मेरे पिता के साथ भी होता था । यह कोई नई बात नहीं । यह गोली ले लो । तो उन्होंने कहा, अरे पागल, अगर गोली ही खाने की जगह होती तो एक लड्डू और न खा जाते? जगह है कहां? एक गोली की भी जगह नहीं छोड़ी ।
कबीर -- अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप ।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥
जीसस को जब सूली लगी तो उनके दोनों तरफ दो चोरों को भी सूली दी गयी । जीसस बीच में थे, सूली पर लटके, दोनों तरफ दो चोरों को भी सूली दी गयी थी । जिनने ऐसा आयोजन किया था, उनका तो केवल अर्थ इतना ही था कि वे जीसस को भी एक चोर-लफंगे से ज्यादा नहीं समझते । इसलिए दो चोरों के साथ-साथ सूली दी थी । लेकिन, ईसाई संतों ने बड़ी अनूठी बात इस साधारण-सी घटना में खोज ली । यह साधारण-सी घटना एक गहरा बोध-प्रसंग बन गयी ।
Jakob Böhme ने कहा है कि जीसस के दोनों तरफ दो चोर खड़े हैं, लटके हैं सूली पर, अगर तुम जरा बायें झुककर नमस्कार किये तो चोर को नमस्कार हो गयी, दायें झुककर नमस्कार किये तो चोर को नमस्कार हो गयी । ठीक बीच में रहे तो ही तुम्हारा नमस्कार जीसस को पहुंचेगा । यह तो बड़ी मीठी बात कही बहुमे ने ।
जरा इधर-उधर हुए कि चूके । सत्य मध्य में है । दोनों तरफ चोर हैं । दोनों तरफ असत्य है । परमात्मा मध्य में है, दोनों तरफ शैतान है ।
कुछ वर्ष पहले इंग्लैंड में एक किताब छपी: The silent spring--मौन वसंत । उस वर्ष इंग्लैंड के वसंत में अचानक हैरानी का फर्क आया था । लाखों पक्षी अचानक वसंत के मौसम में वृक्षों से गिरे और मर गए । लाखों! ढेर लग गए रास्तों पर पक्षियों के । पूरा, पूरा वसंत मौन हो गया । और बड़ी मुश्किल हुई कि क्या हुआ? क्या बात हो गई? Radiation पर इंग्लैंड में जो प्रयोग चलते थे और atomic energy के जो प्रयोग चलते थे, उनकी कुछ भूल-चूक से वैसा हुआ । लेकिन इंग्लैंड उस वसंत के बाद फीका हो गया! अब इंग्लैंड में वैसा वसंत नहीं आएगा कभी । गाने वाले पक्षियों का बड़ा हिस्सा एकदम समाप्त हो गया । उसको रिप्लेस करना मुश्किल है ।
बुद्ध के पास एक युवक दीक्षित हुआ। संगीत में कुशल था। अदभुत थी वीणा की उसकी सामर्थ्य। लेकिन आया। था सम्राट; भोग में पला; भोग में जीया। आया तो दूसरी अति पर चला गया। दूसरे भिखारी, दूसरे भिक्षु, दूसरे साधु-संन्यासी रास्ते पर चलते, तो वह कांटों में चलता। दूसरे एक ही वस्त्र पहनते, तो वह नंगा खड़ा होता। दूसरे एक बार भोजन करते, तो वह दो दिन में एक बार भोजन करता।
छः महीने में सूखकर हड्डी हो गया। पैर घाव से भर गए। चेहरा पहचानना मुश्किल हो गया। सुंदर थी काया उसकी, बड़ी स्वर्ण-काया थी। आया था, तो कोई भी मोहित हो जाए, ऐसा शरीर था। अब तो देखकर विरक्ति होती, विकर्षण होता। कोई पास आता, तो बदबू आती!
भिक्षुओं ने बुद्ध से कहा, क्या कर रहा है तुम्हारा वह साधक? वह अपने को मारे डाल रहा है! हम तो सोचते थे, इतने सुख में पला! कहते हैं, उसके घर में कभी वह गद्दियों से नीचे नहीं उतरा; मखमल के कालीनों से नीचे नहीं चला। कहते हैं, कभी उसने पैर पृथ्वी पर नहीं रखा; धूल नहीं छुई कभी उसके पैरों को। सुनते हैं, उसके घर में गुलाब के जल से स्नान करता था। सुनते हैं, उसके घर में वायु सदा सुवासित रहती थी दूर-दूर से आए इत्रों से। कहते हैं लोग, कथाएं हैं कि सीढ़ियां चढ़ता था, तो नग्न स्त्रियां सीढ़ी के किनारे खड़ी रहतीं रेलिंग की तरह; उन पर हाथ रखकर कंधे पर, ऊपर जाता था। ऐसा यह आदमी, इतना कष्ट झेलता है! असंभव घटित होता है!
बुद्ध ने कहा, नहीं भिक्षुओ! संभव घटित हो रहा है। जो आदमी एक अति पर रुग्ण होता, वह अक्सर दूसरी अति पर पुनः रुग्ण हो जाता है। मध्य में रुकना मुश्किल है--पेंडुलम की भांति।
पर उन्होंने कहा, अब वह मर जाएगा, जी न सकेगा। बिलकुल सूखकर कांटा हो गया है। पहचानना मुश्किल है। पास खड़े होने में बदबू आती है। स्नान नहीं करता है वह। कहता है, स्नान करूंगा, तो शरीर की सज्जा हो जाएगी। वह जो इत्रों से नहाता था, अब साधारण से गांव के गंदे डबरे में भी नहीं नहाता है। कहता है, शुद्धि हो जाएगी शरीर की। शरीर को सजाना क्या? शरीर के सौंदर्य का प्रयोजन क्या?
बुद्ध उसके पास गए सांझ और कहा, भिक्षु श्रोण! मैंने सुना कि तू जब सम्राट था, तो तू वीणा बजाने में बड़ा कुशल था। एक प्रश्न पूछने आया हूं। वीणा के तार अगर बहुत ढीले हों, तो संगीत पैदा होता है? भिक्षु श्रोण ने कहा, पागल हुए हैं आप! आप जैसा ज्ञानी और ऐसे सवाल पूछता! वीणा के तार ढीले हों, तो संगीत पैदा कैसे होगा? टंकार ही पैदा नहीं होती। तो बुद्ध ने कहा, तार बहुत कसे हों, तब भिक्षु श्रोण संगीत पैदा हो सकता है? उसने कहा, नहीं; अगर तार बहुत कसे हों, तो टूट जाएंगे। संगीत पैदा नहीं होगा। तार चाहिए सम, न बहुत कसे, न बहुत ढीले। तार चाहिए मध्य, न इस तरफ, न उस तरफ। तार चाहिए ऐसे कि न तो कहा जा सके कि ढीले हैं, न कहा जा सके कि कसे हैं।
तो बुद्ध ने कहा कि मैं जाता हूं भिक्षु श्रोण! तू बुद्धिमान है। तुझसे कुछ कहने की मुझे जरूरत नहीं है। कुछ कहने आया था, अब नहीं कहता हूं। इतना ही कहता हूं कि जो वीणा में संगीत पैदा होने का नियम है, वही प्राणों में भी संगीत पैदा होने का नियम है। तार बहुत कस मत, बहुत ढीले भी मत छोड़। समत्व को उपलब्ध हो। बीच में आ। मज्झिम निकाय। अति को छोड़।
यह योग न तो बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है और न बिलकुल न खाने वाले का तथा न अति शयन करने के स्वभाव वाले का और न अत्यंत जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
यह दुखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करने वाले का तथा कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य शयन करने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
बुद्ध कहते थे, अति से बचो। मध्य में चलो। सदा मध्य में चलो। हमेशा मध्य में रहो, बीच में। खोज लो हर चीज का बीच बिंदु, वहीं रहो।
एक दिन सारिपुत्र ने बुद्ध को कहा कि भगवन! आप इतना ज्यादा जोर देते हैं मध्य पर कि मुझे लगता है कि यह भी एक अति हो गई! हर चीज में मध्य, मध्य! यह तो एक अति हो गई!
बुद्ध ने कहा, एक अति माफ करता हूं। मध्य की अति, the excess of being in the middle, उसको माफ करता हूं। बाकी कोई अति नहीं चलेगी। एक अति को चलाए रहना -- मध्य, मध्य, मध्य -- सब चीजों में मध्य। तो ध्यान में बड़ी सुगमता हो जाए।
मन सदा देखता है कि दूसरे पर जिम्मेवारी थोप दो। अगर तुम भटक रहे हो तो कहेगा कोई भटका रहा है।
मुल्ला नसरुद्दीन शराबघर पहुंचा। ऐसे ही काफी पीये था, घर से ही पीकर चला था। दूकानदार ने भी देखा कि इतना ज्यादा पीये है। उसने कहा कि, 'आज तुम्हें न दूंगा।' तो नसरुद्दीन ने कहा, 'तुमने क्या समझा है? तुम एक ही दूकान हो इस गांव में? किस अकड़ में भूले हो? दुबारा पैर न रखूंगा। देते हो या नहीं?' दूकानदार ने कहा, 'तुम जाओ। जब होश में हो तब आना।'
नसरुद्दीन लड़खड़ाता बाहर निकला। बड़ी देर खोजने के बाद दूसरी दूकान खोजी; वह उसी दूकान का दूसरा दरवाजा था। शराबी आदमी! उसको बड़ी देर लग गई टटोलते। इधर गया, उधर गया, गोल-गोल घूमा, परिक्रमा की, पहुंचा। बड़ी प्रसन्नता से भीतर गया और कहा कि 'क्या समझा है उन लोगों ने? दूसरे दूकान वाले अकड़ गये हैं। ग्राहक पर ही जीते हैं और अकड़ से मरे जा रहे हैं।' उस दूकानदार ने कहा, 'नसरुद्दीन तुम फिर वहीं आ गये हो और आज तुम्हें न मिलेगी।'
नसरुद्दीन बाहर निकला, फिर खोजा-बीना। आधी रात गये, तीसरे दरवाजे से उसी दूकान के भीतर प्रवेश हुआ। उसने कहा, कि बड़ी मुसीबत हो गई इतनी दूकानें दूर-दूर। तो एक दूकान वाला न दे, तो दूसरे पर जाने में घंटों लग जाते हैं, तब उसने गौर से देखा और कहा, 'क्या मामला है? क्या तुमने सब दूकानें खरीद लीं और हर जगह तुम्हीं मौजूद हो?'
मन इस दरवाजे से घुसे, तो भी उसी दूकान पर जाता है; दूसरे दरवाजे से घुसे तो भी उसी दूकान पर जाता है, मन कहीं और जा ही नहीं सकता। एक अति भी वहीं ले जायेगी, दूसरी अति भी वहीं ले जायेगी। मन मध्य से कभी प्रवेश नहीं करता। क्योंकि वहां मौत है। इसलिए मन एक अति से दूसरी अति पर डोलता है, घड़ी की पेंडुलम की भांति। इस डोलने में ही मन का अस्तित्व है।
जब लोहे की रॉड गरम हो जाती है तो आप उसे किसी भी आकार में ढाल सकते हैं; कभी भी अपना मिजाज़ खराब मत करिए नहीं तो लोग आपको उसी तरह से ढाल देंगे जैसा वे चाहते है ।
मुल्ला नसरुद्दीन पर मुकदमा चला और मजिस्ट्रेट ने पूछा 'तुम्हारी उम्र क्या है नसरुद्दीन?' उसने कहा, 'चालीस वर्ष।' उस मजिस्ट्रेट ने कहा, 'हद हो गई! झूठ की भी एक सीमा है। तीन साल पहले भी तुम पर मुकदमा चला था, तब भी तुमने चालीस वर्ष ही बताया था।' नसरुद्दीन ने कहा, 'आपने सवाल भी तब यही किया था, कितनी उम्र? मैं संगत आदमी हूं; जो जवाब एक दफे दे दिया, अब अदालत में मैं झूठ न बोलूंगा। तुम हजार बार पूछो, तुम मुझे धोखे में न डाल सकोगे। मैं चालीस--जो जबाब दे चुका, दे चुका; उस पर मजबूत रहूंगा।'
मन संगति बनाता है, आत्मा स्वतंत्रता है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने एक मित्र को सड़क पर जाते देखा; पीठ की तरफ से। तेजी से कदम बढ़ाये, जाकर उसकी पीठ ठोंकी और कहा, 'कहां खो गये थे अब्दुल। वर्षों बाद दिखाई पड़े।' उस आदमी ने लौट कर, चौंक कर देखा। मुल्ला नसरुद्दीन ने भी उसे चौंक कर देखा और कहा, 'हद्द हो गई! कौन सी विपत्ति आई तुम पर? पिछली बार जब मिले थे तो ठिगने थे, मोटे थे और अब अचानक लंबे और दुबले हो गये। चेहरा भी बिलकुल बदल डाला। दाढ़ी-मूंछ कब बढ़ा ली?' उस आदमी ने कहा कि माफ करें, आप किसी और की भूल में होंगे। मेरा नाम अब्दुल्ला नहीं है। नसरुद्दीन ने दुबारा उसकी पीठ ठोंकी और कहा, 'प्यारे, तो नाम भी बदल दिया!'
बुद्धि जल्दी नहीं थकती। विपरीत स्थिति में भी सोचे चली जाती है।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर आए हुए एक मेहमान ने चांदी के दो कपों को देख कर पूछा -- ऐसा लगता है कि ये दो कप तुम्हें किसी प्रतियोगिता में मिले होंगे--
हां, मुझे अखिल विश्व-संगीत-प्रतियोगिता में ये ईनाम में मिले थे।
अच्छा! कब-कब मिले थे?
सन उन्नीस सौ छप्पन में।
एक ही प्रतियोगिता में दो कप क्यों मिले?
जब मैंने गायन-वादन प्रारंभ किया तब यह छोटा सा कप मिला--मुल्ला नसरुद्दीन ने समझाया--और बाद में गाना बंद करवाने के लिए उन्होंने यह बड़ा वाला कप ईनाम में दिया।
कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन ।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन ॥
कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी अगर यह मन होश में नहीं आता तो आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।
कनफ्यूशियस एक गांव में गया एक बार। उस गांव में लिटेन नाम का एक बहुत बड़ा विद्वान था। कि गांव के लोगों ने कनफ्यूशियस से गांव के बाहर ही कहा: हमारे गांव में एक अदभुत विद्वान है, लिटेन, आप उससे मिल कर बहुत खुश होंगे। कनफ्यूशियस ने कहा: उसकी क्या खूबी है? जिसकी वजह से तुम प्रशंसा करते हो। उन लोगों ने कहा: उसकी खूबी यह है कि इतना बड़ा विचारशील आदमी है वह, किसी भी काम को करने के पहले तीन बार सोचता है। कनफ्यूशियस ने कहा कि थोड़ी गलती हो गई, दो बार सोचना काफी है। एक बार सोचना कम है, तीन बार सोचना ज्यादा हो गया। तुम्हारा विद्वान मध्य में नहीं है, अति पर है। यह खबर लिटेन को पहुंची कि कनफ्यूशियस ने कहा है कि एक बार सोचना कम, तीन बार सोचना ज्यादा हो गया। दो बार सोचना काफी है।
जो एक बार सोचता है वह काम गलती कर लेता है। जो तीन बार सोचता है वह काम कर ही नहीं पाता। इसलिए विचारकों ने दुनिया में कोई काम नहीं किया। उनसे काम हो नहीं सकता, सोचने में ही सब व्यतीत हो जाता है।
लिटेन को खबर पहुंची, उसने कहा कि ठीक कहा: मेरी भूल दुरुस्त हुई। सच में यह तीन बार सोचना काफी हो गया, ज्यादा हो गया। एक बार सोचना अल्प है, तीन बार सोचना अति हो गई। ठीक कहा कि दो बार सोचना पर्याप्त है। लिटेन गया और कनफ्यूशियस के पैर छुए और कहा कि मैं धन्यवाद देता हूं, सोचने के संबंध में मध्य-बिंदु आपने मुझे सुझाया।
शुभ-अशुभ
कथा :
चीन में ऐसा हुआ कि एक आदमी के सिर में दर्द था-कोई चार हजार साल पुरानी कथा है-बडा दर्द था और जीवन भर से दर्द था । और एक दुश्मन ने छिप कर उसे तीर मार दिया । उसके पैर में तीर लगा और दर्द चला गया । बड़ी हैरानी हुई । तीर तो निकल गया, वह आदमी बच भी गया, लेकिन दर्द चला गया । इसी आदमी के अनुभव से चीन में एक शास्त्र का जन्म हुआ : accupuncture । इससे यह पता चला कि दर्द तो उसके सिर में था लेकिन असली उलझन उसके पैर में थी । उसके पैर में विद्युत का प्रवाह अटक गया था, उसका परिणाम सिर में हो रहा था । सिर के इलाज करने से कुछ भी नहीं हो सकता था । उसके पैर में जो विद्युत का प्रवाह अटक गया था वह तीर के लगने से संयोगवशात खुल गया । तब से accupuncture पैदा हुआ ।
accupuncture बड़ी अनूठी औषधि है । तुम्हारे बाएं हाथ में दर्द हो, वे दाएं हाथ का इलाज करें । तुम्हारे सिर में दर्द है, वे पैर के अंगूठे का इलाज करें और ठीक कर दें । और इलाज भी कुछ नहीं है सिर्फ थोड़ा सा एक सुई चुभा दी । उस सुई के चुभाने से जीवन की ऊर्जा का जो प्रवाह है, उसको बदल देते हैं ।
अब इस आदमी ने तो तीर मारा था अशुभ के लिए, लेकिन हो गया शुभ । न केवल उस आदमी के जीवन में शुभ हो गया, उसका सिर-दर्द चला गया, चार हजार साल में करोड़ों लोगों ने लाभ लिया accupuncture से । वह सब लाभ उसी आदमी के ऊपर जाता है जिसने तीर मारा था । लेकिन उसकी आकांक्षा तो बुरी थी, वह तो अशुभ करने चला था ।
कभी तुम शुभ करने जाते हो और अशुभ हो जाता है । तुम सब अच्छा कर रहे थे और सब गड़बड़ हो जाता है । अक्सर ऐसा होता है कि बाप बेटे को बहुत अच्छा बनाना चाहता है इसी कारण बेटा बुरा हो जाता है । तुम्हारी ज्यादा चेष्टा खतरनाक होती है । गांधी जैसा अच्छा बाप पाना मुश्किल है । गांधी ने अपने पहले बेटे को बरबाद कर दिया, हरिदास को । गांधी ने ही बरबाद किया । उसको इतना अच्छा बनाने का.. .उनको तो महात्मा होने की धुन सवार थी, उसको भी महात्मा बनाना है । तुम्हें महात्मा बनना है, तुम बनो । कोई मना नहीं कर रहा है । लेकिन दूसरे पर तो मत थोपो । दूसरे का मौका आने दो । जब उसको मौका आएगा, आएगा ।
वे हरिदास को जबरदस्ती महात्मा बनाने में लग गए । हरिदास को इस तरह महात्मा बनाया उन्होंने कि हरिदास के भीतर बगावत पैदा हो गई । उसने बुरी तरह बदला लिया । बदला लेने में अपने को भी नष्ट कर लिया । जो-जो गांधी कहते थे उससे उल्टा करने लगा । शराब पीने लगा, वेश्यागामी हो गया और आखिर में मुसलमान हो गया । क्योंकि गांधी कहते थे, हिंदू-मुस्लिम सब एक; तो उसने कहा, अब यह आखिरी चोट भी करके देख लें । वह मुसलमान हो गया । हरिदास गांधी से अब्दुल्ला गांधी हो गया । और जब गांधी को खबर मिली कि हरिदास मुसलमान हो गया तो उनको बड़ा सदमा पहुंचा । जब यह खबर हरिदास को मिली तो वह हंसा ! उसने कहा कि अरे, सदमा! हिंदू-मुस्लिम सब एक, 'इश्वर अल्ला तेरो नाम' सदमा क्या? तो बात सब बकवास थी, ऊपर-ऊपर थी! सदमे की क्या बात है? मैं मुसलमान हो गया तो कुछ बुरा हो गया? तो वह जो हिंदू-मुस्लिम एक है, सब राजनीति ही थी? वह कुछ गहरी बात नहीं थी ।
गांधी ने अच्छा बनाने की कोशिश की । लेकिन कोई किसी के अच्छा बनाने से थोड़े ही अच्छा बनता है! अक्सर ऐसा होता है, अच्छे बाप के बेटे बिगड़ जाते हैं । अक्सर ऐसा होता है । क्योंकि चारों तरफ से उनकी गर्दन कसने की कोशिश की जाती है कि अच्छे बनो । जबरदस्ती दुनिया में कहीं अच्छाई होती है? अच्छाई तो स्वतंत्रता में फलती है ।
तो तुम अच्छा करो, बुरा हो जाता है । बुरा करो, कभी अच्छा हो जाता है । तो तुम्हारे करने का क्या भरोसा? परमात्मा पर छोड़ दो ।
आपकी जिद ने मुझे और पिलाई हजरत
शेखजी इतनी नसीहत भी बुरी होती है ।
नेपोलियन का एक जन्मजात शत्रु मर गया था । नेपोलियन की आंख में आंसू आ गए । पास कोई मित्र बैठा था, उसने पूछा कि आपको प्रसन्न होना चाहिए कि आपका जन्मजात शत्रु मर गया!
नेपोलियन ने कहा, यह मैंने कभी सोचा ही नहीं था । लेकिन आज जब मेरा जन्मजात शत्रु मर गया है, जिससे मेरी सदा की शत्रुता थी और जिससे कभी मित्रता की कोई आशा न थी, तो आज जब वह मर गया है, तब मैं पाता हूं कि मेरा कुछ हिस्सा कम हो गया । अब मैं वही कभी न हो सकूंगा, जो उसकी मौजूदगी में था ।
नेपोलियन को यह जो प्रतीति है, यह लाओत्से की धारणा को स्पष्ट करेगी । नेपोलियन कहता है, मेरे शत्रु के मर जाने से मुझमें भी कुछ मर गया, जो उसकी बिना मौजूदगी के अब कभी न हो सकेगा । मैं कुछ कम हो गया । मुझमें कुछ था, जो उसी की वजह से था । आज वह नहीं है, तो मेरे भीतर भी वह बात नहीं रह गई ।
इसका तो यह अर्थ हुआ कि शत्रु भी आपको बनाते हैं, मित्र ही नहीं । और शत्रुओं के बिना भी आप कम हो जाएंगे, खाली हो जाएंगे ।
लाओत्से -- जगत में विपरीत कुछ भी नहीं है; विपरीत केवल दिखाई पड़ता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन को उसका पड़ोसी एक दिन कह रहा था कि तुम्हारा लड़का जो है फजलू बहुत भद्दी और गंदी गालियां बकता है। नसरुद्दीन ने कहा, बड़े मियां, कोई फिक्र न करो; छोटा है, बच्चा है, नासमझ है। जरा बड़ा होने दो, अच्छी— अच्छी गालियां भी बकने लगेगा।
अगर साक्षी दिखाई पड़ जाए, तो मुस्कुराहट धीरे-धीरे सतत हो जाएगी। हर अनुभव में आप हंस सकेंगे।
सच-झूठ
कथा :
एक पुरानी चीनी कथा है, जंगल में कोई लकड़हारा लकड़ियां काटता था । अचानक देखा कि उसके पीछे आकर खड़ा हो गया है एक बारहसिंगा-सुंदर, अति सुंदर, अति स्वस्थ । लकड़हारे ने अपनी कुल्हाड़ी उसके सिर पर मार दी । बारहसिंगा मर गया । तब लकड़हारा डरा; कहीं पकड़ा न जाए । क्योंकि वह राजा का सुरक्षित वन था और शिकार की मनाही थी । तो उसने एक गड्डे में छिपा दिया उस बारहसिंगे को, ऊपर से मिट्टी डाल दी और वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ।
अब लकड़ियां काटने की कोई जरूरत न थी । काफी पैसे मिल जाएंगे बारहसिंगे को बेचकर । सांझ जब सूरज ढल जाएगा और अंधेरा उतर आएगा तब निकाल कर बारहसिंगे को अपने घर ले जाएगा । अभी तो दोपहर थी ।
वह वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा और उसकी झपकी लग गई । जब उठा तो सूरज ढल चुका था और अंधेरा फैल रहा था । बहुत खोजा लेकिन वह गड्ढा मिला नहीं, जहां बारहसिंगे को गड़ा दिया था । तब उसे संदेह होने लगा कि हो न हो, मैंने स्वप्न में देखा है । कहीं ऐसे बारहसिंगे पीछे आकर खड़े होते हैं! आदमी को देख कर भाग जाते हैं, मीलों दूर से भाग जाते हैं । जरूर मैंने स्वप्न में देखा है और मैं व्यर्थ ही परेशान हो रहा हूं ।
हंसता हुआ, अपने पर ही हंसता हुआ घर की तरफ वापस लौटने लगा । यह भी खूब मूढ़ता हुई! राह में एक दूसरा आदमी मिला तो उसने अपनी कथा उससे कही कि ऐसा मैंने स्वप्न में देखा । और फिर मैं पागल, उस गड्डे को खोजने लगा ।
उस दूसरे आदमी को हुआ, हो न हो इस आदमी ने वस्तुत: बारहसिंगा मारा है । लकड़हारा तो घर चला गया, वह आदमी जंगल में खोजने गया और उसने बारहसिंगा खोज लिया । चोरी-छिपे वह अपने घर पहुंचा । उसने अपनी पत्नी को सारी कथा कही कि ऐसा लकड़हारे ने मुझे कहा और उसने यह भी कहा कि स्वप्न देखा है । अब मैं कैसे मानूं कि स्वप्न देखा है? स्वप्न कहीं सच होते हैं? यह बारहसिंगा सामने मौजूद है । तो स्वप्न नहीं देखा होगा, सच में ही हुआ होगा ।
लेकिन पत्नी ने कहा, तुम पागल हो । तुम दोपहर को सोए तो नहीं थे जंगल में? उसने कहा, मैं सोया था, झपकी ली थी । तो उसने कहा, तुमने हो न हो लकड़हारे का सपना देखा है । और सपने में लकड़हारा तुम्हें दिखाई पड़ा । तो वह आदमी कहने लगा, अगर लकड़हारा सपने में देखा है तो यह बारहसिंगा तो मौजूद है न!
तो उसकी स्त्री ने कहा, ज्ञानी कहते हैं, सपने में और सत्य में फर्क कहां? सपने भी सच होते हैं और जिसको हम सच कहते हैं, वह भी झूठ होता है । हो गया होगा सपना सच । निश्चिन्त हो गया वह आदमी । अपराध का एक भाव था कि लकड़हारे को धोखा दिया, वह भी चला गया ।
रात लकड़हारे ने एक सपना देखा कि उस आदमी ने जंगल में जाकर खोज लिया गड्ढा । और वह बारहसिंगे को घर ले गया । वह आधी रात उठकर उसके घर पहुंच गया । दरवाजा खटखटाया । दरवाजा खोला तो बारहसिंगा आंगन में पड़ा था । तो उसने कहा, यह तो बड़ा धोखा दिया तुमने । मैंने सपना देखा, तुम्हें निकालते देखा और बारहसिंगा तुम्हारे द्वार पर पड़ा है । ऐसी बेईमानी तो नहीं करनी थी ।
मुकदमा अदालत में गया । मजिस्ट्रेट बड़ा मुश्किल में पड़ा । मजिस्ट्रेट ने कहा, अब यह बड़ी उलझन की बात है । लकड़हारा सोचता है कि उसने सपना देखा था । तुम्हारी पत्नी कहती है कि तुमने सपना देखा कि लकड़हारा देखा था । अब लकड़हारा कहता है कि सपने में उसने देखा कि तुम बारहसिंगा ले आए । जो हो, इस पंचायत में मैं न पडूंगा । यह कानून के भीतर आता भी नहीं सपनों का निर्णय । एक बात सच है कि बारहसिंगा है, सो आधा-आधा तुम बांट लो ।
यह फाइल राजा के पास पहुंची दस्तखत के लिए, स्वीकृति के लिए । राजा खूब हंसने लगा । उसने कहा, यह भी खूब रही । मालूम होता है इस न्यायाधीश का दिमाग फिर गया है । इसने यह पूरा मुकदमा सपने में देखा है । उसने अपने वजीर को बुला कर कहा कि इसको सुलझाना पड़ेगा ।
वजीर ने कहा, देखिए, ज्ञानी कहते हैं, जिसको हम सच कहते हैं वह सपना है । और अब तक कोई पक्का नहीं कर पाया है कि क्या सपना है और क्या सच है । और जो जानते थे प्राचीन पुरुष- लाओत्सु जैसे, वे अब मौजूद नहीं दुर्भाग्य से, जो तय कर सके कि क्या सपना और क्या सच । यह हमारी सामर्थ्य के बाहर है । न्यायाधीश ने जो निर्णय दिया, उसे चुपचाप स्वीकृति दे दें । इस उलइान में पड़ें मत । क्योंकि केवल जानी पुरुष ही तय कर सकते हैं कि क्या सच है और क्या सपना है ।
मैं तुमसे कहना चाहता हूं ज्ञानी पुरुष ही तय कर सकते हैं कि क्या सपना है और क्या सच है । लेकिन हम क्यों नहीं तय कर पाते? हम चूकते क्यों चले जाते हैं? हम चूकते चले जाते हैं क्योंकि हम सोचते हैं, जो देखा उसमें ही तय करना है । जो देखा उसमें क्या सच और जो देखा उसमें क्या झूठ ।
दिन में देखा वह सच हम कहते हैं, रात जो देखा वह झूठ । जाग कर जो देखा वह सच, सोकर जो देखा वह झूठ । आंख खुली रख कर जो देखा वह सच, आंख बंद रख कर देखा जो झूठ । सबके साथ जो देखा सच, अकेले में जो देखा वह झूठ । लेकिन हम एक बात कभी नहीं सोचते कि हम देखे और देखे में ही तौल करते रहते हैं ।
ज्ञानी कहते हैं, जिसने देखा वह सच, जो देखा वह सब झूठ-जाग कर देखा कि सोकर देखा, अकेले में देखा कि भीड़ में देखा, आंख खुली थी कि आंख बंद थी-जो भी देखा वह सब झूठ । देखा, देखा सो झूठ । जिसने देखा, बस वही सच । द्रष्टा सत्य और दृष्य झूठ ।
जीसस - जब तक तुम्हारी दो आंखें एक आंख न बन जाए, तब तक तुम मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश न कर सकोगे ।
एक सम्राट ने, जो बड़ा खूंखार आदमी था, कहा कि इस गांव में जो भी असत्य बोलेगा उसे सूली पर लटका देंगे । और उसने कहा कि सिखावन के तौर पर, नगर का बड़ा द्वार जब सुबह खुलेगा, तो वहां जल्लाद मौजूद रहेंगे फांसी लगाकर । और जो भी आदमी आएंगे उनसे पूछेंगे । अगर उनमें से कोई भी असत्य बोला तो तत्क्षण सूली पर लटका देंगे, ताकि पूरा गांव रोज सुबह देख ले कि असत्य बोलनेवाले की क्या हालत होती है ।
मुल्ला नसरुद्दीन उसके दरबार में था, उसने कहा अच्छा, तो कल फिर दरवाजे पर मिलेंगे । उस सम्राट ने कहा, तुम्हारा मतलब? उसने कहा, कल वहीं तुम भी मौजूद रहना । हम असत्य बोलेंगे और तुम हमें फांसी पर लगाकर देख लेना ।
सम्राट बड़ा नाराज हुआ । उसने बड़ा इंतजाम किया कि यह आदमी चाहता क्या है! और सुबह जब दरवाजा खुला, सम्राट मौजूद था, और वजीर मौजूद थे, पूरे दरबारी मौजूद थे, फांसी का तख्ता मौजूद था, जल्लाद मौजूद थे । और मुल्ला अपने गधे पर सवार दरवाजे के भीतर प्रविष्ट हुआ ।
सम्राट ने कहा -- कहां जा रहे हो नसरुद्दीन?
नसरुद्दीन ने कहा -- फांसी के तख्ते पर लटकने जा रहा हूं ।
अब बड़ी मुश्किल हो गई । अगर उसको लटकाओ तो वह सच हो जाए । अगर न लटकाओ तो वह झूठ है । अब करो क्या? अगर उसको फांसी पर लटका दो तो एक सच्चे आदमी को फांसी हो गई । अगर उसको फांसी पर न लटकाओ, तो एक झूठा आदमी पहले ही दिन छूटा जा रहा है । सम्राट ने अपना सिर ठोंक लिया । नसरुद्दीन ने कहा कि सत्य और असत्य का निर्णय इतना आसान नहीं । हटाओ फांसी वगैरह । कौन जानता है कौन सत्य बोल रहा है, कौन असत्य बोल रहा है! कौन जानता है क्या सत्य है, क्या असत्य है!
सत्य और असत्य बड़ी नाजुक बातें हैं ।
झूठ को भी चलना हो, तो किसी न किसी वास्तविकता का सहारा लेना जरूरी है, खुद नहीं चल सकता, उसके पास कुछ भी नहीं है । झूठ का मतलब ही यह है कि उसके पास कुछ भी नहीं है, उसे सहारा लेना पड़ता है । इसलिए झूठ बोलनेवाला हमेशा पूरे उपाय करता है आपको समझाने का, कि मैं सच बोल रहा हूं । अगर भरोसा आ जाए कि यह झूठ है, तो झूठ वहीं गिर जाता है ।
एमेनुअल कांट ने बड़ी कीमत की बात कही है । उसने कहा है कि अगर सारी दुनिया में सभी लोग झूठ बोलने लगें, तो झूठ बिलकुल बेकार हो जाए । झूठ तभी तक चलता है, जब तक कुछ लोग सच बोल रहे हैं, या आशा रहती है कि कोई न कोई सच बोलता है । अगर सभी लोग तय ही कर लें कि हम झूठ ही बोलेंगे, और जो भी बोलेंगे वह झूठ ही होगा, तो फिर झूठ के चलने का कोई उपाय न रह जाएगा । पर बड़ी अड़चनें होंगी, काम चलना ही मुश्किल हो जाएगा ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन ट्रेन में सवार हुआ । जिस धंधे में वह लगा था, उसी धंधे का एक दूसरा आदमी भी उसी डिब्बे में चलती-भागती गाड़ी में सवार हुआ । वह मुल्ला का प्रतियोगी था, उसी धंधे में । मुल्ला ने मन में सोचा अगर मैं इससे पूछूंगा कि कहां जा रहे हो, तो यह जरूर झूठ बोलेगा । फिर भी मुल्ला ने कहा देखें और पूछा, कहां जा रहे हो? उस आदमी ने कहा, दिल्ली जा रहा हूं । मुल्ला ने मन में कहा कि जरूर कलकत्ता जा रहा होगा । यह आदमी विरोधी है धंधे में, और सिवाय झूठ के कभी सच बताता नहीं, जरूर कलकत्ता जा रहा होगा; पक्का है मामला । लेकिन तभी उसे खयाल आया कि गाड़ी तो दिल्ली जा रही है । मुस्कुराया वह, हंस कर बोला कि क्यों झूठ बोलते हो? दिल्ली जा रहे हो और झूठ बोलते हो कि दिल्ली जा रहे, ताकि समझूं कि कलकत्ते जा रहे हो!
बड़ी अड़चन हो जाए, यदि सारे लोग झूठ बोल रहे हों । तो हिसाब लगाना मुश्किल हो जाए, और किसी बात का कोई भरोसा भी न रहे । दुनिया चलती है थोड़े से सच के सहारे । झूठ भी चलता है सच के सहारे । अहंकार बिलकुल सरासर झूठ है, उसका कोई भी अस्तित्व नहीं है । शरीर का अस्तित्व है, आत्मा का अस्तित्व है; अहंकार का कोई अस्तित्व नहीं है । अहंकार मात्र एक खयाल है । या तो अहंकार आत्मा में अपने पैर गड़ाए तो चल सकता है । लेकिन आत्मा में वह पैर गड़ा नहीं सकता; क्योंकि आत्मा के प्रकाश में, वह क्योंकि अंधकार है, टिकेगा नहीं । इसलिए शरीर के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है । अहंकार अपनी जड़ें शरीर में डाल देता है । शरीर के सहारे अहंकार सच्चा हो जाता है, वास्तविक हो जाता है, यथार्थ हो जाता है ।
जीवन आंख मूंदकर खुद को दोहराता है - जब तक आप इसके प्रति जागरूक नहीं हो जाते हैं, यह एक चक्र की तरह दोहराता रहेगा ।
Edmund Burke [1729-1797] दुनिया का इतिहास लिख रहा था। कोई पंद्रह साल उसने मेहनत की थी और आधा इतिहास लिख चुका था। पंद्रह साल; करीब अपनी पूरी जिंदगी की समझदारी का समय वह इतिहास पर लगा रहा था। सुबह से उठता था, तो रात आधी रात तक लिखता ही रहता था। क्योंकि बड़ा था काम और जिंदगी थी छोटी। और भरोसा नहीं था कि किताब पूरी हो सके।
आधी किताब जब पूरी हो गई थी, एक दिन दोपहर को घर के आस-पास जोर से शोरगुल मचा। लेकिन वह तो अपने काम में लगा रहा। शोरगुल बढ़ता चला गया। तब वह उठकर बाहर आया, उसने कहा, बात क्या है! लोग भाग रहे थे। पूछा, बात क्या है? किसी ने कहा, हत्या हो गई। तुम्हारे मकान के पीछे मर्डर हो गया। एक से पूछा; उसने कुछ कहा कि किस तरह हुआ। दूसरे से पूछा; उसने कुछ कहा। वे सब आंखों देखे हुए, चश्मदीद गवाह थे।
बर्क भागा हुआ अपने मकान के पीछे पहुंचा। वहां लोग मौजूद थे। भीड़ लगी थी। लाश सामने पड़ी थी। हत्यारा पकड़ लिया गया था। लेकिन सबके version अलग थे। देखने वाला कोई कह रहा था कि जिम्मेवार कौन है। कोई कह रहा था कि जो मारा गया, वह ठीक ही मारा गया। कोई कह रहा था, जिसने मारा, उसने बहुत बुरा किया। कोई कह रहा था, हत्यारा जिम्मेवार नहीं है। कोई कह रहा था कि हत्यारा जिम्मेवार है। बर्क ने सबसे पूछा और लौटकर पंद्रह साल जो किताब में मेहनत लगाई थी, उसमें आग लगा दी। उसने लिखा कि जब मेरे घर के पीछे हत्या हो जाए, और आंखों देखने वाले लोगों की गवाहियां अलग हों, तो पांच हजार साल पहले क्या हुआ था, इसको पांच हजार साल बाद मैं लिखूं, यह व्यर्थ है। इस झंझट में मैं नहीं पडूंगा। बर्क ने अपने पत्र में लिखा है कि इतिहास सरासर झूठ है। सच्चा इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता।
Edmund Burke - To read without reflecting is like eating without digesting
दक्षिण में एक संन्यासी था ब्रह्मयोगी। उसने आक्सफोर्ड, रंगून और कलकत्ता विश्वविद्यालय में तीन बार एक बहुत अदभुत प्रयोग किया--उसने मरने का प्रयोग किया। वह दस मिनट के लिए मर जाता था, मर जाता था मेडिकली, जिसे चिकित्सक कह सकें कि मौत हो गई। कलकत्ता यूनिवर्सिटी में जब उसने प्रयोग किया, तो दस बड़े चिकित्सक मौजूद थे। कलकत्ता यूनिवर्सिटी के सबसे बड़े चिकित्सक, सर्जन, सब मौजूद थे। और जब ब्रह्मयोगी दस मिनट के लिए मर गया, तो उन दसों ने दस्तखत किए हैं सर्टिफिकेट पर कि यह आदमी मर गया है, इसकी हम गवाही देते हैं। सांस खो गई, हृदय की धड़कनें खो गईं, खून की गति खो गई, मरने की सारी की सारी लक्षण पूरी हो गई। दस मिनट बाद वह आदमी वापस लौट आया, और उस आदमी ने कहा कि अगर यह तुम्हारा सर्टिफिकेट सही है, तो मैं वापस नहीं लौट सकता। और अगर मैं वापस लौट आया हूं, तो तुमने अब तक जितने मृत्यु के सर्टिफिकेट दिए सब झूठे थे। क्योंकि इन दो के सिवाय और क्या मतलब होगा? और उन दस डाक्टरों ने दूसरी बात भी लिख कर दी है और उन्होंने लिख कर यह दिया है कि जहां तक हम समझते हैं और जहां तक हमारा विज्ञान जानता है, हम समझते हैं कि यह आदमी मर गया था। लेकिन हम अपनी आंखों को झूठा नहीं कह सकते, और यह आदमी फिर जिंदा है।
जब भी सच और झूठ में समझौता हो, तो झूठ जीतता है।
एक बार ऐसा एक गांव में हुआ। एक आदमी ने रास्ते पर चलते एक आदमी को पकड़ लिया। और कहा कि हद हो गई! अब बहुत हो गया; अब बर्दाश्त के बाहर है। वह सौ रुपए जो आपने लिए थे, मुझे वापस लौटा दें! वह आदमी चौंका। उसने कहा कि क्या कह रहे हैं आप? मैंने और आपसे सौ रुपए कभी उधार लिए! मैंने आपकी शकल भी पहले नहीं देखी। उस आदमी ने कहा कि लो, सुनो मजाक! लेते वक्त पुराने परिचित थे, देते वक्त शकल भी पहचान में नहीं आती!
भीड़ इकट्ठी हो गई है! रास्ते पर चारों तरफ लोग आ गए हैं! लोगों ने कहा कि भई, क्या बात है! उस आदमी ने चिल्लाकर कहा कि मेरे सौ रुपए लूटे ले रहा है यह आदमी। कहता है, मेरी शकल भी नहीं देखी! उस आदमी ने कहा कि हैरान कर रहे हैं आप! सच में ही मैंने आपकी शकल नहीं देखी! लोगों को भी शक हुआ कि इतना झूठ तो कोई भी नहीं बोलेगा कि शकल भी न देखी हो और सौ रुपये!
अंततः लोगों ने, जैसा कि लोग होते हैं, उन्होंने कहा कि compromise कर लो, पचास-पचास पर निपटारा कर लो! जिस आदमी को देने थे, उसने कहा, क्या कह रहे हैं आप? मैं इसकी शकल नहीं जानता। लोगों ने कहा, अब तुम ज्यादती कर रहे हो! उस आदमी ने कहा कि भई, ठीक है। हम पचास छोड़े देते हैं। और क्या! पचास छोड़े देता हूं, लोगों ने कहा, इनकी बात का खयाल रखकर! स्वभावतः, लोग उसके और साथ हो गए। उन्होंने कहा, पचास तो तुम दे ही दो!
ऑस्कर वाइल्ड -- झूठ बोलना केवल उन्हीं के लिए संभव है, जिनकी स्मृति बहुत अच्छी हो। जिनकी स्मृति कमजोर है, उन्हें भूलकर झूठ नहीं बोलना चाहिए। क्योंकि झूठ में बहुत हिसाब रखना पड़ेगा।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे से कह रहा है, तेरे झूठ को अब हम बरदाश्त ज्यादा नहीं कर सकते। तू गजब के झूठ बोल रहा है! उस लड़के ने कहा, मैं और झूठ! नसरुद्दीन ने सिर्फ उसको दिखाने के लिए, मित्र एक साथ खड़ा था, तो उसको कहा कि अच्छा तू एक झूठ अभी बोलकर बता, यह एक रुपया तुझे इनाम दूंगा। उसके लड़के ने कहा, पांच रुपए कहा था!
पाखंड का जो सबसे बड़ा उपद्रव है, वह यह है कि आपकी पहचान खो जाती है, प्रत्यभिज्ञा मुश्किल हो जाती है।
तीन महिलाएं अपने पति के विषय में चर्चा कर रही थीं। पहली बोली: 'हमारे विवाह को इतने वर्ष हो गए, पर हम दोनों में आज तक एक बार भी तूत्तू मैं-मैं नहीं हुई।' दूसरी ने लंबी सांस लेते हुए कहा: 'काश, मैं भी यही कह सकती!' तीसरी बोली: 'अरी तू भी कह दे न! आखिर इसने भी कहा ही तो है, कहने में क्या बनता बिगड़ता है?'
करुणा
कथा :
बुद्ध के पास एक आदमी आया और उसने कहा कि मैं दुनिया की कैसे सेवा करूं, आप मुझे समझा दें । और कहते हैं, बुद्ध ने आंख बंद कर ली और उनकी आंख से एक आंसू टपका । ऐसा बहुत मुश्किल से होता है कि बुद्ध रोएं । वह आदमी भी घबड़ा गया कि मैंने कुछ ऐसी बात तो नहीं कह दी कि उन्हें चोट लगी हो? कि मैंने उनके फूल जैसे कोमल हृदय को कोई आघात तो नहीं पहुंचा दिया? ऐसा मैंने कुछ कहा तो नहीं । वह तो सोच कर ही आया था कि बुद्ध बड़े प्रसन्न होंगे, जब सुनेंगे कि मैं अपना सारा जीवन मनुष्य जाति की सेवा में लगाना चाहता हूं । और यह क्या हुआ कि बुद्ध की आंख से आंसू टपका?
आनंद भी खिन्न हो गया, और भी भिक्षु खिन्न हो गए । उन्होंने कहा, तुमने कहा क्या आखिर? उस आदमी ने कहा, मैंने कुछ ऐसी बात कही नहीं, इतना ही कहा है । बुद्ध से पूछा उन्होंने, कि क्या हुआ? आपकी आंख में आंसू? उन्होंने कहा, मैं इस आदमी के लिए रोया । इसने अभी अपनी ही सेवा नहीं की और यह सारी दुनिया की सेवा करने चला । इसने अभी अपने को भी नहीं जाना । यह आदमी महादु:ख में है । यह अपने दुख से बचने के लिए दूसरों की सेवा करने में उलझना चाहता है । यह इसका बचाव है । इसलिए मैं रोता हूं । इसकी करुणा वास्तविक करुणा नहीं है, इसकी करुणा आत्म-पलायन है । इसलिए मैं रोता हूं ।
बुद्ध और रोते?
खिन्नोऽपि न च खिद्यते ।
ज्ञानी पुरुष अगर कभी उदास हो, दुखी हो, उसकी आंख में आंसू भी आ जाएं तो जल्दी निष्कर्ष मत लेना । वह अपने लिए नहीं रोता ।
मायाचार
कथा :
कनफ्यूशियस की बड़ी प्राचीन कथा है कि कनफ्यूशियस एक गांव से गुजरता था और उसने एक स्त्री को एक कब्र पर पंखा करते देखा । बड़ा हैरान हुआ । इसको कहते हैं प्रेम! पति तो मर गया, कब्र को पंखा कर रही है? उसने पूछा कि देवी, सुना है मैंने पुराणों में कि ऐसी देवियां हुई हैं, लेकिन अब होती हैं सोचता नहीं था । लेकिन धन्य! तेरे दर्शन हुए, चरण छू लेने दे । उसने कहा, रुको । पहले पूछ तो लो कि क्यों पंखा हिला रही है? क्यों हिला रही है? कनफ्यूशियस ने पूछा । उसने कहा कि जब मेरा पति मरा तो उसने कहा कि देख, विवाह तो तू करेगी ही, लेकिन जब तक मेरी कब्र न सूख जाए, मत करना । पंखा हिला रही हूं? कब्र को सुखा रही हूं । गीली कब्र । अब पति को वचन दे दिया ।
तुम तो जब भी रोते हो, अपने लिए रोते हो । जब तुम बताते हो कि दूसरों के लिए रो रहे हो तब भी तुम अपने लिए ही रोते हो । पति मर गया किसी का और पत्नी रो रही है; लेकिन वह अपने लिए ही रो रही है, पति के लिए नहीं रो रही । यह सहारा था, सुरक्षा थी, अर्थ की व्यवस्था थी । यह पति का सहारा छूट गया । इस पति के कारण हृदय भरा-पूरा था, एक खाली जगह छूट गई । वह अपने लिए रो रही है । वह पति के लिए नहीं रो रही है ।
रोगी आदमी के प्रेम में भी रोग होता है । स्वाभाविक है । कुछ और होता है! बाप अपने बेटे से कहता है कि तू देख, पढ़-लिख, बड़ा बन, प्रतिष्ठित हो । तुझसे मेरा प्रेम है इसलिए यह कह रहा हूं । लेकिन बेटा अगर अप्रतिष्ठित हो जाए, बड़े पदों पर न पहुंचे, तो प्रेम खो जाता है । तो प्रतिष्ठा से प्रेम होगा, बेटे से कहां प्रेम है! महत्वाकांक्षा से प्रेम होगा; शायद, मेरा बेटा है, खूब प्रशंसा पाये, इससे प्रेम होगा, क्योंकि इसके बहाने मेरा अहंकार भी तृप्त होगा । मेरा बेटा प्रधानमंत्री हो गया, राष्ट्रपति हो गया, तो यह अहंकार की ही यात्रा हुई प्रेम के द्वारा । यह प्रेम नहीं । यह प्रेम के पीछे महत्वाकांक्षा का रोग है । प्रेम तो कुछ भी नहीं मांगता, देता है ।
जहां प्रतियोगिता का भाव है, वहीं अशांति है।
एक बूढ़ी औरत बड़ा बोझ लिए सिर पर जाती है। एक घुड़सवार पास से निकला। तो उस की औरत ने कहा कि बेटा, बोझ बड़ा है, इसे तू ले-ले; और आगे चार मील बाद, चुंगी पर दे जाना। मैं जब वहा पहुंचूंगी तो ले लूंगी।
घुड़सवार अकड़ा, उसने कहा -- क्या समझा है तूने? मैं तेरा कोई गुलाम हूं? कोई नौकर-चाकर हूं? ढो अपना बोझ। यह गंदी गठरी मैं कहा ले जाऊंगा? एड़ मारी, आगे बढ़ गया। लेकिन कोई दो फर्लांग गया होगा, उसे खयाल आया कि गठरी लेकर चल ही देते। चुंगी-चौकी वाले को क्या पता? नाहक गठरी गंवाई। पता नहीं क्या हो! लौटकर आया, कहा -- मां, भूल हो गई। बोझ ज्यादा है। दे-दे, चुंगी-चौकी पर दे जाऊंगा। उस बूढ़ी ने कहा -- बेटा अब तू चिंता मत कर। जो तुझसे कह गया, वह मुझसे भी कह गया है। तू अपनी राह ले, अब मैं ढो लूंगी।
कृष्ण -- जो सबके लिए रात्रि है, तब भी योगी जागा हुआ है। या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी!
इंश्योरेंस कंपनी के आफिस में फोन बजा। एक महिला बोली, जी, मैं इंश्योरेंस करवाना चाहती हूं। मैनेजर ने कहा, हम अभी उधर आते हैं। महिला ने कहा, जी नहीं, आप फोन पर ही कर दें। मैनेजर ने कहा, ऐसा नहीं कर सकता। महिला ने कहा, फिर रहने दें, अब तो घर में आग लग चुकी है।
दिमाग और छाते में एक समानता है -- दोनों खुले हों तभी काम के हैं नहीं तो बोझ बन जाते हैं ।
मुल्ला नसरुद्दीन यात्रा करके लौट रहा था। जहाज तूफान में उलझ गया। और यूं लगे कि अब गया तब गया। सब लोग प्रार्थना करने लगे। मुल्ला आखिर तक हिम्मत बांधे रहा, नहीं की प्रार्थना, नहीं की प्रार्थना । क्योंकि प्रार्थना करने का मतलब है कि व्रत लो, नियम लो, कि हे प्रभु ऐसा करूंगा वैसा करूंगा, बचाओ! उसने सोचा अगर बिना ही इसके तो अच्छा। मगर जब देखा कि अब डूबी ही डूबी, आखिर नाव के और जो लोग थे उन्होंने कहा कि नसरुद्दीन, अब तुम भी कुछ कसम लो, हम सब कसमें ले चुके। अब दिखता है तुम्हारे पाप के कारण ही डूब रही है। और बिलकुल जब डूबने की हालत आ गयी कि अब देर नहीं है, तो नसरुद्दीन ने कहा: 'हे प्रभु, मेरा जो महल है संगमरमर का, वह जो नौ लाख का महल है, उसको बेच कर गरीबों में बांट दूंगा--अगर यह नौका बच गयी।'
संयोग की बात नौका बच गयी। अब तुम सोच सकते हो नसरुद्दीन की छाती पर सांप लोट गए, कि जरा देर और रुक जाता, यह तो बचने ही वाली थी, यह तूफान जाने ही वाला था! मगर फंस गया। अब करना क्या? मगर होशियार आदमी है, रास्ते निकाल ही लेता है। और गांव भर में...नाव जब किनारे लगी, गांव भर में एक ही चर्चा, एक ही गरम-गरम चर्चा कि गजब कर दिया नसरुद्दीन ने! क्योंकि लोग जानते थे यह ऐसा महाकंजूस, कि इसके दरवाजे पर भिखारी भी नहीं आते, क्योंकि भिखारी अगर आ भी जाएं तो दूसरे भिखारी कह देते: 'भैया, क्यों समय खराब कर रहे हो? तुम नए मालूम होते हो इस गांव में। इस आदमी से भीख नहीं मिलेगी। और तुम्हारे पास कुछ होगा, अगर अकेला हुआ तो छुड़ा लेगा। इसने लोगों से उनके भिक्षापात्र तक छीन लिए हैं। भागो, आगे बढ़ो!'
यह आदमी नौ लाख का महल दान करेगा! बस एक ही चर्चा थी कि कब होगा, कब होगा! और दूसरे दिन नसरुद्दीन ने घोषणा की कि मकान बिकने वाला है, जिनको भी लेना हो आ जाएं। दूसरे दिन लोग आए। लोग देख कर बड़े हैरानी भी हुए। नसरुद्दीन ने मकान के सामने ही संगमरमर के खंभे के साथ एक बिलकुल मरियल बिल्ली भी बांध रखी थी। लोगों ने पूछा: 'यह मरियल बिल्ली किसलिए बांध रखी है?'
नसरुद्दीन ने कहा: 'ठहरो, अभी समझ में आएगा।' उसने कहा कि यह मकान मुझे बेचना है। नौ लाख इसके दाम हैं और एक रुपया बिल्ली का दाम है। दोनों चीजें साथ बिकेंगी। दुनिया जानती है कि इस मकान के दाम नौ लाख हैं, इससे कम एक पैसे का यह मकान नहीं है। लेकिन मैं एक झंझट में फंस गया हूं। ए भाइयो एवं बहनो, तुम मुझे इस झंझट से बचा लो। झंझट से बचने की तरकीब यह है कि बिल्ली के दाम नौ लाख रुपये हैं और मकान का दाम एक रुपया; दोनों साथ-साथ बिकेंगे। जिसको लेना हो ले लो।'
कई लोग उत्सुक थे लेने को, मकान शानदार! उन्होंने कहा: "हमें क्या है, यह एक रुपये में और सही, एक रुपया और ज्यादा! मरी बिल्ली फेंक-फाक देंगे, करना क्या? ले लिया। लेकिन नसरुद्दीन की तरकीब तुमने देखी, उसने एक रुपया गरीबों में बांट दिया, नौ लाख रुपये बैंक में जमा करवा दिया। मकान का दाम बांटने की कसम खायी थी, कोई बिल्ली के दाम बांटने की तो कसम खायी थी नहीं।
घायल तो यहाँ, हर एक परिंदा है,
मगर जो फिर से उड़ सके, वही जिन्दा है..!!
एक विश्व-विद्यालय का प्रोफेसर अपना अंतिम संदेश दे रहा था स्नातकों को, जो उत्तीर्ण हो गए थे और अब जल्दी ही अदालतों में जाकर वकालत शुरू करेंगे। तो उसने कहा, यह मेरा आखिरी संदेश तुम्हारे लिए, जो मैं सदा अपने विद्यार्थियों को देता हूं जब वे मुझे छोड़ते हैं। अगर कानून तुम्हारे पक्ष में हो तो कानून की किताबों का उद्धरण दो। सिर्प कानून की किताबें काफी हैं। अगर कानून तुम्हारे पक्ष में न हो, तो जितने जोर से बोल सको उतने जोर से बोलो, कानून की फिक्र छोड़ दो। और अगर कानून बिल्कुल विपक्ष में हो, तो सिर्प बोलने से काम नहीं चलेगा, टेबल भी पीटो! उछलो-कूदो; हंगामा मचा दो! कानून पक्ष में हो तो धीमे बोलो, चलेगा। लेकिन अगर कानून विपरीत हो, फिर धीरे मत बोलना। फिर तो तुम्हारे हंगामे पर ही सब निर्भर है। फिर मजिस्टेट हंगामे से ही प्रभावित होगा।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बगल के सेठ से एक कटोरा मांग लाया कि घर में मेहमान आए हैं, गरीब आदमी हूं, कटोरा नहीं है; सुबह लौटा जाऊंगा। सेठ ऐसे तो कृपण था, लेकिन उसने सोचा कि क्या हर्जा है, सुबह कटोरा लौटा जाएगा, कोई सदा के लिए मांग भी नहीं रहा है। कोई लेकर भाग जाए, ऐसा आदमी भी नहीं है। और एक कटोरे के पीछे घरद्वार छोड़ कर भागेगा कहां? दे दिया कटोरा।
सुबह नसरुद्दीन लौटा, एक कटोरा भी लाया, साथ में एक छोटी कटोरी भी लाया। सेठ ने पूछा: यह कटोरी कहां से ले आए? यह कटोरी किसलिए? उसने कहा कि रात कटोरे ने कटोरी को जन्म दिया। आपका कटोरा गर्भवान था। सेठ ने कहा कि हद हो गई! मानने का जी तो न हुआ, लेकिन मानने का जी हुआ भी। बात तो सरासर झूठी थी, मगर अब यह कटोरी चांदी की साथ ले आया है, इसको छोड़ना भी उचित नहीं! प्रसन्नता से रख लिया।
पांच-सात दिन बाद नसरुद्दीन आया और उसने कहा कि मेहमान घर में आए हैं, कड़ाही की जरूरत है; खीर बनानी है। सेठ बड़ा खुश हुआ। कहा: जरा सम्हाल कर ले जाना, कड़ाही गर्भवती है। और सेठ रात भर सो नहीं सका कि देखें कल क्या होता है? और कल वही हुआ जो सोचा था सेठ ने। एक छोटी कड़ाही लेकर नसरुद्दीन आ गया। सेठ भी चैंका कि यह भी हद कर रहा है! यह मैंने कभी सोचा ही नहीं था, मगर कुछ न कुछ राज है। नसरुद्दीन ने कहा कि आप कहते थे कि कड़ाही गर्भवती है; यह छोटी कड़ाही पैदा हुई है। आपकी संपत्ति सम्हालिए। कड़ाही आपकी है, उसका बच्चा भी आपका है। वह भी सम्हाल लिया।
कोई महीना भर बाद नसरुद्दीन आया और कहा कि बड़ी जरूरत पड़ गई है, बहुत से लोगों को दावत दी है, तो कई थालियां चाहिए, कटोरियां चाहिए, पतेलियां चाहिए, कड़ाहियां चाहिए। सेठ ने कहा कि ले जाओ, जो चाहिए ले जाओ, मगर ख्याल रखना कि सब गर्भवती हैं। नसरुद्दीन ने कहा कि वह तो मैं दो दफे देख ही चुका हूं, कि आपके यहां के बर्तन कोई साधारण बर्तन नहीं हैं, वह तो अपने अनुभव से देख चुका, आपको कहने की जरूरत नहीं। उस रात तो सेठ सो ही नहीं सका।
लेकिन दूसरे दिन नसरुद्दीन नहीं आया। तो बड़ा चिंतित हुआ। तीसरे दिन नहीं आया तो चैथे दिन उसने आदमी को भेजा। नसरुद्दीन बैठा रो रहा था। आदमी ने कहा क्या हुआ? उसने कहा कि सब मर गए। पता नहीं क्या हुआ, फुड पाय.जनिंग हो गया या क्या हुआ, मगर सब मर गए। एक नहीं बचा! आज तीन दिन से मातम मना रहा हूं। आज आने की सोच ही रहा था, तीसरा पूरा हो गया, बस आज आता ही था, तुम्हें आने की कोई जरूरत न थी।
नौकर तो भागा, सेठ से बोला कि यह आदमी पागल है। यह कह रहा है, सब बर्तन मर गए। बर्तन कहीं मरते हैं! अब सेठ को समझ आई कि अब खुद फंस गए। भागे हुए गए कि क्यों रे नसरुद्दीन के बच्चे, निकाल बर्तन! नसरुद्दीन ने कहा कि मालिक, सब मर गए! सेठ ने कहा कि कहीं बर्तन मरते हैं! नसरुद्दीन ने कहा कि जब बाल-बच्चे पैदा करते हैं, तो मरेंगे नहीं? मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू? जब मीठा पी गए, अब कड़वा भी पिओ..अब मैं भी क्या कर सकता हूं! मैं तो दफना भी चुका।
एक दर्जी मुल्ला नसरुद्दीन को अचकन और चूड़ीदार पाजामा बेच रहा था। खींचतान कर किसी तरह उसको चूड़ीदार पाजामा पहना दिया..दो घंटे लगे। नसरुद्दीन ने कहा कि भई, यह तो बहुत कठिन काम है। और तुमने किसी तरह चढ़ा तो दिया, अब मुझे डर लग रहा है कि इसको मैं उतार सकूंगा कि नहीं। और आईने के सामने खड़ा हुआ तो बिल्कुल बंदरछाप काला दंतमंजन! उसने कहा कि भइया, यह तुमने मेरी क्या गति कर दी! यह दिल्ली में नेतागणों की होती रहे, होती रहे, मगर मुझे कोई काला दंतमंजन बेचना है? एक ढोल और दे दो मुझे! यह कहां का कपड़ा मुझे पहना दिया? निकालो!
मगर दर्जी भी दर्जी था। दर्जी ने कहा कि तुम समझ ही नहीं रहे। तुम्हें आधुनिक सयता का कोई बोध ही नहीं है। अरे, यह राष्ट की वेशभूषा है..राष्टीय वेश है! और तुम इतने सुंदर लग रहे हो! तुम जरा बाहर तो हो कर आओ! और तुम इतने जवान लग रहे हो कि तुम्हारे मित्र भी तुम्हें पहचान नहीं सकेंगे।
नहीं माना दर्जी तो मुल्ला जरा बाहर सड़क पर चक्कर लगाने लगा। चलना ही मुश्किल हो रहा था, अब गिरे तब गिरे की हालत थी..जो कि नेतागणों की रहती ही है, अब गिरे तब गिरे! जब तक न गिरे तब तक समझो चमत्कार है! गिरे तो उठना फिर बिल्कुल मुश्किल हो जाता है। उठ आए तो समझो महा चमत्कार है! कोई पांच-सात मिनट बाद ही वापिस लौट आया। जैसे ही भीतर आया, वह दर्जी उठ कर खड़ा हुआ -- कहिए, महाशय आइए, आपकी क्या सेवा करूं? आप कहां से आए हैं? आप अजनबी मालूम होते हैं इस बस्ती में। और कपड़े आपके क्या सुंदर! मैं तो बिल्कुल पहचान ही नहीं पा रहा हूं, दर्जी बोला।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दुकान पर कुछ सामान खरीदने गया। दुकानदार दाम ज्यादा बता रहा था। मुल्ला ने कहा: दाम दुगुने हैं। दुकानदार ने कहा कि दुगुने हों या तिगुने, इसी दाम में मैं चीजें बेचता हूं। मुल्ला ने कहा: सामने का दुकानदार आधे में बेच रहा है। तो उस दुकानदार ने कहा: वहीं से ले लो। उसने कहा कि वहां से कैसे लें, उस का स्टाक खत्म हो गया है! उस दुकानदार ने कहा: स्टाक जब मेरा खत्म हो जाता है तो मैं तो एक चैथाई में बेचता हूं, आधे की क्या बात!
ऐसे ही जिद्दमजिद चलती रही। आखिर उस दुकानदार ने कहा: भई, सिर पच गया; उसने कहा कि ऐसा कर, अगर तू एक काम कर दे तो आधे में दूंगा; अगर तू बता दे कि मेरी कौन सी आंख असली है और कौन सी नकली?
मुल्ला ने गौर से देखा और कहा कि बाईं आंख तुम्हारी नकली है। दुकानदार तो बड़ा हैरान हुआ, बाईं आंख उसकी नकली थी! मगर इस कला से बनाई गई थी कि पहचानना मुश्किल था कौन असली, कौन नकली। उसने कहा कि नसरुद्दीन, मान गए भाई! कैसे पहचाने कि बाईं आंख नकली है? नसरुद्दीन ने कहा: उसमें कुछ दया दिखाई पड़ती है। असली तो हो ही नहीं सकती। असली तो बिल्कुल कठोर है।
अज्ञान से उपजा
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर से गिर पड़ा । सारा गांव चकित हुआ, क्योंकि गधा उसको लेकर अस्पताल पहुंच गया । तो मुल्ला के घर लोग पहुंचे और लोगों ने कहा कि बड़े मियां, अल्लाह का शुक्र, लाख-लाख शुक्र कि आपको ज्यादा चोट नहीं लगी । और एक सज्जन ने कहा कि सच कहें तो विश्वास नहीं होता कि गधा इतना समझदार होता है । क्योंकि कहावत तो यही है कि गधा यानी गधा । मगर हद हो गई ! आपका गधा कुछ विशिष्ट गधा है । कितना समझदार जानवर कि आपको लेकर अस्पताल पहुंच गया ! भरोसा नहीं आता इसकी समझदारी पर । मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, क्या खाक समझदार है, गधों के अस्पताल ले गया था !
गधा ले जाएगा तो गधों के अस्पताल ले जाएगा । वेटनरी अस्पताल ले गया होगा । गधा समझदारी भी करेगा तो कितनी करेगा? एक सीमा है । अज्ञानी समझदारी भी करेगा तो कितनी करेगा? एक सीमा है । उस सीमा के पार अज्ञान नहीं ले जा सकता ।
असली सवाल, असली क्रांति, असली रूपांतरण स्थितियों का नहीं है, बोध का है । अज्ञान से मुक्त होना है, संसार से नहीं ।
मुल्ला नसरुद्दीन पकड़ा गया । किसी की मुर्गी चुरा ली । वकील ने उसको सब समझा दिया कि क्या-क्या कहना । रटवा दिया कि देख, इससे एक शब्द इधर-उधर मत जाना । वह सब रट लिया, कंठस्थ कर लिया । वकील को कई दफे सुना भी दिया । वकील ने कहा, अब बिलकुल ठीक । अपनी पत्नी को भी सुना दिया । रात गुनगुनाता रहा, सुबह अदालत में भी गया और मुकदमा जीत भी गया, क्योंकि वकील ने ठीक-ठीक पढ़ाया था । उसने वही-वही कहा जो वकील ने पढ़ाया था । मजिस्ट्रेट ने कई तरह से पूछा, विपरीत वकील ने कई तरह से खोज-बीन की, लेकिन वह टस से मस न हुआ । सबको पता है कि मुर्गी उसने चुराई है । मजिस्ट्रेट को भी पता -- छोटा गांव । और वह कई औरों की भी मुर्गियां चुरा चुका है तो सभी को, गांव को पता है कि है तो मुर्गी-चोर । लेकिन डटा रहा ।
आखिर मजिस्ट्रेट ने कहा कि अब हार मान गए । ठीक है तो तुम्हें मुक्त किया जाता है नसरुद्दीन । तो भी वह खड़ा रहा । मजिस्ट्रेट ने कहा -- अब खड़े क्यों हो? तुम्हें मुक्त किया जाता है । तो उसने कहा, इसका क्या मतलब? मुर्गी मैं रख सकता हूँ?
वह चोरी भीतर है तो कहां जाएगी? वह सब पढ़ाया-लिखाया व्यर्थ हो गया । आदमी कितना ही ऊपर से आरोपण कर ले, कोई न कोई बात भीतर से फूट ही पड़ती है, खबर दे जाती है ।
तुम कितने ही शांत बनो ऊपर से, तुम कितने ही सज्जन बनो, तुम कितने ही सुशील बनो, तुम कितना ही अभिनय करो, कोई न कोई बात कहीं न कहीं से बह कर निकल आएगी । क्योंकि तुम जो हो उसको ज्यादा देर झुठलाया नहीं जा सकता ।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उस पर नाराज थी। बात ज्यादा बढ़ गई और पत्नी ने चाबियों का गुच्छा फेंका और कहा कि मैं जाती हूं। अब बहुत हो गया और सहने के बाहर है। मैं अपनी मां के घर जाती हूं और कभी लौटकर न आऊंगी।
नसरुद्दीन ने गौर से पत्नी को देखा और कहा कि अब जा ही रही हो, तो एक खुशखबरी सुनती जाओ। कल ही तुम्हारी मां तुम्हारे पिता से लड़कर अपनी मां के घर चली गई है। और जहां तक मैं समझता हूं वहां वह अपनी मां को शायद ही पाए।
एक वर्तुल है भूलों का। वह एक-सा चलता जाता है। एक बंधी हुई लकीर है, जिसमें हम घूमते चले जाते हैं। हर पीढ़ी वही भूल करती है, हर आदमी वही भूल करता है, हर जन्म में वही भूल करता है। भूलें बड़ी सीमित हैं।
जो जीवन को पकड़ता है, वह मृत्यु को पाता है। इसका यह अर्थ हुआ कि जो जीवन को छोड़ता है, वह महाजीवन को पाता है।
एक बड़ी प्रसिद्ध हंगेरियन कहानी है कि एक आदमी का विवाह हुआ। झगडैल प्रकृति का था, जैसे कि आदमी सामान्यत: होते हैं। मां-बाप ने यह सोचकर कि शायद शादी हो जाए तो यह थोड़ा कम क्रोधी हो जाए, थोड़ा प्रेम में लग जाए, जीवन में उलझ जाए तो इतना उपद्रव न करे, शादी कर दी।
शादी तो हो गई। और आदमी झगडैल होते हैं, उससे ज्यादा झगडैल स्त्रियां होती हैं। झगडैल होना ही स्त्री का पूरा शास्त्र है, जिससे वह जीती है। मां-बाप लड़की के भी यही सोचते थे कि विवाह हो जाए, घर-गृहस्थी बने, बच्चा पैदा हो, सुविधा हो जाएगी। उलझ जाएगी, तो झगड़ा कम हो जाएगा।
लेकिन जहां दो झगडैल व्यक्ति मिल जाएं, वहां झगड़ा कम नहीं होता; दो गुना भी नहीं होता; अनंत गुना हो जाता है। जब दो झगड़ैल व्यक्ति मिलते हैं, तो जोड़ नहीं होता गणित का; दो और दो चार, ऐसा नहीं होता, गुणनफल हो जाता है।
पहली ही रात, सुहागरात को भेंट में जो चीजें आई थीं, उनको खोलने को दोनों उत्सुक थे; पहला डब्बा हाथ में लिया; बड़े ढंग से पैक किया गया था। पति ने कहा कि रुको, यह रस्सी ऐसे न खुलेगी। मैं अभी चाकू ले आता हूं। पत्नी ने कहा कि ठहरो, मेरे घर में भी बहुत भेंटें आती रहीं। हम भी बहुत भेंटें देते रहे हैं। तुमने मुझे कोई नंगे-लुच्चों के घर से आया हुआ समझा है? ऐसे सुंदर फीते चाकुओं से नहीं काटे जाते, कैंची से काटे जाते हैं।
झगड़ा भयंकर हो गया कि फीता चाकू से कटे कि कैंची से कटे। दोनों की इज्जत का सवाल था। बात इतनी बढ़ गई कि डब्बा उस रात तो काटा ही न जा सका, सुहागरात भी नष्ट हो गई उसी झगड़े में। और विवाद, क्योंकि प्रतिष्ठा का सवाल था, दोनों के परिवार दाव पर लगे थे कि कौन सुसंस्कृत है!
वह बात इतनी बढ़ गई कि वर्षों तक झगड़ा चलता रहा। फिर तो बात ऐसी सुनिश्चित हो गई कि जब भी झगडे की हालत आए, तो पति को इतना ही कह देना काफी था, चाकू! और पत्नी उसी वक्त चिल्लाकर कहती, कैंची! वे प्रतीक हो गए।
वर्षों खराब हो गए। आखिर पति के बरदाश्त के बाहर हो गया। और डब्बा अनखुला रखा है। क्योंकि जब तक यही तय न हो कि कैंची या चाकु तब तक वह खोला कैसे जाए। कौन खोलने की हिम्मत करे?
एक दिन बात बहुत बढ़ गई, तो पति समझा-बुझाकर झील के किनारे ले गया पत्नी को। नाव में बैठा, दूर जहां गहरा पानी था, वहा ले गया, और वहा जाकर बोला कि अब तय हो जाए। यह पतवार देखती है, इसको तेरी खोपड़ी में मारकर पानी में गिरा दूंगा। तैरना तू जानती नहीं है, मरेगी। अब क्या बोलती है? चाकू या कैंची? पत्नी ने कहा, कैंची।
जान चली जाए, लेकिन आन थोड़े ही छोड़ी जा सकती है! रघुकुल रीत सदा चली आई, जान जाय पर वचन न जाई।
पति भी उस दिन तय ही कर लिया था कि कुछ निपटारा कर ही लेना है। यह तो जिंदगी बरबाद हो गई। और चाकू-कैंची पर बरबाद हो गई!
लेकिन वह यही देखता है कि पत्नी बरबाद करवा रही है। यह नहीं देखता कि मैं भी चाकू पर ही अटका हुआ हूं अगर वह कैंची पर अटकी है। तो दोनों कुछ बहुत भिन्न नहीं हैं। पर खुद का दोष तो युद्ध के क्षण में, विरोध के क्षण में, क्रोध के क्षण में दिखाई नहीं पड़ता। उसने पतवार जोर से मारी, पत्नी नीचे गिर गई। उसने कहा, अभी भी बोल दे! तो भी उसने डूबते हुए आवाज दी, कैंची। एक डुबकी खाई, मुंह-नाक में पानी चला गया। फिर ऊपर आई। फिर भी पति ने कहा, अभी भी जिंदा है। अभी भी मैं तुझे बचा सकता हूं? बोल! उसने कहा, कैंची। अब पूरी आवाज भी नहीं निकली, क्योंकि मुंह में पानी भर गया। तीसरी डुबकी खाई, ऊपर आई। पति ने कहा, अभी भी कह दे, क्योंकि यह आखिरी मौका है! अब वह बोल भी नहीं सकती थी। डूब गई। लेकिन उसका एक हाथ उठा रहा और दोनों अंगुलियों से कैंची चलती रही। दोनों अंगुलियों से वह कैंची बताती रही, डूबते-डूबते, आखिरी क्षण में।
महाभारत के लिए कोई कुरुक्षेत्र नहीं चाहिए; मन काफी है।
एक मस्तिष्क के सर्जन ने एक आदमी का आपरेशन किया, एक राजनेता का। मस्तिष्क में कुछ खराबी थी। उसने पूरा मस्तिष्क बाहर निकाल लिया। लेकिन कई घंटे लगने थे, तो उसने खोपड़ी वगैरह सीकर राजनेता को सुला दिया। वह अपने काम में लग गया।
लेकिन राजनेता और एक जगह बैठा रहे! उसने देखा, सर्जन काम में लगा है और वह बिलकुल ठीक है, तो वह निकल भागा। सर्जन बड़ा हैरान हुआ। जब मस्तिष्क ठीक हो गया, तो वह आदमी नदारद। बहुत खोजबीन की, उसका कोई पता न चला।
पांच साल बाद पता चला कि वह देश के प्रधानमंत्री हो गए हैं। वह सर्जन उनके मस्तिष्क को लेकर गया कि महाराज, हम खोज—खोजकर परेशान हो गए अब पता चला कि आप प्रधानमंत्री हो गए हैं। उसने कहा, अब तुम यह मस्तिष्क ले ही जाओ। इसी से तो अड़चन हो रही थी। जब से इसको खोया है, तब से देखिए कहाँ से कहाँ पहुँच गए।
तर्क हिंसात्मक है; खंडन उसका लक्ष्य है। तर्क एक तरह की तलवार है, जिससे दूसरे की गर्दन काटो। और जिस तलवार से तुम दूसरे की गर्दन काट रहे हो, याद रखना, आज नहीं कल इसी तलवार से आत्महत्या करोगे।
अकबर एक दिन गुस्से में आ गया। कुछ बीरबल ने ऐसी बात कह दी। कही तो थी मजाक में ही, लेकिन मजाक जरा गहरा हो गया कि अकबर ने आव देखा न ताव, एक चांटा बीरबल को रसीद कर दिया! बीरबल भी कोई चुप रह जाने वाला तो था नहीं, लेकिन अकबर को चांटा मारना तो महंगी बात हो जाए। सो उसने पास में खड़े एक दरबारी को और भी करारा चांटा मार दिया। दरबारी तो बहुत चौंका, उसने कहा, यह कैसा न्याय? अकबर ने तुम्हें मारा, तुम मुझे क्यों मारते हो?
बीरबल ने कहा, तू क्यों फिक्र करता है? अरे और किसी को तू मार! चलने दे, कभी न कभी अकबर के पास पहुंच जाएगा। देता चल। आगे बढ़ाओ। रोकने की जरूरत नहीं है। पहुंच जाएगा अकबर तक, घबड़ाओ मत। दुनिया गोल है।
और हर चीज पहुंच जाती है--शायद आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों। कर्म का सारा सिद्धांत इतना ही है कि हर चीज एक दिन तुम पर लौट आएगी। सोच-समझ कर देना।
कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी (लट्ठ) हाथ ।
जो घर बारै (जलावे) आपना, चलै हमारे साथ ॥
मुल्ला नसरुद्दीन छाता लेकर बाजार से गुजर रहा था। वर्षा होने लगी, मगर उसने छाता न खोला। दो चार ने लोगों ने देखा, उन्होंने कहा कि नसरुद्दीन, छाता क्यों नहीं खोलते? नसरुद्दीन ने कहा कि छाते में छेद ही छेद हैं। लोगों ने पूछा फिर छाता लेकर चले ही क्यों? उसने कहा -- मैंने सोचा कौन जाने रास्ते में वर्षा हो जाए!
एक दाढ़ी वाले साहब बस में खड़े-खड़े सफर कर रहे थे। एक स्टॉप पर एक बहुत ही ठिगने कद का व्यक्ति उस में सवार हुआ। उसका हाथ डंडे तक नहीं पहुंच रहा था। इसलिए वह उन दाढ़ी वाले साहब की दाढ़ी पकड़कर कर खड़ा हो गया। कुछ देर तक तो दाढ़ी वाले साहब चुप रहे लेकिन वे फिर उस से बोले -- मेरी दाढ़ी छोड़...। उस ठिगने आदमी ने कहा -- क्यों, क्या आप अगले स्टॉप पर उतरने वाले हैं? अपनी-अपनी सूझ। अपनी-अपनी ऊंचाई। अपनी-अपनी तंद्रा। अपनी-अपनी बुद्धिहीनता।
सत्य बांझ है, उसके बाल बच्चे नहीं होते।
एक कवि महोदय माइक छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे। जब श्रोताओं ने बहुत चिल्ल पों मचाई तो कवि महोदय बोले: ठीक है, अब आप थोड़ी और सब्र करके मेरी अंतिम पंद्रहवीं कविता सुन लें।
ऐसा बार—बार कह कर तो आप उन्नीस कविताएं पहले ही सुना चुके हैं—कई श्रोताओं ने चिल्लाकर टोका। कवि महोदय ने शांत मुद्रा की और देखा और बोले: गिनती में भूल सुधार के लिए धन्यवाद। और यह कह कर वे पुनः कविता पाठ करने में तल्लीन हो गए।
लोग बस चले जा रहे हैं। कहां जा रहे हैं, क्योंकि जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, जो कर रहे हैं उस से कुछ हो रहा है कि नहीं हो रहा है—किसी को चिंता नहीं है। होश ही नहीं है। जिंदगी ऐसे धक्कम धुक्की में बीती जाती है, आपाधापी में बीती जाती है।
बुद्ध -- जैसे सागर को कहीं से भी चखो खारा है, ऐसे ही बुद्धों को भी कहीं से चखो, उनका स्वाद एक ही है, जागरण का स्वाद है।
एक हकीम ने चंदूलाल से कहा: कौन कहता है तुम बीमार हो? चंदूलाल तुम्हारी नाड़ी तो घड़ी जैसी तेज चल रही है।'
चंदूलाल ने कहा: 'हकीम साहब, आपका हाथ मेरी नाड़ी पर नहीं, घड़ी पर ही है।'
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
शीश दिए तो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ॥
मुल्ला नसरुद्दीन के पड़ोस में एक नए व्यक्ति आकर बसे। उसके देखने का ढंग आलोचना से भरा है। सभी पड़ोसियों की वह निंदा करता रहता है। नए पड़ोसी आए तो उसने सोचा, देखें, क्या कहता है! तो उससे पूछा -- नए पड़ोसी आ गए, क्या खबर है उनके संबंध में? क्या सोचते हो?
उसने कहा -- ग्यारह भाई हैं। पहला भाई राजनेता है और दूसरा उससे भी गया बीता। तीसरा भाई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है -- शिक्षकों से भगवान बचाए और चौथा उससे भी गधा। पांचवां मनोवैज्ञानिक है, छठवां भी पागल। सातवां दुकानदार है, आठवां भी चोर। नौवां कवि है और दसवां भी लफंगा। और ग्यारहवां अपने बाप-जैसा ही बाल ब्रह्मचारी है।
इंसान अपनी खुद की नज़रों में सही होना चाहिये, दुनिया की छोड़िये, दुनिया तो भगवान् से भी दुःखी है
एक धर्मगुरु एक सराय में आ कर ठहरा। उसने अपना घोड़ा झाड़ के नीचे बांधा। मुल्ला नसरुद्दीन यह देख रहा था। घोड़ा बड़ा प्यारा था और बड़ा कीमती था। और धर्मगुरु प्रसिद्ध था, और अपने घोड़े से उसका बड़ा लगाव था। वह दूर-दूर की यात्रा अपने घोड़े पर करता था। वह दोपहर के विश्राम के लिए रुका।
मुल्ला नसरुद्दीन घोड़े के पास गया। घोड़े को सहलाया। जब वह घोड़े को सहला रहा था और खुश हो रहा था--घोड़ा सच में बड़ा बहुमूल्य था--तभी एक घोड़े का खरीददार पास से निकलता था। उसने नसरुद्दीन से कहा, तुम्हारा घोड़ा है?
अब इतना शानदार घोड़ा! कहना मुश्किल हो गया कि अपना नहीं है।
नसरुद्दीन ने कहा, हां, अपना ही घोड़ा है।
उस आदमी ने कहा, बेचते हो? बात में बात बढ़ गयी।
नसरुद्दीन ने कहा, खरीदने की हिम्मत है?
हजार रुपए का घोड़ा था, नसरुद्दीन ने दो हजार दाम मांगे। न कोई देगा, न कोई बात उठेगी, बात खतम हो जाएगी। वह आदमी दो हजार देने को तैयार हो गया। अब बात यहां तक बढ़ गयी थी कि पीछे लौटना मुश्किल हो गया। तो उसने बेच दिया। फिर उसने सोचा, ऐसा कुछ हर्जा भी क्या है? दो हजार मुफ्त हाथ लग रहे हैं। और धर्मगुरु सोया हुआ है।
वह जब दो हजार गिन कर खीसे में रख ही रहा था--खरीददार तो घोड़ा ले कर जा चुका-- धर्मगुरु बाहर आया। भागने का मौका न मिला। तो रुपए तो उसने खीसे में रख लिए, अब क्या करे? कुछ सूझा नहीं, तो जहां घोड़ा खड़ा था, वहां घोड़े की रस्सी अपने गले में डाल कर और घास का एक टुकड़ा मुंह में ले कर खड़ा हो गया।
धर्मगुरु खुद भी बहुत घबड़ाया। देखी उसने यह हालत, तो उसके भी हाथ-पैर कांप गए कि यह हुआ क्या है? यह मामला क्या है? उसने कहा, भाई यह क्या कर रहे हो? बात क्या है!
नसरुद्दीन ने कहा, अब आपसे क्या छिपाना! सच बात कह दूं?
उस धर्मगुरु ने कहा कि मुझे तुम्हारी सच बात जानने का कोई प्रयोजन नहीं। मैं यह पूछता हूं, वह मेरा घोड़ा कहां है? क्योंकि तुम तो मुझे आदमी पागल मालूम पड़ते हो। मेरा घोड़ा कहां है?
नसरुद्दीन ने कहा कि आपके घोड़े की बात और मेरी बात दो अलग-अलग बातें नहीं हैं। मैं ही आपका घोड़ा हूं।
धर्मगुरु ने कहा कि यह तुम क्या कह रहे हो? होश में हो? शराब पीए हो? क्या मामला है?
नसरुद्दीन ने कहा कि आप पूरी कहानी सुन लें। बीस साल पहले एक स्त्री के साथ मैंने व्यभिचार किया, पाप किया। परमात्मा बहुत नाराज हो गया और उसने गुस्से में मुझे घोड़ा बना दिया--आपका घोड़ा। ऐसा मालूम होता है कि मेरा दंड पूरा हो गया है और मैं वापस आदमी हो गया हूं। मेरा नाम नसरुद्दीन है।
धर्मगुरु भी घबड़ा गया। परमात्मा की ऐसी नाराजगी कि आदमी को घोड़ा बना दिया! एकदम घुटने पर टिक गया। खुद भी परमात्मा से प्रार्थना की उसने कि क्षमा कर, पाप तो मैंने भी बहुत किए हैं। मगर दया कर। तेरी अनुकंपा का सहारा मांगता हूं। फिर उसने नसरुद्दीन से कहा, भाई, यह तो ठीक है, अब मुझे आगे जाना है। अब जो हुआ, हुआ। तुम अपने घर जाओ और मैं बाजार जा कर घोड़ा खरीद लूं।
वह बाजार गया तो घोड़े बेचने वाले की दूकान पर उसने अपने घोड़े को खड़ा पाया। तो और उसकी छाती घबड़ा गयी। वह पास गया घोड़े के और कान में बोला, नसरुद्दीन फिर से? इतनी जल्दी?
सतगुरु साँचा सूरमा नख सिख मारा पूर।
बाहर घाव न दीसई भीतर चकनाचूर
रूपांतरण
कथा :
गौतम बुद्ध के जीवन में उल्लेख है कि जब वे बारह वर्ष के बाद अपने घर वापस लौटे तो स्वभावत: अपने पिता को, अपनी पत्नी को, अपने बेटे को मिलना चाहे । तो आनंद ने कहा कि यह शोभा नहीं देता । बुद्धपुरुष का कौन पिता, कौन बेटा, कौन पत्नी? बात खतम हो गई । आप तो ज्ञान को उपलब्ध हो गए ।
बुद्ध ने कहा, मैं तो हो गया लेकिन वे नहीं हैं अभी उपलब्ध । उनका मोह अभी भी मेरे प्रति है । और मैं तो मुक्त हो गया लेकिन मेरा ऋण तो कायम है । उनसे मैंने जन्म लिया । और इस पत्नी को मैं बारह साल पहले छोड़ कर अंधेरी रात में भाग गया था, क्षमा तो मांग लेने दो । मेरी यात्रा तो पूरी हो गई, लेकिन वह तो अभी भी जली- भुंजी बैठी है । अभी भी नाराज है । बड़ी मानिनी है यशोधरा । उसने मुझे क्षमा नहीं किया । और जब तक मैं क्षमा न मांग वह क्षमा करेगी भी नहीं । अब मुझे उससे क्षमा मांग लेने दो ताकि वह भी मुक्त हो जाए । यह बात गई-गुजरी हो गई । जो हुआ, हुआ ।
आनंद जरा कसमसाया । उसको यह बात जंचती नहीं । बुद्धपुरुष को क्या लेना- देना? फिर भी अब नहीं मानते तो ठीक है, गया!
आनंद जब संन्यस्त हुआ था- आनंद बुद्ध का बड़ा भाई था स्वयं, चचेरा बड़ा भाई । जब वह संन्यस्त हुआ था, बुद्ध से दीक्षा ली थी तो दीक्षा के पहले उसने कहा था कि मेरी कुछ शर्तें हैं । दीक्षा के बाद तो मैं शिष्य हो जाऊंगा, फिर तुम मेरी सुनोगे नहीं । मुझे तुम्हारी सुननी पड़ेगी । दीक्षा के पहले बड़े भाई के हैसियत से ये शर्तें तुमसे मांग लेता हूं । उसमें एक शर्त यह भी थी कि सदा तुम्हारे साथ रहूंगा । तुम कभी भी मुझसे यह न कह सकोगे कि आनंद, मुझे छोड़ । रात तुम्हारे कमरे में सोऊंगा । तुम्हारी छाया की तरह चलूंगा । तुम मुझे समझा न सकोगे कि आनंद जा, तू दूसरे गाव में शिक्षा दे लोगों को । मैं कहीं जाने वाला नहीं । मैं तुम्हारे पीछे रहूंगा । ऐसी उसने पहले ही शर्त रखी थी और बुद्ध ने शर्त मान ली थी ।
जब वे महल में प्रवेश करने लगे तो बुद्ध ने कहा, आनंद, यशोधरा खुल न पाएगी अगर तू मौजूद रहा । कुलीन स्त्री है । वह अपना भाव भी प्रकट न करेगी तेरे सामने । फिर तू मेरा बड़ा भाई है, वह घूंघट कर लेगी । वह रो भी न पाएगी, नाराज भी न हो पाएगी । और तेरे सामने तेरी प्रतिष्ठा को ध्यान में रख कर वह कुछ कहेगी भी नहीं । तू कृपा कर । आज तू जरा पीछे रह जा ।
आनंद ने कहा, यह कैसी बात! बुद्धपुरुष को पत्नी क्या, पति क्या! पर बुद्ध ने कहा, तू छोड़ फिकर बुद्धपुरुषों की । मैं किसी परिभाषा से बंधा नहीं । यही उचित मालूम होता है ।
और बात ठीक थी । यशोधरा क्षमा न कर पाती बुद्ध को अगर आनंद मौजूद रहता । जब बुद्ध गए, यशोधरा टूट पड़ी । रोयी, चीखी, चिल्लाई, नाराज हुई । उसने कहा कि तुम मुझे छोड़ कर भाग गए । तुमने इतना भी भरोसा न किया कि मुझे जगा कर पूछ लेते? क्या तुम सोचते हो, मैं मना करती? तुमने इतना भी मेरे प्रेम का भरोसा न किया, इतना मेरे प्रेम का समादर न किया । तुम पूछ लेते कि मैं जाता हूं । मैं तुम्हें जाने देती लेकिन तुम पूछ तो लेते । तुम जगा कर कह तो देते । मैं अंतिम क्षण तुम्हारे पैर तो छू लेती । तुमने इतना भी मुझे मौका न दिया? तुमने इतना भी भरोसा न किया? मैं क्षत्राणी हूं तुम अगर कहते कि तुम्हें अपनी गर्दन भी काटनी है तो मैं तुम्हारे पैर छूकर तुमसे कहती कि ठीक है, तुम मालिक हो । तुम मेरे स्वामी हो । मैं तुम्हारी मालिक नहीं हूं । तुम्हें जो ठीक लगे, करो । लेकिन तुम भाग गए चोर की तरह, वह मन में कसती है बात । कांटे की तरह सलती है बात ।
वह खूब नाराज हुई । वह खूब चिल्लाई । वह खूब रोई । इस सब उधेड़बुन में उसे खयाल ही न रहा कि बुद्ध चुपचाप खड़े हैं, एक शब्द भी नहीं बोले हैं । तब उसने अपनी आंखों से आंसू पोंछे और बुद्ध से कहा, आप चुप हैं, बोलते नहीं?
बुद्ध ने कहा, मैं क्या बोलूं? क्योंकि जो गया था वह आया नहीं । जिससे तू लड़ रही है वह अब है नहीं । और जो मैं आया हूं उससे तू बिलकुल अपरिचित है । तू मेरी तरफ देख पागल! जो गया था वह मैं नहीं हूं । देह वैसी लगती होगी तुझे, लेकिन सब बदल गया । आमूल बदल गया हूं । जड़-मूल से बदल गया हूं । यह कोई और ही आया है । यह एक दूसरी ही ज्योति है । मैं तो मिट गया, नया होकर आया हूं । तू मेरी तरफ देख । अब कब तक गुजरे को लेकर बैठी रहेगी? जो हुआ, हुआ । उठ । जो मुझे हुआ है वह तुझे देने आया हूं । मैंने परम आनंद पाया है । तू भी उसकी भागीदार बन । और यशोधरा संन्यस्त हुई ।
जब यशोधरा संन्यस्त हो गई तो यशोधरा से बुद्ध ने कहा, एक बात तू आनंद को समझा दे । वह चिंतित है । अगर मैं आनंद को लेकर आया होता तो तू खुल पाती? वह कहती, कभी नहीं खुल पाती । मैं तुम्हें फिर कभी क्षमा न कर पाती । एक तो चोर की तरह भाग कर गए और फिर आए तो भीड़- भाड़ लेकर आए ताकि मैं कुछ कह न सकूं । आनंद की मौजूदगी में मैं चुपचाप रह जाती । मैंने अपने हृदय के छाले तुम्हें न दिखाए होते । बात खतम हो गई थी । तुमने फिर मेरा भरोसा नहीं किया । तुम फिर किसी को लेकर आ गए आड की तरह, बीच में पर्दे की तरह ।
बुद्धपुरुष की कोई परिभाषा नहीं ।
एक सम्राट अपने बेटे से नाराज हो गया तो उसे निकाल दिया, राज्य के बाहर । राजा का बेटा था, कुछ और करना जानता भी न था । मजदूरी कर न सकता था । कभी सीखी नहीं कोई बात । कोई कला-कौशल न आता था । तो जब कभी राजा हट जाए राज्य से, तो भिखारी होने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह जाता । तो यह कुछ आश्चर्यजनक नहीं कि महावीर और बुद्ध दोनों राजपुत्र थे और दोनों ने जब राज्य छोड़ा, तो दोनों भीख मांगने लगे । यह कुछ आश्चर्य की बात नहीं । राजपुत्र और कुछ जानता नहीं । या तो वह सम्राट हो सकता है, और या भिखारी हो सकता है । एक अति से दूसरी अति पर ही जा सकता है । बीच में कोई जगह नहीं । वह राजपुत्र भीख मांगने लगा किसी दूर की राजधानी में ।
वर्षों बीत गये । भूल ही गया यह बात धीरे-धीरे । रोज-रोज भीख मांगो तो कहां, कैसे याद रहे कि तुम सम्राट के बेटे हो! कितनी दूर तक इसे याद रखोगे! रोज-रोज भीख मांगना, भीख का मिलना मुश्किल है । कपड़े उसके जराजीर्ण हो गये, पैर लहूलुहान हो गये, शरीर काला हो गया, अपना ही चेहरा दर्पण में देखे तो पहचान न आये, भूल ही गया, फुर्सत कहां रही? याद करने की सुविधा कहां रही? भीख मांगने से समय कहां कि याद करे, बैठे सोचे कि राजमहल...और फिर वह याद पीड़ादायी भी हो गयी । और उस याद से तो घाव को ही छेड़ना है । सार भी क्या है? उससे कुछ सुख तो मिलता नहीं, दुख ही मिलता है । कांटे चुभाने से बार-बार प्रयोजन क्या है! तो धीरे-धीरे हम उन बातों को भूल जाते हैं, जिनसे दुख मिलता है । वह भूल गया ।
उसका पिता बूढ़ा हुआ । एक ही बेटा था । पछताने लगा बाप । अब मौत करीब आती है, अब कौन मालिक होगा इस साम्राज्य का? बुरा-भला जैसा था, उसने अपने वजीर भेजे कि उसे खोज लाओ । जिस दिन वजीर उस गांव में पहुंचे जहां वह भिखमंगा भीख मांग रहा था, एक छोटे-से होटल के सामने जहां जुआरी ताश खेल रहे थे वह भीख मांग रहा था, एक टूटे-से ठीकरे में ।
राजमहल से आया रथ रुका । वजीर नीचे उतरा । सूरज की किरणों में चमकता हुआ स्वर्ण-रथ! यह वर्षों का भिखमंगापन जैसे एक क्षण में खो गया । वजीर उतरा और उसके पैरों पर गिर गया, और कहा कि आप चलें, पिता ने याद किया है । अभी उस भिक्षापात्र में जो कुछ थोड़े-से पैसे पड़े थे--एक-एक पैसे को मांग रहा था, उसने भिक्षापात्र उसी समय नीचे गिरा दिया । उसकी आवाज बदल गयी । उसने कहा कि जाओ, मेरे लिए ठीक वस्त्रों का इंतजाम करो । जाओ, मेरे लिए ठीक स्नानगृह का इंतजाम करो । अभी मांगता था भीख, तो आवाज में बड़ी दयनीयता थी । उस आवाज और इस आवाज में कोई हिसाब ही न था लगाना । कोई पहचान ही न सकता यह उसी भिखारी की आवाज है । और जब वह बैठ गया रथ पर, तो उसकी आंखों की चमक...एक क्षण में सारा भिखमंगापन खो गया ।
तुम्हें याद भी आ जाए तुम्हारी महिमा, तुम्हारे स्वरूप की थोड़ी-सी झलक भी, स्वप्न ही सही--अंधेरी से अंधेरी रात में भी तुम्हें सुबह का स्वप्न भी आ जाए--तो रात टूटने लगी ।
असली सवाल प्रश्नों का नहीं है, असली सवाल तुम्हारी चित्त दशा का है। एक खास चित्त दशा में खास तरह के प्रश्न उठते हैं। उसी चित्त दशा को बनाये रखे अगर तुम प्रश्नों को हल करना चाहो, हल नहीं हो सकते। अकसर लोग यही कर रहे हैं। यह असंभव है। चित्त का तो कुछ रूपांतरण नहीं करते। चित्त तो वही का वही रहता है। प्रश्न पूछते हैं, एक उत्तर मिलता है। तुम्हारा चित्त वही का वही, उस उत्तर में से दस प्रश्न खड़े हो जाते हैं। फिर दस उत्तर ले आओ, हजार प्रश्न खड़े हो जाएंगे।
एक स्कूल में ऐसा हुआ। एक छोटा बच्चा भाग-भागकर सिनेमा पहुंच जाता था। शिक्षक परेशान था। कुछ भी पूछो वह किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा हो जाता था। एक दिन उसने यह सोचकर कि चलो कुछ ऐसा पूछें जिसका यह उत्तर दे सके, तो अंग्रेजी के शब्द पूछे कि इनका अर्थ क्या है? वह खड़ा रह गया हक्का-बक्का! वह उनके भी उत्तर न दे सका। शिक्षक ने उसकी सहायता के लिए उसके पड़ोसी विद्यार्थी से पूछा -- 'ड्रीम' का क्या अर्थ है? उसने कहा, स्वप्न! दूसरे से पूछा -- 'गर्ल' का क्या अर्थ है? उसने कहा, लड़की। अब तो बात साफ थी। उसने इस लड़के से पूछा -- 'ड्रीमगर्ल' का क्या अर्थ है? उस लड़के ने कहा, 'हेमामालिनी।'
दुनिया में दो हैं यात्राएं--प्रेय और श्रेय। साधारणतः जो अज्ञान में डूबा है, वह प्रेय में अनुरक्त होता है। वह कहता है, जो प्रिय है, वही मैं करूंगा। जिसको ज्ञान की पहली किरण उतरने लगी, वह कहता है, जो श्रेय है वही करूंगा। क्या फर्क है? प्रेय तो होता है मन का विषय और श्रेय है चैतन्य का विषय। जो ठीक है, वही करूंगा। जो सत्य है, वही करूंगा। जो शुभ है, वही करूंगा। श्रेयस ही मेरा जीवन होगा। यही साधुता का लक्षण है।
महावीर ने कहा है, जो प्रारंभ में मीठा हो, जरूरी नहीं कि अंत में भी मीठा हो। और जो प्रारंभ में कड़वा हो, जरूरी नहीं कि अंत में भी कड़वा हो। बहुत-सी औषधियां कड़वी होती हैं लेकिन स्वास्थ्य लाती हैं। और बहुत-सी मिठाइयां मीठी होती हैं और सिर्फ रुग्ण करती हैं। इसलिए चुनाव श्रेय का करना। विवेक से करना, बोध से करना। मन की मानकर मत करना। मन उलझाता है।
जिससे श्रेय सधे, वही ज्ञान है। और जिससे मैत्री बढ़े, प्रेम बढ़े, वही ज्ञान है। निश्चित ही पंडित का ज्ञान प्रेम को बढ़ाता नहीं। मुल्ला-मौलवी का ज्ञान प्रेम को बढ़ाता नहीं। घटाता है। हिंदू मुसलमान से घृणा करता है, मुसलमान हिंदू से घृणा करता है। जैन हिंदुओं से, हिंदू जैनों से। यह ज्ञान नहीं हो सकता। यह शास्त्र होगा। शास्त्र लड़वाता है। ज्ञान जुड़वाता है। ज्ञान है परम योग। शास्त्र में संघर्ष है।
बड़े वृक्ष गिरते क्यों हैं? तूफान तो नहीं गिराता। क्योंकि तूफान गिराता होता तो छोटे तो कभी के बह गये होते। नहीं, बड़े वृक्ष तूफान के खिलाफ अकड़कर खड़े रहते हैं, इसलिए गिर जाते हैं। छोटे वृक्ष तूफान के साथ हो लेते हैं, हवा पूरब जाती है तो पूरब झुक जाते हैं, हवा पश्चिम जाती है तो पश्चिम झुक जाते हैं। छोटे वृक्ष कहते हैं, हम तुम्हारे साथ हैं। बड़े वृक्ष कहते हैं, हम तुम्हारे विरोध में हैं। उसी विरोध में गिर जाते हैं।
ध्यान का अर्थ है, मन की सफाई । ध्यान का अर्थ है, अ-मन की तरफ यात्रा ।
विचार में आप जो भी देखते हैं, उसे आप अनुकूल कर लेते हैं । और आप अगर गलत हैं, तो सब गलत हो जाता है । ध्यान में आप वही देखते हैं, जैसा है । और आपको उसके अनुकूल होना पड़ता है । विचार में सब कुछ आपके अनुकूल हो जाता है । ध्यान में आपको अस्तित्व के अनुकूल होना पड़ता है । इसलिए ध्यान में रूपांतरण हो जाता है ।
सुकरात कहता था, जान लेना ही ठीक हो जाना है। उससे लोग पूछते थे कि हम भलीभांति जानते हैं कि चोरी बुरी है, लेकिन चोरी छूटती नहीं! तो सुकरात कहता, तुम जानते ही नहीं कि चोरी क्या है। अगर तुम जान लो कि चोरी क्या है, तो छोड़ने के लिए कुछ भी न करना होगा।
जैसे जमीन चीजों को अपनी तरफ खींचती है, ऐसे ही परमात्मा भी चीजों को अपनी तरफ खींचता है।
एक अमेरिकी विचारक एलन वाट एक झेन फकीर के पास साधना कर रहा था। उस झेन फकीर ने एलन वाट को पूछा कि तुम क्या खोज रहे हो? ध्यान तुम कर रहे हो किस लिए? तो एलन वाट ने कहा कि परमात्मा की तलाश के लिए। तो वह झेन फकीर हंसने लगा। उसने कहा कि तुम बड़े अजीब काम में लगे हो। यह काम पूरा हो नहीं पाएगा।
एलन वाट हैरान हुआ। उसने कहा कि हम तो सोचते थे कि पूरब के लोग मानते हैं कि यही काम करने योग्य है। और तुम यह क्या कह रहे हो! उसने कहा कि यह नहीं होगा; या तो तुम न बचोगे या परमात्मा न बचेगा। मगर मिलन नहीं हो सकता। या तो तुम खो जाओगे, तो परमात्मा बचेगा, या परमात्मा खो जाएगा, तो तुम बचोगे।
जो उसे जानते हैं, वे जानने में ही शून्य हो जाते हैं। जितना जानते हैं, उतने ही शून्य हो जाते हैं।
एक शिकारी ने एक सिंह को मारा, एक सिंहनी को मारा; जोड़े को मार डाला। तब उसे पता चला कि जोड़े के बच्चे भी थे। तो सिंह शावकों को, दो बच्चों को वह घर ले आया। एक तो उनमें से मर गया, एक बड़ा हो गया। उसे उसने शाक-सब्जी-दूध पर ही पाला।
वह सिंह शावक बड़ा हुआ, शाकाहारी। वह उसके पास बैठा रहता, जैसे बिल्ली बैठती या कुत्ता बैठता। बच्चे उसके साथ खेलते, वह बड़ा होता गया। नए लोग तो भयभीत हो जाते, लेकिन पूरा गांव जानता था, वह गांव में घूम आता। लोग उसे मिठाई खिलाते और उसको प्रेम करते।
एक दिन शिकारी बैठा था, वह भी बैठा था, उसका सिंह भी उसके पास बैठा था। शिकारी के पैर में चोट लग गई थी, और थोड़ा-सा खून बह रहा था। और उस सिंह ने उसे चाट लिया। बस, फिर खतरा हो गया। स्वाद लग गया। खून का स्वाद। उसी वक्त शिकारी खतरे में पड़ गया। क्योंकि उसने सिंह की गर्जना कर दी, वह शाकाहारी न रहा।
शिकारी को अपने प्राण बचाने मुश्किल हो गए, क्योंकि सिंह ने झपट्टा मार दिया। कभी उसने किसी पर झपट्टा न मारा था। उसे पता ही न था कि खून का स्वाद क्या है। अब स्वाद लग गया, तो उसके रोएं—रोएं में सोई हुई प्रकृति जाग गई।
उसके कण-कण में सिंह सोया था। सिंह शाकाहारी हो गया था। उसको पता ही नहीं था, इसलिए कोई उपाय ही न था। वह भूल ही चुका होगा कि सिंह है। अचानक गर्जना हो गई। सारा घर खतरे में पड़ गया। सारा गांव खतरे में पड़ गया।
जब स्वाद लग जाए, तब क्रांति घट जाती है।
बुद्ध से किसी ने पूछा, तुम कौन हो? क्योंकि इतने सुंदर थे! देह तो उनकी सुंदर थी ही, लेकिन ध्यान ने और अमृत की वर्षा कर दी थी। एक अपूर्व सौंदर्य उन्हें घेरे था। एक अपरिचित आदमी ने उन्हें देखा और पूछा: तुम कौन हो? क्या स्वर्ग से उतरे कोई देवता? बुद्ध ने कहा -- नहीं। तो क्या इंद्र के दरबार से उतरे हुए गंधर्व? बुद्ध ने कहा -- नहीं। तो क्या कोई यक्ष? बुद्ध ने कहा -- नहीं। ऐसे वह आदमी पूछता गया, पूछता गया -- क्या कोई चक्रवर्ती सम्राट? बुद्ध ने कहा -- नहीं। तो उस आदमी ने पूछा -- कम से कम आदमी तो हो! बुद्ध ने कहा -- नहीं। तो क्या पशु पक्षी हो? बुद्ध ने कहा -- नहीं। तो उसने फिर पूछा थककर कि फिर तुम हो कौन, तुम्ही कहो? तो बुद्ध ने कहा -- मैं सिर्फ एक जागरण हूं। मैं बस जागा हुआ, एक साक्षी मात्र। वे तो सब नींद की दशाएं थीं। कोई पक्षी की तरह सोया है, कोई पशु की तरह सोया है। कोई मनुष्य की तरह सोया है, कोई देवता की तरह सोया है। वे तो सब सुषुप्ति की दशाएं थीं। कोई स्वप्न देख रहा है गंधर्व होने का, कोई यक्ष होने का, कोई चक्रवर्ती होने का। वे सब तो स्वप्न की दशाएं थीं। वे तो विचार के ही साथ तादात्म्य की दशाएं थीं। मैं सिर्फ जाग गया हूं। मैं इतना ही कह सकता हूं कि मैं जागा हुआ हूं। मैं सब जागकर देख रहा हूं। मैं जागरण हूं -- मात्र जागरण!
The first to apologize is the bravest.
The first to forgive is the strongest
The first to forget is the happiest
पश्चाताप
कथा :
बुद्ध के ऊपर एक आदमी आकर थूक गया । तो उन्होंने अपनी चादर से अपना मुंह पोंछ लिया । और मुंह पोंछ कर उस आदमी से कहा, और कुछ कहना है भाई? जैसे उसने कुछ कहा हो । उसने थूका है । आनंद तो बड़ा नाराज हो गया । आनंद है बुद्ध का शिष्य । उसने तो कहा कि प्रभु मुझे आज्ञा दें तो इसकी गर्दन तोड़ दूं । पुराना क्षत्रिय! संन्यासी हुए भी आज उसकी बीस वर्ष हो गए लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है, गांठें आसानी से थोड़े ही छूटती हैं । उसकी भुजाएं फड़क उठीं । उसने कहा कि हद हो गई ।
यह आदमी आपके ऊपर थूके और हम बैठे देख रहे हैं । आप जरा आज्ञा दे दें । आपका संकोच हो रहा है, इसकी गर्दन तोड़ दूं ।
बुद्ध ने कहा, इस आदमी ने थूका उससे मुझे हैरानी नहीं होती, लेकिन तेरी बात से मुझे बड़ी हैरानी होती है । आनंद, बीस साल तुझे हुए हो गए मेरे पास, तेरी पुरानी आदतें न गईं? और मैं यह कह रहा हूं कि इस आदमी ने कुछ कहना चाहा है । कई बार ऐसा हो जाता है कि कहने को शब्द नहीं मिलते तो इसने थूक कर कहा है । यह कुछ कहना चाहता था । भाषा में बहुत कुशल न होगा, गाली-गलौज देना ठीक से आता न होगा या गाली जो आती होंगी उनसे काम न चलता होगा । इसकी मजबूरी तो समझ । यह कुछ कहना चाहता था ।
कई बार ऐसा होता है, तुम किसी को गले लगाते हो, क्योंकि तुम कुछ कहना चाहते थे, जो शब्दों में नहीं आता था । तुम किसी का हाथ लेकर दबाते हो; तुम कुछ कहना चाहते थे जो शब्दों में नहीं आता, हाथ दबा कर कहते हो । तुम किसी के गले में फूल की माला डाल देते हो; कुछ कहना चाहते थे, नहीं कहा जा पाता तो फूल से कहते हो । कभी कुछ कहना चाहते हो, आंख आंसुओ से नम हो जाती है । कहना चाहते थे, नहीं कह पाए, आंख आंसुओ से कहती है ।
यह आदमी कुछ कहना चाहता था । कोई कांटा इसके भीतर गड़ रहा है । थूक कर इसने फेंक लिया, चलो यह निर्भार हुआ । वह आदमी खड़ा ये सब बातें सुन रहा है । वह तो बड़ा मुश्किल में पड़ गया । वह तो वहां से भागा घर । वह तो चादर ओढ़ कर सो रहा । उसको तो भारी पश्चात्ताप होने लगा, वह तो रोने लगा । वह दूसरे दिन क्षमा मांगने आया । वह बुद्ध के चरणों पर गिर पड़ा । उसने कहा, मुझे क्षमा कर दें ।
बुद्ध ने कहा, पागल! क्षमा कौन करे? जिसको तूने गाली दी थी वह अब है कहां? चौबीस घंटे में गंगा बहुत बह गई । जिस गंगा को तू गाली दे गया था वह गंगा अब है कहां? तूने मुझे गाली दी थी, चौबीस घंटे हो गए । बात आई-गई हो गई । पानी पर खिंची लकीरें टिकती तो नहीं । अब तू क्षमा मांगने किससे आया है? अब मैं तुझे क्षमा कैसे करूं? मैंने कोई गांठ नहीं बांधी । बांधता तो खोलता । अब मैं क्या खोलूं? मैं तुझसे इतना ही कह सकता हूं तू भी अब यह गांठ मत बांध । बात आई-गई हो गई । आया हवा का झोंका, चला गया । अब तू पश्चात्ताप भी मत कर ।
यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है बुद्ध ने कही : अब तू पश्चात्ताप भी मत कर ।
निष्पाप
कथा :
महाराष्ट्र के एक अपूर्व संत हुए एकनाथ । एक आदमी उनके पास बार-बार आता था । खोजी था । कहता कि प्रभु, कुछ ज्ञान दें । हजार बार उसे समझा चुके थे मगर वह कुछ उसकी समझ में न आता था । वह फिर आ जाता था कि प्रभु, कुछ ज्ञान दें । जीवन निष्पाप कैसे हो? एक दिन सुबह-सुबह आया, एकनाथ से कहने लगा, आप कुछ तो समझाएं कि जीवन निष्पाप कैसे हो? उन्होंने कहा, मैं तुझे रोज समझाता, तेरी समझ में नहीं आता तो मैं क्या करूं? वह आदमी कहने लगा कि आप कैसे निष्पाप हुए यह बता दो, तो उसी रास्ते मैं भी चलूं ।
एकनाथ ने कहा कि ठहर, अचानक मेरी नजर तेरे हाथ पर पड़ गई, तेरी उम्र की रेखा कट गई है । यह बात तो पीछे हो लेगी । उसकी तो कुछ जल्दी भी नहीं है । यह तो तू जनम भर से कर रहा है । मगर यह मैं तुझे बता दूं कहीं भूल न जाऊं, सात दिन में तू मर जाएगा । तेरी उम्र की रेखा कट गई है ।
अब जब एकनाथ किसी को कहें कि सात दिन में तू मर जाएगा तो अविश्वास करना तो मुश्किल है । और सब बातों पर चाहे अविश्वास कर लिया हो, मगर इस पर तो कौन अविश्वास करे? एकनाथ जैसा निस्पृह व्यक्ति कहेगा तो ठीक ही कहेगा । वह तो आदमी घबड़ा गया । उसके तो हाथ-पैर कैप गए । वह तो उठ कर खड़ा हो गया । एकनाथ ने कहा, अरे कहां चले? बैठो । तुम्हारा प्रश्न तो अभी उत्तर दिया ही नहीं कि मैं कैसे निष्पाप हुआ । उसने कहा, महाराज, अब तुम समझो निष्पाप कैसे हुए । इधर मौत आ रही है, सत्संग की किसको पड़ी है? अब कभी फुरसत मिली तो आएंगे । एकनाथ ने हाथ पकड़ा कि भागे कहां जाते हो? वह बोला कि छोड़ो भी जी । इधर बाल- बच्चों को देखूं इंतजाम करूं । सात दिन! कहते हो कि सात दिन में मर जाऊंगा ।
वह तो भागा । अभी आया था तो अकड़ से भरा था । उसके पैर की चाल देखने जैसी थी । अब गया तो कंपने लगा । उन्हीं सीढ़ियों से उतरा मंदिर की लेकिन सहारा लेकर उतरा । घर गया तो बिस्तर से लग गया । घर के लोगों ने पूछा, हुआ क्या?समझाया-बुझाया कि ऐसे कहीं कोई मौत आती है? लेकिन उसने कहा कि वह पक्का है । मौत आ रही है । ऐसा इंतजाम कर लो, ऐसा इंतजाम कर लो, सब करके वह अपने बिस्तर पर पड़ा रहा । खाना-पीना छूट गया । मरते आदमी को क्या खाना-पीना! तीन दिन में तो वह बिलकुल निढाल होकर पड़ गया । मौत निश्चित आने लगी । घर भर के लोग भी उदास होकर बैठे उसकी खाट के पास ।
सातवें दिन जब सूरज ढलने के करीब था और वह बिलकुल मौत की प्रतीक्षा कर रहा था, मौत तो नहीं, एकनाथ आ पहुंचे अपना । दरवाजा खटखटाया । एकनाथ को देख कर नमस्कार करने तक की आवाज उससे नहीं निकल सकी । हाथ नहीं जोड़ सका, इतना कमजोर हो गया । एकनाथ ने कहा, अरे भाई इतनी क्या बात है? बड़ी मुश्किल से उसने कहा कि अब और क्या? मौत आ रही है । एकनाथ ने कहा, एक प्रश्न पूछने आया हूं । सात दिन में कुछ पाप किया? पाप करने का कोई विचार आया? उसने कहा, हद हो गई मजाक की । मौत सामने खड़ी हो तो पाप करने की सुविधा कहा? मौत सामने खड़ी हो तो पाप का खयाल कैसे उठे?
एकनाथ ने कहा, उठ, तेरी मौत अभी आई नहीं । रेखा तेरी काफी लंबी है । यह तो मैंने तेरे को सिर्फ तेरा उत्तर.. .तेरे प्रश्न का जवाब दिया है । और तो तू समझता ही नहीं था । तेरे तो सिर पर खूब जोर से डंडा मारे तो ही शायद तेरी समझ आए । अब तेरी समझ में आया कि हम निष्पाप कैसे हैं? मौत सामने खड़ी है ।
जहां जीवन क्षण-क्षण बीता जाता हो, जहां समय चुकता जाता हो, वहां कैसा पाप? जहां मौत सब छीन लेगी वहां कैसा इकट्ठा करना? जहां मौत सब पोंछ देगी वहां कैसे सपने संजोने? जहां मौत आकर सब नष्ट कर देगी वहां क्या बनाना?
प्रसिद्धि
कथा :
रॉबर्ट रिप्ले अमरीका का एक बहुत प्रसिद्ध आदमी हुआ । उसको प्रसिद्ध होना था तो उसने आधे सिर के बाल घोट डाले-आधे सिर के । तीन दिन के भीतर पूरे अमरीका में उसका नाम हो गया । क्योंकि सारे अखबारों में फोटो छप गया, अखबार के लोग आने लगे उससे पूछने कि यह आपने क्यों किया? क्या बात है? इसके पीछे राज क्या है? उसने एक सर्कस से हाथी खरीद लिया और हाथी पर बैठकर न्यूयॉर्क में घूम गया-आधा सिर घुटा और हाथी पर बैठा । और हाथी पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है -रॉबर्ट रिप्ले । बच्चा-बच्चा जान गया, घर-घर से लोग निकलकर आ गये देखने कि मामला क्या है । और उससे पूछा, तो उसने कहा, कुछ नहीं, मैं प्रसिद्ध होना चाहता था । और वह प्रसिद्ध हो गया । अब तुम देखते हो, मुझे भी उसका नाम मालूम है । नहीं तो रॉबर्ट रिप्ले का नाम मालूम होने का मुझे कोई कारण नहीं है । उसने कुछ और किया ही नहीं सिवाय इसके ।
मगर फिर उसने ऐसी कई बातें कीं, जब उसको एक दफा तरकीब हाथ लग गयी । तो कई बातें कीं । उसने एक बड़ा दर्पण अपने सामने बांध लिया और उल्टा चलकर पूरे अमरीका की यात्रा की । दर्पण सामने, दर्पण में देखे पीछे का रास्ता और चले उल्टा । वह बड़ा प्रसिद्ध हो गया । जब वह मरने के करीब था, तो उसने अपने प्रेस एजेंट को कहा-अब तो उसकी बडी ख्याति हो गयी थी, उसके पास प्रेस एजेंट और सब व्यवस्था थी और कुल काम उसका इसी तरह का था, कुछ उल्टा-सीधा करना-उसने अपने प्रेस एजेंट को कहा कि खबर कर दो, रिप्ले मर गया । पर उसने कहा कि अभी तुम जिंदा हो । उसने कहा मैं अपनी अखबार में खबर पढ़ना चाहता हूं मरने की । मर तो मैं जाऊंगा, डॉक्टर कहते हैं चौबीस घंटे से ज्यादा जी नहीं सकता । तो मैं आखिरी काम यह करना चाहता हूं कि मैं देखना चाहता हूं, अखबार मेरे मरने के बाद मेरे संबंध में क्या लिखेंगे । प्रशंसा करेंगे, निंदा करेंगे, एडीटोरियल लिखे जाएंगे कि नहीं, कौन क्या कहेगा? राजनेता बोलते कि नहीं, क्या होता है? वह मैं देखना चाहता हू । और मैं आखिरी खबर भी दुनिया में पैदा करना चाहता हूं वह मैं तुम्हें पीछे बताऊंगा, तुम अभी तो सूचना कर दो ।
अखबारों को खबर दे दी गयी, सब अखबार छप गये, फोटो छप गये कि रिप्ले मर गया । और शाम को उसने अखबार पढ़े, अखबार बढ़ते हुए फोटे उतरवायी-अपने मरने की खबर पढ़ते हुए रॉबर्ट रिप्ले । और उसने दूसरी खबर दी कि अब दूसरी खबर दे दो कि रॉबर्ट रिप्ले मनुष्य जाति का पहला आदमी जिसने अपने मरने की खबर खुद पढ़ी । पड़ेगा भी कोई कैसे! तब मरा । यह आखिरी खबर दुनिया में छपवाकर मरा ।
लोग ढंग-ढंग की व्यवस्थाएं जुटाते हैं, कैसे ध्यान आकर्षित हो जाए ।
जब बर्नार्ड शॉ को नोबल प्राइज मिली तो उसने इनकार कर दिया । पहले तो नोबल प्राइज मिली, इसकी खबर छपी, सारे दुनिया के अखबारों में । फिर उसने इनकार कर दिया, इसकी खबर छपी । वह दुनिया का पहला आदमी था जिसने नोबल प्राइज इनकार किया । और बड़ी खबर छपी । कि ऐसा तो कभी हुआ नहीं । कोई नोबल प्राइज इनकार करता है! और उसने जो वक्तव्य दिया, उसमें कहा कि अब मैं का हो गया, जब मैं जवान था तब मिलती तो मुझे कुछ सुख होता । अब तो किन्हीं बच्चों को दो! अब तो मैं उस जगह के पार आ गया, जहां नोबल प्राइज का कोई मतलब नहीं होता । यह शान बतायी उसने! यह छपी । यह तो सम्राट का अपमान है, स्वीडन के सम्राट का । उसकी तरफ से सम्मान मिलता है नोबल प्राइज का, कभी किसी ने इनकार किया नहीं था, यह पहला ही उपद्रव खड़ा हुआ । सारी दुनिया से दबाव डाला गया, इंग्लैंड के राजा ने दबाव डाला और बड़े -बड़े राजनेताओं ने दबाव डाला कि स्वीकार करो, यह तो अपमान है । चाहे स्वीकार करके फिर तुम दान कर देना यह धनराशि ।
तो इस बड़े दबाव में, बड़ी मजबूरी में उसने स्वीकार किया, अब अखबारों में खबर छपी कि वह राजी हो गया, उसने स्वीकार कर लिया । स्वीकार करके उसने तत्क्षण-एक हाथ से दस्तखत किया स्वीकार का और दूसरे हाथ से दान कर दिया, पूरी धनराशि, कोई दस लाख रुपये की धनराशि दान कर दी । वह अखबारों में खबर छपी कि, बड़ा दानी । और आखिरी खबर यह छपी कि वह दान जिसको किया है, वह संस्था कुछ और नहीं उसकी ही संस्था है, वह खुद ही एक मेंबर हैं उसके । ऐसे इस हाथ से देकर अपने को ही ले ली । और जब उससे पूछा गया, यह सब जाल क्यों किया? तो उसने कहा कि नोबल प्राइज मिलती, एक दफे छपकर बात खतम हो जाती, मैंने सात दफे छपवा ली । सात दिन तक दुनिया भर की आंखें अटकाए रखा ।
आदमी उत्सुक है कि कोई उसकी ओर ध्यान दे। कैसा भी पागलपन करने को तैयार है ।
जीसस की एक बहुत अदभुत मूर्ति दो वर्ष पहले रोम में तोड़ी गई। माइकल एंजलो की मूर्ति थी बनाई हुई। जीसस सूली से उतारे गए हैं और मरियम की गोद में उनका सिर है, मां की गोद में सिर है। कहते हैं, इससे ज्यादा सुंदर मूर्ति पृथ्वी पर दूसरी नहीं थी। वर्षों अथक श्रम करके माइकल एंजलो ने बनाई थी। इसका मूल्य, इसकी कीमत जानी नहीं जा सकती। इतनी जीवंत कोई मूर्ति न थी। संगमरमर पर इससे ज्यादा गहरा कभी कोई प्रयोग न हुआ था। और एक आदमी ने जाकर उसको हथौड़े से तोड़ दी। पकड़ा गया, पूछा गया, तो उसने कहा कि यह मुझे सदा से खलती थी। मैं भी चाहता हूं कि मेरा नाम भी इतिहास में अमर हो जाए। माइकल एंजलो ने बनाई, मैने तोड़ी।
कुछ लोग हैं, जो अपनी क्षमता का उपयोग कुछ तोड़ने के लिए करते हैं। कोई है जो मूर्ति बनाता है, और कोई है जो जाकर मूर्ति तोड़ आता है।
अधिक लोग मरते समय मौत के कारण नहीं रोते। रोते इसलिए हैं इसलिए कि जीवन व्यर्थ गया और मौत आ गई।
संतोष
कथा :
एक बौद्ध भिक्षु रोज भिक्षा मांगने आता वैशाली में, राजधानी में । एक घर जो बड़े अभिजात्य का घर था, बड़े कुलीन परिवार का घर था, उसके द्वार पर भिक्षा मांगने गया । द्वार पर दस्तक दी, अति सुंदर हीरे-जवाहरातों से लदी एक स्त्री ने द्वार खोला । वह परिवार बुद्ध का विरोधी था । तो वह स्त्री नाराज हो गयी, उसने कहा, दुबारा कभी यहां मत आना । भिक्षु ने कहा, तो भिक्षापात्र खाली जाए । तो वह क्रोध में आ गयी, तो उसने उठाकर एक कचरे की टोकरी उसके भिक्षापात्र में और भिक्षु के ऊपर फेंक दी । सारा कचरा उसके ऊपर गिर गया, भिक्षापात्र कचरे से भर गया । जैसा बुद्ध की आज्ञा थी कि जब कोई तुम्हें कुछ भी भेंट दे तो धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना । तो उसने झुककर धन्यवाद दिया ।
राहगीर एक खडा यह सब देख रहा था । उसने भिक्षु से पूछा कि यह क्या पागलपन है? तुम किस बात के लिए सिर झुकाए, और किस बात के लिए धन्यवाद दिया? तो भिक्षु ने कहा, उसने कुछ तो दिया । कम-से-कम देना तो आया । कचरा सही, मगर उठाना कचरे की टोकरी को, डालना, इतना श्रम किया । धन्यवाद! कुछ तो दिया । अपमान सही, मगर देने की कृपा तो की ।
यथास्थितिस्वस्थ: ।
जो हो, उसमें स्वस्थ, प्रसन्न ।
एक गरीब औरत, उसका छोटा बच्चा, सर्दी के दिन और उसके पास कपड़े उढाने को नहीं तो उसने कुछ भी, लकड़ी के टुकडे, चिदिया, कागज, अखबार, इन सबका खूब पूर बना लिया और उसको उसमें ढांप देती थी । वह बेटा मस्त सो जाता । एक रात उस बेटे ने कहा, मां, जरा उन गरीबों की तो सोचो जिनके पास लकड़ी के ये टुकड़े, अखबार और ये चिदिया नहीं होंगी, वे बेचारे कैसे सोते होंगे! वह मजे से रात नींद लेता है । वह सोच रहा है यह बड़ी अमीरी है । जरा उनकी तो सोचो, वह कहने लगा, जिनके पास लड़की के टुकड़े और ये चीजें नहीं होंगी, वे कैसे सोते होंगे!
दुख इतना नहीं डांवाडोल करता जितना सुख कर जाता है । इसीलिए समस्त साधकों ने दुख को तो वरण कर लिया है, सुख को छोड़ दिया है । क्योंकि उन्होंने देखा कि दुख इतना दुखी नहीं करता । अंततः दुख सुख से आता है । तप का इतना ही अर्थ है, तपश्चर्या का इतना ही अर्थ है कि सुख में से तो कुछ तुम पा सकते हो, इसकी आशा ही मत रखना, हाँ, दुख में से कुछ पाया जा सकता है । दुख में से कुछ पाया जा सकता है, यही तप का अर्थ है । सुख में से कुछ भी नहीं पाया जा सकता, सुख बिलकुल बांझ है ।
परमज्ञान की अवस्था तो वही है जहां न सुख सुखी करता है, न दुख दुखी करता है । कोई चीज डुलाती नहीं, आदमी अपने स्वयं में थिर है ।
लाओत्से का एक शिष्य च्वांगत्से हुआ । च्वांगत्से को चीन के सम्राट ने निमंत्रण भेजा कि तुम आओ और मेरे बड़े वजीर बन जाओ । च्वांगत्से ने खबर भेजी, लेकिन मैं जितने सुख में हूं, उसके ऊपर कोई सुख नहीं । तो वजीर बना कर तुम मुझे नीचे ही उतार पाओगे । क्योंकि इसके आगे तो कोई आनंद है नहीं । अब तो कहीं भी बढ़ना पीछे हटना है । अब तो इंच भर सरकना, खोना है । क्योंकि जहां मैं हूं, उससे परम कोई आनंद नहीं है ।
आस्कर वाइल्ड -- जब मैं सारी दुनिया में भटका, तभी अपने देश को पहचान पाया। तब अपने गांव आया, तब मेरा गांव और ही हो गया। क्योंकि अब मैं और था, सारी दुनिया देखकर लौटा था। गांव के वृक्ष शानदार मालूम होने लगे, और गांव के पक्षी, पहली दफा मैंने उनके गीत सुने। क्योंकि दुनिया ने मेरी आंखें खोल दीं। अपने ही गांव में था, तो सोया-सोया था। पता ही न था।
सुख का स्रोत
कथा :
फकीर बायजीद को धर्म से बाहर निकाल दिया गया था, क्योंकि उसने एक कुफ्र की बात की । बैठा था एक वृक्ष के नीचे और कुछ लोग हज की यात्रा को जा रहे थे और उसने कहा कि पागलों, कहां जा रहे हो, हज यहां बैठा है? और उनमें से कुछ लोग रुक गये । और उन्होंने देखा बात तो सच थी । ऐसा सौंदर्य, ऐसा प्रसाद, ऐसा माधुर्य उन्होंने कभी देखा न था । वे ठगे खड़े रह गये । तो बायजीद ने कहा, अब खड़े क्या हो, परिक्रमा करो । तो उन्होंने उसकी परिक्रमा की । उसके हाथ ये, जैसा लोग काबा का पत्थर चूमते हैं ।
अब उसने कहा, अब घर लौट जाओ । और दुबारा अगर फिर हज करना हो, तो मेरे पास भी आने की जरूरत नहीं, अपनी ही परिक्रमा कर लेना । यह तो मैंने तुम्हें एक पाठ पढ़ाया । इस पाठ को मत पकड़ लेना जोर से, नहीं तो मैं मर जाऊंगा तो तुम इस झाडू के चक्कर लगाओगे ।
ऐसे ही तो लोग उपद्रव कर रहे हैं । अभी तक काबा के पत्थर का चक्कर लगाया जा रहा है । परिक्रमाएं कर रहे हैं । चले काशी, चले गिरनार, चले जेरूसलम । कहीं जाना है! सदा मन में एक भ्रांति है कि सुख कहीं और बरस रहा है, बस तुम्हें छोड्कर बरस रहा है ।
सूफी फकीर स्त्री हुई राबिया । वह एक सांझ अपने घर के सामने कुछ खोज रही थी, दो-चार लोग आते थे, उन्होंने पूछा, क्या खो गया? उसने कहा मेरी सुई गिर गयी । तो वे दो-चार भी उसको साथ देने लगे--बूढ़ी औरत है, आंखें भी कमजोर हैं! लेकिन फिर उनमें से किसी एक को होश आया कि सुई बड़ी छोटी चीज है, जब तक ठीक से पता न चले कहां गिरी, तो इतने बड़े रास्ते पर कहां खोजते रहेंगे? तो उसने पूछा कि मां, यह बता दे कि सुई गिरी कहां है? तो वहीं आसपास हम खोज लें, इतने बड़े रास्ते पर! उसने कहा बेटा! यह तो पूछो ही मत, सुई तो घर के भीतर गिरी है । वे चारों हाथ छोड़कर खड़े हो गये, उन्होंने कहा तू पागल हुई है! सुई घर के भीतर गिरी है, खुद भी पागल बनी, हमको भी पागल बनाया । जब सुई घर के भीतर गुमी है, तो भीतर ही खोज । उसने कहा, वह तो मुझे भी पता है । लेकिन भीतर अंधेरा है, बाहर रोशनी है--सूरज अभी ढला नहीं--अंधेरे में खोजूं भी कैसे? खोज तो रोशनी में ही हो सकती है ।
वे हंसने लगे । उन्होंने कहा कि मालूम होता है बुढ़ापे में तेरा सिर फिर गया है! सठिया गयी तू! अगर घर में रोशनी नहीं है, तो भी खोजना तो घर में ही पड़ेगा । तो रोशनी भीतर ले जा । दीया मांग ला उधार पड़ोसी से, अगर तेरे घर में दीया नहीं ।
अब हंसने की बारी उस बुढ़िया की थी । वह बड़ी महत्वपूर्ण सूफी फकीर औरत हुई । वह हंसने लगी । उसने कहा कि मैं तो सोचती थी कि तुम इतने समझदार नहीं हो जितनी समझदारी की बात कर रहे हो । मैं तो उसी तर्क का अनुसरण कर रही थी, जिसका तुम सब कर रहे हो । तुम सब भी बाहर खोज रहे हो, बिना बूझे कि खोया कहां? भीतर खोया है, खोज बाहर रहे हो । और कारण जो मैंने बताया, वही तुम्हारा है ।
आंखों की रोशनी बाहर पड़ती है, आंखें बाहर देखती हैं, बाहर सब साफ-सुथरा है, भीतर बड़ा गहन अंधकार है ।
सुनना
कथा :
जीसस के जीवन में उल्लेख है कि उनका एक भक्त लजारस मर गया । वह बाहर थे गांव के । लजारस की बहनों ने खबर भेजी कि लजारस मर गया, आप जल्दी आएं । वे आये तो भी चार दिन लग गये । तब तक तो लाश को संभालकर रखा उन्होंने- कब्र में रख दिया था । एक गुफा में छिपा दी थी लाश । जब जीसस आए तो वे दोनों बहनें Mery और Martha रोने लगीं और उन्होंने कहा कि अब तो क्या हो सकेगा! अब तो बदबू भी आने लगी । जीसस ने कहा, तुम फिकर छोड़ो । अगर मैं पुकारूंगा तो लजारस सुनेगा ।
किसी को भरोसा न था । पर भीड़ इकट्ठी हो गयी । जब वे गये उस गुफा के द्वार पर और उन्होंने जोर से आवाज दी कि लजारस बाहर आ! कहते हैं, लजारस अपनी अर्थी से उठा, चलकर बाहर आ गया । और जब बाहर आ गया तो लोग घबड़ा गये, लोग भागने लगे । जीसस ने कहा, भागो मत । मैंने तुमसे कहा था न, अगर मैं पुकारूंगा तो वह सुनेगा! क्योंकि वह मुझे सुन ही चुका है । और जब उसने जिंदा रहते हुए मेरी आवाज सुन ली, तो कोई कारण नहीं है कि मुर्दा रहते मेरी आवाज क्यों न सुनेगा! तुम न मुझे जिंदा रहकर सुने हो, न तुम मुझे मुर्दा रहकर सुन पाओगे -तुम जिंदा में भी नहीं सुन पाए तो तुम मुर्दा में कैसे सुनोगे?
ऐसी घटना घटी हो, न घटी हो, ये घटनाएं प्रतीक घटनाएं हैं । लेकिन बात तो सच है, गुरु जब पुकारता है शिष्य को कि लजारस उठ, बाहर आ, तो लजारस उठकर बाहर आ जाता है । श्रवणमात्रेण । फिर ना-नुच नहीं करता है । फिर यह नहीं कहता है कि अभी कैसे आऊं, अभी तो अंधेरा है, अभी तो रात बहुत है, अभी थोड़ी देर और सो लेने दें, कि मैं तो मरा पड़ा हूं -लजारस ने यह भी न कहा कि यह कोई वक्त की बात है, मैं इधर मरा पड़ा हूं, इधर कब्र में रखने की मेरी तैयारी चल रही है -जब लजारस बाहर आया तो उसके ऊपर कफन बंधा था-उसने यह भी न कहा कि अब कफन में बंधे से तो मत उठाओ, लोग क्या कहेंगे! कुछ तो औपचारिकता बरतो । नियम बिलकुल तो मत तोड़ो, मर्यादा तो रखो । मैं इधर मरा पड़ा हूं, अर्थी पर कसा पड़ा हूं, तुम बुलाते हो? नहीं, आ गया ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक नदी के किनारे से गुजर रहा था । सांझ घिरने लगी । सूरज ढल चुका है । और एक आदमी डूब रहा है; और वह आदमी चिल्लाया, सहायता करो, सहायता करो, मैं डूब रहा हूं! मुल्ला किनारे पर खड़ा है, वह बोला हद्द हो गयी; अरे, डूबने में किसी से क्या सहायता की जरूरत, डूब जाओ! इसमें सहायता की क्या जरूरत है!
तुम कुछ का कुछ सुन ले सकते हो । इससे सावधान रहना ।
एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन को लोगों ने देखा बीच बाजार में सिर के पीछे तकिया लगाये, दोनों हाथों से संभाले चला जा रहा है । धीरे-धीरे लोग इकट्ठे हो गये । भीड़ जमा हो गयी । फिर किसी ने कहा कि मुल्ला, माजरा क्या है? यह कर क्या रहे हो? इस तरह किसी को चलते नहीं देखा--तकिया सिर से लगाये, दोनों हाथों से पकड़े, कर क्या रहे हो? मुल्ला ने कहा, करूं क्या, भाई! डाक्टर ने कहा हृदय का दौरा पड़ा है, तकिये से सिर मत उठाना । तो तकिये से सिर तो उठा ही नहीं सकता हूं!
जिन्होंने शास्त्र से सूचनाएं ली हैं, उनकी सूचनाएं ऐसी ही हैं । वे तकिया बांध लेंगे सिर से, लेकिन करेंगे तो वही जो कर सकते हैं । करेंगे तो वही जो उनके अनुभव में सही मालूम पड़ रहा है ।
एक गांव में शराब के खिलाफ बोलने के लिए एक महात्मा का आगमन हुआ। उनका देश शराब के विपरीत सप्ताह मना रहा था। तो महात्मा ने बहुत समझाया, शराब के खिलाफ बहुत—सी बातें समझाई। और फिर जोर देने के लिए उसने कहा कि तुम्हें पता है कि गांव में सब से बड़ी हवेली किसकी है? शराब बेचने वाले की। और पैसा उसका कौन चुकाता है? तुम। और तुम्हें पता है कि गांव में किसकी स्त्री सबसे ज्यादा कीमती गहने पहनती है? शराब बेचने वाले की। और उसका मूल्य तुम अपने खून से चुकाते हो।
जब सभा पूरी हो गई, तो एक जोड़ा, पति—पत्नी, उसके पास आया और महात्मा के चरणों में सिर रखकर उन्होंने कहा कि आपकी बड़ी कृपा है। आपने जो उपदेश दिया, उससे हमारा जीवन बदल गया। तो महात्मा ने कहा कि बड़ी खुशी की बात है। क्या तुमने शराब न पीने का तय कर लिया? उन्होंने कहा कि नहीं, हमने एक शराब की दुकान खोलने का तय कर लिया है। आपने ऐसी हृदय को चोट पहुंचाने वाली बातें कहीं कि अब हम सोचते हैं, सब धंधा छोड्कर शराब ही बेचने का धंधा कर लें।
जिनको हम संसार के सुख कहते हैं, वे पहले सुख मालूम पड़ते हैं, पीछे दुख मालूम पड़ते हैं। और जिनको हम अध्यात्म की तपश्चर्या कहते हैं, वह पहले कष्ट मालूम पड़ती है और पीछे आनंद हो जाता है।
एक गांव में एक बहुत बड़ा कंजूस धनपति था। उससे कभी कोई दान मांगने में सफल नहीं हो पाया था। और गांव में बड़ी तकलीफ थी। कोई प्लेग फैल गई थी। मजबूरी की वजह से दान मांगने लोग उसके घर भी गए। उन्होंने दान की प्रशंसा में बहुत बातें कहीं। और उन्होंने कहा कि दान से बड़ा धर्म जगत में दूसरा नहीं है। और यह समय ऐसी असुविधा का है कि आप जरूर कुछ दान करें।
उस कंजूस ने कहा कि मुझे दान के संबंध में थोड़ा और समझाओ। जो चंदा मांगने आए थे, बड़े प्रसन्न हुए, क्योंकि यह बड़ा शुभ लक्षण था। क्योंकि पहले तो वह दरवाजा ही नहीं खोलता था। भीतर भी आ जाए कोई दान मांगने, तो तत्काल बाहर निकालता था। उसने कहा कि बैठो प्रेम से। मुझे जरा दान के संबंध में और थोड़ा समझाओ।
उन्होंने कहा, कुछ आशा है। यह पहला मौका था कि उसने दान मांगने वालों को इतने प्रेम से बिठाया। फिर तो उसने पानी वगैरह भी बुलाकर पिलाया। और कहा कि जरा और, मुझे दान के संबंध में पूरा ही समझा दो। वे समझे कि अब कोई दिक्कत नहीं रही। कहीं और दान मांगने न जाना पड़ेगा। सभी कुछ यह आदमी दे देगा। इसके पास इतना है कि यह अकेला भी काफी है गाव की बीमारी के मुकाबले में।
जब वे सारी बात कह चुके, तो उस कृपण कंजूस ने कहा कि मैं तुम्हारी बात से इतना प्रभावित हो गया हूं कि जिसका कोई हिसाब नहीं! तो उन्होंने कहा, अब आपका क्या इरादा है? उसने कहा, इरादा क्या! मैं भी तुम्हारे साथ दान मांगने चलता हूं। जब दान इतनी बड़ी चीज है, तो मैं भी लोगों को समझाऊंगा।
जब तक आपके भीतर का अहंकार न मिट जाए तब तक आप न जान पाएंगे कि कौन अहंकार-शून्य है, और कौन अहंकार-शून्य नहीं है।
एक बार एक समझदार आदमी ने, एक तरकीब निकाली थी कि सारी मनुष्य जाति को शांत रहने का अनुभव करा दे। उसने यह अफवाह उड़ाई, सारी दुनिया में कि चांद पर भी लोग रहते हैं। अगर हम सारे लोग बहुत ताकत से चिल्लाएं तो शायद वे सुन लें। तो सारी पृथ्वी पर एक खास नियत दिन, खास समय पर सारे लोग जोर से "हो, हो, हो...' की आवाज करके चिल्लाएंगे। यह अफवाह उड़ा दी।
सारी दुनिया में बड़ी उत्सुकता से उस दिन की प्रतीक्षा की गई। वह क्षण आ गया, वह घड़ी आ गई, वह पल करीब आने लगा। सारी दुनिया के लोग, बच्चों से बूढ़ों तक तैयार थे, क्योंकि सारे लोग चिल्लाएंगे तो ही शायद चांद तक रहने वाले लोगों तक आवाज पहुंच सके। और उनसे संबंध पैदा करना था।
ठीक क्षण भी आ गया, लेकिन कोई भी नहीं चिल्लाया। क्योंकि हर एक सोचता था कि मैं चुप रह जाऊं तो इतनी बड़ी आवाज सुनने का मौका फिर दोबारा आने वाला नहीं है। सब चिल्लाएंगे--कितनी अदभुत आवाज होगी मैं सुन लूं। और एक के न चिल्लाने से क्या फर्क पड़ेगा। दुनिया में कोई भी नहीं चिल्लाया। और वह एक क्षण टोटल साइलेंस का क्षण था, क्योंकि सभी प्रतीक्षा कर रहे थे। कोई भी पीछे के खयाल में नहीं था, आगे के खयाल में नहीं था। इसी वक्त एक घटना घट रही थी कि सारी दुनिया में सारे लोग चिल्लाएंगे "हो, हो, हो...'--और इस आवाज को हम सुन लें।
उस क्षण--उस अदभुत होशियार आदमी ने बड़ी तरकीब का काम किया था। फिर बहुत समय से ऐसा कोई काम नहीं हुआ। और आदमी की जिंदगी में कोई शांति का क्षण नहीं। उस वक्त सारे लोग हैरान रह गए थे। उस पल के बीत जाने पर लोगों को पता चला था, कितनी गहरी शांति संभव है। क्योंकि उस क्षण कोई पास्ट नहीं था, कोई फ्यूचर नहीं था। एक उसी पल में घटना घटने वाली थी। जरा चूक गए तो चूक गए। तो सारे लोग सचेत, और प्रत्येक आदमी ने सोचा था मैं सुन लूं। सुना सबने--आवाज नहीं सुनी, शांति सुनी। आवाज तो हुई ही नहीं। लेकिन साइलेंस सुनी।
यदि तुम देह का अभिमान छोड़कर अपने चेतन स्वरूप में विश्राम लेकर स्थिर हो जाओ तो इसी समय सुखी और शांत होकर बंधनों से मुक्त हो जाओगे ।
नजरिया
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक राह से गुजरता था । एक दर्पण पड़ा मिल गया । कभी दर्पण इसके पहले उसने देखा न था । उठाकर देखा । सोचा, अरे! तस्वीर तो मेरे पिताजी की मालूम पड़ती है । मगर जवानी की होगी । हद्द हो गयी! मैंने कभी सोचा भी न था कि मेरे पिताजी और तस्वीर उतरवाएंगे! ऐसे रंगीन तबीयत के तो आदमी न थे! मगर मिल गयी तो अच्छा हुआ । झाड़-पोंछकर खीसे में रखकर घर चला आया । कहीं बच्चे, पत्नी फोड़-फाड़ न दें, खो-खवा न दें, ऊपर चढ़ गया, छप्पर में छिपाकर रख आया । लेकिन पत्नी से कभी कोई पति कुछ छिपा पाया है! पत्नी ने देखा, कुछ छिपा रहा है । रात जब मुल्ला सो गया तो वह उठी, दीया जलाया, छप्पर के पास गयी, निकाला, देखा; तो उसने कहा अरे! तो इस औरत के पीछे दीवाना है! आज पता चला!
दमन का खतरा ऐसा है, जैसे चाय की केटली का मुंह किसी ने बंद कर दिया हो और ऊपर से पत्थर रख दिया हो और नीचे से आग भी दिए जा रहे हैं! तब फूटेगी केटली।
लाओत्से का एक शिष्य च्वांगत्से मरने के करीब था । अंतिम क्षणों में उसके मित्रों ने पूछा, तुम्हारी कोई इच्छा है? तो उसने कहा, एक ही इच्छा है मेरी कि इस पृथ्वी पर मैं पैरों के बल खड़ा था, उस परलोक में मैं सिर के बल खड़ा होना चाहता हूं । शिष्य बहुत परेशान हुए । और उन्होंने कहा, हमारी कुछ समझ में नहीं आता । क्या आप परलोक में उलटे खड़े होना चाहते हैं? तो च्वांगत्से ने कहा, जिसे तुम सीधा खड़ा होना कहते हो, उसे इतना उलटा पाया कि आने वाले जीवन में उलटा खड़े होकर प्रयोग करना चाहता हूं, शायद वही सीधा हो ।
चिंतन का अर्थ है, जो भीतर वासना घटती है, उसके साथ ही बह जाते हैं; दूर खड़े होकर देख नहीं पाते। मन में उठा क्रोध का विचार, तो आप भी क्रोध के विचार के साथ identified हो जाते हैं; तादात्म्य हो जाता है। आप ही क्रोध हो जाते हैं, you become anger।
मुल्ला नसरुद्दीन खोज रहा था, पूर्ण स्त्री मिले, परिपूर्ण स्त्री मिले। जीवन भर खोजा। जब वो मर रहा था तो किसी ने पूछा, मिली की नही वो स्त्री, जिसे तुम जीवन भर खोजते रहे।
मुल्ला ने कहा --मिली क्यों नही, दो-तीन बार ऐसे मौके आए।
व्यक्ति ने पूछा फिर तुम अविवाहित के अविवाहित क्यों रहे।
मुल्ला ने कहा-मैं क्या करूँ वो पूर्ण पुरुष खोज रही थी।
विश्वास वह आदमी करता है, जिसके भीतर अविश्वास है। और श्रद्धा उस आदमी में होती है, जिसके भीतर अविश्वास नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन बूढ़ा हो गया था। नौकरी के लिए एक दफतर में गया। वाचमैन की, पहरेदार की जगह खाली थी। उस मालिक ने कहा कि ठीक है, लेकिन मैं तुम्हें बता दूं कि हमें किस तरह का व्यक्ति चाहिए। तुम ठीक हो, काम हम दे सकेंगे, लेकिन फिर भी तुम समझ लो। हमें ऐसा व्यक्ति चाहिए जो चौबीस घंटे संदेह करे–वाचमैन। कोई भी भीतर आये, तो कभी आस्था और भरोसे से न देखे, चौबीस घंटा संदेह करे। और चौबीस घंटा लोगों के दोष, भूल-चूक निकालने की कोशिश में लगा रहे। और चौबीस घंटा लड़ने को तत्पर रहे। दुष्ट स्वभाव हो, कर्कश आवाज हो। भयावह चेहरा हो और जरा ही कोई उत्तेजना दे दे तो बिलकुल शैतान उसके भीतर प्रगट हो जाये–हमें ऐसा आदमी चाहिए। ठीक है, तुम चल पाओगे।
नसरुद्दीन ने कहाः क्षमा करें, I am sorry, this job is not for me, but I will send my wife around–यह काम मेरा नहीं है, लेकिन मैं अपनी पत्नी को भेज दूंगा। बिलकुल जैसा आप कह रहे हैं, वैसा ही व्यक्तित्व है उसका!
तुम्हारा शरीर ईश्वर का मंदिर है, और ईश्वर तुम्हारे भीतर है ।
हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह खुश था। एक दिन एक अक्लमंद आदमी उसके पास आया। उसने हफीज से कहा, 'अगर तुम्हारे पास अंगूठे जितना बड़ा हीरा हो, तो तुम पूरा शहर खरीद सकते हो, और अगर तुम्हारे पास मुट्ठी जितना बड़ा हीरा हो तो तुम अपने लिए शायद पूरा देश ही खरीद लो।' वह अक्लमंद आदमी इतना कह कर चला गया। उस रात हफीज सो नहीं सका। वह असंतुष्ट हो चुका था, इसलिए उसकी खुशी भी खत्म हो चुकी थी।
दूसरे दिन सुबह होते ही हफीज ने अपने खेतों को बेचने और अपने परिवार की देखभाल का इंतजाम किया, और हीरे खोजने के लिए रवाना हो गया। वह हीरों की खोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा, पर उन्हें पा नहीं सका। उसने उन्हें यूरोप में भी दूंढ़ा, पर वे उसे वहां भी नहीं मिले। स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बार्सिलोना नदी में कूद कर खुदखुशी कर ली।
इधर जिस आदमी ने हफीज के खेत खरीदे थे, वह एक दिन उन खेतों से होकर बहने वाले नाले में अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था। तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी और पड़े एक पत्थर पर पड़ी, और वह इंद्रधनुष की तरह जगमगा उठा। यह सोच कर कि वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा, उसने उसे उठा कर अपनी बैठक में सजा दिया। उसी दिन दोपहर में हफीज को हीरों के बारे में बताने वाला आदमी खेतों के इस नए मालिक के पास आया। उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देख कर पूछा, 'क्या हफीज लौट आया?' नए मालिक ने जवाब दिया, 'नहीं, लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा?' अक्लमंद आदमी ने जवाब दिया, 'क्योंकि यह हीरा है। मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूं।' नए मालिक ने कहा, 'नहीं, यह तो महज एक पत्थर है। मैंने इसे पाले के पास से उठाया है। आइए, मैं आपको दिखता हूं'। वहां पर ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं। उन्होंने वहां से नमूने के तौर पर बहुत सारे पत्थर उठाए, और उन्हें जांचन-परखने के लिए भेज दिया। वे पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होंने पाया कि उस खेत में दूर-दूर तक हीरे दबे हुए थे।
अब्राहम लिंकन -- शत्रुओं को मित्र बना कर क्या मैं उन्हें नष्ट नहीं कर रहा ?
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक रात भांग पी ली। भांग के नशे में जमीन घूमती हुई दिखाई पड़ने लगी। सुबह उठकर जब वह होश में आ गया, उसने कहा, मैं समझ गया.. जिस आदमी ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी घूमती है, वह भंगेड़ी रहा होगा!
दूसरे में हम स्वयं को ही देखते हैं। दूसरा जैसे दर्पण है।
मुल्ला नसरुद्दीन की एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा कर रहा था। उसे भेजा पहाड़ पर कि थोड़े दिन हवा-पानी बदलकर आओ। बड़े चिंतित, दिन-रात परेशान, दिन-रात बेचैन, रोज नई बीमारियां लेकर हाजिर। भेज दिया पहाड़ पर।
तीन दिन बाद नसरुद्दीन का तार आया -- बहुत प्रसन्न हुं, क्यों?
अब प्रसन्नता भी बिना क्यों के नहीं चलती! यह 'क्यों' की बीमारी छोड़ो। है।, अगर बीमार हो, प्रसन्न नहीं हो, दुखी हो, तो पूछो कि क्यों। क्योंकि दुख को मिटाना है, इसलिए पूछना है क्यों। कारण खोजने हैं उसके, जिसको मिटाना है। जिसको पाना है, उसके कारण क्या खोजने। 'क्यों' क्यों पूछना? मत पूछो।
ज्ञानियों ने कहा है, परमात्मा के संबंध में प्रश्न मत उठाओ। इसलिए नहीं कि उत्तर नहीं है; इसलिए कि परमात्मा यानी परम स्वास्थ्य, बात ही क्या उठानी है!
इटली में एक साधु हुआ है, और जब वह मर रहा था तो लोगों ने उससे पूछा कि तुम साधु कैसे हुए? उसने कहा कि मैंने आंख खोल कर देखा तो साधु होने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह गया।
पूछा, आंख खोल कर देखा? हम भी आंख खोल कर देख रहे हैं!
उसने कहा, मैंने बहुत कम लोग देखे जो आंख खोल कर देख रहे हों, अधिक लोग आंख बंद किए देख रहे हैं।
सत्य के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति केवल दो ही गलतियां कर सकता है, पहली शुरुआत ही न करना और दूसरी पूरा रास्ता न तय करना ।
छुपाना
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मुल्ला की बड़ी प्रशंसा कर रही है। ऐसे दिन सौभाग्य के कम ही आते हैं कि पत्नी और पति की प्रशंसा करे! लेकिन मुल्ला बहुत डरा हुआ था, क्योंकि ऐसे सौभाग्य का मतलब होता है, कुछ न कुछ उपद्रव! कुछ खर्चा करवा दे! या जरूर कुछ मतलब होगा पीछे। आखिर मतलब साफ हो गया। पत्नी ने कहा, अब बहुत हो गया, अब तुम खोजो, लड़की के लिए लड़का खोजना ही पड़ेगा। अब इस साल खाली नहीं जाना चाहिए। मुल्ला ने कहा कि क्या करूं, खोजता हूं, लेकिन गधों के अतिरिक्त कोई मिलता ही नहीं! तो पत्नी के मुंह से सच्ची बात निकल गयी। उसने कहा, अगर ऐसे ही मेरे पिता भी सोचते रहते तो मैं अनब्याही ही रह जाती!
हम जैसे हैं, उससे भिन्न हम थोड़ी-बहुत देर चेष्टा कर सकते हैं--क्षण-दो क्षण--फिर जल्दी ही चूक हो जाती है।
मुल्ला नसरुद्दीन का मित्र बीमार था। मरने के करीब था। मित्र जाकर उसको समझाते थे कि कोई फिकर नहीं, मौत आ नहीं रही, तुम रोज-रोज ठीक हो रहे हो। आखिरी रात भी आ गयी, डाक्टरों ने कहा, अब बचेगा नहीं। मुल्ला उसे देखने गया था। मित्रों ने उसे समझाया कि देखो भूल से भी उसके मरने की बात मत कहना। वह वैसे ही मर रहा है, अब उसे और दुखी क्यों करना! घड़ी-दो घड़ी सुख से, शांति से रह ले। जाना तो है ही। उसको दुख क्यों देना! सदमा मत पहुंचाना। मुल्ला ने कहा,क्या तुमने मुझे नासमझ समझा है? मुझे पता है।
मुल्ला गया उसने बड़ी इधर-उधर की हांकी, मित्र को खूब प्रसन्न किया, इतना कि वह मरनेवाला आदमी हंसने लगा। उसके गप-सड़ाका, उलटी-सीधी कहानियां, वह बिलकुल उठकर बैठ गया मरनेवाला, तभी मुल्ला, जोर-जोर से सिर हिलाने लगा, उसने पूछा क्या हुआ? उसने कहा, पूछो मत! यह तुम किस चीज के लिए सिर हिला रहे हो? उसने कहा कि तुमसे मैं बात जरूर कर रहा हूं, लेकिन एक प्रश्न मेरे मन में उठ रहा है कि यह तुम्हारे घर की जो सीढ़ियां हैं, मर जाओगे तो अर्थी निकाली कैसे जाएगी? यह सीढ़ियां इरछी-तिरछी हैं। तो मैं बार-बार उसी को इनकार कर रहा हूं कि मुझे क्या मतलब! यह जब मरेगा, जब मरेगा! और जिनको उतारना होगा, वे समझें! मगर यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार आ रहा है कि इन सीढ़ियों से अर्थी निकालना बड़ा मुश्किल है।
छिपाना की कोशिश सत्य के प्रगट होने का रास्ता है! झूठ को बचाओ, छिपाओ, तो भी खुल जाता है। सच को बचाओ, छिपाओ, तो भी प्रगट हो जाता है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी पत्नी से कह रहा था कि मैं एक घंटे में वापिस आने का प्रयत्न करूंगा । यदि न आया तो शाम तक आ जाऊंगा । और अगर शाम तक भी न आ पाया तो समझ लेना कि मुझे अकस्मात बाहर जाना पड़ गया । वैसे अगर मैं बाहर गया तो चपरासी से चिट्ठी जरूर भिजवा दूंगा । मुल्ला की पत्नी ने कहा, चपरासी को तकलीफ मत देना, मैंने चिट्ठी तुम्हारी जेब से निकाल ली है ।
तुम जो-जो छिपाते हो, तुम्हें लगता हो तुमने छिपा लिया, लेकिन सभी को पता चल जाता है ।
एक पुलिसवाले ने मुल्ला नसरुद्दीन की कार को रोककर कहा -- तुम्हारा लाइसेंस देखें जरा । मुल्ला ने कहा, बड़ी हैरानी की बात है । लेकिन हवलदार साहब, मैंने तो कोई नियम तोड़ा भी नहीं । लाइसेंस दिखाने की क्या जरूरत है?
उस हवलदार ने कहा, महानुभाव! तुम इतनी सावधानी से मोटर चला रहे हो कि मुझे शक हो गया । सावधानी से चलाते ही वे लोग हैं, जिनके पास लाइसेंस नहीं ।
तुम जो-जो छिपाने की चेष्टा करते हो, किसी बेबूझ ढंग से वह प्रगट होने लगता है । तुम क्रोध छिपाना चाहते हो, तुम्हारे चारों तरफ क्रोध की छाया पड़ने लगती है । तुम लोभ छिपाना चाहते हो, वह तुम्हारे चारों तरफ उसकी छाया पड़ने लगती है । तुम्हारे छिपाए कुछ भी छिपेगा नहीं ।
संसार के ऊपर तुमने जो दावे किए हैं, उनको छोड़ देना संन्यास है ।
मुल्ला नसरुद्दीन पर एक मुकदमा चला । गांव के एक नेताजी को किसी आदमी ने उल्लू-का-पट्ठा कह दिया । अब ऐसे तो सभी नेता उल्लू के पट्ठे होते हैं । नहीं तो नेता क्यों हों? आदमी अपने को तो सम्हाल ले! आदमी खुद तो चल ले! आदमी सारी दुनिया को बदलने चल पड़ता है । सारी दुनिया को ठीक करने चल पड़ता है ।
पर नेता बहुत नाराज हुआ । उसने मानहानि का मुकदमा चला दिया । मजिस्ट्रेट ने पूछा मुल्ला को--मुल्ला गवाह था--कि जिस होटल में यह घटना घटी, वहां पचासों लोग आ-जा रहे थे । और जिस आदमी ने नेताजी को उल्लू-का-पट्ठा कहा, उसने नाम लेकर भी नहीं कहा; सिर्फ उल्लू-का-पट्ठा कहा । तो इसका क्या सबूत है कि उसने नेताजी को ही कहा, किसी और को नहीं कहा? अब मुल्ला नसरुद्दीन नेता के पक्ष में गवाही देने आया था । वह बोला, इसका बिलकुल पक्का सबूत है । यद्यपि वहां सैकड़ों लोग आ-जा रहे थे, लेकिन इसने नेताजी को ही उल्लू-का-पट्ठा कहा ।
मजिस्ट्रेट ने कहा, इसका प्रमाण क्या है?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, क्योंकि वहां और दूसरा कोई उल्लू-का-पट्ठा मौजूद ही नहीं था ।
अब करोगे क्या? पक्ष में गवाही देने आए हैं!
तुम्हारे मतलब तुम्हारे हैं । तुम पक्ष में खड़े होओ कि विपक्ष में; बहुत फर्क नहीं पड़ता । तुम गवाही कहां से दे रहे हो, बहुत फर्क नहीं पड़ता । तुम तो तुम ही हो । तुम्हारे पास आते-आते किरणें तक मैली हो जाती हैं । तुम्हारे हाथ आते-आते सोना भी कचरा हो जाता है । तुम्हारे पास पहुंचते-पहुंचते सभी सत्य असत्य हो जाते हैं ।
तुम अपने मतलब से चुन लोगे । तुम जो चुनना चाहते हो वही चुन लोगे ।
एक गांव में एक मां और उसकी बेटी थी । उस गांव में उन मां और बेटी को रात में उठ कर नींद में चलने की आदत थी । sleep-walkers थीं, वे दोनों ही । एक रात वे दोनों नींद में उठीं और अपने पीछे के बगीचे में पहुंच गईं । नींद में उठने की कई लोगों को बीमारी होती है, उनको भी थी । बगीचे में पहुंचकर जैसे ही मां ने अपनी लड़की को देखा, और उसने जोर से कहा कि चांडाल, दुष्ट तूने ही मेरी सारी जवानी छीन ली है । तू जवान होती गई और मैं बूढ़ी होती गई, तू ही है, जिसने मेरी जवानी छीन ली । तू ही है मेरी शत्रु । जैसे ही उस लड़की ने अपनी मां को देखा, उसने जोर से कहा, ओ बूढ़ी चुड़ैल! तेरी वजह से ही मेरा जीवन एक परतंत्रता बना हुआ है । तू मेरे पैरों की जंजीर बन गई है । जैसे ही वह ये बातें कर रहीं थीं, मुर्गे ने बांग दी सुबह होने को हो गई, उन दोनों की नींद खुल गई, नींद खुलते ही उस बूढ़ी औरत ने कहा -- ओ मेरी प्यारी बेटी, इतनी सुबह तू उठ आई, कहीं तुझे सर्दी न लग जाए, हवा ठंडी है । और उस लड़की ने अपनी मां के पैर पड़े जैसा कि रोज सुबह वह पड़ती थी । और उसने कहा -- हे पूज्य मां, सुबह तुम्हारे दर्शन करके मेरा हृदय अत्यंत आनंदित हो गया ।
नींद में उन्होंने क्या कहा? और जाग कर सब क्या हो गया? नींद में शायद उन्होंने अपने हृदय की सच्ची बातें कह दीं । शायद नींद में उनके भीतर जो चलता था, वह निकल आया था ।
विंस्टन चर्चिल की एक लड़की ने शादी की एक ऐसे युवक से, जिसको चर्चिल नहीं चाहता था कि वह शादी करे । बहुत क्रोध था मन में, पी गया । शादी हो गई । उस युवक को कभी उसने कहा भी नहीं कि मेरे मन में क्रोध है । उस बेचारे को कुछ पता भी नहीं । वह चर्चिल को पापा-पापा कह कर बात करता रहता । लेकिन चर्चिल को जब भी वह पापा कहता था, तो आग लग जाती थी । यह आदमी उसे पापा कहे, उसे बिलकुल बरदाश्त के बाहर था ।
दूसरे महायुद्ध के बाद एक दिन वह आया हुआ था दामाद । और उसने चर्चिल से पूछा कि पापा, आप इस समय दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिज्ञ किसको मानते हैं ?
फिर उसे उसने पापा कहा, तो उसे बहुत बेचैनी हो गई । उसने कहा कि मैं मुसोलिनी को सबसे बड़ा राजनीतिज्ञ मानता हूं । तो जरा उसका दामाद हैरान हुआ । क्योंकि चर्चिल अपने दुश्मन को और मुसोलिनी को कहेगा! और जब कि दुनिया में बड़े लोग थे । रूजवेल्ट था और स्टैलिन थे और हिटलर थे; तब मुसोलिनी पर एकदम से नजर जाएगी उसकी! और चर्चिल खुद कोई मुसोलिनी से कम आदमी नहीं था, ज्यादा ही आदमी था ।
तो उसने पूछा, मैं समझा नहीं कि आप मुसोलिनी को क्यों...?
तब चर्चिल एकदम चौंका, पर उसने कहा कि जाने भी दो । पर उसके दामाद ने जिद्द पकड़ी कि नहीं, मुझे बताइए कि क्यों? तो उसने कहा, अब तू नहीं मानता तो मैं कहता हूं । मैं मुसोलिनी को इसलिए बड़ा राजनीतिज्ञ कह पाया, क्योंकि उसमें इतनी हिम्मत थी कि अपने दामाद को गोली मार दे । और कोई कारण नहीं है उसमें । उस वक्त मेरे मन में तुझे गोली मारने का एकदम हो रहा था, कि पापा जब तू कहता है, पापा, तब मुझे लगता है कि गोली मार दूं । लेकिन I dont have guts. मुसोलिनी में guts था, अपने दामाद को उसने गोली मार दी । इसलिए उसको मैं बड़ा भारी आदमी मानता हूं । मुझमें उतने guts नहीं हैं ।
हमारे दिमाग में पर्तें हैं । छिपाए चले जाते हैं, दबाए चले जाते हैं । कभी उखड़ आती हैं, कभी निकल आती हैं, कभी दिखाई पड़ जाती हैं । कभी जीवन भर भी हम छिपाए चले जाते हैं । कई दफे ऐसा भी होता है कि आदमी समझता है कुछ और मुझमें ज्यादा है, कुछ होता और ज्यादा है ।
पहचान के पहली तो जरूरी यह है कि अपना थोड़ा निरीक्षण करें ।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर चोरी हुई। और दूसरे दिन चोर पकड़ भी लिया गया। मुल्ला थानेदार की आज्ञा लेकर पुलिस थाने में भीतर गया। चोर के पैर पकड़ कर बैठ गया। चोर तो बहुत हड़बड़ाया। उसने कहा, 'क्या बात है?' नसरुद्दीन ने कहा, 'भैया, एक तरकीब मुझे भी बता दे। किस भांति तू घर में घुसा? बड़ा गजब का आदमी है। इसी तरह मैं भी घुस जाऊं और पत्नी को पता न चले। बस, यह राज बता दे।'
धोखा देने से जो मिलता है वह ना-कुछ है। और खुद की श्रद्धा खो जाने से जो खो जाता है, वह बहुत कुछ है। तुम बड़े सस्ते में अपने को बेचे डाल रहे हो।
अकबर के समय में एक धार्मिक व्यक्ति तीर्थयात्रा पर गया। उन दिनों बड़े खतरे के दिन थे। संपत्ति को पीछे छोड़ जाना और अकेला ही आदमी था, बच्चे—पत्नी भी नहीं थे, काफी संपदा थी। तो एक मित्र के पास रख गया, जिस पर भरोसा था। और कहा कि अगर जीवित लौट आया, तो मुझे लौटा देना, अगर जीवित न लौटूं, तो इसका जो भी सदुपयोग बन सके कर लेना। यात्रा कठिन भी थी पुराने दिनों में, तीर्थ से बहुत लोग नहीं भी लौट पाते थे।
वह लंबी मानसरोवर तक की यात्रा पर गया था। पर भाग्य से जीवित वापस लौट आया। मित्र ने तो मान ही लिया था कि लौटेगा नहीं। लेकिन जब वह लौट आया, तो अड़चन हुई। संपत्ति काफी थी और देना मित्र को भी मुश्किल हुआ। मित्र नट गया। उसने कहा कि रख ही नहीं गए! कैसी बातें करते हो? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया कोई गवाह भी नहीं था। वह बात अकबर की अदालत तक पहुंची। एक भी गवाह नहीं, उपाय भी नहीं कोई। यह आदमी कहता है, रख गया। और दूसरा आदमी कहता है, नहीं रख गया। अब कैसे निर्णय हो?
अकबर ने बीरबल से सलाह ली। बीरबल ने, जो आदमी रुपए रख गया था, उससे कहा कि कोई भी तो गवाह हो! उसने कहा, गवाह तो कोई भी नहीं है; सिर्फ जिस वृक्ष के नीचे बैठकर मैंने इसे संपत्ति दी थी, वह वृक्ष ही गवाह है। बीरबल ने कहा, तब काम चल जाएगा। तुम जाओ, वृक्ष को कहो कि बुलाया है अदालत ने। लगा तो उस आदमी को कि यह पागलपन का मामला है, लेकिन कोई और उपाय भी नहीं है। सोचा, पता नहीं इसमें कुछ राज. हो। उसने कहा, मैं जाता हूं प्रार्थना करूंगा।
वह आदमी गया। दूसरा, जिसके पास रुपए जमा थे, वह बैठा रहा, बैठा रहा। बड़ी देर हो गई। तो बीरबल ने कहा, बड़ी देर हो गई, यह आदमी लौटा क्यों नहीं! तो उस आदमी ने कहा कि जनाब, वह वृक्ष बहुत दूर है। तो बीरबल ने कहा, मामला हल हो गया। तुमने रुपए लिए हैं, अन्यथा तुम्हें उस वृक्ष का पता कैसे चला कि वह कितने दूर है!
अगर आप बहुत चालाक हैं, तो आप प्रज्ञावान पुरुष के पास भी बैठकर यही सोचते रहेंगे कि वह गलत है। क्योंकि अपने को बचाने का वही एक उपाय है, और कोई उपाय नहीं है।
महात्मा गांधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के पिता पंडित मोतीलाल नेहरू को एक पत्र लिखा। क्योंकि उन्हें खबर मिली कि मोतीलाल नेहरू सभा-समाज में, क्लब में लोगों के सामने शराब पीते हैं। तो पत्र में उन्होंने लिखा कि अगर पीनी हो तो कम से कम अपने घर के एकांत में तो पीएं! भीड़-भाड़ में, लोगों के सामने पीना...यह शोभा नहीं देता।
मोतीलाल नेहरू ने जो जवाब दिया, वह बहुत महत्वपूर्ण है। मोतीलाल नेहरू ने कहा: आप मुझे पाखंडी बनाने की चेष्टा न करें। जब मैं पीता ही हूं, तो क्यों घर में छिप कर पिऊं? जब पीता ही हूं तो लागों को जानना चाहिए कि मैं पीता हूं; जिस दिन नहीं पीऊंगा उस दिन नहीं पीऊंगा। आपसे ऐसी आशा न थी कि आप ऐसी सलाह देंगे!
Knowing others is intelligence, knowing yourself is true wisdom
Mastering others is strength, mastering yourself is true power
मौन
कथा :
दो प्रेमियों को पास-पास बैठे देखा? नहीं बोलते, इसलिए नहीं कि बोलने को कुछ नहीं है। नहीं बोलते इसलिए कि बोलने को इतना कुछ है, कैसे बोलें? और बोलने को कुछ ऐसा है कि बोलते से ही गंदा हो जाता है। शब्द उसे कुरूप कर देते हैं। उसे मौन में ही संवादित किया जा सकता है। उसे चुप रहकर ही कहा जा सकता है। लेकिन चुप्पी मुखर है। मौन भाषा है।
अमरीका का एक प्रेसिडेंट, John Coolidge, कम बोलता था, अत्यधिक कम । दुनिया में कोई राजनीतिज्ञ इतना कम बोलने वाला नहीं हुआ है । कोई मरने के वर्ष भर पहले किसी मित्र ने उससे पूछा कि कुलीज, इतना कम बोले हो जिंदगी भर, कारण क्या है ? कुलीज ने कहा -- जो नहीं बोला है, उसके लिए दंड कभी नहीं मिलता; जो नहीं बोला है, उसके लिए कभी पछताना नहीं पड़ता है । जो बोला है, उसके लिए बहुत पछताना पड़ा है । यह तो मुझे ज्यादा अनुभव न था, कुलीज ने कहा, अगर दुबारा मुझे मौका मिले तो मैं बिलकुल चुप रह जाने वाला हूं । यह तो ज्यादा अनुभव न था, अनुभव से धीरे-धीरे सीखा । लेकिन अब मैं कह सकता हूं कि जो बोला, उसके लिए दंड पाया सदा; जो नहीं बोला, उसके लिए कोई पीड़ा मुझे नहीं झेलनी पड़ी ।
फ्रायड -- पहले तो मैं सोचता था कि हम बात करते हैं कुछ कहने के लिए, लेकिन अब मेरा अनुभव यह है कि हम बात करते हैं कुछ छिपाने के लिए । कुछ चीजें हैं, जो चुप रहने में उघड़ जाएंगी, उनको हम बातचीत करके छिपा लेते हैं ।
एक मित्र के साथ लाओत्से सुबह घूमने निकलता है । वर्षों से साथी है । मित्र जानता है कि लाओत्से सदा चुप रहता है । तो मित्र के घर कोई मेहमान आया है और वह उसको भी घुमाने ले आया है । रास्ते में उस मेहमान ने बड़ी परेशानी अनुभव की है । वह बहुत restless हो गया है । क्योंकि न लाओत्से बोलता है, न उसका मेजबान बोलता है । वह मित्र बहुत परेशान हो गया । आखिर उसके वश के बाहर हो गया, तो उसने कहा कि सुबह बहुत सुंदर है, देखते हैं! लेकिन न मित्र ने देखा न जवाब दिया, न लाओत्से ने देखा न जवाब दिया । तब और बेचैनी उसकी बढ़ गई । इससे तो चुप ही रहता तो अच्छा था ।
लौट आए । लौटने के बाद लाओत्से ने मित्र के कान में कहा कि अपने साथी को दुबारा मत लाना, बहुत बातूनी मालूम पड़ता है--too much talkative ! मित्र भी थोड़ा दंग हुआ, क्योंकि इतनी ज्यादा बात तो नहीं की थी । कोई डेढ़ घंटे की अवधि में एक ही तो बात बोला था वह कि सुबह बड़ी सुंदर है ।
सांझ को मित्र आया और लाओत्से से कहा, क्षमा करना, उसे तो रोक दिया । लेकिन मैं भी बेचैन रहा हूं । ऐसी ज्यादा बात तो नहीं की थी । इतना ही कहा था कि सुबह बड़ी सुंदर है । लाओत्से ने कहा, दिया नाम कि चीजें नष्ट हो जाती हैं । सुबह बड़ी सुंदर थी, जब तक वह तुम्हारा साथी नहीं बोला था ।
बोलना सिर्फ प्रलोभन है । जैसे हम छोटे बच्चों को शक्कर की गोलियां दे देते हैं स्कूल बुलाने के लिए, खेल-खिलौने रख देते हैं स्कूल बुलाने के लिए । फिर धीरे-धीरे खेल-खिलौने कम होते जाते हैं । नर्सरी में तो हमें खेल-खिलौने ही रखने पड़ते हैं; पढ़ाई-लिखाई का कोई सवाल नहीं । कहते उसे स्कूल हैं, बाकी पढ़ाई-लिखाई का कोई वास्ता नहीं है । फिर धीरे-धीरे खिलौने विदा होने लगेंगे । फिर भी बच्चों की किताबों में हमें बड़ी रंगीन तस्वीरें रखनी पड़ती हैं । जब बच्चे पहली दफे किताब लेते हैं, तो किताब के लिए रंगीन तस्वीर नहीं देखते, रंगीन तस्वीर के लिए किताब पढ़ते हैं । फिर रंगीन तस्वीरें समाप्त होने लगती हैं । फिर धीरे-धीरे तस्वीरें विदा हो जाती हैं ।
ठीक ऐसे ही बुद्ध या लाओत्से जब बोलते हैं, तो बोलते हैं उनके लिए, जो सिर्फ बोलने को ही समझ सकेंगे । लोग जब पास आ जाते हैं, निकट आ जाते हैं, पास बैठने की क्षमता पा जाते हैं, सत्संग का रस और स्वाद मिलने लगता है, तब बुद्ध और लाओत्से जैसे लोग मौन होने लगते हैं । और जो वाणी के लोभ में आया था, वह किसी दिन मौन का संदेश पाकर लौटता है ।
स्नान से तन की शुद्धि, ध्यान से मन की शुद्धि और दान से धन की शुद्धि होती है ।
एक अमेरिकन यात्री एक पहाड़ की यात्रा पर गया था। बड़ी मुश्किल में पड़ गया। गांव में कई लोगों से उसने बात करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने कोई जवाब न दिया। सांझ को कुछ लोग एक कुएं की पाट पर बैठे थे, तो वह भी जाकर बैठ गया। उसने दो-चार दफे बात चलाने की कोशिश की। लोगों ने देखा, लेकिन चुप ही रहे। फिर उसने पूछा कि क्या मामला है? क्या इस गांव में कोई कानून है बोलने के खिलाफ? बोलते क्यों नहीं हो? इज़ देअर एनी ला अगेंस्ट स्पीकिंग?
फिर भी थोड़ी देर चुप रहे लोग। फिर एक बूढ़े ने उससे धीरे से उसके कान में कहा, देअर इज़ नो सच ला हियर, बट अप हियर पीपुल स्पीक ओनली व्हेन दे फील दैट बाई स्पीकिंग दे कैन इम्प्रूव अपान साइलेंस। तभी बोलते हैं, जब उन्हें लगे कि बोलने से मौन के ऊपर कुछ कहा जा सकता है; अन्यथा नहीं बोलते।
हमने कभी खयाल ही नहीं किया है। तो यहां तो समाप्त हो जाएगा। आप दस दिन मौन में बैठना एक घंटा, और उस घंटे में मैं फिर आपसे बोल सकूंगा; लेकिन वह बोलना बहुत गहरा हो जाएगा। और उस दस दिन के मौन में आप वह जान पाएंगे, जो शायद शब्द से न जान पाए हों।
शब्द से बहुत थोड़ा कहा जा सकता है; मौन से बहुत ज्यादा कहा जा सकता है। शब्द से बहुत कम समझा जा सकता है; मौन से बहुत ज्यादा समझा जा सकता है। क्योंकि शब्द बुद्धि का उपकरण है; और बुद्धि तोड़ देती है। और मौन अखंड है; तोड़ता नहीं, जोड़ देता है।
श्रद्धा ज्ञान देती है, विनम्रता मान देती है और योग्यता स्थान देती है ।
क कवि, एक रहस्यवादी कवि समुद्र के तट पर गया था। सुबह सूरज निकला। समुद्र की लहरों पर सूरज का जाल छा गया। सुगंधित हवाएं थीं। फूलों की खुशबू थी। वृक्षों की छाया थी। वह आराम से बैठकर इस धूप और लहरों के खेल को देख रहा था। हवाएं उसके नासापुटों को छूने लगीं। रोआं-रोआं उसका आनंद से भर उठा। उसे स्मरण आया अपनी प्रेयसी का। लेकिन उसकी प्रेयसी वहां मौजूद न थी। वह बीमार थी और दूर एक अस्पताल में थी।
उसे लगा, काश, इस सुबह, इस सूरज को, इस आकाश को, इन हवाओं को, इन सागर की लहरों को, इस वातावरण में वह मेरी प्रेयसी क्षणभर को भी आ जाए, तो स्वस्थ हो जाए! लेकिन उसे लाना मुश्किल है। उसका खाट से भी उठना मुश्किल है। फिर सोचा उसने कि दूसरा उपाय यह हो सकता है कि मैं थोड़ा-सा यह वातावरण एक पेटी में बंद करूं और अस्पताल ले चलूं।
वह एक मजबूत पेटी लाया। रोआं-रंध्र भी कहीं खुला न रह जाए पेटी का, सब तरफ मोम लगाकर बंद कर दिया, मजबूत ताले डाले। हवाएं, सूरज की रोशनी, सुगंध, सब पेटी में बंद कर दीं। आकाश का छोटा-सा टुकड़ा भी बंद हो गया। ताला डालकर सब तरफ से बंद करके रंध्र, एक बहुमूल्य पत्र के साथ उसने संदेशवाहक को पेटी लेकर अस्पताल भेजा। उसने अपने पत्र में लिखा कि अनूठा है यहां सब। अदभुत है। चमत्कृत हो गया हूं। काश तू यहां होती! लेकिन उसका कोई उपाय नहीं, इसलिए थोड़ा-सा नमूना इस आकाश का, इस सुबह का, इस सूरज की किरणों का, इस पेटी में बंद करके भेजता हूं।
पत्र पहुंच गया। पेटी भी पहुंच गई। चाबी भी पहुंच गई। चाबी से पेटी खोल भी ली गई। लेकिन भीतर कुछ भी न था! जब बंद किया था, तब सब था। सूरज की किरणें भी थीं। हवाएं भी थीं। नाचता हुआ आकाश भी था। सब था। वह तरंगित पूरा वातावरण पेटी के ऊपर ही नाच रहा था। सब था, वह सब उसने बंद किया था। लेकिन जब पेटी खोली गई, तो वहां कुछ भी न था।
होगा भी नहीं। आकाश पेटियों में बंद नहीं किए जा सकते। बंद करते ही सब बदल जाता है। अनुभूतियां भी शब्दों में बंद नहीं की जा सकतीं। बंद करते ही सब बदल जाता है। कहते ही खो जाता है सत्य।
मुझे आज्ञाकारी लोगो जैसे अनुयायी नही चाहिये; मुझे बुद्धिमान दोस्त चाहिये, जो यात्रा के समय मेरे सहयोगी हो ।
सूफी फकीर हुआ बायजीद। जब वह अपने गुरु के पास गया, तो बहुत हैरान हुआ। जब वह अपने गुरु के पास था, तो उसने एक दिन देखा कि गांव का सम्राट आया और उसने आकर बायजीद के गुरु को कहा कि मुझे भी दीक्षा दे दें इस परम मौन में, जिसमें आप विराजमान हो गए हैं। तो बायजीद का गुरु अनाप—शनाप बातें बकने लगा। वह सदा चुप रहता था। वह मुश्किल से, कभी कोई पूछता, तो बहुत मुश्किल से महीनों में जवाब देता था। अनाप—शनाप बातें बोलने लगा!
वह सम्राट वापस चला गया। बायजीद ने अपने गुरु से पूछा कि ऐसा हमने कभी नहीं देखा। उसने आपको आकर कहा था, आप परम मौन में प्रतिष्ठित हो गए हैं, मुझे भी उसी तरफ ले चलें! बायजीद के गुरु ने कहा कि उसको पता न चल जाए कि मैं मौन में प्रतिष्ठित हो गया हूं इसीलिए तो अनाप—शनाप बककर उसे मैंने विदा कर दिया।
बायजीद ने पूछा, अपने मौन को आप छिपाना क्यों चाहते हैं? उसके गुरु ने कहा, इस जगत में अगर कुछ भी छिपाने योग्य है, तो मौन है। क्योंकि वह अंतरतम संपदा है। और वह इतनी नाजुक संपदा है कि जरा बाहर प्रभावित करने की इच्छा से टूट जाती है और खो जाती है।
दूसरे को बताने की इच्छा भी उसे भीतर नष्ट कर देती है।
एक सूफी फकीर हुआ है, इब्राहीम। वह बल्ख का राजा था। और जब संन्यासी हुआ और अपने गुरु के पास गया, तो उसके गुरु ने कहा कि तू पहले एक काम कर। नग्न हो जा। तो इब्राहीम अपने कपड़े छोड्कर नग्न हो गया। इब्राहीम के साथी उसे छोड़ने आए थे, वे बड़े हैरान हुए। एक ने इब्राहीम के कान में भी कहा कि जरा पूछ भी लो कि किस लिए? इब्राहीम ने कहा कि जब समर्पण करने आ गया, तो अब प्रश्न की गुंजाइश नहीं है। फिर इब्राहीम के गुरु ने कहा कि यह चप्पल जो पड़ी है मेरी, एक उठा लो अपने हाथ में। उसने चप्पल उठा ली। और इब्राहीम से कहा कि जाओ बाजार में— उसी की राजधानी थी वह कल तक—जाओ बाजार में नग्न और अपने सिर पर चप्पल मारते जाना और एक चक्कर पूरे बाजार का लगा आना।
इब्राहीम निकल पड़ा! वह अपने को चप्पल मारता जाता। भीड़ इकट्ठी हो गई। लोग हंसी—मजाक करने लगे। लोग समझे कि पागल हो गया इब्राहीम। वह पूरा चक्कर लगाकर वापस लौट आया। इब्राहीम के गुरु ने कहा कि तेरी परीक्षा पूरी हो गई।
उसके साथियों ने इब्राहीम के गुरु से पूछा कि क्या हम पूछ सकते हैं—क्योंकि इब्राहीम तो कहता है कि पूछने का सवाल ही न रहा— क्या हम पूछ सकते हैं कि इसका प्रयोजन क्या है? तो इब्राहीम के गुरु ने कहा, इसका प्रयोजन है यह देखना कि अभी भी दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता तो भीतर नहीं रह गई! क्योंकि जो, दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता करता है, विचार करता है, योजना करता है, वह मौन में प्रवेश नहीं कर सकता।
मौन में सबसे बड़ी कठिनाई है दूसरे की मौजूदगी, जो आपके मन में सदा बनी रहती है। जब आप मौन बैठते हैं, तब भी आप मौन कहां बैठते हैं, किन्हीं दूसरों से कल्पना में बात करते रहते हैं। आदमी दो तरह की बातें करता है, वास्तविक लोगों से और काल्पनिक लोगों से। बातचीत जारी रहती है। जिनसे आप मौन में भी बात करते हैं, अगर वे कल्पना के जीव भी आपसे प्रभावित न हों, तो भी दुख हो जाता है। असली लोगों की तो हम बात छोड़ दें। आप कल्पना में किसी से बात कर रहे हों, और वह प्रभावित न हो, और कहे कि छोड़ो भी, क्या बकवास लगा रखी है! तो भी मन दुखी और खिन्न हो जाता है। सपने में भी जीतने की इच्छा बनी रहती है दूसरे को।
हम सब के अन्दर एक मैजिक है जो हमारी उर्जा बदल देता है और हमारे प्रति दूसरों की धारणा बदल देता है, उसे ईमानदारी कहते हैं ।
अनैतिक
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे को समझा रहा था, दुकान पर। सभी बातें समझा रहा था धीरे-धीरे, बेटा बड़ा हो गया, दुकान संभाले। एक दिन उसने कहा कि सुन, देख, यहां व्यवसाय की नैतिकता का प्रश्न है। यह जो आदमी अभी-अभी गया, दस रुपये का नोट इसे देना था, लेकिन भूल से यह दस-दस के दो नोट दे गया है, एक-दूसरे में जुड़े थे। अब यह सवाल उठता है व्यावसायिक नीति का कि मैं अपने साझीदार को यह दस रुपये का दूसरा नोट बताऊं कि न बताऊं? वह यह नहीं कह रहा है कि नीति का सवाल उठता है कि मैं इस आदमी को बुलाऊं जो बीस रुपये दे गया है। यह तो बात खतम हुई। इससे तो कुछ लेना-देना नहीं। अब मैं अपने partner को बताऊं या न बताऊं?
व्यवसायी की बुद्धि तो नीति में से भी व्यवसाय ही खोजेगी। और जो इस ग्राहक को बुलाने को, देने को राजी नहीं है, वह साझीदार को भी बताने को राजी नहीं हो सकता।
नैतिक व्यक्ति बेशर्त नैतिक नहीं होता। धार्मिक व्यक्ति बेशर्त नैतिक होता है। उसकी कोई शर्त नहीं है। नीति कोई साधन नहीं है, जिससे कहीं पहुंचना है। नीति ही उसका साध्य है। शुभाचरण उसका आनंद है।
मैक्यावेली या चाणक्य, जो कि लाओत्से से ठीक उलटे लोग हैं । अगर लाओत्से का विपरीत छोर खोजना हो, तो मैक्यावेली और चाणक्य ऐसे लोग हैं । मैक्यावेली कहता है कि लोगों को समझाओ कि भले रहो, क्योंकि तुम्हारी बुराई तभी सफल हो सकती है कि लोग भले रहें । लोगों को समझाओ कि सादगी से जीओ । लोगों को समझाओ कि सरल रहो । लोगों को कहो कि धोखा मत देना । तो तुम्हारा धोखा सफल हो सकता है ।
मैक्यावेली ने लिखा है अपनी किताब प्रिंस में, राजाओं को जो उसने सलाह दी है उसमें उसने लिखा है कि राजा ऐसा होना चाहिए, जो नीति की बातें लोगों को समझाए, लेकिन नीति से कभी जीए नहीं । क्योंकि अगर खुद ही तुम नीति से जीने लगे, तो तुम बुद्धू हो! फिर तो फायदा क्या है समझाने का? लेकिन समझाते रहना कि लोग नीति से रहें, तब तुम्हारी अनीति सफल हो सकेगी । और अगर तुम ही जीने लगे, तो कोई और दूसरा तुम पर सफल हो जाएगा । इसलिए इस तरह का धोखा जारी रखना कि नीति अच्छी है । और इस तरह का अपना चेहरा भी बनाए रखना कि तुम बड़े नैतिक हो । लेकिन भूल कर भी इस जाल में खुद मत पड़ जाना, इससे बाहर खड़े रहना और सदा होशियार रहना कि जगत में सफल तो अनीति होती है । लेकिन अनीति की सफलता का आधार नीति का प्रचार है । नहीं तो अनीति सफल नहीं हो सकती ।
इसलिए मैक्यावेली कहता है कि खूब नीति का प्रचार करो । बच्चों को स्कूल में, कालेज में शिक्षा दो कि नैतिक रहो । लेकिन खुद इस भूल में मत पड़ जाना । इससे बचे रहना । चेहरा बनाए रखना, तो तुम्हारी सफलता की कोई सीमा न रहेगी ।
यह लाओत्से से ठीक उलटा आदमी है । बहुत बुद्धिमान आदमी है । और एक लिहाज से, मैं मानता हूं कि आदमी की शक्ल को ठीक-ठीक पेश कर रहा है, जैसा आदमी है । मैक्यावेली आदमी को गहरे में पहचानता है । और आदमी के संबंध में वह जो कह रहा है, वह बहुत दूर तक सच है । निन्यानबे मौके पर बिलकुल ही सच है । और वह कहता है, मैं उनको सलाह नहीं दे रहा हूं, जो अपवाद हैं । मैं तो उनको सलाह दे रहा हूं, जो नियम हैं । जैसा नियम है, वह मैं सलाह दे रहा हूं ।
एक ओर हम दुर्लभ पदार्थों के लिए मोह बढ़ाए चले जाते हैं । अब कोहीनूर पत्थर ही है । और अगर कोई... हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं, एक ऐसे आदिवासी समाज की कल्पना कर सकते हैं, जहां कोहनूर सड़क पर पड़ा रहे और बच्चे खेलें और फेंकते रहें और कोई उसको उठाए न । क्योंकि कोहनूर में कोई intrinsic value नहीं है, कोई भीतरी मूल्य नहीं है । कोहनूर में जो मूल्य है, वह दिया हुआ मूल्य है, आरोपित मूल्य है । कोहनूर के भीतर कोई मूल्य नहीं है । क्योंकि न उसको खा सकते हैं, न उसको पी सकते हैं, वह किसी काम पड़ नहीं सकता । वह बिलकुल बेकाम है । लेकिन उसकी सिर्फ एक ही खूबी है कि वह रेयर है, ज्यादा नहीं है । अकेला है । बहुत थोड़ा है । न्यून है । अगर न्यून चीज को हम ऊपर से मूल्य दे दें, तो दुनिया उसके लिए पागल हो जाएगी । अब यह हालत हो सकती है कि एक आदमी अपना जीवन गंवा दे कोहनूर को पाने में और कोहनूर किसी काम में न आए । लेकिन दुर्लभ पदार्थ को दी गई प्रतिष्ठा, समाज में चोरी, बेईमानी और प्रतियोगिता और संघर्ष पैदा करती है ।
सहज स्वीकार से जो मृत्यु को पकड़ लेता है, मृत्यु उसके लिए समाप्त हो जाती है।
प्लेटो ने एक छोटी-सी कहानी लिखी है। और कहानी है एक नैतिक प्रश्न उठाने के लिए। कहानी है कि एक आदमी को यदि कोई ऐसी तरकीब मिल जाए, कोई ऐसा ताबीज मिल जाए, कि वह invisible हो सके, अदृश्य हो सके--जब चाहे तब अदृश्य हो सके--तो प्लेटो पूछता है कि क्या ऐसा आदमी नैतिक हो सकेगा? वह आपकी दुकान पर आए और हीरे-जवाहरात उठा ले; और अदृश्य है, पुलिस उसे पकड़ न पाए, समाज उसे अनैतिक कह न पाए। वह किसी के घर में रात घुस जाए; दिखाई न पड़े, अदृश्य हो सके। तो प्लेटो ने यह पूछा है कि क्या ऐसा नैतिक आदमी खोजना संभव है, जिसके हाथ में अदृश्य होने का ताबीज हो और जो नैतिक रह जाए? बड़ा कठिन मालूम पड़ता है ऐसा आदमी खोजना।
आप भी अगर सोचें कि आपको ताबीज मिल गया, एक पांच मिनट के लिए सोचें कि हाथ में ताबीज है, अब क्या करिएगा! आपका मन फौरन रास्ते बताएगा कि यह-यह करो--पड़ोस वाले की पत्नी को ले भागो, फलां आदमी की कार ले भागो, फलां की दुकान में घुस जाओ--फौरन आपका मन आपको सब रास्ते बता देगा। अभी मिला नहीं ताबीज आपको, लेकिन ताबीज मिल जाए, इसका खयाल भी आपको फौरन बता देगा कि आप क्या-क्या कर सकते हो--जो कि आप नहीं कर पा रहे हो, क्योंकि अनैतिक होने में हानि मालूम पड़ रही है। और कोई कारण नहीं है।
इस जगत में जो हमें नैतिक और अनैतिक लोग दिखाई पड़ते हैं, उनके नैतिक और अनैतिक होने का निर्णायक सूत्र लाभ और हानि है।
एक मछली की दूकान के सामने मुल्ला नसरुद्दीन खड़ा था। थोड़ा दूर हटकर, रास्ते पर। परिचित मछली बेचनेवाला! उससे उसने कहा कि 'भैया, जरा दोत्तीन बड़ी मछलियां मेरी तरफ फेंको तो।' उस दूकानदार ने कहा, 'फेंकने की क्या जरूरत है? तुम पास आ जाओ, इतनी दूर क्यों खड़े हो? मछलियां तुम्हें हाथ में ही दे दूंगा।' नसरुद्दीन ने कहा कि 'नहीं, उसके पीछे कारण हैं। मैं दुनिया का सबसे बड़ा निखट्टू मछुआ हो सकता हूं, लेकिन झूठा आदमी नहीं। तुम फेंकोगे, मैं पकडूंगा, तो घर जाकर पत्नी से कह सकूंगा कि मैंने इन्हें स्वयं पकड़ा है।'
बेईमान के ढंग बदल सकते हैं, ऊपरी व्यवस्था बदल सकती है, ढांचा, रंग, रूप, सब बदल सकता है, लेकिन भीतर का स्पंदन तो वही रहेगा।
एक व्यापारी ने उधारिये से मासूम सा सवाल पूछा -- अरे फोन नही उठाना है तो मत उठाओ, बस इतना सा बता दो, खराब क्या है? तबियत या नियत !!!!
संन्यास उस दिन नहीं होता, जिस दिन संन्यास लिया जाता है; उस दिन तो केवल औपचरिक रूप से शुरुआत होती है। संन्यास उस दिन फलित होता है, जिस दिन साक्षी का अनुभव होता है।
जब मुल्ला मरने लगा, अपने बेटे को कहा, आखिरी संदेश देता हूं। दो नियम का सदा पालन करना, ये व्यवसाय के आधार-स्तंभ हैं। यही चरित्र है, यही शील है व्यवसाय में। पहला कि जो वचन दो, उसे पूरा करना। और दूसरा कि कभी भूल कर किसी को वचन मत देना।
जहां तंबू ही बांधने चाहिए वहां तुम पत्थरों के महल बना रहे हो !
ढब्बूजी ने अपने जिगरी दोस्त चंदूलाल को बताया, गजब हो गया, यार! यही समझो कि सब कलयुग का प्रताप है। लोगों में नैतिकता तो नाममात्र भी नहीं रही। जानते हो, अभी जो मेहमान आए थे हमारे यहां, वे जनाब जाते समय हमारी खूबसूरत अटैची मार कर ले गए। बेईमानी की भी हद होती है, भाई!
चंदूलाल ने सहानुभूति जताते हुए कहा: राम-राम! यह बीसवीं सदी तो चरित्र के पतन की सदी है, दोस्त! दुख न करो! क्या वह अटैची बहुत महंगी थी? ढब्बू जी बोले -- क्या मालूम महंगी थी कि सस्ती, अपने को तो रेल के डिब्बे में पड़ी मिली थी।
रस तो अनंत था, अंजुरी भर ही पिया,
जी में वसंत था, एक फूल ही दिया।
मिटने के दिन आज मुझको यह सोच है,
कैसे बडे युग में कैसा छोटा जीवन जिया।
जानकारी
कथा :
गुरजिएफ के पास जब पहली दफा Ouspensky आया--उसका प्रमुख शिष्य--तो गुरजिएफ ने कहा, तू एक काम कर। एक कागज पर दो खंड कर ले। एक तरफ लिख, जो तू जानता है। और एक तरफ लिख, जो तू नहीं जानता है। और ईमानदारी बरत। क्योंकि अगर मेरे पास कुछ सीखना है, तो ईमानदारी से शुरुआत करनी होगी। फिर मेरा कुछ खोता नहीं, अगर तू बेईमान भी रहे। जो तू लिख देगा कि तू जानता है, उस संबंध में मैं फिर कभी तुझसे बात न करूंगा। बात खतम हो गयी, तू जानता है। और जो तू लिख देगा कि नहीं जानता है, उस संबंध में मैं तेरी पूरी सहायता करूंगा जानने के लिए। अब तू सोच ले। यह कागज ले, भीतर के कमरे में जाकर लिख ले।
Ouspensky प्रसिद्ध आदमी था। बड़ा गणितज्ञ था। जब गुरजिएफ के पास आया तो गुरजिएफ को तो कोई भी नहीं जानता था, Ouspensky का नाम अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का नाम था। उसने एक बड़ी अदभुत किताब Tertium Organum लिखी थी। ऐसी किताबें सदियों में एकाध बार लिखी जाती हैं। कहते हैं, दुनिया में केवल तीन किताबें हैं उस मूल्य की, पूरे मनुष्य जाति के इतिहास में। पहली किताब Aristotle ने लिखी थी। उसका नाम है -- Organum, पहला सिद्धांत। दूसरी किताब Lord Bacon ने लिखी, उसका नाम है-- Novum Organum, नया सिद्धांत। और तीसरी किताब Ouspensky ने लिखी। उसका नाम है-- Tertium Organum, तीसरा सिद्धांत। कहते हैं, इन तीन किताबों का कोई मुकाबला नहीं है।
और Ouspensky ने जब ऐसी बहुमूल्य किताब लिखी थी, तो स्वभावतः अकड़ थी। अकड़ तो उसकी किताब के पहले पन्ने से ही पता चलती है। पहले पन्ने पर ही वह लिखता है कि Aristotle ने पहला सिद्धांत लिखा, Bacon ने दूसरा लिखा, मैं तीसरा लिखता हूं, लेकिन तीसरा पहले से भी पहले मौजूद था। यह मेरा तीसरा सिद्धांत पहले से भी पहले है! और किताब तो मूल्यवान है, इसमें कोई भी शक नहीं है।
गुरजिएफ को कोई भी नहीं जानता था। गुरजिएफ को लोगों ने जाना Ouspensky के कारण। क्योंकि Ouspensky उसका शिष्य हो गया। तो जरूर इस फकीर में कुछ होगा। और गुरजिएफ ने कहा, तू लिख ले। क्योंकि मैंने तेरी किताब देखी है। तू बड़े खतरे में है। तुझे पता नहीं है और तुझे खयाल है कि तुझे पता है। यह साफ हो जाए पहले ही दिन, फिर बात चल पड़ेगी।
Ouspensky आदमी निश्चित ईमानदार रहा होगा। सब दांव पर लगा दिया उसने। घंटेभर वह बैठा रहा उस कमरे में। सर्द रात थी, पसीना-पसीना हो गया। हाथ में लिए कलम, कागज सामने रखे, चेष्टा करता है, लेकिन कुछ भी याद नहीं आता जो जानता हो, जो वस्तुतः जानता हो, जिसको स्वयं जाना हो। जिसका साक्षात्कार हुआ हो। न ईश्वर को जानता है, न आत्मा को जानता है। कुछ भी तो नहीं जानता। अभी ध्यान भी तो नहीं जाना। अभी प्रेम भी तो नहीं जाना। परमात्मा तो बहुत दूर है, अभी प्रेम भी नहीं जाना। रोता है, पसीने से तरबतर है।
घंटेभर बाद वापिस आता है। गुरजिएफ के चरणों में गिर पड़ता है। खाली कागज हाथ में दे देता है। कहता है, मैं कुछ भी नहीं जानता। मैं शिष्य होने को तैयार हूं। और वह आखिरी क्षण है, उसके बाद उसने कभी गुरजिएफ के सामने किसी भी बात को जानने का दावा नहीं किया।
गुरजिएफ ने खूब भरा उसे। खूब उंडेला उसमें। इतना खाली पात्र मिल जाए, तो गुरु भी नाच उठता है! और इतना खाली हूं, ऐसा मानने को तैयार हो जाए; खाली तो सभी हैं। मानने में अड़चन है। खाली हैं तो और ढक्कन को बंद किये बैठे हैं, कि कोई ढक्कन न खोल ले, कोई भीतर देख न ले!
हम जानते बहुत हैं बिना जाने।
एक सूफी किताब पहली दफा प्रकाशित हुई है । किताब तो एक हजार साल पुरानी है । एक हजार साल में बहुत दफे सोचा गया कि उसे प्रकाशित किया जाए । लेकिन फिर प्रकाशित नहीं किया जा सका । क्योंकि कोई प्रकाशक, कोई publisher उसे छापने को राजी न हुआ । बात क्या थी कि कोई publisher उसे छापने को राजी न हुआ? बात यह है कि उस किताब में कुछ लिखा हुआ नहीं है । दो सौ पृष्ठ की किताब है कोरी! उस किताब की कहानी जरूर लंबी है । और सूफियों के हाथ में वह किताब पीढ़ी-दर-पीढ़ी दी जाती रही है । और कब किसने उस किताब को पढ़ कर क्या कहा, उसका भी इतिहास निर्मित हो गया है । पढ़ने को उसमें कुछ है नहीं । लेकिन जब एक सूफी गुरु ने दूसरे को उसे दिया, तो उसने पढ़ कर जो वक्तव्य दिया, वह संगृहीत हो गया है ।
अभी वह किताब प्रकाशित हुई है । पर वह publisher भी सीधी किताब छापने को राजी नहीं हुआ । उसने कहा कि पहले वे जो-जो बातें किताब के बाबत कही गई हैं, वे भी लिखी जाएं, तो कुछ छापने जैसा हो । ये दो सौ पेज खाली! तो दो सौ पेज खाली छापे हैं और नौ पन्ने आगे लिखित छापे हैं । वे किताब के हिस्से नहीं हैं । वह किताब के संबंध में लोगों ने जो कहा है वह है ।
जिस व्यक्ति ने यह किताब पहली दफा दी अपने शिष्य को, उसने कहा कि ठीक से पढ़ लेना, क्योंकि जो भी जानने योग्य है, वह सब मैंने इसमें लिख दिया है । All that is worth knowing! शिष्य ने किताब खोली, और उसमें तो कुछ भी नहीं था । उसने अपने गुरु को कहा, लेकिन इसमें तो कुछ भी नहीं है । तो उसके गुरु ने कहा कि that means nothing is worth knowing । इसका अर्थ है कि कुछ जानने योग्य नहीं है । इसमें मैंने वह सब लिख दिया है जो जानने योग्य है । और जिस दिन तू इस किताब को पढ़ने में समर्थ हो जाएगा, उस दिन तू सब किताबों से मुक्त हो जाएगा ।
इसलिए इस किताब का नाम है: the books of the books, शास्त्रों का शास्त्र । इसमें कुछ है नहीं ।
फिर जब दूसरे शिष्य को वह किताब दी गई, तो उसने किताब खोली ही नहीं । उसके गुरु ने कहा, खोल कर पढ़ भी! पर उसने कहा कि पढ़ने से कभी कुछ नहीं मिलेगा, यह मैं जानता हूं । इसे भी पढ़ने से कुछ न मिलेगा । तो उसके गुरु ने कहा कि इसीलिए तुझे मैंने योग्य समझा कि यह किताब तुझे दे दूं, क्योंकि जो पढ़ने वाले हैं, उनके यह किसी काम की नहीं है । कथा है कि उस शिष्य ने किताब जिंदगी भर नहीं खोली ।
बड़ी कठिन बात है । किताब आपके हाथ में हो और जिंदगी भर न खोली हो, बड़ी कठिन बात है । मरते वक्त अपने जिस शिष्य को उसने सौंपा, उसे उसने कहा कि ध्यान रख, मैंने इसे कभी पढ़ा नहीं । और मेरे गुरु ने मुझे यह इसीलिए दी थी कि वे जानते थे कि पढ़ने में मेरी उत्सुकता नहीं, जानने में मेरी उत्सुकता है । मैं तुझे सौंपता हूं, इसी आशा में कि तू भी जानने की चेष्टा में लगेगा, पढ़ने की चेष्टा में नहीं ।
पढ़ने से जो ज्ञान मिल जाएगा, वह सिर्फ ज्ञान जैसा प्रतीत होता है । धोखा होता है । pseudo knowledge होती है । दिखाई पड़ता है कि ज्ञान है; वह ज्ञान होता नहीं ।
लाओत्से -- जो जानते हैं, वे लोगों को जानने से रोकते हैं । क्योंकि वे यह जानते हैं कि लोगों के भटकने का जो सुगमतम मार्ग है, वह जानकारी है ।
नसरुद्दीन पर एक मुकदमा चला । चोरी का मुकदमा है । और अदालत में मजिस्ट्रेट ने कहा... बड़ी मुश्किल से, मजिस्ट्रेट सख्त था बहुत, बहुत मुश्किल से ही नसरुद्दीन का वकील नसरुद्दीन को बचा पाया । जब अदालत के बाहर निकलते थे, तो वकील ने पूछा कि नसरुद्दीन, सच बताओ, चोरी तुमने की भी थी या नहीं? नसरुद्दीन ने कहा कि तुम्हें सुन-सुन कर महीनों तक, मुझे भी शक आने लगा है कि मैंने चोरी की थी?
जानकारी से ज्ञान का भ्रम पैदा होता है । अगर हम पुनरुक्त करते जाएं, जानकारी को बार-बार दोहराते जाएं, दोहराते जाएं, तो हम यह भूल ही जाते हैं कि यह हमारा जानना हुआ नहीं है । बार-बार दोहराने से लगता है कि मैं जानता हूं ।
च्वांगत्से -- If you want to know, beware of knowledge; अगर जानना चाहो, तो जानकारी से सावधान!
एक बात बार-बार सुन कर कठिनाई हो जाती है । और दूसरे से सुन कर नहीं, जब आप खुद ही दोहराते रहते हैं । बचपन से दोहराते रहते हैं, ईश्वर है, ईश्वर है, ईश्वर है । खून के साथ मिल जाती है बात । हड्डियों में समा जाती है । मांस-पेशियों में घुस जाती है । रोएं-रोएं से बोलने लगती है । होश नहीं था, तभी से पता चलता है कि ईश्वर है । फिर दोहराते-दोहराते-दोहराते-दोहराते याद ही नहीं रह जाता कि कोई क्षण था जब मैंने सवाल उठाया हो कि ईश्वर है? लगता है, सदा से मुझे मालूम है कि ईश्वर है ।
अब यह जानकारी आत्मघाती है । अब जब हमें पता ही है कि ईश्वर है, तो खोजने क्यों जाएं? जो मालूम ही है, उसकी तलाश क्यों करें? जो पता ही है, उसके लिए श्रम क्यों उठाएं? इसलिए पूरा मुल्क अध्यात्म की चर्चा करते-करते गैर-आध्यात्मिक हो गया । अगर इस मुल्क को कभी धार्मिक बनाना हो, तो एकबारगी समस्त धर्मशास्त्रों से छुटकारा पा लेना पड़े । एक बार जानकारी से मुक्ति हो, तो शायद हम फिर तलाश पर निकल सकें, खोज पर निकल सकें ।
Bertrand Russell ने दो भेद किए हैं ज्ञान के--करीब-करीब ठीक ऐसे । एक को वह कहता है acquaintance, परिचय; और दूसरे को वह कहता है knowledge, ज्ञान । जो परिचय है वह हमारे पास इकट्ठा हो जाता है; और जो ज्ञान है वह हमारे पास इकट्ठा नहीं होता, वह हम को ही रूपांतरित कर जाता है । ज्ञान और ज्ञानी में फर्क नहीं होता; जानकारी में और जानने वाले में फासला होता है, distance होता है, space होती है, जगह होती है ।
लाओत्से कहता है कि जो जानते हैं, वे लोगों को जानकारी से बचाएंगे । इसीलिए बचाएंगे, ताकि कभी लोग भी उस दुनिया में प्रवेश कर सकें, जहां जानने की घटना घटती है । इसलिए समस्त ज्ञानियों ने ज्ञान पर जोर नहीं दिया, ध्यान पर जोर दिया । ध्यान से क्षमता बढ़ती है जानने की, और ज्ञान से तो केवल संग्रह बढ़ता है ।
यह फर्क आप खयाल में ले लें: संग्रह और क्षमता ।
महावीर ने तो कहा कि जिस दिन परम ज्ञान होता है, उस दिन न जानने वाला बचता है, न जाने जाने वाली वस्तु बचती है, न जानकारी बचती है; बस केवल ज्ञान ही बच रहता है, सिर्फ जानना ही बच रहता है । न पीछे कोई जानने वाला होता, न आगे कुछ जानने को शेष होता; just a knowing, सिर्फ जानना मात्र रह जाता है ।
जैसे एक दर्पण हो, जिसमें कोई प्रतिबिंब न बनता हो, क्योंकि उसके आगे कुछ भी नहीं है; दर्पण हो, उसमें कोई reflection न बनता हो, क्योंकि आगे कोई object नहीं है, कोई वस्तु नहीं है जिसका बने । फिर भी दर्पण तो दर्पण होगा । लेकिन then it is just a mirror । और भी ठीक होगा कहना, then it is just a mirroring । कुछ भी तो नहीं बन रहा है उसमें, लेकिन अभी दर्पण तो दर्पण है ।
महावीर कहते हैं, जब सच में ही आंतरिक ज्ञान का आविर्भाव होता है अपनी पूर्णता में, तो व्यक्ति सिर्फ जानने की एक क्षमता मात्र रह जाता है; जानकारी बिलकुल नहीं बचती । और ध्यान रहे, जानकारी जहां खत्म होती है, वहीं जानने वाला भी खत्म हो जाता है ।
लाओत्से के पास कनफ्यूशियस गया और कहा -- मुझे कुछ उपदेश दें, जिससे कि मैं अपने जीवन का निर्धारण कर सकूं । लाओत्से ने कहा कि जो दूसरे के ज्ञान से अपने जीवन का निर्धारण करता है, वह भटक जाता है । मैं तुम्हें भटकाने वाला नहीं बनूंगा ।
कनफ्यूशियस बड़ी दूर की यात्रा करके आया था । और कनफ्यूशियस बुद्धिमान से बुद्धिमान लोगों में से एक था; जो लोग बहुत जानते हैं , उनमें से एक था । कनफ्यूशियस ने कहा, मैं बहुत दूर से आया हूं, कुछ तो ज्ञान दें ।
लाओत्से ने कहा, हम ज्ञान को छीनने का काम करते हैं; देने का अपराध हम नहीं करते ।
इसलिए असली गुरु बहुत अप्रीतिकर लगता है । वह आपको सब जगह से काटता है । वह जो-जो आप जानते हैं वहां-वहां से आपकी जड़ें हिलाता है । इसलिए असली गुरु के पास जाने में बड़ी घबड़ाहट होती है । क्योंकि वह आपको नग्न करेगा, वह आपके एक-एक वस्त्र को निकाल कर अलग फेंक देगा, वह आपके सब आवरण अलग कर देगा । वह आपको वहीं खड़ा कर देगा, जहां आप हैं ।
कनफ्यूशियस बड़ा उदास लौटा । लाओत्से उसे झोपड़े के द्वार तक छोड़ने आया था । बहुत उदास देख कर--क्योंकि वह मीलों पैदल चल कर आया था--लाओत्से ने कहा, तुम्हें उदास देख कर अच्छा नहीं लगता है । कनफ्यूशियस ने कहा, उदास तो जाऊंगा ही, क्योंकि मैं उपदेश लेने आया था । तो लाओत्से ने कहा, लौट कर एक बार मुझे और गौर से देख लो । अगर मुझे देखना उपदेश बन जाए, तो तुम खाली हाथ नहीं लौटोगे ।
कनफ्यूशियस ने लौट कर अपने शिष्यों को कहा कि सिर पर से निकल गईं बातें, समझ नहीं आया । आदमी तो अदभुत मालूम होता है, सिंह की तरह । उसके पास खड़े होने में डर लगता है । लेकिन बातें सब सिर पर से निकल गईं, कुछ समझ में नहीं आया । और मैंने बहुत जोर दिया, तो उस आदमी ने इतना ही कहा कि मुझे देख लो ।
तो ऐसा लगता नहीं कि कनफ्यूशियस समझ पाया । क्योंकि देखने के लिए भी आंख चाहिए । और कनफ्यूशियस ज्ञान लेने आया था--इच्छा से भरा हुआ । और लाओत्से मौजूद था--अभी, यहीं । कनफ्यूशियस था भविष्य में--कुछ मिल जाए, कुछ जिससे आगे रास्ता खुले; कोई मोक्ष मिले, कोई आनंद, कोई खजाना अनुभूति का । यह जो आदमी मौजूद था सामने निपट, इस पर उसकी नजर न थी । इस आदमी से कुछ लेना था जो भविष्य में काम पड़ जाए । इसलिए शायद ही वह लाओत्से को देख पाया हो ।
बहुत दुखद है वहां खड़ा होना, जहां आप हैं; इसे गुरु जानता है । बहुत अरुचिकर है यह बात जाननी कि मुझे कुछ भी पता नहीं है; यह वह भी जानता है । लेकिन वह यह भी जानता है कि इसे जाने बिना जानने के जगत में कोई यात्रा नहीं हो सकती ।
African Proverb -- Not to know is bad; not to wish to know is worse.
एक आदमी रोज सुबह आया, इक्कीस दिन तक, और रोज वह कहता लाओत्से से कि तुमने जो कहा था, वह मैं भूल गया। तुमने जो कल कहा था, फिर से समझा दो। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन। फिर लाओत्से के एक शिष्य मातसु को हैरानी हुई। उसने उस आदमी को जब पांचवें दिन फिर आते देखा, तो उसने उसको झोपड़े के बाहर रोका और कहा कि क्या मामला है?
उसने कहा, वह मैं भूल गया। वह जो कल समझाया था, मैं फिर समझने आया हूं।
तो उसने कहा, तू भाग जा, अब तू भीतर मत जा। क्योंकि एक पागल तू है, और दूसरा पागल हमारे पास लाओत्से है। तू अगर जिंदगी भर भी आता रहा, तो वह समझाता रहेगा। पांच दिन से, चार दिन से मैं भी देख रहा हूं कि तू वही का वही सवाल ले आता है और वह वही का वही सवाल समझाने बैठ जाता है।
जब यह बात ही चल रही थी मातसु के साथ, तभी लाओत्से बाहर आ गया। और उसने कहा, आ गया भाई! अंदर आ जा। भूल गया, फिर से सुन ले!
वह इक्कीस दिन रोज आ रहा है। बाईसवें दिन नहीं आया। तो कहानी कहती है कि लाओत्से उसके घर पहुंच गया। कहा, क्या तबीयत खराब है? क्या हुआ? उस आदमी ने कहा, समझ में आ गया। और कुछ? उसने कहा कि कुछ नहीं; मैं दूसरा आदमी हो गया।
लेकिन फर्क आप समझ रहे हैं? अगर हम इक्कीस दफा जाते लाओत्से के घर पर, तो हम समझने न जाते। हम कहते, समझ में तो पहले दिन ही आ गया, जिंदगी नहीं बदली। वह आदमी यह कहता ही नहीं है कि जिंदगी नहीं बदली। क्योंकि वह आदमी यह कहता है कि आप कहते हो, समझ में आ जाएगा तो जिंदगी बदल ही जाएगी, वह बात खतम हो गई।
विश्वासी के भीतर जरा-सा छेद करो, जरा-सी सर्जरी और संदेह बाहर आ जाएगा। स्किन डीप, चमड़ी से ज्यादा गहरा नहीं होता विश्वास। और श्रद्धा? श्रद्धा गहराई का नाम है।
एक यूनिवर्सिटी में एक धर्मगुरु ने आकर विद्यार्थियों को कुछ पर्चे बांटे। एक क्वेश्चनेयर था। और उसमें पूछा कि तुम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक कौन सी समझते हो? तो किसी ने लिखा शेक्सपियर की किताब, किसी ने लिखा बाइबिल, किसी ने लिखा कुरान, किसी ने लिखा झेंदावेस्ता, किसी ने लिखा गीता। जिसको जो पसंद थी। सारे इकट्ठे करके उसने उन विद्यार्थियों से पूछा कि तुमने जो-जो किताबें लिखीं, इनको तुमने पढ़ा? उन्होंने कहा, पढ़ा हमने नहीं है। ये श्रेष्ठ किताबें हैं, इन्हें पढ़ता कोई भी नहीं। जो किताबें हम पढ़ते हैं, वे दूसरी हैं। पर उनके बाबत आपने जानकारी नहीं चाही थी। आपने पूछा था, दुनिया की श्रेष्ठ किताबें।
असल में, श्रेष्ठ किताब की परिभाषा यही है कि जब उस किताब का नाम सब को पता हो जाए और कोई उसे न पढ़ता हो, तो समझना कि वह श्रेष्ठ किताब है। जब तक उसे कोई पढ़ता हो, तब तक वह श्रेष्ठ नहीं है, पक्का समझना। कुछ न कुछ गड़बड़ होगी।
जो पुरुष निश्चय करके अंतरात्मा में ही सुख वाला है और आत्मा में ही आराम वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, ऐसा वह ब्रह्म के साथ एकीभाव हुआ सांख्ययोगी ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होता है।
जर्मनी में एक बहुत बड़ा पंडित था। उसने जिंदगी में सारी दुनिया के शास्त्र इकट्ठे किए। बहुत शास्त्र हैं दुनिया में, उसने सारे धर्मों के शास्त्र इकट्ठे किए। उसके मित्रों ने कहा भी कि तुम पढ़ोगे कब? उसने कहा कि पहले मैं सब इकट्ठा कर लूं। क्योंकि मैं पढ़ने में लग जाऊंगा, फिर इकट्ठा कौन करेगा? पहले मैं सब इकट्ठा कर लूं, निश्चिंत होकर ताला बंद करके फिर पढने में लग जाऊंगा।
वह इकट्ठा करता रहा। उसकी लाइब्रेरी बड़ी होती चली गई, बड़ी होती चली गई। कहते हैं, उसके पास इतनी किताबें इकट्ठी हो गईं कि अगर जमीन पर एक के बाद एक किताब रखी जाए, तो एक चक्कर पूरा का पूरा लग जाए पूरी जमीन का। लेकिन यह जब तक घटना घटी, तब तक वह नब्बे साल का हो चुका था।
सब धर्मग्रंथ, सब तरह की साधना पद्धतियों के ग्रंथ उसने इकट्ठे कर लिए। जिस दिन उसके संग्राहकों ने कहा कि अब और कोई किताब बची नहीं धर्म की, तब वह आखिरी सांसें गिन रहा था। उसने आंख खोली और उसने कहा कि अब तो बहुत देर हो गई। मैं पढूंगा कब? इतना करो कि मुझे स्ट्रेचर पर उठाकर मेरी लाइब्रेरी में एक चक्कर लगवा दो। देख तो लूं कम से कम!
वह आदमी जिंदगीभर हिंदुस्तान, तिब्बत और चीन की यात्राएं करता रहा। कहीं भी कोई धर्मग्रंथ हो, सब इकट्ठा कर लो! शिंटो का हो, तिब्बतन हो, चीनी हो--जहां मिले। कहीं दूर खबर मिलती कि अफ्रीका के फलां जंगल की जाति के पास एक किताब है, जो छपी नहीं; तो वहां जाकर अनुलिपि तैयार करवाकर, उतरवाकर, किसी भी तरह वह लाएगा। नब्बे साल बीत गए। मरा, तब उसके पास सिर्फ किताबें थीं। जिनको उसने देखा था, जिनको उसने पढ़ा नहीं था। अक्सर ऐसा होता है। अक्सर ऐसा ही होता है।
आपने कभी कंजूस आदमी को प्रसन्न देखा है? कंजूस प्रसन्न हो ही नहीं सकता। प्रसन्नता में भी उसे लगेगा, कुछ खर्च हो रहा है, कुछ नुकसान हुआ जा रहा है।
पाखण्ड
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन को उसके धर्मगुरु ने बहुत समझाया और कहा कि तू शराब छोड़ दे। एक दिन उसने कसम भी ले ली। फिर जब लौटने लगा सांझ अपने घर की तरफ और शराबघर आया, तो हाथ-पैर कंपने लगे उसके। खींचने लगा शराबघर उसे। इतनी प्रगाढ़ता से, जैसा पहले भी कभी न खींचा था। क्योंकि पहले तो सिर्फ शराबघर था, आज भीतर एक कसम भी ले ली थी, वह भी दूसरे के कहने से ले ली थी। मन बड़ा आतुर होने लगा। मन हजार बहाने खोजने लगा। कि छोड? भी, कौन देख रहा है! किसको पता है स्वर्ग-नर्क का! और क्या जरूरत किसी की बातों में पड़ने की! किस प्रभाव में आकर तुमने हां भर दी? लेकिन, गांव के लोग हैं, देख लेंगे, धर्मगुरु तक खबर पहुंच जाएगी। फिर प्रतिष्ठा भी दांव पर है। फिर उसे यह भी लगने लगा कि यह भी बड़ी मेरी कमजोरी है कि मैं इतनी-सी बात पर विजय नहीं पा सकता! तो अहंकार ने बल पकड़ा। किसी तरह उसने पचास कदम अपने को घसीट लिया घर की तरफ। पचास कदम के बाद, उसने जोर से अपनी पीठ थपथपायी, उसने कहा कि नसरुद्दीन, गजब कर दिया! अब आ, तुझे दिल खोलकर पिलाता हूं। इस खुशी में कि तू शराबघर के सामने से निकल आया, पचास कदम। वाह रे तेरा संकल्प! चल, अब इस खुशी में तुझे पिलाता हूं। और उसने खूब पिलायी। दुगुनी पिलायी।
अगर हमने उधार लिया है चरित्र, तो ऐसा ही होगा। हम कोई न कोई बहाना खोज लेंगे। कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे। इसी से पाखंड पैदा होता है।
बहाउद्दीन एक सूफी फकीर हुआ । जिस महानगरी में वह था, उसका सबसे बड़ा धनी व्यक्ति बहाउद्दीन के पास आता था और कहता था कि तुम सूर्य हो पृथ्वी पर! अंधेरा तुम्हें देख कर दूर हट जाता है! बहाउद्दीन हंसता था । जब भी वह आता, वह इसी तरह की बातें कहता कि तुम चांद की तरह शीतल हो, तुम अमृत की भांति हो । बहाउद्दीन हंसता । एक दिन जब वह आदमी चला गया, तो बहाउद्दीन के एक शिष्य ने कहा कि हमें बड़ी अजीब सी लगती है यह बात । वह आदमी कितने आदर के वचन बोलता है और आप ऐसा हंस देते हैं, mannerless; यह शिष्टता नहीं मालूम पड़ती । वह आदमी इतने शिष्टाचार से सिर रखता है पैर पर, कहता है सूर्य हो आप, और आप एकदम हंस देते हैं, जैसे कोई गलती बात कह रहा हो ।
बहाउद्दीन ने उस आदमी का हाथ पकड़ा और कहा, मेरे साथ चल । वे उस धनपति की दूकान पर गए । बहाउद्दीन ने सिर्फ अपनी टोपी बदल ली थी, और कुछ न बदला था । उसकी दूकान पर गए सामान खरीदने । सामान खरीद कर लौट आए । रास्ते में बहाउद्दीन ने अपने शिष्य से कहा, देखा! उसको खयाल भी नहीं आया है कि मैं सूरज हूं । उसी से सामान खरीद कर लौट रहे हैं । पंद्रह मिनट उससे बातचीत भी हुई । और उसने ठग भी लिया और माल भी कम दिया है । पर उसके शिष्य ने कहा, भूल हो सकती है; काम में व्यस्त था ।
दूसरे दिन फिर बहाउद्दीन ने कहा कि चल । बहाउद्दीन तो अपनी तरह का आदमी था । तीन सौ पैंसठ दिन, पूरे साल...वह शिष्य घबड़ा गया, वह कहने लगा, अब बस करो, समझ गए, मान गए । पर उसने कहा कि नहीं । तीन सौ पैंसठ दिन पूरे रोज बहाउद्दीन उसकी दूकान पर जाता किसी शक्ल में, कुछ खरीद कर लाता । और वह शिष्य को भी घसीटता । तीन सौ पैंसठ दिन! और इस बीच भी वह आदमी आता रहा दस-पांच दिन में और कहता, तुम सूरज हो! अंधेरे में रोशनी हो जाती है! तुम अमृत हो! तुम्हारी किरण मिल जाती है एक, तो मृत्यु का कहीं पता नहीं चलेगा!
तीन सौ पैंसठ दिन के बाद बहाउद्दीन ने कहा कि बंद कर बकवास! तीन सौ पैंसठ दिन रोज तेरे द्वार पर आया हूं । सूरज तो बहुत दूर, दीया भी दिखाई नहीं पड़ा । तूने इतना भी न कहा कि आप एक टिमटिमाते दीए हैं । कुछ भी तूने नहीं कहा । तू सरासर झूठ बोल रहा है । तुझे सिर्फ इतना मतलब है कि बहाउद्दीन बड़ा आदमी है ।
दूसरों के पंखों को लेकर जैसे कोई पक्षी उड़ने की कोशिश करे तो जो गति हो, वही गति उस आदमी की हो जाती है जो जानकारी को आचरण बनाने की कोशिश करता है ।
एक चर्च में एक पादरी लोगों को समझा रहा है कि कैसी भी स्थिति हो, सदभाव रखना चाहिए । तभी एक मक्खी उसकी नाक पर आकर बैठ गई । उसने कहा, for example, उदाहरण के लिए, यह मक्खी मेरे नाक पर बैठी है, लेकिन इसको मैं दुश्मन नहीं मानता, और इसे मैं दुश्मन की तरह हटाता भी नहीं हूं । मक्खी को भी परमात्मा ने बनाया; यह भी उसकी सुंदरतम कृति है । और तभी अचानक उसने कहा कि धत तेरे की! ऐसी की तैसी, मक्खी नहीं है, मधुमक्खी है!
सब गड़बड़ हो गया । वह मक्खी थी भी नहीं । लेकिन मधुमक्खी को भी परमात्मा ने ही बनाया हुआ है । लेकिन वह सज्जन मक्खी के भ्रम में उपदेश दिए जा रहे थे ।
सब जगह समझाया जा रहा है, क्रोध मत करो, यह मत करो, वह मत करो । और हम वही तो कर रहे हैं ।
सब कहीं और जी रहे हैं। कोई वहां नहीं जी रहा है, जहां है।
एक ईसाई फकीर नियम से जीसस के वचनों का पालन करता था । एक आदमी ने उसके गाल पर एक चांटा मारा, तो उसने दूसरा गाल कर दिया । क्योंकि जीसस ने कहा है, जो तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे, दूसरा कर देना । मगर वह आदमी भी जिद्दी था । उसने दूसरे गाल पर भी चांटा मारा ।
यह इसने सोचा नहीं था । और जीसस ने यह कहा भी नहीं है कि वह दूसरे पर भी मारेगा । इतना ही कहा है कि तुम दूसरा कर देना, तो वह तो पिघल जाएगा, पैरों पर गिर पड़ेगा । इसने कहा, हद्द हो गई । उसने दूसरे पर भी दुगुनी ताकत से चांटा मारा । अब इसकी समझ में भी न आया, क्योंकि ईसा का कोई वचन नहीं है कि तीसरा गाल कर देना, तीसरा कोई गाल भी नहीं है । तो उसने उठा कर तीसरा चांटा उसको मारा ।
पर उस आदमी ने कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं? जीसस को भूल गए?
उसने कहा, नहीं, भूले नहीं । लेकिन दो ही गाल हैं । और तीसरे के बाबत कोई instruction नहीं है । अपनी ही बुद्धि से चलना पड़ेगा । मेरी बुद्धि यह कहती है कि अब मारो ।
यह बुद्धि तब भी मौजूद थी, जब दो गाल पर चांटा मारा गया । यही असली बुद्धि है, यह इस आदमी की अपनी बुद्धि है । वक्त पर यही काम पड़ेगी, जब मुसीबत आएगी । वह जो हमारा कमजोर हिस्सा है, वह केवल शब्दों से जीता है । सुने हुए वचन, पढ़े हुए वचन मस्तिष्क में बैठ जाते हैं । फिर हम उन्हीं को आधार बना कर कसमें खाते हैं, आचरण को बनाते हैं ।
जीसस - judge not lest ye be judged तुम तो निर्णय ही मत करो, नहीं तुम्हारा निर्णय होगा फिर । किसी दिन तुम झंझट में पड़ोगे ।
अजनबी, एक सूफी फकीर था। गांव का एक बहुत बड़ा पंडित, एक बड़ा व्याकरण का ज्ञाता अजनबी को सुनने आया, तो उसने देखा कि वह व्याकरण वगैरह जानता नहीं, ठीक से भाषा उसे आती नहीं। तो उस पंडित ने कहा कि पहले तो लोगों को, जिनको आप समझा रहे हैं, ठीक से भाषा समझाइए, व्याकरण समझाइए। प्रारंभ से ही प्रारंभ करिए। यह आप क्या कर रहे हैं? आप इतनी ऊंची बातें कर रहे हैं! लेकिन न भाषा का ठिकाना, न व्याकरण का।
तो उस सूफी फकीर ने कहा कि तू रुक जा यहां। उस फकीर के चमत्कारों की बड़ी कथाएं थीं। वह पंडित रुक गया। सूफी ने उससे कहा कि बाहर झोपड़े के जो कुत्ते और बिल्लियां सांझ को इकट्ठे होते हैं, तू उनको व्याकरण सिखाना शुरू कर दे।
उसे लगा तो कि यह पागलपन की बात है; लेकिन यह फकीर कह रहा है। और यह चमत्कारी है, शायद कोई राज होगा। शायद ये कुत्ते और बिल्लियां साधारण न हों, कुछ खूबी के हों। या फिर इसका कोई मतलब होगा। शायद इन्हें सिखाते-सिखाते मुझे कुछ सीखने को मिल जाए। बात तो कुछ होगी ही, रहस्य इसमें कुछ होगा ही। उसने बेचारे ने सिखाना शुरू कर दिया।
सरल से सरल पाठ सिखाता था, लेकिन कुत्ते-बिल्ली थे कि नहीं सीखते थे। छह महीने बीत गए, वह भी थक गया। फकीर कई बार पूछा कि कोई प्रगति? कोई प्रगति तो नहीं हो रही है। फकीर ने कहा, बिलकुल प्रारंभ से ही प्रारंभ किया है न? बिलकुल प्रारंभ से ही प्रारंभ किया है! इससे और आगे प्रारंभ भी नहीं होता कुछ। कुछ भी सिखा पाए? उसने कहा कि एक कदम ही नहीं उठ रहा आगे। उस फकीर ने कहा, क्या, कठिनाई क्या है? उस पंडित ने कहा, वे भाषा ही नहीं जानते हैं, बोलना ही नहीं जानते। बोलना जानते हों, तो मैं व्याकरण भी सिखा दूं।
वह फकीर कहने लगा कि मैं जिस दुनिया की बातें कर रहा हूं, तुझे उस दुनिया की न भाषा का पता है और न व्याकरण का पता है। तुझे उसका पता हो, तो मैं भी शुरू कर सकता हूं। तेरे साथ भी शुरू कर सकता हूं।
जरा-सा भी संदेह हो, तो खुले आकाश के नीचे खड़ा नहीं हो सकता; अपने घर के भीतर छिपकर बैठेगा। संदेह डराता है।
मुल्ला नसरुद्दीन पर एक मुकदमा चला है। और अदालत में नसरुद्दीन ने कहा कि मेरी पत्नी ने कैंची उठा कर मेरे चेहरे पर हमला कर दिया और मेरे चेहरे को ऐसा काट डाला, जैसे कोई कपड़े के टुकड़े-टुकड़े कर दे। मजिस्ट्रेट बहुत हैरान हुआ; क्योंकि चेहरे पर कोई निशान ही नहीं मालूम पड़ते! मजिस्ट्रेट ने पूछा, यह कब की बात है? नसरुद्दीन ने कहा, यह कल ही रात की बात है। मजिस्ट्रेट और अचंभे में पड़ा। उसने कहा, नसरुद्दीन, कुछ सोच कर कहो। तुम्हारे चेहरे पर जरा सा भी निशान नहीं है चोट का और तुम कहते हो, कैंची से इसने टुकड़े-टुकड़े कर दिए तुम्हारे चेहरे की चमड़ी के! नसरुद्दीन ने कहा कि चेहरे पर निशान की कोई जरूरत नहीं है। I have got the witness, ये बीस आदमी खड़े हैं। ये कहते हैं कि जो मैं कहता हूं, ऐसा हुआ है।
गवाह केवल वे ही उपस्थित करते हैं, जिन्हें अनुभूति नहीं होती।
चीन में एक मेला भरा । एक आदमी कुएं में गिर पड़ा । शोरगुल बहुत है। बहुत चिल्लाता है, मगर कोई सुनता नहीं। तब एक बौद्ध-भिक्षु उसके पास आकर रुका। उसने नीचे नजर डाली। वह आदमी चिल्लाया कि बचाओ महाराज! हे भिक्षु महाराज मुझे बचाओ! मैं मरा जा रहा हूं। भिक्षु ने कहा: भगवान ने कहा है कि जीवन तो जरा है, मरण है। मरना तो होगा ही। मरना तो सभी को है। यहां जो भी आए सभी को मरना है।
उस आदमी ने कहा: वह सब ठीक है, अगर अभी, अभी फिलहाल तो निकालो, फिर जब मरना है मरेंगे। मगर बौद्ध—भिक्षु भी ज्ञानी था, उसने कहा कि क्या समय से भेद पड़ता है, आज मरे कि कल मरे! अरे जब मरना ही है तो मर ही जाओ। और यदि जीवन की आशा छोड़कर मरोगे, तो फिर पुनर्जन्म नहीं होगा। और यह जीवन की आशा लेकर मरे, फिर सड़ोगे। चौरासी का चक्कर है!
वह आदमी वैसे ही तो मरा जा रहा है, उसको और चौरासी का चक्कर! बौद्ध भिक्षु तो आगे बढ़ गया। ज्ञान की बात कह दी, मतलब की बात कह दी; सुनो सुनो, समझो, न समझो न समझो। उसके पीछे एक कन्फ्यूशियन भिक्षु आकर रुका। उसने भी देखा नीचे। वह आदमी चिल्लाया कि महाराज, तुम बचाओ। कन्फ्यूशियस को मानने वाले ने कहा: घबड़ा मत, कन्फ्यूशियस ने अपनी किताब में लिखा है कि हर कुएं पर पाट होनी चाहिए, आज यह प्रमाण हो गया। इस कुएं पर पाट नहीं है, इसलिए तू गिरा। अगर पाट होती, कभी न गिरता। हम सारे देश में आंदोलन चलाएंगे कि हर कुएं पर पाट होने चाहिए।
उसने कहा: यह सब तुम करना पीछे। मैं मर जाऊंगा। और अब पाट भी बन जाएगी। तो क्या होगा? मैं तो गिर ही चुका हूं।
उसने कहा: तू तो फिकर ही मत कर; यह सवाल व्यक्तियों का नहीं है। व्यक्ति तो आते रहते हैं, जाते रहते हैं; सवाल समाज का है।
वह गया और मंच पर खड़ा हो गया और मेले में लोगों को समझाने लगा कि भाइयो! हर कुएं पर पाट होने चाहिए।
तब एक ईसाई पादरी भी आकर रुका। उसने जल्दी से अपने झोले में से बाल्टी निकाली, रस्सी निकाली। बाल्टी डाली, रस्सी डाली। आदमी को कहा कि पकड़ ले रस्सी, बैठ जा बाल्टी में। खींच लिया उसे बाहर। वह आदमी पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा कि तुम्हीं सच्चे धार्मिक आदमी हो। बौद्ध—भिक्षु आया, वह मुझे धम्मपद की गाथाएं सुनाने लगा। कन्फ्यूशियसी आया, वह मुझे कहने लगा कि सब कुओं पर पाट बनवा देंगे, तू मत घबड़ा। तेरे बच्चे कभी भी नहीं गिरेंगे। एक तुम्हीं, सच्चे, जो तुमने मुझे बचाया। मगर एक बात मेरे मन में उठती है कि एकदम से बाल्टी—रस्सी कहां से ले आए?
उसने कहा: मैं ईसाई हूं। हम सब इंतजाम पहले ही करके चलते हैं। सेवा हमारा धर्म है। और हमारी तुमसे इतनी ही प्रार्थना है, न तो जरूरत है कुओं पर पाट बनाने की, न जरूरत है धम्मपद की गाथाओं को याद करने की। ऐसे ही गिरते रहना, ताकि हम भी बचाएं, हमारे बच्चे भी बचाए। अपने बच्चों को भी समझा जाना कि गिरते रहना। क्योंकि न तुम गिरोगे न हम बचाएंगे, तो फिर स्वर्ग कैसे जाएंगे?
जिसके पास जागरण के चक्षु हैं, ध्यान की आंख है, वह जो भी करता है ठीक करता है।
एक गांव में यज्ञ हो रहा है, भेड़-बकरियां काटी जा रही हैं, और बुद्ध आ गए, बस ठीक समय पर आ गए। उन्होंने पूछा उस पंडित को, पुरोहित को, जो यह कर रहा है हत्या का कार्य। खास पंडित-पुरोहित होते थे, जो यही काम करते थे। तुम जानकर चकित होओगे, तुम में कोई शर्मा यहां मौजूद हों तो नाराज न हों। शर्मा उन्हीं पंडित-पुरोहित का नाम है। शर्मा का अर्थ होता है शर्म न करने वाला, काटने वाला। जो यज्ञ में पशु-पक्षियों का काटता था, वह शर्मा कहा जाता था। अब तो लोग भूल गए हैं। अब तो शर्मा बड़ा समादृत शब्द है। इनका समादृत कि वर्मा इत्यादि भी अपने को छोड़कर शर्मा लिखते हैं। शर्मा का मतलब होता है हत्यारा। लेकिन हत्यारा साधारण नहीं, असाधारण आत्माओं को स्वर्ग पहुंचाने लगा।
तो बुद्ध ने कहा कि यह तुम क्या कर रहे हो? तो उन्होंने कहा कि यह कोई हत्या नहीं है, हिंसा नहीं है। ये जो पशु-पक्षी काटे जाएंगे, इन सब की आत्माएं स्वर्ग चली जाएगी। तो बुद्ध ने बड़ा मजाक किया! और बुद्ध ने कहा: तो अपने माता-पिता को क्यों नहीं काटते? स्वर्ग ही भेद दो। यह अवसर मिला, स्वर्ग भेजने का द्वार खुला और तुम इन पशु—पक्षियों को भेज रहे हो, माता-पिता को भेद दो। पत्नी-बच्चों को भेद दो। फिर सब को भेज कर खुद भी चले जना। मगर इन पशु-पक्षियों को तो न भेजो। ये तो जाना भी नहीं चाहते। ये तो तड़फ रहे हैं। ये तो भागना चाहते हैं। ये तो कहते हैं क्षमा करो! बोल नहीं सकते। जरा इनकी आंखें तो देखो, गिड़गिड़ा रही हैं। मिमिया रहे हैं; ये कह रहे हैं हमें जाने दो। ये तो स्वर्ग नहीं जाना चाहते, इनको तुम भेज रहे हो। और जो जाना चाहते हैं...। जिस यजमान ने यह करवाया है यज्ञ, वह स्वर्ग जाना चाहता है, उसी को भेज दो।
तोड़ने का भी एक मजा होता है। विरोध का भी एक मजा होता है। निंदा का भी एक रस होता है। उस में मत पड़ जाना। नहीं तो कई बार, द्वार के करीब आते-आते भी चूक जा सकते हो।
एक आदिवासी गांव में...आदिवासियों को तो, सीधे-सादे भोले-भाले लोग! और बदलने के लिए भी भोली-भाली, सीधी-सादी कोई तरकीबें खोजनी पड़ती हैं, जो उनके काम आ सकें। अब बड़े तर्क तो वे समझ नहीं सकते। बाइबिल और वेद का तो उन्हें पता नहीं। तो पादरी ने पूरा गांव बदलने की पूरी तैयारी कर ली थी। ईसाई होने को गांव तैयार था। और तरकीब क्या थी, तरकीब बड़ी सीधी / सरल थी। मगर तुम्हारी तरकीबें भी बहुत भिन्न नहीं हैं। कितनी ही जटिल हों, उनका मौलिक ढंग वही है।
तरकीब यह थी कि उसने एक दिन सारे गांव को इकट्ठा किया। आग जलाई एक तरफ और पानी से भरा हुआ एक मटका रखा दूसरी तरफ। और उसने कहा कि देखो, कौन सच्चा है? किससे परख की जाए? आदिवासी कहते हैं भवसागर कहा है संसार को, तो सच्चा वही जो तिरा दे। तो पानी में जो डूब जाए, वह झूठा और जो बच जाए वह सच्चा। उसने दो मूर्तियां बना रखी थीं। एक राम की मूर्ति, वह लोहे की और एक जीसस की मूर्ति, वह लकड़ी की। और एक ने एक दूसरा सेट भी अपनी झोले में तैयार रखा था, अगर आग से परीक्षा करनी हो तो उल्टा वहां जीसस लोहे के और राम लकड़ी के। मटके में उसने डाल दीं दोनों मूर्तियां। राम जी तत्काल डूब गए। लोहे के थे तो बचते कैसे? जीसस तैरने लगे। तालियां बज गई। गांव के लोगों ने कहा कि अब इससे ज्यादा प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या? संसार भव—सागर है! ये राम जी के साथ गए तो खुद भी डूबे। आप डूबते, ले डूबे जिजमान! खुद तो डूबेंगे महाराज, और हमें भी डुबाएंगे। जीसस ही बचावनहार! देखो क्या तैर रहे हैं! तुम्हें भी तिरा देंगे।
वह तो सब गड़बड़ हो गयी एक आदमी की वजह से। एक हिंदू संन्यासी भी गांव में ठहरा हुआ था। उसको यह खबर लगी। वह भागा हुआ पहुंचा। उसने यह सब हालत देखी; सब समझ गया राज। उसने कहा: भाई, परीक्षा तो अग्नि से होगी, क्योंकि अग्नि—परीक्षा ही हिंदुस्तान में चलती रही है। राम जी भी जब सीता जी को लेकर आए थे तो अग्नि-परीक्षा ली थी। जल-परीक्षा सुनी कभी?
गांव के लोगों ने कहा। यह बात तो यह ठीक है। जल-परीक्षा तो सुनी ही नहीं। अग्नि-परीक्षा!
पादरी थोड़ा डरा। उसने कोशिश तो की किसी तरह झोले में छिपी दूसरी मूर्तियां निकाल ले, लेकिन अब इस संन्यासी को धोखा देना मुश्किल था। उसने तो मटके में डली हुई मूर्तियां बाहर निकाल लीं और उसने कहा कि अब असली परीक्षा होती है देखो। डाल दीं दोनों को आग में। राम जी तो मजे से खड़े रहे, जीसस महाराज भभक कर जल गए। संन्यासी ने कहा: देखो, अग्नि-परीक्षा होगी, उस मग जो पार उतरेगा, वह ही तुम्हें पार उतारेगा।
आदमी के साथ यही खिलवाड़ चलता रहा है। उसे ऐसे ही तर्क दिए जाते रहे हैं। उसे इसी तरह के गणित समझाए जाते रहे हैं। आदमी भयभीत है; बचना चाहता है। मौत सामने खड़ी है।
सुख से सटो मत और दुखों से हटो मत ।
साईं, शिरडी के साईं के जीवन में एक उल्लेख है। उनके एक भक्त ने कहा कि अब तो मैं सभी में परमात्मा को देखने लगा हूं। तो साईं बाबा ने कहा कि अगर तुम सबमें परमात्मा को देखने लगे होते, तो इस भरी दोपहरी में मुझे नमस्कार करने किसलिए आते हो? कहीं भी नमस्कार कर लेना था। अगर मैं ही तुम्हें सब जगह दिखाई पड़ने लगा हूं तो इस भरी दोपहरी में इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी? मैं वहीं तुम्हें मिल जाता, मैं वहीं था।
वह जो भक्त था, रोज भोजन लेकर आता था बाबा के लिए। और जब तक वे भोजन न कर लेते, तब तक वह खुद भी भोजन नहीं करता था।
तो साईं बाबा ने कहा, कल से अब तुम भोजन लेकर मत आना, मैं वहीं आ जाऊंगा। तुम मुझे पहचान लेना, क्योंकि तुम्हें दिखाई पड़ने लगा है! वह भक्त बडी मुश्किल में पड़ा। भोजन की थाली लगाकर वह अपने द्वार के वृक्ष के नीचे बैठ गया। अब वह प्रतीक्षा कर रहा है। और एक कुत्ता उसे परेशान करने लगा। भोजन की सुगंध, वह कुत्ता बार—बार आने लगा। और वह डंडे से कुत्ते को मार—मारकर भगाने लगा। वक्त बीतने लगा और साईं बाबा का कुछ पता नहीं, तो फिर वह थाली लेकर पहुंचा उस मस्जिद में, जहां साईं बाबा रहते थे।
अंदर गया, तो देखा कि साईं बाबा की आंख से आंसू बह रहे हैं। तो पूछा कि आप आए नहीं? और मैं राह देखता रहा। साईं बाबा ने कहा, मैं आया था। मेरी पीठ देख! पीठ पर उसकी लकडी के निशान थे, जो उसने कुत्ते को लकड़ियां मारी थीं। मैं आया था। तू तो कहता था, सबमें तू देखने लगा, इसलिए मैंने सोचा, किसी भी शक्ल में जाऊंगा, तू पहचान लेगा। तो मैं कुत्ते की शक्ल में आया था। उस भक्त ने कहा, जरा भूल हो गई। ऐसे तो मैं सबमें आपको देखने लगा हूं लेकिन जरा कुत्ते में देखने का अभी अभ्यास नहीं है। अब आइएगा, बराबर पहचान लूंगा।
फिर दूसरे दिन हुआ वही। लेकिन इस बार कुत्ता नहीं आया, एक कोढ़ी आ गया। और उसने दूर से कहा, दूर रहना! यहां बाबा का भोजन रखा है, अपवित्र मत कर देना! दूर रह, छाया मत डाल देना! लेकिन वह कोढ़ी सुनता ही नहीं है, पास आए चला जाता है। तो वह अपनी थाली लेकर भागा और कोढ़ी उसके पीछे भाग रहा है। और वह थाली लेकर भाग रहा है साईं बाबा की तरफ।
जब वह भीतर पहुंचा, तो देखा, वहां साईं बाबा नहीं हैं। पीछे लौटकर देखा, तो कोढ़ी की जगह साईं बाबा खड़े हैं। और साईं बाबा ने कहा, लेकिन तू पहचानता ही नहीं है! उसने कहा, नया-नया रोज-रोज अभ्यास करवाते हैं! आज पक्का कर लिया था कि कुत्ते में देखेंगे, और आप कोढ़ी होकर आ गए! कल आइए।
अभ्यास धर्म नहीं है। चेष्टा करके कोई बात दिखाई पड़ने लगे, उसका कोई मूल्य नहीं। निश्चेष्ट दिखाई पड़े..।
सुकरात - जहाँ सम्मान है वहां डर है, पर ऐसी हर जगह सम्मान नहीं है जहाँ डर है, क्योंकि संभवतः डर सम्मान से ज्यादा व्यापक है ।
पिरहो नाम का यूनान में एक दार्शनिक हुआ। वह लोगों को समझाता था, 'जीवन असार है। और आत्महत्या एकमात्र उपाय है।' वह खुद तिरान्नबे साल तक जीया। आत्महत्या नहीं की उसने। और बड़े मजे से जीया। उससे बुढ़ापे में किसी ने पूछा कि, 'पिरहो, जिंदगी से तुम समझाते हो कि जिंदगी बेकार है और आत्महत्या एक मात्र उपाय है, और तुम्हारी मानकर हमने सुना कई लोगों ने आत्महत्या भी कर ली। तुमने क्यों नहीं की?' उसने कहा कि 'मेरी मजबूरी है। मुझे समझाने के लिए लोगों को, रुके रहना पड़ा। नहीं तो समझाता कौन?'
जहां सभी बीमार हों, वहां स्वस्थ होना खतरा लेना है। जहां सभी अंधे हों, वहां आंखें मुसीबत में डालेंगी।
एक कैथलिक पादरी और उसका एक मित्र दोनों शतरंज खेल रहे थे। कैथलिक पादरी चाल चूक गया। और ऐसे समय में कोई साधारण आदमी होता तो गालियां बकता, क्रोध जाहिर करता, अपने ही ऊपर नाराज होता। लेकिन पादरी तो यह नहीं कर सकता। उसने सिर्फ अपने होंठ को दबा लिया। होंठ काट लिया। दूसरे मित्र ने कहा कि मैंने बहुत तरह की शांतियां देखीं, लेकिन इससे ज्यादा अपवित्र शांति कभी नहीं देखी।
भीतर गाली की गूंज है। ऊपर सब शांत है।
कोई न देखता हो--एकांत में, अकेले में, निर्जन में महात्मा होना बहुत कठिन है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कसम खा ली लोगों के समझाने-बुझाने से कि अब गालियां न देगा। और गालियां उसके तकिया कलाम जैसी थीं। वह बिना गाली के बोलता ही नहीं था। ऐसा वाक्य खोजना मुश्किल था जिसमें गाली न हो। गाली से ही शुरू और अंत होता था। कसम तो ले ली, पर बड़ी मुश्किल में पड़ गया और पहले ही दिन झंझट हो गई। एक मित्र के घर भोजन करने गया था। नौकरानी के हाथ से चाय छलक गई और उसके कपड़े पर गिर गई और उसका हाथ भी जल गया। कसम खा ली थी गाली न देने की। और आज ही खाई थी कसम। अभी भूला भी नहीं था, अभी देर भी न हुई थी, ताजी थी बात। खड़ा हो गया उबलता हुआ आग से और उसने कहा कि सज्जनो, तुममें से कोई खड़ा होकर इस समय वे शब्द कहे इस औरत से, जो मैंने कहे होते अगर कसम न खाई होती।
दूसरे की मौजूदगी में तुम वही नहीं रह जाते, जो तुम हो। कृत्रिम आवरण आ जाता है। अभिनय शुरू हो जाता है।
मुल्ला नसरुद्दीन के नगर में एक दूकानदार की दूकान सौ वर्ष पुरानी हो गई थी। तो उसने एक जलसा मनाया। सौ वर्ष पूरे हो गये थे दूकान को और उस गांव में वह सबसे पुरानी दूकान थी। उसने बड़ा समारोह किया। दीये जलाये, बैंड बाजे बजाये, सारे नगर को भोज पर आमंत्रित किया। फिर वह बोला और उसने अपनी प्रशंसा में कहा कि देखो, क्या कोई बता सकता है इस गांव में इससे भी कोई पुरानी दूकान है? सौ वर्ष से हम सेवा कर रहे हैं इस गांव की। मुल्ला नसरुद्दीन उठ कर खड़ा हो गया; उसने कहा कि ठहरो। मेरी दूकान तुमसे भी ज्यादा पुरानी है। वह आदमी हैरान हुआ। उसने कहा कि तुम्हारी दूकान? तुम तो मस्जिद में मुल्ला का काम करते हो। उसने कहा, वही तो हमारी दूकान है। वह चौदह सौ साल पुरानी है। इस तरह की बात दुबारा मत करना इस गांव में हमारे रहते।
दुनिया में कहीं कोई प्रकाश की दूकान है? कोई दीये की दूकान है? कहीं भी कोई दूकान दीये की नहीं है। क्योंकि दूकानों पर तो अंधापन बिकता है।
एक वैज्ञानिक हुआ मैक्स प्लांक, उसने अपना एक संस्मरण लिखा है। उसने लिखा है कि वह जीवशास्त्र का अध्ययन कर रहा था और मनोविज्ञान का भी अध्ययन कर रहा था, और कोशिश कर रहा था कि मनोविज्ञान में और जीवशास्त्र में क्या भीतरी संबंध है। और 'जब मन प्रभावित होता है, तो शरीर कैसा प्रभावित होता है।
एक युवती से उसका प्रेम था। लेकिन एक दिन युवती एकदम झटके के साथ खड़ी हो गई। उसके पास बैठी थी, चांद था आकाश में, वे दोनों बड़े प्रेम की बातें कर रहे थे। अचानक वह झटके से खड़ी हो गई। और उसने कहा कि क्षमा करो; यह बात खतम; अब मुझसे दुबारा मत मिलना। मैक्स प्लांक ने कहा, बात क्या है? उसने कहा कि मैं कई दिन से अनुभव कर रही हूं कि जब भी तुम मुझसे प्रेम की बातें करते हो, तो तुम अपना हाथ मेरी नाड़ी पर रखते हो।
वह जांच करता था कि जब मैं प्रेम की बात करता हूं तो उसकी नाड़ी में कोई फर्क पड़ता है कि नहीं! प्रेम भी थीसिस की बात थी! उसे कुछ प्रेम में उतरने का कोई कारण नहीं था, सिर्फ जांच रहा था कि जब मन प्रभावित होता है, तो शरीर प्रभावित होता है कि नहीं!
अब यह आदमी जरूर ही खोज लेगा संबंध मन के और शरीर के, लेकिन एक अनूठे अनुभव से वंचित रह जा सकता है। प्रेम से वंचित रह जा सकता है।
आप ध्यान में उत्सुक हो सकते हैं, एक बौद्धिक ऊहापोह की तरह। तब आप छिलके लेकर लौट आए जहां कि आपको फल मिल सकते थे।
परमात्मा के गहरे नियमों में से एक नियम यह है कि दूसरा आपके लिए, जो भी मूल्यवान है, वह नहीं कर सकता। वह आपको ही करना पड़ेगा।
मुल्ला नसरुद्दीन का एक स्त्री से प्रेम था। फिर टूट गया प्रेम तो मुल्ला गया, जो-जो चीजें उसने भेंट की थीं, वापस मांगने--कि मैंने छल्ला दिया था, चूड़ियां दी थीं, वे सब मुझे वापस कर दो।
स्त्री भी गुस्से में थी, उसने सब उठा कर फेंक दिया। मुल्ला फिर भी खड़ा था।
उसने कहा, अब क्या खड़े हो? लो सामान अपना और रास्ता लगो!
मुल्ला ने कहा, और मैंने जो पत्र लिखे थे, वे पत्र भी मुझे लौटा दो।
वह स्त्री भी थोड़ी चौंकी कि सोने की अंगूठी मांग लो, ठीक है; मोतियों का हार दिया था, मांग लो, ठीक है। लेकिन पत्र! उसने कहा, पत्रों का क्या करोगे?
मुल्ला ने कहा, अब तुमसे क्या छिपाना! मुहल्ले के एक पंडित जी से लिखवाता था। हर पत्र के लिए एक रुपया दिया है। और अभी मेरी जिंदगी बाकी है, अभी फिर प्रेम करूंगा। ये पत्र काम आ जाएंगे। नहीं तो फिर से लिखवाने पड़ेंगे।
हार्दिक जो भी है वह सत्य है। बौद्धिक जो भी है वह असत्य है।
इंग्लैंड के एक महानगर में शेक्सपियर का कोई नाटक चल रहा था। बहुत वर्षों पहले की बात है। तब सज्जनों के लिए नाटक देखना पाप समझा जाता था और धर्म-पुरोहितों के तो देखने का सवाल ही नहीं था। धर्म का तो ठेका ही उन्हीं का है। लेकिन एक पादरी नाटक देखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा था। उसने वही विधि खोजी, जो हम सब जीवन में खोजते हैं। उसने थियेटर हाल के मैनेजर को लिख कर पूछाः 'क्या आप नाटक के पिछले द्वार से मेरे प्रवेश का इंतजाम कर सकेंगे, ताकि कोई मुझे न देख सके? ' मैनेजर का जवाब आयाः 'खेद है, यहां कोई ऐसा दरवाजा नहीं है, जो ईश्वर को नजर न आता हो!'
सत्य-जीवन में प्रवेश के लिए असत्य-जीवन में मरना ही पडता है।
विरोधाभास
कथा :
एक बहुत बड़े मनस्विद मायर्स ने अपने संस्मरणों में लिखा है...मायर्स खोज कर रहा था कि लोगों की क्या धारणा है, मरने के बाद क्या होता है, इस संबंध में। तो वह जो भी मिलता उससे ही पूछता कि तुम्हारी मरने के बाद क्या स्थिति होगी, इस संबंध में क्या धारणा है? एक महिला से उसने पूछा, उसकी जवान बेटी अभी-अभी मर गयी थी, तो उसने पूछा कि तुम्हारी बेटी मर गयी, तुम्हारा क्या खयाल है, तुम्हारी बेटी का क्या हुआ होगा? तो उस महिला ने बड़े क्रोध से देखा और कहा, क्या हुआ होगा? वह स्वर्ग के सुख भोग रही है। लेकिन मैं आपसे प्रार्थना करती हूं कि इस तरह की दुखदायी बातें मुझसे न करें। अब इसे थोड़ा सोचो, मायर्स ने लिखा है कि एक तरफ वह कहती है, स्वर्ग के सुख भोग रही है, और दूसरी तरफ कहती है कि आप इस तरह की दुखदायी बातें न करें।
एक ही वचन में दो विरोधाभास! अगर वस्तुतः लड़की स्वर्ग के सुख भोग रही है, तो दुखदायी बात नहीं है। और अगर दुखदायी बात है, तो स्वर्ग के सुख की बात केवल कल्पना है। केवल सुनी-सुनायी है।
परिवर्तन है बाहर, शाश्वता है भीतर। परिवर्तन है गाड़ी का चाक। और शाश्वतता है गाड़ी की कील, जिस पर चाक घूम रहा है।
बर्नार्ड शा अमेरिका गया बहुत-बहुत निमंत्रणों के बाद। तब वह कहता रहा कि अमेरिका बड़ा नासमझ, idiotic मुल्क है; मैं जाता ही नहीं, ऐसे मूढ़ों के बीच जाकर मैं क्या करुंगा। इधर वह गाली देता रहा, उधर अमेरिका में आकर्षण बढ़ता गया। जो गाली देता है, उसके प्रति आकर्षण तो बढ़ ही जाता है। बहुत निमंत्रण थे, तो बर्नार्ड शा गया। जिस जगह उसे उतारा गया, वहां इतना भीड़-भड़क्का हो गया और इतना खतरा था कि कोई झगड़ा न हो जाए, तो उसे चोरी से पहले ही दूसरी जगह उतारकर ले जाया गया।
और पहली ही सभा में वह बोला, तो उसने उपद्रव शुरू किया। वह पहली ही सभा में बोला, तो उसने कहा कि जहां तक मैं देख पा रहा हूं, यहां मौजूद कम से कम पचास प्रतिशत आदमी बिलकुल महामूर्ख हैं । जो अध्यक्ष था, वह घबड़ा गया और लोग चिल्लाने लगे कि शर्म! शर्म! वापस लो अपने शब्द! अध्यक्ष ने कहा कि आप शुरू से ही उपद्रव की बात कह दिए। किसी तरह लोगों को समझाइए!
तो बर्नार्ड शा ने कहा कि नहीं! नहीं! मैं क्या कहना चाह रहा था और मुझसे बड़ी गलती हो गई। मैं कह रहा था कि जहां तक दिखाई पड़ता है, यहां उपस्थित पचास प्रतिशत लोग बहुत बुद्धिमान मालूम पड़ते हैं। और लोगों ने तालियां बजाईं कि यह बात ठीक कही गई है। और बर्नार्ड शा ने झुककर अध्यक्ष से कहा कि confirm हो गया कि पचास प्रतिशत यहां बिलकुल गधे हैं।
लेकिन इन दो वक्तव्यों में बड़ा फर्क मालूम पड़ता है। बात वही है।
कबीर -- ह्रदय माहीं आरसी और मुख देखा न जाए
मुख तो तभी दिखे जब दिल की दुविधा जाए
सकारात्मक सोच
कथा :
एक झेन फकीर रास्ते से गुजर रहा था और एक आदमी उसे लकड़ी मारकर भागा। उसके संगी-साथी ने कहा, कुछ करो, तुम खड़े हो! वह फकीर बोला, मैं क्या करूं? समस्या उसकी है, मेरी नहीं। उसके भीतर जरूर कुछ आग जल रही होगी। उस आग के प्रभाव में ही वह क्रोध से भर गया है। अगर मैं उसे आज न मिलता, अच्छा हुआ मैं मिल गया, नहीं तो वह किसी और पर उबल पड़ता। वह तो अच्छा हुआ कि मुझ पर उबला, किसी और पर उबलता तो दूसरा भी उस पर टूट पड़ता। वह मुश्किल में पड़ जाता। वैसे ही मुश्किल में है! इतना क्रोध उसके भीतर जल रहा है, अब और उसे दंड देने की जरूरत है क्या? दंड उसने काफी पा ही लिया। लेकिन समस्या उसकी है, समस्या मेरी नहीं है।
कोई तुम्हें गाली देता है, समस्या गाली देनेवाले की है। तुम्हारा क्या है! तुम इस सारी दुनिया को कैसे बदलोगे? यह दुनिया कुछ ऐसी है!
पश्चिम का एक बहुत बड़ा धनपति मारगन जब मरा, तो मरने के पहले उसे किसी ने पूछा कि तुमने इतनी अटूट धनराशि इकट्ठी की है और तुम्हारे नीचे हजारों बड़ी प्रतिभा के और बुद्धिमान लोग काम करते थे । तुमने इतने-इतने बुद्धिमानों का कैसे उपयोग किया? उसने कहा, राज छोटा-सा है । मैंने कभी उन्हें ऐसा अनुभव नहीं होने दिया कि मैं उन पर कोई अहसान कर रहा हूं । और मैंने कभी ऐसा भी अनुभव नहीं होने दिया कि वे मेरी बात मानकर कोई काम कर रहे हैं । मेरी सदा यह चेष्टा रही कि उनको सदा यह लगता रहे कि वे ही मुझ पर अहसान कर रहे हैं और उनकी बातें मानकर मैं चल रहा हूं ।
वह आदमी बड़ा कुशल था । उसको अगर कोई काम भी करवाना होता तो अपने बीस मित्रों को इकट्ठा कर लेता । उनसे कहता कि यह समस्या आ गई है, अब हल खोजना है । खुद चुपचाप बैठा रहता । अब बीस आदमी जहां इकट्ठे हों, बीस हल आते । उनमें से जो हल उसका अपना होता, वह उसको स्वीकार कर लेता । लेकिन अपनी तरफ से वह कभी न कहता कि यह, यह मेरा सुझाव है । वह चुप बैठा रहता । वह सुझाव को आने देता । ठीक समय की प्रतीक्षा करता । कोई न कोई उस सुझाव को देगा ही । या अगर ठीक सुझाव न आता, कुछ हेर-फेर से आता, तो वह थोड़ी तरमीम करता, वह थोड़े संशोधन पेश करता, लेकिन वह भी सुझाव की तरह; आज्ञा की तरह नहीं । उसने बड़े-बड़े लोगों से काम लिया ।
मरते वक्त वह कहकर गया कि मेरी कब्र पर एक पत्थर लगा देना कि यहां एक आदमी सोता है, जिसने अपने से ज्यादा बुद्धिमान लोगों से काम लेने की कुशलता दिखाई । उसने कहा कि मेरे सारे इतने विराट धन को इकट्ठा कर लेने का राज इतना है कि मैंने कभी किसी को अनुभव नहीं होने दिया कि वह मुझसे छोटा है ।
लोभ अगर संसार की जड़ है तो दान धर्म की ।
एक फकीर था जुन्नून । कोई भी आदमी उसके पास मिलने आता, तो वह हंसता खिलखिला कर और नाचने लगता । लोग उससे पूछते कि बात क्या है? वह कहता एक तरकीब मैंने सीख ली है सुखी होने की । मैं हर आदमी में से वह कारण खोज लेता हूं, जिससे मैं सुखी हो जाऊं । एक आदमी आया, उसके पास एक आंख थी, जुन्नून नाचने लगा । यह क्या मामला है? उसने कहा कि तुमने मुझे बड़ा सुखी कर दिया; मेरे पास दो आंखें हैं, हे प्रभु इसमें तेरा धन्यवाद! एक लंगड़े आदमी को देखकर वह सड़क पर ही नाचने लगा । उसने कहा कि गजब--अपनी कोई पात्रता न थी, दो पैर दिए हैं! एक मुर्दे की लाश--मुर्दे को लोग मरघट ले जा रहे थे । जुन्नून ने कहा, हम अभी जिंदा हैं, और पात्रता कोई भी नहीं है । और कोई कारण नहीं है, अगर हम मर गए होते इस आदमी की जगह, तो कोई शिकायत भी करने का उपाय नहीं था । उसकी बड़ी कृपा है ।
जुन्नून दुखी नहीं था, कभी दुखी नहीं हो सका । क्योंकि उसने दूसरे का दुख देखना शुरू कर दिया । और जब कोई दूसरे का दुख देखता है, तो उसकी पृष्ठभूमि में अपना सुख दिखाई पड़ता है । और जब कोई दूसरे का सुख देखता है तो उसकी पृष्ठभूमि में अपना दुख दिखाई पड़ता है ।
पुण्य भी बाहर भटकाता है, पाप भी बाहर भटकाता है। दोनों का अंतस्तल से कोई संबंध नहीं है।
मुसलमान फकीर इब्राहीम कहता था कि मैं उस आदमी की तलाश में हूं, जो मुझे भलाई में विफल कर दे । विफल से उसका मतलब यह था कि जिसकी वजह से मुझे यह भरोसा आ जाए कि आदमी इतना बुरा है कि उसकी भलाई करना उचित नहीं है । जिंदगी में बहुत लोगों ने उसे धोखे दिए, उसकी चीजें छीन लीं, उसका सामान चुरा ले गए, उसे चोटें पहुंचाई, लेकिन हर बार वह हंसता था और वह कहता था--तुम कुछ भी करो, लेकिन मैं इन्सान पर भरोसा न खोऊंगा । मैं इतना ही समझूंगा कि किसी से भूल हो गई, लेकिन कभी यह न समझूंगा कि आदमी बुरा है ।
साधना का अर्थ है, धीरे-धीरे बाहर से भीतर की तरफ जाना।
सारे पश्चिम में जब पहली दफा बुद्ध के ग्रंथों का अनुवाद हुआ, तो उन्होंने कहा, यह pessimist है -- par excellence । यह तो आखिरी दम का दुखवादी है बुद्ध । क्योंकि कहता है: जन्म दुख है, जीवन दुख है, जरा दुख है, मरण दुख है, सब दुख है । यह तो दुखवादी है । लेकिन उनमें से किसी ने न सोचा कि इसके चेहरे की तरफ तो देखो । यह दुखवादी है, तुम सुखवादी हो! तो तुम्हारे चेहरे पर सुख की कोई छाप होनी चाहिए । तुम्हारे चेहरे पर सुख का कोई इशारा नहीं दिखाई पड़ता । और यह आदमी जो कहता है, जन्म दुख है, जीवन दुख है, सब दुख है, इसके आनंद का कोई पारावार नहीं है । तो जरूर कहीं कोई भूल हो रही है ।
दुख का सूत्र है, सुख की मांग । आनंद की प्रतिष्ठा का मार्ग है, दुख की स्वीकृति ।
च्वांगत्से की पत्नी मर गई । तो सम्राट गया सांत्वना देने, तो वह खंजड़ी बजा रहा था अपने द्वार पर बैठ कर । सुबह पत्नी को विदा किया, बारह बजे खंजड़ी बजाता था । पैर फैलाए हुए था, गीत गाता था । सम्राट थोड़ा झिझका । वह तो तैयार होकर आया था, जैसा कि जब भी कोई किसी के घर मर जाता है तो लोग तैयार होकर आते हैं -- क्या कहना! क्या पूछना! सब तैयार होता है, बिलकुल rehersal दो दफे घर में करके आते हैं । क्या कहेंगे; क्या उत्तर देगा; और क्या जवाब होगा । सब पक्का ही है । और जो दो-चार अनुभवी हैं, दो-चार को विदा कर चुके हैं, वे तो बिलकुल पक्के ही हैं । उनको तो कोई जरूरत ही नहीं, उनको dialogue बिलकुल याद ही होता है । वह तैयार करके सम्राट आया था कि ऐसा-ऐसा दुख प्रकट करेंगे, ऐसा-ऐसा भाव बताएंगे । इधर देखा तो हालत ही उलटी थी । यहां पुराने dialogue का उपाय न था । वे खंजड़ी बजा रहे थे । और बड़े आनंदित थे ।
सम्राट से न रहा गया । उसने कहा, च्वांगत्से, दुख न मनाओ, इतना काफी है; कम से कम खंजड़ी तो मत बजाओ । बहुत है, इतना ही बहुत है कि दुख मत मनाओ । बाकी खंजड़ी?
च्वांगत्से ने कहा, या तो दुख मनाओ या खंजड़ी बजाओ । दो के बीच में खड़े होने की कोई जगह नहीं है । और दुखी मैं क्यों होऊं? परमात्मा को धन्यवाद दे रहा हूं कि इतने दिन जीवन था -- आश्चर्य! उसने मेरी इतनी सेवा की -- आश्चर्य! उसने मुझे इतना प्रेम दिया -- आश्चर्य! और मैं उसे विदा के क्षण में अगर खंजड़ी बजा कर विदा भी न दे सकूं, तो बहुत अकृतज्ञ! मैं उसे विदा दे रहा हूं । अब वह दूर, धीरे-धीरे दूर होती जाती होगी इस लोक से । मैं उसे विदा दे रहा हूं । मेरी खंजड़ी की आवाज धीमी होती जाती होगी । पर जाते क्षण में मैं उसे आनंद से विदा दे पाऊं ।
एक हम हैं, साथ रह कर भी आनंद से नहीं रह पाते, हम सुखवादी हैं! एक च्वांगत्से है, मृत पत्नी को खंजड़ी बजा कर आनंद की विदा दे रहा है, वह दुखवादी है! तब फिर हमारा दुखवाद-सुखवाद बड़ा अजीब है । कौन दुखवादी है? हम दुखवादी हैं, चौबीस घंटे दुख में रहते हैं । च्वांगत्से परम सुखवादियों में एक है ।
महावीर को कोई पत्थर मार रहा है; महावीर खड़े हैं । हमारे मन में होगा, कैसा कायर आदमी है? पत्थर का जवाब तो और बड़े पत्थर से देना चाहिए । लेकिन महावीर खड़े हैं--किसी कायरता से नहीं, किसी परम शक्ति के कारण । इतनी विराट शक्ति है भीतर कि ये पत्थर लगते नहीं, ये पत्थर चोट नहीं पहुंचा पाते । ये पत्थर भीतर किसी reaction को, किसी प्रतिक्रिया को जन्म नहीं दे पाते । ये पत्थर फेंकने वाला बचकाना है । महावीर इस पर दया से भरे हैं, पूरी करुणा से, कि कैसा पागल है, व्यर्थ मेहनत उठा रहा है ।
हम दो में से एक काम कर सकते हैं: या तो पत्थर का जवाब पत्थर से दें और या भाग खड़े हों । हमें दो के अतिरिक्त तीसरा विकल्प नहीं दिखाई पड़ता । महावीर का विकल्प तीसरा है । न तो वे भागते हैं, न वे पत्थर का जवाब पत्थर से देते हैं । वे पत्थर को लेते ही नहीं । पत्थर उनके भीतर किसी तरह का कोई व्यवधान पैदा नहीं कर पाता । और इससे वे बड़े लाभ में रहते हैं, हानि में नहीं रहते । इससे वे अपनी परम शांति, अपने परम आनंद में प्रतिष्ठित रहते हैं । वे उससे इंच भर यहां-वहां नहीं होते ।
जो उपदेश दे, अनुशासन करे, अनुचित कार्य से रोके, वह सत्पुरुषों का प्रिय होता है और असत्पुरुषों का अप्रिय ।
एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया । वह बैल घंटों ज़ोर-ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं । अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ ।
किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी । जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर रोने लगा और फिर, अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया । सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया.. अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था । जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे-वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।
ध्यान रखें, आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी, जैसे कि आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा, कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा, कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे…
ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है ।
सकारात्मक रहें.. सकारात्मक जीएं !
मुल्ला नसरुद्दीन बहुत से कांच के सामान लेकर घर आ रहा था । कुछ खयाल में था, सब गिर पड़ा, चकनाचूर हो गया। रास्ते पर टुकड़े बिखर गए। मुल्ला खड़े होकर देख रहा है उनको। भीड़ लग गई। लोग भी सकते में हैं कि वह कुछ बोल भी नहीं रहा। कुछ कहता भी नहीं। सब चीजें टूट-फूट कर पड़ी हैं।
फिर मुल्ला ने ऊपर नजर उठाई और उसने कहा, यहां क्यों खड़े हो? क्या तुमने किसी मूरख को पहले नहीं देखा? हम एक मूरख हैं कि हम ये सब चीजें तोड़ कर खड़े हैं;
घर मुल्ला लौटा है खाली हाथ। पत्नी ने कहा कि वह सब सामान? मुल्ला ने कहा, कांच का था, जितनी दूर चला, उतना ही काफी है। घर तक आने का क्या भरोसा की बात कर रही है? जितनी दूर चला, उतना काफी है। सामान ही कांच का था।
नावें बना लेते हैं कागज की और यात्रा पर निकल जाते हैं अनंत सागर की खोज में। हैरानी यह नहीं है कि आप कभी पहुंचते नहीं, हैरानी यह है कि दो-चार कदम भी आपकी नाव चल जाती है। Miracle है! वही तो मुल्ला ने कहा कि इतनी दूर चला, it is enough! वही मैं चकित हुआ, मुल्ला ने कहा, कि इतनी दूर तक कैसे आ गया! कांच का सामान है।
अंगुलियों से जिस तरफ इशारे किए जा सकते हैं, वे क्षुद्र ही हो सकती हैं चीजें। विराट की तरफ अंगुलियों से इशारे नहीं किए जा सकते।
दो मनोवैज्ञानिक का एक ही मकान में दफ्तर था । वे रोज सुबह आते, लिफ्ट में अक्सर साथ-साथ सवार होते। वह जो लिफ्ट को चलाने वाला सेवक था, वह बड़ा हैरान था। जब भी वे दोनों साथ-साथ जाते तो पहले एक मनोवैज्ञानिक उतरता, दसवीं-बारहवीं मंजिल पर कहीं। जब भी वह उतरता, दरवाजे से लौटकर दूसरे मनोवैज्ञानिक के ऊपर थूकता, चला जाता अपनी तरफ; और दूसरा चुपचाप अपना रूमाल निकालकर अपना मुंह पोंछ लेता, टाई पोंछ लेता, या कोट पर पड़ गया होता थूक, पोंछ लेता, रख लेता और अपना बस तैयारी करने लगता, क्योंकि पंद्रहवीं या बीसवीं मंजिल पर उसको उतरना था। आखिर उस लिफ्टमैन को और सम्हालना मुश्किल हो गया।
एक दिन उसने कहा कि यह बात बहुत हुई जा रही है, यह मामला क्या है? यह आदमी क्यों आपके ऊपर थूकता है?
उस मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह उसकी समस्या है, उसी से पूछो। मेरा इसमें कोई हाथ ही नहीं है। यह समस्या उसकी है, उसी से पूछो। बेचारा! जरूर कोई न कोई पागलपन उसे सवार है। मेरा तो कुछ भी नहीं बिगड़ता। पोंछ लेता हूं। उसकी सोचो! असली तकलीफ वही पा रहा है। थूकने के पहले तकलीफ पाता होगा, थूकते वक्त तकलीफ पाता है, पीछे तकलीफ पाता होगा। क्योंकि समस्या उसकी है, वही कुछ कर रहा है। हम तो केवल दर्शक हैं। अगर जीवन को ऐसे देखने की कला आ जाए तो फिर तुम्हें कोई दुख नहीं दे सकता।
परिवर्तन से सावधान, क्योंकि परिवर्तन तेरा बड़ा शत्रु है। यह परिवर्तन लड़कर तुझे तेरे मार्ग से निकाल बाहर करेगा और तुझे संदेह के दुष्ट दल-दल में गाड़ देगा।
मार्गन अमेरिका का बड़ा करोड़पति था, अरबपति था । उससे किसी ने एक दिन पूछा कि आपको जिंदगी में इतनी सफलता कैसे मिली? तो मार्गन ने कहा, मैंने कभी कोई अवसर नहीं खोया। जब भी अवसर आया, मैंने छलांग लगाई और उसे पकड़ा। अपने को खोने को मैं राजी रहा, लेकिन अवसर को खोने को राजी नहीं रहा।
उस आदमी ने पूछा, तो हम कैसे पहचानेंगे कि अवसर आ गया! और जब तक हम पहचानेंगे, तब तक कहीं ऐसा न हो कि अवसर निकल जाए! कहीं ऐसा न हो कि हम पहचानें और छलांग लगाएं, तब तक अवसर जा चुका हो! क्योंकि क्षण तो, क्षण नहीं रुकता। आया नहीं कि गया नहीं। पहचानते-पहचानते चला जाता है। तो आप कैसे पहचानते थे और छलांग लगाते थे?
मार्गन ने जो उत्तर दिया, वह बहुत हैरानी का है। मार्गन ने कहा कि मैं कभी रुका ही नहीं; मैं छलांग लगाता ही रहा। अवसर आ गया तो छलांग काम कर गई, अवसर नहीं आया तो भी मैं छलांग लगाता रहा। क्योंकि इतना मौका नहीं था कि मैं प्रतीक्षा करूं, अवसर को पहचानूं, फिर छलांग लगाऊं। मैं छलांग लगाता ही रहा। अवसर का घोड़ा नीचे आ गया, तो हम सवार थे; लेकिन हमारी छलांग जारी थी, जब घोड़ा नहीं था, तब भी।
जो जागता है वह केवल जीवन को जानता है, उसके लिए मौत जैसी कोई चीज नहीं रह जाती। जो सोता है; वह जीवन को कभी नहीं जान पाता, वह केवल मृत्यु को ही जानता है।
चीन में एक सम्राट ने अपने मुख्य वजीर को, बड़े वजीर को फांसी की सजा दे दी। कुछ नाराजगी थी। लेकिन नियम था उस राज्य का कि फांसी के एक दिन पहले स्वयं सम्राट फांसी पर लटकने वाले कैदी से मिले, और उसकी कोई आखिरी आकांक्षा हो तो पूरी कर दे। निश्चित ही, आखिरी आकांक्षा जीवन को बचाने की नहीं हो सकती थी। वह बंदिश थी। उतनी भर आकांक्षा नहीं हो सकती थी।
सम्राट पहुंचा--कल सुबह फांसी होगी--आज संध्या, और अपने वजीर से पूछा कि क्या तुम्हारी इच्छा है? पूरी करूं! क्योंकि कल तुम्हारा अंतिम दिन है। वजीर एकदम दरवाजे के बाहर की तरफ देखकर रोने लगा। सम्राट ने कहा, तुम और रोते हो? कभी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता, तुम्हारी आंखें और आंसुओं से भरी!
बहुत बहादुर आदमी था। नाराज सम्राट कितना ही हो, उसकी बहादुरी पर कभी शक न था। तुम और रोते हो! क्या मौत से डरते हो? उस वजीर ने कहा, मौत! मौत से नहीं रोता, रोता किसी और बात से हूं। सम्राट ने कहा, बोलो, मैं पूरा कर दूं। वजीर ने कहा, नहीं, वह पूरा नहीं हो सकेगा, इसलिए जाने दें। सम्राट जिद्द पर अड़ गया कि क्यों नहीं हो सकेगा? आखिरी इच्छा मुझे पूरी ही करनी है।
तो उस वजीर ने कहा, नहीं मानते हैं तो सुन लें, कि आप जिस घोड़े पर बैठकर आए हैं, उसे देखकर रोता हूं। सम्राट ने कहा, पागल हो गए? उस घोड़े को देखकर रोने जैसा क्या है? वजीर ने कहा, मैंने एक कला सीखी थी; तीस वर्ष लगाए उस कला को सीखने में। वह कला थी कि घोड़ों को आकाश में उड़ना सिखाया जा सकता है, लेकिन एक विशेष जाति के घोड़े को। उसे खोजता रहा, वह नहीं मिला। और कल सुबह मैं मर रहा हूं, जो सामने घोड़ा खड़ा है, वह उसी जाति का है, जिस पर आप सवार होकर आए हैं।
सम्राट के मन को लोभ पकड़ा। आकाश में घोड़ा उड़ सके, तो उस सम्राट की कीर्ति का कोई अंत न रहे पृथ्वी पर। उसने कहा, फिक्र छोड़ो मौत की! कितने दिन लगेंगे, घोड़ा आकाश में उड़ना सीख सके? कितना समय लगेगा? उस वजीर ने कहा, एक वर्ष। सम्राट ने कहा, बहुत ज्यादा समय नहीं है। अगर घोड़ा उड़ सका तो ठीक, अन्यथा मौत एक साल बाद। फांसी एक साल बाद भी लग सकती है, अगर घोड़ा नहीं उड़ा। अगर उड़ा तो फांसी से भी बच जाओगे, आधा राज्य भी तुम्हें भेंट कर दूंगा।
वजीर घोड़े पर बैठकर घर आ गया। पत्नी-बच्चे रो रहे थे, बिलख रहे थे। आखिरी रात थी। घर आए वजीर को देखकर सब चकित हुए। कहा, कैसे आ गए? वजीर ने कहानी बताई। पत्नी और जोर से रोने लगी। उसने कहा, तुम पागल तो नहीं हो? क्योंकि मैं भलीभांति जानती हूं, तुम कोई कला नहीं जानते, जिससे घोड़ा उड़ना सीख सके। व्यर्थ ही झूठ बोले। अब यह साल तो हमें मौत से भी बदतर हो जाएगा। और अगर मांगा ही था समय, तो इतनी कंजूसी क्या की? बीस, पच्चीस, तीस वर्ष मांग सकते थे! एक वर्ष तो ऐसे चुक जाएगा कि अभी आया अभी गया, रोते-रोते चुक जाएगा।
उस वजीर ने कहा, फिक्र मत कर; एक वर्ष बहुत लंबी बात है। शायद, शायद बुद्धिमानी के बुनियादी सूत्र का उसे पता था। और ऐसा ही हुआ। वर्ष बड़ा लंबा शुरू हुआ। पत्नी ने कहा, कैसा लंबा! अभी चुक जाएगा। वजीर ने कहा, क्या भरोसा है कि मैं बचूं वर्ष में? क्या भरोसा है, घोड़ा बचे? क्या भरोसा है, राजा बचे? बहुत-सी conditions पूरी हों, तब वर्ष पूरा होगा। और ऐसा हुआ कि न वजीर बचा, न घोड़ा बचा, न राजा बचा। वह वर्ष के पहले तीनों ही मर गए।
कल की कोई भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। फल सदा कल है, फल सदा भविष्य में है। कर्म सदा अभी है, यहीं। कर्म किया जा सकता है। कर्म वर्तमान है, फल भविष्य है। इसलिए भविष्य के लिए आशा बांधनी, निराशा बांधनी है।
जीसस -- जो बचाएगा, उससे छीन लिया जाएगा। जो दे देगा, उसे सब कुछ दे दिया जाएगा। जो अपने को बचाता है, व्यर्थ ही अपने को खोता है। क्योंकि उसे परमात्मा के गणित का पता नहीं है। जो अपने को खोता है, वह पूरे परमात्मा को ही पा लेता है।
बुद्ध एक गांव से निकलते। कुछ लोग गाली देते। वे हंसकर आगे बढ़ जाते। फिर कोई भिक्षु उनसे पूछता, उन्होंने गाली दी, आपने उत्तर नहीं दिए? बुद्ध कहते, कभी मैंने उनको गाली दी होंगी, वे उत्तर दे गए हैं। अब और आगे का सिलसिला क्या जारी रखना! जरूर मैंने उन्हें कभी गाली दी होंगी, नहीं तो वे क्यों कष्ट करते? अकारण तो कुछ भी घटित नहीं होता है। कभी मैंने गाली दी होंगी, उत्तर बाकी रह गया था, अब वे उत्तर दे गए हैं। अब मैं उनको फिर गाली दूं, फिर आगे का सिलसिला होता है। सौदा पट गया। लेन-देन हो गया। अब मैं खुश हूं। अब आगे उनसे कुछ लेना-देना न रहा। अब मैं आगे चलता हूं।
एक बार मौन में घिर हो जाओ, फिर तुम्हारी वाणी में भी एक सुगंध आ जाएगी।
यहूदियों की अदभुत किताब तालमुद कहती है, परमात्मा तुमसे यह न पूछेगा कि तुमने कौन-कौन सी भूलें कीं? परमात्मा तुमसे यही पूछेगा कि तुमने आनंद के कौन-कौन से अवसर गंवाए? तुमसे यह न पूछेगा, तुमने कौन-कौन से पाप किए? यह बात मुझे बड़ी जंचती है। परमात्मा और पाप का हिसाब रखे, बात ही ठीक नहीं। परमात्मा और पापों का हिसाब रखे! परमात्मा न हुआ तुम्हारा प्राइवेट सेक्रेटरी हो गया। कोई पुलिस का इंस्पेक्टर हो गया। कोई अदालत का मजिस्ट्रेट हो गया। परमात्मा न हुआ कोई आलोचक हो गया, कोई निंदक हो गया। परमात्मा की इतनी बड़ी आंखों में तुम्हारे पाप दिखाई पड़ेंगे? तुम्हारी भूलें दिखाई पड़ेगी?
नहीं, तालमुद ठीक कहता है, परमात्मा पूछेगा कि इतने सुख के अवसर दिए उनको गंवाया क्यों? इतने नाचने के मौके थे, तुम बैठे क्यों रहे? इतने कंजूस क्यों थे? इतने कृपण क्यों थे? मैंने तुम्हें इतना दिया था, तुमने उसे बांटा होता। तुमने उसे बहाया होता। तुम एक बंद सरोवर की तरह क्यों रहे? तुम बहती हुई सरिता क्यों न बने? तुम कृपण वृक्ष की तरह रहे कि जिसने फूलों को न खिलने दिया कि कहीं सुगंध बंट न जाए! तुम एक खदान की तरह रहे जो अपने हीरों को दबाए रही, कहीं सूरज की रोशनी न लग जाए!
जब ध्यान बोलता है, जब ध्यान की वीणा पर संगीत उठता है, जब मौन मुखर होता है, तब शास्त्र निर्मित होते हैं।
चीन में कहानी है कि एक आदमी वर्षों तक सोचता था कि पास में एक पहाड़ पर तीर्थस्थान था, वहां जाना है। लेकिन कोई तीन-चार घंटे की यात्रा थी, दस-पंद्रह मील का फासला था-वर्षों तक सोचता रहा। पास ही था, नीचे घाटी में ही रहता था, हजारों यात्री वहां से गुजरते थे, लेकिन वह सोचता था पास ही तो हूं, कभी भी चला जाऊंगा।
बूढ़ा हो गया। तब एक दिन एक यात्री ने उससे पूछा कि भाई, तुम भी कभी हो आओ? उसने कहा कि मैं सोचता ही रहा, सोचा इतना पास हूं कभी भी चला जाऊंगा। लेकिन अब देर हो गई, अब मुझे जाना ही चाहिए। उठा, उसने दुकान बंद की। सांझ हो रही थी। पत्नी ने पूछा, कहां जाते हो? उसने कहा मैं, अब तो यह मरने का वक्त आ गया, और मैं यही सोचता रहा इतने पास है, कभी भी चला जाऊंगा, और मैं इन यात्रियों को ही जो तीर्थयात्रा पर जाते हैं सौदा-सामान बेचता रहा। जिंदगी मेरी यात्रियों के ही साथ बीती-आने-जाने वालों के साथ। वे खबरें लाते, मंदिर के शिखरों की चर्चा करते, शांति की चर्चा करते, पहाड़ के सौंदर्य की बात करते, और मैं सोचता कि कभी भी चला जाऊंगा, पास ही तो है। दूर-दूर के लोग यात्रा कर गए, मैं पास रहा रह गया। मैं जाता हूं।
कभी यात्रा पर गया न था। सिर्फ यात्रा की बातें सुनी थीं। सामान बाँधा, तैयारी की रातभर-पता था कि तीन बजे रात निकल जाना चाहिए, ताकि सुबह-सुबह ठंडे-ठंडे पहुंच जाए। लालटेन जलाई। क्योंकि देखा था कि यात्री बोरिया-बिस्तर भी रखते हैं, लालटेन भी लेकर जाते हैं। लालटेन लेकर गांव के बाहर पहुंचा तब उसे एक बात खयाल आई कि लालटेन का प्रकाश तो चार कदम से ज्यादा पड़ता नहीं। पंद्रह मील का फासला है। चार कदम तक पड़ने वाली रोशनी साथ है। यह पंद्रह मील की यात्रा कैसे पूरी होगी? घबड़ाकर बैठ गया। हिसाब लगाया। दुकानदार था, हिसाब-किताब जानता था। चार कदम पड़ती है रोशनी, पंद्रह मील का फासला है। इतनी सी रोशनी से कहीं जाना हो सकता है? घबड़ा गया। हिसाब बहुतों को घबड़ा देता है।
अगर तुम परमात्मा का हिसाब लगाओगे, घबड़ा जाओगे। कितना फासला है। कहाँ तुम, कहाँ परमात्मा! कहाँ तुम, कहाँ मोक्ष! कहाँ तुम्हारा कारागृह और कहाँ मुक्ति का आकाश! बहुत दूर है। तुम घबड़ा जाओगे, पैर कंप जाएंगे। बैठ जाओगे, आश्वासन खो जाएगा, भरोसा टूट जाएगा। पहुंच सकते हो, यह बात ही मन में न समाएगी ।
उसके पैर डगमगा गए। वह बैठ गया। कभी गया न था, कभी चला न था, यात्रा न की थी। सिर्फ लोगों को देखा था आते-जाते। उनकी नकल कर रहा था, तो लालटेन भी ले आया था, सामान भी ले आया था। कहते हैं, पास से फिर एक यात्री गुजरा और उसने पूछा कि तुम यहां क्या कर रहे हो? उस आदमी ने कहा, मैं बड़ी मुसीबत में हूं। इतनी सी रोशनी से इतने दूर का रास्ता! पंद्रह मील का अंधकार, चार कदम पड़ने वाली रोशनी! हिसाब तो करो! उस आदमी ने कहा, हिसाब-किताब की जरूरत नहीं। उठो और चलो। मैं कोई गणित नहीं जानता, लेकिन इस रास्ते पर बहुत बार आया-गया हूं। और तुम्हारी लालटेन तो मेरी लालटेन से बड़ी है। तुम मेरी लालटेन देखो-वह बहुत छोटी सी लालटेन लिए हुए था, जिससे एक कदम मुश्किल से रोशनी पड़ती थी-इससे भी यात्रा हो जाती है। क्योंकि जब तुम एक कदम चल लेते हो, तो आगे एक कदम फिर रोशन हो जाता है। फिर एक कदम चल लेते हो, फिर एक कदम रोशन हो जाता है।
जिनको चलना है, हिसाब उनके लिए नहीं है। जिनको नहीं चलना है, हिसाब उनकी तरकीब है। जिनको चलना है, वे चल पड़ते हैं। छोटी सी रोशनी पहुंचा देती है। जिनको नहीं चलना है, वे बड़े अंधकार का हिसाब लगाते हैं। वह अंधकार घबड़ा देता है। पैर डगमगा जाते हैं।
आज यह दुनिया इतनी युद्ध, इतनी हिंसा, इतनी घृणा, इतने वैमनस्य से भरी हुई है, इसके लिए कौन जिम्मेवार है? इसके लिए वे लोग जिम्मेवार हैं, जिन्होंने परमात्मा का अनुसंधान छोड़ दिया है। इसके लिए वे लोग जिम्मेवार हैं, जिन्होंने अंतरात्मा का अनुसंधान छोड़ दिया है। क्योंकि मेरा मानना यह है, और मैं समझता हूं यह बात आपकी समझ में आ सकेगी, कि जो व्यक्ति अपने भीतर आनंद से भरा हुआ नहीं होगा, वह व्यक्ति दूसरों को दुख देने में आनंद लेने लगता है। जो व्यक्ति अपने भीतर आनंद से भरा हुआ नहीं होता, वह व्यक्ति दूसरे लोगों को दुख देने में आनंद लेने लगता है। यह दुनिया इतनी दुखी है, क्योंकि इतने दुखी लोग हैं, आनंद-शून्य और रहित, कि उनका एक ही आनंद रह गया है कि वे दूसरों को पीड़ित करें, परेशान करें, दुखी करें। जब वे दूसरे को दुखी देखते हैं तो उन्हें अपने सुखी होने का थोड़ा सा भ्रम पैदा होता है। और अगर ऐसा होता रहा, तो युद्ध बढ़ते जाएंगे, हमारे हाथ एक-दूसरे के गले पर कसते जाएंगे, और हमारे हृदय कठोर और पत्थर होते जाएंगे। और शायद इसका अंतिम परिणाम यह हो कि हम सारे मनुष्य को समाप्त कर लें। हम उसकी तैयारी में हैं।
भूल वह है, जिसमें व्यक्ति जिम्मेवार होता है, खुद की ही कुछ गलती से कर जाता है।
ब्लावट्स्की सारी दुनिया में यात्रा की। वह भारत थी, और दूसरे मुल्कों में थी। लोग उसे हमेशा देख कर हैरान हुए। वह एक झोला अपने साथ रखती थी और जब गाड़ियों में बैठती, तो उसमें से कुछ निकाल कर बाहर फेंकती रहती। लोग उससे पूछे कि यह क्या है? उसने कहा, कुछ फूलों के बीज हैं। अभी वर्षा आएगी, फूल खिलेंगे, पौधे निकल आएंगे। लोगों ने कहा, लेकिन तुम इस रास्ते पर दुबारा निकलोगी, इसका तो कुछ पता नहीं। उसने कहा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फूल खिलेंगे, कोई उन फूलों को देख कर आनंदित होगा, यह मेरे लिए काफी आनंद है। उसने कहा, जीवन भर बस एक ही कोशिश की; जब से मुझे फूल मिले हैं, तब से फूल सबको बांट दूं, बस यही चेष्टा रही है। और जिस व्यक्ति को भी फूल मिल जाएंगे, वह उनको बांटने के लिए उत्सुक हो जाएगा। आखिर बुद्ध या महावीर क्या बांट रहे हैं? चालीस वर्ष तक बुद्ध जीवित रहे। क्या बांट रहे हैं? किस चीज को बांटने के लिए भाग रहे हैं और दौड़ रहे हैं? कोई आनंद उपलब्ध हुआ है, उसे बांटना जरूरी है।
भ्रांति वह है, जिसमें जाति, मनुष्य जैसा है, वही जिम्मेवार होती है। मनुष्य के होने का ढंग ही जिम्मेवार होता है।
बुद्ध मरने के करीब हैं। जीवन का दीया बुझने के करीब है। शरीर छूटने को है। और एक भिक्षु बुद्ध से पूछता है, बहुत पीड़ा हो रही है। भिक्षु कहता है, बहुत मन दुखी हो रहा है। थोड़े ही क्षणों बाद आप नहीं होंगे! बुद्ध कहते हैं, जो नहीं था, वही नहीं हो जाएगा। जो था, वह रहेगा। मृत्यु आ रही है। बुद्ध कहते हैं, जो नहीं था, वही नहीं हो जाएगा। इसलिए तुम व्यर्थ दुखी मत हो जाओ। क्योंकि मृत्यु उसे ही मिटा सकती है, जो नहीं था; जिसे हमने सोचा भर था कि है। स्वप्न था जो। हमारी धारणा मात्र थी, अस्तित्व नहीं था जिसका। विचार मात्र था, वस्तु-जगत में जिसकी कोई संभावना भी न थी, वही मिट जाएगा। जो नहीं था, वही मिट जाएगा; वह था ही नहीं। और जो था, उसके मिटने का कोई उपाय नहीं है। जो है, वह रहेगा।
जब भी हमें कोई बुरा दिखाई पड़ता है, हम बड़े हो जाते हैं। जब भी हमें कोई भला दिखाई पड़ता है, हम छोटे हो जाते हैं।
विल्मा रुडोल्फ का जन्म अमेरिका के टेनेसी प्रान्त के एक गरीब घर में हुआ था । चार साल की उम्र में विल्मा रूडोल्फ को पोलियो हो गया और वह विकलांग हो गई । विल्मा रूडोल्फ केलिपर्स के सहारे चलती थी। डाक्टरों ने हार मान ली और कह दिया कि वह कभी भी जमीन पर चल नहीं पायेगी।
विल्मा रूडोल्फ की मां सकारात्मक मनोवृत्ति महिला थी और उन्होंने विल्मा को प्रेरित किया और कहा कि तुम कुछ भी कर सकती हो इस संसार में नामुनकिन कुछ भी नहीं।
विल्मा ने अपनी माँ से कहा 'क्या मैं दुनिया की सबसे तेज धावक बन सकती हूं ?' माँ ने विल्मा से कहा कि ईश्वर पर विश्वास, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो वह प्राप्त कर सकती हो।
नौ साल की उम्र में उसने जिद करके अपने ब्रेस निकलवा दिए और चलना प्रारम्भ किया। केलिपर्स उतार देने के बाद चलने के प्रयास में वह कई बार चोटिल हुयी एंव दर्द सहन करती रही लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी एंव लगातार कोशिश करती गयी । आखिर में जीत उसी की हुयी और एक-दो वर्ष बाद वह बिना किसी सहारे के चलने में कामयाब हो गई।
उसने 13 वर्ष की उम्र में अपनी पहली दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और सबसे अंतिम स्थान पर आई। लेकिन उसने हार नहीं मानी और और लगातार दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती गयी । कई बार हारने के बावजूद वह पीछे नहीं हटी और कोशिश करती गयी । और आखिरकार एक ऐसा दिन भी आया जब उसने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया।
15 वर्ष की अवस्था में उसने टेनेसी राज्य विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ उसे कोच एड टेम्पल मिले। विल्मा ने टेम्पल को अपनी इच्छा बताई और कहा कि वह सबसे तेज धाविका बनना चाहती है । कोच ने उससे कहा - 'तुम्हारी इसी इच्छाशक्ति की वजह से कोई भी तुम्हे रोक नहीं सकता और मैं इसमें तुम्हारी मदद करूँगा'।
विल्मा ने लगातार कड़ी मेहनत की एंव आख़िरकार उसे ओलम्पिक में भाग लेने का मौका मिल ही गया । विल्मा का सामना एक ऐसी धाविका (जुत्ता हेन) से हुआ जिसे अभी तक कोई नहीं हरा सका था।
पहली रेस 100 मीटर की थी जिसमे विल्मा ने जुता को हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया एंव दूसरी रेस (200 मीटर) में भी विल्मा के सामने जुता ही थी इसमें भी विल्मा ने जुता को हरा दिया और दूसरा स्वर्ण पदक जीत लिया। तीसरी दौड़ 400 मीटर की रिले रेस थी और विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुत्ता से ही था। रिले में रेस का आखिरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथलीट ही दौड़ता है। विल्मा की टीम के तीन लोग रिले रेस के शुरूआती तीन हिस्से में दौड़े और आसानी से बेटन बदली। जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई, उससे बेटन छूट गयी। लेकिन विल्मा ने देख लिया कि दुसरे छोर पर जुत्ता हेन तेजी से दौड़ी चली आ रही है। विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठायी और मशीन की तरह तेजी से दौड़ी तथा जुत्ता को तीसरी बार भी हराया और अपना तीसरा गोल्ड मेडल जीता। इस तरह एक विकलांग महिला (जिसे डॉक्टरों ने कह दिया था कि वह कभी चल नहीं पायेगी) विश्व की सबसे तेज धाविका बन गयी और यह साबित कर दिया की इस दुनिया में नामुनकिन कुछ भी नहीं।
अगर आप सच देखना चाहते हैं तो ना सहमती और ना असहमति में राय रखिये ।
एक सूफी फकीर औरत हुई राबिया। वह किसी में कुछ बुरा नहीं देखती थी। वही तो संत का लक्षण है! वह कांटे को भी देखती तो उसकी प्रशंसा में गीत ही उससे निकलता। उसके मित्र, उसके शिष्य और दूसरे फकीर बड़े परेशान थे। कैसी ही बुरी बात हो, उसमें कुछ न कुछ फूल का खिलना वह देख ही लेती थी। एक दिन एक फकीर हसन ने कहा कि राबिया, सब तरह की खबरें हम तेरे पास लाते हैं। तू कुछ न कुछ अच्छा देख लेती है। क्या तुझे शैतान में भी कुछ अच्छा दिखाई पड़ता है?
राबिया का चेहरा ऐसे प्रसन्नता से भर गया जैसे शैतान का नहीं, परमात्मा का नाम लिया गया हो। और राबिया ने कहा, 'धन्यवाद शैतान का। क्योंकि न वह मेरी वासना को उकसाता और न मुझमें कभी संयम का जन्म होता। न वह मुझे चुनौती देता और न मैंने परमात्मा तक यात्रा की होती। धन्यवाद शैतान का! और यह तो हसन तुम्हें भी मानना पड़ेगा कि कुछ गुण शैतान में हैं, जो संतों में भी नहीं होते।'
हसन ने कहा, 'कौन से गुण? सुने नहीं कभी। किसी शास्त्र में लिखे नहीं।'
तो राबिया ने कहा, 'देखो असंभव में लगा है शैतान, परमात्मा को हराने में। इससे बड़ी असंभव बात क्या होगी? लेकिन हताश नहीं होता। तुम परमात्मा को पाने में लगे हो, जिससे सरल कोई बात नहीं हो सकती; फिर भी हार-हार जाते हो और हताश हो जाते हो। धैर्य तो मानना पड़ेगा शैतान का। सीखना हो तो उससे सीखना चाहिए। अनंतकाल से परमात्मा को हराने में लगा है, जो कि हो ही नहीं सकता। और तुम परमात्मा को पाने में लगे हो, जो कि होना ही चाहिए इसी क्षण! क्योंकि परमात्मा स्वभाव है; उसे पाने में क्या दिक्कत है? वह तुम्हारे भीतर छिपा है। एक कदम भी तो नहीं उठाना; बस, जरा आंख खोलनी है। और तुम उसमें भी हार जाते हो, थक जाते हो। और शैतान स्वभाव को हराने में लगा है जो हो ही नहीं सकता। क्योंकि अगर स्वभाव हार जाये, तो फिर जीतेगा क्या? स्वभाव का तो अर्थ है, जो शाश्वत नियम है। उसके विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता। असंभव में लगा है। लेकिन उसका धैर्य, उसकी लगन, उसका श्रम, सीखने जैसा है।' राबिया ने कहा, 'मैं तो परमात्मा तक पहुंची शैतान से सीख-सीख कर। और जिस दिन मैंने परमात्मा को पाया, मैंने पहला धन्यवाद शैतान को दिया। उसके सहारे के बिना यह यात्रा नहीं हो सकती थी।'
तुम्हें परमात्मा भी मिल जाये तो तुम शिकायत लेकर खड़े हो जाओगे। तुम्हारे मन में फेहरिश्त (list) होगी शिकायतों की, कि अगर कभी परमात्मा मिल जाये तो यह पूरी फेहरिश्त सामने रख देंगे। शायद इसी डर से वह तुम्हें मिलता भी नहीं।
बुद्ध एक गांव से गुजरे हैं। लोगों ने गालियां दी हैं। और उन्होंने कहा कि ठीक, तुम्हें जो करना था, तुमने किया; अब मैं जाऊं? मुझे दूसरे गांव जल्दी पहुंचना है। पर उन्होंने कहा, हमने जो गालियां दी हैं, उनका क्या? तो बुद्ध बहुत हंसने लगे। उन्होंने कहा, तुम थोड़ी देर से आए। दस वर्ष पहले आना था, तब मैं था। तब तुम्हारी गालियों के उत्तर मुझसे निकलते। अब कौन उत्तर दे? तुम गालियां देते हो, यहां भीतर सन्नाटा है। वहां उत्तर देने वाला अब नहीं है।
दृष्टि उधार नहीं पायी जा सकती। दृष्टि के लिए स्वयं को निखारना जरूरी है।
सिकंदर विश्व-विजय पर जाने से पहले यूनान के एक बड़े फकीर डायोजनीज से मिलने गया था। डायोजनीज नग्न, नदी के तट पर सुबह की धूप ले रहा था। सिकंदर ने जाकर कहा, डायोजनीज, तुम धन्यभागी समझो अपने को! महान सिकंदर तुमसे मिलने आया है!
डायोजनीज हंसने लगा और उसने कहा, जो स्वयं को महान कहता हो, वह पागल है। और मैंने तुझ जैसा दीन-दरिद्र आदमी पहले नहीं देखा। यह महान होने का दावा आंतरिक हीनता को छिपाने के लिए ही किया जाता है। ये आभूषण, ये वस्त्र, यह नंगी तलवार, यह काफिला, यह फौज-फाटा, यह सब दिखावा है। भीतर तू बिलकुल खाली है। लाख उपाय कर, ऐसे तू भरेगा नहीं।
डायोजनीज ने पूछा, कहां जा रहे हो?
सिकंदर ने कहा, एशिया मायनर जीतना है।
डायोजनीज ने पूछा, फिर क्या करोगे? और डायोजनीज लेटा था नदी की रेत में। सर्दी की ऐसी ही सुबह रही होगी, धूप ले रहा था। वह लेटा ही रहा, वह उठ कर बैठा भी नहीं। फिर क्या करोगे?
सिकंदर ने कहा, फिर भारत जीतना है।
डायोजनीज ने कहा, फिर?
सिकंदर ने कहा कि फिर और जो थोड़ी-बहुत दुनिया बचेगी, वह जीत लेनी है।
डायोजनीज ने कहा, और फिर?
सिकंदर ने कहा, फिर क्या, फिर आराम करेंगे।
डायोजनीज हंसने लगा, उसने कहा, आराम तो हम अभी कर रहे हैं। तुम तब करोगे? अगर आराम ही करना है, अगर आखिर में आराम ही करना है, तो इतनी दौड़-धूप किसलिए? आराम, देखो हम अभी कर रहे हैं। वह लेटा ही था। और इस नदी के तट पर बहुत जगह है, कोई ऐसा भी नहीं कि जगह की कमी है, तुम भी आराम कर सकते हो, कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं है।
बात तो सिकंदर को समझ में पड़ी। इतनी चोट से कही गई थी, इतने बलपूर्वक कही गई थी--और जिस आदमी ने कही थी, उसकी मस्ती साफ थी, उसकी मालकियत साफ थी! सिकंदर शर्म से झुक गया और उसने कहा कि मानता हूं डायोजनीज, तुम अकेले आदमी हो जिसके सामने मुझे अपनी दीनता अनुभव होती है। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं, फिर तुम्हारे पास क्या है जिसके कारण मैं अचानक दीन मालूम हो रहा हूं? मेरे पास सब कुछ है!
डायोजनीज ने कहा, सब कुछ है तेरे पास, लेकिन और की चाह है, इसलिए तू भिखारी है। मेरे पास कुछ भी नहीं है, लेकिन और की चाह नहीं है, इसलिए मैं सम्राट हूं। और देख, जिंदगी हाथ से बीती जाती है, और मत गंवा!
सिकंदर ने कहा, मिल कर खुशी हुई। और अगर दोबारा ईश्वर ने मुझे जन्म दिया तो कहूंगा उससे--इस बार सिकंदर न बना, इस बार डायोजनीज बना।
डायोजनीज खिलखिला कर हंसने लगा और उसने कहा, पागल हो तुम! अरे अभी डायोजनीज क्यों नहीं हो जाते? अगले जन्म में क्या भरोसा, याद रख सको कि भूल जाओ! फिर परमात्मा राजी हो, न राजी हो। अगला जन्म हो या न हो। कल का भरोसा नहीं, तुम अगले जन्म पर टाल रहे हो! अगर बात जंचती है तो आओ लेट जाओ तुम भी नग्न इस नदी के तट पर। यह तट बड़ा है, हम दोनों के लिए बहुत बड़ा है। कोई झगड़ा नहीं, तुम भी विश्राम करो। खूब दौड़े-धूपे, खूब आपा-धापी की! आओ हम विश्राम करें! अगर मैं तुम्हारे मन भा गया हूं तो अभी हो जाओ डायोजनीज, कौन रोकता है? सिकंदर होना हो तो मुश्किल मामला है; लेकिन डायोजनीज होना हो तो बिलकुल सरल, क्योंकि स्वाभाविक। फेंक दो ये वस्त्र! कह दो फौजों से: नमस्कार! वापस लौट जाओ! मेरी विजययात्रा समाप्त हो गई। मुझे जहां आना था वहां आ गया।
सिकंदर ने कहा, यह मुश्किल है, आज मुश्किल है, अभी मुश्किल है।
डायोजनीज ने कहा, अगर आज मुश्किल है, अभी मुश्किल है, तो सदा मुश्किल रहेगा। जो आज हो सकता है, उसे कल पर मत टालो। और जो कल पर टालता है, वह सदा के लिए टाल देता है। फिर तुम्हारी मर्जी।
सिकंदर ने कहा, मैं बहुत खुश हुआ हूं मिल कर, बहुत प्रभावित हुआ हूं। मैं आपकी कुछ सेवा कर सकता हूं?
डायोजनीज ने कहा, क्या मांगूं, मेरी कोई मांग नहीं! क्या चाहूं, मेरी कोई चाह नहीं! लेकिन अगर तुम कुछ करना ही चाहते हो तो तुम्हें मैं निराश भी नहीं भेजूंगा। तुम जरा हट कर खड़े हो जाओ, क्योंकि तुमने धूप रोक रखी है।...धन्यवाद कि तुमने मेरी सुनी और हट कर खड़े हो गए। और स्मरण रखना, जिंदगी में किसी की धूप रोक कर खड़े मत होना।
चोट खाकर लौटा सिकंदर, भयंकर चोट खाकर लौटा! चलते वक्त कह कर आया था डायोजनीज से कि जब लौट कर आ जाऊंगा, यात्रा पूरी करके, तो इसी जीवन में तुम्हारे जैसा ही जीऊंगा। डायोजनीज ने कहा, ऐसी यात्राओं से कोई कभी लौटता नहीं। ये यात्राएं वासना की इतनी लंबी हैं, इनका कोई अंत नहीं। वासना कभी पूरी होती है? वासना दुष्पूर है। तृष्णा कभी भरती नहीं। एक तृष्णा मिटती नहीं कि दस पैदा हो जाती हैं। तुम लौट न सकोगे। कोई कभी नहीं लौटा। यह यात्रा कभी पूरी ही नहीं होती। समझदार बीच में ही रुक जाते हैं, पूरी करने की चिंता नहीं करते। नासमझ कहते हैं: पूरी करेंगे यात्रा, फिर रुकेंगे। यात्रा ऐसी है कि पूरी होती ही नहीं। मौत पहले आ जाती है, यात्रा का अंत नहीं आता।
और यही हुआ, सिकंदर लौटते वक्त बीच में ही मर गया, घर वापस नहीं पहुंच पाया।
संयोग की बात, सिकंदर और डायोजनीज एक ही दिन मरे। सिकंदर जरा जल्दी, कोई घड़ी भर पहले; और डायोजनीज, कोई घड़ी भर बाद।
यह प्यारी कहानी है। सिकंदर वैतरणी पार कर रहा है, स्वर्ग जा रहा है। उसने पीछे किसी के आने की खड़बड़-खड़बड़ की आवाज सुनी। लौट कर देखा--डायोजनीज! एक क्षण को तो खुश हुआ और एक क्षण को उदास भी, क्योंकि वह डायोजनीज फिर हंसेगा खिलखिला कर और वह कहेगा: कहा था न मैंने कि इस यात्रा को तुम पूरा न कर पाओगे? मर गए न आखिर मध्य में!
और इसलिए भी मन में उसके बड़ी शर्म आ गई कि डायोजनीज तो नंगा था; जिंदगी में भी नंगा था, अब भी नंगा था; सिकंदर जिंदगी भर सुंदर-सुंदर वस्त्रों में ढंका रहा, आज नंगा था। अब छिपाए अपने नंगेपन को सो कैसे छिपाए? बड़ी लाज लगी, बड़ी संकोच की दशा पैदा हो गई। छिपाने को लाज को, दबाने को संकोच को--इसके पहले कि डायोजनीज हंसे, सिकंदर हंसा। हंसी झूठी थी, खोखली थी। और हंस कर उसने डायोजनीज को कहा, कैसा अपूर्व संयोग है, एक सम्राट और एक फकीर का फिर से मिलना हो रहा है!
डायोजनीज ने कहा, बात तुम ठीक कहते हो, लेकिन जरा समझने में भूल करते हो कि सम्राट कौन है और फकीर कौन है। सम्राट पीछे है, फकीर आगे है। फकीर तुम हो। तुम सब गंवा कर लौट रहे हो, मैं सब कमा कर लौट रहा हूं। क्योंकि तुम्हारी जिंदगी चाह की जिंदगी थी और मेरी जिंदगी आनंद की जिंदगी थी, चाह की नहीं; संतोष की, तृप्ति की।
कभी-कभी सच को झूठ की भाषा उपयोग करनी पड़ती है, क्योंकि सच की कोई भाषा नहीं है। सच शून्य है, निःशब्द है।
एक फकीर था, मुसलमान फकीर, हसन। वह एक छोटे-से झोपड़े में रहता था। उस झोपड़े में इतनी थोड़ी जगह थी कि हसन और उसकी पत्नी, बस दो ही सो पाते थे। रात सोए थे, वर्षा की रात थी, अंधेरी रात थी। कोई आधी रात किसी आदमी ने आकर दरवाजा खटखटाया। हसन ने अपनी पत्नी से कहा, दरवाजा खोल! मालूम होता है कोई भटक गया राहगीर है। उसकी पत्नी ने कहा, देखते नहीं हैं, यहां जगह कहां है दो से ज्यादा के लिए!
हसन ने कहा -- पागल, यह कोई अमीर का महल नहीं है कि जगह कम पड़ जाए। यह गरीब की झोपड़ी है। अमीर के महल छोटे होते हैं, गरीब की झोपड़ी तो बड़ी होती है। अभी हम दो लेटे थे, अब हम तीन बैठेंगे। जगह काफी हो जाएगी। दरवाजा खोल। द्वार आया हुआ आदमी वापस लौट जाए?
दरवाजा खोल दिया। वह आदमी आकर बैठ गया। वे दोनों उठ कर बैठ गए, तीनों बैठ कर गप-शप करने लगे। दरवाजा अटका है। फिर दो आदमी आए और दरवाजा खटखटाया। हसन ने द्वार पर खड़े आदमी से कहा -- दरवाजा खोल मित्र जल्दी। उस आदमी ने कहा, आप कहते क्या हैं! यहां जगह बहुत कम है। उसने कहा कि जगह कम है? अगर जगह कम होती तो तू अंदर कैसे आ पाता? जगह यहां बहुत ज्यादा है। उस आदमी ने कहा -- देखते नहीं हो, मुश्किल से हम तीन बैठे हुए हैं! हसन ने कहा -- अभी हम बैठे हैं, फिर हम खड़े हो जाएंगे। लेकिन यह गरीब की झोपड़ी है, इसमें जगह कभी कम होती ही नहीं।
दरवाजा खोल देना पड़ा, वे दो आदमी भीतर आ गए। वे पांचों खड़े होकर बातचीत करने लगे। और तभी वर्षा में भीगे हुए एक गधे ने आकर द्वार खटखटाया, सिर मारा। हसन ने द्वार पर खड़े आदमी से कहा, मित्र, दरवाजा खोल, कोई अतिथि आया है। उसने कहा, कोई अतिथि नहीं है, यह गधा है।
उसने कहा, तुझे पता नहीं है, यह गरीब आदमी का झोपड़ा है, यहां गधे के साथ भी आदमी जैसा व्यवहार होता है। अमीर के महल पर आदमी से भी गधे जैसा व्यवहार होता है। यह तो गरीब का झोपड़ा है, यहां तो हम गधे से भी आदमी जैसा व्यवहार करते हैं। अमीर के मकान की बात अलग है, वहां तो आदमी से भी गधे जैसा व्यवहार होता है। दरवाजा खोल! अभी हम दूर-दूर खड़े हैं, अब हम पास-पास खड़े हो जाएंगे। लेकिन यह गरीब की झोपड़ी छोटी नहीं पड़ सकती है। अगर बहुत जरूरत पड़ी तो मैं अलग हो जाऊंगा, मेरी पत्नी बाहर हो जाएगी। लेकिन जब तक हमसे हो सकेगा, हम इसे बड़ा करते रहेंगे।
गोधन, गजधन, बाजधन और रतन धन खान ।
जब आवे संतोष धन, सबधन धूरि समान ॥
स्वामी राम जापान गए। जिस जहाज पर वह थे, एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था। अब चीनी भाषा सीखनी बहुत कठिन बात है। शायद मनुष्य की जितनी भाषाएं हैं, उनमें सबसे ज्यादा कठिन बात है। क्योंकि चीनी भाषा के कोई वर्णाक्षर नहीं होते, कोई क ख ग नहीं होता। वह तो चित्रों की भाषा है। इतने चित्रों को सीखना नब्बे वर्ष की उम्र में! अंदाजन किसी भी आदमी को दस वर्ष लग जाते हैं ठीक से चीनी भाषा सीखने में।
नब्बे वर्ष का बूढ़ा सीख रहा है सुबह से सांझ तक, यह कब सीख पाएगा? सीखने के पहले इसके मर जाने की संभावना है। और अगर हम यह भी मान लें, बहुत आशावादी हों कि यह जी जाएगा दस-पंद्रह साल, तो भी उस भाषा का उपयोग कब करेगा? जिस चीज को दस साल सीखने में लग जाएं, अगर दस-पच्चीस वर्ष उसके उपयोग के लिए न मिलें, तो वह सीखना व्यर्थ है। लेकिन वह बूढ़ा सुबह से सांझ तक डेक पर बैठा हुआ है और सीख रहा है!
रामतीर्थ के बरदाश्त के बाहर हो गया। उन्होंने जाकर तीसरे दिन उससे कहा कि क्षमा करें, मैं आपको बाधा देना चाहता हूं। एक बात मुझे पूछनी है। आप यह क्या कर रहे हैं? यह चीनी भाषा आप कब सीख पाएंगे? आपकी उम्र तो नब्बे वर्ष हुई! और उस बूढे आदमी ने रामतीर्थ की तरफ देखा और उसने कहा कि जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक जिंदा हूं। और जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक मर नहीं गया हूं। मरने का चिंतन करके मैं मरने के पहले नहीं मरना चाहता हूं। और अगर मरने का हम चिंतन करें कि कल मैं मर जाऊंगा, तो यह तो मुझे जन्म के पहले दिन से ही विचार करना पड़ता कि कल मैं मर सकता हूं, कभी भी मर सकता हूं। तो फिर मैं जी भी नहीं पाता। लेकिन नब्बे साल मैं जीया हूं। और जब तक मैं जी रहा हूं, तब तक सीखूंगा, ज्यादा से ज्यादा जानूंगा, ज्यादा से ज्यादा जीऊंगा। क्योंकि जब तक जी रहा हूं, तब तक एक-एक क्षण का पूरा उपभोग करना जरूरी है ताकि मेरा पूरा आत्म-विकास हो।
और उसने रामतीर्थ से पूछा कि आपकी उम्र क्या है? रामतीर्थ की उम्र तो केवल बत्तीस वर्ष थी। वे बहुत झेंपे होंगे मन में, और कहा कि सिर्फ बत्तीस वर्ष। बूढ़े आदमी ने जो कहा वह पूरे भारत को सुन लेना चाहिए। उसने कहा -- तुम्हें देख कर मैं समझता हूं कि तुम्हारी पूरी कौम बूढ़ी क्यों हो गई है। तुम्हारी पूरी कौम से यौवन, शक्ति, ऊर्जा क्यों चली गई है। तुम क्यों मुर्दे की तरह जी रहे हो पृथ्वी पर। क्योंकि तुम मृत्यु के संबंध में अत्यधिक विचार करते हो और जीवन के संबंध में जरा भी नहीं।
जैसे मां को प्रसव-पीड़ा से गुजरना पड़ता है ताकि उसका बच्चा पैदा हो सके, ऐसे ही प्रत्येक व्यक्ति को एक साधना से गुजरना पड़ता है ताकि उसका सत्य पैदा हो सके।
शेख फरीद एक मस्त फकीर हुआ। सम्राट् अकबर उससे मिलने गया था। किसी ने सम्राट् अकबर को एक सोने की और हीरे-जवाहरातों से मढ़ी, बड़ी कलात्मक कैंची भेंट की थी। जाते वक्त सोचा कि इसको ले चलूं, फरीद को भेंट कर आऊं। बहुमूल्य थी, अनूठी थी, बेजोड़ थी। ले गया, फरीद को चढ़ाई। फरीद ने कैंची देखी और कहा --तुम आए और कुछ भेंट लाए, धन्यवाद, मगर कैंची मेरे काम की नहीं है। तुम तो मुझे सुई-धागा भेज देना, कैंची तुम ले जाओ।
अकबर ने पूछा, सुई-धागा! मैं कुछ समझा नहीं। फरीद ने कहा कि बात यह है..काटना हमारा काम नहीं है, जोड़ना हमारा काम है। सुई-धागे से जोड़ेंगे, कैंची से तो काटना होता है। कैंची तुम्हारे काम की। काटना तुम्हारा धंधा, राजनीति! इसकी काटो, उसकी काटो। काटते ही रहो। और तुम दूसरों की काट रहे हो और दूसरे तुम्हारी काट रहे हैं। एक-दूसरे की काटने में लगे रहो। कैंची तुम्हारे काम की, भइय्या! मुझे सुई-धागा भेज देना। क्योंकि मेरा धंधा जोड़ने का है।
जब तक करना पड़े तब तक ध्यान। जब बिना किए बरसने लगे तब समाधि।
आत्म-विशवास
कथा :
एक सिंह जंगल में गया। उसने पूछा एक सियार से कि जंगल का राजा कौन? सियार ने कहा, आप हैं महानुभाव! आपके अतिरिक्त और कौन राजा है? आप महाराजा हैं, सम्राट हैं। लोमड़ी से पूछा। खरगोश से पूछा। चीते से पूछा। सबने कहा, आप ही सम्राट हैं; कैसी बात पूछते हैं?
फिर हाथी के पास आया। हाथी से पूछा कि इस जंगल का सम्राट कौन है? हाथी ने अपनी सूंड में सिंह को फंसाया और कोई पचास फीट दूर फेंक दिया। सिंह नीचे गिरा, झाड़-झूड़कर धूल फिर वापिस आया और कहा कि अगर तुम्हें उत्तर मालूम नहीं, तो नाराज होने की क्या बात है!
हाथी की कोई घोषणा नहीं है। सिंह की घोषणा है। हाथी चुपचाप है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जो लोग अपने अहंकार की घोषणा करते हैं, उनमें हीनभाव होता है।
जो असली दावेदार हैं, वे कभी दावा नहीं करते । इसे ऐसा समझें । जो असली दावेदार हैं, वे कभी दावा नहीं करते । उनका दावा इतना प्रामाणिक है कि उसके करने की कोई जरूरत नहीं है । उनका दावा इतना आधारभूत है कि स्वयं परमात्मा भी उसे इनकार नहीं कर पाएगा । इसलिए किसी आदमी को मनवाने की कोई भी जरूरत नहीं है ।
जीसस को सूली लगी । तो जीसस के शिष्यों को खयाल था कि सूली पर जीसस को मारा नहीं जा सकेगा । क्योंकि वे चमत्कार दिखला देंगे, वे miracle कर देंगे, सूली बेकार जाएगी और जीसस को मारा नहीं जा सकेगा । जीसस के शिष्यों को यह खयाल था । क्योंकि ईश्वर का बेटा अगर ऐसे मौके को भी चूक जाएगा और दावा नहीं करेगा--यह तो मौका था, दुश्मन खुद मौका दे रहा था ।
और दुश्मन का भी कहना यह था कि अगर तुम सचमुच ईश्वर के बेटे हो, तो सूली पर तय हो जाएगा । अगर ईश्वर अपने बेटे की भी रक्षा नहीं कर सकता, तो फिर और किसकी रक्षा करेगा? और अगर ईश्वर के बेटे को भी साधारण आदमी फांसी पर लटका देते हैं और ईश्वर कुछ नहीं कर पाता, बेटा कुछ नहीं कर पाता, तो सब दावे बेकार हैं । जीसस के दुश्मन भी जीसस को सूली पर ले गए थे इस खयाल से कि अगर वह सच में ईश्वर का बेटा है, तो दावा हो जाएगा । वह जाहिर हो जाएगी बात, हम सूली न दे पाएंगे ।
जीसस के शिष्यों को भी यही खयाल था कि सूली पर सब निर्णय हो जाएगा--डिसीसिव, आखिरी बात का फैसला हो जाएगा । चमत्कार देखना चाहते हो? दिख जाएगा!
लेकिन जीसस चुपचाप मर गए; एक साधारण आदमी की तरह मर गए । जब जीसस के हाथ में खीलियां ठोंकी जा रही हैं, तब शिष्य भी उत्सुकता से देख रहे हैं, कि अब चमत्कार होता है! अब चमत्कार होता है! दुश्मन भी आतुरता से देख रहे हैं कि शायद चमत्कार होगा! शायद! पता नहीं, यह आदमी हो ही ईश्वर का बेटा! लेकिन दुश्मन भी निराश हुए, मित्र भी निराश हुए । जीसस ऐसे मर गए, जैसे कोई भी अ, ब, स मर जाता । भारी सदमा लगा ।
शत्रुओं को तो सदमा का कोई कारण नहीं था । उन्होंने कहा कि ठीक है, हम तो पहले ही कहते थे कि यह आदमी झूठ बोल रहा है । यह सरासर झूठी बात है कि ईश्वर का बेटा है । यह बढ़ई का लड़का है । यह कोई ईश्वर वगैरह का बेटा नहीं है । आखिर मर गया! सिद्ध हो गई बात! शिष्यों को भारी सदमा लगा । लगना ही था । अपेक्षा थी, वह टूट गई । disillusionment हो गया । एक भ्रम खंडित हो गया ।
दो हजार साल तक जीसस को प्रेम करने वाले लोग इस पर विचार करते रहे हैं कि बात क्या हुई! जीसस को सिद्ध करना चाहिए था । अगर लाओत्से को वे समझ सकें, तो बात समझ में आ जाएगी, अन्यथा जीसस को कभी नहीं समझा जा सकेगा ।
जीसस सच में ही इतना बेटा हैं ईश्वर के, दावा इतना प्रामाणिक है, कि उसे करने की कोई जरूरत नहीं है । अगर जीसस ने कोई चमत्कार दिखाया होता, तो मेरी दृष्टि में तो वे ना-कुछ हो जाते । उसका मतलब ही यह होता कि वे आदमियों के सामने सिद्ध करने को बहुत आतुर हैं । उनका ऐसा चुपचाप निरीह आदमी की तरह मर जाना इस बात की घोषणा है कि वह आदमी साधारण न था । साधारण आदमी भी थोड़े हाथ-पैर मारता । साधारण आदमी भी थोड़े हाथ-पैर मारता ।
नहीं, उन्होंने कुछ किया ही नहीं, हाथ-पैर मारने की बात अलग । वह सूली काफी वजनी थी । तो जो उसे ढो रहे थे, उनसे ढोते नहीं बनती थी । तो जीसस ने कहा, मेरे कंधे पर रख दो, मैं अभी जवान हूं । जो मजदूर ढो रहे थे, वे बूढ़े थे । तो जीसस अपनी सूली को लेकर पहाड़ पर चढ़े । सूली पर चढ़ गए सरलता से, और मर गए चुपचाप!
दावा इतना गहन रहा होगा, ईश्वर की सन्निधि इतनी निकट रही होगी कि उसे सिद्ध करना व्यर्थ था । अगर जीसस ने कोशिश करके उसे सिद्ध किया होता, तो वे साफ सबूत दे देते कि वे दावेदार पक्के नहीं थे । असल में जो दावेदार है, वह दावा करता ही नहीं । मगर ईसाइयत न समझा पाई अब तक इस बात को । क्योंकि लाओत्से का तो ईसाइयत को कोई खयाल नहीं । और सच यह है कि जो भी जीसस को समझना चाहते हैं, वे बिना लाओत्से को समझे नहीं समझ सकते हैं । क्योंकि यहूदी धर्म के पास जीसस को समझाने का कोई सूत्र नहीं है । और जीसस के पहले उनके मुल्क में जो लोग भी पैदा हुए, उनमें से किसी से भी जीसस का कोई तालमेल नहीं है । जीसस बिलकुल foreign element थे, एकदम विजातीय तत्व हैं ।
और यह वही आदमी है, जिसने मुर्दों को छुआ और वे जिंदा हो गए । और यह वही आदमी है, जिसने बीमारों को छुआ और उनकी बीमारियां विलीन हो गईं । और यह वही आदमी है कि सूखे वृक्ष के नीचे बैठ गया, तो उस पर पत्ते आ गए । और यह वही आदमी है, जो कि सागर तूफान कर रहा हो, तो इसके इशारे से शांत हो गया ।
लेकिन यह मरते वक्त गैर-दावे में मर गया! हैरान हुए शत्रु भी कि यह आदमी कुछ तो जानता ही था ।
यह आदमी अदभुत रहा होगा! इसका ऐसा चुपचाप मर जाना एक miracle है, एक चमत्कार है । पर लाओत्से को समझेंगे, तो यह बात समझ में आएगी । और बहुत से वचन हैं जीसस के, जो लाओत्से को बिना समझे समझ में नहीं आएंगे ।
जीसस कहते हैं, धन्य हैं वे लोग, जिनके पास कुछ भी नहीं, क्योंकि वे स्वर्ग के राज्य के मालिक होंगे ।
लाओत्से को समझे बिना समझना मुश्किल है ।
जीसस कहते हैं, धन्य हैं वे लोग, जो विनम्र हैं । जिन्होंने कोई दावा नहीं किया, वे ही प्रभु के राज्य के हकदार हैं । धन्य हैं वे, जो आत्मा से दरिद्र हैं, क्योंकि परमात्मा की सारी समृद्धि उनकी है ।
ये वचन सिवाय लाओत्से के कहीं से आने वाले नहीं हैं । यहूदी परंपरा में इन वचनों की कोई जगह नहीं है । क्योंकि यहूदी परंपरा कहती है कि जो तुम्हारी एक आंख फोड़े, तुम उसकी दोनों फोड़ देना । और अगर किसी ने किसी की एक आंख फोड़ी है, तो परमात्मा उसको सजा देगा और उसकी दूसरी आंख फोड़ देगा । वहां इस लड़के का अचानक पैदा होना और इस लड़के का यह कहना, जीसस का यह कहना कि जो तुम्हारा कोट छीने, उसे कमीज भी दे देना; पता नहीं, संकोचवश कमीज वह न छीन पाया हो; और जो तुमसे कहे कि दो मील तक मेरा बोझ ढोओ, तुम तीन मील तक ढो देना, क्योंकि हो सकता है संकोच में हो और आगे के लिए न कह पाया हो । यह जो हवा है, यह जो दृष्टि है, यह लाओत्सियन है ।
कबीर -- आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पुछै बात
सो गूंगा गुड़ खाये के, कहे कौन मुख स्वाद।
संत फ्रांसिस का एक संप्रदाय है । और संत फ्रांसिस एक विनम्र लोगों में एक था, ईसाइयत में जो पैदा हुए । संत फ्रांसिस तो अदभुत रूप से विनम्र था । उसकी विनम्रता का तो कोई हिसाब नहीं है । पर अनुयायी और वादी तो विनम्र होना बड़ा मुश्किल है । तो एक जगह ईसाइयों के सभी संप्रदाय के लोगों का एक सम्मेलन हो रहा है । तो वहां एक फ्रांसिस का अनुयायी फकीर कहता है कि हम कैथलिकों जैसे परंपरा के धनी नहीं हैं, यह सच है; और हम ट्रैपिस्ट--एक संप्रदाय है ईसाइयों का--उसके जैसे बुद्धिसंपन्न नहीं हैं, यह भी सच है; और हम क्वेकर--ईसाइयों का दूसरा संप्रदाय--उसके जैसे प्रार्थना में कुशल नहीं हैं, यह भी सच है; But in humility we are at the top! वह कहता है, पर विनम्रता में हम तो सबसे ऊपर हैं ।
सब गड़बड़ हो गया । In humility we are at the top! Humility का मतलब ही क्या होता है? विनम्रता में तो हम सर्वश्रेष्ठ हैं, सर्वोपरि हैं! उसमें हमारा कोई मुकाबला नहीं! हम फ्रांसिस के अनुयायी हैं ।
विनम्रता में सर्वोपरि! विनम्रता का मतलब ही यह होता है कि किसी के ऊपर न होने का भाव--किसी के ऊपर । सबसे पीछे होने का भाव!
जीसस -- धन्य हैं वे, जो अंतिम खड़े हैं, क्योंकि मेरे स्वर्ग के राज्य में वे ही प्रथम होंगे ।
लाओत्से और हमारे बीच ऐसे ही उलटे नाते हैं । इसलिए लाओत्से को समझना मुश्किल हो जाता है । लाओत्से को समझना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि हमारे तर्क की व्यवस्था में और उसकी तर्क की व्यवस्था में बड़ा उलटापन है । हम कहते हैं कायरता, और लाओत्से कहता है शक्ति । वह कहता है, जितनी बड़ी शक्ति है, उतनी ही लडने की आतुरता कम होगी । अगर शक्ति पूर्ण है, तो लड़ाई होगी ही नहीं ।
ऐसा समझें हम, परमात्मा के द्वार पर जाकर हम गाली दे रहे हैं । कोई उत्तर नहीं मिलता । और नास्तिक हजारों साल से खंडन करते रहे हैं । एक भी बार ऐसा नहीं हुआ कि परमात्मा एकाध बार तो कह देता कि मैं हूं । इतने दिन से लंबा विवाद चलता है । एकाध बार तो उसको इतना तो खयाल आ जाना चाहिए था कि यह बड़ी कायरता होगी, एक दफे तो कह दूं कि मैं हूं । नहीं, वह चुप है ।
Moulana Rumi -- Stop acting so small. You are the universe in ecstatic motion.
मुल्ला नसरुद्दीन की पूरी मित्र-मंडली एक दिन सिनेमा देखने गई। बरसात के दिन थे, सभी लोग रेनकोट पहने टिकट के लिए लंबी लाइन में खड़े थे। ढब्बूजी ने पीछे पलट कर मुल्ला से कहा, नसरुद्दीन, बड़े जोरों से लघुशंका लगी है। क्या करूं समझ में नहीं आता! यदि लाइन छोड़ कर बाथरूम तक जाऊं तो फिर पीछे खड़ा होना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में टिकट मिलना मुश्किल लगता है। और यदि न जाऊं तो डर है कि कहीं कपड़े ही खराब न हो जाएं। बड़ी विकट समस्या है।
मेरी बात मानो--मुल्ला ने सलाह दी--सामने खड़े चंदूलाल के रेनकोट की पाकेट में जीवन-जल का त्याग कर दो।
ढब्बूजी ने मुस्कुरा कर कहा, और यदि उसे पता चल गया तो?
कुछ पता नहीं चलता--मुल्ला बोला--वैसे भी कितनी बारिश हो रही है!
अरे मजाक मत करो--मुल्ला से ढब्बूजी ने कहा--यदि इस चंदूलाल को पता चल गया तो बहुत झगड़ा-फसाद हो सकता है।
मुझ पर विश्वास रखो, पता नहीं चलेगा--नसरुद्दीन ने ढाढस बंधाया।
मगर मैं कैसे भरोसा करूं! जिंदगी भर के लिए दुश्मनी हो जाएगी। बड़ा डर लगता है मुझे ऐसा करने में।
अरे यार ढब्बूजी, तुम तो सचमुच एकदम ढब्बू हो! फिक्र मत करो, जैसा मैं कहता हूं वैसा करो। मैं यह तुमसे अपने अनुभव से कह रहा हूं--मुल्ला नसरुद्दीन ने रहस्य खोला--जब मैंने तुम्हारे रेनकोट की जेब में पेशाब की थी, तुम्हें पता चला? तो फिर तुम क्यों डरते हो?
थोड़ा अनुभव से हो तो बात में बल होता है।
Rumi - Your task is not to seek for love, but merely to seek and find all the barriers within yourself that you have built against it.
परिग्रह
कथा :
एक भिखमंगा एक गांव की एक सड़क पर नियमित रूप से भीख मांगता था। तगड़ा भिखमंगा था। कोई दूसरा भिखमंगा वहां घुस भी नहीं सकता था। भिखमंगों की भी अपनी-अपनी सीमा होती है। उसकी सीमा-रेखा में कोई दूसरा भिखमंगा नहीं आ सकता था। उनका भी साम्राज्य होता है--भिखमंगों का भी! लेकिन एक दिन किसी ने देखा कि वह भिखमंगा किसी दूसरी सड़क पर भीख मांग रहा है। तो उसने पूछा, अरे! वह पुरानी जगह छोड दी? क्योंकि वह पुराना मोहल्ला तो धनपतियों का मोहल्ला था और वहां ज्यादा भीख मिलने की संभावना थी। उसने कहा, छोड़ नहीं दी, मेरी लड़की का विवाह हो गया, उसको दहेज में दे दी, उसके पति को।
तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हारा मोहल्ला भिखमंगे ने किसी को दहेज में दे दिया है। भिखमंगे का भी साम्राज्य है! नंगा भी आदमी खड़ा हो, लंगोटी भी उसके पास न हो, तो भी जहां से सपने आते थे वह जगह तो अभी नहीं तोड़ी। तो वह जहां खड़ा है,जितनी छोटी-सी जमीन को घेर रहा है, उस पर ही 'मेरे' का कब्जा हो जाएगा। मूल को तोड़ना पड़ेगा। शाखाएं-प्रशाखाएं काटने से कुछ भी न होगा।
भाव-लिंगी ने अंतर को बदला, जागकर; द्रव्य-लिंगी ने बाहर को बदला, सोये-सोये।
जौहरी
कथा :
एक आदमी अपने गधे के गले में एक हीरा लटकाये चला जा रहा था। एक जौहरी ने देखा, चकित हो गया! लाखों का हीरा होगा और यह गधे के गले में लटकाये हुए है! उसने पूछा, क्या लेगा इस पत्थर का? उस आदमी ने कहा, एक रुपया दे दें। उस जौहरी ने कहा, चार आने में देना है? पत्थर है, करेगा क्या? उसने कहा अब चार आने तो रहने दो बच्चे खेल लेंगे! उस जौहरी ने सोचा कि आयेगा, चार आने भी कौन देनेवाला है इसको! जौहरी जरा दो-चार कदम आगे चला गया, तभी तक दूसरा जौहरी आया। उसने एक हजार रुपये में वह खरीद लिया पत्थर। लौटकर जौहरी आया भागा हुआ, कहा क्या हुआ, बेच दिया? कितने में बेच दिया? उसने कहा, हजार रुपये में। पहले जौहरी ने कहा, पागल हुए हो! अरे, वह लाखों का हीरा था! उस गधे के मालिक ने कहा कि मैं पागल होऊं या न होऊं, मुझे तो पता नहीं कि वह हीरा था, इसलिए हजार में बेच दिया; तुझे तो पता था कि हीरा है, एक रुपये में लेने को तू राजी न हुआ!
हीरा अपने-आप में थोड़े ही हीरा है! पड़ा रहता है हजारों वर्ष तक, जब तक कि किसी जौहरी की नजर में नहीं आता। जौहरी की नजर में आते ही हीरा हो जाता है। उसके पहले तो पत्थर ही था। और तुम्हारे पास जौहरी की नजर न हो, तो तुम्हारे लिए भी पत्थर है।
मिश्र में एक अदभुत फकीर हुआ, झुन्नून। एक युवक ने आकर उससे पूछा -- सत्य का आकांक्षी हूं। मुझे भी चरणों में जगह दो। झुन्नून ने देखा उसकी तरफ। उसने कहा, तू एक काम कर। खीसे से एक पत्थर निकाला और कहा, जा बाजार में, सब्जी मंडी में चला जा, और दुकानदारों से पूछना कि इसके कितने दाम मिल सकते हैं।
वह भागा गया। उसने जाकर सब्जियां बेचने वाले लोगों से पूछा। कई ने तो कहा कि हमें जरूरत ही नहीं है, दाम का क्या सवाल? दाम तो जरूरत से होता है। हटाओ अपने पत्थर को। पर किसी ने कहा कि ठीक है, सब्जी तौलने के काम आ जाएगा। तो दो पैसे ले लो, चार पैसे ले लो, पत्थर रंगीन है।
पर झुन्नून ने कहा था, बेचना मत, सिर्फ दाम पूछकर आ जाना। ज्यादा से ज्यादा कितने दाम मिल सकते हैं? सब तरफ पूछकर आ गया, चार पैसे से ज्यादा कोई देने को तैयार न था।
आकर कहा कि चार पैसे से ज्यादा कोई देने को तैयार नहीं है। बहुत तो लेने को ही तैयार नहीं। बहुतों ने तो झिड़क कि हटो यहां से, सुबह का वक्त! हम ग्राहकों से बात करें, कि यह पत्थर लेकर आ गए! शाम को आना। किसी ने उत्सुकता भी दिखाई तो इसीलिए कि सब्जी तौलने के काम आ जाएगा 1 एक आदमी ऐसा भी मिला, उसने कहा कि कोई काम का तो नहीं,लेकिन बच्चे खेलेंगे। अब तुम ले आए हो तो चलो, चार पैसे ले लो। बड़ी दया से उन्होंने चार पैसे देने को कहा है'-बेच आऊं?
गुरु ने कहा, अब तू ऐसा कर, सोने-चांदी के बाजार में चला जा, वहां पूछ आ। लेकिन बेचना नहीं है, सिर्फ दाम पता लगाने हैं। वह वहां गया, वह तो हैरान होकर लौटा। सोने-चांदी के दुकानदार हजार रुपया देने को तैयार थे। भरोसा ही न आया। कहां चार पैसे, कहां हजार रुपए! बहुत फर्क हो गया। लगा कि बेच ही दे। जो आदमी दे रहा है हजार रुपए; फिर दे या न दे, कल बदल जाए। पर गुरु ने मना किया था। लौटकर आया। कहा, कि अब रोकना ठीक नहीं। हजार रुपए देने वाला एक आदमी मिल गया। पांच सौ से कम में तो किसी ने मांगा ही नहीं।
गुरु ने कहा, अब तू ऐसा कर, बेच मत देना। अब तू जाकर हीरे-जवाहरात जहां बिकते हैं, जौहरी और पारखी जहां हैं, वहां ले जा; लेकिन बेचना नहीं है। चाहे कोई कितना ही दे और तेरे मन में कितना ही उत्साह आ जाए, बेचना भर नहीं। वहां गया तो चकित हो गया। वहां तो लोग दस लाख रुपया तक देने को तैयार थे उस पत्थर के। वह तो पगलाने लगा। कहो दो पैसे और कहो दस लाख! कई बार तो मन हुआ कि बेचो और रुपए ले जाओ। और यह आदमी पीछे दे, न दे। लेकिन गुरु ने मना किया था।
लौटकर आया। गुरु ने पत्थर ले लिया। उसने कहा, बेचना नहीं है। सिर्फ तुझे यह बताने को पत्थर दिया था कि सत्य का तू आकांक्षी है, इतने से ही सत्य नहीं मिलता; पारखी भी है या नहीं? नहीं है तो हम सत्य देंगे और तू दो पैसे दाम बताएगा। तू दो पैसे का भी न समझेगा। पारखी होकर आ। सत्य तो है और हम देने को भी तैयार हैं। लेकिन सिर्फ इतना तेरे कह देने से कि तू आकांक्षी है, काफी नहीं हल होता। क्योंकि मैं देखता हूं? अकड़ तेरी भारी है। पैर भी तूने झुककर छुए हैं। शरीर तो झुका, तू नहीं झुका। छू लिए हैं उपचार वश, छूने चाहिए इसलिए। और लोग भी छू रहे हैं इसलिए। झुकना ही तुझे नहीं आता, तो जिन हीरों की यहां चर्चा है वह तो झुकने से ही उनकी परख आती है। तो पहले झुकना सीखकर आ।
चोर अगर अचोर होने की कोशिश करेगा तो उसमें भी चोरी कर जायेगा। क्योंकि चोर...कोशिश तो चोर ही करेगा।
विपरीत दृष्टिकोण
कथा :
अमरीका में texas प्रांत के लोग बड़े अभद्र, हिंसक समझे जाते हैं । एक सिनेमागृह में एक texas प्रांत का आदमी अपनी बंदूक सम्हाले interval के बाद वापस लौटा । बाहर गया होगा । अपनी सीट पर उसने किसी आदमी को बैठे देखा । उसने पूछा -- महानुभाव! आपको पता है, यह सीट मेरी है । वह जो आदमी बैठा था, मजाक में ही कहा, थी आपकी । अब तो मैं बैठा हूं । सीट किसी की होती है?
बस, उसने बंदूक तानी और गोली मार दी । भीड़ इकट्ठी हो गई और उसने लोगों से कहा कि इसी तरह के लोगों के कारण texas के लोग बदनाम हैं ।
मुल्ला का बेटा उससे पूछ रहा था कि पिताजी, मैं दुविधा में हूं । दांतों का डाक्टर बनूं या कानों का? मुल्ला ने कहा, इसमें दुविधा की बात क्या है? दांतों के डाक्टर बनो । क्योंकि व्यक्ति के कान तो केवल दो होते हैं, दांत बत्तीस होते हैं ।
अगर भीतर लोभ हो तो हर तरफ लोभ छाया डालेगा । तुम्हारे सभी निर्णय, तुम्हारे सभी वक्तव्य, तुम्हारा उठना-बैठना, सब लोभ से परिचालित होगा ।
नसरुद्दीन को खबर दी है उसके घर के आस-पास के पड़ोसियों ने कि तू भाग जल्दी, तेरी पत्नी नदी में गिर पड़ी है! पूर है तेज, वर्षा के हैं दिन, धार है कड़ी और डर है कि पत्नी शीघ्र ही सागर में पहुंच जाएगी । तू भाग!
नसरुद्दीन भागा । तट पर बहुत भीड़ इकट्ठी हो गई । वह नदी में कूदा और उलटी धार की तरफ तैरने लगा । उलटी तरफ! सागर की तरफ दौड़ रही है नदी, वह उलटी तरफ, नदी के उद्गम की तरफ जोर से तैरने लगा । तेज है धार, तैर भी नहीं पा रहा । लोगों ने चिल्लाया, पागल नसरुद्दीन, कोई नदी में गिर जाए, तो उलटी तरफ नहीं बहता । तेरी पत्नी नीचे की तरफ गई होगी! उन्होंने कहा कि माफ करो, मेरी पत्नी को मैं तुमसे अच्छी तरह जानता हूं । वह सदा उलटे काम करती रही है । वह कभी नीचे की तरफ नहीं बह सकती । उसे मैं भलीभांति पहचानता हूं । तीस साल का हमारा-उसका सत्संग है । अगर तुम यह कहते हो कि सभी लोग नदी में गिर कर नीचे की तरफ बहते हैं, तो मेरी पत्नी ऊपर की तरफ बही होगी ।
मोह / क्रोध / लोभ / अहंकार में लिए निर्णय सही कैसे हो सकते हैं
मेले में एक झूले पर मुल्ला लगातार झूले जा रहा था। थोड़ी देर के लिए झूला बंद हुआ तो मुल्ला दौड़ता हुआ आया, जल्दी से पानी पीया और फिर वापस झूले पर जा बैठा।
पास बैठे एक बच्चे ने पूछा – अंकल, आपको भी झूला झूलना बहुत अच्छा लगता है?
'अच्छा!!' मुल्ला भड़क गया – 'झूले में बैठना मुझे बिलकुल ही अच्छा नहीं लगता. मेरा सिर चकराता है। झूले में इतने देर से बैठे-बैठे मेरा जी घबरा रहा है। परंतु इस झूले के मालिक पर मेरा पचास रुपया उधार है. और उस उधारी को वसूलने का हिक्कक... एक हिक्कक... यही.... हिक्कककक... रास्ता बचा.... हिक्कक…'
एक दिन मुल्ला एक मशहूर मनोचिकित्सक के पास पहुँचा और उससे निवेदन किया कि क्या वो उसका व्यक्तित्व विभाजित (personality split) कर सकता है।
'तुम्हारा व्यक्तित्व विभाजित करना?' डॉक्टर ने आश्चर्य से पूछा - 'यहाँ तो split personality वाले इलाज के लिए आते हैं और ठीक होकर जाते हैं. तुम तो उलटे इस काम के लिए कह रहे हो! भला क्यों?'
'इसलिए कि,' मुल्ला ने जवाब दिया – 'मैं बेहद अकेलापन महसूस करता हूँ'।
क्रोध को जिसने जान लिया, वह क्रोध नहीं कर सकता।
मुल्ला कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर पहुँचा और अपनी व्यथा सुनानी शुरू कर दी - मेरे पास एक ही, छोटा सा कमरा है और मेरे साथ मेरे दो और भाई रहते हैं। एक ने चार बंदर पाले हैं और दूसरे ने छः कुत्ते। वे सभी उसी छोटे से कमरे में रहते हैं। बदबू और घुटन से मेरा तो जीना हराम हो गया है। काउंसलर ने सांत्वना देते हुए कहा - 'कमरे में खिड़की तो होगी..' । 'हाँ है' मुल्ला ने कहा । 'तो उसे तुम खोल क्यों नहीं लेते' काउंसलर ने उपाय बताया. 'क्या?' मुल्ला चिल्लाया - 'और मैं अपने सारे कबूतर उड़ जाने दूं?'
जब दूसरों की मौजूदगी से तुम ऊब जाओ, परेशान हो जाओ, तो उचित है कि आख बंद कर लो और अपने में खो जाओ।
एक रात मुल्ला नसरुद्दीन घर आया। शराब ज्यादा पी गया है। हाथ में चाबी लेकर ताले में डालता है, नहीं जाती, हाथ कंप रहा है। पुलिस का आदमी द्वार पर खड़ा है। वह बड़ी देर तक देखता रहा, फिर उसने कहा -- नसरुद्दीन, मैं कुछ सहायता करूं? लाओ चाबी मुझे दो, मैं खोल दूं। नसरुद्दीन ने कहा, चाबी की तुम फिकर न करो -- जरा इस कंपते मकान को तुम पकड़ लो, चाबी तो मैं खुद ही डाल दूंगा।
शुतुरमुर्ग का अपना तर्क है कि जो नहीं दिखाई पड़ता, वह नहीं है। हम भी तो यही कहते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन गया था एक शास्त्रीय संगीत की सभा में। और जब संगीतज्ञ आलाप भरने लगा, तो उसकी आंख से आंसू गिरने लगे। पड़ोसी ने पूछा कि नसरुद्दीन! हमने कभी सोचा भी नहीं कि तुम शास्त्रीय संगीत के इतने प्रेमी हो। तुम्हारी आंख से आंसू टपक रहे हैं!
उसने कहा, हाँ, टपक रहे हैं। क्योंकि यह आदमी खतरे में है। यही हालत मेरे बकरे की हो गई थी जब वह मरा। ऐसे ही भरता था आलाप। यह मरेगा। इसको बचाने का उपाय करो। ऐसे ही चिल्ला-चिल्लाकर मेरा बकरा मरा।
तमस मांगता है। सत्व देता है। रजस को फुरसत नहीं है।
एक बड़ी पुरानी कहानी है पंचतंत्र में, कि एक आदमी को निरंतर भक्ति करने से कोई देवता प्रसन्न हो गया। और उसने कहा, माग ले, तू जो भी मांगता हो। तो उसने कहा, जो भी मैं मांगूं कभी भी वह मुझे मिले, यही मैं मांगता हूं। होशियार आदमी रहा होगा, गणितज्ञ रहा होगा, एक मांग में खतम हो जाएगी बात, तो उसने कहा कि मैं यही मांगता हूं कि जो भी कभी मांगूं वह मुझे मिल जाए।
देवता ने देखा कि यह तो चालाकी कर रहा है। वरदान एक दिया था, इसने तो करोड़ मांग लिए, अनंत मांग लिए। देवता ने कहा, वही देता हूं लेकिन सिर्फ एक शर्त है, कि जो तुझे मिलेगा, वह तेरे पड़ोसियों को दुगना होकर मिलेगा।
बस, बात खतम हो गई। अब वह आदमी बड़ी मुश्किल में पड़ गया। यही तो मूढ़ आदमी की दिक्कत है। उसको खुद से कोई मतलब नहीं है। खुद को चाहे दुख भी मिले तो चलेगा, किसी को सुख न मिल जाए।
अब वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया। उसने मांगा महल। महल तो बन गया। लेकिन दुगने बड़े महल पड़ोसियों के बन गए। वह फिर नीचे के नीचे रह गया। उसने कहा, यह तो कोई सार न रहा। इससे तो झोपड़ा ही बेहतर था। फल क्या है इसका! उसने मांगा धन, दुगना धन पड़ोसियों के घर में बरस गया। उसने कहा, ऐसे नहीं चलेगा। यह देवता तो चालाकी कर गया।
तो उसने कहा, मेरी एक आंख फोड़। उसकी एक फूटी; पड़ोसियों की दोनों फूट गईं। उसने कहा, अब मेरे घर के सामने एक बड़ा कुआं बना दे। उसके घर के सामने एक कुआं बना, पड़ोसियों के घर के सामने दो बन गए।
अब उसको तृप्ति हुई। खुद की आंख गई, उसकी कोई चिंता नहीं। अब तृप्ति हो गई कि अंधे कुओं में गिरेंगे। जाएंगे कहां? सारा पड़ोस अंधा हो गया, दो-दो कुएं हर घर के सामने हो गए। अब उसको शांति हुई।
जो मूढ़ चित्त का व्यक्ति है, उसको अपने सुख में रस नहीं होता। उसका एक ही सुख होता है कि दूसरों को वह कितना दुखी करे।
एक नेता ने दूसरे नेता को जन्मदिन पर बधाई देते हुए लिखा
ईश्वर करें, आपके उदघाटन भाषण की मीटिंग में नहीं हो हूटिंग, न ही पथराव हो
विरोधियों के आक्रोश से, गुरु बचाए न ही छात्रों द्वारा घेराव हो
शनि की कृपा से आपका क्षेत्र बाढ़, अकाल और सूखाग्रस्त घोषित हो जाए
राहत कार्य के अंतर्गत आपकी सारी गरीबी धुल जाए,
राजनीति में सदा, यूं ही चलती रहे तिजारत
वर्षगांठ मुबारक!
अनेकान्त
कथा :
चार मेंढक, वर्षा में बाढ़-आयी एक नदी पर डूबने को थे । एक लक्कड़ बहता आ गया, वे उस पर सवार हो गए । बड़े प्रसन्न हुए । लक्कड़ बहने लगा । बाढ़ थी तेज, नदी भागी जा रही है सागर की तरफ । पहले मेंढक ने कहा, यह लक्कड़ संसार का श्रेष्ठतम लक्कड़ है । देखो तो कितना जीवंत और गतिवान! कैसा बहा जाता है । लक्कड़ तो बहुत देखे, मगर ऐसा प्राणवान लक्कड़ कभी नहीं देखा । न कभी हुआ, न कभी होगा । दूसरे ने कहा, लक्कड़ नहीं बह रहा है महानुभाव! नदी बह रही है । विवाद छिड़ गया । दूसरे ने कहा, लक्कड़ तो और लक्कड़ों जैसा ही है । कुछ विशिष्टता इसमें नहीं है । जरा गौर से तो देखो । बह रही है नदी । नदी के बहने के कारण लक्कड़ भी बह रहा है ।
तीसरे ने कहा, न लक्कड़ बहता, न नदी; विवाद फिजूल है । तुम दोनों अंधे हो । तुम आधा-आधा देख रहे हो । तुम अधूरा देख रहे हो । आंखें साफ चाहिए तो असली बात तुम्हें समझ में आ जाए--जैसा कि सभी धर्मशास्त्रों ने कही है--कि सब प्रवाह तो मनुष्य के मन में हैं । सब गति मन की है । सब दौड़-धूप मन की है । ऐसा मैं देखता हूं कि न तो नदी का सवाल है, न लक्कड़ का, यह मन में बह रही विचारों की धारा है, जिससे जीवन में परिवर्तन दिखाई पड़ता है । मन ठहर जाए, सब ठहर जाता है । शास्त्रों में खोजो तो तुम्हें पता चलेगा ।
विवाद चलने लगा । कोई निर्णय तो करीब आता दिखाई न पड़ा । आखिर तीनों को खयाल आया कि चौथा चुप बैठा है । चौथा मेंढक चुप बैठा था । कुछ बोला ही नहीं था । सबकी सुन रहा था, गुन रहा था, लेकिन बोला कुछ भी नहीं था । उन तीनों ने कहा कि अब कुछ निर्णय तो होता नहीं । निर्णय होने का उपाय भी नहीं ।
इसलिए तो संसार में विवाद सदियों से चलते रहे हैं, सनातन चलते रहे हैं । कुछ निर्णय नहीं होता । नास्तिक-आस्तिक के बीच क्या निर्णय हुआ? जैन-हिंदू के बीच क्या निर्णय हुआ? मुसलमान-ईसाई के बीच क्या निर्णय हुआ? निर्णय तो कभी होते ही नहीं ।
तो उन तीनों ने कहा कि आप चुप हैं । आप कुछ कहें । उस चौथे मेंढक ने कहा, विवाद का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि तुम तीनों ही ठीक हो । नदी भी बह रही है, लक्कड़ भी बह रहा, मन की गति तो सारी दुनिया को पता है । तीनों ही ठीक हो और तीनों ही गलत भी । क्योंकि तुम छोटे-से सत्य को बहुत बड़ा करके कह रहे हो । तुम खंड सत्य को अखंड करने की चेष्टा कर रहे हो । अंश सत्य को सिद्ध कर रहे हो कि वही पूरा सत्य है ।
महावीर जैसा रहा होगा यह मेंढक--स्यातवादी । उसने कहा, तुम तीनों ही ठीक हो । साधु-चरित्र रहा होगा यह मेंढक । श्वेत लेश्या को उपलब्ध रहा होगा यह मेंढक । उसने कहा तुम तीनों ही ठीक हो और तीनों गलत भी । गलत इसलिए कि तुम अंश को पूरा सिद्ध कर रहे हो । और सही इसलिए कि तुम्हारी तीनों की बातों में सत्य की कोई झलक है ।
तीनों बहुत नाराज हो गए । यह बात तो तीनों के बर्दाश्त के बाहर हो गई । क्योंकि उनमें से कोई भी यह मानने को राजी नहीं था कि उसका वक्तव्य पूर्ण सत्य नहीं है । और न ही उनमें से कोई यह बात मानने को राजी था कि उसके विराधी के वक्तव्य में भी सत्य का अंश हो सकता है ।
और तब एक चमत्कारों का चमत्कार घटित हुआ । मेंढकों में शायद ऐसा न होता रहा हो, मनुष्य में सदा होता रहा है । लेकिन उस दिन मेंढकों में भी हुआ । वे तीनों इकट्ठे हो गए और चौथे को धक्का देकर लक्कड़ से बाढ़ में गिरा दिया । उन्होंने कहा, बड़े आए साधु बने! बड़े ज्ञानी होने का दावा कर रहे हैं । वे तीनों इकट्ठे हो गए । उन्होंने अपना विवाद छुड़ा दिया, छोड़ दिया विवाद क्योंकि यह उन तीनों को ही दुश्मन मालूम पड़ा । और एक बात में वे राजी हो गए कि यह तो कम से कम गलत है;बाकी निर्णय हम पीछे कर लेंगे ।
यही अवस्था महावीर के साथ हुई । और सारे दर्शनों के दावे हैं, महावीर का कोई दावा नहीं है । इसलिए महावीर किसी को भी रुचे नहीं । महावीर ने कहा, वेदांत भी ठीक है, सांख्य भी ठीक है, वैशेषिक भी ठीक है, मीमांसा भी ठीक है, लेकिन सभी अंश सत्य हैं । यह बात किसी को जंची नहीं । इसलिए एक बहुत महत्वपूर्ण विचार-दर्शन महावीर ने दिया, लेकिन अनुयायी वे ज्यादा न खोज पाए । क्योंकि सभी नाराज हो गए । वेदांती भी नाराज हुआ । उसने कहा, अंश सत्य? हमारा और अंश सत्य? सांख्य भी नाराज हुआ कि हमारा और अंश सत्य? अहंकार को बड़ी चोटें लगीं ।
एच. जी. वेल्स -- अगर लोग चुप रहें तो दुनिया में से निन्यानबे प्रतिशत झगड़े समाप्त हो जाएं ।
बर्नार्ड शॉ साठ साल की उम्र तक उसे पता ही नहीं था कि उसे पीला रंग दिखाई नहीं पड़ता। उसे हरे और पीले में कोई फर्क नहीं मालूम होता था। साठ वर्ष तक पता नहीं चला। पता चले भी कैसे? साठवीं वर्षगांठ पर किसी ने उसे एक वस्त्र उपहार में भेजे हैं; वे हरे रंग के हैं। तो टाई लेने बाजार गया। टाई उसने नहीं भेजी है। तो वह पीले रंग की टाई खरीद लाया। उसकी जो सेक्रेटरी थी, उसने कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं! यह बहुत बेहूदी लगेगी। अगर मेल ही मिलाना है, तो हरे रंग की ही खरीद लें। पर बर्नार्ड शॉ ने कहा कि कौन कहता है यह हरा रंग नहीं है! यह हरा रंग है।
तब पहली दफे पता चला कि वह color blind है! उसे पीले रंग और हरे रंग में कोई फर्क नहीं दिखाई पड़ता। वे दोनों उसे एक से दिखाई पड़ते हैं। लेकिन साठ साल तक उसे कोई पता नहीं चला।
तो जो हमें दिखाई पड़ता है, उसमें हमारे देखने की क्षमता सम्मिलित हो जाती है।
अब एक मछली पानी में तैर रही है। और अगर पानी नीले रंग का है, तो जो चांद उसको प्रतिबिंब पानी में बना हुआ दिखाई पड़ेगा, वह नीले रंग का दिखाई पड़ेगा। और कोई उसके पास जानने का उपाय नहीं है कि जिस चांद का यह प्रतिबिंब है, वह नीला नहीं होगा।
महावीर -- जो भी हम जानते हैं, हमें निरंतर ही उसमें स्यात लगा कर बोलना चाहिए। उससे इस बात की खबर मिलती है कि हम सत्य के पूर्ण होने का दावा नहीं करते, सिर्फ प्रतिबिंब होने का दावा करते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन को किसी मित्र, जो कि नया-नया पायलट हो गया है, ने कहा कि तुम बैठो, तुम्हें मैं जरा घुमा दूं। मुल्ला को उसने घुमाया और जब वापस उतारा, तो मुल्ला ने कहा, Thank you for your two trips! उसने कहा कि दो? एक ही थी। मुल्ला ने कहा, my first and last । उसने कहा, दो -- मेरी पहली और आखिरी। नमस्कार!
धर्म वस्तुत: मृत्यु के पार जाने का उपाय है। इसलिए जिस व्यक्ति को भी वस्तुत: धार्मिक रूपांतरण से गुजरना हो, उसे अपनी मृत्यु के प्रति बहुत सघन रूप से सचेत हो जाना चाहिए। मृत्यु के प्रति सचेत होने का अर्थ मृत्यु से भयभीत होना नहीं है। सच तो यह है, जो सचेत नहीं होते, वे ही भयभीत होते हैं। जो सचेत होते हैं, वे तो उसके पार जाने का उपाय करने लगते हैं। उनका मृत्यु का भय नष्ट हो जाता है।
नसरुद्दीन गांव का न्यायाधीश हो गया था। पहला ही मुकदमा उसकी अदालत में आया। पक्ष के वकील ने कुछ कहा, अपना वक्तव्य दिया। नसरुद्दीन ने कहा, बिलकुल ठीक। जो कोर्ट का क्लर्क था, जो नीचे ही नसरुद्दीन के बैठा था, वह थोड़ा घबड़ाया। जज को ऐसा निर्णय नहीं देना चाहिए। अभी दूसरे पक्ष की बात सुनी ही नहीं गई।
उसने झुककर नसरुद्दीन को कहा कि शायद आपको पता नहीं अदालत के नियम। आप चुप रहें। निर्णय आखिर में। और अगर आप अभी कह देते हैं कि बिलकुल ठीक, तो फिर दूसरे विपक्षी को कहने का क्या मौका रहा! नसरुद्दीन ने कहा, बिलकुल ठीक। उस क्लर्क से कहा।
फिर विपक्षी की बात सुनी। और जब विपक्षी अपना पूरा वक्तव्य दे चुका, तो नसरुद्दीन ने कहा, बिलकुल ठीक। क्लर्क झुका और उसने कहा, अब हद हो गई। पक्ष भी ठीक; मैंने विरोध किया, वह भी ठीक, अब यह विरोधी जो कह रहे हैं, यह भी ठीक! आपका मतलब क्या है? ये सब ठीक नहीं हो सकते! नसरुद्दीन ने कहा कि बिलकुल ठीक।
इस भाव-दशा को समझना थोड़ा कठिन है। या तो मूढ़ में हो सकती है यह भाव-दशा, या परम ज्ञानी में। या तो मूढ़ ऐसी मूढ़ता कर सकता है कि सभी को ठीक कह दे। और या फिर परम ज्ञानी ऐसे ज्ञान की बात कर सकता है कि सभी को ठीक कहे। मध्य में तो हमें सदा ऐसा लगेगा कि कुछ ठीक और कुछ गलत। अगर एक पक्ष ठीक है, तो विपक्ष गलत होगा ही।
हम सब अरस्तु के तर्क से जीते हैं। जहां विपरीत बातें, दोनों सही नहीं हो सकतीं। दोनों गलत हो भी सकती हैं, लेकिन दोनों सही नहीं हो सकतीं। सही तो एक ही हो सकती है।
तम मूर्च्छा में ले जाता है। रज गति और विकास, त्वरा में ले जाता है। सत्व शान्ति में ले जाता है। लेकिन ये तीनों तत्त्व जगत के भीतर हैं।
फासला
कथा :
जोशुआ लियेमेन ने लिखा है कि जब वह युवा था और अपने गुरु के आश्रम में था तो रोज दो घंटे के लिए आश्रम के बगीचे में घूमने और ध्यान करने का समय मिलता था । घूमने और प्रार्थना करने का समय मिलता था । खुली प्रकृति में प्रार्थना के पंख लगाकर उड़ने के लिए सुविधा मिलती थी । एक और युवक उसका मित्र था, वे दोनों साथ ही साथ घूमते थे । दोनों को सिगरेट पीने की लत थी, लेकिन संकोच होता था, कि गुरु से पूछे बिना आश्रम में धूम्रपान कैसे करें! तो उन्होंने कहा, पूछ ही क्यों न लें? और गुरु इतना सरल है, इतना सीधा है कि शायद ही इनकार करे ।
उन्होंने पूछा । दूसरे दिन लियेमेन जब पहुंचा तो उसने देखा, उसका साथी धूम्रपान कर रहा है । वह बहुत हैरान हुआ । उसने कहा, क्या तुमने पूछा नहीं? मैंने तो पूछा, लेकिन मेरे पूछते ही उन्होंने कहा -- नहीं, कभी नहीं । तुमने मालूम होता है पूछा नहीं, या कि पूछकर भी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो? उस युवक ने कहा, आश्चर्य! मैंने तो पूछा और उन्होंने कहा कि बिलकुल ठीक है, पीयो ।
लियेमेन ने कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि हम दोनों को इतने विपरीत उत्तर क्यों दिए गए? उस दूसरे युवक ने कहा, पहले यह कहो, तुमने पूछा क्या था? लियेमेन ने कहा, मैंने पूछा था कि क्या मैं प्रार्थना करते समय धूम्रपान कर सकता हूं? उन्होंने कहा, नहीं, कभी नहीं । और लियेमेन ने पूछा उस युवक से, तुमने क्या पूछा था?
उस युवक ने कहा कि बस, बात साफ हो गई । मैंने पूछा था कि क्या मैं धूम्रपान करते समय प्रार्थना कर सकता हूं? उन्होंने कहा, निश्चित ।
'धूम्रपान करते समय प्रार्थना कर सकता हूं?' कौन मना करेगा? लेकिन 'प्रार्थना करते समय धूम्रपान कर सकता हूं?' कौन हां भरेगा? पर बात जरा-सी फर्क की है, पर बड़े फर्क की है । जमीन-आसमान का फासला हो जाता है ।
एक में सर्व
कथा :
शिव अपने बेटों के साथ खेल रहे हैं--कार्तिकेय और गणेश । और ऐसे ही खेल में उन्होंने कहा कि तुम मानते हो कि मैं ही यह सारी सृष्टि हूं? तो मेरे भक्त को मेरी परिक्रमा कैसी करनी चाहिए, तुम बताओ । तो कार्तिकेय तो बड़े बुद्धिमान रहे होंगे, ज्ञानी रहे होंगे । चले सारी सृष्टि का चक्कर लगाने । शिव की परिक्रमा करनी है । और शिव यानी सारी सृष्टि । सब में व्याप्त परमात्मा । पता नहीं अभी तक लौटे भी कि नहीं कार्तिकेय । कहानी कुछ कहती नहीं । गणेश ने ज्यादा होशियारी की । वजनी शरीर, हाथी की सूंड! अब इतनी बड़ी पृथ्वी का चक्कर क्या? उन्होंने शिव का चक्कर लगाकर जल्दी से वहीं बैठ गए । हो गई! सृष्टि की परिक्रमा हो गई । अगर शिव ही समाए हैं सारी सृष्टि में तो अब सारी सृष्टि की परिक्रमा क्या करनी! शिव की कर ली तो सारी सृष्टि की हो गई । कार्तिकेय ने सोचा ठीक उलटा । वह भी ठीक है, वह भी तर्क ठीक है । कि जब सारी सृष्टि में समाए हैं तो सारी सृष्टि की जब परिक्रमा होगी तभी तो परिक्रमा हो पाएगी ।
मन का अर्थ है, सूक्ष्म तरंगें, जो अभी विचार भी नहीं बनीं । जिसको फ्रायड unconsious कहता है । जिसको फ्रायड consious mind कहता है, उसको महावीर वचन कहते हैं।
एक आदमी था महाराष्ट्र में। घोर नास्तिक था। साधु-संतों के पास जाता, तो साधु-संत बड़ी मुश्किल में पड़ जाते। क्योंकि यह दुर्भाग्य की घटना है कि नास्तिक भी हमारे तथाकथित साधु-संतों से ज्यादा समझदार होते हैं।
साधु-संत मुश्किल में पड़ जाते। उस नास्तिक को जवाब देते उनसे न बन पड़ता। वह जो भी पूछता, उन साधु-संतों को बेचैन कर जाता। साधु-संत होना चाहिए ऐसा कि जिसे कोई बेचैन न कर जाए; बल्कि बेचैनी से भरा कोई पास आए, तो चैन लेकर जा सके। लेकिन वह नास्तिक बहुत-से साधु-संतों के लिए तकलीफ और परेशानी का कारण बन गया था। बड़े-बड़े साधुओं के पास जाकर भी उसने पाया कि उसके प्रश्नों का उत्तर नहीं है।
तब एक साधु ने उससे कहा कि तू इधर-उधर मत भटक। तेरे लायक सिर्फ एक ही आदमी है, एकनाथ नाम का। तू उसके पास चला जा। अगर उससे उत्तर मिल जाए, तो ठीक। नहीं तो फिर परमात्मा से ही उत्तर लेना। फिर बीच में दूसरा आदमी काम नहीं पड़ेगा। उस आदमी ने कहा, लेकिन परमात्मा तो है ही नहीं! तो उस साधु ने कहा, फिर एकनाथ आखिरी आदमी है। उत्तर मिल जाए, ठीक; न मिले, तो तू जान।
बहुत आशा से भरा हुआ वह नास्तिक एकनाथ के पास पहुंचा। सुबह थी। कोई सुबह के आठ, साढ़े आठ, नौ बज रहे थे। धूप घनी थी, सूरज ऊपर निकल आया था। गांव में पूछता हुआ गया, तो लोगों ने कहा कि एकनाथ के बाबत पूछते हो! नदी के किनारे मंदिरों में देखना, अभी कहीं सोता होगा! उसके मन में थोड़ी-सी चिंता हुई। साधु तो ब्रह्ममुहूर्त में उठ आते हैं। नौ बज रहे हैं; कहीं सोता होगा!
गया जब मंदिर में, तो देखकर और मुश्किल में पड़ गया। क्योंकि एकनाथ शंकर के मंदिर में सोए हैं, पैर दोनों शंकर की पिंडी से टिके हैं; आराम कर रहे हैं! सोचा कि नास्तिक हूं मैं, अगर इतना महानास्तिक मैं भी नहीं हूं। शंकर को पैर लगाते मेरी भी छाती कंप जाएगी। कहीं हो ही अगर! कहता हूं कि नहीं है। लेकिन पक्का भरोसा नहीं है नहीं होने का। कहीं हो ही अगर? और पैर लग जाए, तो कोई झंझट खड़ी हो जाए। किसके पास मुझे भेज दिया! लेकिन जब अब आ ही गया हूं, तो इससे दो बात कर ही लेनी चाहिए। वैसे बेकार है। यह मुझसे भी गया-बीता मालूम पड़ता है!
और जो आदमी शंकर की पिंडी पर पैर रखकर सो रहा है, उसको उठाने की हिम्मत न हो सकी। पता नहीं नाराज हो, क्या करे! ऐसे आदमी का भरोसा नहीं। बैठकर प्रतीक्षा की। कोई दस बजे एकनाथ उठे।
उस आदमी ने कहा कि महाराज, आया था पूछने कुछ ज्ञान; अब तो कोई जरूरत न रही पूछने की। क्योंकि आप मुझसे भी आगे गए हुए मालूम पड़ते हैं! पूछने कुछ और आया था, अभी पहले तो मैं यह पूछना चाहता हूं, यह कोई उठने का समय है? साधु-संत ब्रह्ममुहूर्त में उठते हैं!
एकनाथ ने कहा कि ब्रह्ममुहूर्त ही है। असल में जब साधु-संत उठते हैं, तभी ब्रह्ममुहूर्त! न हम अपनी तरफ से सोते हैं, न अपनी तरफ से उठते हैं। जब वह सो जाता है, सो जाता है; जब वह उठता है, तब उठ जाता है। तो हमने तो एक ही जाना कि जब नींद खुल गई ब्रह्म की, तो ब्रह्ममुहूर्त है! हम अपनी तरफ से सोते भी नहीं, अपनी तरफ से जागते भी नहीं। ब्रह्म को जब सोना है, सो जाता है; ब्रह्म को जब जगना है, जग जाता है। यह ब्रह्ममुहूर्त है, क्योंकि ब्रह्म उठ रहे हैं!
उसने कहा, गजब की बात कह रहे हैं आप भी। और मुश्किल में डाल दिया। हम तो पूछने आए थे, ब्रह्म है या नहीं? अब हम और मुश्किल में पड़ गए! क्योंकि आप तो कह रहे हैं, आप ही ब्रह्म हैं! एकनाथ ने कहा कि यह ही नहीं कह रहा हूं कि मैं ही ब्रह्म हूं, यह भी कह रहा हूं कि तू भी ब्रह्म है। फर्क इतना ही है कि तुझे अपने होने का पता नहीं, मुझे अपने होने का पता है।
उसने कहा, छोड़िए इस बात को। यह भी आपसे पूछ लूं कृपा करके कि शंकर की पिंडी पर पैर रखकर सोना कौन-सा तुक है! एकनाथ कहने लगे, मैंने सब जगह पैर रखकर देखा, शंकर को ही पाया। कहीं भी पैर रखूं, फर्क क्या पड़ता है! जहां भी पैर रखूं, वही है। शंकर की पिंडी पर रखूं, तो वही है, अगर ऐसा होता, तो एक बात थी। जहां भी पैर रखूं, वही है। तो फिर मैंने फिक्र छोड़ दी।
उस आदमी ने कहा, तो मैं जाऊं! क्योंकि अभी हम भी इस हालत पर नहीं पहुंचे कि शंकर की पिंडी पर पैर रख सकें! हम तो कुछ ज्ञान लेने आए थे। आस्तिक होने आए थे। आप महानास्तिक मालूम पड़ते हो। एकनाथ ने कहा, अब इतनी धूप चढ़ गई, जाओगे कहां। भोजन बनाता हूं, भोजन कर लो, फिर जाना।
और एकनाथ गांव में जाकर आटा मांग लाए। फिर उन्होंने बाटियां बनाईं। और जब वे बाटियां बनाकर रख रहे थे, तो एक कुत्ता आकर एक बाटी लेकर भाग गया। तो एकनाथ हंडी लेकर घी की उसके पीछे भागे।
उस आदमी ने समझा कि यह दुष्ट, कुत्ते से भी बाटी छुड़ाकर लाएगा। अजीब संन्यासी मिल गया! ले गया कुत्ता एक बाटी, तो ले जाने दो।
यह भी उसके पीछे दौड़ा कि देखें, यह करता क्या है? एक मील दौड़ते-दौड़ते एकनाथ बामुश्किल उस कुत्ते को पकड़ पाए और पकड़कर कहा कि राम, हजार दफे समझाया कि बिना घी की बाटी हमको पसंद नहीं है खानी; तुमको भी नहीं होगी। नाहक एक मील दौड़वाते हो। हम घी लगाकर थोड़ी देर में रखते; फिर उठाकर ले जा सकते थे! छुड़ाकर बाटी, घी की हंडी में डालकर--कुत्ते के मुंह की जूठी बाटी वापस डालकर--घी में पूरा सराबोर करके मुंह में लगा दी और कहा कि आइंदा खयाल रखना, नहीं तो हड्डी-पसली तोड़ देंगे। न इस राम को पसंद है, न उस राम को पसंद है! जब हम बाटी में घी लगा लें, तभी ले जाया करें। नाहक एक मील दौड़वाया!
उस आदमी ने सोचा कि बड़े मजे का आदमी है! शंकर की पिंडी पर पैर रखकर सोता है, कुत्ते को राम कहता है!
अगर ठीक से समझें, तो यह भजन चल रहा है। ये दोनों ही भजन के रूप हैं। अगर प्रभु सब जगह है, ऐसा स्मरण आ जाए, तो शंकर की पिंडी को अलग कैसे करिएगा! और अगर सब जगह प्रभु है, तो कुत्ते को बिना घी की बाटी कैसे खाने दीजिएगा!
ये दोनों विरोधी बातें नहीं हैं, ये एक ही प्रभु के भजन में लीन चित्त के दो रूप हैं। और संगतिपूर्ण हैं; इनमें कोई विरोध नहीं है।
स्वीकार
कथा :
एक झेन फकीर मर रहा था । मरते वक्त एकदम उठकर बैठ गया और उसने अपने शिष्यों से कहा कि मेरे जूते कहां हैं? उन्होंने कहा, क्या मतलब है? जूते का क्या करियेगा? चिकित्सक तो कहते हैं, आप आखिरी क्षण में हैं और आप ने भी कहा, यह आखिरी दिन है । उसने कहा, इसीलिए तो जूते मांगता हूं । मैं चलकर जाऊंगा मरघट । बहुत हो गया यह दूसरों के कंधों पर जाना । जबर्दस्ती मैं न जाऊंगा । कहते हैं, मनुष्य जाति का पहला आदमी! उस आदमी का नाम था बोकोजू । यह झेन फकीर चलकर गया । कब्र खोदने में भी उसने हाथ बंटाया, फिर लेट गया और मर गया ।
जीसस - देखो खेत में लगे हुए लिली के फूलों को; न तो ये श्रम करते हैं, न ये दुकान करते हैं, न ये बाजार करते । फिर भी कोई अनजान, अपरिचित इनकी सब जरूरतें पूरी कर जाता है । और देखो तो जरा इनके सौंदर्य को । सम्राट सोलोमन भी अपनी सारी सजावट के साथ इतना सुंदर न था, जितने ये खेत के किनारे लगे लिली के फूल हैं । तुम इन जैसे हो जाओ ।
झेन फकीर रिंझाई एक व्यक्ति को बता रहा है झोपड़े के बाहर, कि देखते हो आकाश को छूने वाले बड़े-बड़े वृक्ष? और देखते हो छोटी-छोटी झाड़ियां? और फिर रिंझाई कहता है कि मुझे वर्षों हो गए इन वृक्षों के पास रहते, कभी मैंने झाड़ियों को यह सोचते नहीं देखा कि बड़े वृक्ष बड़े क्यों हैं । और न कभी मैंने बड़े वृक्षों को अकड़ते देखा कि ये झाड़ियां छोटी हैं और हम बड़े हैं ।
तो आदमी पूछता है, इसका राज क्या है?
तो रिंझाई कहता है, इसका राज सिर्फ इतना है कि झाड़ियां प्रकृति से झाड़ियां हैं, वृक्ष प्रकृति से वृक्ष हैं । बड़े होने में कोई पद नहीं, छोटे होने में कोई पदहीनता नहीं । जो प्रकृति वृक्षों को बड़ा बनाती है, वही प्रकृति घास के पौधे को छोटा बनाती है । और जरूरी नहीं है कि जो ऊंचा है, वह हर स्थिति में ऊंचा हो । जब तूफान आते हैं, तो बड़े वृक्ष नीचे गिर जाते हैं और छोटे पौधे बच जाते हैं ।
भीतर की दृष्टि अगर विधायक है, तो कोई कृत्य पाप नहीं है। अगर दृष्टि विध्वंसात्मक है, तो सभी कृत्य पाप हैं।
टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है। मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था। देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां जुड़वां--एक अभी भी उस मृत स्त्री के स्तन से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं--तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?
उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली हाथ वापस लौट गया। उसने जा कर अपने प्रधान को कहा कि मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें, लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है। तीन जुड़वां बच्चियां हैं--छोटी-छोटी, दूध पीती। एक अभी भी मृत स्तन से लगी है, एक रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे दिए जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।
मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा, जिसकी मर्जी से मौत होती है, जिसकी मर्जी से जीवन होता है! तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा मिलेगी। और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।
इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर--क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार टूटता है।
देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा?
उसे जमीन पर फेंक दिया गया। एक चमार, सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा। यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था। उस चमार को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए। इस आदमी को कुछ खाने-पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो--जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए--वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।
उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी-चिल्लायी।
और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा, हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।
देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के पकड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है--मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हजारों खुशियों के द्वार खुल जाएंगे। तो देवदूत हंसा। उसे लगा, अपनी मूर्खता--क्योंकि यह पत्नी भी नहीं देख पा रही है कि क्या घट रहा है!
जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा।
एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं। क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फंसेंगे।
लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। जब चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए?
देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा। तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।
भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर चाहिए। तब वह चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं।
लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन बार हंस लूं...।
दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कि कभी पूरी न होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा। क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं।
तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।
और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है? उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को पाल लिया।
अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो रहा है।
देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूं।
ग्रंथि
कथा :
बुद्ध से कोई पूछता कि क्रोध कैसे छोड़ें तो बुद्ध कहते, पहले यह तो जानो कि तुम क्रोध करते कैसे हो । छोड़ने की बात पीछे । नंबर दो है, दोयम । प्रथम है, तुम क्रोध करते कैसे हो । तो अब तुम ऐसी कोशिश करो कि जब क्रोध हो तब तुम पूरी तरह जागकर देखना कि क्रोध उठता कैसे है । यह सीधी बात है ।
बुद्ध एक दिन सुबह-सुबह अपने भिक्षुओं के बीच आए, बैठे; और उन्होंने एक रुमाल हाथ में लिया हुआ था, उसमें एक गांठ बांधी, दूसरी गांठ बांधी, पांच गांठें बांधीं । भिक्षु देखते रहे चौंककर कि मामला क्या है? ऐसा उन्होंने कभी किया न था ।
फिर उन्होंने पूछा कि भिक्षुओं, इस रुमाल में पांच गांठें लग गईं । तुमने दोनों हालतें देखीं, जब इसमें कोई गांठ न थी और अब जब कि गांठ लग गई । क्या यह रुमाल दूसरा है या वही है? गांठ से शून्य और गांठ लगे रुमाल में कोई फर्क है या यह वही है?
एक भिक्षु ने कहा कि महाराज! आप झंझट में डालते हैं । एक अर्थ में तो यह रुमाल वही है । गांठ जरूर लग गईं लेकिन रुमाल तो वही का वही है । और दूसरे अर्थ में रुमाल वही नहीं है क्योंकि पहले रुमाल में गांठें नहीं थीं । वह गांठ-मुक्त था, इसमें गांठें हैं ।
बुद्ध ने कहा, ऐसा ही आदमी है । आदमी परमात्मा ही है, बस गांठें लग गई हैं । फर्क इतना ही है जितना गांठ लगे रुमाल में और गैर-गांठ लगे रुमाल में है! दोनों बिलकुल एक जैसे हैं । गांठ में थोड़ी उलझन बढ़ गई है, बस । गांठ खोलनी है ।
तो बुद्ध ने कहा, ठीक है, गांठ खोलनी है । तो मैं तुमसे पूछता हूं, मैं क्या करूं कि जिससे गांठ खुल जाएं? और उन्होंने दोनों रुमाल के कोने पकड़कर खींचना शुरू किया । एक भिक्षु ने खड़े होकर कहा कि महाराज! इससे तो गांठें और छोटी हुई जा रही हैं । आप खींच रहे हैं, इससे तो गांठों का खुलना मुश्किल हो जाएगा । यह कोई ढंग न हुआ खोलने का । इससे तो और उलझन बढ़ जाएगी । खींचने से कहीं गांठें खुली हैं? गांठें छोटी होती जा रही हैं, और सूक्ष्म होती जा रही हैं । इतनी छोटी हो जाएंगी तो फिर खोलना मुश्किल हो जाएगा ।
तो बुद्ध ने कहा, मैं क्या करूं? तो उस भिक्षु ने कहा, आप रुमाल मेरे हाथ में दें । मैं पहले देखना चाहता हूं कि गांठें किस ढंग से लगाई गई हैं । क्योंकि जब तक यह पता न हो कि लगाई कैसे गईं तब तक खोली नहीं जा सकतीं । बुद्ध ने कहा, मेरी बात तुम्हारी समझ में आ गई । इतना ही दिखाने के लिए मैंने यह रुमाल, ये गांठें और यह प्रयोग किया था ।
जिस चीज को भी खोलना हो वह लगी कैसे? खोलने के लिए जल्दी मत करना । क्योंकि डर यह है कि कहीं तुम खींचने-तानने में गांठ को और छोटा न कर लो ।
इसेन फकीर कहते हैं, हे परमात्मा, तू परम अंधकार है! The absolute darkness! प्रकाश को जलाओ, बुझाओ, प्रकाश क्षणभंगुर है। अंधेरा शाश्वत है। न जलाओ, न बुझाओ। आपके करने का कोई प्रयोजन नहीं है। आप आओ, जाओ, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दीया जले, बुझे; सूरज निकले, डूबे; अंधकार अपनी जगह है--अछूता, अस्पर्शित, कुंवारा। प्रकाश को गंदा किया जा सकता है; अंधेरे को गंदा नहीं किया जा सकता। उसको छुआ ही नहीं जा सकता।
नसरुद्दीन एक कार से टकरा गया। उसको भारी चोट पहुंची है, जितनी पहुंच सकती है। दोनों पैर की हड्डियां टूट गई हैं, एक हाथ टूट गया है, गर्दन टूट गई है, कई पसलियां टूट गई हैं। सिर पर बहुत चोट हैं। सब पर पट्टियां बंधी हैं। वह अस्पताल में पड़ा है।
सुलतान नगर से गुजर रहा है। खबर मिली कि गांव का सबसे बूढ़ा आदमी और बड़ा जाहिर आदमी अस्पताल में है, तो वह देखने गया है। देख कर उसकी समझ में न आया, क्या कहे। क्योंकि सिर्फ नसरुद्दीन का मुंह दिखाई पड़ता है और दो आंखें दिखाई पड़ती हैं, बाकी सब पट्टियां बंधी हैं। भारी चोट पहुंची है। आदमी बचेगा भी कि नहीं बचेगा! सुलतान कुछ कहना चाहता है, लेकिन कहां से शुरू करे, यह ही समझ में नहीं आता। सहानुभूति भी क्या बताए, मामला ही बिलकुल गड़बड़ है। सहानुभूति बताने लायक भी नहीं है। फिर भी कुछ कहना चाहिए, तो वह कहता है कि बहुत ज्यादा चोट पहुंची; पैर टूट गया, हाथ टूट गया, सिर पर चोट पहुंची, मुंह पर चोट पहुंची, पसलियां टूट गईं, बड़ी पीड़ा होती होगी नसरुद्दीन! बहुत ज्यादा दुख, बहुत ज्यादा दर्द होता होगा! नसरुद्दीन कहता है, नहीं, वैसे तो नहीं होता; होता है, When I laugh.. उसने कहा कि जब मैं हंसता हूं, तब थोड़ा होता है, ऐसे नहीं होता। वह सुलतान तो समझ ही नहीं सका कि ऐसी हालत में कोई आदमी हंसेगा काहे के लिए। उसको खयाल में ही नहीं आया, कल्पना ही के बाहर था कि यह हंसेगा। वह नसरुद्दीन बोला, नहीं, ऐसे कोई तकलीफ नहीं हो रही; जरा हंसता हूं, तो थोड़ी तकलीफ होती है। सुलतान की हिम्मत न पड़ी कि अब और कुछ आगे क्या कहे। फिर भी उसने कहा, आ ही गया हूं तो अच्छा ही हुआ, एक सवाल पूछ कर चला जाऊं। क्या नसरुद्दीन, ऐसी हालत में भी हंस पाते हो? नसरुद्दीन ने कहा, अगर ऐसी हालत में न हंस पाऊं, तो हंसना सीखा ही नहीं। यानी और हंसने का क्या मतलब हो सकता है! और हंसने का मौका क्या हो सकता है! और हंसता हूं इसलिए कि अब तक कई बार ऐसा भ्रम होता था, लेकिन पक्का पता नहीं था, सोचा बहुत बार था, अब पता चला कि नसरुद्दीन हड्डियां कितनी ही टूट जाएं, नसरुद्दीन नहीं टूटता। इधर भीतर हंस लेता हूं कि बड़ा मजा है! सब टूट गया है। जो आ रहा है, वही दया दिखला रहा है; लेकिन मुझको खुद दया नहीं आ रही है। सब टूट गया है, सब फूट गया है; अब इसमें कुछ है नहीं ज्यादा बचने वाला। हंसी आ रही है इससे। और लोग मुझसे आकर पूछते हैं, कैसे हो नसरुद्दीन? नसरुद्दीन बिलकुल ठीक है; नसरुद्दीन बिलकुल ठीक है। ये जो ग्रंथियां हैं मन की, इनके बीच में अगर आप अलग दिख जाएं, तो ग्रंथियां तत्काल गिर जाती हैं। फिर आप बिलकुल ठीक हैं। वे सारी पट्टियां बंधी रहेंगी, आपकी सब ग्रंथियां उलझी रहेंगी, चारों तरफ सब उपद्रव बना रहेगा, सब बाजार खड़ा रहेगा; आप अचानक बाहर हो जाते हैं। You transcend it। अतिक्रमण है। अतिक्रमण में ही सुलझाव है। गुत्थियां सुलझाई नहीं जा सकतीं, इन गुत्थियों के पार होने में सुलझाव है।
अनुपम
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन शराबघर गया । शेखी मारना उसकी आदत है । शेखी मार रहा था शराबघर के मालिक के सामने कि मैं हर तरह की शराब स्वाद लेकर पहचान सकता हूं । और ऐसा ही नहीं है, अगर तुम दस-पांच शराबें भी इकट्ठी एक प्याली में मिला दो तो भी मैं बता सकता हूं कि कौन-कौन सी शराब मिलाई गई है ।
मालिक ने कहा तो रुको । वह भीतर गया, मिला लाया एक ग्लास में मार्टिनी, ब्रांडी, रम, ह्विस्की--जो भी उसके पास था, सब मिला लाया । मुल्ला पी गया और एक-एक शराब का नाम उसने ले लिया कि ये-ये चीजें इसमें मिली हैं । चकित हो गया वह मालिक भी । उसने कहा, एक बार और । वह भीतर गया और एक गिलास में सिर्फ पानी भर लाया । मुल्ला ने पीया, बड़ा बेचैनी में खड़ा रह गया । कुछ सूझे न । शुद्ध पानी है । स्वाद ही उसे इसका याद नहीं रहा है शुद्ध पानी का ।
उसने इतना ही कहा, कि यह मैं नहीं जानता यह क्या है! मगर एक बात कह सकता हूं, इसकी बिक्री न होगी ।
हमारा जो भी अनुभव है वह
- कई तरह की शराबों का है । शुद्ध जल का तो हम स्वाद ही भूल गए हैं
- बेहोशियों का है; होश का तो हम स्वाद ही भूल गए
- विक्षिप्तताओं का है, स्वास्थ्य का तो हम स्वाद ही भूल गए
- गर्हित, व्यर्थ, असार का है; सार का तो हम स्वाद ही भूल गए
हमें तो वही शब्द समझ में आते हैं, जो हमारे अनुभव के हैं ।
इसलिए महावीर कहते हैं 'अनुपम' ।
बुद्ध के जीवन में एक उल्लेख है। एक सम्राट आया बुद्ध को मिलने। स्वभावतः सम्राट था तो उसने एक बहुमूल्य कोहिनूर जैसा हीरा अपने हाथ में ले लिया। चलते वक्त उसकी पत्नी ने कहा कि पत्थर ले जा रहे हो। पत्नी ज्यादा समझदार होगी।
स्त्रियां अक्सर पुरुषों से ज्यादा भावपूर्ण होती हैं। भाव की एक समझ होती है। पत्नी ने कहाः पत्थर ले जा रहे हो। माना कि कितना ही मूल्यवान है; लेकिन बुद्ध के लिए इसका क्या मूल्य? जिसने सब साम्राज्य छोड़ दिया, उसके लिए पत्थर ले जा रहे हो। यह भेंट कुछ जंचती नहीं। अच्छा तो हो कि अपने महल के सरोवर में पहला कमल खिला है मौसम का, तुम वही ले जाओ। वह कम से कम जीवित तो है। और बुद्ध कमलवत हैं। उनके जीवन का फूल खिला है। उसमें कुछ प्रतीक भी है। इस पत्थर में क्या है? यह तो बिल्कुल बंद है, जड़ है।
बात तो उसे जंची, तो उसने सोचा कि एक हाथ खाली भी है; पत्थर तो ले ही जाऊंगा, क्योंकि मुझे तो इसी में मूल्य है। तो, मैं तो वही चढ़ाऊंगा जिसमें मुझे मूल्य है। लेकिन तू कहती है, तेरी बात भी हो सकती है कि ठीक हो। और बुद्ध को मैं जानता भी नहीं कि किस तरह के आदमी हैं।
तो फूल भी ले लिया। एक हाथ में कमल है, एक हाथ में हीरा, लेकर वह सम्राट बुद्ध के चरणों में गया। जैसे ही बुद्ध के पास पहुंचा और हीरे का हाथ उसने आगे बढ़ाया, बुद्ध ने कहाः गिरा दो।
मन में तो बड़ी उसे चोट लगी। चढ़ा दो नहीं, बुद्ध ने कहा, गिरा दो। अभी हाथ जरा सा बढ़ाया ही था, मगर जब बुद्ध ने कहा, गिरा दो, चोट तो लगी अहंकार को कि बहुमूल्य हीरा है, गिराने की चीज नहीं है। ऐसा हीरा दूसरा पृथ्वी पर खोजना मुश्किल है। यह मेरे खजाने का सिरमौर है।
मगर अब बुद्ध के सामने न गिराए तो भी फजीहत होगी, और हजारों भिक्षु बैठे हैं, और सब की आंखें टंगी हैं। उसने बड़े बेमन से, गिराना तो नहीं चाहता था, लेकिन गिरा दिया। सोचा, शायद पत्नी ने ही ठीक कहा हो। दूसरा हाथ आगे बढ़ाया, और जरा ही आगे गया था कि बुद्ध ने फिर कहाः गिरा दो।
अब तो उसे जरा समझ के बाहर हो गई बात कि यह आदमी कुछ भी नहीं समझता। न बुद्धि की बात समझता है, न हृदय की बात समझता है। बुद्धि के लिए हीरा था; गणित था उसमें, हिसाब था, धन था। प्रेम कमल, भाव हृदय..और इसको भी कहता है, गिरा दो! और मेरी पत्नी तो इसके चरणों में बहुत आती है। वह इसे पहचानती है। और यह उसको भी नहीं समझ पाया। मगर अब जब कहता है...। और जब हीरा गिरा दिया तो अब इस कमल में क्या रखा है, दो कौड़ी का है।
उसने गिरा दिया। तब वह खाली हाथ बुद्ध की तरफ झुकने लगा, बुद्ध ने कहाः गिरा दो। तब तो उसने समझा कि यह आदमी पागल है। अब कुछ है ही नहीं गिराने को। दोनों हाथ खाली हैं।
उसने कहाः अब क्या गिरा दूं?
बुद्ध तो चुप रहे; बुद्ध के एक भिक्षु ने, सारिपुत्र ने कहाः अपने को गिरा दो! हीरे और कमलों को गिराने से क्या होगा? अपने को गिरा दो! शून्यवत हो जाओ तो ही उन चरणों का स्पर्श हो पाएगा। तुम बचे, चरण दूर; तुम मिटे, चरण पास।
तब कहते हैं, उस सम्राट को उसी क्षण बोध हुआ। वह गिर गया। वह सच ही गिर गया। जब वह उठा तो दूसरा आदमी था। वह महल की तरफ वापस न गया। वह भिक्षु हो गया! यह संन्यस्त हो गया! उसने कहाः जब गिरा ही दिया तो अब वापस जाने वाला न बचा। बहुत दूसरों ने समझाया कि इतनी कोई जल्दी नहीं। उसने कहाः अब बात ही नहीं, जब मैं ही न रहा तो कौन वापस जाए? जो आया था वह अब नहीं है। अब बुद्ध मुझ में समा गए। उनकी बांसुरी मुझे सुनाई पड़ी! जरा सा सुर इतना मधुर है, तो पूरे संगीत का कैसा आनंद होगा!
ममत्व
कथा :
जीसस -- ऊंट भी निकल सकता है सुई के छेद से, लेकिन वे जो धनवान हैं, वे मेरे मोक्ष के द्वार से न निकल सकेंगे ।
एक सम्राट एक चर्च में प्रार्थना कर रहा था । कोई धर्म का बड़ा दिन था और सभी प्रार्थना को आए थे । सम्राट भी आया था । और फिर प्रार्थना करते-करते जोश में चढ़ गया, जैसा कि हम सभी चढ़ जाते हैं । और फिर वह जरा ज्यादा बातें कहने लगा । वह यह तक बोल गया कि हे प्रभु, मैं तेरे चरणों में क्षुद्र से क्षुद्र धूल हूं, मैं ना-कुछ हूं, मैं कुछ भी नहीं हूं । जब वह यह कह रहा था, तब उसने देखा कि पास में एक साधारण आदमी भी प्रार्थना कर रहा है और वह भी प्रभु से कह रहा है कि मैं भी कुछ नहीं हूं, ना-कुछ हूं । उस सम्राट ने कहा कि सुन, यह कौन मुझसे प्रतियोगिता कर रहा है? ध्यान रहे, मेरे राज्य में मुझ सा ना-कुछ, मुझसे ज्यादा ना-कुछ और कोई भी नहीं है ।
हम अपने न-होने को भी संपत्ति और धन बना सकते हैं! यह सम्राट यह भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई और भी हो उसके राज्य में, जो कह सके कि मैं कुछ भी नहीं हूं । उसमें भी सम्राट ही आगे होगा ।
जीसस का मतलब धनवान से यह नहीं कि जिनके पास धन है । धनवान से मतलब है कि जिसके मन में मैं कुछ हूं, ऐसा भाव है । ऐसा व्यक्ति उस द्वार से न निकल सकेगा ।
जब पार का दिखायी पड़ता है, तो श्रद्धा उतरती है।
सूफी फकीर हुआ हफीज। महाकवि भी हुआ। उसने एक गीत लिखा। गीत, ऐसा लगता है अपनी प्रेयसी के लिए लिखा है। गीत में उसने कहा कि तेरी ठोड़ी पर जो तिल का निशान है, उसके लिए मन होता है बुखारा दे दूं, कि समरकंद! समरकंद और बुखारा का मालिक उस समय था तैमूरलंग। वह बहुत नाराज हो गया, जब उसके कान में यह गीत पड़ा कि यह कौन है? मालिक मैं हूं, यह देने वाला कौन है?
उसने हफीज को पकड़वा बुलाया। उसने कहा कि हद्द हो गयी। पहली तो बात यह कि किसी स्त्री के ठोड़ी पर तिल है, यह इस योग्य नहीं कि तुम बुखारा और समरकंद दे दो। फिर दूसरी बात यह कि पहले यह भी तो पक्का कर लो कि बुखारा-समरकंद तुम्हारे बाप के हैं, जो तुम दे रहे हो? ये मेरे हैं। मैं अभी जिंदा हूं। तुमने मुझसे पूछे बिना यह कविता कैसे लिखी?
हफीज हंसने लगा इस मूढ़ता पर। उसने कहा, सुनो! पहले तो जिसके तिल की बात है, बुखारा-समरकंद उसी के हैं। तुम नाहक बीच में उपद्रव कर रहे हो। तुम आज हो, कल न रहोगे। जिसके तिल की बात है, बुखारा-समरकंद उसी के हैं--वह तो परमात्मा की बात कर रहा है, सूफी फकीर परमात्मा को प्रेयसी के रूप में बात करते हैं--और फिर दूसरी बात, उसी की चीज उसी को लौटा देने में क्या लगता है? न बुखारा-समरकंद तुम्हारे हैं, न मेरे, वह मुझे भी पता है। मगर जिसके हैं उसी को मैं लौटा रहा हूं, तुम बाधा डाल रहे हो; देखो, पीछे पछताओगे। और हफीज ने कहा, सुनो! मैं गरीब आदमी हूं, लेकिन मेरा दिल तो देखो! कुछ मेरे पास नहीं, बुखारा-समरकंद दे दिए। तुम्हारे पास सब है, अपनी कृपणता तो देखो!
हफीज की ऐसी बात सुनकर कहते हैं तैमूरलंग भी हंसने लगा। अन्यथा वह हंसने वाला आदमी न था।
दुनियां के मजदूरों, एक हो जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास खोने को सिवाय जंजीरों के और कुछ भी नहीं।
पात्र
कथा :
सूफी फकीर बायजीद से किसी ने पूछा कि क्या मैं कुछ प्रश्न पूछ सकता हूं? तो बायजीद ने कहा, तुम पूछ सकते हो; लेकिन तुम प्रश्न पूछ सकते हो, इसीलिए उत्तर पाने के योग्य भी हो, ऐसा मत सोचना । तुम प्रश्न पूछोगे, जरूरी नहीं है कि मैं उत्तर भी दूं । क्योंकि उत्तर मैं तभी दे सकता हूं, जब तुम पात्र हो उत्तर को झेलने के ।
गलत आदमी को दिया गया ज्ञान खतरनाक हो सकता है । अपात्र के हाथ में शक्ति, स्वयं उसके लिए और दूसरों के लिए भी हानिकर हो सकती है । अमृत भी अपात्र में जहर हो जाता है ।
बुद्ध ने घर छोड़ा । तो वे गए; जो भी जानता था, उसके पास गए । और उससे कहा कि मैं परम सत्य की खोज में आया हूं, तुम्हें परम सत्य हो पता तो मुझे कहो । तो अदभुत लोग थे! जिन्हें नहीं पता था, उन्होंने कहा, परम सत्य का हमें पता नहीं; हम तो शास्त्र सत्य को जानते हैं । तो वह हम तुमसे कह सकते हैं । तो बुद्ध ने कहा, शास्त्र सत्य मुझे नहीं जानना, मुझे तो सत्य ही जानना है । तो उन्होंने कहा, तुम और किसी के पास जाओ ।
फिर बुद्ध उनके पास गए, जिन्होंने उन्हें साधना कराई । एक व्यक्ति के पास बुद्ध तीन वर्ष तक साधना करते थे । जो-जो उसने कहा, वह उन्होंने पूरा किया । जब सब पूरा कर डाला, तब बुद्ध ने कहा कि अब कुछ और भी करने को बचा है? या मेरे करने में कोई भूल-चूक रही है? उस गुरु ने कहा, नहीं, तुम्हारे करने में कोई भूल-चूक नहीं रही; तुमने पूरी निष्ठा से पूरा कर दिया है । तो बुद्ध ने कहा, लेकिन मुझे परम सत्य का अभी तक कोई पता नहीं चला । तो उस व्यक्ति ने कहा, जितना मैं जानता था, उतना मैंने तुम्हें करवा दिया । परम सत्य का मुझे भी कोई पता नहीं है । अब तुम कहीं और जाओ; तुम किसी और को खोजो ।
बुद्ध छह वर्ष तक ऐसे चक्कर काटते फिरे । जिसके पास जो सीखने मिला, उन्होंने सीखा । जब तक नहीं सीखा, तब तक सवाल भी नहीं पूछा । यह बड़े मजे की बात है । तीन साल एक आदमी के पास समाप्त किए हैं । जब उस आदमी ने कहा, अब मुझे सिखाने को कुछ भी नहीं है; तब बुद्ध ने कहा, लेकिन परम सत्य मुझे अभी नहीं मिला । तीन साल पहले पूछना था यह बात कि परम सत्य तुम्हारे पास है? तीन साल खराब करके यह पूछने की क्या जरूरत है?
असली सवाल यह नहीं है कि परम सत्य किसी के पास है । असली सवाल यह है कि तुम पहले अपने को योग्य बनाते हो या नहीं । इसलिए तीन साल बाद पूछा । क्योंकि यह योग्यता भी तो आनी चाहिए कि मैं पूछ सकूं । जब गुरु ही कहने लगा कि अब मेरे पास सिखाने को कुछ भी नहीं, तब बुद्ध ने कहा, लेकिन परम सत्य मुझे नहीं मिला । और तुमने जो सिखाया, वह मैंने पूरा किया । अगर उसमें कोई कमी रही हो तो मुझे बताओ । मैं उसे पूरा करने को तैयार हूं । पर उसने कहा कि नहीं, तुम पूरा कर चुके हो । और अब बताने को मेरे पास कुछ भी नहीं । जितना मैं जानता था, वह मैंने तुमसे कह दिया । उसके आगे तुम कहीं और खोजो ।
बुद्ध सारे गुरुओं के पास भटक लिए, सारे शास्त्रियों के पास भटक लिए, नहीं मिला । फिर वे अकेली अपनी यात्रा पर चले गए । लेकिन अपनी अकेली यात्रा पर जाने के पहले उन्होंने सब द्वार-दरवाजे खटखटा लिए । ध्यान रहे, अकेले की यात्रा भी वही कर सकता है, जिसने बहुतों के साथ चल कर देख लिया हो । अकेले की यात्रा पर भी वही जा सकता है, जो बहुत सी यात्राओं पर बहुतों के साथ जा चुका हो । हमारे चारों तरफ न मालूम कितना-कितना जानने वाले लोग हैं । जितना वे जानते हैं, उतने दूर तक तो उनके साथ चल लेना उचित है । उसके पहले अकेले होने की जिद्द भी खतरनाक है और नुकसानदायक है । यह अनुभव भी आवश्यक है--अकेले हो जाने के लिए ।
तो बुद्ध ने एक-एक को खोजा । जो जहां तक ले जा सकता था, वहां तक ले गया । उसको धन्यवाद दिया कि उसने इतनी कृपा की, और विदा हुए । जब उन्हें परम सत्य का अनुभव हुआ, तब उन्होंने कहा कि मैं सोचता था कि शायद जिनके पास मैं गया हूं, वे मुझसे कुछ छिपा तो नहीं रहे हैं । लेकिन अब मैं कह सकता हूं, उन्होंने कुछ भी न छिपाया था । असल में, परम सत्य बात ऐसी थी कि उसे कोई दूसरा नहीं दे सकता था । उसे कोई दूसरा नहीं दे सकता था । और मैं दूसरे से ले भी नहीं सकता था, क्योंकि मेरे मौन की भी वैसी क्षमता न थी । मैं शब्द से ही पूछता था, शब्द से ही वे बताते थे । जब कोई परम मौन में उतरने लगे, तभी तो परम मौन में उसे कहा भी जा सकता है ।
निःसंशय वही हो सकता है, जिसने संदेह को दबाया नहीं, संदेह को रूपांतरित किया, ट्रांसफार्म किया और जिज्ञासा बनाई।
एक सूफी फकीर के आश्रम में प्रविष्ट होने के लिये चार स्त्रियां पहुंचीं। उनकी बड़ी जिद थी, बड़ा आग्रह था। ऐसे सूफी उन्हें टालता रहा, लेकिन एक सीमा आई कि टालना भी असंभव हो गया। सूफी को दया आने लगी, क्योंकि वे द्वार पर बैठी ही रहीं--भूखी और प्यासी; और उनकी प्रार्थना जारी रही कि उन्हें प्रवेश चाहिए।
उनकी खोज प्रामाणिक मालूम हुई तो सूफी झुका। और उसने उन चारों की परीक्षा ली। उसने पहली स्त्री को बुलाया और उससे पूछा, "एक सवाल है। तुम्हारे जवाब पर निर्भर करेगा कि तुम आश्रम में प्रवेश पा सकोगी या नहीं। इसलिए बहुत सोच कर जवाब देना।'
सवाल सीधा-साफ था। उसने कहा कि एक नाव डूब गई है; उसमें तुम भी थीं और पचास थे। पचास पुरुष और तुम एक निर्जन द्वीप पर लग गये हो। तुम उन पचास पुरुषों से अपनी रक्षा कैसे करोगी? यह समस्या है।
एक स्त्री और पचास पुरुष और निर्जन एकांत! वह स्त्री कुंआरी थी। अभी उसका विवाह भी न हुआ था। अभी उसने पुरुष को जाना भी न था। वह घबड़ा गई। और उसने कहा, कि अगर ऐसा होगा तो मैं किनारे लगूंगी ही नहीं; मैं तैरती रहूंगी। मैं और समुद्र में गहरे चली जाऊंगी। मैं मर जाऊंगी, लेकिन इस द्वीप पर कदम न रखूंगी।
फकीर हंसा, उसने उस स्त्री को विदा दे दी और कहा, कि मर जाना समस्या का समाधान नहीं है। नहीं तो आत्मघात सभी समस्याओं का समाधान हो जाता।
यह पहला वर्ग है, जो आत्मघात को समस्या को समाधान मानता है। तुम चकित होओगे, कि तुममें से अधिक लोग इसी वर्ग में हैं। हर बार जीवन में वही समस्याएं हैं, वही उलझने हैं, और हर बार तुम्हारा जो हल है, वह यह है कि किसी तरह जी लेना और मर जाना। फिर तुम पैदा हो जाते हो।
इस संसार में मरने से तो कुछ हल होता ही नहीं। फिर तुम पैदा हो जाते हो, फिर वही उलझन, फिर वही रूप, फिर वही झंझट, फिर वही संसार; यह पुनरुक्ति चलती रहती है। यह चाक घूमता रहता है। तुम्हारे मरने से कुछ हल न होगा। तुम्हारे बदलने से हल हो सकता है। मरने से हल नहीं हो सकता। मर कर भी तुम, तुम ही रहोगे। फिर तुम लौट आओगे।
और अगर एक बार आत्मघात समस्या का समाधान मालूम हो गया तो तुम हर बार यही करोगे। तुम्हारे मन में भी अनेक बार किसी समस्या को जूझते समय जब उलझन दिखाई पड़ती है और रास्ता नहीं मिलता, तो मन होता है, मर ही जाओ। आत्महत्या ही कर लो। यह तुम्हारे जन्मों-जन्मों का निचोड़ है। पर इससे कुछ हल नहीं होता। समस्या अपनी जगह खड़ी रहती है।
दूसरी स्त्री बुलाई गई। वह दूसरी स्त्री विवाहित थी, उसका पति था। यही सवाल उससे भी पूछा गया, कि पचास व्यक्ति हैं, तू है; नाव डूब गई है सागर में, पचास व्यक्ति और तू एक निर्जन द्वीप लग गये हैं। तू अपनी रक्षा कैसे करेगी?
उस स्त्री ने कहा, इसमें बड़ी कठिनाई क्या है? उन पचास में जो सबसे शक्तिशाली पुरुष होगा, मैं उससे विवाह कर लूंगी। वह एक, बाकी उनचास से मेरी रक्षा करेगा।
यह उसका बंधा हुआ अनुभव है। लेकिन उसे पता नहीं, कि परिस्थिति बिलकुल भिन्न है। उसके देश में यह होता रहा होगा, कि उसने विवाह कर लिया और एक व्यक्ति ने बाकी से रक्षा की। लेकिन एक व्यक्ति बाकी से रक्षा नहीं कर सकता। एक व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली हो, पचास से ज्यादा शक्तिशाली थोड़े ही होगा। रक्षा असल में एक पति थोड़े ही करता है स्त्री की! जो पचास की पत्नियां हैं, वह उन पचास को सीमा के बाहर नहीं जाने देतीं।
इसलिए वह जो उसका अनुभव है, इस नई परिस्थिति में काम न आयेगा। वह एक आदमी मार डाला जायेगा, वह कितना ही शक्तिशाली हो। उसका कोई अर्थ नहीं है। पचास के सामने वह कैसे टिकेगा?
पुराना अनुभव हम नई परिस्थिति में भी खींच लेते हैं। हम पुराने अनुभव के आधार पर ही चलते जाते हैं, बिना यह देखे कि परिस्थिति बदल गई है और यह उत्तर कारगर न होगा।
फकीर ने उस स्त्री को विदा कर दिया और उससे कहा, कि तुझे अभी बहुत सीखना पड़ेगा, इसके पहले कि तू स्वीकृत हो सके। तूने एक बात नहीं सीखी है अभी, कि परिस्थिति के बदलने पर समस्या ऊपर से चाहे पुरानी दिखाई पड़े, भीतर से नई हो जाती है। और नया समाधान चाहिये।
महावीर को विदा हुए पच्चीस सौ साल हो गये। पच्चीस सौ सालों में सारी समस्याएं बदल गई, संसार बदल गया, आदमी के होने का ढंग बदल गया, आदमी की चेतना बदल गई। तुम पुराना उत्तर पीटे चले जा रहे हो! तुम यह भूल ही गये हो, कि अब वह समस्या ही नहीं है, जिसके लिये तुम्हारे पास समाधान है। समस्या समाधान में कोई तालमेल नहीं रहा।
वह दूसरी स्त्री विदा कर दी गई। तीसरी स्त्री बुलाई गई, वह एक वेश्या थी। और जब फकीर ने उसे समस्या बताई कि समस्या यह है, कि पचास आदमी हैं, तुम हो, नाव डूब गई, एकांत निर्जन द्वीप होगा, तुम अकेली स्त्री होओगी। समस्या कठिन है; तुम क्या करोगी?
वह वेश्या हंसने लगी। उसने कहा, मेरी समझ में आता है कि नाव है, पचास आदमी हैं, एक स्त्री मैं हूं। फिर नाव डूब गई है, पचास आदमी और मैं किनारे लग गये, निर्जन द्वीप है, समझ में आता; लेकिन समस्या क्या है? वेश्या के लिये समस्या हो ही नहीं सकती! इसमें समस्या कहां है, यह मेरी समझ में नहीं आता। और जब समस्या ही न हो, तो समाधान का सवाल ही नहीं उठता।
बहुत से लोग हैं तीसरे वर्ग में, जो कहते हैं समस्या कहां है? परमात्मा है कहां, जिसको तुम खोज रहे हो? ध्यान होता कहां है, जिसकी तुम तलाश कर रहे हो? प्रार्थना, पूजा बकवास है। मोक्ष, निर्वाण सपने हैं। समस्या है कहां? तुम क्यों व्यर्थ पालथी मार कर बैठे हो? क्यों लगा रखा है यह सिद्धासन? किसके लिए आंख बंद किये बैठे हो? कोई आनेवाला नहीं है। कहां जा रहे हो मंदिर-मस्जिदों में? वहां कोई भी नहीं है। सब पुरोहितों का जाल है। शास्त्रों को पढ़ रहे हो? सब कुशल लोगों की उक्तियां हैं। चालाकों का खेल है। मत पड़ो उलझन में; समस्या कोई है ही नहीं। इसलिए समाधान की चिंता मत करो। किस गुरु के पास जा रहे हो, किसलिए जा रहे हो? प्रश्न ही नहीं है, पूछना क्या है?
तीसरे वर्ग के लोग भी हैं। वे इतने दिन तक समस्या में रह लिए हैं, कि समस्या दिखाई पड़नी ही बंद हो गई। जब तुम बहुत किसी चीज के आदी हो जाते हो, तो तुम्हारी आंखें धुंधली हो जाती हैं। फिर वह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। अगर तुम्हारे घर के सामने ही कोई वृक्ष लगा हो, तो वह तुम्हें दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। तुम उसे रोज देखते हो, वह दिखाई पड़ना बंद हो जाता है।
"समस्या कहां है?' वेश्या ने पूछा।
वेश्या भी विदा कर दी गई। क्योंकि जिसके लिए समस्या ही नहीं है, उसे समाधान की यात्रा पर कैसे भेजा जा सकता है?
चौथी स्त्री के सामने भी वही सवाल फकीर ने रखा। उस स्त्री ने सवाल सुना, आंखें बंद कीं, आंखें खोलीं और कहा, "मुझे कुछ पता नहीं। मैं निपट अज्ञानी हूं।'
वह चौथी स्त्री स्वीकार कर ली गई। ज्ञान के मार्ग पर वही सकता है, जो अज्ञान को स्वीकार ले।
स्वाभाविक है यह बात। क्योंकि अगर तुम्हारे पास उत्तर है ही, तो फिर किसी उत्तर की कोई जरूरत न रही। उत्तर है ही, इसका अर्थ है तुम स्वयं ही अपने गुरु हो; किसी गुरु का कोई सवाल न रहा। गुरु की खोज वही कर पाता है, जिसके पास कोई उत्तर नहीं है।
समस्या है! विराट समस्या है। समाधान का कोई ओर-छोर नहीं मिलता।
जीवन एक पहेली है। सुलझाने की कोई कुंजी हाथ नहीं। जितना ही जीवन को देखते हैं, उतनी ही उलझन बढ़ती है, रहस्य बढ़ता है। कल तक जिन बातों को जानते थे कि जानते हैं, वे भी अनजानी हो जाती हैं। उनके भी धागे हाथ से छूट जाते हैं।
जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, वैसे-वैसे अज्ञान की स्पष्ट प्रतीति होती है। और जिसको अज्ञान का अहसास होता है, वही केवल गुरु के द्वार पर दस्तक देने में समर्थ है। और जो परम-अज्ञान को अनुभव करता है, वही केवल गुरु के चरणों में झुक पाता है।
बीमार
कथा :
आज से कोई सौ वर्ष पहले अमेजन नदी के किनारे पहली दफा एक कबीले का पता चला । उस कबीले में जाकर खयाल में आया कि पूरा कबीला मलेरिया से बीमार है, पूरा कबीला । सब बच्चे बिना मलेरिया के पैदा होते हैं उस कबीले में भी; लेकिन पैदा होते से ही मलेरिया पकड़ जाता है, क्योंकि पूरा कबीला बीमार है, और चारों तरफ मच्छर हैं, मलेरिया के कीटाणु हैं ।
उस कबीले को पता ही नहीं कि मलेरिया कोई बीमारी है, क्योंकि जब सभी बीमार हों, तो बीमारी नार्मल हो गई । तो वह कबीला तो मानकर ही चलता है कि ऐसा तो होता ही है जीवन में, यह बीमारी तो जीवन के साथ ही जुड़ी है और जब सभी बच्चे पैदा होते से ही बीमार हो जाते हैं, तो उन्हें कभी पता ही नहीं चलता कि वे बीमारी को ही स्वास्थ्य समझ लेते हैं । आधा-आधा जीते हैं, अधूरे, मरे-मरे जीते हैं । लेकिन यही स्वास्थ्य है । क्योंकि और स्वास्थ्य का कोई मापदंड भी तो नहीं है, जिससे तुलना की जा सके ।
मनस्विद कहते हैं कि यह सारी की सारी पृथ्वी विक्षिप्त है । और अगर मंगल ग्रह से कभी या और किसी ग्रह से कभी कोई दूसरा चैतन्य प्राणी इस पृथ्वी पर आए, तो शायद हमें पता चले कि हम सब विक्षिप्त हैं । और हम पैदा होते ही हो जाते हैं । सब बच्चे स्वस्थ पैदा होते हैं और होने के बाद रोग पकड़ना शुरू हो जाता है । क्योंकि बाप भी बीमार है, मां भी बीमार है, परिवार बीमार है, समाज बीमार है, देश बीमार है । पूरी मनुष्यता बीमार है और सब तरफ विक्षिप्तता के कीटाणु हैं । यह जो बीमार आदमी आपके भीतर पैदा हो जाता है, वह है आपकी छाया । और उसको आप इतने जोर से पकड़ लेते हैं, आप समझते हैं कि यही आपकी आत्मा, तो फिर छूटना मुश्किल हो जाता है ।
जो मानता है कि मैं मुक्त हूं, वह मुक्त है और जो मानता है कि मैं बद्ध हूं, वह बद्ध है । यह जनश्रुति सत्य ही है कि 'जैसी मति वैसी गति ।'
न्यूयार्क में एक आदमी रोज रात अपनी छत से, साठ मंजिल मकान की छत से, दूसरे की छत पर कूद जाता था। वापस कूद आता था। पर यह नींद में ही होता था। नियमित कम था। कोई रात दो बजे! धीरे—धीरे यह बात मुहल्ले—पड़ोस में पता चल गई। लोग देखने भी खड़े होने लगे। कोई आदमी होश में नहीं कूद सकता। दोनों मकानों के बीच काफी फासला है और खतरा बड़ा है। क्योंकि साठ मंजिल का गड्ढ़ है बीच में।
लेकिन एक रात काफी लोग इकट्ठे हो गए। और जब वह आदमी कूदा, तो उन्होंने सिर्फ जोश में आवाज लगा दी। उस आदमी की नींद टूट गई। जैसे ही नींद टूट गई उसकी, उसकी समझ के बाहर हो गया कि यह क्या हो रहा है! वह बीच के खड्ड में गिर गया और मर गया।
आत्मा साक्षी है, शक्तिमान है, पूर्ण है, अकेला है, मुक्त है, चेतन है, निष्क्रिय है, असंग है, इच्छा रहित है, शांत है, परंतु भ्रम-वश संसारी की तरह हो गया है ।
धैर्य
कथा :
छोटे बच्चे आम की गुठली को बो देते हैं जमीन में लेकिन घड़ी आधी घड़ी में उखाड़ कर फिर देखते हैं कि अभी तक अंकुर आया कि नहीं? अंकुर कभी नहीं आएगा; क्योंकि दिन में दस बार तो वह निकाल ली जाएगी जमीन से । अंकुर आ सकता था, एक महीने, दो महीने की प्रतीक्षा करनी जरूरी थी । पानी देना जरूरी था । और गुठली छिपी रहे जमीन के गर्भ में, यह जरूरी था । उसे बार-बार निकाल लेना खतरनाक है । और हम सब छोटे बच्चे हो दिन में भी हो सकता है, लेकिन तब बड़ा धैर्य चाहिए । तीन जन्मों में भी न होगा, धैर्य की कमी हो तो ।
निर्विकल्प समाधि का अर्थ है, जब ध्यान सध गया । जब ध्यान अभ्यास न रहा, सिद्धि हो गयी ।
सूफी फकीर जुन्नैद के पड़ोस में एक आदमी रहता था, जो बड़ा व्यभिचारी, दुराचारी, शराबी, सब खूबियां उसमें थीं। जुन्नैद ने एक दिन परमात्मा से कहा: 'हे प्रभु, इस आदमी को उठा क्यों नहीं लेता? इस आदमी की वजह से कितना अनाचार फैल रहा है!'
उस रात जुन्नैद को स्वप्न में परमात्मा दिखाई पड़ा! उसने कहा: 'जुन्नैद, तुझे इस आदमी के पड़ोस में रहते कितने दिन हुए--केवल सात दिन! और मैं इस आदमी को सत्तर साल से जिंदा रखे हूं। मैं जिस सत्तर साल से श्वास दे रहा हूं, जीवन दे रहा हूं, उसे तू सात दिन भी बर्दाश्त नहीं कर सकता! और सिर्फ तू पड़ोस में रहा है। तेरा वह कुछ बिगाड़ नहीं रहा है। यह कैसा अधैर्य? और तू यह नहीं देखता कि अगर वह आदमी गलत होता तो मैं उसे जिलाए क्यों रखता? उसमें कुछ राज है, कुछ खूबी है।'
ईसप प्रज्ञावान था। एक दिन रास्ते के किनारे बैठा था । एक आदमी निकला और उसने पूछा -- भाई मेरे, बता सकोगे कि गांव कितना दूर है और मैं कितनी देर में पहुंच जाऊंगा। ईसप कुछ भी न बोला; सिर्फ, उठकर उस आदमी के साथ चलने लगा। वह आदमी थोड़ा डरा भी। उसने कहा कि मैंने पूछा है कि गांव कितनी दूर है, मैं कितनी देर में पहुंच जाऊंगा। तुम कुछ उत्तर दो, तुम्हें चलने की कोई जरूरत नहीं है मेरे साथ।
लेकिन ईसप चुपचाप उसके साथ चलता रहा। कोई पंद्रह मिनट बाद ईसप ने कहा कि दो घंटे लगेंगे। उस आदमी ने कहा कि पागल आदमी हो। यह बात तुम वहीं कह सकते थे। मेरे साथ मील भर आने की जरूरत न थी। ईसप ने कहा कि जब तक तुम्हारी चाल न देख लूं तब तक कैसे बताऊं कि कितनी देर लगेगी। रास्ते की लंबाई से थोड़ी तय होता है; आदमी की चाल...! अब मैं निश्चित भाव से कहता हूं कि दो घंटे लगेंगे।
नि:शब्द
कथा :
महाकाश्यप बुद्ध के पास आया । तो बुद्ध से महाकाश्यप ने पूछा कि कितना समय लगेगा? कब आएगी वह घड़ी जब मैं भी बुद्ध हो जाऊंगा? बुद्ध ने कहा, अगर तूने दोबारा पूछा तो समय बहुत लग जाएगा । फिर मैं भी तेरी कोई सहायता नहीं कर सकता । अभी तू क्षम्य है, नया-नया पहली दफा आया है । पूछ लिया कोई हर्ज नहीं । अब दोबारा मत पूछना, तो जल्दी हो सकती है बात ।
फिर महाकाश्यप का दूसरा ही उल्लेख है । बस दो ही उल्लेख हैं बुद्ध के जीवन में महाकाश्यप के । और वह उनका सबसे कीमती शिष्य था । एक यह उल्लेख है और एक और उल्लेख है कि वर्षों बाद, कोई चालीस वर्ष बाद, एक दिन बुद्ध आकर मौन बैठ गए हैं मंच पर । उनके हाथ में एक कमल का फूल है, और वह उस फूल को देखे चले जाते हैं । और हजारों लोग इकट्ठे हुए हैं और वे सुनना चाहते हैं । और बुद्ध बोलते नहीं, मौन बैठे हैं और उस फूल को देखे चले जाते हैं । ऐसा कभी न हुआ था । आखिर किसी ने खड़े होकर कहा कि यह कब तक चलेगा । हम सुनने आए हैं दूर से, आप चुप बैठे हैं । तो बुद्ध ने कहा, जो मैं शब्दों से कह सकता था, वह मैं कई बार कह चुका । आज मैं वह कह रहा हूं, जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता । अगर कोई समझता हो, तो इशारा करे । हजारों लोग इकट्ठे थे, सन्नाटा छा गया । शब्द ही समझ में नहीं आते थे, तो निःशब्द क्या समझ में आएगा!
लेकिन एक खिलखिलाहट की आवाज भीड़ में गूंजी । और बुद्ध ने कहा कि मालूम होता है महाकाश्यप है; पकड़ो उसे, भाग न जाए । चालीस साल पहले इस आदमी की वाणी सुनी थी, आज इसकी हंसी सुनी । बुद्ध ने कहा, महाकाश्यप क्यों हंसता है तू? क्या हुआ तुझे? तो महाकाश्यप ने कहा, जिसकी प्रतीक्षा कर रहा था, वह हो गया । शब्द से नहीं हुआ, आपके मौन से हो गया । तो बुद्ध ने वह फूल, जो उनके हाथ में था, वह महाकाश्यप को दिया और कहा कि जो मैं शब्दों से दे सकता था, मैंने दे दिया सबको; और जो मैं शब्दों से नहीं दे सकता था, वह मैं महाकाश्यप को देता हूं ।
बताना है उसके संबंध में, तो मौन होना पड़ता है ।
मारपा के सामने एक युवक आकर बैठा है । वह तीन वर्ष से मारपा के पास है । और मारपा से कह रहा है, रास्ता बताइए । कुछ उसका पता-ठिकाना बताइए । कुछ नाम हो तो बोलिए । और जब भी वह कहता है कि कुछ उसका पता-ठिकाना बताइए, तभी अगर मारपा बोलता भी है, तो एकदम चुप हो जाता है । वैसे बोलता रहता है । और जब भी वह युवक कहता है, कुछ पता-ठिकाना बताइए, अभी तो आप बोल ही रहे हैं,थोड़ा उसका भी, कि वह एकदम आंख बंद करके चुप हो जाता है । अगर मारपा का शिष्य पूछता है कि कोई तो रास्ता बताइए, तो वह चल भी रहा हो रास्ते पर तो एकदम खड़ा हो जाता है ।
तीन साल में परेशान हो गया । उसने कहा कि हद्द हो गई । वैसे आप थोड़ा चलते भी हैं, और जब भी मैं रास्ते की बात उठाता हूं कि एकदम ठहर जाते हैं । वैसे आप बोलते हैं, कोई एतराज आपको बोलने में नहीं है, लेकिन जैसे ही मैं उसकी खबर पूछता हूं कि आप आंख बंद करके ओंठ सी लेते हैं । और मैं उसी के लिए आया हूं । न तो आपका बाकी चलना मुझे कोई प्रयोजन है, और न आपकी बाकी बातों से मुझे कोई मतलब है । लेकिन मारपा तो आंख ही बंद करके बैठ जाता है जब ऐसी बात छिड़ती है ।
आखिर एक दिन उस युवक ने कहा, अब मैं जाऊं?
मारपा ने पूछा, तुम आए ही कब थे? तीन साल से तुम दरवाजे के बाहर ही घूम रहे हो । आते कहां भीतर? जाने की आज्ञा किससे लेते हो? मैंने एक क्षण को नहीं जाना कि तुम भीतर आए । कई बार मैं द्वार खोल कर खड़ा हो गया । कई बार रुक गया कि शायद मैं चलता हूं, इसलिए तुम प्रवेश न कर पाते होओ । तो मैं खड़ा हो गया । जब भी तुमने सवाल पूछा, मैंने तुम्हें जवाब दिया है ।
उस युवक ने कहा, हद्द हो गई । यही तो बेचैनी है कि जब भी मैंने सवाल पूछा, आप चुप रह गए हैं । ऐसे आप बोलते रहते हैं । यह भी इल्जाम मुझ पर आप लगा रहे हैं? इसीलिए तो मैं जाता हूं छोड़ कर तुम्हें कि जब भी मैंने पूछा, आप चुप रह गए हैं ।
मारपा ने कहा, वही था जवाब । काश, तुम भी उस वक्त चुप रह जाते! काश, जब मैं चलते-चलते ठहर गया था, तुम भी ठहर जाते! तो मिलन हो जाता हमारा ।
शेख फरीद के पास कोई गया है और उससे पूछता है कि मुझे कुछ कहो! लेकिन वही कहना जो सत्य है, जरा सा भी असत्य न हो । मुझे तो तुम उसी सत्य को बताना, संतों ने जिसकी तरफ इशारा किया है और कहा है कि बताया नहीं जा सकता । तुम मुझे वही सत्य बता दो, जो निःशब्द है । फरीद ने क्या कहा? फरीद ने कहा, जरूर बताऊंगा, तुम अपने प्रश्न को इस भांति बना कर लाओ कि शब्द उसमें न हों । तुम निःशब्द में पूछोगे, मैं निःशब्द में उत्तर दे दूंगा । लेकिन तुम मेरे साथ ज्यादती मत करो कि तुम शब्द में पूछो और मैं निःशब्द में उत्तर दूं । तुम जाओ, तुम निःशब्द बना लाओ अपने प्रश्न को । मैं वादा करता हूं कि निःशब्द में उत्तर दूंगा ।
वह आदमी चला गया । कठिनाई तो थी । बहुत सोचा उसने, वर्षों । कभी-कभी फरीद उसके गांव से निकलता था, तो उसके दरवाजे खटखटाता था कि क्यों भाई, क्या हुआ तुम्हारे सवाल का? बना पाए अब तक कि नहीं बना पाए? वह आदमी कहता, बहुत कोशिश करता हूं,लेकिन प्रश्न बनता नहीं बिना शब्द के । और कोशिश करो, फरीद कहता था । जब तुम्हारी कोशिश पूरी हो जाए और तुम बना लो निःशब्द प्रश्न, तो आ जाना मेरे पास! मैंने उत्तर तैयार रखा है ।
वह आदमी भी मर गया, फरीद भी मर गया । न वह आदमी कभी फरीद के पास गया; न कभी वह फरीद का उत्तर किसी को सुनने मिला । मरते वक्त किसी ने फरीद से पूछा कि वह तैयार उत्तर आपके पास है; वह आदमी तो आता ही नहीं, हम सब सुनने को उत्सुक हैं । वह आप हमें बता जाएं! फरीद चुप बैठा रहा । उन्होंने कहा, बता दें! फरीद चुप बैठा रहा । उन्होंने कहा, बता दें, आपकी आखिरी घड़ी है, कहीं उत्तर आपके साथ न चला जाए । फरीद ने कहा कि मैं बता रहा हूं; मैं मौन हूं, यही मेरा उत्तर है । लेकिन अगर मैं इतना भी कहूं कि मैं मौन से बता रहा हूं, तो उससे द्वैत पैदा होता है । क्योंकि उसका मतलब होता है, मौन से बताया जा सकता है, बिना मौन के नहीं बताया जा सकता । Duality खड़ी हो जाती है, Distinction पैदा हो जाता है, भेद निर्मित हो जाता है । इसलिए तुम मुझसे यह मत कहलवाओ कि मैं मौन से बता रहा हूं; मैं मौन हूं और तुम समझ लो, शब्द मत उठाओ ।
किधर से बर्क (बिजली) चमकती है देखें ऐ वाइज
मैं अपना जाम उठाता हूं तू किताब उठा
बुद्ध एक दिन गुजरते हैं एक राह से जंगल की। पतझड़ के दिन हैं। सारा वन सूखे-पत्तों से भरा है। और आनंद ने बुद्ध से पूछा है कि क्या आपने हमें सब बातें बता दीं जो आप जानते हैं? क्या आपने अपना पूरा सत्य हमारे सामने स्पष्ट किया है? बुद्ध ने सूखे-पत्तों से अपनी मुट्ठी भर ली और कहा, आनंद! मैंने तुमसे उतना ही कहा है जितने सूखे-पत्ते मेरी मुट्ठी में हैं। और उतना अनकहा छोड़ दिया है जितने सूखे-पत्ते इस वन में हैं। वही कहा है जो तुम समझ सको। फिर जैसे तुम्हारी समझ बढ़ेगी वैसे-वैसे वह भी कहा जा सकेगा जो पहले समझा नहीं जा सकता था।
ध्यान करने का मतलब है, एफर्ट, प्रयास—मन को बदलने का। और ध्यान में होने का मतलब है, मन को बदलने का प्रयास नहीं, चुपचाप अपने में सरक जाना।
सम्मोहन
कथा :
तिब्बत में इसके लिए बड़े गहन प्रयोग पैदा किए गए । एक बड़ा प्रयोग है बारदो । तिब्बत में मरते आदमी को मरते वक्त वह एक साधना करवाते हैं, पर वह एकदम से नहीं करवाई जा सकती । जीवन में उसने की हो, तो मरते वक्त उसका प्रयोग किया जा सकता है । बारदो एक तरह का ध्यान है । इस ध्यान में साधक को सचेतन रूप से स्वर्ग और नरक की यात्रा करवाई जाती है । साधक शांत होकर पड़ जाता है, शिथिल हो जाता है । उसका जो मार्गदर्शक है, उसका जो गुरु है, उसके प्रति अपने को समर्पित कर देता है, और कहता है, अब तुम मुझे जहां ले चलो ।
एक विशेष वातावरण में जब साधक बिलकुल शिथिल होता है, और करीब-करीब सम्मोहित, hypnotized अवस्था में होता है, और अपना चिंतन, अपना विचार, अपना तर्क सब छोड़ देता है, वह जो गुरु उसके पास है, उसका मार्गदर्शक, guide, जो उसे स्वर्ग-नरक में ले जा रहा है उसके साथ चलने को राजी होता है । फिर गुरु उसे क्रमशः, जैसे कि सम्मोहित व्यक्ति को क्रमशः गहरे में ले जाया जा सकता है, वैसे उसे गहरे ले जाने लगता है । पहले वह उसे गहरा सुझाव देता है कि तू मूर्छित हो रहा है, बेहोश हो रहा है । और वह स्वीकार करता है, सहयोग करता है । फिर उसे सुझाव देता है कि यह मूर्च्छा इतनी गहन हो गई कि अब तेरे कानों को मेरी आवाज के सिवाय किसी की आवाज न सुनाई पड़ेगी । वह इसे भी स्वीकार कर लेता है । सब आवाज बंद हो जाती हैं, सामान्य सम्मोहन में भी यही प्रयोग होता है । जब सारी आवाजें बंद हो जाती हैं, और जब सिर्फ मार्गदर्शक की आवाज सुनाई पड़ती है, तब मार्गदर्शक प्रयोग करके देखता है । हाथ में सुई चुभोता है और कहता है कि हाथ में मैं कोई सुई नहीं चुभो रहा हूं, तुझे किसी तरह की पीड़ा का अनुभव नहीं होगा । हाथ में सुई चुभोता है, हाथ हटता भी नहीं, साधक पीड़ा की कोई खबर नहीं देता है! पैर में अंगारा छुआ देता है और कहता है कि साधारण ठंडा पत्थर तेरे पैर से स्पर्श कर रहा हूं; साधक चीख मार कर पैर नहीं हटा लेता है । अंगारा पैर को छूता है, साधक को कोई पता नहीं चलता है । अब मार्गदर्शक जानता है कि साधक ने अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया ।
अगर पूरा समर्पण हो, तो अंगारे से छुए गए पैर में भी फफोला नहीं आता है । और अगर आपने सुना हो कि लोग आँग पर नाचकर निकल जाते हैं और आग उनको नहीं जलाती, तो इसमें कुछ जादू मत समझ लेना । सिर्फ मन का भाव है । इससे उल्टा भी होता है । सम्मोहित, hypnotized व्यक्ति को अगर हाथ में कंकड़ रख दिया जाए और कहा जाए कि भयंकर जलता हुआ अंगारा है, तो वह सम्मोहित व्यक्ति चीख मार कर हाथ हटा लेगा, कंकड़ को फेंक देगा । यहां तक तो ठीक है क्योंकि मन की बात है । लेकिन मजा तो यह है कि हाथ पर फफोला आ जाता है ।
हम जो देख रहे हैं, वह बहुत कुछ हमारे मन का खेल है ।
सम्बन्ध
कथा :
जापान के एक कारागृह में एक अनूठी घटना वर्षों तक घटती रही । एक फकीर बार-बार चोरी करता और सजा पाता रहता । लोग चकित थे । फकीर ऐसा साधु था असाधारण कि कोई भरोसा ही न करता था कि वह साधु और कभी चोरी करेगा । गुण उसके ऐसे थे बुद्धत्व के और चोरी की बात का कहीं तालमेल न था । और चोरी भी बहुत छोटी-मोटी! और यह जिंदगी भर चला! बूढ़ा हो गया तो उसके शिष्यों ने कहा कि अब तो बंद करो यह उपद्रव । हमारी कल्पना में भी नहीं आता कि किसलिए यह चोरी करते हो! हम मान भी नहीं सकते हैं कि तुम चोरी करते हो; लेकिन सब गवाह हो जाते हैं, सबूत हो जाते हैं, और तुम्हारी सजा हो जाती है । और तुम्हारे पीछे हम भी बदनाम हो जाते हैं कि तुम किसके शिष्य हो, वह आदमी फिर जेल में चला गया । और तुम अब आखिरी बार छूट आए हो, उम्र भी कम बची है, स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, अब तुम कृपा करके यह उपद्रव बंद करो । और तुम्हें जो चाहिए हम सदा देने को तैयार हैं; चोरी की तुम्हें जरूरत नहीं है । और तुम चोरी भी ऐसी छोटी-छोटी करते हो कि भरोसा नहीं आता कि क्या करते हो!
तो उसने कहा कि जिंदगी भर मैंने कहा नहीं, अब तुमसे कहता हूं--चोरी मैं सिर्फ इसलिए करता हूं, ताकि भीतर जाकर चोरों को बदल सकूं । उन तक पहुंचने का और कोई उपाय नहीं है । वहां बहुत चोर दुखी हो रहे हैं । वहां बहुत अपराधी और पापी हैं । उनको कौन बदले? और कैसे बदले? और अगर मैं गुरु की तरह जाकर उनको उपदेश दूं, तो उनको नहीं बदल सकता ।
क्योंकि जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई सम्मान पैदा नहीं होता है । जो अपने ही जैसा नहीं होता है, उससे कोई संबंध निर्मित नहीं होते हैं । एक गुरु की तरह, एक साधु की तरह जाकर मैं खड़ा हो जाऊं, तो उनके मन में मेरे प्रति एक फासला और एक दूरी रहती है कि मैं साधु हूं और वह चोर है । शायद मेरी मौजूदगी उनकी निंदा भी बन जाती है । शायद मेरे कारण उनको पीड़ा और दुख भी हो । शायद अकारण मैं उनकी पीड़ा का कारण भी बन जाऊं । तो मैं चोर होकर ही जाना पसंद करता हूं । मैं फिर उनके जैसा हो गया । उनकी ही काल-कोठरियों में बंद, उनकी ही तरह जंजीर मेरे हाथ में, मैं भी एक चोर, वे भी एक चोर । फिर हम एक-दूसरे की भाषा समझ सकते हैं । और फिर उनकी ही भाषा में मैं उनको बदलने की कोशिश करता हूं । फिर तुम मुझे रोकोगे । जब तक मैं हूं, मेरा यही काम है कि वे जो पीड़ा और पाप से घिरे हैं, उन्हें बाहर लाऊं । बोधिसत्व उस किनारे से ऐसा ही व्यक्ति है लौटता हुआ इस किनारे पर । और अगर उसे यहां लौटना है, और इस किनारे के लोगों को सहायता पहुंचानी है, तो उसे इस किनारे की कुछ भाषा कायम करनी होगी । इस किनारे के लोगों से कुछ संबंध स्थापित करना होगा । निर्वाण-काया वही संबंध है इस जगत के लोगों से । और इस जगत के लोगों की भाषा क्या है?
इस जगत के लोगों की भाषा वासना है ।
एक फकीर ठहरा था एक महानगरी के बाहर। अमावस की रात। महानगरी में विद्युत के दीए पूरे नगर में जल रहे थे, जैसे दीवाली हो। फकीर लेटा था अंधेरे में एक वृक्ष के तले। एक जुगनू उड़ती हुई आकर फकीर के पास बैठ गई। बैठकर उसने पंख बंद कर लिए। उसकी चमकती हुई रोशनी बंद हो गई। तभी अचानक बिजली के कारखाने में कुछ गड़बड़ हुई होगी, और सारे नगर की बिजली चली गई।
उस जुगनू ने फकीर से कहा, एक्सक्यूज मी फार मेंशनिंग-- कहने के लिए क्षमा करें। बट डू यू सी इन व्हाट शेप दिस ग्रेट सिटी विल बी, इफ आई एम गान समव्हेयर एल्स--अगर मैं कहीं और चली जाऊं, तो इस बड़े नगर का क्या होगा, देखते हैं! कहने के लिए क्षमा करें। क्योंकि जुगनू ने सोचा कि चूंकि मैंने पंख बंद किए और मेरी चमक बंद हुई, सारा नगर अंधकार में डूब गया!
फकीर मन ही मन में हंसा, ऊपर नहीं, क्योंकि ऊपर हंसे, तो जुगनू से फिर बातचीत नहीं हो सकती। उसने कहा कि तेरी सूचना के लिए धन्यवाद। मैं तो सदा से ही ऐसा जानता था। तेरी बड़ी कृपा है कि तू इस नगर को छोड़कर नहीं जाती। नगर की तो बात दूर, अगर तू इस विश्व को छोड़कर चली जाए, तो आकाश में जो तारे टिमटिमा रहे हैं, ये भी एकदम बंद हो जाएं। ये भी एकदम बंद हो जाएं और बुझ जाएं। जुगनू पास सरक आई और उसने कहा, आदमी तुम काम के मालूम पड़ते हो। कुछ और बातें करें।
कहते हैं, सुबह तक जुगनू फकीर हो गई। मगर फकीर को जुगनू होने से शुरू करना पड़ा। रातभर चली बात; सुबह तक जुगनू फकीर हो गई।
एक ज्ञानी और एक अज्ञानी के बीच बातचीत हो पाती है। लेकिन समझौते करने पड़ते हैं ।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने कुछ मित्रों के साथ मछलियों के शिकार के लिए गया। नाव जब बीच नदी में पहुंची, वह जहां बैठा था वहीं अपने चाकू से छेद करने लगा। उसके मित्र बहुत चौंके। चंदूलाल ने कहा यह क्या करते हो? ढ़ब्बू जी ने कहा पागल हो गए हो, होश है?
मुल्ला ने कहा मैं अपनी जगह पर कर रहा हूं। तुम्हें बीच में बोलने की जरूरत नहीं। तुम्हें जो करना हो अपनी जगह पर तुम करो।
चंदूलाल ने कहा यह बात ठीक है। ढ़ब्बू जी ने भी कहा यह बात तर्कसंगत है। वह अपनी जगह पर छेद कर रहा है, हम क्यों बोलें? अपना क्या लेता—देता है?
यहां एक आदमी छेद करता है और न मालूम कितने आदमी डूबते हैं! इससे उलटा भी सच है यहां एक आदमी छेद को भर देता है और न मालूम कितने आदमी उबर जाते हैं! जिंदगी जुड़ी है, जिंदगी संयुक्त है। हम अलग—अलग नहीं हैं। इसलिए एक व्यक्ति जब बुद्धत्व को उपलब्ध होता है तो सारे जगत में बुद्धत्व की लहर फैल जाती है।
जब भारत में महावीर हुए, उसी समय बुद्ध हुए, उसी समय मक्सली गोशाल हुआ, उसी समय प्रबुद्ध कात्यायन हुआ, उसी समय संजय वेलट्ठीपुत्त हुआ, और -- और न मालूम कितने बुद्ध ज्ञात-अज्ञात नाम, अचानक जगह-जगह फूल खिल गए। और ऐसा भारत में ही नहीं हुआ, सारी दुनिया में लहर दौड़ी। यूनान में सुकरात हुआ, पाइथागोरस हुआ, हेराक्लाइटस हुआ। ईरान में जरथुस्त्र हुआ; चीन में लाओत्सु हुआ, च्चांगत्सु हुआ, लीहत्सु हुआ। एक ऐसी लहर उठी सारी दुनिया में, जगह—जगह दीये जल गए! एक दीया क्या जला, दीयों की पंक्तियां लग गईं!
प्रतिक्रिया
कथा :
बुद्ध एक गांव के पास से निकलते थे, कुछ लोगों ने उनके ऊपर पत्थर फेंके और उन्हें गालियां दीं और अपमानित किया । बुद्ध ने उन मित्रों से कहा -- मुझे दूसरे गांव जल्दी जाना है, अगर तुम्हारी बात पूरी हो गई हो, तो मैं जाऊं? या तुम्हारे पत्थर अगर तुम्हें और फेंकने बाकी हों तो मैं थोड़ा और रुकूँ । लेकिन ज्यादा देर मैं न रुक सकूंगा, दूसरे गांव मुझे जल्दी पहुंचना है ।
उन लोगों ने कहा -- हमने न तो कोई बातें कहीं हमने तो स्पष्ट ही अपमान किया है और गालियां दी हैं और हमने पत्थर फेंके हैं, लेकिन क्या आपको यह दिखाई नहीं पड़ता कि ये गालियां हैं, अपमान है? और आपकी आंखों में कोई क्रोध दिखाई नहीं पड़ रहा है ।
बुद्ध ने कहा -- अगर दस वर्ष पहले तुम आए होते, तो तुम मुझे क्रोधित करने में समर्थ हो जाते, क्योंकि तब मैं था ही नहीं, तब मेरे भीतर सारी क्रियाएं यांत्रिक थीं । मुझे कोई गुदगुदा देता तो मुझे हंसी आती, और मेरा कोई आदर करता तो मैं प्रसन्न होता, और मुझे कोई गालियां देता तो मैं अपमानित होता । ये सारी क्रियाएं बिलकुल यंत्र की भांति होती हैं, मैं इनका मालिक नहीं । लेकिन तुम थोड़ी देर करके आए हो, अब मैं अपना मालिक हो गया हूं । अब कुछ भी मेरे भीतर होता नहीं, जो मैं करना चाहता हूं वही होता है । जो मैं करना चाहता हूं वही होता है । जो मैं नहीं करना चाहता अगर वह मेरे भीतर होता हो तो उसे कर्म नहीं कहा जा सकता, वह एक्शन नहीं है, वह रिएक्शन है, वह प्रतिक्रिया है, प्रतिकर्म है ।
एक छोटा सा लडका पहली बार अपने गांव के पास के जंगल में गया था। वह एकांत से भयभीत और बहुत चैकन्ना था। तभी उसे झाडियों में कुछ सरसराहट सुनाई पडी। निश्चय ही कोई व्यक्ति छिपा हुआ उसका पीछा कर रहा था। उसने जोर से चिल्ला कर पूछाः 'कौन है? ' और भी जोर से पहाडियों ने पूछाः 'कौन है? ' अब तो किसी के छिपे होने का उसे पूर्ण निश्चय हो गया। भयभीत तो वह वैसे ही था। उसके हाथ-पैर कांपने लगे और हृदय जोर-जोर से धडकने लगा। लेकिन स्वयं को साहस देने के लिए उसने छिपे हुए आदमी से कहाः 'डरपोक!' प्रतिध्वनि हुईः 'डरपोक!' अंतिम बार उसने शक्ति जुटाई और चिल्लायाः 'मैं मार डालूंगा!' पहाड और जंगल भी जोर से चिल्लाएः 'मैं मार डालूंगा!' तब वह लडका सिर पर पैर रख कर गांव की ओर भागा। उसके ही पैरों की प्रतिध्वनि उसे ऐसी लगती थी जैसे वह आदमी उसका पीछा कर रहा है। अब उसमें लौट कर देखने का भी साहस नहीं था। वह घर के द्वार पर जाकर गिर पडा और बेहोश हो गया। होश में आने पर सारी बात पता चली। सुन कर उसकी मां खूब हंसी और बोलीः 'कल फिर वहीं जाना और जो मैं बताऊं वह उस रहस्यमय व्यक्ति से कहना। मैं तो उससे भलीभांति परिचित हूं। वह तो बहुत ही भला और प्यारा आदमी है।' वह लडका कल फिर वहां गया। उसने जाकर कहाः 'मेरे मित्र!' प्रतिध्वनि हुईः 'मेरे मित्र!' इस मैत्रीपूर्ण ध्वनि ने उसे आश्वस्त किया। उसने कहाः 'मैं तुम्हें प्रेम करता हूं!' पहाडों ने, जंगलों ने, सभी ने दुहरायाः 'मैं तुम्हें प्रेम करता हूं!' क्या प्रतिध्वनि की कथा ही हमारे तथाकथित जीवन की कथा नहीं है? और क्या हम सब संसार के जंगल में ऐसे बाल अजनबी ही नहीं हैं, जो अपनी ही प्रतिध्वनियों को सुनते हैं, भयभीत होते हैं और भागते हैं? क्या सच ही स्थिति ऐसी ही नहीं है? लेकिन स्मरण रहे कि 'मैं मार डालूंगा!' यह प्रतिध्वनि है, तो 'मैं तुम्हें प्रेम करता हूं!' यह भी प्रतिध्वनि ही है।
यांत्रिकता
कथा :
एक सुबह एक राजा का दरबार भरा था, और एक आदमी आया, और उसकी आंख से खून बह रहा था, उसकी एक आंख फूट गई थी । और उस आदमी ने आकर राजा के दरबार में कहा कि महाराज मुझ पर बड़ा अन्याय हो गया है । रात मैं एक घर में चोरी करने घुसा, लेकिन अंधेरा होने की वजह से मैं भूल से दूसरे घर में चला गया, वह दूसरा घर जुलाहे का था, और जुलाहे ने अपने कपास पीटने के यंत्र को खिड़की पर ही टांग रखा था, वह मेरी आंख में लग गया और मेरी आंख फूंट गई । अब मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं । इस जुलाहे ने मेरी आंख फोड दी । आप जुलाहे को बुलाइए और उसको सजा दीजिए, ताकि न्याय पूरा हो सके ।
राजा ने कहा -- फौरन जुलाहे को पकड़ कर लाया जाए । यह तो हद्द बुरी बात है, यह बेचारा चोर अब क्या करेगा? इसकी आंख फूट गई! एक तो रात का इसका काम हमेशा था और अब एक आंख फूट जाने पर इसका क्या होगा? फौरन उस जुलाहे को दो सिपाही पकड़ कर ले आए । उस जुलाहे ने कहा -- मेरे मालिक, कसूर तो मुझसे हो गया कि मैंने खिड़की पर अपना यंत्र टांग दिया, लेकिन आप देखिए कि मुझे दोनों आंखों कि जरूरत पड़ती है, कपड़ा सीते वक्त या कपड़ा बुनते वक्त मुझे दोनों तरफ दाएं-बाएं देखना पड़ता है । अगर मेरी एक आंख फोड़ दी गई, तो फिर कपड़ा बुनना मुश्किल हो जाएगा । तो ज्यादा अच्छा हो...मेरे पड़ोस में एक चमार रहता है और उसका काम ऐसा है जूता सीने का, कि एक आंख से भी चल सकता है, दो आंखों की कोई खास जरूरत भी नहीं है, तो उसको बुलवा कर आप एक आंख फोड़ दें । न्याय भी पूरा हो जाएगा । किसी को असुविधा भी न होगी । उस महाराजा ने कहा -- बिलकुल ठीक! इससे उचित और क्या हो सकता है? उस चमार को बुलवा लो और उसकी आंख फोड़ दो । उस चमार को बुलवा लिया गया और उसकी आंख फोड़ दी गई । न्याय संतुष्ट हो गया ।
एक आदमी अगर दफ्तर में काम करता हो और उसका मालिक उसे गाली दे दे और अपमान कर दे, तो मालिक के क्रोध का उत्तर कैसे दिया जा सकता है? वह क्रोध को पी जाएगा । क्रोध तो उठ आएगा भीतर, क्योंकि क्रोध न मालिक को देखता है और न किसी को देखता है । क्रोध तो भीतर जलने लगेगा । लेकिन साहस, सुरक्षा और बहुत से खयाल उसे भीतर दबा देंगे । वह क्रोध भीतर उबलता रहेगा । वह आदमी घर जाएगा । मालिक तो ताकतवर है । और जैसे नदी ऊपर की तरफ नहीं चढ़ सकती नीचे की तरफ बहती है, वैसे ही क्रोध भी नीचे की तरफ बहेगा । घर जाएगा, कमजोर पत्नी मिल जाएगी घर पर उसे, और कोई भी बहाना निकाल लेगा और कमजोर पत्नी पर टूट पड़ेगा, और उसे यह खयाल भी न आएगा कि यह जो क्रोध है, यह अंधा क्रोध, पत्नी से उसका कोई संबंध भी नहीं है । वह पत्नी पर टूट पड़ेगा । हो सकता है पत्नी को मारे या गालियां दे या अपमान करे । और पत्नी तो पति से क्या कह सकती है, उसे तो हमेशा सिखाया गया है कि पति है परमात्मा, इसलिए वह जो कहे सो सुनना और सहना । वह उस क्रोध को पी लेगी, लेकिन क्रोध भीतर जग जाएगा । और जैसे नदी नीचे की तरफ बहती है...उसका बच्चा जब स्कूल से लौट आएगा, तो कोई भी बहाना मिल जाएगा, और वह बच्चे को पीटना शुरू कर देगी । कमजोर है । बच्चे पर पत्नी का क्रोध निकलना शुरू हो जाएगा । और बच्चा क्या कर सकता है? मां के लिए कुछ भी नहीं कर सकता । हो सकता है वह अपनी गुड़िया की टांग तोड़ डाले या अपने बस्ते को पटक दे और स्लेट फोड़ दे ।
ऐसा क्रोध अंधे की तरह बहता रहेगा । ऐसे हमारे सारे जीवन के भाव और विचार और भावनाएं और कर्म एक अंधे चक्कर में घूम रहे हैं ।
यह जीवन की स्थिति है -- यांत्रिकता और इस यांत्रिकता में चाहे कोई मंदिर जाता हो, चाहे कोई मस्जिद जाता हो, और चाहे कोई कुरान पढ़ता हो, चाहे गीता पढ़ता हो; कुछ भी न होगा, क्योंकि जो आदमी अभी अपने विचारों और अपने कर्मों के ऊपर सचेत नहीं है उसकी गीता और कुरान का पढ़ना खतरनाक सिद्ध होगा ।
पांच हजार सालों में पंद्रह हजार युद्ध हुए । कौन ये युद्ध कर रहा है? यह सोया हुआ, यांत्रिक आदमी युद्ध की जड़ में है, यह जो भी करेगा उससे हिंसा पैदा होगी और युद्ध पैदा होगा । और यह सोया हुआ आदमी जो भी बनाएगा उससे विनाश होगा ।
एक सुबह एक गांव में बुद्ध का आगमन हुआ था । उन्होंने उस गांव के लोगों को समझाना शुरू किया; सामने ही एक व्यक्ति बैठ कर अपने पैर का अंगूठा हिलाए जा रहा था, बुद्ध ने बोलना बंद करके उस व्यक्ति को कहा-- मेरे मित्र, तुम्हारा अंगूठा क्यों हिलता है? जैसे ही बुद्ध ने यह कहा, उसके पैर का हिलना बंद हो गया । और उस व्यक्ति ने कहा, जहां तक मेरा सवाल है, मुझे इसका स्मरण भी नहीं था कि मेरा पैर हिल रहा है! आपने कहा, मुझे स्मरण आया और मेरा पैर रुक गया । मुझे खयाल भी नहीं था, बोध भी नहीं था कि मेरा पैर हिल रहा है । बुद्ध ने कहा -- तुम्हारा पैर है, और हिलता है, और तुम्हें पता नहीं? तो तुम आदमी हो या यंत्र हो?
यंत्र हम उसे कहते हैं, जिसे अपनी गति का कोई बोध नहीं है ।
एक गांव में एक महिला ने उस गांव में आए हुए एक फकीर के पास अपने बच्चे को ले जाकर मौजूद किया और उस फकीर को कहा कि मेरा यह बच्चा रोज-रोज बिगड़ता जाता है । इसने सारी शिष्टता और सभ्यता छोड़ दी है, इसने सारे नियम तोड़ दिए हैं, हमारे परिवार के । इसे थोड़ा आप भयभीत कर दें, डरा दें, शायद ये ठीक हो जाए । उस फकीर ने इतनी बात सुनी, उसने जोर से आंखें निकाली, हाथ-पैर हिलाए और वह कूद के उस बच्चे के सामने खड़ा हो गया, जैसे उसकी जान ले लेगा । वह बच्चा तो इतना घबड़ा गया कि वह भागा । लेकिन फकीर कूदता ही गया और इतने जोर से चिल्लाया कि बच्चा तो भाग गया, उसकी मां बेहोश होकर गिर पड़ी । और जब उसकी मां बेहोश होकर गिर पड़ी, तो वह फकीर भी निकल भागा । थोड़ी देर बाद जब उस स्त्री को होश आया, तो उसने बैठ कर प्रतीक्षा की कि वह फकीर आ जाए, थोड़ी देर बाद वह फकीर भीतर लौटा । उस स्त्री ने कहा आपने तो हद कर दी, मैंने बच्चे को डराने को कहा था, मुझे डराने को नहीं कहा था ।
वह फकीर बोला -- तू पूछती है?; माना कि तूने बच्चे को डराने को कहा था, लेकिन जब बच्चे को मैंने डराया, तो मुझे खयाल भी न था, कि तू भी डर जाएगी । तू क्यों डर गई? और जब तू डर गई, और तू बेहोश हो गई, तो मुझे पता भी नहीं था कि मैं भी डर जाऊंगा? तुझे बेहोश देख कर मैं भी डर गया और भाग गया । जब भय ने पकड़ा तो उसने बच्चे को ही नहीं पकड़ा, तुझे भी पकड़ लिया और मुझे भी पकड़ लिया । उस फकीर ने कहा सच्चाई यह है कि मुझमें भी चीजें घटित होती हैं, मैं भी उनका मालिक नहीं हूं, तू भी उनकी मालिक नहीं है, बच्चा भी उनका मालिक नहीं है । भय ने पकड़ लिया, उस पर हमारी कोई मालकियत न रही । और जब तू भी भयभीत हो गई तो मुझे भी खयाल न रहा कि यह क्या हो रहा है? मैं भी घबड़ा गया और मैं भी भयभीत हो गया और भाग गया ।
जीवन में हमारे भय, क्रोध, घृणा, हिंसा, प्रेम वे सब घटित हो रहे हैं, उन पर हमारा कोई काबू नहीं है । उनके प्रति काबू होना दूर हमें कोई होश भी नहीं है कि क्या हो रहा है।
बुद्ध के पास उनका एक भिक्षु आनंद, वर्षों तक रहा । एक दिन सुबह उसने पूछा बुद्ध से कि मैं देखता हूं, रात आप सोते हैं, तो आप एक ही करवट सोते हैं, और जहां पैर रखते हैं, जिस पैर के ऊपर पैर रखते हैं, जहां हाथ रखते हैं, रात भर आपका हाथ वहीं रहता है, पैर वहीं रहता है, सुबह आप वैसे ही उठते हैं जैसा रात सोए थे; क्या रात भर आप जागे रहते हैं ? बुद्ध ने कहा -- जब से शरीर का बोध हुआ है, तब से शरीर वही करता है, जो मैं कराना चाहता हूं । अन्यथा शरीर कुछ भी नहीं करता । अगर मैं करवट बदलना चाहूं, तो ही बदलूंगा, नहीं तो नहीं बदलूंगा । शरीर का जब से बोध हुआ है, मैं शरीर का मालिक हो गया हूं । तो पैर जहां रखता हूं वहीं रखे रहता हूं, कोई जरूरत क्या है उसे बदलने की, जरूरत हो तो बदलूं । चूंकि वर्षों से कोई जरूरत नहीं पड़ी इसलिए उसे वहीं रखे रहता हूं ।
यह हमें खयाल में भी नहीं आएगा । हमें तो जागे हुए भी अपने शरीर का कोई पता नहीं है कि वह क्या कर रहा है, तो सोए हुए शरीर का कैसे पता हो सकता है ?
आपने गाली दी, इसलिए क्रोध किया था, ऐसा नहीं; अब समझ में आया कि मैं क्रोध करना चाहता था और आपकी गाली की प्रतीक्षा थी । और अगर आप गाली न देते, तो मैं कहीं और से गाली खोजता । मैं उकसाता कि गाली दो । मैं ऐसी तरकीब करता, मैं ऐसी बात करता, मैं ऐसा काम करता कि कहीं से गाली आए । क्योंकि मेरे भीतर जो भर गया था, वह रिलीज होना चाहता था । उसे मुक्त होना जरूरी था ।
संत अगस्तीन -- जब तक मुझसे कोई नहीं पूछता कि समय क्या है, मैं भलीभांति जानता हूं; और जब कोई पूछता है, तभी गड़बड़ हो जाती है ।
एक शराबी कहा करता था कि मैंने कभी एक प्याली से ज्यादा शराब नहीं पी। जो मित्र उसको जानते थे, उन्होंने कहा, हमसे झूठ बोलते हो? आंखों से हमने देखा है तुम्हें प्यालियों पर प्याली ढालते! उसने कहा, मैंने एक प्याली से ज्यादा कभी नहीं पी। मैं यह बाइबिल पर हाथ रखकर कसम खाकर कह सकता हूं। मित्रों को भरोसा न हुआ! बाइबिल उठा लाया। उसने बाइबिल पर हाथ रखकर कसम खा ली, एक प्याली से ज्यादा मैंने कभी नहीं पी। उन मित्रों ने कहा, हद हो गई! झूठ की भी एक सीमा होती है! तुम बाइबिल को भी झूठ में घसीट रहे हो। आज सांझ को देखेंगे।
सांझ को देखा, जैसा कि वह रोज पीता था, प्याली पर प्याली ढालता गया। मित्रों ने कहा, यह क्या कर रहे हो? उसने कहा, मैं फिर भी कहता हूं कि मैंने एक प्याली से ज्यादा नहीं पी। उन्होंने कहा, तुम्हारा मतलब क्या है? तब इसका मतलब है कि हमारी भाषाएं अलग-अलग हैं! उस आदमी ने कहा, निश्चित। एक प्याली तो मैं पीता हूं, फिर दूसरी प्याली पहली प्याली पीती है। फिर एड इनफिनिटम, फिर तीसरी प्याली चौथी प्याली पीती है। फिर चौथी प्याली पांचवीं प्याली! मैं एक ही प्याली पीता हूं। बाकी प्याली के लिए मेरा कोई जिम्मा नहीं। मैं तो कसम खाकर आता हूं कि एक से ज्यादा न पीऊंगा। लेकिन कसम खाने वाला एक पीकर ही बेहोश हो जाता है। फिर प्याली पर प्याली पीती चली जाती हैं।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, तुम्हें यह दिखाई पड़ना शुरू होता है कि बुद्धि का कोई भी उत्तर स्वीकार नहीं होगा।
पहला हवाई जहाज, जो पूर्ण रूप से स्वचालित था, बना। उसमें पायलट की कोई जरूरत न थी। उसमें परिचारिकाओं की कोई आवश्यकता न थी। बटन दबाओ, चाय आये; बटन दबाओ, भोजन आये। कोई भी व्यक्ति वहां न था; सभी तरह स्वचालित था, आटोमैटिक था। जैसे ही हवाई जहाज उड़ा, सूचना आनी शुरू हुई कि यह हवाई जहाज पूरी तरह स्वचालित है; यह पहला हवाई जहाज है। लाल रंग की बटन दबायें, चाय, पानी, नाश्ता; पीले रंग की बटन दबायें, भोजन। हरे रंग की बटन दबायें तो सब जरूरतें। और कोई पायलट नहीं है। यह स्वचालित हवाई जहाज अपने गंतव्य पर पहुंच कर उतर जायेगा। आप बिलकुल चिंता न करें। घबड़ाने की कोई भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी तरह की सावधानी बरती गई है। यंत्र में कहीं भी कोई भूल नहीं है--यंत्र में कहीं भी कोई भूल नहीं है--यंत्र में कहीं भी कोई भूल नहीं है... और इस लाइन पर बात अटक गई। सोच सकते हैं उस हवाई जहाज के यात्रियों की हालत! भूल तो साफ है। और जब यह भूल हो सकती है, तो कोई भी भूल हो सकती है।
अगर गौर से अपने विचार को देखोगे तो एक बात समझ में आ जायेगी कि बहुत ज्यादा विचार नहीं है भीतर। कुछ विचार हैं जो बार-बार पुनरुक्त होते हैं।
गांव का सरपंच नेताजी को गांव की सैर करवा रहा था। सरपंच ने गांव की अनेक चीजें दिखाईं। जब वे रास्ते के किनारे से गुजर रहे थे तो नेताजी ने देखा, एक व्यक्ति आम के वृक्ष पर सो रहा है। सरपंच ने उस व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा, यह हमारे गांव का सबसे बड़ा आलसी व्यक्ति है।
नेताजी ने आश्चर्य से पूछा, आलसी! फिर यह वृक्ष पर कैसे चढ़ गया?
सरपंच बोला, हम लोगों ने जब आम की गुठली यहां बोई थी, तब यह व्यक्ति आकर उस गुठली पर सो गया था, सो आज तक सो रहा है। यह वृक्ष पर चढ़ा नहीं है।
गुरु ने चेले से कहा लेटे-लेटे; कि उठ कर पता लगाओ बरसात हो रही है या नहीं, बेटे। तो चेले ने कहा -- 'ये बिल्ली अभी-अभी बाहर से आई है, इसके ऊपर हाथ फेर कर देख लीजिए; अगर भीगी हुई हो तो बरसात हो रही है, समझ लीजिए।'
गुरु ने दूसरा काम कहा -- कि सोने का समय हुआ; जरा दीया तो बुझा दे बचुआ।
बचुआ बोला--'आप आंखें बंद कर लीजिए; दीया बुझ गया समझ लीजिए।'
अंत में गुरु ने कहा हार कर; कि उठ, किवाड़ तो बंद कर।
शिष्य ने कहा--'गुरुवर, थोड़ा तो न्याय कीजिए; दो काम मैंने किए हैं, एक काम तो आप भी कर लीजिए।'
अपवाद
कथा :
एक जादूगर ने बहुत सी भेड़ें पाल रखीं थीं । उस जादूगर ने उन भेड़ों को बेहोश करके, hypnotize करके, सम्मोहित करके यह कह दिया था कि तुम भेड़ नहीं हो, उन भेड़ों को बेहोश करके उस जादूगर ने उनके कान में कह दिया कि तुम भेड़ नहीं हो । इसके पहले भेड़ें हमेशा भयभीत रहती थीं, कि पता नहीं उनको खिलाया जाएगा, पिलाया जाएगा और एक दिन उन्हें काट दिया जाएगा । उस जादूगर ने उनको बेहोश करके कह दिया कि तुम भेड़ हो ही नहीं, तुम तो सिंह हो । उनके चित्त में यह बात बैठ गई, उस दिन से वे अकड़ कर जीने लगीं । उस दिन से वह यह बात भूल गई कि उन्हें काटने के लिए पाला जा रहा है । और जब उनमें से एक भेड़ काट दी जाती थी, तो बाकी भेड़ सोचती कि वह तो भेड़ थी, मैं तो सिंह हूं । मैं कभी काटे जाने वाली नहीं हूं । रोज भेड़ें कम होती जाती थीं, लेकिन हर भेड़ यही सोचती थी कि वह दूसरी तो भेड़ थी इसलिए काटी गई, और मैं, मैं तो सिंह हूं मैं काटी जाने वाली नहीं हूं ।
उस जादूगर के घर उसका एक मित्र मेहमान हुआ, तो उसने पूछा कि हम भी भेड़ें पालते हैं, और हम भी भेड़ों को काटते हैं, और उनके मांस को बेचते हैं, लेकिन हमारी भेड़ें तो बड़ी भयभीत रहती हैं, और बड़ी परेशान रहती हैं । तुम्हारी भेड़ें तो बड़ी शान से घूमती हैं, और एक भेड़ काटी जाती है, तो दूसरी भेड़ उसकी कोई फिकर नहीं करती है, और शान से घूमती रहती है, बात क्या है? उस जादूगर ने कहा -- मैंने एक तरकीब काम में लाई है । इनको बेहोश करके मैंने कह दिया है कि तुम भेड़ नहीं हो, इसलिए ये मौज में घूमती रहती हैं, और इनके भागने का, भयभीत होने का मुझे कोई डर नहीं रह गया । और जब एक भेड़ कटती है, तो बाकी भेड़ें सोचती हैं कि वह भेड़ थी, मैं तो भेड़ नहीं हूं ।
मनुष्य-जाति के साथ भी कुछ मामला ऐसा ही है । हर आदमी को यह खयाल है कि मैं तो कुछ और हूं, बाकी सारी भेड़ें हैं, तो जब मैं आपसे यह कह रहा हूं कि मनुष्य यंत्र है, तो मैं भलीभांति जानता हूं आप अपने पड़ोसी को विचार करके सोच रहे होंगे कि बात तो इस आदमी के बाबत बिलकुल ठीक है, रही मेरी बात, तो मैं तो नहीं हूं, मैं तो exception हूं । मैं तो एक अपवाद हूं । बाकी लोगों के संबंध में तो यह बात बिलकुल ठीक है ।
अक्रोध का अर्थ है, चौबीस घंटे एक शांत स्थिति। यह तभी हो सकता है, जब हम दूसरे को दोष देना बंद कर दें।
साहस
कथा :
एक वृद्ध वैज्ञानिक अपने बच्चों को समझा रहा था कि निरीक्षण क्या है? उसके बच्चों ने उससे पूछा कि विज्ञान की खोज में सबसे बड़ी बात क्या है ? उस वृद्ध वैज्ञानिक ने कहा -- दो बातें जरूरी हैं, एक तो courage, साहस, और दूसरा निरीक्षण, observation. उन बच्चों ने कहा कि हमें ठीक से समझा दें, तो शायद हमारी समझ में आ जाए । वह वृद्ध वैज्ञानिक एक प्याली में नमक का बहुत कड़वा, बहुत बेस्वाद घोल बना कर लाया, और उसने उन बच्चों को कहा कि यह नमक का घोल है, बहुत कड़वा, बहुत बेस्वाद; इसे जीभ पर रखोगे तो वमन हो जाएगा, उलटी हो जाएगी । सारा मुंह तिक्त और कड़वा हो जाएगा । लेकिन इसकी जांच करनी है और इसे पहचानना है । तो मैं अपनी अंगुली इसमें डुबाऊंगा और उसे अपनी जीभ पर रखूंगा । तुम ठीक से निरीक्षण करते रहना कि मैं किस भांति यह कर रहा हूं ? जब मैं कर चुकूं तो तुम्हें भी यही करना होगा, अंगुली डुबानी होगी और जीभ पर रखनी होगी । ठीक से निरीक्षण करना । जैसा मैं करूं ठीक वैसा ही तुम्हें भी करना है । उन बच्चों ने गौर से देखा, वे टकटकी लगा कर देखते रहे, निरीक्षण करना जरूरी था । फिर उनको भी वैसा ही करना था । उस बूढ़े ने अपनी अंगुली डुबाई, फिर अंगुली को जीभ पर रखा ।
लेकिन जैसा बच्चों की अपेक्षा थी कि उसके चेहरे पर बेस्वाद होने के भाव आएंगे, शायद उसे उलटी हो जाएगी, न तो उसे उलटी हुई, न उसके चेहरे पर कोई भाव आए, न कोई फर्क हुआ । फिर इसके बाद वह प्याली घुमाई गई और हर बच्चे ने उसमें अंगुली डुबाई और अपनी जीभ पर रखी । लेकिन जीभ पर रखते से ही जैसे जहर मुंह में पहुँच गया हो, वे सारे बच्चे थूकने लगे, कुछ बच्चों को उलटी हो गई । उन सारे बच्चों के चेहरे एकदम घबड़ाहट से भर गए, उनकी आंखों में आंसू आ गए । जब वे सारे बच्चे यह प्रयोग कर चुके तो उस वृद्ध वैज्ञानिक ने कहा -- मेरे बच्चों जहां तक साहस का सवाल है, तुम सब पूरे अंक पाने में सफल हो गए । तुम सब साहसी हो, लेकिन जहां तक निरीक्षण, observation का सवाल है, तुम सब असफल हो गए । क्योंकि मैंने जो अंगुली घोल में डुबाई थी, वही मैंने जीभ पर नहीं रखी थी, मैंने दूसरी अंगुली जीभ पर रखी थी । तुमने निरीक्षण नहीं किया, तुमने ठीक से नहीं देखा । जो अंगुली मैंने डुबाई थी, वही मैंने जीभ पर नहीं रखी, मैंने दूसरी अंगुली जीभ पर रखी थी । तो साहस तो तुमने किया लेकिन निरीक्षण तुम नहीं कर पाए।
जो उस वृद्ध वैज्ञानिक ने उन बच्चों को समझाया, जीवन के संबंध में भी मैं आपसे यही कहता हूं कि हममें से बहुत से लोग साहस तो करते हैं, लेकिन निरीक्षण नहीं कर पाते । और बिना निरीक्षण के साहस खतरनाक है । सोया हुआ आदमी साहसी हो जाए तो बड़ा खतरनाक है, उससे दुनिया में सिवाय बुराई के और कुछ भी पैदा नहीं हो सकता ।
बुद्ध के चार आर्य / सत्य -- 1. जीवन दुख है । 2. दुख के कारण हैं । 3. दुख से मुक्त होने की विधि है । 4. दुख मिट जाता है ।
निर्णय
कथा :
एक रात एक घटना घटी । एक शादी में कोई दो सौ, उस नगर के सारे प्रतिष्ठित लोग इकट्ठे थे । और एक मित्र आया और उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला जो कोई तीन हजार वर्ष पुराना Egypt का सिक्का था । और उसने कहा कि इस तरह के दो ही सिक्के हैं दुनिया में, एक यह है और एक और किसी आदमी के पास । इस सिक्के को मैंने बीस हजार रुपये खर्च करके खरीदा है । तीन हजार वर्ष पुराना सिक्का है, बस ऐसे दो ही सिक्के हैं इतने पुराने । तो मैंने सोचा कि आप शायद देख कर खुश होंगे इसलिए मैं ले आया, कोई दो सौ लोग थे, सिक्का एक हाथ से दूसरे हाथ में चला गया, लोग देखने लगे । और अनेक लोगों ने उसे घेर लिया । और लोग पूछने लगे बीस हजार में खरीदा है, ऐसी इसमें क्या खूबी है? कितना पुराना है, किस राजा के वक्त का है? और किस सन् का है? ये सारी बातें होने लगीं । आधा घंटे बाद उसने फिकर की कि वह सिक्का कहां है? सिक्का मिलना मुश्किल हो गया । जिससे भी पूछा गया, उसने कहा, मैंने देखा तो जरूर, मैंने किसी और को दे दिया । वह सिक्का भीड़ में भटक कर खो गया और मिलना कठिन हो गया । अब परेशानी खड़ी हो गई । शादी का काम तो स्थगित हो गया और सिक्के को खोजना जरूरी हो गया । लोगों ने सलाह दी कि सारे लोग अपनी जेबों की तलाशी दे दें, अब तो और कोई रास्ता नहीं है । सभी लोग राजी हो गए कि हमारी जेबें देख ली जाएं, हमने तो लिया नहीं । लेकिन एक आदमी ने इनकार कर दिया । उसने कहा कि मैं चोर नहीं हूं यह मैं कहे देता हूं, मैंने सिक्का नहीं लिया, यह मैं बता देता हूं, मैं यहां शादी में सम्मिलित होने आया हूं, अपनी जेबों की तलाशी देने नहीं । मैंने आपसे कहा भी नहीं था कि सिक्का दिखलाइए, तो मैं चोर नहीं हूं, यह मैं कहे देता हूं, लेकिन मेरी जेब में हाथ डालने की कोई कोशिश न करें ।
अगर आप वहां मौजूद होते तो क्या करते? क्या सोचते? जो लोग मौजूद होते थे, वहां उन्होंने भी यही सोचा कि इस आदमी में जरूर कोई गड़बड़ है । सिक्का अगर इसने नहीं चुराया है तो इतनी जिद्द की क्या बात है कि मैं अपनी जेब नहीं दिखलाऊंगा । आखिर लोगों ने तय किया कि जबरदस्ती करनी पड़ेगी । उस आदमी ने अपनी जेब से पिस्तोल निकाल ली और उसने कहा कि क्षमा करिए, जबरदस्ती का परिणाम खतरनाक हो सकता है ।
अब बात बहुत बिगड़ गई । सिवाय इसके कि पुलिस को खबर की जाए, कोई मार्ग न रहा । पुलिस को फोन करके खबर की गई । दरवाजे मकान के बंद कर दिए गए ताकि कोई निकल न सके, और सबसे कहा गया कि जो जहां है, वह वहीं खड़ा रहे । पुलिस आने को ही थी एक नौकर ने मेज पर से कोई बर्तन उठाया और हैरानी हुई वह सिक्का उस बर्तन के नीचे रखा हुआ था । वह सिक्का मिल गया तो सारे लागों ने उस सज्जन को कहा कि तुम कैसे पागल हो ? जब तुमने सिक्का नहीं लिया था, तो इनकार करने और पिस्तोल निकालने की क्या जरूरत थी ? उसने अपने खीसे में हाथ डाला और दूसरा सिक्का निकाल कर बाहर रख दिया और उसने कहा कि दूसरे सिक्के का मालिक मैं हूं, जिसकी ये चर्चा कर रहे थे । मैं भी यह सोच कर आया था कि दिखा दूंगा अपना सिक्का, लेकिन उन्होंने पहले दिखा दिया, तो फिर मैंने सोचा, अब कोई मतलब नहीं है, मैं चुप रह गया । लेकिन पांच मिनट पहले कौन मेरा विश्वास कर सकता था कि मैं इस सिक्के का मालिक मैं हूं । मैं चोर था । पांच मिनट पहले कौन विश्वास कर सकता था कि मैं इसका मालिक हूं । आपमें से कोई विश्वास कर सकता था पांच मिनट पहले ? आपमें से कोई पांच मिनट पहले संदेह करने से बच सकता था कि यह आदमी चोर है?
अगर ऐसा कोई आदमी आपके भीतर हो तो वह समझ ले कि वह जागा हुआ आदमी है, सोया हुआ आदमी नहीं है । लेकिन नहीं ! हम सभी शक कर जाते कि यह आदमी चोर है । और अगर सिक्का उसके खींसे से मिल जाता तब तो बात पक्की हो जाती कि यह आदमी चोर है । कोई दुनिया में मानने को राजी नहीं होता कि यह सिक्का इसका है । लेकिन वह सिक्का उसका था । जिंदगी इतनी ही mysterious है, इतनी ही रहस्यपूर्ण है । इसलिए जो जानते हैं वे निर्णय नहीं लेते ।
नास्तिकता ग्रेविटेशन है। जमीन की ताकत नीचे की तरफ खींचती है। आस्तिकता ग्रेस, प्रसाद है, अनुग्रह है; ऊपर की तरफ ले जाता है।
क्राइस्ट के जीवन में एक उल्लेख है। वे एक गांव के बाहर ठहरे हुए थे। और कुछ लोग एक स्त्री को लेकर उनके पास गए और उन लोगों ने कहा, इस स्त्री ने व्यभिचार किया है। हम इसे क्या सजा दें? पुरानी किताब में लिखा हुआ है, पुरानी धर्म की किताब में लिखा हुआ है--इसे पत्थर मारो और मार डालो।
उन्होंने क्राइस्ट से इसलिए यह पूछा कि इससे दो बातें साफ हो जाएंगी। एक तो यह बात साफ हो जाएगी, अगर क्राइस्ट यह कहेंगे कि इसे पत्थरों से मार डालो, तो हम कहेंगे, आप तो कहते थे कि जो एक गाल पर चांटा मारे उसके सामने दूसरा कर देना चाहिए। और आप तो कहते थे, जो घृणा करे उसको प्रेम करना चाहिए। और आप तो कहते थे कि जो चोट पहुंचाए उसको क्षमा कर देना चाहिए। तो फिर आप यह क्या कह रहे हैं? और अगर क्राइस्ट ने कहा कि इसे पत्थर मत मारो, यह बुरा है। तो हम कहेंगे, यह तो धर्मग्रंथ के विरोध में आप कह रहे हैं, आप तो धर्मशास्त्र के विरोध में हैं।
क्राइस्ट ने कहा, जो पुरानी किताब में लिखा है, वही करो। सारे लोग पत्थर उठा लो और इसे मार डालो।
वह स्त्री तो बहुत घबड़ा गई। उसने सोचा था कि क्राइस्ट के पास जाने से शायद जीवन बच जाए, क्योंकि वे शायद ही इस बात के लिए कहेंगे कि मार डाला जाए। लेकिन जब उन्होंने कहा कि सारे लोग पत्थर उठा लो और इसे समाप्त कर दो, तो वह स्त्री घबड़ा गई। सारे लोगों ने पत्थर उठा लिए और वे सारे लोग मारने को थे, तब क्राइस्ट ने कहा, एक क्षण ठहरो। वह आदमी सबसे पहले पत्थर मारे जिसने कभी व्यभिचार न किया हो या व्यभिचार का विचार न किया हो।
उस पूरी भीड़ में एक भी आदमी ऐसा नहीं था जिसने व्यभिचार न किया हो या व्यभिचार का विचार न किया हो। वे पत्थर नीचे गिर गए और वे लोग वापस लौट गए। और उन्होंने उस स्त्री से कहा, कोई व्यक्ति इस जगत में किसी दूसरे का निर्णायक नहीं हो सकता। अदभुत उन्होंने उस स्त्री से बात कही: इस जगत में कोई व्यक्ति किसी दूसरे का निर्णायक नहीं हो सकता।
नासमझ जो हैं, वे इस जगत में दूसरों का विचार करते रहते हैं और निर्णय करते रहते हैं। और जो समझदार हैं, वे अपना विचार करते हैं और अपना निर्णय करते हैं।
अस्तित्व
कथा :
एक बहुत पुरानी तिब्बतन कथा है कि एक छोटा सा मच्छर था । आदमी ने लिखी, इसलिए छोटा सा लिखा है । मच्छर बहुत बड़ा था, मच्छरों में बड़े से बड़ा मच्छर था । कहना चाहिए, मच्छरों में राजा था, सम्राट था । कोई मच्छर गोबर के टीले पर रहता था, कोई मच्छर वृक्ष के ऊपर रहता था, कोई मच्छर कहीं । राजा कहां रहे, बड़ी चिंता मच्छरों में फैली । फिर एक हाथी का कान खोजा गया । और मच्छरों ने कहा कि महल तो यही है आपके रहने के योग्य ।
मच्छर जाकर दरवाजे पर खड़ा हुआ, हाथी के कान पर । महान विशालकाय दरवाजा था--हाथी-द्वार । मच्छर ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा कि सुन ऐ हाथी, मैं मच्छरों का राजा, फलां-फलां मेरा नाम, आज से तुझ पर कृपा करता हूं, और तेरे कान को अपना निवास-स्थान बनाता हूं । जैसा कि रिवाज था, मच्छर ने तीन बार घोषणा की । क्योंकि यह उचित नहीं था कि किसी के भीतर निवास बनाया जाए और खबर न की जाए । हाथी खड़ा सुनता रहा । मच्छर ने सोचा, ठीक है--मौनं सम्मति लक्षणम् । वह सम्मति देता है, मौन है ।
फिर मच्छर वर्षों तक रहता था, आता था, जाता था । उसके बच्चे, संतति और बड़ा विस्तार हुआ, बड़ा परिवार वहां रहने लगा । फिर भी जगह बहुत थी । मेहमान भी आते, और भी लोग रुकते । बहुत काफी था ।
फिर और कोई जगह सम्राट के लिए खोज ली गई और मच्छरों ने कहा कि अब आप चलें, हम और बड़ा महल खोज लिए हैं । तो मच्छर ने फिर दरवाजे पर खड़े होकर कहा कि ऐ हाथी सुन, अब मच्छरों का सम्राट, फलां-फलां मेरा नाम है, अब मैं जा रहा हूं । हमने तुझ पर कृपा की । तेरे कान को महल बनाया ।
कोई आवाज न आई । मच्छर ने सोचा, क्या अब भी मौन को सम्मति का लक्षण मानना पड़ेगा? अब भी? यह जरा दुखद मालूम पड़ा कि ठीक है, जाओ, कुछ मतलब नहीं । वह हां भी नहीं भर रहा है, न भी नहीं भर रहा है । उसने और जोर से चिल्ला कर कहा, लेकिन फिर भी कुछ पता न चला । उसने और जोर से चिल्ला कर कहा । हाथी को धीमी सी आवाज सुनाई पड़ी कि कुछ... । हाथी ने गौर से सुना, तो सुनाई पड़ा कि एक मच्छर कह रहा है कि मैं सम्राट मच्छरों का, मैं जा रहा हूं, तुझ पर मेरी कृपा थी, इतने दिन तेरे कान में निवास किया । क्या तुझे मेरी आवाज सुनाई नहीं पड़ती है?
हाथी ने कहा, महानुभाव, आप कब आए, मुझे पता नहीं । आप कितने दिन से रह रहे हैं, मुझे पता नहीं । आप आइए, रहिए, जाइए, जो आपको करना हो, करिए । मुझे कुछ भी पता नहीं है ।
लेकिन अस्तित्व और मनुष्य के मन के बीच कोई इतना भी संबंध नहीं है । न हम आते हैं, तब उसे पता चलता है कि हमने बैंड-बाजे बजा कर घोषणा कर दी है कि मेरा जन्म हो रहा है । न हम मरते हैं, तब उसे पता चलता है । हम आते हैं और चले जाते हैं । पानी पर खींची रेखा की भांति बनते हैं और मिट जाते हैं । लेकिन इस थोड़ी सी देर में, जब कि रेखा बनने और मिटने के बीच में थोड़ी देर बचती है, उतनी थोड़ी देर में हम न मालूम कितने शब्द निर्मित करते हैं । उस बीच हम न मालूम कितने सिद्धांत निर्मित करते हैं । उस बीच हम न मालूम कितने शास्त्र बनाते हैं, संप्रदाय बनाते हैं । उस बीच हम मन का पूरा जाल फैला देते हैं ।
वर्तना
कथा :
झेन फकीर बोकोजू एक पुल पर से गुजर रहा है । साथी है एक साथ में । वह साथी बोकोजू से कहता है, देखते हैं आप, नदी कितने जोर से बही जा रही है! बोकोजू कहता है, नदी का बहना तो कोई भी देखता है मित्र, जरा गौर से देख, पुल भी कितने जोर से बहा जा रहा है--दि ब्रिज!
वह आदमी चौंक कर चारों तरफ देखता है, ब्रिज तो अपनी जगह खड़ा है । पुल कहीं बहते हैं? नदियां बहती हैं । वह आदमी चौंक कर बोकोजू की तरफ देखता है । बोकोजू कहता है, और यह तो अभी मैंने तुझसे पूरी बात न कही । और गौर से देख, पुल पर जो खड़े हैं, वे और भी जोर से बहे जा रहे हैं ।
यहां जो भी घटित होता है समय के भीतर, वह परिवर्तन है । यहां जो भी कहा जाता है, वह मिट जाएगा । यहां जो भी लिखा जाता है, वह बुझ जाएगा । यहां सब हस्ताक्षर रेत के ऊपर हैं । रेत पर भी नहीं, पानी पर ।
Bill Gates - I choose a lazy person to do a hard job. Because a lazy person will find an easy way to do it.
प्रगति
कथा :
Aldous Huxley - से कोई पूछ रहा था कि आपकी तीन पीढ़ियां--Huxley परिवार की तीन पीढ़ियां प्रगति के पक्ष में काम करती रही हैं, बाप और परदादा से लेकर तीन परिवार मनुष्य-जाति की प्रगति हो, इस का काम करते रहे हैं -- आपसे हम लेखा चाहते हैं, ब्योरा चाहते हैं इस बात का कि क्या आप कह सकते हैं कि आदमी आज से पांच हजार साल पहले जैसा था, उससे आज ज्यादा सुखी है? ज्यादा शांत है? ज्यादा आनंदित है?
Aldous Huxley ने कहा, अगर मेरे परदादा से पूछा होता, तो वे हिम्मत से कह सकते थे कि हां, है! अगर मेरे बाप से पूछा होता, तो वे थोड़ा झिझकते । मैं उत्तर ही नहीं दे सकता ।
नहीं, आदमी सुखी भी नहीं हुआ, शांत भी नहीं हुआ, आनंदित भी नहीं हुआ । और प्रगति काफी हो गई । प्रगति कम न हुई, प्रगति काफी हो गई ।
नमन का अर्थ इतना ही नहीं होती कि किसी के चरणों में सिर झुका देना। नमन का अर्थ होता है: किसी के चरणों में अपने को चढ़ा देना। यह सिर झुकाने की बात नहीं है; यह अहंकार विसर्जित कर देने की बात है।
एक बाउल फकीर से एक बड़े शास्त्रज्ञ पंडित ने पूछा कि प्रेम, प्रेम...निरंतर प्रेम का जप किए जाते हो, यह प्रेम है क्या? मैं भी तो समझूं! इस प्रेम का किस शास्त्र में उल्लेख है, किन वेदों का समर्थन है?
वह बाउल फकीर हंसने लगा। उसका इकतारा बजने लगा। खड़े होकर वह नाचने लगा। पंडित ने कहा: नाचने से क्या होगा? और इकतारा बजाने से क्या होगा? व्याख्या होनी चाहिए प्रेम की। और शास्त्रों का समर्थन होना चाहिए। कहते हो प्रेम परमात्मा का द्वार है, मगर कहां लिखा है? और नाचो मत, बोलो! इकतारा बंद करो बैठो! तुम मुझे धोखे में न डाल सकोगे। औरों को धोखे में डाल देते हो इकतारा बजा कर, नाच कर। औरों को लुभा लेते हो, मुझको न लुभा सकोगे।
उस बाउल फकीर ने फिर भी एक गीत गाया। उस बाउल फकीर ने कहा: गीतों के सिवाय हमारे पास कुछ और है नहीं। यही गीत हमारे वेद, यही गीत हमारे उपनिषद, यही गीत हमारे कुरान। क्षमा करें! नाचूंगा, इकतारा बजाऊंगा, गीत गाऊंगा—यही हमारी व्याख्या है। अगर समझ में आ जाए तो आ जाए; न समझ में आए, दुर्भाग्य तुम्हारा। पर हमसे और कोई व्याख्या न पूछो। और कोई उसकी व्याख्या है ही नहीं।
और जो गीत उसने गाया, बड़ा प्यारा था। गीत का अर्थ था: एक बार एक सुनार एक माली के पास आया और कहा कि तेरे फूलों की बड़ी प्रशंसा सुनी है, तो मैं आज कसने आया हूं कि फूल सच्चे हैं, असली हैं या नकली हैं? मैं अपने सोने के कसने के पत्थर को ले आया हूं।
और वह सुनार उस गरीब माली के गुलाबों को पत्थर पर कस—कसकर फेंकने लगा कि सब झूठे हैं, कोई सच्चे नहीं हैं।
उस बाउल फकीर ने कहा: जो उस गरीब माली के प्राणों पर गुजरी, वही तुम्हें देखकर मेरे प्राणों पर गुजर रही है। तुम प्रेम की व्याख्या पूछते हो! और मैं प्रेम नाच रहा हूं। अंधे हो तुम! तुम प्रेम के लिए शास्त्रीय समर्थन पूछते हो—और मैं प्रेम को संगीत दे रहा हूं! बहरे हो तुम!
Most people overestimate what they can do in one year and underestimate what they can do in ten years -― Bill Gates
रहस्य
कथा :
नसरुद्दीन एक होटल में बैठा हुआ है । और कोई आदमी उससे आकर गांव के समाचार पूछता है । अजनबी है, परदेशी है । नसरुद्दीन उससे कहता है कि आप ताश तो नहीं खेलते हैं? अन्यथा हम ताश खेलें । वह आदमी कहता है, एक बार खेल कर देखा, फिर बेकार पाया । नसरुद्दीन कहता है, आप शतरंज में तो शौक नहीं रखते हैं? अन्यथा मैं शतरंज बुला लूं । वह आदमी कहता है, एक दफा शतरंज भी खेली थी । नहीं, कुछ सार न पाया । नसरुद्दीन कहता है, फिर आपके लिए मैं क्या इंतजाम करूं?संगीत सुनना पसंद करेंगे? तो मैं कुछ वाद्य बजाऊं । वह आदमी कहता है, एक दफा सुना था, सार नहीं पाया । तो नसरुद्दीन कहता है, मछली मारने के शौकीन हैं? तो चलें हम, मौसम अच्छा है, बाहर मछलियां मारें । तो वह आदमी कहता है, मैं तो न जा सकूंगा, मेरा लड़का है उसे ले जाएं ।
नसरुद्दीन उससे कहता है, माफ करें, मैं सोचता हूं, आपका एकमात्र लड़का! क्योंकि एक दफा देखा होगा आपने प्रेम, काम, फिर दुबारा तो...I presume your only son, नसरुद्दीन कहता है । क्योंकि एक दफा ताश खेल कर देखा, बेकार पाया । एक दफा शतरंज खेल कर देखी, बेकार पाई । एक दफा मछली मार कर देखी, बेकार पाई । तो I presume your only son!
जीवन में कोई तथ्य ऐसा नहीं है, जो दुबारा देखने योग्य है । और अगर दुबारा देखने योग्य है, तो वह तथ्य नहीं होगा, उसमें कुछ रहस्य होगा, जो अनजाना रह गया, जिसको फिर जानना पड़ेगा, फिर जानना पड़ेगा । फिर भी अनजाना रह जाएगा, तो फिर जानना पड़ेगा । जिस चीज को हम पूरा जान लें, उसे दुबारा जानने का कोई भी सवाल नहीं है । क्या सवाल है? नहीं जान पाते हैं पूरा, इसलिए दुबारा जानते हैं, तिबारा जानते हैं, हजार बार जानते हैं, और फिर भी एक हजार एक बार जानने की कामना जगती है । क्योंकि वह अनजाना, अपरिचित रहस्य पीछे शेष रह गया ।
निश्चेष्ट
कथा :
डायोजनीज, एक फकीर, सुकरात से मिलने गया था । सुकरात बहुत सरल व्यक्ति था--वैसा सरल व्यक्ति, जिसने सरलता को साधा नहीं है । क्योंकि जिसने साधा, वह तो जटिल हो गया । सरलता भी साध कर लाई जाए, cultivate करनी पड़े, तो जटिल हो जाती है ।
सुकरात सरल व्यक्ति था । उसने सरलता को कभी साधा नहीं था । उसने असरलता के विपरीत किसी सरलता को कभी पकड़ा नहीं था । डायोजनीज जटिल था । उसने सरलता को साधा था । वह अक्सर नग्न रहता, या अगर कभी कपड़े भी पहनता, तो चिथड़ों से जोड़ कर पहनता । अगर कभी नए कपड़े उसे कोई भेंट कर देता, तो उनको पहले काट कर, टुकड़े करवा कर, पुनः जुड़वा कर, तभी उन्हें पहनता । अगर कोई नए कपड़े भेंट कर देता, तो पहले उन्हें गंदे करता, सड़ाता, खराब करता, फिर चिथड़े बनाता, फिर उन्हें जोड़ता । सरलता का अभ्यासी था ।
सुकरात को मिलने आया । सुकरात से उसने कहा, तुम्हें इन इतने सुंदर वस्त्रों में देख कर मुझे लगता है, कैसे तुम साधु हो? कैसी तुम्हारी सरलता ? सुकरात हंसने लगा और उसने कहा, हो सकता है, सरल मैं न होऊं; हो सकता है, तुम जो कहते हो, वह ठीक है ।
डायोजनीज नहीं समझ पाया होगा कि सरल व्यक्ति का यह लक्षण है । तो डायोजनीज ने कहा कि तुम खुद ही स्वीकार करते हो? यही तो मैंने लोगों से कहा था कि सुकरात सरल आदमी नहीं है । तुम खुद भी स्वीकार करते हो, मुहर लगाते हो मेरी बात पर? सुकरात ने कहा, तुम कहते हो, तो इनकार करने का मैं कोई कारण नहीं पाता हूं; असरल ही होऊंगा । डायोजनीज खिलखिला कर हंसने लगा।
जब वह उतर रहा था नीचे, तो सुकरात का शिष्य प्लेटो उसे द्वार पर मिला । उसने प्लेटो से कहा कि सुनो, तुम्हारे गुरु ने लोगों के सामने स्वीकार की है यह बात कि वह सरल नहीं है ।
प्लेटो ने नीचे से ऊपर तक देखा और कहा कि तुम्हारे फटे चिथड़ों में जो छेद हैं, उनमें से सिवाय अहंकार के और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है । तुम कृपा करके नंगे कभी मत होना, नहीं तो सिवाय अहंकार के कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा । तुम्हारे छेद में से सिर्फ अहंकार ही दिखाई पड़ता है । प्लेटो ने कहा, तुम समझ ही नहीं पाए, यही तो सरल आदमी का लक्षण है कि तुम उससे कहने जाओ कि तुम सरल नहीं हो तो वह स्वीकार कर लेगा । और तुम्हारी यह घोषित सरलता बड़ी असरल है, बहुत जटिल है ।
सरलता अगर सचेष्ट है, तो जटिल हो जाती है । और जटिलता भी अगर निश्चेष्ट है, तो सरल हो जाती है ।
ध्यान रखें, हमारे मन का तर्क हमें कहां भटकाता है? वह कहता है, इतनी चेष्टा करके जब नहीं मिल रहा, तो बिना चेष्टा किए कैसे मिलेगा? लेकिन लाओत्से कहेगा कि चेष्टा कर रहे हो इतनी, इसीलिए नहीं मिल रहा । एक बार बिना चेष्टा किए हुए भी देखो! क्या कारण होगा ऐसा? ऐसा लाओत्से क्यों कह पाता है?
ऐसा इसलिए कहता है कि जीवन में जो भी पाने योग्य है, वह हमें सदा से ही मिला हुआ है । चेष्टा की वजह से हम इतने व्यस्त और परेशान हैं कि हम उसे देख नहीं पाते ।
इस सदी के जो बड़े से बड़े वैज्ञानिक आविष्कार हुए हैं, उन सभी आविष्कारकों का यह अनुभव है कि जिसे वे खोज रहे थे, उसे वे तब तक न खोज पाए, जब तक खोजने का मन रहा । बड़े से बड़े आविष्कार इस सदी के जो हैं, जिन बड़े-बड़े आविष्कारों पर नोबल पुरस्कार मिले हैं, उन अधिकतम पुरस्कृत लोगों का यह अनुभव है कि जो हमने जाना, वह कोशिश से नहीं जान पाए । किसी क्षण में जब कोई कोशिश न थी, कोई चीज भीतर से उठी और जवाब आ गया ।
मैडम क्यूरी ने तो रात सोते वक्त अपने गणितों के उत्तर लिखे । दिन भर थक गई है, परेशान हो गई है, नहीं उत्तर आते हैं । सो गई है । रात नींद में उत्तर आ गया है । उठ कर उत्तर लिख लिया है । सुबह पाया कि उत्तर सही है । और उत्तर बिना process के आया है, क्योंकि रात सिर्फ उत्तर लिखा है । फिर process में कभी तो दिनों लग गए पूरी करने में । उत्तर तो मिल गया है ।
यह उत्तर कहां से आया?
जो मनुष्य के अंतरतम को जानते हैं, वे कहते हैं, जो भी जाना जा सकता है, वह मनुष्य जाने ही हुआ है । जो भी इस जगत में कभी भी जाना जाएगा, उसे आप इस क्षण भी जान रहे हैं । सिर्फ आपको पता नहीं है । मनुष्य की अंतस चेतना में वह सब छिपा है, जो कभी भी प्रकट होगा । वृक्ष में जो पत्ते हजार साल बाद प्रकट होंगे, वे भी बीज में छिपे थे । अन्यथा वे प्रकट नहीं हो सकते हैं । हजार साल बाद आदमी जो जानेगा, आदमी आज भी जानता है । पर जानता नहीं कि जानता है । बाहर खोज-बीन में उलझा हुआ है ।
जितने भी आविष्कार के क्षण हैं, वे relaxed, विश्राम के क्षण हैं । न्यूटन बैठा है वृक्ष के तले और सेव गिर गया । विश्राम का क्षण था; कोई प्रयोगशाला नहीं थी वह ।
एक वैज्ञानिक अपने विद्यार्थियों को प्रयोगशाला में समझा रहा है कि बुद्धि पर जोर डालो, थोड़ी शर्म खाओ । पता नहीं तुम्हें कि न्यूटन वृक्ष के नीचे बैठा था, और फल गिरा और उसने कितना बड़ा आविष्कार कर लिया! और तुम इतनी मेहनत करके भी कुछ नहीं कर पा रहे हो । एक युवक खड़े होकर कहता है कि हमें भी वृक्ष के नीचे बैठने दो, तो शायद फल गिरे और कोई आविष्कार हो जाए! लेकिन इस प्रयोगशाला के तनाव में न्यूटन भी कुछ न कर पाता । यह खोजने की इतनी जो चेष्टा है, इतना जो तनाव और tesion है, शायद न्यूटन भी कुछ न कर पाता । न्यूटन भी सोच नहीं रहा था उस वक्त; बिना सोचे बैठा था ।
इस जगत में जो बड़े से बड़ी खोजें घटित होती हैं, वे उन क्षणों में होती हैं, जब मन होता है विश्राम में और निर्विचार ।
लाओत्से का आधारभूत दर्शन: मनुष्य चेष्टा न करे, प्रयास न करे, कर्ता न बने, दावेदार न हो, तो उसे वह सब संपदा मिल जाएगी, जिसकी तलाश है । तलाश से नहीं मिलेगी ।
समझ कर जो काम अभी हो सकता है, थक कर वह जन्मों में होता है ।
जूडो की कला कहती है, मारो मत । जब कोई मारे, तो उसके सहयोगी हो जाओ, उसको दुश्मन मत मानो । मानो कि जैसे वह अपने ही शरीर का एक हिस्सा है । और तब थोड़ी ही देर में मारने वाला थक जाएगा और परेशान हो जाएगा । उसकी शक्ति क्षीण होगी । क्योंकि हर घूंसे में शक्ति बाहर फेंकी जा रही है । और आपकी शक्ति क्षीण नहीं होगी । बल्कि जूडो कहता है कि उसके घूंसे से जो शक्ति निकल रही है, वह भी आप पी जाओगे, वह भी आपको मिल जाएगी । पांच मिनट के भीतर जूडो का ठीक से जानने वाला आदमी किसी भी तरह के आदमी को परास्त कर देता है । परास्त करना नहीं पड़ता, वह परास्त हो जाता है ।
एक बहुत प्रसिद्ध कथा है जूडो की । एक बहुत बड़ा तलवारबाज है, एक बड़ा swordman है । वह इतना बड़ा तलवारबाज है कि जापान में उसका कोई मुकाबला नहीं है । एक रात वह अपने घर लौटा है, दो बजे हैं । जब वह अपने बिस्तर पर लेटने लगा, तो उसने देखा, एक बड़ा चूहा निकला है दीवार से । उसे बड़ा क्रोध आया । उसने चूहे को डराने-धमकाने की कोशिश की अपने बिस्तर पर से ही, लेकिन चूहा अपनी जगह पर बैठा रहा । उसे बड़ी हैरानी हुई । वह बड़े-बड़े लोगों को धमका दे, तो भाग खड़े होते हैं! चूहा! उसको क्रोध इतना आ गया कि उसके पास में ही उसकी सीखने की लकड़ी की तलवार पड़ी थी, उसने उठा कर जोर से चूहे पर हमला किया । हमला उसने इतने क्रोध में किया, चूहा जरा इंच भर सरक गया और उसकी तलवार जमीन पर पड़ी और टुकड़े-टुकड़े हो गई, और चूहा अपनी जगह बैठा रहा । तब जरा उसे घबराहट पैदा हो गई । चूहा कोई साधारण नहीं मालूम होता । उसके वार को चूक जाना, उसका वार चूक जाए, इसकी कल्पना भी नहीं थी ।
वह अपनी असली तलवार लेकर आ गया । लेकिन जब चूहे को मारने के लिए कोई असली तलवार लेकर आता है, तो उसकी हार निश्चित है । असली तलवार लेकर आ गया जब वह, तभी हार निश्चित हो गई । चूहे को मारने के लिए असली तलवार एक योद्धा को लानी पड़े! चूहे से डर तो गया वह बहुत । और चूहा असाधारण है । हाथ उसका कंपने लगा । और उसे लगा कि अगर असली तलवार टूट गई, तो फिर इस अपमान को सुधारने का कोई उपाय न रह जाएगा । उसने बहुत सम्हल कर मारा । और जो जानते हैं, वे कहते हैं, जितना सम्हल कर आप निशाना लगाएंगे, उतना ही चूक जाएगा । क्योंकि सम्हलने का मतलब है कि भीतर डर है, भीतर घबड़ाहट है, कंपन है । अगर भीतर कोई डर नहीं, घबड़ाहट नहीं, तो आदमी सम्हल कर काम नहीं करता । काम करता है और हो जाता है । उसने तलवार मारी उसे । जिंदगी में उसने बहुत बार तलवार उठाई और चलाई और वह कभी चूका नहीं था । एक क्षण उसका हाथ बीच में कंपा और जब तलवार नीचे पड़ी, तो टुकड़े-टुकड़े हो गई । चूहा जरा सा हट गया था ।
उस तलवारबाज की समझ के बाहर हो गई बात । उसने होश खो दिया । कहानी कहती है कि उसने गांव में खबर की कि किसी के पास कोई जानदार बिल्ली हो, तो ले आओ । और दूसरे दिन गांव में जो बड़े से बड़ा धनपति था, उसने अपनी बिल्ली भेजी । वह कई चूहों को मार चुकी थी । लेकिन तलवारबाज डरा हुआ था । और जिस धनपति ने अपनी बिल्ली भेजी थी, वह भी डरा हुआ था । क्योंकि जब तलवारबाज की तलवार टूट गई हो, तो बिल्ली कहां तक सफल होगी, यह भय है । और बिल्ली को भी खबर मिल गई थी । और तलवारबाज बहुत बड़ा था । बिल्ली ने बहुत चूहे मारे थे, लेकिन इस चूहे से आतंकित हो गई थी । रात भर सो न पाई । सुबह जब चली, तो पूरी तैयारी से चली । रास्ते में पच्चीस योजनाएं बनाईं । कभी-कभी उसके मन को भी हुआ, मैं यह क्या कर रही हूं! चूहे तो मुझे देखते ही भाग जाते हैं । मैं योजना कर रही हूं! लेकिन योजना कर लेनी उचित थी । चूहा असाधारण मालूम होता था ।
बिल्ली दरवाजे पर आई । एक क्षण उसने भीतर देखा, चूहे को देख कर कंप गई । चूहा बैठा था । तलवार टुकड़े-टुकड़े पड़ोस में पड़ी थी । इसके पहले कि बिल्ली आगे बढ़े, चूहा आगे बढ़ा । बिल्ली ने बहुत चूहे देखे थे । लेकिन कोई चूहा बिल्ली को देख कर आगे बढ़ेगा! बिल्ली एकदम बाहर हो गई ।
तलवारबाज की हिम्मत बिलकुल टूट गई कि अब क्या होगा! सम्राट को खबर की गई कि आपके राजमहल की बिल्ली भेज दी जाए,अब कोई और उपाय नहीं है । सम्राट के पास जो बिल्ली थी, वह निश्चित ही देश की श्रेष्ठतम, कुशल बिल्ली थी । लेकिन वही हुआ जो होना था । सम्राट की बिल्ली ने चलते वक्त सम्राट से कहा, आपको शर्म आनी चाहिए, ऐसे छोटे-मोटे चूहों को मारने को मुझे भेजते हैं । मैं कोई साधारण बिल्ली नहीं हूं!
लेकिन यह भी उसने अपनी रक्षा के लिए कहा था । खबरें पहुंच गई थीं कि चूहा आगे बढ़ा, कि बिल्ली वापस लौट गई, कि तलवार टूट गई, कि योद्धा हार गया है, कि चूहे का आतंक पूरे गांव पर छाया हुआ है, चूहा साधारण नहीं है । लेकिन बचाव के लिए उसने राजा से कहा कि इस साधारण से चूहे के लिए मुझे भेजते हैं! सम्राट ने कहा, चूहा साधारण नहीं है । और आतंकित मैं भी हूं कि तू लौट तो न आएगी!
जो होना था, वही हुआ । बिल्ली गई । उसने जोर से झपट्टा मारा । लेकिन चूक गई । दीवार से उसका मुंह टकराया, लहूलुहान होकर वापस लौट गई । चूहा अपनी जगह था ।
गांव में एक फकीर के पास और एक बिल्ली थी । इस सम्राट की बिल्ली ने ही कहा कि अब और कुछ रास्ता नहीं है, सिर्फ उस फकीर के पास एक बिल्ली है जो हम सब की गुरु है और जिससे हमने कला सीखी है । शायद उसे कुछ पता हो । वह मास्टर कैट थी । उस बिल्ली को बुलाया गया । सारे गांव की बिल्लियां इकट्ठी हो गईं । कोई पांच सौ बिल्लियों ने भीड़ लगा ली मकान के आस-पास, क्योंकि यह चमत्कार का मामला था । और अगर फकीर की बिल्ली हारती है, तो फिर बिल्ली सदा के लिए चूहों से हार जाएगी ।
चूहा अपनी जगह बैठा था । फकीर की बिल्ली जब भीतर जाने लगी, तो सभी बिल्लियों ने सलाह दी कि देखो ऐसा करना, कि देखो ऐसा करना, कुछ ऐसा कर लेना! उस फकीर की बिल्ली ने कहा, नासमझों, अगर योजना बनाओगी चूहे को पकड़ने की, तो चूहे को कभी न पकड़ पाओगी । क्योंकि जिस बिल्ली ने योजना बनाई, वह हार गई । योजना बनाने का मतलब ही यह है कि चूहे से डर गए तुम । चूहा ही है न! पकड़ लेंगे । कोई पकड़ने में कला की जरूरत नहीं है, बिल्ली होना ही हमारी कला है । हम पकड़ लेंगे । योजना मैं नहीं बनाऊंगी ।
योद्धा ने भी कहा कि थोड़ा सोच लो, क्योंकि यह आखिरी मामला है । अगर तू भी लौट गई, तो मुझे घर छोड़ कर भाग जाना पड़ेगा । क्योंकि भीतर इस कमरे के मैं अब नहीं जा सकता हूं । वह चूहे को देखना भी ठीक नहीं है अब । वह वहीं बैठा है अपनी जगह पर । उस बिल्ली ने कहा, ये भी कोई बातें हैं! सब शांत रहें ।
वह बिल्ली भीतर गई और चूहे को पकड़ कर बाहर आ गई । बिल्लियों की भीड़ लग गई । उन सब ने पूछा कि चूहे को तुमने पकड़ा कैसे? क्या है तरकीब? उस बिल्ली ने कहा, मेरा बिल्ली होना काफी है । मैं बिल्ली हूं और यह चूहा है । और चूहे सदा से कोआपरेट करते रहे,सदा से सहयोग करते रहे । बिल्लियां सदा से पकड़ती रहीं । यह हम दोनों का स्वभाव है कि मैं बिल्ली हूं और यह चूहा है । यह पकड़ा जाएगा और मैं पकड़ लूंगी । तुमने योजना बनाई, इसी से भूल हो गई । तुम बुद्धि को बीच में लाए, इसी से परेशान हुए ।
झेन फकीर इस कहानी को सैकड़ों साल से कहते रहे हैं । यह बिल्ली गरीब फकीर की बिल्ली थी । सम्राट की बिल्ली के बराबर इसके पास शरीर भी न था, ताकत भी न थी । इसके हाथ में तलवार भी न थी । यह साधारण बिल्ली थी । पर उस बिल्ली ने कहा कि मेरा स्वभाव, यह चूहे का स्वभाव, इसमें कोई अनहोना नहीं हुआ है ।
जुजुत्सु या जूडो सिखाने वाले लोग कहते हैं कि प्रकृति का एक नियम और एक स्वभाव है । अगर कोई घूंसा आपकी तरफ मारा जाए,अगर आप प्रतिरोध करें, तो दोनों शक्तियां लड़ती हैं और दोनों शक्तियों में संघर्ष होता है । दोनों शक्तियां क्षीण होती हैं । अगर आप प्रतिरोध न करें, तो एक ही तरफ से शक्ति आती है, दूसरी तरफ खाली गड्ढा बन जाता है । शक्ति आत्मसात हो जाती है । दूसरा व्यक्ति परेशान हो जाता है । वह योजना करके हमला करता है । और आप अनायोजित, बिना किसी प्लानिंग के चुपचाप हमले को पी जाते हैं । अगर ऐसा शून्य भीतर बन जाए कि किसी हमले का कोई प्रतिरोध न हो--क्योंकि भीतर कोई प्रतिरोध करने वाला संकल्प ही न रहा--तो उस शून्य में जगत की महानतम शक्ति का आविर्भाव होता है ।
लाओत्से कहता है, संकल्प क्षीण हो । उसका अर्थ है कि संकल्प शून्य हो । भीतर शून्यवत हो जाओ; कुछ होने की कोशिश मत करो । उस बिल्ली ने कहा कि तुम सब बिल्लियां बिल्ली होने की कोशिश कर रही हो! बिल्ली होने की कोई कोशिश करनी पड़ती है? तुम बिल्ली हो । तुम्हारी कोशिश ही तुम्हें तकलीफ में डाल रही है । तुम हमला बनाने की योजना में पड़ी हो ।
जूडो का शिक्षक सिखाता है कि हमला मत करना, सिर्फ हमले की प्रतीक्षा करना । और जब हमला आए, तो तुम एक ही बात का ध्यान रखना कि तुम उसे आत्मसात कर जाओ ।
और अगर कोई गाली दे और आप गाली को आत्मसात कर जाएं, तो जिसने गाली दी है, वह कमजोर हो जाता है । करें और देखें! और जिसने गाली चुपचाप पी ली है--पी ली, दबाई नहीं--दबाना नहीं है, पी ली, जैसे कोई ने प्रेम का उपहार दिया, ऐसा पी ली है, आत्मसात कर ली, समा ली अपने में, absorb कर ली, गड्ढा बन गया । तो गाली देने में जितनी शक्ति उस व्यक्ति की व्यय हुई, उतनी शक्ति इस व्यक्ति को मिल गई ।
लाओत्से -- 'यदि योग्यता की पद-मर्यादा न बढ़े, तो न विग्रह हो, न संघर्ष ।' योग्यता को पद क्यों बनाएं हम? योग्यता को स्वभाव क्यों न मानें!
नेपोलियन की ऊंचाई छोटी थी, बहुत लंबा नहीं था । और अक्सर ऐसा हो जाता है कि बहुत छोटी ऊंचाई के लोग बड़े पदों पर पहुंचने की कोशिश करते हैं । अपनी लाइब्रेरी में एक दिन किताब निकाल रहा था, लेकिन अलमारी ऊंची थी । और हाथ उसका पहुंचता नहीं था । तो उसके साथ जो उसका पहरेदार था, वह तो कोई सात फीट ऊंचा आदमी था, उसने कहा -- महानुभाव, अगर कुछ अनुचित न हो और मैं आपके आगे बढ़ कर निकालने की आज्ञा पाऊं, तो मुझे आज्ञा दें । No one is higher than me in your army । नेपोलियन ने बहुत क्रोध से देखा और कहा कि not higher, but longer । तुमसे लंबा फौज में कोई भी नहीं है, ऊंचे तो बहुत हैं । ऊंचा तो मैं ही हूं ।
नेपोलियन को चोट लगनी स्वाभाविक है । कहे higher! इसमें भाषा ही की भर भूल नहीं थी, भूल भारी थी । नेपोलियन ने फौरन सुधार कर दिया कि कहो longer, कहो लंबा ।
ऊंचा और लंबे में क्या फर्क किया नेपोलियन ने? लंबा तो सिर्फ प्राकृतिक घटना है । ऊंचे के साथ पद-मर्यादा है । ऊंचे के साथ valuation है । लंबे के साथ कोई मूल्य नहीं है ।
एक स्कूल में एक पादरी बच्चों को बाइबिल का पाठ सिखा रहा है । और उनसे कह रहा है कि कल मैंने तुम्हें क्षमा के लिए सारी बातें समझाई थीं । अगर कोई तुम्हें मारे, तो तुम उसे क्षमा कर सकोगे? एक छोटे से लड़के को उसने खड़े करके पूछा कि तेरा क्या खयाल है? अगर कोई लड़का तुझे घूंसा मार दे, तो तू उसे क्षमा कर सकेगा? उस लड़के ने कहा, कर तो सकूंगा, अगर वह मुझसे बड़ा हो । छोटे को करना जरा मुश्किल पड़ जाएगा ।
असल में, हम सब की मनोदशा ऐसी ही है । जिसको हम दबा सकते हैं, हम दबा देते हैं । जिसको हम सता सकते हैं, उसे हम सता देते हैं । जिसको हम चोट पहुंचा सकते हैं, उसे हम चोट पहुंचा ही देते हैं । जिसे हम नहीं पहुंचा सकते, तब हम बड़े सिद्धांतों की बात कर लेते हैं ।
लाओत्से कह रहा है कि तुम्हारे भीतर वह बिंदु ही न रह जाए, जो छोटे-बड़े को सोचता है । इसके साथ, उसके साथ, सोचता है । इस स्थिति में क्या करूं, उस स्थिति में क्या करूं, सोचता है । वह बिंदु ही न रह जाए । तुम्हारे भीतर संकल्प ही न रह जाए ।
लाओत्से को अगर एक छोटा बच्चा भी चांटा मार दे, तो भी जवाब नहीं देगा । और एक सम्राट भी हमला बोल दे, तो भी जवाब नहीं देगा ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक गांव में ठहरा है, जहां की वह भाषा नहीं समझता। और लैटिन में उस गांव के पंडितों का समाज जुड़ता है और बातें करता है। मुल्ला भी रोज सुनने जाता है। लोग बड़े चिंतित हुए हैं कि वह समझता क्या खाक होगा! मगर वह नियमित सबसे पहला पहुंचने वाला और सबसे बाद में उठने वाला! आखिर लोगों की बेचैनी बढ़ गई और उन्होंने पूछा कि मुल्ला, तुम लैटिन समझते नहीं हो, एक शब्द तुम्हें आता नहीं, तुम ऐसी तल्लीनता से सुनते हो; क्या तुम समझ पाते होगे!
मुल्ला ने कहा -- और तो मैं कुछ नहीं समझता, लेकिन यह मैं समझ जाता हूं कि कौन आदमी कितने जोर से चिल्ला रहा है, वह जरूर असत्य बोल रहा होगा। कौन आदमी बोलने में क्रोध में आ रहा है, मैं समझ जाता हूं कि वह असत्य बोल रहा होगा। कौन आदमी शांति से बोल रहा है, कौन आदमी बोलने में आग्रहहीन है। अगर मैं भाषा समझता होता, तो मुझे यह समझना इतना आसान न पड़ता। मैं भाषा में उलझ जाता। मैं भाषा समझता ही नहीं हूं, तो मैं चेहरा, आंखें, और सब चीजें देखता हूं, भाषा को छोड़ कर। और मुझे बड़ा आनंद आ रहा है। यह मैं बिलकुल नहीं समझ पाता, क्या कहा जा रहा है, लेकिन यह मैं समझता हूं कि कहने वाला कहां से कह रहा है--जान कर कह रहा है, बिना जाने कह रहा है।
हम जो भी कहते हैं, हमारा gesture, हमारे कहने की emphasis, जोर, हमारा आग्रह, सब बताता है। और ध्यान रहे, जितना हम असत्य कहते हैं, उतने आग्रह से कहते हैं; जितना सत्य कहते हैं, उतना आग्रह-शून्य हो जाता है।
सत्य अपने आप में पर्याप्त है। मेरे आग्रह की कोई भी जरूरत नहीं है; मेरे बिना भी वह खड़ा हो सकता है।
रूस के एक थियेटर में एक दिन बड़ी मुश्किल हुई थी। बड़ा नाटक चल रहा था। और उस नाटक में एक हकलाने वाले आदमी का काम था। वह हकलाने वाला आदमी अचानक बीमार पड़ गया, जो हकलाने का अभिनय करता था। और ऐन वक्त पर खबर आई, और पर्दा उठने के करीब था। और मैनेजर और मालिक घबड़ाए, क्योंकि उसके बिना तो सारी बात ही खराब हो जाती। वही हास्य था उस पूरे नाटक में। उसी की वजह से रंग था। कोई उपाय नहीं था, और किसी आदमी को इतनी जल्दी हकलाने का अभ्यास करवाना भी मुश्किल था। लेकिन तभी किसी ने कहा कि हमारे गांव में एक हकलाने वाला आदमी है, हम उसे ले आते हैं। उसे सिखाने की कोई जरूरत नहीं है। आप उससे कुछ भी कहो, वह हकलाता ही है। और सब तरह के इलाज हो चुके हैं, बड़े चिकित्सक उसको देख चुके हैं। उसका कोई इलाज अब तक सफल नहीं हुआ है। वह धनपति का लड़का है।
उसे ले आया गया। और बड़ा चमत्कार हुआ, उस दिन वह नहीं हकला सका। पहली बार जिंदगी में, नाटक के मंच पर खड़ा होकर, वह युवक नहीं हकला सका। क्या हुआ? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर इतना सचेतन कोई हो जाए, तो कोई भी चीज खो जाती है। कोई भी चीज खो जाती है।
जो यात्रा चुनी, जो कर रहे हैं, उससे दुख और पीड़ा, अशांति बढ़ती है, तो निश्चित ही वह मार्ग मेरा नहीं है।
एक मेरे मित्र सारी दुनिया का चक्कर लगा कर लौटे। उन्होंने बहुत झीलें देखीं, बहुत प्रपात देखे। फिर वे मेरे गांव में आए। और मैंने उनसे कहा कि गांव के पास भी एक प्रपात है, वह मैं दिखाने ले चलूं। वे बोले, मैंने बहुत बड़े-बड़े प्रपात देखे हैं और अब इसको देखने से क्या होगा? मैंने कहा कि अगर उन प्रपातों का विचार आप छोड़ दें, तो यह प्रपात भी देखने में अदभुत है। अगर उन प्रपातों का विचार आप छोड़ दें और वे आपकी आंख में तैरते न रहें, तो आपको यह प्रपात भी दिखाई पड़ेगा, और यह बहुत अदभुत है।
वे मेरे साथ गए। दो घंटे हम उस प्रपात पर थे। लेकिन उन्होंने एक क्षण भी उस प्रपात को नहीं देखा। वे मुझे बताते रहे, अमरीका में कोई प्रपात कैसा है, स्विटजरलैंड में कोई प्रपात कैसा है। उन्होंने कहां-कहां प्रपात देखे, उनकी चर्चा करते रहे। दो घंटे के बाद जब हम वापस लौटे तो वे मुझसे बोले, बड़ा सुंदर प्रपात था।
मैंने कहा, आप यह बिलकुल झूठ कह रहे हैं, इस प्रपात को आपने देखा नहीं। यह प्रपात आपको दिखाई नहीं पड़ा और मुझे अनुभव हुआ कि मैं एक अंधे आदमी को लेकर आ गया हूं।
वे बोले, मतलब?
मैंने कहा कि आप इतने उन प्रपातों के विचार से भरे थे, आपकी आंखें इतनी बोझिल थीं, आपका चित्त इतना कंपित था, आपके भीतर इतनी स्मृतियां घूम रही थीं कि उन सबके पार इस प्रपात को देखना असंभव था। इस प्रपात को देखने की जरूरत अगर अनुभव होती तो उन सारी स्मृतियों को, उन सारे विचारों को, उन सारे खयालों को छोड़ देने की जरूरत थी। जब वे छूट जाते तो वह स्थान मिलता खाली और स्वच्छ, जहां से इसके दर्शन हो सकते थे।
केवल वे ही लोग जगत में दर्शन को उपलब्ध होते हैं जो निर्विचार देखना सीख जाते हैं।
मैं एक गांव गया था। एक साधु मेरे मित्र थे। वे वहां संन्यास की तैयारी में लगे थे। मैं जब उनके झोपड़े के पास गया, मैंने देखा, वे अंदर नंगे टहल रहे हैं। खिड़की में से दिखाई पड़ा। फिर मैं द्वार पर गया। मैंने द्वार पर दस्तक दी। जब उन्होंने द्वार खोला, तो वे कपड़ा लपेटे हुए हैं। मैंने उनसे पूछा, अभी खिड़की से मैंने देखा था तो आप नग्न थे। अब आप कपड़ा क्यों लपेटे हुए हैं?
वे बोले, मैं नग्न रहने का अभ्यास कर रहा हूं। आज नहीं कल मुझे नग्न साधु हो जाना है। तो उसका मैं अभ्यास कर रहा हूं। अकेले में अभ्यास करूंगा पहले। फिर कुछ मित्रों के बीच। फिर थोड़ा बाहर निकलूंगा घर के। फिर गांव में। फिर शहर में। इस भांति धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाऊंगा।
मैंने उनसे कहा, आप किसी सर्कस में भर्ती हो जाइए। आपको संन्यास लेने की कोई जरूरत नहीं। आप किसी सर्कस में भर्ती हो जाइए।
यह इसलिए आपसे कहता हूं कि अभ्यास से आई हुई नग्नता वह नग्नता नहीं है, जो महावीर को आई होगी। वह नग्नता अभ्यास से नहीं, इनोसेंस से आई। वह नग्नता प्रैक्टिस नहीं की गई थी। चित्त इतना सरल हो गया, इतना निर्दोष हो गया कि वस्त्र अनावश्यक हो गए, छूट गए। वे वस्त्र छोड़े नहीं गए, वे वस्त्र छूट गए। ऐसे जो नग्नता आ जाए, वह तो अर्थपूर्ण है।
शत्रु-मित्र
कथा :
एक यहूदी हसीद, उसने एक किताब लिखी है । हसीद क्रांतिकारी फकीर हैं । और यहूदी पुरोहित वर्ग उनके विपरीत है, जैसा कि सदा होता है । इस हसीद ने एक किताब लिखी और अपने प्रधान यहूदी पुरोहित के पास भेजी । जिसके हाथ भेजी, उससे कहा कि तू देखना, वह क्या व्यवहार करते हैं! कुछ बोलना मत, तुझे कुछ करना नहीं है; सिर्फ देखना, साक्षी रहना ।
उसने जाकर किताब दी । तो जो बड़ा पुरोहित था, वह और उसकी पत्नी दोनों बैठे थे सांझ अपने बगीचे में । उसने किताब दी और उसने कहा कि फलां-फलां हसीद फकीर ने यह किताब भेजी है । उसने मुश्किल से हाथ में ले पाया था, जैसे ही सुना कि हसीद ने भेजी है, उसने जोर से किताब फेंक दी सड़क की तरफ और कहा, ऐसी अपवित्र किताब को मैं हाथ भी न लगाना चाहूंगा ।
उसकी पत्नी ने कहा, लेकिन इतने कठोर होने की जरूरत क्या है? घर में इतनी किताबें हैं, इसको भी रख दिया होता! और फेंकना भी था तो इस आदमी के चले जाने पर फेंक सकते थे । ऐसा असंस्कृत व्यवहार करने की जरूरत क्या है? रख देते, किताबें इतनी रखी हैं, एक किताब और रख जाती । और फेंकना ही था, तो पीछे कभी भी फेंक देते । इतनी जल्दी क्या थी!
यह उस आदमी ने खड़े होकर सुना । उसके मन में खयाल आया कि पत्नी भली है । लौट कर उसने अपने गुरु को कहा कि पुरोहित तो बहुत दुष्ट आदमी मालूम होता है । उसको तो कभी आप अपने में उत्सुक कर पाएंगे, इसकी कोई आशा नहीं है । लेकिन उसकी पत्नी कभी आप में उत्सुक हो सकती है ।
उस फकीर ने कहा, पहले पूरी कथा तो कहो; तुम व्याख्या मत करो । हुआ क्या?
उसने कहा, हुआ इतना ही कि पुरोहित ने तो किताब लेकर ऐसे फेंक दी, जैसे जहर हो । और कहा कि फेंको इसे, यहां मैं हाथ भी नहीं लगाऊंगा । इतनी अपवित्र को मैं छू भी नहीं सकता । और उसकी पत्नी ने कहा कि ऐसी जल्दी क्या थी? रख देते, घर में बहुत किताबें थीं, पड़ी रहती । और फेंकना था तो पीछे फेंक देते । इतना अशिष्ट होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
हसीद कहने लगा कि कभी पुरोहित से तो हमारा संबंध भी बन जाए, उसकी पत्नी से कभी न बन सकेगा । उस फकीर ने कहा, पुरोहित से हमारा कभी संबंध बन ही जाएगा । जो इतनी घृणा से भरा है, वह कितनी देर इतनी घृणा से भरा रहेगा? आखिर प्रेम प्रतीक्षा करता होगा, वह लौट आएगा । लेकिन जो इतनी उपेक्षा की बात कह रही है कि रख देते, पड़ी रहती, indifferent, पीछे फेंक देते, कोई हर्जा न था, शिष्टाचार का तो खयाल रखो, उस स्त्री का हमारे प्रति कोई भी भाव नहीं है; न घृणा का, न प्रेम का । उससे हमारा संबंध बहुत मुश्किल है । लेकिन पुरोहित से हमारा संबंध बन ही जाएगा । तुम देखोगे कि पुरोहित अब तक किताब उठा कर पढ़ रहा होगा । तुम जाओ वापस ।
उसने कहा, क्या बात करते हैं! वह पढ़ेगा कभी?
तुम वापस जाओ, तुम व्याख्या मत करो । तुम जाकर फिर देखो ।
लौट कर उसने देखा, द्वार बंद हैं । खिड़की से झांका, पुरोहित वह किताब लेकर पढ़ रहा है ।
जीवन ऐसा है! उसमें जो गाली दे जाता है, वह प्रेम करने की क्षमता जुटा कर ले जाता है । उसमें जो प्रेम प्रकट कर जाता है, वह गाली देने की क्षमता जुटा कर ले जाता है । विपरीत संयुक्त है । जो आदर करता है, वह अनादर करने की क्षमता इकट्ठी करने लगता है । जो अनादर करता है, वह क्षमा मांगने के लिए उत्सुकता इकट्ठी करने लगता है । अगर कोई जीवन को ऐसा देख पाए, तब न मित्र मित्र, न शत्रु शत्रु! तब चीजें एक विराट पैटर्न में, एक विराट ढांचे में दिखाई पड़ने लगती हैं, एक gestalt में दिखाई पड़ने लगती हैं ।
दो उपाय हैं । धूप पड़ रही है बाहर । तो एक रास्ता तो यह है कि मैं छाता लगा कर जाऊं । तब मैं धूप को दुश्मन मान कर रोक रहा हूं । और एक रास्ता यह है कि मैं शरीर को ऐसा बलिष्ठ करके जाऊं कि धूप मुझे पीड़ा न दे पाए । लाओत्से कहेगा कि उचित है कि शरीर को बलिष्ठ करके जाओ; और तब धूप तुम्हें मित्र मालूम पड़ेगी । क्योंकि न इतनी धूप पड़ती, न तुम इतना शरीर को बलिष्ठ करके जाते । शरीर को ऐसा बलिष्ठ करके जाओ कि धूप शत्रु मालूम न पड़े । धूप तो कमजोर शरीर को शत्रु मालूम पड़ रही है ।
यह जो हमारा, हम जिस ढंग से सोचते हैं, उस पर निर्भर करता है कि हम कोई सहयोग का मार्ग खोजें । जीवन और हमारे बीच सहयोग स्थापित हो ।
पश्चिम के सोचने के ढंग का अर्थ होता है तर्क, पूरब के सोचने के ढंग का अर्थ होता है अनुभूति ।
एक बहुत अदभुत आदमी हुआ है, इकहार्ट। उसने मजाक में एक दिन परमात्मा से सुबह प्रार्थना की है। लेकिन उसकी प्रार्थना कीमती है और मन में रख लेने जैसी है। इकहार्ट ने एक दिन सुबह प्रार्थना की परमात्मा से कि हे प्रभु, मेरे दुश्मनों से तो मैं निपट लूंगा, मेरे मित्रों से तू निपट ले; उनसे मैं बिलकुल नहीं निपट पाता।
इकहार्ट का शिष्य साथ में था। उसने यह प्रार्थना सुनी। वह बड़ा हैरान हुआ। हैरान इसलिए हुआ कि सवाल तो दुश्मनों से ही होता है निपटने का; मित्रों से तो कोई सवाल नहीं होता! और यह इकहार्ट क्या पागलपन की बात कह रहा है। कहीं गलती तो नहीं हो गई शब्दों की जमावट में! इकहार्ट जैसे ही प्रार्थना के बाहर हुआ, मित्र ने हाथ पकड़ा और कहा कि मालूम होता है, तुम कुछ भूल कर गए। यह तुमने क्या कहा! मित्रों से निपटने की कोई जरूरत ही नहीं है। और तुमने परमात्मा से कहा कि शत्रुओं से तो मैं निपट लूंगा, मेरे मित्रों से तू निपट ले।
इकहार्ट ने कहा कि मैं तुझसे कहता हूं कि जिन-जिन को हमने मित्र समझा है, वे ही हमारे शत्रु हैं, और उनसे निपटना बड़ा मुश्किल है। और उनमें सबसे बड़ा मित्र है मैं, ईगो। यह बहुत मित्र मालूम पड़ता है। हम इसी को तो जिंदगीभर बचाते हैं। यही है जहर, क्योंकि यही 'मैं' शरण न जाने देगा; यही 'मैं' सिर न झुकाने देगा; यही 'मैं' छोड़ने न देगा आपको कि आप let go में पड़ जाएं। कह दें कि ठीक।
कभी देखें। कभी देखें, जमीन पर ही लेट जाएं। किसी मंदिर में जाने की उतनी जरूरत नहीं है। जमीन पर ही लेट जाएं चारों हाथ-पैर छोड़कर, और कह दें परमात्मा से कि अब घंटेभर तू ही है, मैं नहीं। और पड़े रहें घंटेभर। अपनी तरफ से कोई बाधा न दें। सिर्फ पड़े रहें, जैसे कि मुर्दा पड़ा हो या कोई छोटा बच्चा अपनी मां की गोद में सिर रखकर सो गया हो। करते रहें, करते रहें। एक पंद्रह-बीस दिन के भीतर आपको शरण का क्या अर्थ है, वह पता चलेगा। यह शब्द नहीं है, यह अनुभव है।
बूंद सागर में गिर जाती है और एक हो जाती है।
पश्चिम में एक बहुत अनूठी किताब कुछ वर्षों पहले प्रकाशित हुई, उस किताब का नाम है : the intimate enemy । वह पति-पत्नी के संबंधों के संबंध में किताब है । लेकिन यह तो सूझ इसको अभी-अभी आई। उर्दू में शब्द है, हिंदी में भी उपयोग होता है : खसम। खसम का मतलब होता है, पति। और खसम का मतलब शत्रु भी होता है। मूल अरबी में तो शत्रु होता है। कैसे शत्रु से पति हो गया, बड़े आश्चर्य की बात है। कोई जोड़ नहीं दिखाई पड़ता। मूल शत्रु है, फिर पति कैसे हो गया? जरूर लोग पकड़ गए होंगे बात। सूत्र समझ में आ गया होगा, खयाल में आ गया होगा कि जिससे प्रेम है, उससे दुश्मनी भी है।
प्रेम
कथा :
जीसस एक गांव से गुजर रहे हैं । और एक वृक्ष के तले विश्राम किया है । वह वृक्ष उस जमाने की बड़ी वेश्या मेग्दालीन का वृक्ष है, उसका बगीचा है । उसने अपनी खिड़की से झांक कर जीसस को देखा, जब वह जाने के करीब थे विश्राम करके । उसने बहुत लोग देखे थे, इतना सुंदर व्यक्ति नहीं देखा था । एक सौंदर्य है जो शरीर का है, और जो थोड़े ही परिचय से विलीन हो जाता है । और एक सौंदर्य है जो आत्मा का है, जो परिचय की गहराई से गहन होता जाता है । एक सौंदर्य है जो आकृति का है । और एक सौंदर्य है जो अस्तित्व का है । उसने बहुत सुंदर लोग देखे थे । मेग्दालीन सुंदरतम स्त्रियों में एक थी । सम्राट उसके द्वार पर दस्तक देते थे । सम्राटों को भी सदा द्वार खुला हुआ नहीं मिलता था । जीसस को देख वह मोहित हो गई । वह निकली अपने भवन के बाहर, जाते हुए युवक को रोका और जीसस से कहा, भीतर आएं, मेहमान बनें मेरे ।
जीसस ने कहा, अब तो मेरा विश्राम पूरा हो चुका । कभी फिर तुम्हारे राह पर थक जाऊंगा, तो अब वृक्ष के नीचे विश्राम न करके भीतर आ जाऊंगा । पर अब तो मेरे जाने का समय हुआ ।
मेग्दालीन के लिए यह भारी अपमान था । वह सोच भी नहीं सकती थी कि एक भिखारी जैसा युवक हतप्रभ न हो जाएगा उसे देख कर! बड़े सम्राट उसे देख कर होश खो देते थे । और जीसस ने अपना झोला उठा लिया, वे चलने को तत्पर हो गए । मेग्दालीन ने कहा, युवक, यह अपमानजनक है! यह पहला मौका है कि मैंने किसी को निमंत्रण दिया है । क्या तुम इतना भी प्रेम मेरे प्रति प्रकट न करोगे कि दो क्षण मेरे घर में रुक जाओ?
जीसस ने कहा, जो तुम्हारे पास प्रेम प्रकट करने आते हैं, फिर से सोचना, उन्होंने तुम्हें कभी प्रेम किया है? जिन्होंने प्रकट किया है, उन्होंने कभी प्रेम किया है? मैं ही हूं अकेला जो प्रेम कर सकता हूं । लेकिन अभी तो मेरे जाने का समय हुआ ।
केवल वही बोले, जिसने मौन के तल छू लिए हों, बाकी चुप रहें।
मेरे एक प्रोफेसर थे। उनका मुझसे बड़ा लगाव था। लेकिन वे मुझे घर बुलाने में डरते थे, क्योंकि शराब पीने की उन्हें आदत थी। और कहीं ऐसा न हो कि मुझे पता चल जाए। कहीं ऐसा न हो कि मेरे मन में उनकी जो प्रतिष्ठा है, वह गिर जाए। वे इससे बड़े भयभीत थे, बड़े डरे हुए थे। बहुत भले आदमी थे।
पर एक बार ऐसा हुआ कि मैं बीमार पड़ा और उन्हें मुझे हास्टल से घर ले जाना पड़ा। तो कोई दो महीने मैं उनके घर पर था। बड़ी मुश्किल हो गई। वे पीए कैसे? पांच-दस दिन के बाद तो भारी होने लगा मामला। मैंने उनसे पूछा कि आप कुछ परेशान हैं, मुझे कह ही दें-अगर आप ज्यादा परेशान हैं, या कोई अड़चन है मेरे होने से यहां, तो मैं चला जाऊं वापस। उन्होंने कहा कि नहीं। पर मैं अपनी परेशानी कहे देता हूं कि मुझे पीने की आदत है। तो मैंने कहा, यह भी कोई बात हुई! आप पी लेते,लुक-छिपकर पी लेते, इतना बड़ा बंगला है। उन्होंने कहा, यही तो मुश्किल है, कि जब भी कोई पीता है-असली पीने वाला-अकेले में नहीं पी सकता। चार-दस मित्रों को न बुलाऊं तो पी नहीं सकता। अकेले में भी क्या पीना! उन्होंने कहा, पीना कोई दुख थोड़े ही है, पीना एक उत्सव है।
वह बात मुझे याद रह गई। जब जीवन की साधारण मदिरा को भी लोग बांटकर पीते हैं, तो जब तुम्हारी प्याली में परमात्मा भर जाए, और तुम न बांटो! जब शराबी भी इतना जानते हैं कि अकेले पीने में कोई मजा नहीं, जब तक चार संगी-साथी न हों तो पीना क्या! जब शराबी भी इतने होशपूर्ण हैं कि चार को बांटकर पीते हैं, तो होश वालों का क्या कहना!
महावीर -- जो चल पड़ा वह पहुंच ही गया।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने एक मित्र के साथ बैठा था। और उसने अपने बेटे को कहा कि जा और तलघरे से शराब की बोतल ले आ। वह बेटा गया, वह वापस लौटकर आया। उस बेटे को थोड़ा कम दिखाई पड़ता है। और उसकी आंखों में एक तरह की बीमारी है कि एक चीज दो दिखाई पड़ती है। उसने लौटकर कहा कि दोनों बोतल ले आऊं या एक लाऊं?
नसरुद्दीन थोड़ा परेशान हुआ, क्योंकि बोतल तो एक ही है। अब अगर मेहमान के सामने कहे एक ही ले आओ, तो मेहमान कहेगा यह भी क्या कंजूसी! अगर कहे दो ही ले आओ, तो यह दो लाएगा कहां से? वहा एक ही है। और मेहमान के सामने अगर यह कहे कि इस बेटे को एक चीज दो दिखाई पड़ती है तो नाहक की बदनामी होगी। फिर इसकी शादी भी करनी है। तो उसने कहा, ऐसा कर, एक तू ले आ और एक को फोड़ आ-बाएं तरफ की फोड़ देना, दाएं तरफ की ले आना, क्योंकि बाएं तरफ की बेकार है। ऐसा उसने रास्ता निकाला।
बेटा गया। उसने बाएं तरफ की फोड़ दी, लेकिन दाएं तरफ कुछ था थोड़े ही!। एक ही बोतल थी, वह फूट गई। बाएं तरफ और दाएं तरफ ऐसी कोई दो बोतलें थोड़े ही थीं। बोतल एक ही थी। दो दिखाई पड़ती थीं। वह बोतल फूट गई, शराब बह गई,वह बड़ा परेशान हुआ। उसने लौटकर कहा कि बड़ी भूल हो गई, वह बोतल एक ही थी, वह तो फूट गई।
मैं तुमसे कहता हूं जहां तुम्हें दो दिखाई पड़ रहे हैं, वहां एक ही है। तुम्हें दो दिखाई पड़ रहे हैं, क्योंकि तुमने अभी एक को देखने की कला नहीं सीखी।
भीतर जाओ, अपने को जानो। आत्म-ज्ञान से ही तुम्हें पता चलेगा मैं और तू झूठी बोतलें थे, जो दिखाई पड़ रहे थे। नजर साफ न थी, अंधेरा था, धुंधलका था, बीमारी थी-एक के दो दिखाई पड़ रहे थे। भ्रम था। भीतर उतरकर तुम पाओगे, जिसको तुमने अब तक दूसरा जाना था वह भी तुम्हीं हो। दूसरे को जब तुम छूते हो, तब तुम अपने ही कान को जरा हाथ घुमाकर छूते हो, बस। वह तुम्हीं हो। जरा चक्कर लगाकर छूते हो। जिस दिन यह दिखाई पड़ेगा, उस दिन प्रेम। उसके पहले जिसे तुम प्रेम कहते हो, कृपा करके उसे प्रेम मत कहो।
जो अस्तित्व को प्रेम करता है, वह अंधकार में भी परमात्मा को पाएगा और प्रकाश में भी परमात्मा को पाएगा।
रामानुज एक गांव में ठहरे थे। एक आदमी उनके पास आया और उसने कहा कि मैं परमात्मा को पाना चाहता हूं। मैं क्या साधना करूं? रामानुज ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा। शायद वे पहचान गए। और उन्होंने कहा कि इसके पहले कि मैं तुझे कुछ बताऊं, तुझसे मैं पूछता हूं--तूने कभी किसी को प्रेम किया? वह आदमी बोला, आप भी कहां की बातें पूछते हैं! कहां की फिजूल बातें! छोड़िए। मैं ईश्वर को पाना चाहता हूं, प्रेम-व्रेम से क्या लेना-देना? मैंने कभी किसी को प्रेम नहीं किया। उसने समझा होगा कि अगर मैं कहूं मैंने प्रेम किया, तो यह एक disqualification, एक अयोग्यता होगी, धर्म की दुनिया में। वहां प्रेम-व्रेम करने वालों की कहां सुविधा है! वहां तो रूखे-सूखे लोग चाहिए, पत्थर की तरह, जिनके जीवन में कभी प्रेम का अंकुर न खिला हो, वही लोग वहां जा सकते हैं।
उस आदमी ने कहा कि नहीं नहीं, प्रेम वगैरह से मेरा कोई संबंध-नाता नहीं रहा। आप तो मुझे प्रभु का रास्ता बताइए! रामानुज ने कहा, मैं फिर पूछता हूं एक बार। कभी भी किसी को भी प्रेम किया हो? उस आदमी ने कहा, नहीं, सच मानिए, मैंने कभी किसी को प्रेम नहीं किया है। मुझे प्रभु का रास्ता बताइए। रामानुज ने कहा, मैं तीसरी बार पूछता हूं तुझसे, न किया हो प्रेम, कभी किसी के प्रति सिर्फ अनुभव किया हो भाव में? उसने कहा कि नहीं। मैं तो ईश्वर को खोजना चाहता हूं।
रामानुज उदास हो गए और उन्होंने कहा, फिर तू कहीं और जा। अगर तूने किसी को भी प्रेम किया होता, तो उसी प्रेम को और बड़ा बनाया जा सकता था, और विराट किया जा सकता था, अनंत किया जा सकता था, कि वह प्रार्थना बन जाए, वह प्रभु की यात्रा बन जाए। लेकिन तू कहता है, प्रेम तूने किया ही नहीं। तो तेरे पास बीज ही नहीं है, वृक्ष कैसे बन सकता है? मुझे क्षमा कर, तू कहीं और जा। मैं असमर्थ हूं। फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता है।
सत्संग वहां है जहां जले दीयों के पास बुझे दीये सरकते-सरकते एक दिन जल उठते हैं।
अरे मुल्ला, आज तुम इतने गुमसुम क्यों बैठे हो? चंदूलाल ने मुल्ला नसरुद्दीन से पूछा।
मेरी प्रेमिका ने शीघ्र ही शादी करने को कहा है, नसरुद्दीन ने उदास स्वर में कहा।
चंदूलाल बोला अरे, तो इसमें चिंता और उदासी कि क्या बात है?
अरे जनाब, चिंता की ही तो बात है, मुल्ला नसरुद्दीन बोला, अगर मैंने शादी कर ली तो फिर मैं प्रेम किस से करूंगा?
बहुत सोचा विचारा, कमाया क्या? बहुत दौड़े-धापे, पहुंचे कहां? अब थोड़े निश्चित होकर बैठ जाओ - किसी उत्तर की तलाश में नहीं!
तल
कथा :
सोरेन कीर्कगार्ड ने किताबें लिखीं । उसकी जिंदगी में किसी को पता न चल सका । एक किताब मुश्किल से छाप पाया, तो पांच कापी बिकीं । वह भी अपने मित्रों ने खरीदीं । बाप जो पैसा छोड़ गया था, बैंक में जमा था, उसी से अपना जिंदगी भर खर्च चलाया । क्योंकि वह तो चौबीस घंटे सोचने, खोजने में लगा था । कमाने की फुर्सत न थी । बाप जो छोड़ गया था बैंक में, हर एक तारीख को उसमें से कुछ पैसा निकाल लाना है, महीना गुजार कर फिर पहुंच जाना है । जिस दिन आखिरी पैसा चुका, बैंक गया, और बैंक में पता चला कि पैसा तो पूरा समाप्त हो गया । बैंक के बाहर ही उसकी सांस टूट गई, सोरेन कीर्कगार्ड की । उसने कहा, अब तो कोई जीने की कोई बात ही न रही! जिस दिन पैसा खाते में चुक गया, उस दिन दरवाजे पर गिर कर मर गया । क्योंकि एक पैसा आने का तो कहीं से कोई उपाय न था । कोई सवाल ही न था । सौ साल किसी ने याद भी न किया सोरेन कीर्कगार्ड को । उसकी किताबों का, उसके नाम का किसी को पता न था । इधर पिछले तीस-चालीस वर्ष में पुनराविष्कृत हुआ । और आज पश्चिम में जिस आदमी का सर्वाधिक प्रभाव समझा जाए, वह सोरेन कीर्कगार्ड है । और अब लोग कहते हैं कि अभी सैकड़ों वर्ष लगेंगे सोरेन कीर्कगार्ड को ठीक से समझने के लिए । लेकिन उसके गांव के लोग हंसे । लोगों ने मजाक उड़ाई कि पागल हो, अरे कुछ कमाओ! चार पैसे कमा लो!
विनसेंट वानगॉग ने जो चित्र बनाए, आज एक-एक चित्र की कीमत तीन लाख, चार लाख, पांच लाख रुपए है । एक-एक चित्र की! और विनसेंट वानगॉग एक चित्र न बेच सका । किसी दूकान से दो कप चाय के लिए थे, तो उसको एक पेंटिंग दे आया कि पैसे तो नहीं हैं । कहीं से एक सिगरेट का पैकेट लिया था, उसको एक पेंटिंग दे आया कि पैसे तो नहीं हैं । मरने के साठ साल बाद जब उसका पता चलना शुरू हुआ, वानगॉग का, तो लोगों ने अपने कबाड़खानों में खोज कर उसके चित्र निकाल लिए । किसी होटल में पड़ा था, किसी दूकान में पड़ा था, किसी से रोटी ली थी उसने और एक चित्र दे गया था । जिनके पास पड़े मिल गए, वे लखपति हो गए । क्योंकि एक-एक चित्र की कीमत पांच-पांच लाख रुपया हो गई । आज केवल दो सौ चित्र हैं उसके । लोग छाती पीट-पीट कर रोए, क्योंकि वह तो कई को दे गया था । वह कोई फेंक चुका था, कोई कुछ कर चुका था । किसी को पता नहीं था, क्या हुआ । और विनसेंट वानगॉग मनुष्य-जाति के इतिहास में पैदा हुए चित्रकारों में चरम कोटि का चित्रकार है अब । लेकिन अपने वक्त में, अभी सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले, सप्ताह में पूरे सात दिन रोटी नहीं खा सका । क्योंकि उसका भाई उसे जितना पैसा देता, वह इतना होता कि वह सात दिन सिर्फ रोटी खा सके । तो वह चार दिन रोटी खा लेता और तीन दिन के पैसे बचा कर रंग खरीद कर चित्र बना लेता । बत्तीस साल की उम्र में जब बिलकुल मरणासन्न हो गया, क्योंकि चार दिन खाना खाना और तीन दिन चित्र बनाना, यह कैसे चलता, तो गोली मार कर मर गया । और लिख गया यह कि अब कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मैं भाई को व्यर्थ तकलीफ दूं! उसको आखिर रोटी के लिए पैसे तो देने ही पड़ते हैं । और मुझे जो बनाना था, वह मैंने बना लिया । एक चित्र, जिसके लिए मैं साल भर से रुका था, वह आज पूरा हो गया ।
अब ये जो लोग हैं, ये किसी और तल पर जीते हैं । उस तल पर जब मनुष्य-जाति कभी पहुंचती है, तब उनका आविष्कार होता है ।
अंध-विशवास
कथा :
एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्न हो गया । और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया । बंजारा बड़ा प्रसन्न था गधे के साथ, अब उसे पैदल यात्रा न करनी पड़ती । सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता । और गधा बड़ा स्वामिभक्त था ।
लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पड़ा और मर गया । दुख में उसने उसकी कब्र बनायी, और उस कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा ।
उस राहगीर ने सोचा कि जरूर किसी महान आत्मा की मृत्यु हो गयी । तो वह भी झुका कब्र के पास । इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे, उसने कुछ रुपये कब्र पर चढ़ाये । बंजारे को हंसी भी आयी । लेकिन तब उस भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी ठीक मालूम न पड़ा । और फिर उसे यह भी समझ में आया कि यह तो बड़ा उपयोगी व्यवसाय हो गया ।
फिर वह उसी कब्र के पास बैठकर रोता, यही उसका धंधा हो गया । लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि किसी महान आत्मा की मृत्यु हो गयी; और गधे की कब्र किसी पहुंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी । ऐसे वर्ष बीते, वह बंजारा बहुत धनी हो गया ।
फिर एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा । उसे भी लोगों ने कहा, एक महान आत्मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना । वह गया । देखा वहां उसने इस बंजारे को बैठा, तो उसने कहा, अरे! किसकी कब्र है यह? और तू यहां बैठा क्यों रो रहा है? उस बंजारे ने कहा, अब आप से क्या छिपाना, जो गधा आपने दिया था, उसी की कब्र है । जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया, मरकर और भी ज्यादा साथ दे रहा है । सुनते ही फकीर खिलखिलाकर हंसने लगा । उस बंजारे ने पूछा, आप हंसे क्यों? फकीर ने कहा, तुझे पता है, जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहुंचे हुए महात्मा की कब्र है । उसी से तो मेरा काम चलता है । वह किस महात्मा की कब्र है, तुझे मालूम? उसने कहा मुझे कैसे मालूम, आप बतायें । उसने कहा, वह इसी गधे की मां की कब्र है ।
धर्म के नाम पर अंधविश्वासों का बड़ा विस्तार है ।
एक वैज्ञानिक समझा रहा था एक सभा में कि आदमी हो कर अंधविश्वासों से मुक्त हो जाओ। जानवर भी अंधविश्वास नहीं करते तो तुम तो आदमी हो। एक बूढ़ी स्त्री खड़ी हो गई और उसने कहा कि 'माफ करिए। अगर चूहे के रास्ते को बिल्ली काट जाए, तो चूहा वापस लौट जाता है कि नहीं?' वह बूढ़ी औरत समझ रही है कि चूहा भी अंधविश्वास के कारण वापिस लौट जाता है, कि रास्ता...।
चूहे का भय तो वास्तविक है, लेकिन आदमी होकर तुम क्यों लौट जाते हो? पर डर है। शायद चूहे से ही सीखा होगा लोगों ने, बिल्ली से डरना।
तुम्हें पता ही नहीं कि तुम क्या मांग रहे हो। तुम कह रहे हो, 'मुझे बचाओ।' तुम्हीं रोग हो। तुम्हीं, तुम्हारे कारागृह हो। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं है। तुम्हीं बाधा हो। और तुम प्रार्थना कर रहे हो कि मुझे बचाओ!
एक अंधेरी रात में किसी सुनसान सड़क पर दो आदमी मिले।
पहला आदमी : 'मैं एक दूकान की खोज में हूं जिसे लोग दीये की दूकान कहते हैं।'
दूसरा आदमी : 'मैं यहां पास ही रहता हूं और तुम्हें उसका रास्ता बता सकता हूं।'
पहला आदमी : 'मैं खुद खोज लूंगा। मुझे रास्ता बता दिया गया है और उसे मैंने लिख भी लिया है।'
दूसरा आदमी : 'फिर तुम इस संबंध में बात ही क्यों करते हो?'
पहला आदमी : 'सिर्फ बात करने के लिये।'
दूसरा आदमी : 'लेकिन अच्छा रहेगा, किसी स्थानीय व्यक्ति से जानकारी ले लो।'
पहला आदमी : 'जो मुझे बताया गया है उस पर मुझे भरोसा है; वही मुझे यहां तक लाया भी है। मैं किसी और आदमी या चीज का भरोसा नहीं कर सकता।'
दूसरा आदमी : 'यद्यपि तुमने पहले मार्गदर्शक का भरोसा किया, तो भी यह नहीं सीखा कि कैसे और किस पर भरोसा किया जाये।'
पहला आदमी : 'ऐसा ही है।'
दूसरा आदमी : 'दीये की दूकान किसलिए खोज रहे हो?'
पहला आदमी : 'बड़े सूत्र से मुझे बताया गया है कि वहां वे वह उपाय बताते हैं, जिससे कोई अंधेरे में भी पढ़ सके।'
दूसरा आदमी : 'ठीक है। लेकिन उसकी एक पूर्वशर्त है, और एक सूचना भी। दीये से पढ़ने की पूर्वशर्त यह है कि तुम्हें पहले पढ़ना आता हो। और सूचना यह है कि दीये की दूकान तो वहीं है, लेकिन दीये वहां से अन्यत्र हटा दिये गये हैं।'
पहला आदमी : 'दीया क्या है यह मैं नहीं जानता। लेकिन इतना तो साफ है कि दीये की दूकान वह है जहां वैसी तरकीब का पता मिलता हो।'
दूसरा आदमी : 'लेकिन दीये की दूकान के दो भिन्न अर्थ भी हो सकते हैं। एक: वह जगह जहां दीये मिलते हों, और दूसरा: वह जगह जहां दीये कभी मिलते थे।'
पहला आदमी : 'तुम यह बात सिद्ध नहीं कर सकते।'
दूसरा आदमी : 'अनेक लोग तुम्हें बेवकूफ समझेंगे।'
पहला आदमी : 'अनेक लोग तुम्हें ही बेवकूफ समझेंगे, या शायद तुम्हारा इरादा कुछ और है। तुम मुझे वहां भेजना चाहते हो जहां तुम्हारे दोस्त दीये बेचते हों, या तुम चाहते हो कि मुझे दीया ही नहीं उपलब्ध हो।'
दूसरा आदमी : 'मैं उससे भी बुरा हूं। तुम्हें दीये की दूकानों का वचन देने और वहां तुम्हारी समस्याओं के हल पाने का भरोसा कराने के बजाय मैं पहले यह जानना चाहूंगा कि तुम पढ़ भी सकते हो कि तुम वैसी दूकान के करीब हो? या कि तुम्हारे लिए और ढंग से दीया प्राप्त किया जाये।'
दोनों आदमियों ने एक क्षण के लिये एक दूसरे को उदास आंखों से देखा और फिर वे अपनी-अपनी राह चले गये।
स्वतंत्रता का अर्थ है, अकेले होने की हिम्मत।
चीन में हजारों साल तक स्त्रियों के पैर में लोहे का जूता पहनाया जाता था, कि पैर छोटा रहे। छोटा पैर सौंदर्य का चिह्न था। जितना छोटा पैर हो, उतने बड़े घर की लड़की थी। तो स्त्रियां चल ही नहीं सकती थीं, पैर इतने छोटे रह जाते थे। शरीर तो बड़े हो जाते, पैर छोटे रह जाते। वे चल ही न पातीं। जो स्त्री बिलकुल न चल पाती, वह उतने शाही खानदान की स्त्री! क्योंकि गरीब की स्त्री तो अफोर्ड नहीं कर सकती थी, उसको तो पैर बड़े ही रखना पड़ता था, उसको तो चलना पड़ता था, काम करना पड़ता था। सिर्फ शाही स्त्रियां चलने से बच सकती थीं। तो कंधों पर हाथ का सहारा लेकर चलती थीं। अपंग हो जाती थीं, लेकिन समझा जाता था कि सौंदर्य है। अपंग होना था वह।
आज चीन की कोई लड़की तैयार न होगी, कहेगी पागल थे वे लोग। लेकिन हजारों साल तक यह चला। जब कोई चीज चलती है तो पता नहीं चलता। जब हजारों लोग, इकट्ठी भीड़ करती है तो पता नहीं चलता। जब सारी भीड़ पैरों में जूते पहना रही हो लोहे के, तो सारी लड़कियां पहनती थीं। जो नहीं पहनती, उसको लोग कहते कि तू पागल है। उसे अच्छा, सुंदर पति न मिलता, संपन्न परिवार न मिलता, वह दीन और दरिद्र समझी जाती। और जहां भी उसका पैर दिख जाता वहीं गंवार समझी जाती— अशिक्षित, असंस्कृत। क्योंकि तेरा पैर इतना बड़ा! पैर सिर्फ बड़े गंवार के ही चीन में होते थे, सुसंस्कृत का पैर तो छोटा होता था।
तो हजारों साल तक इस खयाल ने वहां की स्त्रियों को पंगु बनाए रखा। खयाल भी नहीं आया कि हम यह क्या पागलपन कर रहे हैं! लेकिन वह चला। जब टूटा तब पता चला कि यह तो पागलपन था।
जब हम जगत को माया कहते हैं तो यह मतलब नहीं होता है कि जगत नहीं है। केवल इतना ही अर्थ होता है कि जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा नहीं है। Appearance है, जैसा है, वैसा दिखाई नहीं पड़ता। और जैसा नहीं, वैसा दिखाई पड़ता है।
दमन
कथा :
नसरुद्दीन एक दुकान पर काम कर रहा है । लेकिन ग्राहकों से उसका अच्छा व्यवहार नहीं है । तो उसे निकाल दिया गया है । जिस दुकान के मालिक ने उसे निकाल दिया है कह कर कि तुम्हारा ग्राहकों से व्यवहार अच्छा नहीं । ध्यान रखो, कानून, नियम यही है दुकान के चलाने का कि ग्राहक सदा ठीक--the customer is always right । तो यहां यह नहीं चल सकता कि तुम नौकर होकर अपने को ठीक करने की सिद्ध करो और ग्राहक को गलत करने की ।
पंद्रह दिन बाद उसने देखा कि नसरुद्दीन पुलिस का सिपाही हो गया है, चौरस्ते पर खड़ा है । उसने कहा, नसरुद्दीन, क्या सिपाही की नौकरी पर चले गए? नसरुद्दीन ने कहा, हां, मैंने फिर बहुत सोचा । This is the only job, where customer is always wrong; जहां ग्राहक सदा गलत होता है । और धंधा अपने को नहीं जमेगा ।
लाओत्से की बात कठिन मालूम पड़ेगी । कानून की जो नियामक शक्तियां हैं, उनको ही नहीं, साधु-संन्यासियों को भी बहुत अप्रीतिकर लगेगा । क्योंकि साधु अपनी साधुता को स्वभाव नहीं मानता, अपना अर्जित गुण मानता है । साधु कहता है, मैं साधु हूं बड़ी चेष्टा से, बड़ी मुश्किल से; बहुत arduous था मार्ग, बड़ी तपश्चर्या की है, तब मैं साधु हूं । और तुम साधु नहीं हो, क्योंकि तुमने कुछ नहीं किया।
इंग्लैंड में कोड़े की सजाएं थीं चोरों के लिए । डेढ़ सौ साल पहले बंद की गईं । क्योंकि सड़क के चौराहे पर खड़े करके कोड़े मारते थे नग्न, ताकि सैकड़ों लोग देख लें । देख लें और प्रभावित हों और दूसरे लोग चोरी न करें । लेकिन डेढ़ सौ साल पहले ऐसा हुआ कि भीड़ खड़ी थी, और दो आदमी उस भीड़ में जेब काट रहे थे । और एक आदमी को नग्न करके बीच में कोड़े मारे जा रहे थे । भीड़ तो देखने में संलग्न थी । किसी को खयाल न था कि कोई जेब काट लेगा । वहां अनेक लोगों की जेबें कट गईं ।
तो इंग्लैंड की पार्लियामेंट में विचार चला कि यह तो हैरानी की बात है । हम सोचते हैं कि कोड़े मारे जाएं सड़क पर कि लोग चोरी न करें । हैरानी मालूम होती है, जहां कोड़े मारे जा रहे थे, वहां लोगों की जेबें कट गईं! क्योंकि लोग इतने तल्लीन थे देखने में कोड़े, और किसी को खयाल न था कि यहां चोरी हो जाएगी ।
आदमी को हम इतनी सजाएं देकर भी जरा नहीं बदल पाए ।
नसरुद्दीन अपने बेटे पर नाराज है। और वह बेटा बहुत खड़े होकर शोरगुल कर रहा है। वह उससे कहता है, बैठ जा बदमाश! वह लड़का है नसरुद्दीन का, वह कहता है, नहीं बैठते! तो नसरुद्दीन कहता है, खड़ा रह, लेकिन आज्ञा मेरी माननी ही पड़ेगी। या तो बैठ या खड़ा रह, लेकिन आज्ञा मेरी माननी ही पड़ेगी। मेरी आज्ञा से तू नहीं बच सकता।
हमारा मन पूरे समय इस कोशिश में है कि हम किसी को दबा पाएं। क्यों? क्योंकि जब हम किसी को दबाते हैं, तभी हमको लगता है कि हम कुछ हैं।
मैं एक मित्र के घर में कोई आठ साल तक रहता था। मैं बहुत हैरान हुआ। वह आदमी बहुत भले थे। मुझे जब भी मिलते, बड़े प्रेम से मिलते। जब भी मिलते, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट होती। लेकिन न तो मैंने उनको पत्नी के सामने उनकी मुस्कुराते देखा, न उनके बेटे के सामने मुस्कुराते देखा, न उनके नौकरों के सामने मैंने उन्हें कभी मुस्कुराते देखा। मैं थोड़े दिन में चिंतित हुआ। जब वह अपने नौकरों के सामने निकलते, तो उनकी चाल देखने जैसी होती थी। वह ऐसे जाते थे, जैसे कोई है ही नहीं आस-पास।
मैंने उनसे पूछा कि बात क्या है?
उन्होंने कहा कि सजग रहना पड़ता है। अगर नौकर के सामने मुस्कुराओ, कल ही वह कहता है तनख्वाह बढ़ाओ; पत्नी के सामने मुस्कुराए कि झंझट में पड़े, कि वह कहती है एक साड़ी आ गई। चेहरे को सख्त रखना पड़ता है, पहरे पर रहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुस्कुरा कर मैं बहुत नुकसान उठा चुका हूं। जब मुस्कुराए, तभी झंझट खड़ी हो जाती है। बेटा भी देख ले कि बाप मुस्कुरा रहा है, तो उसका हाथ जेब में चला जाता है।
उन्होंने कहा, मैंने तो एक पूरा चेहरा बना रखा है सख्ती का। यह मजबूरी है, इसमें बहुत कष्ट होता है, लेकिन यह सुरक्षा है। बेटा पास आने में डरता है; कमरे में बैठे होते हैं, तो नौकर नहीं गुजरता; किसी की हिम्मत नहीं है कि उनके सामने कोई खड़ा हो जाए।
जितने हम सुरक्षित होते हैं, उतनी हमें नोकें बनानी पड़ती हैं। नोकें जो हैं, वह हमारे चारों तरफ security arrangement है, व्यवस्था है। डर है, आक्रमण है चारों तरफ; हमलावर हैं इकट्ठे। आदमी नहीं, दुश्मन हैं चारों तरफ। उन दुश्मनों से अपने को बचाना है।
एक आदमी ने शादी की है, लेकिन पत्नी बहुत पढ़ी-लिखी नहीं है। मन में बड़ी इच्छा है कि पत्नी कभी पत्र लिखे। घर से बाहर पति गया है, तो उसे समझाकर गया है। थोड़ा लिख लेती है। समझाकर गया है, क्या-क्या लिखना। सभी पति-पत्नी एक-दूसरे को समझा रहे हैं, क्या-क्या लिखना!
उसने बताया था, ऊपर लिखना, प्राणों से प्यारे--कभी ऐसा होता नहीं है--नीचे लिखना, चरणों की दासी। पत्नी का पत्र तो मिला, लेकिन कुछ भूल हो गई। उसने ऊपर लिखा, चरणों के दास। और नीचे लिखा, प्राणों की प्यासी।
जहां आग्रह है मालकियत का, वहां हम सिर्फ घृणा ही पैदा करते हैं। और जहां घृणा है, वहां हिंसा आएगी।
मुसलमान टेलर था, दर्जी था। वह बीमार पड़ा। करीब-करीब। मरने करीब पहुंच गया था। आखिरी जैसे घड़ियां गिनता था, कि रात उसने एक सपना देखा कि वह मर गया और कब्र में दफनाया जा रहा है। बड़ा हैरान हुआ, कब्र रंग-बिरंगी बहुत सी झंडियां लगी हैं। उसने पास खड़े एक फरिश्ते से पूछा कि ये झंडियां यहां क्यों लगी हैं? दर्जी था, कपड़े में उत्सुकता भी स्वाभाविक थी। उस फरिश्ते ने कहा, जिन-जिन के तुमने कपड़े चुराए हैं, जितने-जितने कपड़े चुराए हैं, उनके प्रतीक के रूप में ये झंडियां लगी हैं। परमात्मा इनसे हिसाब करेगा।
वह घबड़ा गया। उसने कहा, हे अल्लाह! रहम कर! झंडियों का कोई अंत ही न था। घबड़ाहट में अल्लाह की आवाज की, उसमें नींद खुल गई। ठीक हो गया। फिर जब दुकान पर वापस आया तो उसके दो शागिर्द थे जो उसके साथ कपड़ा सीने का काम सीखते थे। उसने कहा कि सुनो, अब एक बात का ध्यान रखना। मुझे अपने पर भरोसा नहीं है। कपड़ा कीमती आ जाएगा तो मैं चुराऊंगा ही। पुरानी आदत समझो। और अब इस बुढ़ापे में बदलना बड़ा कठिन है। तुम एक काम करना, जब भी तुम देखो कि मैं कोई कपड़ा चुरा रहा हूं तुम इतना कह देना, उस्ताद जी! झंडी! जोर से कह देना, उस्ताद जी! झंडी!
शिष्यों ने बहुत पूछा कि इसका मतलब क्या है? उसने कहा, वह तुम मत उलझो। मेरे लिए काम हो जाएगा।
ऐसे तीन दिन बीते। दिन में कई बार शिष्यों को चिल्लाना पड़ता, उस्ताद जी! झंडी! वह रुक जाता। चौथे दिन लेकिन मुश्किल हो गई। एक जज महोदय की अचकन बनने आई। बड़ा कीमती कपड़ा था, विलायती था। उस्ताद घबड़ाया कि अब ये चिल्लाते ही हैं, झंडी! तो उसने जरा पीठ कर ली शिष्यों की तरफ और कपड़ा मारने ही जा रहा था कि शिष्य चिल्लाए, उस्ताद जी, झंडी! उसने कहा, बंद करो नालायकों! इस रंग का कपड़ा वहाँ था ही नहीं। क्या झंडी-झंडी लगा रखी है? और फिर हो भी तो जहां इतनी झंडियां लगी हैं, एक और लग जाएंगी।
ऊपर-ऊपर के नियम बहुत गहरे नहीं जाते। सपनों में सीखी बातें जीवन का सत्य नहीं बन सकतीं। भय के कारण कितनी देर सम्हलकर चलोगे? और लोभ कैसे पुण्य बन सकता है?
वही उत्तर वास्तविक है जो आपकी दृष्टि आपके भीतर उत्पन्न कर देती है। शेष सब उत्तर व्यर्थ हैं।
एक बड़े प्रसिद्ध मुनि हुए। नाम था शीतल-प्रसाद। उनका आगरा में आगमन हुआ। आगरा में एक कवि रहते थे, बनारसी दास। वे उनके दर्शन को गए। कवि थे, मस्त आदमी थे! पूछा कि महाराज, आपका नाम जान सकता हूं? उन्होंने कहा, मेरा नाम शीतल-प्रसाद है।
फिर कुछ बात चलने लगी। कवि जरा भुलक्कड़ स्वभाव के थे। थोड़ी देर बाद भूल गए। उन्होंने कहा, महाराज! आपका नाम जान सकता हूं?
मुनि थोड़े नाराज हुए। कहा -- कह दिया शीतल-प्रसाद! फिर थोड़ी बात चली। कवि फिर भूल गए। वे जरा भुलक्कड़ थे। उन्होंने पूछा, महाराज! आपका नाम जान सकता हूं? तो शीतल-प्रसाद ने डंडा उठा लिया और कहा कि मूरख! कितनी बार बताया कि शीतल-प्रसाद! कवि ने कहा, महाराज! ज्वाला-प्रसाद होता तो ठीक था। शीतल-प्रसाद जमता नहीं।
ऊपर से ढांक लोगे, भीतर न हो जाएगा। भीतर ज्वाला ही रहेगी, ऊपर से तुम कितने ही शीतल-प्रसाद हो जाओ। नहीं, अहिंसा को ऊपर से मत थोपना, न सत्य को ऊपर से ओढ़ना। यह कोई राम-नाम की चदरिया नहीं है कि ओढ़ ली और भक्त हो गए।
शांत होने के लिए तो भीतर के अंतःकरण के सारे विरोधाभास मिटाने होंगे। असली साधना वहां है।
एक मां अपने छोटे लड़के को पालक की सब्जी खाने के लिए जबरदस्ती कर रही थी। अब पालक! उसे समझा रही थी, इससे ताकत आएगी, शक्ति बढ़ेगी। बच्चा रो रहा है। उसने कहा, अच्छा खाए लेता हूं! लेकिन इसीलिए खा रहा हूं कि शक्ति बढ़ जाए, ताकि मुझे फिर कोई पालक न खिला सके।
मुल्ला नसरुद्दीन को अभी-अभी डाकिया चिट्ठी दे गया था। नसरुद्दीन ने लिफाफा खोला तो ढब्बूजी भी उचक कर देखने लगे कि आखिर किसकी है! इस पर नसरुद्दीन ने लिफाफा उनके हाथ में रख दिया और कहा कि लो, खुद पढ़ कर देख लो। गुलजान ने भेजी है मायके से।
ढब्बूजी ने चिट्ठी खोल कर देखी जो चौंक कर बोले, लेकिन यह तो कोरा कागज है!
हां, आजकल मेरी और उसकी बोलचाल बंद है--नसरुद्दीन ने मायूसी से जवाब दिया--जब से झगड़ा करके गई है, ऐसे ही पत्र डालती है।
ऐसे ही तथाकथित विरागी होता है। ऊपर-ऊपर से वैराग्य, भीतर-भीतर सारी वासनाएं, सारी कामनाएं दबी हुई--दमित चित्त।
एक धनपति ने किसी विशेष अवसर पर अपने मित्रों को भोज दिया था। उस राज्य का राजा भी भोज में उपस्थित था। इस कारण उस धनपति की खुशी का ठिकाना नहीं था। लेकिन अतिथि भोजन करने बैठे ही थे कि उसकी खुशी क्रोध में बदल गई। उसके दास-दासियां सेवा में लगे थे, एक दास से उसके पैर पर गर्म भोजन से भरी थाली गिर पडी। उसका पैर जल गया और उसकी आंखों में क्रोध उबल पडा। निश्चय ही उस गुलाम के जीवित बचने की अब कोई संभावना नहीं थी। वह गुलाम भय से थर-थर कांप रहा था। लेकिन मरता क्या न करता? उसने आत्मरक्षा के लिए उस देश के पवित्र धर्म-ग्रंथ से एक उद्धृत कियाः 'स्वर्ग उसका है जो अपने क्रोध पर संयम करता है।'
उसके मालिक ने सुना। उसकी आंखों में तो क्रोध उबल रहा था, लेकिन फिर भी वह संयमित होकर बोलाः 'मैं क्रोध में नहीं हूं।'
इस पर स्वभावतः अतिथियों ने तालियां बजाईं और स्वयं राजा ने भी प्रशंसा की। उस धनपति की आंखों का क्रोध अभिमान बन गया। वह गौरवान्वित हुआ था।
लेकिन उस दास ने फिर कहाः 'स्वर्ग उसका है जो क्षमा करता है।' उसके मालिक ने कहाः 'मैंने तुम्हें क्षमा किया।'
यद्यपि उन आंखों में क्षमा कहां जो अहंकार से भरी हों। लेकिन अहंकार क्षमा करके भी तो पुष्ट हो सकता है। अहंकार के मार्ग बहुत सूक्ष्म हैं।
वह धनपति अब तो अतिथियों को अत्यंत धार्मिक मालूम होने लगा था। उन्होंने तो सदा उसे एक क्रूर शोषक की भांति ही जाना था। उसके इस अभिनव रूप को देख कर तो वे चकित ही रह गए थे। सामने ही बैठे राजा ने भी उसे ऐसे देखा जैसे कोई अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति को देखता है। वह धनपति अब पृथ्वी पर नहीं था। उसका सिर आकाश छू रहा था।
अंततः उस दास ने धर्मग्रंथ का अधूरा पूरा किया, 'क्योंकि, परमात्मा उन्हें प्रेम करता है, जो दयालु हैं।'
उस धनपति ने चारों ओर देखा। लौकिक लोभ तो सदा ही उसकी आंखों में था। आज वही पारलौकिक बन गया था। उस गुलाम से उसने कहाः 'जाओ, मैंने तुम्हें मुक्त किया। अब तुम मेरे गुलाम नहीं हो।' और साथ ही स्वर्ण-मुद्राओं से भरी एक थैली भी उसे भेंट दी। उसकी आंखों में क्रोध, अहंकार बना था। अब वही लोभ बन गया था। क्रोध, लोभ, घृणा, भय--क्या सभी किसी एक ही शक्ति की अभिव्यक्तियां नहीं हैं? और जब धर्म इतना सस्ता हो तो कौन धनपति उसे न खरीदना चाहेगा?
हम जानते थे, इल्म से कुछ जानेंगे ।
जाना तो यह जाना, कि न जाना कुछ भी ॥
--उस्ताद ज़ौक़
हार
कथा :
हांगकांग में पहली दफा जो अमरीकन उतरा, उसने हांगकांग के बंदरगाह पर दो चीनियों को लड़ते देखा । लाओत्से की परंपरा से ही जुड़ी हुई अनेक परंपराएं चीन में विकसित हुईं । वह दस मिनट तक खड़ा होकर देखता रहा कि वे बिलकुल एक-दूसरे के मुंह के पास मुंह ले आते हैं, घूंसा उठाते हैं, एक-दूसरे की नाक तक घूंसा ले जाते हैं, बड़ी गालियां देते हैं, बड़ी चीख-पुकार मचाते हैं; लेकिन हमला नहीं होता । दस मिनट में वह थोड़ा हैरान हुआ कि यह किस प्रकार की लड़ाई है! उसने अपने गाइड को पूछा कि यह क्या हो रहा है? क्योंकि उसको समझ में नहीं आया कि यह लड़ाई हो रही है । क्योंकि लड़ाई कैसी? इतने निकट घूंसे पहुंच जाते हैं और वापस लौट जाते हैं । यह कोई खेल हो रहा है! उस गाइड ने कहा कि यह चीनी ढंग की लड़ाई है--A chinese way of fighting!
उसने कहा कि लेकिन फाइट तो हो ही नहीं रही, लड़ाई तो हो ही नहीं रही । दस मिनट से मैं देख रहा हूं, इतने निकट दुश्मन हो और घूंसा इतने करीब आ जाता हो, फिर वापस क्यों लौट जाता है?
तो उस गाइड ने कहा कि ढाई हजार साल से इस मुल्क में एक खयाल है कि जो पहले हमला करे, वह कमजोर, वह हार गया । तो ये दोनों प्रतीक्षा कर रहे हैं । जो पहले हमला करे, वह कमजोर, वह हार गया । उसने काबू पहले खो दिया । वह कमजोरी का लक्षण है । तो यह सब भीड़ भी खड़े होकर यह देख रही है कि देखें, कौन हारता है । और हार का लक्षण यह हुआ कि हमला हुआ कि भीड़ हट जाएगी । बात खत्म हो गई । फलां आदमी हार गया, जिसने हमला किया पहले । और ये दोनों एक-दूसरे को उकसा रहे हैं कि हमला करो । अब इसमें कौन हारता है, यह देखना है । और हार का बड़ा अजीब सूत्र है -- वह जो हमला करेगा, वह हार गया ।
यह लाओत्से की धारणा है कि कमजोर हमला पहले कर देता है ।
ईसप की कथा हम सबको ज्ञात है कि लोमड़ी ने बहुत छलांग मारीं, अंगूरों तक नहीं पहुंच सकी। लेकिन अहंकार यह भी तो स्वीकार नहीं कर सकता कि मेरी छलांग छोटी है। अहंकार यही कहेगा कि अंगूर खट्टे हैं। लेकिन यह कहानी अधूरी है। ईसप दुबारा आए, तो कहानी को पूरा करे। मैं कहानी को पूरा कर देता हूं। जब इस लोमड़ी ने ईसप की कहानी पढ़ी, तो उसने तत्काल एक जिम्नाजियम में जाकर व्यायाम करना शुरू कर दिया। छलांग लगानी सीखी, दवाएं लीं, ताकत के लिए विटामिन्स लिए। और लोमड़ी इतनी ताकतवर हो गई कि वापस गई उसी वृक्ष के नीचे और पहली ही छलांग में अंगूर का गुच्छा उसके हाथ में आ गया। लेकिन जब उसने चखा, तो अंगूर सच में ही खट्टे थे। लेकिन अब लोमड़ी क्या करे? उसने लौट कर लोगों से कहा कि अंगूर बहुत मीठे हैं। अहंकार है, तो कहीं से भी भर लेगा। न पहुंच पाएं अंगूर तक, तो अंगूर खट्टे हैं। और पहुंच जाएं, तो खट्टे भी हों तो भी मीठे हैं। एक बात ध्यान रख लेनी जरूरी है कि हम जो भी वक्तव्य दे रहे हैं, वह वक्तव्य हमारी पराजय से तो नहीं निकलता है? हार से तो नहीं निकलता है? हारे हुए वक्तव्यों का कोई भी मूल्य नहीं है।
सारी दुनिया हमें एक ही पाठ सिखाती है कि धोखा मत खाना किसी और से; और सबको धोखा देना। और हम सबको धोखा देते-देते भूल ही जाते हैं कि जीवन धोखा देने में नहीं है। धोखा देना खुद ही धोखा खाना है।
सशर्त
कथा :
नसरुद्दीन से उसकी पत्नी पूछ रही है एक दिन कि इधर कुछ दिनों से मुझे शक होता है कि तुमने मुझ पर प्रेम कम कर दिया है । क्या मैं तुमसे पूछ सकती हूं कि जब मैं बूढ़ी हो जाऊंगी, तब भी तुम मुझे प्रेम करोगे? नसरुद्दीन ने कहा कि पूजूंगा, तेरे चरणों की धूल सिर पर लगाऊंगा । लेकिन ठहर, तू अपनी मां जैसी तो न हो जाएगी? अगर तेरी मां जैसी हो जाए, तो हाथ जोड़ लूं । तू ऐसी ही तो रहेगी न!
गुरु-नानक -- राम गयो रावण गयो, जाको बहु परिवार ।
कह नानक थिर कुछ नहीं , सपने ज्यूं संसार..!!
धारणा
कथा :
1910 में जर्मनी की एक ट्रेन में एक पन्द्रह-सोलह वर्ष का युवक बैंच के नीचे छिपा हुआ था । उसके पास टिकट नहीं था । वह घर से भाग खड़ा हुआ है । उसके पास पैसा भी नहीं है । फिर तो बाद में वह बहुत प्रसिद्ध आदमी हुआ और हिटलर ने उसके सर पर दो लाख मार्क की घोषणा की कि जो उसका सिर काट लाये । वह तो फिर बहुत बड़ा आदमी हुआ और उसके बड़े अद्भुत परिणाम हुए,और स्टैलिन और आइंस्टीन और गांधी सब उससे मिलकर बहुत आनंदित हुए । उस आदमी का बाद में नाम हुआ - Wolf Messing. उस दिन तो उसे कोई नहीं जानता था, 1910 में ।
Wolf Messing ने अभी अपनी आत्म कथा लिखी है जो रूस में प्रकाशित हुई है । और बड़ा समर्थन मिला है । अपनी आत्मकथा उसने लिखी है -- About myself. उसने उसमें लिखा है । कि उस दिन मेरी जिंदगी बदल गई । उस ट्रेन में नीचे के फर्श पर छिपा हुआ पडा था बिना टिकट के कारण । मैसिंग ने लिखा कि वे शब्द मुझे कभी नहीं भूलते—टिकट चेकर का कमरे में प्रवेश, उसके जूतों की आवाज और मेरी श्वास का ठहर जाना और मेरी घबराहट और पसीने का छूट जाना, ठंडी सुबह, और फिर उसका मेरे पास आकर पूछना -- Young man, your ticket?
मैसिंग के पास तो टिकट नहीं था । लेकिन अचानक पास में पडा हुआ एक कागज का टुकडा / अख़बार का रद्दी टुकडा मैसिंग ने हाथ में उठा लिया । आँख बंद की और संकल्प किया कि यह टिकट है, और उसे उठाकर टिकट चेकर को दे दिया । और मन में सोचा कि है भगवान, है परमात्मा, उसे टिकट दिखाई पड़ जाये । टिकट चेकर ने उस कागज को पंक्चर किया, टिकट वापिस लौटायी और कहा -- When you have got the ticket, why you are lying under the seat? पागल हो, जब टिकट तुम्हारे पास है तो नीचे क्यों पड़े हो । मैसिंग को खुद भी भरोसा नहीं आया । लेकिन इस घटना ने उसकी पूरी जिंदगी को बदल दिया । इस घटना के बाद पिछली आधी सदी में पचास वर्षों में जमीन पर सबसे महत्वपूर्ण आदमी था उसे धारणा के संबंध में सर्वाधिक अनुभव था ।
मैसिंग की परीक्षा दुनिया में बड़े-बड़े लोगों न ली । 1940 में एक नाटक के मंच पर जहां वह अपना प्रयोग दिखला रहा था, लोगों में विचार संक्रमित करने का, अचानक पुलिस ने आकर मंच का पर्दा गिरा दिया और लोगों से कहां कि वह कार्यक्रम समाप्त हो गया । क्योंकि मैसिंग गिरफ्तार कर लिया गया है । मैसिंग को तत्काल बंद गाड़ी में डाल कर क्रेमलिन ले जाया गया और स्टैलिन के सामने मौजूद किया गया । स्टैलिन ने कहा -- मैं मान नहीं सकता कि किसी व्यक्ति को दूसरे कि धारण को सिर्फ आंतरिक धारणा से प्रभावित किया जा सकता है । क्योंकि अगर ऐसा हो सकता है तो फिर आदमी सिर्फ पदार्थ नहीं रह जाता । तो मैं तुम्हें इसलिए पकड़कर बुलाया हूं कि तुम मेरे सामने सिद्ध करो ।
मैसिंग ने कहा -- आप जैसा भी चाहें । स्टैलिन ने कहा कि कल दो बजे तक तुम यहां बंद हो । दो बजे आदमी तुम्हें ले जाएंगे मॉस्को के बड़े बैक में । तुम क्लर्क को एक लाख रूपया सिर्फ धारणा के द्वारा निकलवा कर ले आओ ।
पूरा बैंक मिलिट्री से घेरा हुआ था । दो आदमी पिस्तौलें लिए हुए मैसिंग के पीछे, ठीक दो बजे उसे बैंक में ले गये । उसे कुछ पता नहीं था कि किस काउंटर पर उसे ले जाया जाएगा । जाकर ट्रैज़रर के सामने उसे खड़ा कर दिया, और उसने एक कोरा कागज उन दो आदमियों के सामने निकाला । कोरे कागज को दो क्षण देखा और ट्रैज़रर को दिया । ट्रैज़रर ने कई बार उस कागज को देखा, चश्मा लगाया, वापस गौर से देखा और फिर एक लाख रुबल निकालकर मैसिंग को दे दिया । मैसिंग ने बैग में वे पैसे अंदर रखे । स्टैलिन को जाकर रूपये दे दिये । स्टैलिन को बहुत हैरानी हुई । वापस मैसिंग लौटा । जाकर क्लर्क के हाथ में वह रूपये वापस दिये और कहा -- मेरा कागज वापस लौटा दो । जब क्लर्क ने वापस कागज देखा तो वह खाली था । जब क्लर्क ने वह खाली कागज देखा तो उसे हार्ट अटेक का दौरा पड़ गया और वह वहीं नीचे गिर पडा । वह बेहोश हो गया । उसकी समझ के बहार हो गयी बात की क्या हुआ ।
लेकिन स्टैलिन इतने से राज़ी नहीं हुआ । कोई जालसाजी हो सकती है । कोई क्लर्क और उसके बीच तालमेल हो सकता है । तो क्रेमलिन के एक कमरे में उसे बंद किया गया । हजारों सैनिकों का पहरा लगाया गया और कहा गया कि ठीक बारह बज कर पाँच मिनिट पर वह सैनिकों के पहरे के बहार हो जाये । वह ठीक बारह बज कर पाँच मिनट पर बाहर हो गया । सैनिक अपनी जगह खड़े रहे, वह किसी को दिखाई नहीं पडा । वह स्टैलिन के सामने जाकर मौजूद हो गया ।
इससे भी स्टैलिन को भरोसा नहीं आया । और भरोसा आने जैसा नहीं था । क्योंकि स्टैलिन की पूरी फ़लसफ़ी पूरा चिंतन, पूरे कम्यूनिज़म की धारणा, सब बिखरती है । यही एक आदमी कोई धोखा-धड़ी कर दे और सारा का सारा मार्क्स का चिंतन अधर में लटक जाये, लेकिन स्टैलिन प्रभावित जरूर हुआ, उसने तीसरे प्रयोग के लिये प्रार्थना की ।
उसकी दृष्टि में जो सवार्धिक कठिन बात हो सकती था, वह यह थी -- उसने कहा कि कल रात बारह बजे मेरे कमरे में तुम मौजूद हो जाओ । बिना किसी अनुमति पत्र के । यह सर्वाधिक कठिन बात थी । क्योंकि स्टैलिन जितने गहरे पहरे में रहता था उतना पृथ्वी पर दूसरा कोई आदमी कभी नहीं रहा । पता भी नहीं होता था कि स्टैलिन किस कमरे में है, क्रेमलिन के । रोज कमरा बदल दिया जाता था । ताकि कोई खतरा न हो, कोई बम न फेंक दे, कोई हमला न कर दे । सिपाहियों की पहली कतार जानती थी कि पाँच नंबर कमरे में है । दूसरी कतार जानती थी कि छह नंबर कमरे में है । तीसरी कतार जानती थी कि आठ नंबर कमरे में है । अपने ही सिपाहियों से भी बचने कि जरूरत थी स्टैलिन को । कोई पता नहीं होता था कि स्टैलिन किस कमरे में है । स्टैलिन की खुद पत्नी को भी पता नहीं होता था कि स्टैलिन किस कमरे में है । स्टैलिन के सारे कमरे, जिन में स्टैलिन रहता था । करीब-करीब एक जैसे थे । जिनमें वह कहीं भी किसी भी क्षण हट सकता था । सारा इंतजाम हर कमरे में था ।
ठीक रात बारह बजे पहरेदार पहरा देते रहे और मैसिंग जाकर स्टैलिन की मेज के सामने खड़ा हो गया । स्टैलिन भी कंप गया । और स्टैलिन ने कहा -- तुमने यह किया कैसे ? यह असंभव है ।
मैसिंग ने कहा -- मैं नहीं जानता । मैंने कुछ ज्यादा नहीं किया मैंने सिर्फ एक ही काम किया कि मैं दरवाजे पर आया और मैंने कहा कि I am Bairiya । बैरिया रूसी पुलिस का सबसे बड़ा आदमी था । स्टैलिन के बाद नंबर दो की ताकत का आदमी था । बस मैंने सिर्फ इतना ही भाव किया कि मैं बैरिया हूं । और तुम्हारे सैनिक मुझे सलाम बजाने लगे । और मैं भीतर आ गया ।
स्टैलिन ने सिर्फ मैसिंग को आज्ञा दी कि वह रूस में घूम सकता है । और प्रमाणिक है । 1940 के बाद रूस में इस तरह के लोगों की हत्या नही की जा सकी तो वह सिर्फ मैसिंग के कारण । 1940 तक रूस में कई लोग मार डाले गये थे, जिन्होंने इस तरह के दावे किये थे । कार्ल आटो विस नाम के एक आदमी की 1937 में रूस में हत्या की गई, स्टैलिन की आज्ञा से । क्योंकि वह भी जो करता था वह ऐसा था कि उससे कम्यूनिज़म की जो materialism / भौतिकवादी धारणा है, वह बिखर जाती है ।
अगर धारणा इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है तो स्टैलिन ने आज्ञा दी अपने वैज्ञानिकों को कि मैसिंग की बात को पूरा समझने की कोशिश करो, क्योंकि इसका युद्ध में भी उपयोग हो सकता है । नामोव -- The ultimate weapon in war is going to be physic power, और जो मैसिंग के अध्ययन से निकलेगा । क्योंकि जिस राष्ट्र के हाथ में अणुबम हों उनको भी धारणा से प्रभावित किया जा सकता है कि वह अपने ऊपर ही फेंक दें । एक हवाई जहाज बम फेंकने जा रहा हो उसके पायलट को प्रभावित किया जा सकता है । वह वापस लौट जाए । अपनी ही राजधानी पर गिरा दे ।
यह धारणा की जो शक्ति है, यह आखिरी अस्त्र सिद्ध होगा । इस पर रोज काम बढ़ता चला जाता है । स्टैलिन जैसे लोगों की उत्सुकता तो निश्चित ही विनाश की तरफ होगी । महावीर जैसे लोगों की उत्सुकता निर्माण और सृजन की और है ।
विवेक
कथा :
ख्रुश्चैव एक पार्टी मीटिंग में बोल रहा था । बोलते वक्त वह स्टालिन की निंदा कर रहा था । तो एक आदमी ने पीछे से खड़े होकर कहा कि महाशय, स्टैलिन के जिन कामों की आप निंदा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लाखों लोगों की हत्या की, साइबेरिया भेजा, जेल में डाला सारे मुल्क को खून में डुबो दिया । जो ये बातें आप कह रहे हैं, जब स्टालिन यह सब कर रहा था तब भी आप स्टालिन के साथ थे । तब आप कहां चले गए थे ? ख्रुश्चैव एक मिनिट के लिए चुप हो गया । फिर उसने कहा, जिन महाशय ने ये बात कही है, कृपा करके अपना नाम और पता बता दें । लेकिन वह फिर नहीं उठा । फिर ख्रुश्चैव ने कहा, कृपा करके उठकर अपनी शक्ल ही दिखा दें, लेकिन उस आदमी का कोई पता नहीं चला । फिर ख्रुश्चैव ने कहा जिस वजह से आप दोबारा नहीं उठ रहे हैं उसी वजह से मैं चुप रह गया था । जिंदा रहना था तो चुप रहना जरूरी था ।
प्रिय (मनोज्ञ) और अप्रिय (अमनोज्ञ) में से किंचित भी एक को वांछनीय और एक को अवांछनीय न मानना ज्ञानी का लक्षण है। समत्व ज्ञानी की आधारशिला है।
डेल कार्नेगी ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि एक स्त्री ने उसे पत्र लिखा। वह रेडियो पर बोला लिंकन के ऊपर। लिंकन की कोई जन्मतिथि थी, उस पर व्याख्यान दिया। और व्याख्यान में उसने लिंकन के संबंध में कुछ गलत तथ्य बोल दिए। तो एक स्त्री ने उसे पत्र लिखा कि जब तुम्हें लिंकन के संबंध में कुछ भी पता नहीं, तो कम से कम व्याख्यान देने की जुर्रत तो मत करो। वह भी रेडियो पर! सारे मुल्क ने सुना। और लोग हंसे होंगे। अपनी भूल सुधार करो और क्षमा मांगो। उसने बहुत क्रोध से पत्र लिखा था।
डेल कार्नेगी ने उसी वक्त क्रोध से जवाब लिखा। जितना जहरीला पत्र था, उतना ही जहरीला जवाब लिखा। लेकिन रात देर हो गई थी, तो उसने सोचा, सुबह पत्र डाल देंगे। पत्र को वैसे ही टेबल पर रखकर सो गया।
सुबह उठकर डालते वक्त दुबारा पढ़ना चाहा। तो पत्र को दुबारा पढ़ा तो उसे लगा कि यह जरा ज्यादा है, इतने क्रोध की कोई जरूरत नहीं। वह गरमी कम हो गई, लोहा ठंडा हो गया। तो उसने सोचा, दूसरा पत्र लिखूं यह उचित नहीं है। उसने दूसरा पत्र लिखा, उसमें थोड़ी—सी क्रोध की रेखा रह गई थी। तब उसे खयाल आया कि अगर रात के बारह घंटे में इतना फर्क हो गया, तो मैं बारह घंटे और रुकूं। जल्दी क्या है जवाब देने की! और देखूं कि क्या फर्क होता है।
बारह घंटे बाद पत्र को पढ़ा, तो उसे लगा कि यह भी ज्यादा है। उसने तीसरा पत्र लिखा। लेकिन तब उसने तय किया कि मैं सात दिन रोज सुबह—सांझ पत्र को पढूंगा और सातवें दिन पत्र को लिखूंगा—फाइनल।
सातवें दिन जो पत्र लिखा, वह प्रेमपूर्ण था, क्षमायाचना से भरा था। उसमें उसने लिखा कि आपने मेरी गलती दिखाई, उसके लिए मैं जितना अनुगृहीत होऊं, उतना कम है। और आगे भी कभी मेरी कोई गलती दिखाई पड़े, तो मुझे खबर देना। वह स्त्री उससे मिलने आई। और सदा के लिए मित्रता खड़ी हो गई।
व्यभिचार का अर्थ है, मन में एक की जगह नहीं है। मन खंडित है। बहुत प्रेमी हैं, बहुत पति हैं; उसका अर्थ है व्यभिचार। एक! तो मन अव्यभिचारी हो जाता है।
साधन और साध्य का अंतर समझने के लिए गौतम बुद्ध एक अख्यान का सहारा लिया करते थे। वे अपने शिष्यों को अनेक बार कहानी सुनाते थे-एक गाँव के कुछ लोग नदीं पार जाने के लिए नाव पर चढ़े। वे कुल आठ लोग थे। धार्मिक प्रकृति के थे। कुछ देर के बाद वे दूसरे किनारे पर पहुँच गए। नाव से उतरकर उन्होंने तय किया कि जिस नाव ने हमें नदी पार कराई है, ऐसा करके उसने हम पर एक प्रकार से उपकार किया है। अतः उसे हम कैसे छोड़ सकते हैं। इसलिए उन्होंने कृतज्ञता-ज्ञापन का एक अद्भुत तरीका खोज निकाला। उन्होंने कहा कि उचित यही होगा कि जिस नाव पर हम सवार थे, अब वह हम पर सवार हो जाए। सो उन आठों ने नाव को अपने सिर पर उठा लिया और चल दिए। वे बाजारों, सड़कों तथा गलियों से गुजरे। देखनेवाले कहते कि 'हमने नाव पर सवार तो कई लोगों को देखा है, लेकिन नाव को लोगों पर सवार कभी नहीं देखा। ये लोग कैसे सिरफिरे हैं, जो नाव को सिर पर ढो रहे है !'
किंतु वे आठों तो स्वयं को अक्लमंद समझते थे। उन्होंने जवाब दिया, 'तुम सब तो कृतघ्न हो। तुम्हें कृतज्ञता का क्या पता ? हम जानते हैं अनुग्रह का भाव। हम कृतज्ञ हैं, हम आभार-प्रदर्शन करना जानते हैं। इस नाव ने हमें नदी पार करवाई है। अब हम इस नाव को स्वयं अपने सिर पर ढोकर संसार पार करवाकर रहेंगे। हम इस पर सवार थे, अब यह हम पर सवार रहेगी।'
अंत में गौतम बुद्ध ने शिष्यों को समझाया कि -- नाव तो वास्तव में नदी पार करवाने के लिए होती है, सिर पर ढोने के लिए नहीं। बहुत लोग साधन या साधना को इस तरह पकड़ लेते हैं कि वही साध्य हो जाती है। इस प्रकार हम सिद्धि का लक्ष्य भूल जाते हैं।
सच्चाई को या तो हम सफेद में या काले में तोड़ देते हैं। सच्चाई gray की ही ज्यादा है। ग्रे ही जरा सघन हो जाता है तो काला हो जाता है और जरा विरल हो जाता है तो सफेद हो जाता है।
सम्राट सोलोमन के के बारे में प्रसिद्ध था कि उससे बड़ा कोई बुद्धिमान नहीं है। इथोपिया की रानी सम्राट ने सम्राट की परीक्षा लेने के लिए एक हाथ में नकली फूलों का एक गुलदस्ता और दूसरे हाथ में असली फूलों का गुलदस्ता लेकर आई। बड़े कलाकारों ने वे नकली फूल बनाए थे। वे इतने असली मालूम होते थे कि एक दफे असली पर शक हो जाए, मगर उन नकली पर शक नहीं हो सकता था। दोनों हाथों में फूल लिए रानी सम्राट से कुछ दूरी पर खड़ी हो गई और उसने कहा -- अभी और पास न आऊंगी, आप बताइए, कौन से फूल असली हैं, कौन से नकली? सोलोमन ने एक क्षण सोचा; दरबारी भी मुश्किल में पड़े कि आज अड़चन आई! बड़ा संदिग्ध मालूम हो रहा था--दोनों असली मालूम होते थे, एक से ज्यादा दूसरा असली मालूम होता था। सोलोमन ने कहा कि रोशनी जरा कम है, सारे खिड़कियां और सारे दरवाजे खोल दो, ताकि मैं ठीक से देख सकूं, मैं बूढ़ा भी हो गया हूं। बात भी ठीक थी, दरवाजे--खिड़कियां खोल दी गई। और जैसे ही दरवाजे-खिड़कियां खोली गयी, एक क्षण सोलोमन देखता रहा और फिर उसने कह दिया कि बाएं हाथ में जो फूल हैं वे नकली हैं।
इथोपिया की रानी तो बड़ी चकित हुई। दोनों हाथों में वह फूल लिए खड़ी थी, उसको भी याद रखना पड़ रहा था कि किस हाथ में नकली लिए है--क्योंकि वे इतने असली मालूम होते थे! हाथ पर लिख छोड़ा था उसने कि इस हाथ में नकली हैं और इसमें असली; नहीं तो खुद ही भूल जाए। सम्राट ने कैसे जान लिया? उसने कहा कि क्षमा करें, मगर आपने चकित कर दिया, आपने कैसे जाना? सोलोमन ने कहा, अब झूठ क्या बोलना, फूल तो मुझे पहले भी दिखाई पड़ रहे थे, रोशनी की कोई ज्यादा जरूरत न थी ये जो मैंने दरवाजे-खिड़कियां खुलवाई, ये मधुमक्खियों के लिए। बगीचे से दो मधुमक्यिा भीतर आ गई। वे जिन फूलों पर आकर बैठ गई वे ही असली। सोलोमन की आंखों को भी धोखा दिया जा सकता है, मगर मधुमक्खियों की आंखों को कैसे धोखा दोगे?
काउंट केसरलिंग -- India is a rich land where poor people live.
सुकरात की जिस दिन मौत हुई, उसे जहर दिया गया। जहर देने के पहले उसके मित्र उसके पास गए और उसके एक शिष्य क्रेटो ने उससे पूछा कि सांझ आपको जहर दे दिया जाएगा तो आप हमें बता दें कि हम दफनाएंगे किस तरह आपको? किस विधि से, किस मार्ग से? गड़ाएं, जलाएं, क्या करें? आप रास्ता बता दें, वैसा हम करें।
सुकरात हंसने लगा और उसने क्रेटो से कहा -- पागल, जो मेरे दुश्मन समझते हैं कि मुझे जहर देकर मार डालेंगे वही तुम समझते हो कि शरीर के मरने से मैं मर जाऊंगा और तुम मेरे दफनाने का विचार करने लगे हो! मैं तुम्हें कहता हूं क्रेटो, कि तुम सब मर जाओगे, तुम सब दफना दिए जाओगे, तब भी मैं जिंदा रहूंगा!
आज ढाई हजार साल हो गए, सुकरात अभी जिंदा है। क्रेटो का नाम सिर्फ हमें इसीलिए याद है कि सुकरात ने वह नाम लिया था।
बुराई से बुराई कभी खत्म नहीं होती। घृणा को तो केवल प्रेम द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है, यह एक अटूट सत्य है।
हाँ या ना
कथा :
नसरुद्दीन पर एक मुकदमा चला है एक अदालत में । और मजिस्ट्रेट ने कहा है कि नसरुद्दीन, तुम लफ्फाज हो, तुम शब्दों को ऐसे टर्न देते हो कि हमें बड़ी कठिनाई होती है । तुम हां और न में जवाब दो । नहीं तो यह मुकदमा कभी खतम न होगा । तुम ऐसी गोल-मोल बातें कर देते हो कि हम उसमें घूमते हैं और कहीं पहुंचते नहीं । तुम हां और न में जवाब दो, तो ही हल हो सकता है ।
नसरुद्दीन ने कहा कि लेकिन जो भी बातें जवाब देने योग्य हैं, वे हां और न में नहीं दी जा सकती हैं । और जो बातें जवाब देने योग्य नहीं हैं, वे हां और न में दी जा सकती हैं । फिर तुमने मुझे कसम खिलाई सत्य बोलने की, वह वापस ले लो! फिर मैं हां और न में जवाब दे दूंगा । तुमने मुझे कसम दिलाई सत्य बोलने की, I am on oath! और सत्य ऐसा नहीं है कि हां और न में जवाब दिया जा सके ।
मजिस्ट्रेट ने कहा, अच्छा तो तुम कोई एक ऐसा उदाहरण दो, जिसका जवाब हां और न में न दिया जा सके ।
नसरुद्दीन ने कहा कि मैं पूछता हूं महानुभाव, आपने अपनी पत्नी को पीटना बंद कर दिया? Have you stopped beating your wife? आप हां और न में जवाब दे दें ।
मजिस्ट्रेट थोड़ी दिक्कत में पड़ा । अगर वह कहे हां, तो उसका मतलब वह पीटता था पहले; अगर वह कहे न, तो उसका मतलब वह अभी पीट रहा है ।
नसरुद्दीन ने कहा, कहिए, क्या खयाल है? मेरी कसम हटा लें, सच बोलने की झंझट मुझ पर न हो, तो मैं हां और न में जवाब दे सकता हूं । लेकिन बहुत चीजें हैं, नसरुद्दीन ने कहा, जिनका हां और न में कोई जवाब नहीं हो सकता है ।
और ईश्वर जहां आता है, वहां तो हां और न बिलकुल बेकार हो जाते हैं । वहां नास्तिक भी मूढ़ और आस्तिक भी मूढ़ हो जाते हैं । वहां हां और न में जवाब देने वाले निपट मूढ़ हैं । वहां चीजें बहुत तरल हो जाती हैं, और एक-दूसरे में प्रवेश कर जाती हैं ।
निमित्त
कथा :
गौतम बुद्ध किसी बाग में विश्राम कर रहे थे। तभी बच्चों का एक झुंड आया और पेड़ पर पत्थर मारकर आम गिराने लगा। एक पत्थर बुद्ध के सर पर लगा और खून बहने लगा।बच्चों ने देखा तो भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि अब बुद्ध उन्हें भला बुरा कहेंगे। बुद्ध की आंखों में आंसू आ गए।
बच्चों ने उनके चरण पकड़ लिए और उनसे क्षमा याचना करने लगे। उनमे से एक बच्चे ने कहा, हमसे बड़ी भूल हो गई है। मेरी वजह से आपको पत्थर लगा और आपके आंसू आ गए। इस पर बुद्ध ने कहा, बच्चों, मैं इसलिए दुखी हूं कि तुमने आम के पेड़ पर पत्थर मारा तो पेड़ ने बदले में तुम्हे मीठे फल दिए, लेकिन मुझे मारने पर मैं तुम्हे सिर्फ डर दे सका।
Stephen Hawking -- The greatest enemy of knowledge is not ignorance, it is the illusion of knowledge.
बुद्ध परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए, लेकिन बुद्ध सुबह प्रार्थना करते हैं, तो रोज तो वे क्षमा मांगते हैं समस्त जगत से। एक दिन बुद्ध से किसी ने पूछा कि आप परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए, आपसे अब किसी को चोट नहीं पहुंचती, पहुंच ही नहीं सकती, आप क्षमा किस बात की मांगते हैं?
बुद्ध ने कहा कि मुझे अपने अज्ञान के दिनों की याद है। कोई मुझे चोट नहीं भी पहुंचाता था, तो पहुंच जाती थी। यद्यपि मैं किसी को चोट नहीं पहुंचा रहा, लेकिन बहुतों को पहुंच रही होगी। मैं जानता हूं कि वह जो अज्ञान चारों तरफ मेरे है, वह जो अज्ञानियों का समूह है चारों तरफ, मेरे बिना पहुंचाए भी अनेकों को चोट पहुंच रही होगी। फिर मैंने पहुंचाई या नहीं पहुंचाई, इससे क्या फर्क पड़ता है? उनको तो पहुंच ही रही है। उसकी क्षमा तो मांगनी ही चाहिए।
पर जिसने पूछा था, उसने कहा, आप तो कारण नहीं हैं पहुंचाने वाले!
बुद्ध ने कहा, कारण तो नहीं, लेकिन निमित्त तो हूं। अगर मैं न रहूं, तो मुझसे तो नहीं पहुंचेगी। मेरा होना तो काफी है न, इतना तो जरूरी है, उनको चोट पहुंचे। तो मैं क्षमा मांगता रहूंगा। यह क्षमा किसी किए गए अपराध के लिए नहीं, हो गए अपराध के लिए है। और हो गए अपराध में मेरा कोई हाथ न हो, तो भी।
ज्ञान से अर्थ knowledge नहीं है। ज्ञान से अर्थ प्रज्ञा है। ज्ञान से अर्थ wisdom है।
एक गाव से चार चोर निकलते थे। उन्होंने देखा कि एक नट छलांग लगाकर बड़ी ऊंची रस्सी पर चढ़ गया। और रस्सी पर नाचने के कई तरह के करतब दिखाने लगा। उन चोरों ने कहा, यह आदमी तो काम का है! इसको उड़ा ले चलें। हमें बड़ी मेहनत पड़ती है मकानों में चढ़ने में रात। यह तो गजब का आदमी है! एक इशारा करो कि दूसरी मंजिल पर पहुंच जाए।
उस नट को उन्होंने उड़ा लिया। रात उन्होंने बड़े से बड़ा जो नगर का सेठ था, उसकी हवेली चुनी; जिसको वे अब तक नहीं चुन पाए थे, क्योंकि हवेली बड़ी थी, चढ़ने में अड़चन थी।
नट को लेकर वे पहुंचे। बड़े प्रसन्न थे। उन्होंने नट से कहा, अब तू देर न कर भाई। एक, दो, तीन, छलांग लगा, ऊपर चढ़। लेकिन नट वहीं खड़ा रहा। उन्होंने फिर दुबारा कहा; नट वहीं फिर खड़ा रहा। उन्होंने फिर तीसरी बार कहा। तीसरी बार एक चोर बिलकुल नाराज हो गया, उसने कहा, अभी तू खड़ा क्यों है? चढ़! हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।
नट ने कहा, पहले नगाड़ा बजाओ। बिना नगाड़े के कैसे नट चढ़ सकता है! नगाड़ा जब बजे, नहीं तो मेरे पैर में गति ही नहीं है। अब चोर नगाड़ा तो बजा नहीं सकता। पर नट ठीक कह रहा था। लेकिन उसको भी खयाल नहीं है कि अगर वह छलांग लगा सकता है, तो नगाड़े से कुछ लेना—देना नहीं है।
गुरु सदा बाहर से बोलता है, लेकिन जिस तरफ इशारा करता है, वह शिष्य के भीतर है। इसलिए दो पड़ाव हैं यात्रा के। एक तो बाहर का गुरु, वह पहला पड़ाव है। और फिर भीतर का गुरु, वह अंतिम पड़ाव है।
प्राथमिकता
कथा :
एक बार बुद्ध से उनके एक शिष्य ने पूछा, भगवन आपने आज तक यह नहीं बताया कि मृत्यु के बाद क्या होता है। उसकी बात सुनकर बुद्ध मुस्कुराए, फिर उन्होंने उससे पूछा, पहले मेरी एक बात का जबाव दो। अगर कोई कहीं जा रहा हो और अचानक कहीं से आकर उसके शरीर में एक जहर भरा तीर लग जाए तो उसे क्या करना चाहिए। पहले शरीर में घुसे तीर को हटाना ठीक रहेगा या फिर देखना कि बाण किधर से आया है और किसे लक्ष्य कर मारा गया है।
शिष्य ने कहा, पहले तो शरीर में घुसे तीर को तुरंत निकालना चाहिए, नहीं तो जहर पूरे शरीर में फ़ैल जाएगा। बुद्ध ने कहा, बिल्कुल ठीक कहा तुमने, अब यह बताओ कि पहले इस जीवन के दुखों के निवारण का उपाय किया जाए या मृत्यु की बाद की बातों के बारे में सोचा जाए।
LaoTzu -- To know that you do not know is the best. To think you know when you do not, is a disease. Recognizing this disease as a disease is to be free of it.
सुरक्षा
कथा :
नसरुद्दीन अपनी पत्नी से बचने के लिए शराब पीने लगा। इतनी ज्यादा, कि मित्र चिंतित हो गए। मित्र इतने चिंतित हो गए कि वह आदमी अब बच नहीं सकेगा। नसरुद्दीन से जब भी उन्होंने कहा, तो उसने कहा कि लेकिन जब मैं शराब पीकर घर जाता हूं, तभी घर जा पाता हूं। दरवाजे पर मेरा पैर कंपने लगता है, अगर मैं होश में जाऊं। और ऐसे-ऐसे प्रश्नों के उत्तर मैं तैयार करने लगता हूं, जो कभी किसी ने किसी से नहीं पूछे होंगे; लेकिन मेरी पत्नी पूछ सकती है। शराब पीकर जाता हूं, तो निश्चिंत प्रवेश कर जाता हूं। यह मेरी सुरक्षा है।
पर बात इतनी बढ़ गई कि मित्रों ने कहा, कुछ करना पड़ेगा, अन्यथा यह मौत आ जाएगी। एक मित्र ने सुझाव दिया कि जब यह पत्नी से इतना डरता है और डरने की वजह से ही शराब पीता है, तो और बड़ा डर अगर लाया जाए तो शायद यह शराब छोड़ दे। अब पत्नी से बड़ा और डर क्या हो? एक मित्र ने कहा, एक काम करो कि आज रात जब यह लौटे, वह आधी रात जब घर लौटने लगे, तो झाड़ पर एक आदमी शैतान बन कर बैठ जाए, डेविल बन जाए। सींग लगा ले, काले कपड़े पहन ले, नकाब पहन ले, घबड़ाने की हालत कर दे और चिल्ला कर कूद पड़े नीचे। तो यह कंपेगा, हाथ-पैर जोड़ेगा। तो उस वक्त इससे वचन करवा ले कि शराब नहीं पीना, नहीं तो मैं तेरा पीछा करूंगा, छोडूंगा नहीं। मित्र बाकी छिप गए। एक मित्र devil बन कर ऊपर झाड़ पर चढ़ गया। नसरुद्दीन बेचारा लौट रहा है कोई दो बजे रात। आहिस्ता से चला आ रहा है। ऊपर से वह आदमी कूदा। सब इंतजाम पूरा था। बाकी मित्रों ने जो झाड़ियों में छिपे थे, बड़ी चीख-पुकार लगाई, जैसे भयंकर खतरा आ गया। और वह आदमी नीचे उतरा, नसरुद्दीन के सामने खड़ा हो गया, नसरुद्दीन की गर्दन पकड़ ली।
नसरुद्दीन ने उसकी तरफ देखा। उस आदमी ने कहा कि वचन दो कि शराब छोड़ दोगे! नसरुद्दीन ने कहा, पहले यह तो बताओ महानुभाव कि आप हो कौन?
इसके यह पूछने से उसको थोड़ी गड़बड़ तो हो ही गई, क्योंकि यह डरा नहीं ज्यादा। उसने कहा, मैं शैतान हूं!
नसरुद्दीन ने कहा, बड़ी खुशी हुई मिल कर। मैं वह आदमी हूं जिसने आपकी बहन से शादी की है।
हमारी सारी की सारी योजना, हमारे शब्द, हमारी भाषा, हमारे सिद्धांत, हमारी शराबें, हमारे सिनेमागृह, हमारे नाचघर, हमारे मनोरंजन, बहुत गहरे में सुरक्षा के आयोजन हैं। सब तरह से। हमारे मंदिर, हमारी मस्जिदें, गुरुद्वारे, वह सब हमारे सुरक्षा के आयोजन हैं। डरे हैं, कहीं कोई इंतजाम कर लिया है। और जब भी कोई डरता है, तो उसको धारें रखनी पड़ती हैं अपने चारों तरफ कई तरह की।
इन नोकों को कौन तोड़ सकता है? इन नोकों को वही तोड़ सकता है, जो insecurity में रहने को राजी है।
Alan Watts ने एक किताब लिखी है। किताब का नाम है: The Wisdom of Insecurity, असुरक्षा की बुद्धिमत्ता। सुरक्षा बड़ी मूढ़तापूर्ण बात है। क्योंकि हम सुरक्षित कुछ नहीं कर पाते; कोशिश में खुद मर जाते हैं और मिट जाते हैं। असुरक्षित रहने की बुद्धिमत्ता! नहीं, हम कोई नोक खड़ी न करेंगे, हम कोई पहरा न बनाएंगे। और जिंदगी आक्रमण करेगी, तो हम स्वागत कर लेंगे।
और बड़ा मजा यह है कि जो आदमी इस भांति राजी हो जाता है कि जो भी आक्रमण होगा, हम पी जाएंगे, स्वीकार कर लेंगे, accept कर लेंगे, राजी हो जाएंगे, कहेंगे यही नियति है, नहीं कोई उपाय करेंगे, उस आदमी पर आक्रमण होना असंभव हो जाता है। क्योंकि आक्रमण का भी अपना तर्क है।
असुरक्षित हो जाओ। और ऐसे भी सुरक्षा क्या कर पाओगे? अगर यह पृथ्वी आज टूट जाए, तो कौन सा इंतजाम है? और यह सूरज आज ठंडा हो जाए, तो क्या करोगे? और यह सूरज आज दूर निकल जाए इस पृथ्वी से, तो कौन सा उपाय है इसे पास ले आने का? कभी यह पृथ्वी बिलकुल शून्य थी, कोई आदमी न था। कभी यह फिर सूनी हो जाएगी। जिस दिन सूनी हो जाएगी, उस दिन क्या करिएगा? किससे शिकायत करने जाइएगा? अनंत-अनंत ग्रहों पर जीवन रहा है और नष्ट हो गया। यह पृथ्वी भी सदा हरी-भरी नहीं रहेगी; यह नष्ट हो जाएगी। इंतजाम क्या है आपके पास? क्या बचाव कर लेंगे?
लेकिन ऐसा ही है कि एक चींटी है और मुंह में एक शक्कर का दाना लिए वर्षा का इंतजाम करने अपने घर की तरफ लौटी चली जा रही है, और आपका पैर उसके ऊपर पड़ जाता है। आपको तो पता ही नहीं चलता। सब व्यवस्था, सब सुविधा--न मालूम कितने सपने होंगे, न मालूम क्या-क्या सोच कर चली होगी, घर न मालूम किन-किन बच्चों को वायदा कर आई होगी कि अभी आती हूं--वह सब नष्ट हो गया! अब चींटी उपाय भी क्या करेगी आपके पैर से बचने का? सोच सकते हैं कुछ उपाय, क्या करेगी?
आप क्या सोचते हैं, आपकी कोई बड़ी हैसियत है? चींटी को दबा लेते हैं, इसलिए सोचते हैं कोई बड़ी हैसियत है? इस विराट जगत में कौन सी स्थिति है मनुष्य की?
एक महासूर्य पास से गुजर जाए, सब राख हो जाए। वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई तीन अरब वर्ष पहले कोई महासूर्य पास से निकलने का मतलब है, कई अरब मील के फासले से निकल गया--उसी वक्त, उसके धक्के में, उसके आकर्षण में चांद जमीन से टूट कर अलग हुआ। ये जो पैसिफिक और हिंद महासागर के जो गङ्ढे हैं, यह चांद जो हिस्सा टूट गया जमीन से, उसकी खाली जगह हैं।
कभी भी निकल सकता है। इस विराट जगत में जहां कोई चार अरब सूर्यों का वास है, वहां सब कुछ हो रहा है। वहां कोई हम से पूछने आएगा? कोई आपकी सलाह लेगा? जरा सा कोई अंतर, और जीवन इस पृथ्वी पर विदा हो जाएगा। जीवन! आप नहीं, जीवन ही विदा हो जाएगा। करोड़ों जातियों के पशु मिले हैं, जो कभी थे और अब उनका एक भी वंशज नहीं है। कोई मनुष्य के साथ कोई विशेष नियम लागू नहीं होता।
लेकिन हम बड़ा इंतजाम करते हैं। हमारा इंतजाम चींटी जैसा इंतजाम है। मैं नहीं कहता, इंतजाम न करें। न लाओत्से कहता है, इंतजाम न करें। यह नहीं कहता कि वर्षा के लिए घर में दो दाने न रखें; जरूर रख लें। लेकिन जान लें भलीभांति कि हमारा सब इंतजाम चींटी जैसा इंतजाम है। और जिंदगी के विराट नियम का जो पहिया घूम रहा है, उस पर हमारा कोई वश नहीं है।
संन्यास के तीन बुनियादी सूत्र खयाल में ले लेने जैसे हैं।
पहला - जीवन एक प्रवाह है। उसमें रुक नहीं जाना, ठहर नहीं जाना, वहां कहीं घर नहीं बना लेना है। एक यात्रा है जीवन। पड़ाव है बहुत, लेकिन मंजिल कहीं भी नहीं। मंजिल जीवन के पार परमात्मा में है।
दूसरा सूत्र - जीवन जो भी दे उसके साथ पूर्ण संतुष्ट और पूर्ण अनुग्रह, क्योंकि जहां असंतुष्ट हुए हम तो जीवन जो देता है, उसे भी छीन लेता है और जहां संतुष्ट हुए हम कि जीवन जो नहीं देता, उसके भी द्वार खुल जाते हैं।
और तीसरा सूत्र - जीवन में सुरक्षा का मोह न रखना। सुरक्षा संभव नहीं है। तथ्य ही असंभावना का है। असुरक्षा ही जीवन है। सच तो यह है कि सिर्फ मृत्यु ही सुरक्षित हो सकती है। जीवन तो असुरीक्षत होगा ही। इसलिए जितना जीवंत व्यक्तित्व होगा, उतना असुरक्षित होगा और जितना मरा हुआ व्यक्तित्व होगा, उतना सुरक्षित होगा।
जीवन की परिधि पर कर्म हो और केंद्र में अकर्म, तभी जीवन की परिपूर्णता फलित होती है। बाहर कर्म, भीतर विश्रांति। बाहर गति, भीतर स्थिति।
सूफी फकीर मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने मरते वक्त वसीयत की थी कि मेरी कब्र पर दरवाजा बना देना और उस दरवाजे पर कीमती से कीमती, वजनी से वजनी, मजबूत से मजबूत ताला लगा देना, लेकिन एक बात ध्यान रखना, दरवाजा ही बनाना, मेरी कब्र की चारों तरफ दीवार मत बनाना। आज भी नसरुद्दीन की कब्र पर दरवाजा खड़ा है, बिना दीवारों के, ताले लगे हैं—जोर से, मजबूत। चाबी समुद्र में फेंक दी गई, ताकि कोई खोज न ले। नसरुद्दीन की मरते वक्त यह आखिरी मजाक थी—संन्यासी की मजाक, संसारियों के प्रति। हम भी जीवन में कितने ही ताले डालें, सिर्फ ताले ही रह जाते हैं। चारों तरफ जीवन असुरक्षित है सदा, कहीं कोई दीवार नहीं है।
मोहम्मद अपने शिष्य अली के साथ किसी मार्ग से गुजर रहे थे। अली के एक शत्रु ने आकर उसे रोक लिया और उसका अपमान करने लगा। अली ने शांति से उसके दुर्वचन सुने। उसकी आंखों में प्रेम और प्रार्थना मालूम होती थी। वह शत्रु की विषाक्त बातों को ऐसे सुनता रहा जैसे वह उसकी प्रशंसा करता हो। उसका धैर्य अदभुत था, लेकिन अंततः उसने भी धैर्य खो दिया और वह शत्रु के तल पर नीचे उतर आया और ईंट का जवाब पत्थर से देने लगा। धीरे-धीरे उसकी आंखें क्रोध से भर गईं और उसके हृदय में घृणा और प्रतिशोध के बादल गरजने लगे। उसका हाथ तलवार पर जा चुका था। मोहम्मद अब तक शांति से बैठे सब देख रहे थे। अचानक वे उठे और अली तथा उसके शत्रु को वहीं छोड कर एक ओर चले गए। इससे अली को बहुत आश्चर्य हुआ और मोहम्मद के प्रति मन में शिकायत भी आई। बाद में जब मोहम्मद मिले तो उसने उनसे कहाः 'आपका यह कैसा व्यवहार? शत्रु मुझे रोके हुए था और आप मुझे बीच में छोड कर चले आए! क्या यह मृत्यु के मुंह में ही छोड आने जैसा नहीं है? ' मोहम्मद ने कहाः 'प्यारे! वह मनुष्य निश्चित ही बहुत हिंसक और क्रूर था और बहुत क्रोध से भरा हुआ था, लेकिन मैं तुझे शांत और प्रेम से भरा देख कर बहुत आनंदित था। उस समय मैंने देखा कि परमात्मा के दस दूत तेरी रक्षा कर रहे थे और उनके शुभाशीषों की तेरे ऊपर वर्षा हो रही थी। प्रेम और क्षमा के कारण तू सुरक्षित था। लेकिन, जैसे ही तेरा हृदय करुणा को छोड कर कठोर हुआ और तेरी आंखें प्रतिशोध की लपटें प्रकट करने लगीं, वैसे ही मैंने देखा कि वे देवदूत तुझे छोड कर चले गए हैं। उस समय उचित ही था कि मैं भी वहां से हट जाऊं। परमात्मा ने ही तेरा साथ छोड दिया था।'
व्याख्या
कथा :
सत्य का एक और आयाम है, जहां न सच रहता है, न झूठ; जहां जो है, है। लेकिन वहां असत्य का बोध भी नहीं है। नसरुद्दीन के गांव में एक नया पुरोहित आया है। मस्जिद में वह बोला है पहले ही दिन। बूढ़ा नसरुद्दीन है, लौटते वक्त मस्जिद से उसने सोचा, इस बूढ़े से पूछे लें कि कैसा लगा प्रवचन। पूछा उसने कि मुल्ला, कैसा लगा प्रवचन? तो मुल्ला ने कहा, बहुत अदभुत था, Wonderful! we never what sin was before you came! हमें पता ही नहीं था कि पाप क्या है। तुम्हारे आने के पहले हमें पता ही नहीं था कि पाप क्या है। जब से तुम आए, पाप का पता चला। पाप का पता चलने के लिए भी तो पाप की व्याख्या साफ होनी चाहिए!
According to all known laws of aviation, there is no way that a bee should be able to fly. Its wings are too small to get its fat little body off the ground. The bee, of course, flies anyways. Because bees don't care what humans think is impossible.
नसरुद्दीन एक दिन अदालत के बाहर अपने वकील को पकड़ा है और जाकर कहा कि सुनो, तलाक का क्या नियम है? Divorce कैसे किया जाए? उस वकील ने कहा, क्या मतलब नसरुद्दीन, क्या हो गया? नसरुद्दीन ने कहा, मेरी पत्नी को कोई शिष्टाचार नहीं आता; table manners तो बिलकुल ही नहीं हैं। सारे घर की बदनामी हो रही है। गांव भर में प्रतिष्ठा धूल में मिली जा रही है। तलाक लेना जरूरी है। वकील ने पूछा, शादी हुए कितने दिन हुए? नसरुद्दीन ने कहा, कोई तीस साल हुए। उस वकील ने कहा, तीस साल से...। तो तीस साल से तुम यह अशिष्टाचार सह रहे हो, तो अब क्यों परेशान हो गए? नसरुद्दीन ने कहा, तीस साल से पता नहीं था; आज ही एक किताब में पढ़ा। आज ही एक किताब में पढ़ा, एक atticate की किताब हाथ में लग गई; उसमें देखा कि सब बर्बाद हो गया, पत्नी में बिलकुल टेबल मैनर्स ही नहीं हैं।
हमें पता कब चलता है? व्याख्याएं! A inch distinction, and heaven and hell are set apart। एक इंच भर का फासला किया तुमने विचार में, और स्वर्ग और नर्क की दूरी पैदा हो जाती है।
शास्त्र-ज्ञान दूसरी कोटि का ज्ञान है। प्रथम कोटि का ज्ञान तो अनुभव है, स्वानुभव है।
विनोद भट्ट ने एक कथा लिखी है कि एक गांव के नेता बहुत मुश्किल में पड़ गए, क्योंकि कोई नया आंदोलन पकड़ में नहीं आ रहा था। और नेता का तो धंधा मर जाए, सीजन मर जाए, अगर कोई नया आंदोलन हाथ में न आए। फिर उन्होंने बहुत सोचा, फिर माथापच्ची की और उनको खयाल आया कि पहले भूमिदान आंदोलन चला, तो वह सफल नहीं हुआ। फिर भूमि-छीनो आंदोलन चला, वह भी सफल नहीं हुआ। हम पत्नी-छीनो आंदोलन क्यों न चलाएं! जिसके पास दो पत्नियां हैं, उसकी एक छीनकर उसको दे दी जाए, जिसके पास एक भी नहीं है।
पूरा गांव राजी हो गया। कई लोगों के पास पत्नियां नहीं थीं। लोगों ने कहा, यह तो बिलकुल समाजवादी प्रोग्राम है; यह तत्काल पूरा होना चाहिए। और गांव में कई लोग थे, जिनके पास दो-दो पत्नियां थीं। गांव का जमींदार था, जिसके पास दो पत्नियां थीं। सबकी नजरें उन पत्नियों पर थीं। उन्होंने कहा, कुछ न हो, हमको न भी मिली तो कोई हर्जा नहीं; जमींदार की तो छूट जाएगी। कोई फिक्र नहीं; आंदोलन चले।
आंदोलन चल पड़ा। जमींदार गांव के बाहर गया था। एक पत्नी को उठाकर आंदोलनकारी ले गए।
जुलूस चल रहा है । नारे लग रहे हैं। जमींदार भागा हुआ आया! नेता का पैर पकड़ लिया, और कहा कि बड़ा अन्याय कर रहे हो मेरे ऊपर। नेता ने कहा, अन्याय कुछ भी नहीं। अन्याय तुमने किया है। दो-दो पत्नियां रखे हो, जब कि गांव में कई लोगों के पास एक भी पत्नी नहीं है, आधी भी पत्नी नहीं है। दो-दो रखे हुए हो तुम? यह नहीं चलेगा। उसने कहा कि नहीं, आप समझ नहीं रहे हैं, बहुत अन्याय कर रहे हैं मेरे ऊपर। हाथ-पैर जोड़ता हूं। मुझ पर थोड़ा ध्यान धरो। मेरा थोड़ा खयाल करो। रोने लगा, गिड़गिड़ाने लगा।
और फिर इस भीड़ में, जब पत्नी को उठाकर लाए थे, तब तक तो सोचा था कि दो पत्नियां हैं जमींदार के पास। जब लाए तो इस बीच में देखा कि साधारण सी औरत है; नाहक परेशान हो रहे हैं। फिर जब वह इतना गिड़गिड़ाने लगा, तो नेताओं ने कहा कि झंझट भी छुड़ाओ। इस स्त्री को कोई लेने को भी राजी न होगा।
तो कहा, अच्छा तू नहीं मानता है, तो ले जा अपनी पत्नी को; हम छोड़े देते हैं।
जमींदार बोला कि आप बिलकुल गलत समझ रहे हैं। मेरा मतलब यह नहीं कि इसको लौटा दो। मेरा मतलब, दूसरी को क्यों छोड़ आए? बड़ा अन्याय कर रहे हैं। उसको भी ले जाओ।
अब जब उसने कहा कि बड़ा अन्याय कर रहे हैं, तो बहुत कठिन था कि नेता समझ पाता कि यह कह रहा है कि दूसरी को भी ले जाओ। मुश्किल था मामला। वह यही समझा स्वभावतः, कि इस पत्नी को छोड़ दो।
शब्द का अपने आप में अर्थ नहीं है। शब्द की व्याख्या निर्मित होती है।
अधार्मिक व्यक्ति सब पर संदेह करता है, अपने को छोड़कर। और धार्मिक व्यक्ति अपने पर संदेह करता है, सब को छोड़कर।
दर्शनशास्त्र की ऐसी व्याख्या की जाती है कि एक अंधा आदमी, अमावस की रात, एक ऐसे भवन में जहां दीया भी नहीं जल रहा है, एक काली बिल्ली को खोज रहा है जो कि वहां है ही नहीं! एक तो अंधा, फिर अमावस की रात, फिर एक दीया भी नहीं घर में, फिर काली बिल्ली--और वह भी वहां मौजूद नहीं है! वह भी मौजूद होती तो भी एक बात थी कि चलो खोजते-खोजते किसी तरह--अगर अंधा न खोज पाता तो कम से कम बिल्ली अंधे को खोज लेती--किसी तरह मिलन हो जाता। लेकिन वह बिल्ली भी वहां है नहीं।
दर्शनशास्त्र ऐसा ही है। सारा पांडित्य ऐसा है। थोथा! और उसके थोथे होने का कारण है: गलत शुरुआत; दूसरे से शुरुआत--उधार।
हंसना
कथा :
तीन चीनी फकीर हुए जिनका नाम कोई नहीं जानता। वे जाने जाते थे केवल 'तीन हंसते हुए संतों' के रूप में, क्योंकि उन्होंने कभी कुछ किया ही नहीं था, वे केवल हंसते रहते थे। वे एक नगर से दूसरे नगर की ओर बढ़ जाते, हंसते हुए। वे खड़े हो जाते बाजार में और खूब जोर से हंसते। सारा बाजार उन्हें घेरे रहता। सारे लोग आ जाते। दुकानें बंद हो जातीं और ग्राहक भूल जाते कि वे आए किसलिए थे। ये तीनों आदमी सचमुच सुंदर थे हंसते और उनके पेट हिलते जाते। और फिर यह बात संक्रामक बन जाती और दूसरे हंसना शुरू कर देते। फिर सारा बाजार हंसने लगता। उन्होंने बदल दिया होता बाजार की गुणवत्ता को, स्वरूप को ही। और यदि कोई कहता कि 'कुछ कहो हम से' तो वे कहते, 'हमारे पास कहने को कुछ है नहीं। हम तो बस हंस पड़ते हैं और बदल देते हैं गुणधर्म ही।' जब कि अभी थोड़ी देर पहले यह एक असुंदर जगह थी जहां कि लोग सोच रहे थे केवल रुपये पैसे के बारे में ही, ललक रहे थे धन के लिए, लोभी, धन ही एकमात्र वातावरण था हर तरफ अचानक ये तीनों पागल आदमी आ पहुंचते हैं और वे हंसने लगते, और बदल देते गुणवत्ता सारे बाजार की ही। अब कोई ग्राहक न था। अब वे भूल चुके थे कि वे खरीदने और बेचने आए थे। किसी को लोभ की फिक्र न रही। वे हंस रहे थे और नाच रहे थे इन तीन पागल आदमियों के आस पास। कुछ पलों के लिए एक नयी दुनिया का द्वार खुल गया था।
वे घूमे सारे चीन में, एक जगह से दूसरी जगह, एक गांव से दूसरे गांव, बस लोगों की मदद कर रहे थे हंसने में। उदास लोग, क्रोधित लोग, लोभी लोग, ईर्ष्यालु लोग वे सभी हंसने लगे उनके साथ।
फिर, एक गांव में ऐसा हुआ कि उन तीनों में से एक मर गया। गांव के लोग इकट्ठे हुए और वे कहने लगे, 'अब तो मुश्किल आ पड़ेगी। अब हम देखेंगे कि कैसे हंसते हैं वे। उनका मित्र मर गया है, वे तो जरूर रोएंगे।' लेकिन जब वे आए, तो दोनों नाच रहे थे, हंस रहे थे, और उत्सव मना रहे थे मृत्यु का। गांव के लोगों ने कहा, 'यह तो बहुत ज्यादती हुई। यह असभ्यता है। जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो हंसना और नाचना अधर्म होता है।' वे बोले, 'तुम नहीं जानते कि क्या हुआ। हम तीनों सदा ही सोचते रहते थे कि सब से पहले कौन मरेगा। यह आदमी जीत गया है, हम हार गए। सारी जिंदगी हंसते रहे उसके साथ। तो हम उसे अंतिम विदाई किसी और चीज के साथ कैसे दे सकते हैं? हमें हंसना ही है, हमें आनंदित होना ही है, हमें उत्सव मनाना ही है। यही एक मात्र विदाई संभव है उस व्यक्ति के लिए जो जीवन भर हंसता रहा है। और यदि हम नहीं हंसते, तो वह हंसेगा हम पर और वह सोचेगा, अरे नासमझों! तो तुम फिर जा फंसे जाल में? हम नहीं समझते कि वह मर गया है। हंसी कैसे मर सकती है? जीवन कैसे मर सकता है?'
हंसना शाश्वत चीज है, जीवन शाश्वत है, उत्सव चलता ही रहता है। अभिनय करने वाले बदल जाते हैं, लेकिन नाटक जारी रहता है। लहरें परिवर्तित होती हैं, लेकिन सागर बना रहता है। तुम हंसते, तुम बदलते और कोई दूसरा हंसने लगता, लेकिन हंसना तो जारी रहता है। तुम उत्सव मनाते हो, कोई और उत्सव मनाता है, लेकिन उत्सव तो चलता ही रहता है। अस्तित्व सतत प्रवाह है, वह सब कुछ समाए चलता है, उसमें एक पल का अंतराल नहीं होता। लेकिन गांव के लोग नहीं समझ सकते थे और वे इस हंसी में उस दिन तो शामिल नहीं हो सकते थे।
फिर देह का अग्नि संस्कार करना था, और गांव के लोग कहने लगे, 'हम तो इसे स्थान कराएंगे जैसे कि धार्मिक कर्मकांड नियत होते हैं।' लेकिन वे दोनों मित्र बोले, 'नहीं, हमारे मित्र ने कहा है कि कोई धार्मिक अनुष्ठान मत करना और मेरे कपड़े मत बदलना और मुझे स्नान मत कराना। जैसा मैं हूं तुम मुझे वैसा ही रख देना चिता की आग पर। इसलिए हमें तो उसके निर्देशों को मानना ही पड़ेगा।'
और तब, अचानक ही, एक बड़ी घटना घटी। जब शरीर को आग दी जाने लगी, तो वह बूढ़ा आदमी आखिरी चाल चल गया। उसने बहुत से पटाखे छिपा रखे थे कपड़ों के नीचे, और अचानक दीपावली हो गयी! तब तो सारा गांव हंसने लगा। ये दोनों पागल मित्र नाच ही रहे थे, फिर तो सारा गांव ही नाचने लगा। यह कोई मृत्यु न थी, यह नया जीवन था।
कोई मृत्यु मृत्यु नहीं होती, क्योंकि प्रत्येक मृत्यु खोल देती है एक नया द्वार वह एक प्रारंभ होती है। जीवन का कोई अंत नहीं, सदा एक नया प्रारंभ होता है, एक पुनर्जीवन।
उत्तर देने का यह अर्थ नहीं है कि जो आप पूछ रहे हैं, वह सार्थक है। उत्तर देने का इतना ही अर्थ है, ताकि आपकी जिज्ञासा घिस-घिसकर शांत हो जाए।
मनोविज्ञान
कथा :
एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक बहुत धन कमा लिया, तो सोचा उसने कि अब विश्राम करें। तो एक छोटे गांव में उसने जमीन ले ली--शौकिया। खेती-बाड़ी करके कुछ कमाने का सवाल न था। कमाई पूरी हो चुकी थी। जरूरत से ज्यादा हो चुकी थी। फसल बोने का मौका आ गया था। जमीन लेकर उसने फसल बोनी शुरू की। खड़े होकर जमीन पर उसने जमीन खुदवा डाली, बक्खर चलवा दिए, दाने फेंके। लेकिन सारे गांव के कौवे आकर उसके खेत के दाने चुनने लगे। एक दिन दाने फेंके, कौवे चुन गए। दूसरे दिन दाने फेंके, कौवे चुन गए। तीसरे दिन दाने फेंके...। फिर उस मनोवैज्ञानिक को संकोच भी लगा, किसी से पूछे; संकोच भी लगा, साधारण बुद्धिहीन किसान, उनसे पूछे कि क्या है राज! कोई उपाय न देख कर पड़ोस के एक किसान से, जो रोज उसको देखता था और हंसता था, उसने पूछा कि बात क्या है?
वह किसान आया। उसने दाने फेंकने का इशारा किया। जैसे दाने फेंके, ऐसे उसने हाथ घुमाए; लेकिन फेंका कुछ नहीं। कौवे आए, बड़े नाराज हुए। चीखे-चिल्लाए, वापस उड़ गए। दूसरे दिन उसने फिर मुद्रा की दाने फेंकने की। कौवे फिर आए, आज थोड़े कम आए। नाराज हुए, आज थोड़े कम नाराज हुए। चले गए। तीसरे दिन उसने फिर वही किया। चौथे दिन उसने दाने फेंके। कौवे नहीं आए। उस मनोवैज्ञानिक ने कहा, अदभुत! राज क्या है? उस किसान ने कहा, छोटा सा मनोविज्ञान। कभी सुना है नाम मनोविज्ञान का? खाली हाथ और तीन दिन, कौवे भी समझ गए कि खाली हाथ है।
अपराध-बोध
कथा :
औरंगजेब ने एक आदमी को सूली दी, सरमद को, सिर्फ एक छोटी सी बात पर। और वह बात इतनी थी कि सरमद एक आयत को पूरा नहीं बोलता था। एक आयत है, मुसलमान जिसको निरंतर दोहराता है, और बड़ी कीमती है: कोई अल्लाह नहीं, सिवाय एक अल्लाह के। कोई अल्लाह नहीं, सिवाय एक अल्लाह के। लेकिन सरमद कहता था सिर्फ इतना ही: कोई अल्लाह नहीं। आधा ही बोलता था: कोई अल्लाह नहीं। पुरोहित परेशान हो गए, औरंगजेब को जाकर कहा। सरमद को बुलाया गया। सरमद से कहा गया कि बोलो, सुना है कि तुम कुछ गलत बातें बोलते हो। उसने कहा, गलत नहीं बोलता; जो वचन है, वही बोलता हूं। सिर्फ आधा बोलता हूं। तो क्यों आधा बोलते हो? वचन पूरा बोलो! क्योंकि पूरे का मतलब और ही है। कोई अल्लाह नहीं है, सिवाय एक अल्लाह के। इसका तो मतलब और ही हुआ कि एक ही अल्लाह है, और कोई अल्लाह नहीं। लेकिन सरमद कहता, मैं आधा ही बोलता हूं, कोई अल्लाह नहीं। इसका तो मतलब हुआ, देयर इज़ नो गॉड, कोई अल्लाह नहीं।
सरमद ने कहा, इतना ही मुझे अभी तक पता चला है; दूसरा हिस्सा मुझे पता नहीं चला। अभी तक मेरे अनुभव ने इतना ही कहा है, कोई अल्लाह नहीं। जिस दिन मुझे पता चलेगा दूसरा हिस्सा भी, कि सिवाय एक अल्लाह के, उस दिन वह भी बोलूंगा। जब तक मुझे पता नहीं, मैं नहीं बोलूंगा।
निश्चित ही, यह आदमी काफिर है। नास्तिक है। इससे और ज्यादा नास्तिक क्या होगा? गर्दन कटवा दी गई। बड़ी मीठी कथा है। चश्मदीद गवाह थे हजारों उस घटना के। इसलिए कथा न भी कहें, तो भी चलेगा; ऐतिहासिक तथ्य भी है। जिस दिन दिल्ली की मस्जिद के सामने सरमद का गला काटा गया, उसकी गर्दन कट कर गिरी सीढ़ी पर, लहू की धारा बही और आवाज निकली: कोई अल्लाह नहीं, सिवाय एक अल्लाह के। कटी हुई गर्दन से!
सरमद को प्रेम करने वाले कहते हैं, जब तक कोई अपनी गर्दन न कटाए, तब तक उस अल्लाह का कोई पता नहीं चलता है, जो एक है। लेकिन कुरान की भाषा को पकड़ेंगे, तो सरमद नास्तिक मालूम होगा। लेकिन सरमद ही आस्तिक है। और औरंगजेब जब मरा, तो उसके मन में जो सबसे बड़ी पीड़ा थी आखिरी मरते क्षण तक, वह सरमद को मरवा देने की थी। आखिरी जो प्रार्थना थी औरंगजेब की, वह यह थी कि मैंने कितने ही पाप किए हों, उनकी मुझे फिक्र नहीं है; लेकिन इस एक सरमद को मार कर जो मैंने किया है, यह काफी है। इससे ज्यादा और कोई पाप की जरूरत नहीं है। यह काफी पाप हो गया है। अगर यह मेरा माफ हो जाए, तो सब माफ। अगर यह मेरा माफ न हो, तो मेरे लिए कोई उपाय नहीं है।
सम्यक जिसने चेष्टा की है, वह कर्म के बाहर हो जाता है।
अकबर ने एक दफा चार लोगों को सजाएं दीं। चारों का एक ही कसूर था। चारों ने मिलकर राज्य के खजाने से गबन किया था। और बराबर गबन किया था। असल में चारों साझीदार थे। सबने बराबर अशर्फियां ले ली थीं।
चारों को बुलाया अकबर ने। और पहले को कहा, तुमसे ऐसी आशा न थी! जाओ। वह आदमी चला गया। दूसरे आदमी से कहा कि तुम्हें सिर्फ इतनी सजा देता हूं कि झुककर सारे दरबारियों के पैर छू लो, और जाओ। तीसरे को कहा कि तुम्हें एक वर्ष के लिए राज्य-निष्कासन देता हूं। राज्य के बाहर चले जाओ। चौथे को कहा कि तुम्हें आजीवन कैदखाने में भेज देता हूं।
कैदी जा चुके, दरबारियों ने पूछा कि बड़ा अजीब-सा न्याय किया है आपने! दंड इतने भिन्न, जुर्म इतना एक समान; यह कुछ न्याय नहीं मालूम पड़ता है! एक आदमी को सिर्फ इतना ही कहा कि तुमसे ऐसी आशा न थी और एक आदमी को आजीवन कैद में भेज दिया!
अकबर हंसा और उसने कहा कि मैं उनको जानता हूं। अगर तुम्हें भरोसा न हो, तो जाओ, पता लगाओ, वे चारों क्या कर रहे हैं! गए। सबसे पहले तो उस आदमी के पास गए, जिस आदमी से कहा था कि तुमसे ऐसी आशा न थी। उसके घर पहुंचे। पता चला, वह फांसी लगाकर मर गया। हैरान हो गए। लौटकर अकबर से कहा।
अकबर ने कहा, देखते हैं, वहां सूई भी काफी थी। उतना कहना भी ज्यादा पड़ गया। उतना कहना भी ज्यादा पड़ गया; वह आदमी ऐसा था। इतना काफी सजा थी, कि तुमसे ऐसी आशा न थी। बहुत सजा हो गई! जिसको थोड़ा भी अपने व्यक्तित्व का बोध है, उसके लिए बहुत सजा हो गई। अब जाकर देखो उस आदमी को जिसको कि सजा दी है जीवनभर की।
वे वहां गए, तो जेलर ने बताया कि वह आदमी जेलखाने में रिश्वत का इंतजाम फैलाकर भागने की योजना बना रहा है। उससे मिले, तो वह कोई उदास न था। कहा कि उदास नहीं हो! आजीवन सजा हो गई। उसने कहा कि छोड़ो भी। जिस दुनिया में सब कुछ हो रहा है, उसमें हम कोई सदा जेल में रहेंगे! निकल जाएंगे। जहां सब कुछ संभव हो रहा है, वहां कोई हम सदा जेल में रहेंगे! तुम दो-चार दिन में देखना कि हम बाहर हैं। और तुम पंद्रह-बीस दिन के बाद देखोगे कि हम दरबार में हैं। तुम चिंता मत करो; हम जल्दी लौट आएंगे। और वैसे भी बहुत थक गए थे, पंद्रह-बीस दिन का विश्राम मिल गया! हैरान हुए कि उसको जीवनभर की सजा मिली है, वह आदमी यह कह रहा है। और जिससे सिर्फ इतना कहा है कि तुझसे इतनी अपेक्षा, ऐसी आशा न थी, वह फांसी लगाकर मर गया!
खून धुलता नहीं -- पाप आसानी से नहीं धुलता।
यह हैरानी की बात है कि पांटियस पायलट, जो उन दिनों रोमन गवर्नर था इजरायल में, जिसकी आज्ञा से जीसस को फांसी लगी, उसे जिंदगी भर एक रोग सताया -- हाथ धोने का रोग! जीसस को मार डालने के बाद वह बार-बार हाथ धोता था, अकारण हाथ धोता था।
क्षत्रिय
कथा :
अकबर के दरबार में दो राजपूत गए। युवा, जवान, अभी मूंछ की रेखाएं आनी शुरू हुई हैं। दोनों अकबर के सामने गए और उन्होंने कहा कि हम दो बहादुर हैं और सेवा में उपस्थित हैं; कोई काम! तो अकबर ने कहा, बहादुर हो, इसका प्रमाण क्या है? उन दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा, हंसे। तलवारें बाहर निकल गईं। अकबर ने कहा, यह क्या करते हो? लेकिन जब तक वह कहे, तब तक तलवारें चमक गईं, कौंध गईं। एक क्षण में तो खून के फव्वारे बह रहे थे; एक-दूसरे की छाती में तलवारें घुस गई थीं। खून के फव्वारों से चेहरे भर गए थे। और वे दोनों हंस रहे थे और उन्होंने कहा, प्रमाण मिला? क्योंकि क्षत्रिय सिर्फ एक ही प्रमाण दे सकता है कि मौत मुस्कुराहट से ली जा सकती है। तो हम सर्टिफिकेट लिखवाकर कहां से लाएं? सर्टिफिकेट कोई और हो भी नहीं सकता बहादुरी का।
अकबर तो घबड़ा गया, उसने अपनी आत्मकथा में लिखवाया है कि इतना मैं कभी नहीं घबड़ाया था। मानसिंह को उसने बुलाया और कहा कि क्या, यह मामला क्या है? मैंने तो ऐसे ही पूछा था! तो मानसिंह ने कहा, क्षत्रिय से दोबारा ऐसे ही मत पूछना। क्योंकि जिंदगी हम हाथ पर लेकर चलते हैं। क्षत्रिय का मतलब यह है कि मौत एक क्षण के लिए भी विचारणीय नहीं है। लेकिन अकबर ने लिखवाया है कि हैरानी तो मुझे यह थी कि मरते वक्त वे बड़े प्रसन्न थे; उनके चेहरों पर मुस्कुराहट थी। मानसिंह से उसने पूछा कि यह मुस्कुराहट, मरने के बाद भी! मानसिंह ने कहा, क्षत्रिय जो हो सकता था, हो गया। फूल खिल गया। तृप्त! कोई यह नहीं कह सका कि क्षत्रिय नहीं! बात खतम हो गई।
मूर्च्छा या नशे की दशा में जो जीवन-व्यवहार चल रहा है, वह तामस की अवस्था है।
बहुत परिश्रम से युक्त, फल को चाहने वाले, अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा जाता है। दौड़ते बहुत हैं, पहुंचते कहीं नहीं। कोल्हू के बैल!
शास्ताओं द्वारा कहा हुआ; जिन्होंने जाना है, जो जागे हैं, उनके इशारे के अनुसार जो करे, वह सात्विक है।
कंपन
कथा :
चीन में एक बहुत बड़ा धनुर्धर हुआ। उसने जाकर सम्राट को कहा कि अब मुझे जीतने वाला कोई भी नहीं है। तो मैं घोषणा करना चाहता हूं राज्य में कि कोई प्रतियोगिता करता हो, तो मैं तैयार हूं। और अगर कोई प्रतियोगी न निकले--या कोई प्रतियोगी निकले, तो मैं स्पर्धा के लिए आ गया हूं। और मैं यह चाहता हूं कि अगर कोई प्रतियोगी न निकले या प्रतियोगी हार जाए, तो मुझे पूरे देश का श्रेष्ठतम धनुर्धर स्वीकार किया जाए। सम्राट ने कहा, इसके पहले कि तुम मुझसे कुछ बात करो, मेरा जो पहरेदार है, उससे मिल लो। पहरेदार ने कहा कि धनुर्धर तुम बड़े हो, लेकिन एक व्यक्ति को मैं जानता हूं, कुछ दिन उसके पास रह आओ। कहीं ऐसा न हो कि नाहक अपयश मिले।
उस व्यक्ति की खोज करता हुआ वह धनुर्धर जंगल पहुंचा। जब उस व्यक्ति के पास उसने देखा और रहा, तो पता चला कि वह तो कुछ भी नहीं जानता था।
तीन वर्ष उसके पास सीखा। सब सीख गया। तब उसके मन में हुआ कि अब तो मैं सब सीख गया, लेकिन फिर भी अब मैं किस मुंह से राजा के पास जाऊं, क्योंकि मेरा गुरु तो कम से कम मुझसे ज्यादा जानता ही है। नहीं ज्यादा, तो मेरे बराबर जानता ही है। तो अच्छा यह हो कि मैं गुरु की हत्या करके चला जाऊं।
अक्सर गुरुओं की हत्या शिष्य ही करते हैं--अक्सर। यह बिलकुल स्वाभाविक नियम से चलता है।
तो गुरु सुबह-सुबह लकड़ियां बीनने गया है जंगल में; वह एक वृक्ष की ओट में खड़ा हो गया। धनुर्धर है, दूर से उसने तीर मारा, गुरु लकड़ियां लिए चला आ रहा है। लेकिन अचानक सब उलटा हो गया। वह तीर पहुंचा, उस गुरु ने देखा, एक लकड़ी सिर के बंडल से निकालकर उस तीर को मारी। वह तीर उलटा लौटा और जाकर उस युवक की छाती में छिद गया।
गुरु ने आकर तीर निकाला और कहा कि इतना भर मैंने बचा रखा था। शिष्यों से गुरु को थोड़ा-सा बचा रखना पड़ता है। लेकिन तुम नाहक...। मुझसे कह देते। मैं गांव आऊंगा नहीं। और शिष्य से प्रतियोगिता करने आऊंगा? पागल हुए हो? तुम जाओ, घोषणा करो, तुम मुझे मरा हुआ समझो। तुम्हारे निमित्त अब किसी को सिखाऊंगा भी नहीं। और मेरे आने की कोई बात ही नहीं; तुमसे प्रतियोगिता करूंगा! जाओ, लेकिन जाने के पहले ध्यान रखना कि मेरा गुरु अभी जिंदा है। और मैं कुछ भी नहीं जानता। उसके पास दस-पांच साल रहकर जो थोड़े-बहुत कंकड़-पत्थर बीन लिए थे, वही। इसलिए उसके दर्शन एक बार कर लो।
बड़ा घबड़ाया वह आदमी। महत्वाकांक्षी के लिए धैर्य बिलकुल नहीं होता। तीन साल इसके साथ खराब हुए। लेकिन अब बिना उस आदमी को देखे जा भी नहीं सकता। तो गया पहाड़ों में खोजता हुआ, और ऊंचे शिखर पर। उसके गुरु ने कहा था कि मेरा बूढ़ा गुरु है, कमर उसकी झुक गई है, तुम पहचान लोगे। जब वह उसके पास पहुंचा, तो उसने जाकर देखा कि एक अत्यंत वृद्ध आदमी, सौ के ऊपर पार हो गया होगा, कमर झुक गई है, बिलकुल गोल हो गया है। सोचा कि यह आदमी!
उसने कहा कि क्या आप ही वे धनुर्धर हैं, जिनके पास मुझे भेजा गया है? तो उस बूढ़े ने आंखें उठाईं, उसकी पलकों के बाल भी बहुत बड़े हो गए थे, बामुश्किल आंखें खोलकर उसने देखा और कहा, हां, ठीक है। कैसे आए हो? क्या चाहते हो? उसने कहा, मैं भी एक धनुर्धर हूं।
तो वह बूढ़ा हंसने लगा। उसने कहा, अभी धनुष-बाण साथ लिए हो! कैसे धनुर्धर हो? क्योंकि जब कोई कला में पूर्ण हो जाता है, तो यह व्यर्थ का बोझ नहीं ढोता है। जब वीणा बजाने में वीणावादक पूर्ण हो जाता है, तो वीणा तोड़ देता है, क्योंकि फिर वीणा पूर्ण संगीत के मार्ग पर बाधा बन जाती है। और जब धनुर्धर पूरा हो जाता है, तो धनुष-बाण किसलिए? ये तो सिर्फ अभ्यास के लिए थे।
बहुत घबड़ाया वह धनुर्धर। उसने कहा, सिर्फ अभ्यास ही! तो आगे और कौन-सी धनुर्विद्या है? तो उस बूढ़े ने कहा, आओ मेरे साथ। वह बूढ़ा उसे लेकर पहाड़ के कगार पर चला गया, जहां नीचे हजारों फीट का गड्ढा है।
वह बूढ़ा आगे बढ़ने लगा, वह धनुर्धर पीछे खड़ा रह गया। वह बूढ़ा आगे बढ़ा, उसके पैरों की अंगुलियां पत्थर के बाहर झांकने लगीं। उसकी झुकी हुई गरदन खाई में झांकने लगी। उसने कहा कि बेटे, और पास आओ; इतने दूर क्यों रुक गए हो! उसने कहा, लेकिन वहां तो मुझे बहुत डर लगता है। आप वहां खड़े ही कैसे हैं? मेरी आंखें भरोसा नहीं करतीं, क्योंकि वहां तो जरा श्वास भी चूक जाए...!
तो उस बूढ़े ने कहा, जब अभी मन इतना कंपता है, तो निशाना तुम्हारा अचूक नहीं हो सकता। और जहां भय है, वहां क्षत्रिय कभी पैदा नहीं होता है। उस बूढ़े ने कहा, जहां भय है, वहां क्षत्रिय कभी पैदा नहीं होता है। वहां धनुर्धर के जन्म की संभावना नहीं है। भयभीत किस चीज से हो? और अगर भय है, तो मन में कंपन होंगे ही, कितने ही सूक्ष्म हों, कितने ही सूक्ष्म हों, मन में कंपन होंगे ही।
अडोल्फ हिटलर -- अगर तुम्हारे देश का कोई शत्रु न हो तो झूठा शत्रु पैदा रखो, लेकिन बनाए रखो। जब तक शत्रु है तब तक देश इकट्ठा रहता है, मजबूत रहता है। जैसे ही शत्रु न हुआ वैसे ही देश ढीला पड़ जाता है, सुस्त हो जाता है। अगर सच्चा शत्रु हो तो सौभाग्य; अगर सच्चा शत्रु न हो तो झूठी ही अफवाहें उड़ाए रखो, डराए रखो लोगों को।
स्वर्ग-नरक
कथा :
बक, इंग्लैंड का एक बहुत बड़ा विचारक था। वह ऐसे नास्तिक था, लेकिन चर्च जाता था। मित्रों ने कई बार उससे कहा भी कि तुम चर्च किसलिए जाते हो? क्योंकि तुम नास्तिक हो!
ठीक ऐसी ही बात कभी डेविड ह्यूम से भी किसी ने पूछी थी। डेविड ह्यूम भी एक नास्तिक था, बड़े से बड़ा इस जगत में जो हुआ, कीमती से कीमती। वह भी लेकिन रविवार को चर्च जरूर जाता था। तो ह्यूम ने जो उत्तर दिया, वही बक ने भी उत्तर दिया था।
बक ने कहा कि चर्च में जो कहा जाता है, उसमें मेरा कोई विश्वास नहीं। लेकिन वह जो आदमी कहता है, उसकी आंखों में मैं झांकता हूं, तो मुझे लगता है कि वह आदमी किसी भीतरी विश्वास से कह रहा है। और सप्ताह में एक दिन ऐसे आदमी की आंख में झांक लेना उचित है, जिसे भीतरी कोई स्वर्ग का अनुभव हो रहा है। वह जो कहता है, उसमें मुझे कोई भरोसा नहीं है कि वह आदमी जो कह रहा है, वह ठीक हो सकता है। उसके सिद्धांतों को मैं तर्कयुक्त नहीं मानता। लेकिन फिर भी सप्ताह में मैं एक ऐसे आदमी की आंख में झांक लेना चाहता हूं, जो भीतर आश्वस्त है। उसकी सुगंध!
बक ने एक दिन, चर्च में जो फकीर बोलता था, उससे पूछा कि मैं तुमसे पूछना चाहता हूं। उस दिन उसने बाइबिल के एक वचन की व्याख्या करते हुए कहा कि भले लोग, जो परमात्मा में विश्वास करते हैं, वे स्वर्ग को उपलब्ध होते हैं। बक ने उससे पूछा कि आप कहते हैं, भले लोग, जो परमात्मा में विश्वास करते हैं, वे स्वर्ग को उपलब्ध होते हैं। तो मैं पूछना चाहता हूं कि बुरे लोग, जो परमात्मा में विश्वास करते हैं, वे स्वर्ग को उपलब्ध होते हैं या नहीं? और यह भी पूछना चाहता हूं कि भले लोग, जो परमात्मा में विश्वास नहीं करते हैं, वे स्वर्ग को उपलब्ध होते हैं या नहीं?
वह फकीर साधारण फकीर नहीं था, ईमानदार आदमी था। उसने कहा, उत्तर देना मुश्किल है, जब तक कि मैं परमात्मा से न पूछ लूं। क्योंकि इसका मुझे कुछ भी पता नहीं। रुको, सात दिन मैं प्रार्थना करूं, फिर उत्तर दे सकता हूं। क्योंकि तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया। अगर मैं यह कहूं कि भले लोग, जो परमात्मा में विश्वास नहीं करते, नर्क जाते हैं, तो भलाई बेमानी हो जाती है, मीनिंगलेस हो जाती है। और अगर मैं यह कहूं कि भले लोग, जो परमात्मा में विश्वास नहीं करते हैं, वे भी स्वर्ग को उपलब्ध हो जाते हैं, तो परमात्मा बेमानी हो जाता है। उसमें विश्वास का कोई अर्थ नहीं रहता। तो रुको।
लेकिन वह फकीर सात दिन सो नहीं सका। सब तरह की प्रार्थनाएं कीं, लेकिन कोई उत्तर न मिला।
सातवां दिन आ गया। सुबह ही आठ बजे बक मौजूद हो जाएगा और पूछेगा कि बोलो! तो वह पांच बजे ही चर्च में चला गया, हाथ जोड़कर बैठकर प्रार्थना करता रहा। प्रार्थना करते-करते उसे नींद लग गई। उसने एक स्वप्न देखा। वही जो सात दिन से उसके प्राणों में चल रहा था, वही स्वप्न बन गया।
उसने स्वप्न देखा कि वह ट्रेन में बैठा हुआ है, तेजी से ट्रेन जा रही है। उसने लोगों से पूछा, यह ट्रेन कहां जा रही है? उन्होंने कहा, यह स्वर्ग जा रही है। उसने कहा, अच्छा हुआ; मैं देख ही लूं। सुकरात कहां है? आदमी अच्छा था, लेकिन ईश्वर में भरोसा नहीं था। वे सारे लोग कहां हैं?
स्वर्ग पहुंच गई ट्रेन। बड़ी निराशा हुई लेकिन स्वर्ग को देखकर। ऐसी आशा न थी। सब उजड़ा-उजड़ा मालूम पड़ता था। सब रूखा-रूखा मालूम पड़ता था। रौनक न थी। पूछा, यही स्वर्ग है न? लोगों ने कहा, यही स्वर्ग है। पूछा कि सुकरात कहां? बहुत खोज-बीन की, पता चला कि नहीं हैं। बहुत घबड़ाया फकीर। स्टेशन भागा हुआ आया और कहा कि नर्क की गाड़ी?
नर्क की गाड़ी में बैठा और नर्क पहुंचा। लेकिन बड़ी मुश्किल में पड़ा। देखा कि बड़ी रौनक है। जैसी स्वर्ग में होने की आशा थी, ऐसी रौनक है। जैसी नर्क में उदासी होनी चाहिए थी, वैसी स्वर्ग में थी। बड़ी चिंता हुई उसे कि कुछ भूल-चूक तो नहीं हो रही है! स्टेशन पर उतरा, तो बड़ी ही रौनक है; रास्तों से निकला, तो बड़ा काम चल रहा है, बड़ा आनंद है; कहीं गीत है, कहीं कुछ है, कहीं कुछ है।
उसने पूछा कि सुकरात, यहां हैं? उन्होंने कहा, यहां हैं। उसने कहा, लेकिन यह नर्क है! सुकरात नर्क में? जिस आदमी से उसने पूछा था, उसने कहा कि चलो, मैं तुम्हें सुकरात से मिला देता हूं। एक खेत में सुकरात गङ्ढा खोद रहा था। उसने सुकरात से पूछा कि तुम सुकरात और यहां नर्क में? अच्छे आदमी और नर्क में? तो सुकरात हंसने लगा और उसने कहा, अभी तक तुम अपनी बाइबिल से गलत व्याख्या किए जा रहे हो। हम कहते हैं, अच्छा आदमी जहां जाता है, वहां स्वर्ग आता है; बुरा आदमी जहां जाता है, वहां नर्क आता है।
इस संसार में कांटे ही कांटे हैं। फूल तो केवल वे ही देख पाते हैं जो स्वयं फूल बन जाते हैं।
एक झेन फकीर के पास पागल का सम्राट मिलने गया था। सम्राट, सम्राट की अकड़! झुका भी तो झुका नहीं। औपचारिक था झुकना। फकीर से कहा -- मिलने आया हूं, सिर्फ एक ही प्रश्न पूछना चाहता हूं। वही प्रश्न मुझे मथे डालता है। बहुतों से पूछा है; उत्तर संतुष्ट करे कोई, ऐसा मिला नहीं। आप की बड़ी खबर सुनी है कि आपके भीतर का दीया जल गया है। आप, निश्चित ही आशा लेकर आया हूं कि मुझे तृप्त कर देंगे।
फकीर ने कहा -- व्यर्थ की बातें छोड़ो, प्रश्न को सीधा रखो। दरबारी औपचारिकता छोड़ो, सीधी-सीधी बात करो, नगद!
सम्राट थोड़ा चौंका: ऐसा तो कोई उस से कभी बोला नहीं था! थोड़ा अपमानित भी हुआ, लेकिन बात तो सच थी। फकीर ठीक ही कह रहा था कि व्यर्थ लंबाई में क्यों जाते हो? कान को इतना उल्टा क्यों पकड़ना? बात करो सीधी, क्या है प्रश्न तुम्हारा?
सम्राट ने कहा -- प्रश्न मेरा यह है कि स्वर्ग क्या है और नर्क क्या है? मैं बूढ़ा हो रहा हूं और यह प्रश्न मेरे ऊपर छाया रहता है कि मृत्यु के बाद क्या होगा -- स्वर्ग या नर्क?
फकीर के पास उसके शिष्य बैठे थे, उस ने कहा: सुनो, इस बुद्धू की बातें सुनो! कभी आईने में अपनी शक्ल देखी? यह शक्ल लेकर और ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं! और तुम अपने को सम्राट समझते हो? तुम्हारी हैसियत भिखमंगा होने की भी नहीं है!
यह भी कोई उत्तर था! सम्राट तो एकदम आगबबूला हो गया। म्यान से उसने तलवार निकाल ली। नंगी तलवार, एक क्षण और कि फकीर की गर्दन धड़ से अलग हो जाएगी। फकीर हंसने लगा और उसने कहा -- यह खुला नर्क का द्वार!
एक गहरी चोट -- एक अस्तित्वगत उत्तर 'यह खुला नर्क का द्वार!'; सम्राट समझा। तत्क्षण तलवार म्यान में भीतर चली गई। फकीर के चरणों पर सिर रख दिया । उत्तर तो बहुतों ने दिए थे -- शास्त्रीय उत्तर, मगर अस्तित्वगत उत्तर, ऐसा उत्तर कि प्राणों में चुभ जाए तीर की तरह, ऐसा स्पष्ट कर दे कोई कि कुछ और पूछने को शेष न रह जाए -- 'यह खुला नर्क का द्वार!' फकीर के चरणों में झुक गया। अब इस झुकने में औपचारिकता न थी दरबारीपन न था। अब यह झुकना हार्दिक था ।
फकीर ने कहा -- 'और यह खुला स्वर्ग का द्वार!' पूछना है कुछ और? और ध्यान रखो, स्वर्ग और नर्क मरने के बाद नहीं है; स्वर्ग और नर्क जीने के ढंग हैं, शैलियां हैं। कोई चाहे यहीं स्वर्ग में रहे, कोई चाहे यहीं नर्क में रहे। कोई चाहे सुबह स्वर्ग में रहे, सांझ नर्क में रहे; कोई चाहे क्षण-भर पहले स्वर्ग और क्षण भर बाद नर्क।
मनुष्य वह है जो मनन कर सके; जिसके सामने विकल्प खड़े हों तो मनन पूर्वक चुन सके! ध्यानपूर्वक चुन सके।
महावीर के जीवन में बड़ी प्यारी कथा है: कि महावीर खड़े हैं एक वन-प्रांत में, ध्यानस्थ। उनका बचपन का एक साथी, जो सम्राट है, उनके दर्शन को आ रहा है। उसने राह में एक दूसरे सम्राट को भी जो महावीर का संन्यासी हो गया है, उसको एक शिलाखंड के पास तपश्चर्यारत खड़ा देखा। तीनों बचपन के साथी हैं। उसके मन में बड़ा ही पश्चात्ताप होने लगा कि मैं बड़ा पीछे रह गया हूं। यह सम्राट प्रशेनचंद्र खड़ा है--कितना शांत, कितना मौन, कितने अपूर्व आनंद में मग्न! और एक मैं हूं कि अभी भी रुपये-पैसे गिन रहा हूं। और महावीर परम अवस्था को उपलब्ध हो गए हैं! मैं अभागा हूं। उसके मन में बड़े त्याग का भाव उठा।
जब वह महावीर के पास गया तो उसने पूछा कि मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। मैंने सम्राट प्रशेनचंद्र को राह में तपश्चर्या करते देखा, वे आपके शिष्य हो गए हैं; उन्हें देख कर मेरे मन में त्याग के बड़े भाव उठे। एक प्रश्न पूछना है: जब मैं प्रशेनचंद्र के सामने खड़ा था, अगर उनकी उसी समय मृत्यु हो जाए, तो उनका कहां जन्म होगा?
महावीर ने कहा, अगर उसी वक्त मृत्यु हो तो वे सातवें नरक में पैदा होंगे।
सम्राट तो हैरान हो गया! इतने शांत, इतने मौन, इतने ध्यानस्थ वे खड़े थे--और मौत हो तो सातवें नरक में जन्म होगा!
महावीर ने कहा, चिंतित मत होओ। लेकिन अब अगर मृत्यु हो--अभी कोई घड़ी भर ही बीती है दोनों के बीच, घटनाओं में--तो वे सातवें स्वर्ग में प्रवेश पाएंगे।
सम्राट ने कहा, यह तो बड़ी पहेली हो गई, आप सुलझा कर कहें।
महावीर ने कहा, तुम्हारे पहले तुम्हारे सैनिक प्रशेनचंद्र के पास से गुजरे थे। उन्होंने कहा, देखो ये मूरख खड़ा है। ये यहां आंख बंद किए खड़े हैं और जिन मंत्रियों के हाथ में ये राज्य सौंप आया है--इसके बेटे तो अभी छोटे हैं, नाबालिग हैं--वे मंत्री सब लूट-खसोट कर रहे हैं और ये मूरख की तरह यहां खड़े हैं! सैनिक, साधारण सैनिक बात करते हुए निकल गए। प्रशेनचंद्र ने यह सुना कि मंत्री लूट-खसोट कर रहे हैं! जिन पर मैंने भरोसा किया, वे धोखा दे रहे हैं! क्षण भर को भूल गया कि मैं त्यागी हूं। भूल ही गया, बेहोशी छा गई, मन में खयाल उठा कि मैं अभी जिंदा हूं, तुमने समझा क्या है, नासमझों! अभी मैं जिंदा हूं, सिर धड़ से अलग कर दूंगा मंत्रियों का! और उसका हाथ तलवार पर चला गया। कोई तलवार नहीं है अब, लेकिन पुरानी आदत। म्यान से तलवार खींच ली--सपने में। और जैसी उसकी आदत थी सदा की, जब भी वह क्रोध में आ जाता--जैसे तुम्हारी या बहुतों की आदत होती है, कोई अपना सिर खुजलाता है, कोई अपनी चैंथी खुजलाता है--उसकी आदत थी कि जब भी वह क्रोध में आ जाता, तो अपने मुकुट को सम्हालता था। उसने मुकुट को सम्हालने की कोशिश की--वहां सिर घुटा था, वहां कुछ भी न था, मुकुट वगैरह कुछ भी न था! उसे होश आ गया कि यह मैं क्या कर रहा हूं? न कोई तलवार है और न अब मैं सम्राट प्रशेनचंद्र हूं! मैं तो सब छोड़ चुका! मेरे मन में यह कैसे हत्या का विचार उठा?
महावीर ने कहा, जब तुम प्रशेनचंद्र के सामने खड़े थे, तब भीतर उसने तलवार खींची हुई थी, उसी समय मरता तो सातवें नरक में जाता। अब उसे होश फिर आ गया है, वह हंस रहा है, उसने अपनी मूढ़ता पहचान ली है, इस समय मर जाए तो सातवें स्वर्ग में उत्पन्न होगा।
प्रत्येक कृत्य निर्णायक है। और कृत्य का निर्णय तुम्हारे अंतस में है, तुम्हारे बाहर नहीं।
जिस मनुष्य ने पहले आश्रम ( ब्रह्मचर्य ) में विद्या नहीं अर्जित किया , दूसरे आश्रम ( गृहस्थ ) में धन नहीं अर्जित किया , तीसरे आश्रम ( वानप्रस्थ ) में पुण्य नहीं अर्जित किया वह मनुष्य चौथे आश्रम ( सन्यास ) में क्या अर्जित करेगा ?
One who has not earned Vidya in the first Ashrama (Brahmacharya). One who has not earned wealth in second Ashrama (Grihastha). One who has not earned Punya in third Ashrama (Vaanprastha). What will he do in the forth Ashrama (Sanyasa) ?
भावना
कथा :
टाल्सटाय ने एक कहानी लिखी है। लिखा है कि एक आदमी का बेटा बहुत दिन से घर के बाहर चला गया। बाप ही क्रोधित हुआ था, इसलिए चला गया था। फिर बाप बूढ़ा होने लगा। बहुत परेशान था। अखबारों में खबर निकाली, संदेशवाहक भेजे। फिर उस बेटे का पत्र आ गया कि मैं आ रहा हूं। आपने बुलाया, तो मैं आता हूं। मैं फलां-फलां दिन, फलां-फलां ट्रेन से आ जाऊंगा।
स्टेशन दूर है, देहात में रहता है बाप। अपनी बग्घी कसकर वह उसे लेने आया। मालगुजार है, जमींदार है। लेकिन उसके आने पर पता चला कि ट्रेन आ चुकी है। वह सोचता था चार बजे आएगी, वह दो बजे आ गई। तो धर्मशाला में ठहरा जाकर। अब अपने बेटे की तलाश करे कि वह कहां गया!
धर्मशाला में कोई जगह खाली नहीं है। धर्मशाला के मैनेजर को उसने कहा कि कोई भी जगह तो खाली करवाओ ही। वह जमींदार है। तो उसने कहा कि अभी एक कोई भिखमंगा-सा आदमी आकर ठहरा है इस कमरे में--उसको निकाल बाहर कर दें? उसने कहा कि निकाल बाहर करो। उसे पता नहीं कि वह उसका बेटा है। उसे निकाल बाहर कर दिया गया। वह अपने कमरे में आराम से...। उसने आदमी भेजे कि गांव में खोजो।
वह बेटा बाहर सीढ़ियों पर बैठा है। सर्द रात उतरने लगी। उस गरीब लड़के ने बार-बार कहा कि मुझे भीतर आ जाने दें,बर्फ पड़ रही है और मुझे बहुत दर्द है पेट में। पर उसने कहा कि यहां गड़बड़ मत करो; भाग जाओ यहां से; रात मेरी नींद हराम मत कर देना। फिर रात पेट की तकलीफ से वह लड़का चीखने लगा। तो उसने नौकरों से उसे उठवाकर सड़क पर फिंकवा दिया।
फिर सुबह वह मर गया। सुबह जब वह जमींदार उठा, तो वह लड़का मरा हुआ पड़ा था। लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। लोग कह रहे थे, कौन है, क्या है, कुछ पता लगाओ। किसी ने उसके खीसे में खोज-बीन की तो चिट्ठी मिल गई। तब तो उन्होंने कहा कि अरे, वह जमींदार जिसको खोज रहा है, यह वही है। यह जमींदार को लिखी गई चिट्ठी-पत्री, यह अखबारों की कटिंग! यह उसका लड़का है।
वह जमींदार बाहर बैठकर अपना हुक्का पी रहा है। जैसे ही उसने सुना कि मेरा लड़का है, एकदम भावना आ गई। अब वह छाती पीट रहा है, अब वह रो रहा है। अब उस लड़के को--मरे को--कमरे के अंदर ले गया है। जिंदा को रात नहीं ले गया। मरे को दिन में कमरे के अंदर ले गया। अब उसकी सफाई की जा रही है--मरे पर। मरे को नए कपड़े पहनाए जा रहे हैं! वह जमींदार का बेटा है। अब उसको घर ले जाने की तैयारी चल रही है। और रात उसने कई बार प्रार्थना की, मुझे भीतर आने दो,तो उसको नौकरों से सड़क पर फिंकवा दिया। यह भावना है?
नहीं, यह भावना का धोखा है। भावना मेरे-तेरे से बंधी नहीं होती, भावना भीतर का सहज भाव है।
टाल्सटाय ने जब यह कहानी लिखी, तो उसने अपने संस्मरणों में लिखा है कि यह कहानी मेरी एक अर्थों में आटोबायोग्राफी भी है। यह मेरा आत्मस्मरण भी है। क्योंकि खुद टाल्सटाय शाही परिवार का था।
उसने लिखा है, मेरी मां मैं समझता था बहुत भावनाशील है। लेकिन यह तो मुझे बाद में उदघाटन हुआ कि उसमें भावना जैसी कोई चीज ही नहीं है। क्यों समझता था कि भावना थी? क्योंकि थिएटर में उसके चार-चार रूमाल भीग जाते थे आंसुओंसे। जब नाटक चलता और कोई दुख, ट्रेजेडी होती, तो वह ऐसी धुआंधार रोती थी कि नौकर रूमाल लिए खड़े रहते--शाही घर की लड़की थी--तत्काल रूमाल बदलने पड़ते थे। चार-चार, छह-छह, आठ-आठ रूमाल एक नाटक, एक थिएटर में भीग जाते। तोटाल्सटाय ने लिखा है कि मैं उसके बगल में बैठकर देखा करता था, मेरी मां कितनी भावनाशील!
लेकिन जब मैं बड़ा हुआ तब मुझे पता चला कि उसकी बग्घी बाहर छह घोड़ों में जुती खड़ी रहती थी और आज्ञा थी कि कोचवान बग्घी पर ही बैठा रहे। क्योंकि कब उसका मन हो जाए थिएटर से जाने का, तो ऐसा न हो कि एक क्षण को भी कोचवान ढूंढ़ना पड़े। बाहर बर्फ पड़ती रहती और अक्सर ऐसा होता कि वह थिएटर में नाटक देखती, तब तक एक-दो कोचवान मर जाते। उनको फेंक दिया जाता, दूसरा कोचवान तत्काल बिठाकर बग्घी चला दी जाती। वह औरत बाहर आकर देखती कि मुर्दे कोचवान को हटाया जा रहा है और जिंदा आदमी को बिठाया जा रहा है। और वह थिएटर के लिए रोती रहती, वह थिएटर में जो ट्रेजेडी हो गई!
तो टाल्सटाय ने लिखा है कि एक अर्थ में यह कहानी मेरी आटोबायोग्राफिकल भी है, आत्म-कथ्यात्मक भी है। ऐसा मैंने अपनी आंख से देखा है। तब मुझे पता चला कि भावना कोई और चीज होगी। फिर यह चीज भावना नहीं है।
I really had a lot of dreams when I was a kid, and I think a great deal of that grew out of the fact that I had a chance to read a lot -― Bill Gates
धीरे-धीरे
कथा :
एक सम्राट अपने वजीर पर नाराज हो गया। उसने उसे एक मीनार पर बंद करवा दिया। वहां से भागने का कोई उपाय न था। अगर वह कूदे भी तो प्राण निकल जाएं। बड़ी ऊंची मीनार थी। उसकी पत्नी बड़ी चिंतित थी, कैसे उसे बचाया जाए? वह एक फकीर के पास गयी। फकीर ने कहा कि जिस तरह हम बचे, उसी तरह वह भी बच सकता है। पत्नी ने पूछा कि आप भी कभी किसी मीनार पर कैद थे? उसने कहा कि मीनार पर तो नहीं, लेकिन कैद थे। और हम जिस तरह बचे, वही रास्ता उसके काम भी आ जाएगा। तुम ऐसा करो...।
उस फकीर ने अपने बगीचे में जाकर एक छोटा सा कीड़ा उसे पकड़कर दे दिया। कीड़े की मूंछों पर शहद लगा दी और कीड़े की पूंछ में एक पतला महीन रेशम का धागा बांध दिया।
पत्नी ने कहा, आप यह क्या कर रहे हैं? इससे क्या होगा?
उसने कहा, तुम फिकर मत करो। ऐसे ही हम बचे। इसे तुम छोड़ दो मीनार पर। यह ऊपर की तरफ बढ़ना शुरू हो जाएगा। क्योंकि वह जो मधु की गंध आ रही है--मूंछों पर लगी मधु की गंध--वह उसकी तलाश में जाएगा। और गंध आगे बढ़ती जाएगी जैसे-जैसे कीड़ा आगे बढ़ेगा, तलाश उसे करनी ही पड़ेगी। और उसके पीछे बंधा हुआ धागा तेरे पति तक पहुंच जाएगा।
पर पत्नी ने कहा, इस पतले धागे से क्या होगा?
फकीर ने कहा, घबड़ा मत। पतला धागा जब ऊपर पहुंच जाए, तो पतले धागे में थोड़ा मजबूत धागा बांधना। फिर मजबूत धागे में थोड़ी रस्सी बांधना। फिर रस्सी में मोटी रस्सी बांधना। उस मोटी रस्सी से तेरा पति उतर आएगा।
उस छोटे से कीड़े ने पति को मुक्ति दिलवा दी। एक बड़ा महीन धागा! लेकिन उस धागे के सहारे और मोटे धागे पकड़ में आते चले गए।
व्यापार
कथा :
एक गांव में एक महाकंजूस था। यहूदी। या कहें मारवाड़ी। उसने कभी एक पैसा दान न दिया। गांव में भिखारी भी उसके घर की तरफ नहीं जाते थे। अगर कोई नया भिखारी उसके घर की तरफ जाता, तो लोग समझ जाते कि नया भिखारी है। जिसको थोड़ा भी पता है, वह कभी भीख मांगने उसके द्वार पर न जाएगा। उसने कभी दिया ही नहीं। वह भिखारी से भी कुछ छीन सकता था। देना उसकी आदत न थी।
लेकिन एक दिन वह गांव के धर्मगुरु के द्वार पर पहुंचा। यहूदी धर्मगुरु। और उसने कहा कि आज मेरे लिए कुछ प्रार्थना करनी होगी। धर्मगुरु ने सोचा कि अब प्रार्थना करवाने आया है, तो कुछ दान करवा लेने का मौका है। लेकिन यहूदी कंजूस भी सोच-विचार कर ही आया था। धर्मगुरु ने पूछा, क्या प्रार्थना करनी है? उस कंजूस ने कहा कि मेरी पत्नी बीमार पड़ी है, मर जाए, यह प्रार्थना करनी है। धर्मगुरु ने कहा, दान क्या दोगे? उस कंजूस ने कहा कि अगर जीवन मांगता, तब तो दान मांगना उचित भी था। मौत मांग रहा हूं; इसके लिए भी दान देना पड़ेगा? कुछ तो संकोच करो, कुछ तो दया करो -- वह खुद मौत मांगते संकोच नहीं कर रहा है।
धर्मगुरु ने देखा कि इतना आसान नहीं है मामला। उसने कहा, कुछ भी हो, मौत हो कि जीवन हो, प्रार्थना तो तभी हम करेंगे जब कुछ दान हो। उसने कहा, अच्छा एक रुपया दे देंगे। बहुत धर्मगुरु ने जोर डाला तो उसने कहा, दो रुपया दे देंगे। ऐसे कुछ बात बनती न दिखी तो धर्मगुरु ने कहा, सुनो! मौत की प्रार्थना की नहीं जा सकती। कोई उल्लेख ही नहीं है शास्त्र में कि किसी की मौत के लिए प्रार्थना कभी की गयी हो। परमात्मा से लोग जीवन की प्रार्थना करते हैं, मौत की नहीं। तुम मुझे क्षमा करो। यह काम मुझसे न हो सकेगा।
महाकंजूस ने कहा, छोड़ो भी ये बातें कानूनी, पांच रुपए दे सकता हूं। धर्मगुरु बोला कि नहीं, यह हो ही नहीं सकता, प्रार्थना तो जीवन की ही हो सकती है। लेकिन एक तरकीब तुम्हें मैं बता देता हूं--क्योंकि कानून में सब जगह तरकीब तो होती ही है -- शास्त्रों में ऐसा कहा है कि अगर कोई आदमी मंदिर को दान का वचन दे और तीन महीने के भीतर दान न दे, तो उसकी पत्नी मर जाती है -- दंडस्वरूप। तो तुम दान की घोषणा कर दो। देने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। पत्नी तीन महीने के भीतर मर जाएगी। तो उस महाकंजूस ने कहा कि जब देना ही नहीं है, तो उसने कहा तब ठीक है, तब एक लाख रुपया दान दे देंगे। जब देना ही नहीं है! धर्मगुरु ने कहा, जब देना ही नहीं है तो क्या लाख क्या दस लाख? अरे, दस लाख ही कह दो! थोड़ा सकुचाया, क्योंकि कल्पना में भी देना कष्टकर मालूम होता है। उसने कहा, दस लाख ज्यादा हो जाएंगे। पर धर्मगुरु ने कहा, जब देना ही नहीं है, तो जैसा एक लाख वैसा दस लाख। वह बड़े बेमन से राजी हुआ और घर लौट गया ।
पत्नी मरी तो नहीं; बीमार थी, ठीक हो गयी। वह बड़ा चकित हुआ। तीन महीने पूरे हुए, वह वापस आया। उसने कहा कि यह नियम तो काम नहीं किया। धर्मगुरु ने कहा कि देखो, शास्त्र कहता है--दंडस्वरूप, as a punishment । मगर तुम तो चाहते हो कि पत्नी मर जाए। इसलिए यह तुम्हें दंड तो न होगा, यह तो पुरस्कार हो जाएगा। इसलिए प्रार्थना व्यर्थ गयी। अगर तुम सच में ही चाहते हो पत्नी मर जाए, तो तुम अब ऐसा करो कि जाकर बाजार से कुछ हीरे-जवाहरात खरीदो, कुछ सुंदर साड़ियां खरीदो, पत्नी को भेंट करो। पत्नी तुम्हारे प्रति इतनी प्रेम से भर जाए और तुम भी इतने प्रेम से भर जाओ कि तुम्हारे प्राण कहने लगें कि नहीं, अब मत मार; हे परमात्मा, अब मत मारना! तब वह मारेगा, कि तभी तो दंड हो सकता है। नहीं तो नियम...।
यह बात जंची। पर उसने कहा, हीरे-जवाहरात मैंने कभी खरीदे नहीं। धर्मगुरु ने कहा, क्या हर्ज है, पत्नी तो मर ही जाएगी, तुम बेच देना। थोड़ा लाभ ही भला हो जाए, नुकसान तो क्या होगा! चीजों के दाम तो रोज बढ़ते ही जाते हैं।
यह बात जंची। वह गया। उसने हीरे-जवाहरात खरीदे। साड़ियां खरीदीं बहुमूल्य। कभी खरीदकर घर लाया न था। पत्नी तो हैरान हो गयी कि इसमें ऐसा रूपांतरण हुआ। निश्चित ही धर्मगुरु की कृपा से हुआ होगा। मंदिर गया, इसीलिए हुआ होगा। उसने भी पहली दफा उसे प्रेम से देखा। और पत्नी उसे इतना प्रेम करने लगी कि उस कंजूस को भी पहली दफा एहसास हुआ कि यह पत्नी तो बड़ी अनूठी है। मैं नाहक ही इसके मरने की प्रार्थना करता था। तब वह डरा। अब उसके मन में यह होने लगा कि कहीं मर न जाए। और तीन महीने करीब होने के पास आ रहे थे। और पत्नी बीमार पड़ गयी। तो वह घबड़ाया हुआ पहुंचा धर्मगुरु के पास। उसने कहा, यह तो मुसीबत हो गयी। नियम काम करता मालूम पड़ रहा है; पत्नी बीमार पड़ गयी। अब कैसे बचाएं उसे? धर्मगुरु ने कहा कि वह जो दस लाख दान दिया था, वह दान दे दो। अब तो बचने का और कोई उपाय नहीं।
जिनको तुम मंदिर कह रहे हो, वे तुम्हारी ही दुकान के आसपास बड़ी दुकानें हैं। वहां भी व्यापार के वही नियम काम कर रहे हैं।
मैं वृद्धों के विवाद को बडे आनंद से सुनता था कि तभी एक संन्यासी का भी आगमन हो गया था। वे इस पर विचार करते थे कि कितने-कितने जन्मों की कितनी-कितनी तपश्चर्या से मुक्ति उपलब्ध होती है। संन्यासी भी इस विवाद में कूद पडे थे। निश्चय ही वे ज्यादा अधिकारी थे और इसलिए उनकी आवाज भी सबसे ज्यादा तेज थी। शास्त्रों की दुहाइयां दी जा रही थीं और कोई भी किसी की सुनने या मानने को तैयार नहीं था। एक वृद्ध का कहना था कि सैकडों जन्म के कठोर तप से मुक्ति प्राप्त होती है। दूसरे का विचार था कि मुक्ति के लिए तप की या सैकडों जन्मों की कोई बात ही नहीं। वह तो प्रभु-कृपा से कभी भी मिल सकती है। तीसरे का कहना था कि चूंकि अमुक्ति भ्रम है, इसलिए तप से उसे नष्ट करने का सवाल ही नहीं है। वह तो ज्ञान की एक झलक में उसी भांति तिरोहित हो जाती है जैसे रज्जु में भासता सर्प विलीन हो जाता है।
फिर किसी ने मुझ से पूछाः 'आप का क्या ख्याल है? ' मैं क्या कहता? इसीलिए तो एक कोने में चुपचाप दबा बैठा था कि कहीं किसी की दृष्टि मुझ पर भी न पड जाए। शास्त्रों का मुझे कोई ज्ञान नहीं है। सौभाग्य से उस दिशा में जाने की भूल ही मैंने नहीं की। अतः पूछने पर भी मैं चुप ही रह गया।
लेकिन थोडी देर बाद फिर किसी ने पूछाः 'आप कुछ क्यों नहीं बोलते हैं? ' मैं बोलता भी तो क्या बोलता? जहां इतने बोलने वाले हों, वहां मैं अकेला ही तो सुननेवाला था। मैं फिर भी चुप ही रह गया। शायद मेरी यह चुप्पी ही बोलने लगी और उन सबका ध्यान अंततः मेरी ही ओर आ गया। शायद वे सब थक गए थे और विश्राम लेना चाहते थे।
मैं जब फंस ही गया था तो मुझे कुछ न कुछ तो कहना ही था। मैंने एक कहानी कहीः एक गांव में ऐसी परंपरा थी कि जब भी किसी युवक का विवाह होता तो उसे या वरपक्ष को विवाह में कम से कम पांच हजार रुपये खर्च करने पडते थे। वह गांव बडा धनी था और इससे कम में वहां विवाह नहीं होते थे। उस गांव के शास्त्रों में भी ऐसा ही लिखा था। उन शास्त्रों को तो कभी किसी ने नहीं प.ढा था, लेकिन गांव के पुरोहित का ऐसा कहना था। पुरोहित से विवाद कौन करता? उसे तो अतीत की किसी मातृभाषा में लिखे सारे शास्त्र कंठस्थ थे। शास्त्र तो सदा से ही स्वतः प्रमाण रहे हैं। उनमें जो है, वही सत्य है। सत्य का और लक्षण ही क्या है? शास्त्र में होना ही तो सत्य का लक्षण है!
लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि एक युवक ने केवल पांच सौ रुपयों में ही विवाह कर डाला और उसकी बहू भी आ गई। निश्चय ही वह युवक कुछ विद्रोही रहा होगा, अन्यथा ऐसा कैसे कर सकता था। गांव के लोगों ने उससे पूछाः 'तूने कितने रुपये खर्च किए? ' वह बोलाः 'पांच सौ।' फिर तो गांव की पंचायत बैठी और पंचों ने उससे कहाः 'गलत है। बिना पांच हजार खर्च किए तो विवाह हो ही नहीं सकता।' वह युवक हंसा और बोलाः 'पांच सौ से विवाह हो सकता है या नहीं, यह व्यर्थ बहस तुम करो। मुझको तो बहू मिल गई है और उसका सुख प्राप्त है।'
यह कह कर वह युवक अपने घर चल दिया था।
मैं भी उठा और उन वृद्धों से बोलाः 'पंचो, नमस्कार। आप बहस जारी रखें, मैं भी अब चलता हूं।'
कारागृह और कोई बड़ा नुकसान नहीं कर सकता है, एक ही नुकसान कर सकता है कि पंख उड़ना भूल जाएं।
एक बहुत बड़ा धनपति, रथचाइल्ड, बहुत परेशान था। अनेक तरह के लोग, अनेक तरह की चीजें बेचना चाहते--इंश्योरेंस के एजेंट, हजार तरह के सेल्समैन दरवाजे पर दस्तक देते। एक सेल्समैन महीनों से आता था। वह उसे कई दफा धक्के देकर निकलवा चुका था। लेकिन वह फिर-फिर आ जाता था। वह चाहता था, उसके धंधे का विज्ञापन, पत्रों में छापने के लिए। आखिर रथचाइल्ड ने कहाः 'आज कोई मैं चालीस साल से धंधे में हूं--और बिना विज्ञापन के। तुम देख रहे हो कि मैंने बहुत कमाया है। और जो भी मैं बनाता हूं, वह बिकता है। अब मुझे विज्ञापन की कोई जरूरत नहीं है। विज्ञापन उनके लिए हैं, जिनकी चीजें बिकती न हों। तुम्हें हजार दफे कह दिया, तुम बार-बार मत आओ।'
सांझ का वक्त था, तभी पास के पहाड़ पर चर्च की घंटियां बजीं। उस विज्ञापन मांगने वाले ने कहाः 'सुनें, क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि यह चर्च कितने साल से है--इस पहाड़ पर?' रथचाइल्ड ने कहाः 'होगा कोई पांच सौ साल पुराना।' पर उसने कहाः 'यह चर्च अभी भी रोज शाम घंटियां बजाता है, और खबर देता है कि मैं हूं। और आप केवल चालीस साल से धंधे में हैं। यह पांच सौ साल से धंधे में है; लेकिन विज्ञापन इसने बंद नहीं किया! जिस दिन इसकी घंटियां बंद होंगी, लोगों का जाना बंद हो जाएगा। लोग भूल जाएंगे कि मंदिर है अब।'
और कहते हैं, रथचाइल्ड प्रभावित हुआ और उसने विज्ञापन देना शुरू किया। उसको लगा कि भगवान की दुकान के लिए भी विज्ञापन की जरूरत होती है--घंटा बजाना पड़ता है!
घंटा बहुत पुराना विज्ञापन है। घंटा बजता रहता है, ताकि तुम्हें खबर रहे कि मंदिर है। बुलावा है कि आओ। अगर मंदिर घंटा बजाना बंद कर दें, तो तुम उन्हें भूल जाते हो।
पाप, पछतावा के अलावा कुछ नहीं देता है।
अशुद्ध देखना
कथा :
रामदास राम की कथा कह रहे हैं। कथा इतनी प्रीतिकर है, राम की कहानी इतनी प्रीतिकर है कि हनुमान भी सुनने आने लगे। हनुमान ने तो खुद ही आंखों से देखी थी सारी कहानी। लेकिन फिर भी कहते हैं, रामदास ने ऐसी कही कि हनुमान को भी आना पड़ा। खबर मिली तो वह सुनने आने लगे। बड़ी अदभुत थी। छिपे-छिपे भीड़ में बैठकर सुनते थे।
पर एक दिन खड़े हो गए, खयाल ही न रहा कि छिपकर सुनना है, छिपकर ही आना है। क्योंकि रामदास कुछ बात कहे जो हनुमान को जंची नहीं, गलत थी, क्योंकि हनुमान मौजूद थे। और यह आदमी तो हजारों साल बाद कह रहा है। तो उन्होंने कहा कि देखो, इसको सुधार कर लो।
रामदास ने कहा कि जब हनुमान लंका गए और अशोक वाटिका में गए, और उन्होंने सीता को वहा बंद देखा, तो वहा चारों तरफ सफेद फूल खिले थे। हनुमान ने कहा, यह बात गलत है, तुम इसमें सुधार कर लो। फूल लाल थे, सफेद नहीं थे। रामदास ने कहा, तुम बैठो, बीच में बोलने की जरूरत नहीं है। तुम हो कौन? फूल सफेद थे।
तब तो हनुमान को अपना रूप बताना पड़ा। हनुमान ही हैं! भूल ही गए सब। कहा कि मैं खुद हनुमान हूं। प्रगट हो गए। और कहा कि अब तो सुधार करोगे? तुम हजारों साल बाद कहानी कह रहे हो। तुम वहां थे नहीं मौजूद। मैं चश्मदीद गवाह हूं। मैं खुद हनुमान हूं, जिसकी तुम कहानी कह रहे हो। मैंने फूल लाल देखे थे, सुधार कर लो।
मगर रामदास जिद्दी। रामदास ने कहा, होओगे तुम हनुमान, मगर फूल सफेद थे। इसमें फर्क नहीं हो सकता। बात यहां तक बढ़ गई कि कहते हैं राम के दरबार में दोनों को ले जाया गया, कि अब राम ही निर्णय करें कि अब यह क्या मामला होगा,कैसे बात हल होगी! क्योंकि हनुमान खुद आंखों-देखी बात कह रहे हैं कि फूल लाल थे। और रामदास फिर भी जिद किए जा रहे हैं कि फूल सफेद थे।
राम ने हनुमान से कहा कि तुम माफी मांग लो। रामदास ठीक ही कहते हैं। फूल सफेद थे। हनुमान तो हैरान हो गए। उन्होंने कहा, यह तो हद्द हो गई, यह तो कोई सीमा के बाहर बात हो गई। मैंने खुद देखे, तुम भी वहां नहीं थे। और न ये रामदास थे और न तुम थे। तुमसे निर्णय मांगा यही भूल हो गई। मैं अकेला वहा मौजूद था। सीता से पूछ लिया जाए, वे मौजूद थीं।
सीता को पूछा गया। सीता ने कहा, हनुमान, तुम क्षमा मांग लो, फूल सफेद थे। संत झूठ नहीं कह सकते। होना मौजूद न होना सवाल नहीं है। अब रामदास ने जो कह दिया वह ठीक ही है। फूल सफेद ही थे। मुझे दुख होता है कि तुम्हें गलत होना पड़ रहा है, तुम्हीं अकेले एकमात्र गवाह नहीं हो, मैं भी थी, फूल सफेद ही थे। शानदार!
उसने कहा, यह तो कोई षडयंत्र मालूम होता है। कोई साजिश मालूम पड़ती है। मुझे भलीभांति याद है।
राम ने कहा, तुम ठीक कहते हो, तुम्हें फूल लाल दिखाई पड़े थे, क्योंकि तुम क्रोध से भरे थे। आंखों में खून था। जब आंखों में खून हो, क्रोध हो, तो सफेद फूल कैसे दिखाई पड़ सकते हैं?
जितनी लंबी झूल लेगा दांये तरफ, उतनी ही लंबी झूल लेगा बांये तरफ।
मुल्ला नसरुद्दीन और उसका जुड़वां भाई, दोनों का जन्मदिन था। तो दोनों ने सोचा, जायें किसी होटल में, खायें, पीयें, मौज करें। दोनों ने एक से कपड़े पहने, एक सी टाई लगाई, एक से रंग का कोट, एक सा जूता, एक सा रूमाल खोंसा, दोनों पहुंचे। मिठाई खाई, भोजन किया, शराबघर में पहुंचे। एक से ग्लासों में एक सी शराब बुलाई। एक शराबी सामने बैठा आंखें मीड़-मीड़ कर उनको देखने लगा। कई बार आंखें मीड़ के देखा, तो नसरुद्दीन हंसा। उसने कहा, 'परेशान न होओ। नशे के कारण तुम्हें गलत दिखाई पड़ रहा है, ऐसा मत सोचो। या एक का दो दिखाई पड़ रहा है, ऐसा भी मत सोचो। हम दो जुड़वां भाई हैं।' उस शराबी ने फिर से आंख मीड़ी और कहा कि 'तुम चारों!'
आंख में अगर मोह है, तुम जहां भी देखोगे वहीं संसार है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक ट्रेन से यात्रा कर रहा था। उसके पास ही बैठे एक युवक ने पूछा, महानुभाव क्या आप बता सकेंगे कि समय क्या हुआ है? नसरुद्दीन के हाथ में घड़ी थी, लेकिन उसने जल्दी अपनी घड़ी छिपा ली। और उसने कहा, माफ करिए; मैं न बता सकूंगा कि समय क्या है।
वह युवक थोड़ा हैरान हुआ। इस तरह की घटना कभी जीवन में उसके घटी न थी कि कोई समय बताने से मना कर दे। उसने पूछा, मैं समझा नहीं कि इसमें आपको क्या अड़चन हो रही है?
नसरुद्दीन ने कहा, अब अगर पूरी बात ही समझनी है, तो समझाए देता हूं। लेकिन बात जरा लंबी है। अभी तुम पूछोगे, समय क्या हुआ है। फिर मैं बता दूं तो बात आगे बढ़ेगी। कहां जा रहे हो, पूछोगे। मैं कहूं बंबई जा रहा हूं। तुम कहोगे, मैं भी बंबई जा रहा हूं। ऐसे ही तो आदमी बात-बात में फंसता है। तुम भी बंबई जा रहे हो; मैं बंबई ही रहता हूं। मैं कहूंगा, अच्छा, आना मेरे घर भोजन कर लेना। ऐसे ही तो आदमी उलझ जाता है। बात में से बात, बात में से बात निकलती आती है। जवान लड़की है घर में, तुम भी जवान हो, देखने-दाखने में अच्छे भी लगते हो। कोई न कोई झंझट हो जाएगी। आज नहीं कल तुम कहोगे, जरा आपकी बेटी को सिनेमा ले जा रहा हूं! और किसी न किसी दिन तुम आ जाओगे विवाह के लिए। और मैं तुमसे कहे देता हूं जिसके पास अपनी घड़ी भी नहीं, उससे मैं लड़की का विवाह नहीं कर सकता।
जीसस -- पैगंबर की पूजा अपने ही गांव में नहीं होती।
कबीर ज्ञान को उपलब्ध हो गए। एक सुबह नदी पर, गंगा पर स्थान करने गए हैं। देखा एक पड़ोसी, परिचित है, ऐसे हाथ से ही चुल्लू भर-भरकर स्नान कर रहा है। तो उन्होंने जल्दी से अपना लोटा मांजा और उसको दिया कि लोटे से स्नान कर लो, ऐसे चुल्लू से भर-भरकर स्नान कितनी देर में कर पाओगे!
उस आदमी ने कहा, सम्हालकर रख अपना लोटा, जुलाहे! क्या जुलाहे का लोटा लेकर हम अपने को अपवित्र करेंगे! वह मुहल्ले का ही आदमी था। कबीर जुलाहा हैं, यह भूलना उसे मुश्किल है। कबीर ने कहा कि बडी गजब की बात तुमने कह दी। लेकिन जब यह लोटा ही तुम्हारी गंगा में स्नान करने से पवित्र न हुआ, तुम कैसे हो जाओगे? तुमने मेरी तो दृष्टि खोल दी; अब गंगा में नहाने न आऊंगा। क्या सार! लोटे को घिस-घिसकर परेशान हो गया और साफ न हुआ, शुद्ध न हुआ। जुलाहे का लोटा, जुलाहे का रहा। तो तुम स्नान कर-करके क्या पा लोगे?
प्रार्थना प्रेम का निचोड़ है, जैसे फूलों का निचोड़ इत्र ।
एक मारवाड़ी सेठ को हवाई यात्रा से बहुत ज्यादा डर लगता था। हवाई जहाज का नाम सुन कर उनकी जान सूखती थी। मगर व्यापार तो आखिर व्यापार है। कई बार उन्हें धंधे के सिलसिले में लंदन जाना पड़ता था। वे हमेशा बीमा करा कर ही हवाई जहाज में कदम रखते थे। एक बार जब वे बिना बीमा कराए ही जाने लगे तो उनके एक परिचित ने पूछा, सेठ जी, इस बार इंश्योरेंस नहीं करवाना क्या?
सेठ जी की आंखों से आंसू झलक आए। उन्होंने निराशा भरे उदास स्वर में कहा, कितनी बार तो करवा चुका! कभी कुछ होता-वोता तो है ही नहीं। हर बार असफलता हाथ लगती है। मेरा तो कुछ भाग्य ही खराब है।
बुद्ध : दूसरों के पुरुष (मर्मच्छेदक) वचनों पर ध्यान न दे, न दूसरों के कृत-अकृत को देखे, (तद्विपरीत) अपने (ही) कृत-अकृत को देखे ।
सुबह-सुबह मुल्ला नसरुद्दीन घूमने निकला। एक दरवाजे पर लगी छोटी सी तख्ती उसने देखी: श्री भोंदूमलजी, भूतपूर्व मुख्यमंत्री। सुबह-सुबह ही कोई गाय माता उस मकान की सीढ़ियों पर पवित्र गोबर कर गई थी । नसरुद्दीन ने अपनी जेब से कलम निकाली और गोबर के पास ही लिख दिया: श्री गोबरमलजी, भूतपूर्व हरी घास!
एक मारवाड़ी को एक पिस्तौलधारी गुंडे ने एक अंधेरी गली में पकड़ लिया। उसके सिर पर पिस्तौल लगा दी और कहा कि दो चीजों में से एक चुन लो--जिंदगी चाहिए कि धन चाहिए? या तो धन मेरे हवाले कर दो और नहीं तो खोपड़ी फोड़ दूंगा गोली से।
मारवाड़ी ने आव देखा न ताव, एक क्षण नहीं सोचा, उसने कहा, मार दो गोली। धन तो मैंने बुढ़ापे के लिए बचा कर रखा है।
आज के यह दिन सनम, घर-घर पपीहा बोलता!
दूर मधु-मुरली बजी, वन-वन वियोगी डोलता!
यह अजब संध्या हुई, शंका हुई कि प्रभात है!
अब गजब की रात है कि दिया जले तो प्रात है!
एक अमरीकन यात्री ने अपने आप-बीती लिखी। वह दिल्ली के स्टेशन पर उतरा। स्टेशन पर उतरा है और एक सरदार ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा है कि मैं आपका भविष्य बताऊंगा।
उसने कहा, लेकिन मुझे भविष्य पूछना नहीं है। हम अपना भविष्य खुद बनाते हैं। भविष्य कहीं है यह हम मानते नहीं।
पर सरदार जी ने तो बताना ही शुरू कर दिया। वह तो हाथ जोर से पकड़े हुए है। और वह आदमी बेचारा शिष्टाचार में सिर्फ हाथ पकड़ाए हुए है। छोड़ नहीं रहा, ठीक है। वह कह रहा है कि मुझे पूछना नहीं है, मुझे कुछ जानना नहीं है, लेकिन सरदार जी तो बताना शुरू कर दिए हैं कि यह होगा, यह होगा, यह होगा भविष्य में।
फिर उस आदमी ने कहा, मुझे जाने दीजिए।
तो सरदार जी ने कहा, मेरी फीस? मेरे दो रुपये फीस के हो गए।
उस आदमी ने कहा, ठीक है। हालांकि मैं मना कर रहा था और आपने जबरदस्ती बताया है, लेकिन फिर भी आपने इतना श्रम किया, ये दो रुपये आप ले लें। लेकिन दो रुपये लेकर सरदार जी ने हाथ छोड़ा नहीं। वह और बताने लगे हैं। उसने कहा कि देखिए, अब हाथ छोड़ दीजिए, क्योंकि फिर आपकी फीस हो जाएगी। लेकिन सरदार जी बताए चले जा रहे हैं। उसने कहा कि मुझे जाना है। जबरदस्ती हाथ छुड़ाया, तो सरदार जी ने कहा कि दो रुपये मेरी फीस और हो गई? उस आदमी ने कहा कि अब मैं दो रुपये आपको नहीं दूंगा। यह तो जबरदस्ती की बात है। तो सरदार जी ने क्या कहा? सरदार जी ने कहा, यू मैटीरियलिस्ट--दो रुपये के लिए मरे जाते हो, भौतिकवादी हो, दो रुपये में जान निकली जाती है!
खुदा बुरा करे इस नींद का यह कैसी नींद ?
खुली कब आंख कि, जब कारवां रवाना हुआ ॥
डॉक्टर ने अहमक अहमदाबादी से पूछा कि क्यों जी, तुमने अपनी पत्नी को दवा तो बराबर दी या नहीं? अहमक अहमदाबादी ने कहा: 'नहीं, अब तक मेरी समझ में यह नहीं आया कि एक गोली तीन बार कैसे दी जा सकती है!'
एक अध्यापक शिकार को गए, अपने बेटे को भी साथ ले गए। जंगल में दूर निकल गए और रास्ता भूल गए। आखिर गुस्से में आ कर बच्चे को मारने लगे। शिक्षक ही जो ठहरे। शिक्षक को गुस्सा आए तो क्या करें! बच्चों को मारता है। पति को गुस्सा आए, पत्नी को मारता है। पत्नी को गुस्सा आए, बच्चों को। बच्चों को गुस्सा आए, खिलौनों को तोड़ देते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि शिक्षक वे ही लोग होते हैं जो जानते हैं भलीभांति कि और किसी को तो जिंदगी में सता न सकेंगे, छोटे-छोटे बच्चों को ही सता सकेंगे, हो जाओ शिक्षक। यह धंधा अच्छा है। पीटने लगा अपने बेटे को और बोला: 'बेवकूफ, मैं तो रास्ता भूल गया हूं, इसलिए भटकता फिर रहा हूं। लेकिन तू क्यों नहीं घर जाता? तू तो घर जा।'
मुल्ला नसरुद्दीन अस्सी साल का हो गया। और तब अचानक एक दिन उसने अपने बेटे को बुला कर कहा--बड़े बेटे को, जिसकी उम्र कोई साठ साल होगी--कि मैंने फिर से विवाह का तय कर लिया है। तेरी मां को मरे काफी महीने हो गए और अब मैं बिना स्त्री के नहीं रह सकता हूं।
बेटा थोड़ा चिंतित हुआ, क्योंकि अस्सी साल में अब शादी? उसने कहा, लेकिन किससे शादी का इरादा है? कौन लड़की है?
नसरुद्दीन ने कहा कि सामने पड़ोसी की लड़की है।
लड़का हंसने लगा। उसने कहा, आप भी मजाक करते हैं! या सिर फिर गया? उसकी उम्र अठारह साल से ज्यादा नहीं है।
नसरुद्दीन ने कहा, सिर फिर गया? जब मैंने तेरी मां से शादी की थी, तब उसकी उम्र भी अठारह साल ही थी। तो फर्क क्या है? अठारह साल से क्या फर्क पड़ता है?
शील
कथा :
एक सूफी फकीर हज की यात्रा को गया। एक महीने का मार्ग था। उस फकीर और उसके शिष्यों ने तय किया कि एक महीने उपवास रखेंगे। पाच-सात दिन ही बीते थे कि एक गांव में पहुंचे, कि गांव के बाहर ही आए थे कि गांव के लोगों ने खबर की कि तुम्हारा एक भक्त गाव में रहता है, उसने अपना मकान, जमीन सब बेच दिया। गरीब आदमी है। तुम आ रहे हो, तुम्हारे स्वागत के लिए उसने पूरे गांव को आमंत्रित किया है भोजन के लिए। सब बेच दिया है ताकि तुम्हारा ठीक से स्वागत कर सके। उसने बड़े मिष्ठान बनाए हैं। फकीर के शिष्यों ने कहा, यह कभी नहीं हो सकता, हम उपवासी हैं, हमने एक महीने का उपवास रखा है। हमने व्रत लिया है, व्रत नहीं टूट सकता। लेकिन फकीर कुछ भी न बोला।
जब वे गांव में आए और उस भक्त ने उनका स्वागत किया, और फकीर को भोजन के लिए निमंत्रित किया तो वह भोजन करने बैठ गया। शिष्य तो बड़े हैरान हुए कि यह किस तरह का गुरु है? जरा से भोजन के पीछे व्रत को तोड़ रहा है! भूल गया कसम, भूल गया प्रतिज्ञा कि एक महीने उपवास करेंगे। यह क्या मामला है? लेकिन जब गुरु ने ही इंकार नहीं किया तो शिष्य भी इंकार न कर सके। करना चाहते थे।
समारोह पूरा हुआ, रात जब विश्राम को गए तो शिष्यों ने गुरु को घेर लिया और कहा कि यह क्या है? क्या आप भूल गए? या आप पतित हो गए?
उस गुरु ने कहा, पागलों! प्रेम से बड़ी कहीं कोई तीर्थयात्रा है? और इसने इतने प्रेम से, अपनी सब जमीन-जायदाद बेचकर, सब लुटाकर-गरीब आदमी है-भोजन का आयोजन किया, उसे इंकार करना परमात्मा को ही इंकार करना हो जाता। क्योंकि प्रेम को इंकार करना परमात्मा को इंकार करना है। ज़रा उस आदमी की भी सोचो, क्या उसके इतना कुछ करने के बाद छोटे से खाने के लिए मना कर देना हिंसात्मक नहीं होता ? रही उपवास की बात, तो क्या फिकर है, सात दिन आगे कर लेंगे। एक महीने का उपवास करना है न? एक महीने का उपवास कर लेंगे। और अगर कोई दंड तुम सोचते हो, तो दंड भी जोड़ लो। एक महीने दस दिन का कर लेंगे। जल्दी क्या है? और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हारी यह अकड़ कि हमने व्रत लिया है और हम अब भोजन न कर सकेंगे, अहंकार की अकड़ है। यह प्रेम की और धर्म की विनम्रता नहीं।
यहां फर्क तुम्हें समझ में आ सकता है। शिष्यों का तो केवल चरित्र है, गुरु का शील है। शील अपना मालिक है, वह होश से पैदा होता है। चरित्र अपना मालिक नहीं है, वह अंधानुकरण से पैदा होता है।
थकान
कथा :
अमरीका का एक बहुत बड़ा विचारक, अपनी वृद्धावस्था में दुबारा पेरिस देखने आया अपनी पत्नी के साथ। तीस साल पहले भी वे आए थे अपनी सुहागरात मनाने। फिर तीस साल बाद जब अवकाशप्राप्त हो गया वह, नौकरी से छुटकारा हुआ, तो फिर मन में लगी रह गई थी, फिर पेरिस देखने आया।
पेरिस देखा, लेकिन कुछ बात जंची नहीं। वह जो तीस साल पहले पेरिस देखा था, वह जो आभा पेरिस को घेरे थी तीस साल पहले, वह कहीं खो गई मालूम पड़ती थी। धूल जम गई थी। वह स्वच्छता न थी, वह सौंदर्य न था, वह पुलक न थी। पेरिस बड़ा उदास लगा। पेरिस थोड़ा रोता हुआ लगा। आंखें आंसुओ से भरी थीं पेरिस की। वह थोड़ा हैरान हुआ। उसने अपनी पत्नी से कहा, क्या हुआ पेरिस को? यह वह बात न रही, जो हमने तीस साल पहले देखी थी। वे रंगीनियां कहां! वह सौंदर्य कहां! वह चहल-पहल नहीं है। लोग थके-हारे दिखाई पड़ते हैं। सब कुछ एक अर्थ में वैसा ही है, लेकिन धूल जम गई मालूम पड़ती है।
पत्नी ने कहा, क्षमा करें, हम बूढ़े हो गए हैं। पेरिस तो वही है। तब हम जवान थे, हममें पुलक थी, हम नाचते हुए आए थे, सुहागरात मनाने आए थे। तो सारे पेरिस में हमारी सुहागरात फैल गई थी। अब हम थके-मांदे जिंदगी से ऊबे हुए मरने के लिए तैयार-तो हमारी मौत पेरिस पर फैल गई है। पेरिस तो वही है।
हिलता लक्षण
कथा :
शेखचिल्ली ने एक दुकान से मिठाई खरीदी। रुपया दिया, आठ आने वापस चाहिए थे, लेकिन फुटकर न थे। तो दुकानदार ने कहा, कल सुबह ले लेना। उस शेखचिल्ली ने चारों तरफ देखा और उसने कहा, पक्का कर लेना जरूरी है,कहीं बदल जाए! कोई फिर चीज खोज लेनी चाहिए। उसने खोज ली। दूसरे दिन सुबह आया और दुकानदार से कहा कि मुझे पहले ही पता था! आठ आने के पीछे गजब कर दिया तुमने।
उस आदमी ने पूछा, क्या मामला है?
उसने कहा, आठ आने वापस लौटाओ। रात मिठाई खरीदी थी।
उसने कहा, तुम होश में हो? यह नाईबाड़ा है, यहां मिठाई कैसी?
उसने कहा, मुझे रात ही शक था। मगर आठ आने के पीछे यह मैंने न सोचा था कि तुम धंधा ही बदल दोगे। मगर मैं भी होशियार हूं। देखा नहीं, सांड जहां बैठा है वहीं का वहीं बैठा है! रात ही मैंने खयाल कर लिया था कि कोई चीज देख लो जिसको तुम धोखा न दे पाओ। यह सांड यहीं बैठा था। मैं देख गया था। सांड वहीं बैठा है। रात में सांड हट गया। सांड जीवित है।
उपनिषद -- पूर्ण से हम पूर्ण को भी निकाल लें, तो भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है।
एक पति चौके में नमक खोज रहा था। बड़ी देर हो गयी, तो उसकी पत्नी ने कहा, 'इतनी देर लगाने की क्या जरूरत है? क्या तुम्हें नमक दिखाई नहीं पड़ता?' उसने कहा कि मैं खोज रहा हूं मुझे दिखाई ही नहीं पड़ता। उस ने कहा कि 'वह बिलकुल सामने रखा है -- वो पीला डब्बा जिस डिब्बे पर हल्दी लिखा है। आंख के सामने रखा है। अंधे हो?'
आरोपण
कथा :
एक मुसलमान नवाब अपने राज्य की यात्रा पर गया हुआ था। एक गांव में उसने बड़ी भीड़ लगी देखी। पूछा, क्या हो रहा है? तो किसी ने कहा, यह रामायण से राजा-राम की कथा पढ़ी जा रही है। तो उसने कहा, मेरे राज्य में और किसी राजा की कथा चले, यह बरदाश्त के बाहर है। कहो पंडित को, कथा मेरी कहे। राज्य मेरा है, किसी और राजा की कथा चल रही है!
पंडित बड़ा होशियार था, घाघ था, जैसे कि पंडित होते हैं। उसने कहा, हुजूर! कथा बड़ी है, लिखने में समय लगेगा। छह महीने में आपकी कथा लिखकर हाजिर कर दूंगा, फिर हम सुनाने लगेंगे। हमें क्या लेना-देना राजा राम से?
छह महीने बाद वह पंडित आया। उसने कहा, कथा तो लिख गई, एक अड़चन आ रही है; आपकी सीता को कौन ले भागा? आप उसका नाम बता दें तो मैं लिख दूं। क्योंकि बिना सीता के चोरी गए कथा बनती ही नहीं। आपकी सीता को कौन चुरा ले गया है? उस शैतान का नाम मुझे बता दें।
उस नवाब ने कहा, भई ठहरो; यह कहां की झंझट में उलझाते हो? ऐसी कथा से बाज आए। तुम अपनी पुरानी जो कथा कहते थे, वही कहो। तुम्हारी कथा के लिए मेरी सीता को चोरी करवाओगे? यह तो महंगा सौदा हो गया।
जब तुम रामायण पढ़ोगे तो तुम राम की कथा में अपने को आरोपित करोगे।
दौड़
कथा :
बच्चों की किताब है, एलिस इन वंडरलैंड । एलिस जब परियों के देश में पहुंची तो इस जमीन से परियों के देश तक आते-आते थक गई । भूख भी लगी है, थक भी गई है, प्यास भी लगी है, और उसने पास ही एक बड़े वृक्ष की घनी छाया में परियों की रानी को खड़े देखा। उसके चारों तरफ मिष्ठानों के थाल लगे हैं, फलों के थाल सजे हैं। और जैसे ही एलिस की नजर परियों की रानी के ऊपर पड़ी, परियों की रानी ने इशारा किया कि आ..। वृक्ष पास ही मालूम पड़ता है, वह दौड़ी।
वह दौड़ती रही.. दौड़ती रही.. दौड़ती रही, फिर ठिठककर खड़ी हो गई। बड़ी हैरानी मालूम पड़ी, वृक्ष और उसके बीच का फासला कम नहीं होता; उतना ही है। सुबह से दौड़ती है, दोपहर आ गई, सूरज सिर पर आ गया, छाया सिकुड़कर बड़ी छोटी हो गई, भूख और भी बढ़ गई इस दौड़ने से, घटी न, और फासला उतना का उतना है!
वह फिर चिल्लाकर पूछती है कि यह मामला क्या है? मैं पागल हो गई हूं या किसी पागल मुल्क में आ गई हूं? यह क्या हो रहा है? ये कैसे नियम हैं?
रानी ज्यादा दूर नहीं है, उसकी आवाज उस तक पहुंच जाती है। और रानी कहती है, घबड़ा मत, तू जरा ठीक से नहीं दौड़ रही है। जरा तेजी से दौड़; इतनी ही जरूरत है।
वह तेज दौड़ती है, बहुत तेज दौड़ती है, पसीने से लथपथ होकर गिर पड़ती है। सांझ होने के करीब आ गई, सूरज उतरने लगा है; देखती है, फासला उतना का उतना है। थरथरा जाती है, घबड़ा जाती है कि क्या हो रहा है! जैसे एक दुख-स्वप्न देखा हो। वह चिल्लाकर पूछती है, यह मुल्क कैसा है? क्या यहां चलने से रास्ते पार नहीं होते?
वह रानी हंसती है; वह कहती है, जहां से तू आती है, उस पृथ्वी पर भी यही नियम है। वहां भी चलने से कोई रास्ते पार नहीं होते। यहां भी नहीं पार होते, वहां भी पार नहीं होते। चलने से कभी कोई रास्ते पार हुए पागल?
बुझी मगर बुझी नहीं, न जाने कैसी प्यास है
करार दिल से आज भी, ना दूर है ना पास है ।
एक कुत्ते के मन में खयाल आ गया कि वह दिल्ली चला जाए। सारी दुनिया दिल्ली जा रही थी। उसने सोचा कि कुत्ते क्यों पीछे रह जाएं! और जब सभी दिल्ली पहुंच जाएंगे, तो कुत्तों के अधिकारों का क्या होगा? फिर वह कुत्ता कोई छोटा-मोटा कुत्ता भी नहीं था, एक एम.पी. का कुत्ता था। नेता का कुत्ता था। दिन-रात दिल्ली जाओ, दिल्ली आओ की बात सुनाई पड़ती थी। दिल्ली जाने की विधियां और उपाय और सीढ़ियां ईजाद किए जाते थे; आदमियों के कंधों पर कैसे चढ़ो, लोगों की आंखों में धूल कैसे झोंको, सब उसने सुन लिया था। वह ठीक ट्रेंड हो गया था।
एक दिन उसने अपने गुरु को कहा--गुरु, मालिक जो उसका एम.पी. था--कहा कि अब बहुत देर हुई जा रही है। अब मुझे आशीर्वाद दें, मैं भी दिल्ली जाऊं! उसने कहा कि तू क्या करेगा दिल्ली जाकर? कुत्ता होकर और तेरी ऐसी हिम्मत?
समझ गया था। वह कुत्ता तो बहुत दिन से रहता था; वह सब राज समझ गया था। उसने कहा कि आप देखते नहीं कि आपका वह जो विरोधी पहुंच गया है इस बार, वह कुत्तों से बेहतर है? बदतर है। नेता ने कहा कि बिलकुल ठीक। यह बात तो बिलकुल ठीक है। तू जा। तू दिल्ली जा। उसने कहा, रास्ता कुछ बता दें। मैं कैसे दिल्ली जाऊं!
तो रास्ता, नेता ने कहा कि सूत्र सरल है। जिस तरकीब से मैं जाता रहा, वही तरकीब तू भी उपयोग कर। क्योंकि वह अनुभव में लाई गई तरकीब है। तरकीब उसने बता दी कि जब अमीर कोई दिखाई पड़े, अमीर कुत्ता...!
कुत्तों में भी अमीर और गरीब होते हैं। अमीर कुत्ता आपने देखा होगा; कार में भी चलता है; सुंदरतम स्त्रियों की गोद में भी बैठता है; शानदार गलीचों पर विश्राम भी करता है! आदमी को रोटी न मिले, उसको तो विशेष भोजन मिलता है। वह अमीर कुत्ता है।
तो उसने कहा, जब अमीर कोई कुत्ता दिखे, तो कहना कि सावधान। गरीब कुत्ते इकट्ठे हो रहे हैं; तुम्हारे लिए खतरा है। मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूं। और जब कोई गरीब कुत्ता दिखे, तो फौरन कहना कि मर जाओगे। लूटे जा रहे हो। शोषण किया जा रहा है। लाल झंडा हाथ में लो। मैं तुम्हारा नेता हूं। इन अमीरों को ठीक करना जरूरी है। और जब तक--जैसा कि अहमदाबाद की सड़कों पर मैंने दो-चार जगह लिखा देखा: जनता जागे, सेठिया भागे--उसने कहा होगा, कुत्ते जागे, सेठिया भागे। तैयार हो जाओ!
पर उस कुत्ते ने कहा कि महाराज, यह तो ठीक है। लेकिन अमीर और गरीब कुत्ते दोनों साथ मिल जाएं, तो मैं क्या करूं? तो कहना, मैं सर्वोदयी हूं! मैं सबके उदय में विश्वास करता हूं। गरीब का भी उदय हो, अमीर का भी उदय हो। सूरज पूरब से भी निकले, पश्चिम से भी साथ निकले। हम सर्वोदयी हैं।
सूत्र पूरा हो गया। कुत्ते ने प्रचार शुरू कर दिया। और नेता ने कहा, ध्यान रखना, जोर से बोले चले जाना। कुत्ते ने कहा, यह तो अभ्यास है हमारा। इसमें कोई चिंता न करें। इसमें हम नेताओं को मात दे देते हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। हम चिल्लाते रहेंगे। नेता ने कहा, अगर चिल्लाते रहे, तो दिल्ली पहुंच जाओगे। बस, चिल्लाने में कुशलता चाहिए। इसकी फिक्र मत करना कि क्या चिल्ला रहे हो। जोर से चिल्ला रहे हो, इसका खयाल रखना। दूसरे को दबा देना चिल्लाने में, बस!
कुत्ते ने शुरू कर दिया काम। महीने पंद्रह दिन में उसने काशी के कुत्तों को राजी कर लिया। नेता से कहा कि अब मैं जाता हूं। आप वहां खबर करवा दें दिल्ली में कि मैं आ रहा हूं। ठहरने का इंतजाम, सब व्यवस्था करवा दें। कितनी देर लगेगी, नेता ने पूछा, तेरे पहुंचने में? कुत्ते ने कहा कि कुत्ते की चाल से जाऊंगा; और सर्वोदयी कहकर फंस गया हूं। तो वे कुत्ते कह रहे हैं, पैदल जाओ। झंझट हो गई। वे कहते हैं, सर्वोदयी, पैदल जाओ, पदयात्रा करो! फंस गया झंझट में; नहीं तो ट्रेन में निकल जाता। अब तो पैदल ही जाना पड़ेगा। कम से कम महीनाभर लग जाएगा।
खबर कर दी गई। दिल्ली के कुत्ते बड़े प्रसन्न हुए। काशी का कुत्ता आता है; धर्मतीर्थ से आता है। जरूर कुछ ज्ञान लेकर आता होगा! काम पड़ेगा। लेकिन बड़ी मुश्किल तो यह हुई कि एक महीने के बाद उन्होंने स्वागत का इंतजाम किया, द्वार-दरवाजे बनाए। लेकिन कुत्ता सात ही दिन में पहुंच गया। वे तो इंतजाम कर रहे थे एक महीने बाद का, कुत्ता सात दिन में दिल्ली पहुंच गया। बड़े चकित हुए।
उन्होंने कहा, बिलकुल समझ नहीं तुम्हें। बेवक्त आ गए। हम सब इंतजाम किए थे। मेयर को राजी किए थे। फूलमाला पहनवाते। यह तुमने क्या किया! सब विरोधी पार्टी के नेताओं को इकट्ठा कर रहे थे कि फूलमाला पहनाते। तुम यह क्या किए? इतनी जल्दी आ गए बेवक्त। कोई तैयारी नहीं है।
उस कुत्ते ने कहा कि मैं क्या कर सकता हूं? काशी से निकला; एक मिनट रुक नहीं सका कहीं। जिस गांव में पहुंचा, उसी गांव के कुत्ते इस बुरी तरह पीछे लग जाते कि मैं जान बचाकर गांव के बाहर होता। वे दूसरे गांव के बाहर तक जब तक मुझे छोड़ते, तब तक दूसरे गांव के कुत्ते मेरे पीछे लग जाते। मैं ठहरा ही नहीं, रुका ही नहीं, विश्राम नहीं किया। बस, भागता ही चला आ रहा हूं! और कहते हैं, इतना ही कहकर वह कुत्ता मर गया, क्योंकि इतना थक गया था।
दिल्ली आमतौर से कब्र बनती है पहुंचने वालों की। बड़ी कब्र है। दौड़-दौड़कर किसी तरह पहुंचते हैं वहां; गिरकर मर जाते हैं। शायद मरने के लिए पहुंचते हैं या किसलिए पहुंचते हैं, कुछ कहना कठिन है। मर गया वह कुत्ता। पर एक राज की बात बता गया कि ठहर नहीं पाया कहीं; दौड़ाते ही रहे लोग।
हम भी एक-एक आदमी के मन को बचपन से दौड़ा रहे हैं। सब मिलकर दौड़ा रहे हैं। सब मिलकर दौड़ा रहे हैं। बाप दौड़ा रहा है कि नंबर एक आओ। मां दौड़ा रही है कि क्या कर रहे हो, बगल के पड़ोसी का लड़का देख रहे हो? स्पोर्ट्स में नंबर एक आ गया। मां-बाप किसी तरह पीछा छोड़ेंगे, तो एक पत्नी उपलब्ध होगी। वह कहेगी, दौड़ो। देखते हो, बगल का मकान बड़ा हो गया। बगल की पत्नी के पास हीरों की चूड़ियां आ गईं। तुम देखते रहोगे ऐसे ही बैठे! दौड़ो। किसी तरह दौड़-दाड़कर और थोड़ी उम्र गुजारता है, तो बच्चे पैदा हो जाते हैं। वे कहते हैं कि क्या बाप मिले तुम भी! न घर में कार है, न टेलीविजन सेट है। कुछ भी नहीं है। बड़ी दीनता मालूम होती है। इनफीरिआरिटी कांप्लेक्स पैदा हो रहा है हममें, स्कूल जाते हैं तो। दौड़ो।
पूरी शिक्षा, पूरा समाज, पूरी व्यवस्था दौड़ने के एक ढांचे में ढली हुई है। दिल्ली पहुंचो। दौड़ो, चाहे जान चली जाए, कोई फिक्र नहीं। दौड़ते रहो। ठहरना भर मत।
जीसस -- लोमड़ियों के लिए भी घर हैं सिर छिपाने को, लेकिन परमात्मा के बेटे के लिए कोई स्थान नहीं, जहाँ वह सिर छिपा ले।
अमेरिका का एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक ओपेनहेमर ने अमेरिकी प्रेसिडेंट को सलाह दी कि जल्दी करें, क्योंकि रूसी चांद पर पहुंचने में हमसे आगे हैं। शुरू में वे थे भी। ओपेनहेमर ने कहा अमेरिका के प्रेसिडेंट को कि हम जल्दी करें, नहीं तो वे चांद पर हमसे पहले पहुंच जाएंगे। प्रेसिडेंट ने ऐसे ही कहा कि let them go to hell -- जाने दो उनको नरक में। ओपेनहेमर ने कहा कि अगर इस रफ्तार से गए, तो वहा भी वे हमसे पहले पहुंच जाएंगे। और यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता!
विनम्रता हीनता नहीं है। विनम्रता अहंकार का विसर्जन है।
नेपोलियन सब कुछ जीत ले, तो भी छोटी-छोटी चीजों में दुखी हो जाता था। एक दिन उसकी घड़ी बिगड़ गई, तो उसे सुधारने की कोशिश में उसने हाथ बढ़ाया। उसकी ऊंचाई ज्यादा नहीं थी, पांच ही फीट थी। तो उसका हाथ नहीं पहुंचा घडी तक, तो उसका जो अर्दली था, वह छ: फीट लंबा जवान था। उसने जल्दी से आकर ठीक कर दिया। नेपोलियन ने अपनी डायरी में लिखा है कि मुझे इतनी पीड़ा हुई कि जैसे मैं सारा संसार हार गया। अर्दली! और उसका हाथ पहुंच गया और मेरा नहीं पहुंचा!
मूर्च्छा दुख का असह्य हो जाना है। और मृत्यु सब से बड़ा दुख है, हमारे लिए। हम डरते हैं मिटने से, इसलिए।
एक फकीर था। नाम था उसका शिब्ली। किसी यात्रा पर था। मार्ग में एक युवक को कहीं तेजी से जाते हुए देखा तो उसने पूछाः 'मित्र, कहां भागे जा रहे हो? ' उस युवक ने बिना ठहरे ही कहाः 'अपने घर।' शिब्ली ने इस पर एक बडा अजीब सा सवाल किया। पूछाः 'कौन सा घर? ' उस युवक ने कहा: 'एक ही तो घर है। परमात्मा का घर। उसकी ही खोज में हूं।' शिब्लीः 'मित्र, परमात्मा को पाना है तो भाग क्यों रहे हो? कहां भागे जा रहे हो? जो यहीं है, उसे भाग कर कैसे पाओगे? जो इसी क्षण है, अभी है, उसे कभी भविष्य में पाने की कामना क्या भ्रांति नहीं? और जो भीतर है, उसे भाग कर खोया ही जा सकता है। उसे पाने के लिए क्या उचित नहीं है कि ठहरो और रुको और स्वयं में देखो? '
जीवन है छोटा। शक्ति है सीमित। समय है अल्प। इसीलिए, जो विचार से, सावधानी से और सजगता से चलते हैं, वे ही कहीं पहुंच पाते हैं।
टेढ़ी खीर
कथा :
एक अंधा था और उस अंधे को दूध से बहुत प्रेम था। उसके मित्र जब भी आते, उसे भेंट में दूध ले आते थे। उसने एक दफा अपने मित्रों को पूछा, इस दूध को मैं इतना प्रेम करता हूं, इतना प्रेम करता हूं कि मैं जानना चाहता हूं कि यह दूध कैसा है? क्या है? मित्रों ने कहा, बड़ा मुश्किल है, कैसे बताएं! फिर भी उस अंधे ने कहा, कुछ तो समझाएं, किसी तरह समझाएं कि यह दूध क्या है? कैसा है? उसके एक मित्र ने कहा कि दूध, बगुला होता है, बगुले के पंख जैसा सफेद है। अंधा बोला, मुझसे मजाक न करें। बगुले को मैं जानता नहीं। उसके पंख की सफेदी को भी नहीं जानता। मैं कैसे समझूंगा कि दूध कैसा है? कुछ और सरल रास्ता अख्तियार करें तो शायद मैं समझ जाऊं। तो उसके मित्र ने कहा, कैसे समझाएं! तो एक मित्र ने कहा, बगुला जो होता है, वह घास काटने के हंसिए की तरह टेढ़ी उसकी गर्दन होती है। अंधा बोला, आप पहेलियां उलझा रहे हैं। मैंने कभी देखा नहीं हंसिया, मुझे पता नहीं वह कैसा टेढ़ा होता है। तीसरे मित्र ने कहा, इतनी दूर क्यों जाते हो? उसने अपने हाथ को मोड़ कर और उस अंधे को कहा, इस हाथ पर हाथ फेरो, इससे पता चल जाएगा कि हंसिया कैसा होता है। उसने उसके तिरछे हाथ पर हाथ फेरा। घूमा हुआ, मुड़ा हुआ हाथ अनुभव हुआ। वह अंधा नाचने लगा, वह बोला, मैं समझ गया, दूध मुड़े हुए हाथ की तरह होता है।
आओ, चित्रित राजरथ के सामान इस लोक को देखो, जहाँ मूढ़ आसक्त होते हैं, ज्ञानी आसक्त नहीं होते ।
अंतर्दृष्टि
कथा :
जब गौतम बुद्ध का जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने उनके पिता को कहा कि यह व्यक्ति बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती सम्राट होगा और या संन्यासी हो जाएगा। उनके पिता ने पूछा कि मैं इसे संन्यासी होने से कैसे रोक सकता हूं? तो उस ज्योतिषी ने बड़ी अदभुत बात कही थी। वह समझने जैसी है। उस ज्योतिषी ने कहा, अगर इसे संन्यासी होने से रोकना है, तो इसे ऐसे मौके मत देना जिसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाए। पिता बहुत हैरान हुए कि हम...। यह क्या बात हुई? उनके पिता ने पूछा। ज्योतिषी ने कहा, इसको ऐसे मौके मत देना कि इसको अंतर्दृष्टि पैदा हो जाए। तो पिता ने कहा, यह तो बड़ा मुश्किल हुआ, क्या करेंगे? उस ज्योतिषी ने कहा कि इसकी बगिया में फूल कुम्हलाने के पहले अलग कर देना। यह कभी कुम्हलाया हुआ फूल न देख सके। क्योंकि यह कुम्हलाया हुआ फूल देखते ही पूछेगा, क्या फूल कुम्हला जाते हैं? और यह पूछेगा, क्या मनुष्य भी कुम्हला जाते हैं? और यह पूछेगा, क्या मैं भी कुम्हला जाऊंगा? और इसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाएगी। इसके आस-पास बूढ़े लोगों को मत आने देना। अन्यथा यह पूछेगा, ये बूढ़े हो गए, क्या मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा? यह कभी मृत्यु को न देखे। पीले पत्ते गिरते हुए न देखे। अन्यथा यह पूछेगा, पीले पत्ते गिर जाते हैं, क्या मनुष्य भी एक दिन पीला होकर गिर जाएगा? क्या मैं गिर जाऊंगा? और तब इसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाएगी।
पिता ने बड़ी चेष्टा की और उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कि बुद्ध के युवा होते-होते तक उन्होंने पीला पत्ता नहीं देखा, कुम्हलाया हुआ फूल नहीं देखा, बूढ़ा आदमी नहीं देखा, मरने की कोई खबर नहीं सुनी। फिर लेकिन यह कब तक हो सकता था? इस दुनिया में किसी आदमी को कैसे रोका जा सकता है कि मृत्यु को न देखे? कैसे रोका जा सकता है कि पीले पत्ते न देखे? कैसे रोका जा सकता है कि कुम्हलाए हुए फूल न देखे?
लेकिन मैं आपसे कहता हूं, आपने अभी मरता हुआ आदमी नहीं देखा होगा, और अभी आपने पीला पत्ता नहीं देखा, अभी आपने कुम्हलाया हुआ फूल नहीं देखा। बुद्ध को उनके बाप ने रोका बहुत मुश्किल से, तब भी एक दिन उन्होंने देख लिया। आपको कोई नहीं रोके हुए है और आप नहीं देख पा रहे हैं। अंतर्दृष्टि नहीं है, नहीं तो आप संन्यासी हो जाते। यानी सवाल यह है, क्योंकि उस ज्योतिषी ने कहा था कि अगर अंतर्दृष्टि पैदा हुई, तो यह संन्यासी हो जाएगा। तो जितने लोग संन्यासी नहीं हैं, मानना चाहिए, उन्हें अंतर्दृष्टि नहीं होगी।
गौतम बुद्ध एक महोत्सव में भाग लेने जाते थे। रास्ते पर उनके रथ में उनका सारथी था और वे थे। और उन्होंने एक बूढ़े आदमी को देखा। वह उन्होंने पहला बूढ़ा देखा। उन्होंने तत्क्षण अपने सारथी को पूछा, इस मनुष्य को क्या हो गया?
उस सारथी ने कहा, यह वृद्ध हो गया।
बुद्ध ने पूछा, क्या हर मनुष्य वृद्ध हो जाता है?
उस सारथी ने कहा, हर मनुष्य वृद्ध हो जाता है।
बुद्ध ने पूछा, क्या मैं भी?
उस सारथी ने कहा, भगवन, कैसे कहूं! लेकिन कोई भी अपवाद नहीं है। आप भी हो जाएंगे।
बुद्ध ने कहा, रथ वापस लौटा लो, रथ को वापस ले लो।
सारथी बोला, क्यों?
बुद्ध ने कहा, मैं बूढ़ा हो गया।
यह अंतर्दृष्टि है। बुद्ध ने कहा, मैं बूढ़ा हो गया। अदभुत बात कही। बहुत अदभुत बात कही। और वे लौट भी नहीं पाए कि उन्होंने एक मृतक को देखा और बुद्ध ने पूछा, यह क्या हुआ?
उस सारथी ने कहा, यह बुढ़ापे के बाद का दूसरा चरण है, यह आदमी मर गया।
बुद्ध ने पूछा, क्या हर आदमी मर जाता है?
सारथी ने कहा, हर आदमी।
और बुद्ध ने पूछा, क्या मैं भी?
और सारथी ने कहा, आप भी। कोई भी अपवाद नहीं है।
बुद्ध ने कहा, अब लौटाओ या न लौटाओ, सब बराबर है।
सारथी ने कहा, क्यों?
बुद्ध ने कहा, मैं मर गया।
यह अंतर्दृष्टि है। चीजों को उनके ओर-छोर तक देख लेना। चीजें जैसी दिखाई पड़ें, उनको वैसा स्वीकार न कर लेना, उनके अंतिम चरण तक। जिसको अंतर्दृष्टि पैदा होगी, वह इस भवन की जगह खंडहर भी देखेगा। जिसे अंतर्दृष्टि होगी, वह यहां इतने जिंदा लोगों की जगह इतने मुर्दा लोग भी देखेगा--इन्हीं के बीच, इन्हीं के साथ। जिसे अंतर्दृष्टि होगी, वह जन्म के साथ ही मृत्यु को भी देख लेगा, और सुख के साथ दुख को भी, और मिलन के साथ विछोह को भी।
एक धर्म का अतिक्रमण कर जो झूठ बोलता है, परलोक के प्रति उदासीन ऐसे प्राणी के लिए कोई इस प्रकार का पाप नहीं रह जाता जो वह न कर सके ।
समृद्ध
कथा :
बुद्ध जब पहली दफा सत्य को उपलब्ध हुए, तब उनके पास कोई भी नहीं था। वे अकेले थे। वे यात्रा करते थे। अनजान, भिखमंगे फकीर थे। तब उन्हें कोई भी नहीं जानता था। वे काशी के बाहर आकर एक वृक्ष के नीचे विश्राम किए। संध्या को जब सूरज ढलता था, तब वे एक झाड़ के नीचे फटे कपड़ों में लेटे हुए थे। काशी का जो नरेश था, वह कुछ दिनों से बहुत दुखी, बहुत चिंतित, बहुत पीड़ित था। उसने अनेक बार आत्मघात करने का भी उपाय किया, लेकिन असफल रहा। वह उस सांझ को अपना मन बहलाने को रथ को लेकर गांव के बाहर निकला। सूरज ढलता था, उसकी अंतिम किरणें बुद्ध की मुखमुद्रा को प्रकाशित करती थीं। वे एक वृक्ष के नीचे टिके आंख बंद किए लेटे थे। सारथी रथ को हांके जाता था। अचानक उस राजा की दृष्टि इस भिखमंगे पर पड़ी। उसने सारथी को कहा, रथ रोक लो! यह कौन व्यक्ति यहां लेटा हुआ है? जिसके पास कुछ भी मालूम नहीं होता, उसके पास सब कुछ कैसे दिखाई पड़ रहा है? मेरे पास सब कुछ है और मुझे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता!
वे उतर कर गए। और उन्होंने बुद्ध को कहा कि क्या मैं यह पूछूं कि यह अदभुत समृद्ध-भिखमंगा कौन है? बुद्ध ने कहा, एक दिन मैं भी दरिद्र-समृद्ध था। जो तुम हो, एक दिन मैं भी वही था। बहुत मेरे पास था और मेरे भीतर कुछ भी नहीं था।
उस राजा ने कहा, मैं बहुत पीड़ित हूं। क्या यह कभी मुझे भी संभव हो सकता है जो तुम्हें संभव हुआ?
बुद्ध ने कहा, जो एक बीज के लिए संभव है, वह हर दूसरे बीज के लिए संभव है। हर बीज वृक्ष बन सकता है। जो मुझे फलित हुआ, वह तुम्हें फलित हो सकता है। क्योंकि मनुष्य की आंतरिक एकता समान है। और मनुष्य की आंतरिक संभावना समान है। लेकिन कुछ करना होगा।
उस राजा ने बुद्ध को कहा, मैं कुछ भी करने को तैयार हूं और मैं कुछ भी खोने को तैयार हूं, क्योंकि सच तो यह है कि जो भी मेरे पास है, उसका अब मुझे कोई मूल्य मालूम नहीं होता।
बुद्ध ने कहा, और कुछ खोने से वह नहीं मिलता है; जो स्वयं को खोने को तैयार होता है, उसे ही वह मिलता है।
ऊर्जा बंधी हुई मिली है प्रत्येक को, नपी हुई मिली है प्रत्येक को। अगर उसे इतर, यहां-वहां खर्च किया, तो अपनी नियति को पूरा नहीं किया जा सकता।
नानक एक गांव में एक दफा मेहमान हुए थे। वे यात्रा में थे और एक गांव में ठहरे। एक बहुत बड़े धनपति ने उनको आकर कहा कि मेरे पास बहुत संपत्ति है और मरने का समय मेरा करीब आ गया, इस सारी संपत्ति को मैं धर्म में लगा देना चाहता हूं। नानक ने नीचे से ऊपर तक उस व्यक्ति को देखा और कहा, तुम तो बहुत दरिद्र मालूम होते हो। तुम्हारे पास कोई संपत्ति नहीं दिखाई पड़ती है।
वह आदमी बोला, मैं सीधे-सादे लिबास में हूं, इसलिए आप समझे नहीं। मेरे पास बहुत है।
नानक ने कहा, मुझे तो कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। मेरे पास हजारों लोग आते हैं, मैं उनकी आंखों में देख कर समझ जाता हूं कि उनके पास कुछ है या नहीं। तुम्हारे पास कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।
वह बोला, आप मुझे आज्ञा दें तो पता चले कि मेरे पास कुछ है या नहीं। कोई काम मुझे बताएं जिसमें मैं अपनी संपत्ति को लगा दूं।
नानक ने एक छोटी सी सुई उसे दे दी और कहा, इसे मरने के बाद मुझे वापस लौटा देना!
यह तो बिलकुल पागलपन की बात हो गई। अगर मैं आपको एक सुई दे दूं--छोटी सी चीज है, छोटी से छोटी चीज है, इस जगत में उससे छोटा और क्या होगा? वह आपको मैं दे दूं और कहूं कि मरने के बाद मुझे वापस लौटा देना। तो सुई तो बहुत छोटी है, काम बहुत बड़ा हो गया। वह आदमी वहां तो कुछ भी नहीं कह सका, क्योंकि उसने खुद काम मांगा था; लेकिन वह रास्ते भर सोचते लौटा कि यह नानक या तो पागल है या इसने खूब मजाक किया! रात भर उसने सोचा कि इस सुई को मरने के बाद कैसे ले जाएंगे? लेकिन कोई उपाय उसे समझ में नहीं आया। उसने बहुत तरह से मुट्ठी बांधने का विचार किया, लेकिन सब तरह की बांधी हुई मुट्ठियां मृत्यु के इसी पार रह जाती हैं, उस पार कोई मुट्ठी नहीं जाती। उसने सब तरह के उपाय सोचे, लेकिन कोई उपाय कारगर नहीं होता था। वह सुबह चार बजे लौटा और नानक के पैर पड़े और कहा, यह सुई वापस ले लें। कहीं उधारी मेरे ऊपर न रह जाए। इसे मैं मृत्यु के बाद वापस नहीं लौटा सकूंगा।
नानक ने कहा, तुम्हारी संपत्ति का क्या हुआ? साथ नहीं पड़ती? तुम्हारी शक्ति का क्या हुआ? साथ नहीं देती?
वह व्यक्ति बोला, इस सुई को मृत्यु के पार ले जाने में मेरी संपत्ति सहयोगी नहीं है।
नानक ने उससे कहा कि संपत्ति केवल वही है जिसे मृत्यु नष्ट न कर पाए। और जिसे मृत्यु छीन लेती हो, उसे नासमझ संपत्ति समझते हैं; समझदार उसे विपत्ति मानते हैं, संपत्ति नहीं। और इसलिए जिन लोगों ने उस संपत्ति को छोड़ दिया, उन्होंने कोई त्याग नहीं किया; विपत्ति मान कर उससे अलग हो गए। नानक ने कहा, जो मृत्यु के पार साथ न जा सके वह विपत्ति हो सकती है।
जिसकी विजय को अविजय में नहीं पलटा जा सकता, जिसके द्वारा विजित वापस संसार में नहीं आते, उस अपड अनन्त-गोचर बुद्ध को किस उपाय से मोहित कर सकोगे ?
शेख अब्दुल्लाह के बारह लड़के हुए। उसने सभी का नाम अब्दुल्लाह जैसा रखा। ऐसे नाम रखे जो अल्लाह पर पूरे होते हैं। किसी का रहीमतुल्लाह, किसी का हिदायतुल्लाह--इस भांति। फिर उसका तेरहवां बच्चा पैदा हुआ। तब वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया। सब नाम चुक गये, जो अल्लाह पर पूरे होते थे। तो वह मुल्ला नसरुद्दीन के पास गया। भाग्य से मैं मौजूद था उस शुभ घड़ी में। और उसने कहा नसरुद्दीन से, 'बड़े मियां! तेरहवां लड़का पैदा हुआ, अल्लाह में पूरे होते किसी नाम का सुझाव दें; मैं तो थक गया खोज-खोज कर। सब नाम चुक गये।'
नसरुद्दीन ने बिना झिझके आकाश की तरफ देखा और कहा, 'तुम उसका नाम रखो, बस कर अल्लाह!'
करुणा करनेवाले को पता नहीं चलता कि मैंने करुणा की; दया करनेवाले को भारी रूप से पता चलता है, कि मैंने दया की।
साधु
कथा :
एक गांव के बाहर एक युवा संन्यासी बहुत दिन तक ठहरा था। युवा सुंदर था। बहुत लोग उसे प्रेम करते और बहुत लोग उसे आदर करते। बहुत उसका सम्मान था और उसके विचार का बहुत प्रभाव था। बड़ी क्रांति की उसकी दृष्टि थी और जीवन में बड़ा बल था। और अचानक एक दिन सब बदल गया। वे ही लोग, जो गांव के उसे आदर करते थे, उन्हीं ने जाकर उसके झोपड़े में आग लगा दी; और वे ही लोग, जो उसके पैर छूते थे, उन्होंने ही जाकर उसके ऊपर चोटें कीं; और जिन्होंने उसे सम्मान दिया था, वे ही उसे अनादर देने को तैयार हो गए।
अक्सर ऐसा होता है। जो सम्मान देते हैं, वे सम्मान देने का बदला किसी भी दिन अपमान करके ले सकते हैं। इसलिए सम्मान करने वाले से बहुत डरना पड़ता है, क्योंकि वे उसका बदला चुकाएंगे किसी दिन। सम्मान देने में उनके अहंकार को चोट लगी है। किसी को सम्मान दिया है; किसी को ऊपर माना है। उनके बहुत गहरे तल पर तो उन्हें बहुत चोट लगी है। इसका बदला वे किसी भी दिन ले सकते हैं। कोई छोटी सी बात; इसका बदला वे ले सकते हैं। इसलिए उस आदमी से बहुत डरना पड़ता है जो सम्मान देता हो, क्योंकि किसी दिन वह पोटेंशियल अपमान करने वाला है। किसी भी दिन वह अपमान कर सकता है। वह किसी भी दिन बदला लेगा इस बात का।
उस युवा को बहुत सम्मान दिया था गांव के लोगों ने। फिर एक दिन सुबह जाकर उसका अपमान किया। बात यह हो गई, गांव में एक लड़की को बच्चा हो गया और उसने कहा कि वह संन्यासी का बच्चा है। स्वाभाविक था कि वे अपमान करते। स्वाभाविक था कि वे अपमान करते। बिलकुल ही स्वाभाविक था। अब इसमें कौन सी गड़बड़ थी? यह तो वे ठीक ही कर रहे थे गांव के लोग। वे उस बच्चे को ले गए और जाकर उस युवा संन्यासी के ऊपर पटक दिया। उस संन्यासी ने पूछा कि बात क्या है? क्या मामला है?
वे बोले कि मामला हमसे पूछते हो? यह बच्चे के चेहरे को देखो और पहचानो कि मामला क्या है! मामला तुम जानते हो। तुम नहीं जानोगे तो कौन जानेगा? यह बच्चा तुम्हारा है।
उस संन्यासी ने कहा, इज़ इट सो? ऐसी बात है? बच्चा मेरा है?
वह बच्चा रोने लगा तो वह संन्यासी उसको, उस बच्चे को चुप कराने में लग गया। गांव के लोग आए और गए। वे उस बच्चे को वहीं छोड़ गए। अभी सुबह थी। फिर उस बच्चे को लेकर वह गांव में भिक्षा मांगने गया, जैसे रोज गया था। लेकिन आज उसे कौन भिक्षा देता? वे जो सम्मान में करोड़ों दे सकते हैं, अपमान में रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं दे सकते। कौन उसे रोटी देता? जहां वह गया, द्वार बंद कर दिए गए। जिस द्वार पर उसने आवाज दी, वह दरवाजा बंद हो गया और लोगों ने कहा, आगे हो जाओ। और पीछे भीड़ थी।
एक बच्चे को लेकर किसी संन्यासी ने शायद जमीन पर कभी भीख न मांगी होगी। वह बच्चा रोता था और वह भीख मांग रहा था। वह बच्चा रो रहा था और वह संन्यासी हंस रहा था, उन लोगों पर जिनका इतना आदर था और जिनका इतना प्रेम था। वह उस द्वार पर भी गया, जिस घर का वह बच्चा था, जिस घर की बच्ची का वह लड़का था। उसने वहां भी आवाज दी और उसने कहा कि मेरी फिकर छोड़ दें, कसूर भी होगा तो मेरा होगा, इस बच्चे का कौन सा कसूर है? इसे कुछ दूध मिल जाए।
उस लड़की को सहना मुश्किल हो गया जिसका वह बच्चा था। उसने अपने पिता से कहा, मुझे क्षमा करें। मैंने झूठ बोला। उस संन्यासी का तो मुझसे कोई परिचय भी नहीं है। उस बच्चे के असली बाप को बचाने के लिए मैंने ऐसा कह दिया। मैंने सोचा था कि थोड़ा कुछ कहा-सुनी करके आप वापस लौट आएंगे। बात यहां तक पहुंच जाएगी, यह मेरी कल्पना के बाहर था।
घर के लोग घबड़ा गए कि यह क्या हुआ? यह तो बड़ी भूल हो गई। यह तो बड़ा मुश्किल हो गया। वे नीचे भागे आए, वे उसके पैर पर फिर गिर पड़े, उसके पैर पड़ने लगे, बच्चे को उसके हाथ से लेने लगे। उसने कहा, क्या मामला है? बात क्या है?
उन्होंने कहा, यह बच्चा आपका नहीं है।
उसने कहा, इज़ इट सो? ऐसी बात है कि बच्चा मेरा नहीं? आप ही तो सुबह कहते थे कि बच्चा आपका है!
यह आदमी है निर-अहंकार। लोगों ने उससे कहा, तुम कैसे पागल हो? सुबह क्यों नहीं कहा कि बच्चा मेरा नहीं है?
उसने कहा, क्या फर्क पड़ता था? बच्चा जरूर किसी का होगा! मेरा भी हो सकता है! यानी यह बच्चा किसी का तो होगा ही! कोई न कोई इसका बाप होगा ही! अब तुम मुझे तो गाली दे ही चुके, अब एक और आदमी को गाली दोगे। क्या फायदा? मेरा मकान जला ही चुके, अब एक आदमी का और जलाओगे। क्या फायदा है? तो मैंने कहा कि इसमें फर्क भी क्या पड़ता है! और अच्छा ही हुआ। तुम्हारे सम्मान, तुम्हारी श्रद्धा की भी मुझे गहराई पता चल गई। तुम्हारी बातों का भी मुझे मूल्य पता चल गया। अच्छा ही हुआ। इस बच्चे ने मुझ पर बड़ी कृपा की। मुझे कुछ बातें दिखाई पड़ गईं।
उन्होंने कहा, तुम बिलकुल ही पागल हो! इतना इशारा भर कर देते कि मेरा नहीं है, तो सब मामला बदल जाता।
उसने कहा, क्या फर्क पड़ता था? मेरी इज्जत ही बिगड़ रही थी न! तो क्या मैं इज्जत के लिए साधु हूं? respectability के लिए? तुम्हारा आदर मिले इसलिए? तुम्हारे आदर-अनादर का भाव छोड़ा, उसी से तो मैं साधु हूं। तुम्हारे आदर-अनादर को विचार करके मैं कुछ करूं तो फिर मैं कैसा साधु हूं?
असल में भीतर मैं का भाव जिसका विलीन हो जाए, वही साधु है।
दुःख भी तुम्हारा सबसे अच्छा साथी बन सकता है, प्रेम और ज्ञान की खोज में…जब भी कोई एक गलीचा को पीटता है, तो वह प्रहार गलीचा के विरुद्ध नहीं होता है, लेकिन वह प्रहार धूल के खिलाफ होता है -- रूमी
द्वार
कथा :
एक नीग्रो एक रात चर्च के दरवाजे को खटखटा रहा है। अंधेरी रात है, और वह काला आदमी द्वार खड़ा है और दरवाजा ठोंक रहा है। फिर द्वार पादरी ने खोला। देखा कि काला आदमी खड़ा है, और वह चर्च तो सफेद लोगों का मंदिर था। वह चर्च तो सफेद चमड़ी वालों का था। बड़े मजे की बात है, मंदिर में भी चमड़ी पहचानी जाती है कि कौन सी है। हिंदू की है कि मुसलमान की है! शूद्र की है कि ब्राह्मण की!
वह नीग्रो था और वह अंग्रेजों का मंदिर था। पादरी क्रोध से जल उठा होगा कि इस मूढ़ ने आधी रात नींद खराब की। वह हाथ मंदिर के दोनों दरवाजों पर रोक कर खड़ा हो गया और उसने कहा, कैसे आए हो, क्या चाहते हो? उस काले आदमी ने कहा, और कुछ भी नहीं, आप रास्ते से हट जाएं और मुझे मंदिर में आने दें। मैं प्रभु के दर्शन करना चाहता हूं। उस पादरी ने कहा, इतना आसान नहीं है प्रभु का दर्शन। जाओ पहले हृदय को शांत करो, मन को पवित्र करो, प्राणों को प्रार्थना से भरो। तब, तब प्रभु के दर्शन होते हैं। और द्वार उसने बंद कर लिए। नीग्रो उतर कर चला गया। उस पादरी ने सोचा, न कभी यह शर्त पूरी कर सकेगा कि हृदय पवित्र करके आ जाए, मन शांत कर ले। न दुबारा आएगा, न मंदिर अपवित्र होगा इसके अपवित्र चरणों से!
और बड़े मजे की बात है कि पवित्र भगवान का मंदिर, अपवित्र आदमी के घुसने से अपवित्र हो जाता है! होना तो उलटा चाहिए था कि अपवित्र आदमी पवित्र मंदिर में पहुंच जाए तो पवित्र हो जाए। लेकिन होता यह है कि खुद भगवान ही अपवित्र हो जाते हैं! यह अपवित्र आदमी बहुत मजबूत है, भगवान बहुत कमजोर और इंपोटेंट मालूम होते हैं। कोई बल नहीं मालूम होता उनमें। एक अपवित्र आदमी चला गया और भगवान अपवित्र हो गए, मंदिर ही अपवित्र हो गया! ऐसे कमजोर मंदिरों से धर्म कैसे आ सकेगा?
ऐसे मंदिर चाहिए, जहां अपवित्र घुसे और पवित्र होकर वापस लौट आए। उसको ही हम मंदिर कह सकते हैं। इसको कैसे मंदिर कह सकते हैं? लेकिन आदमी की बनाई हुई कोई चीज ऐसा मंदिर नहीं हो सकती। क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि आदमी जो भी बनाएगा, वह आदमी से छोटा होगा। आदमी से बड़ा नहीं हो सकता। आदमी की बनाई कोई चीज आदमी से बड़ी नहीं हो सकती। असल में, सृष्टि कभी भी स्रष्टा से बड़ी न हुई है, न हो सकती है।
वह नीग्रो वापस लौट गया। पादरी निश्चिंत सो गया। फिर वर्ष बीत गए। दो-चार बार खयाल भी आया कि वह आया नहीं! लेकिन नहीं वह नहीं आया, तो उसने सोचा कि ठीक है, मेरा तर्क काम कर गया। लेकिन एक साल बीता था कि वह आदमी आ गया। वर्ष का पहला दिन है, पहली तारीख है, वह आदमी सुबह-सुबह चला आ रहा है। पुरोहित ने देखा और वह घबड़ा गया है। घबड़ाने का यह भी कारण है कि वह चर्च की तरफ आ ही नहीं रहा है। उसके आने से लग रहा है कि शर्त पूरी हो गई। उसकी आंखें ऐसी शांत मालूम पड़ रही हैं, जैसे कोई झील हो। उसके चेहरे पर ऐसी रोशनी, दीप्ति, ऐसी किरणें मालूम हो रही हैं, जैसे कोई ज्योति हो। उसके चलने में ऐसा लग रहा है, जैसे कोई आदमी नहीं, कोई देवता चलता हो।
वह पुरोहित घबड़ा आया। शायद शर्त पूरी हो गई! वह भागा कि दरवाजा बंद करे। लेकिन दरवाजा बंद करना व्यर्थ था। उस आदमी ने तो चर्च की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखा। वह तो आगे बढ़ गया। तो वह पुरोहित हैरान हो गया। शर्त भी पूरी हो गई मालूम होती है। फिर आया क्यों नहीं! तो वह गया, दौड़ा, जाकर उस आदमी को रोका और कहा, मेरे दोस्त, आप आए नहीं?
वह नीग्रो खूब हंसने लगा। उसने कहा, बड़ी मजाक हो गई। मैं तो आने को था, और एक वर्ष इसी मंदिर में आने की कामना में सब कुछ छोड़ कर उसका ही स्मरण किया, उसके लिए ही रोया, उसके लिए ही जागा और सोया। सपने में वह था, जागने में वह था। मन को पवित्र करने की सब कोशिश की। और कल धीरे-धीरे ऐसा लग रहा था कि आ गई है वह घड़ी। मन शांत हो गया है, शायद अब में जा सकूंगा। रात जब सोया था, तो मन बिलकुल निर्विकार था और मैं खुश था कि सुबह उठते ही वर्ष के पहले दिन मंदिर में प्रवेश कर जाऊंगा। लेकिन रात सब गड़बड़ हो गया।
भगवान मुझे रात दिखाई पड़े सपने में और कहने लगे, तू चाहता क्या है? किसलिए प्रार्थनाएं कर रहा है? किसलिए साधना कर रहा है? किसलिए आंसू बहा रहा है? तू चाहता क्या है? बोल मैं पूरा कर दूं।
तो मैंने उनसे कहा, कुछ और नहीं चाहता। वह जो गांव का मंदिर है, उसमें प्रवेश चाहता हूं। भगवान एकदम उदास हो गए और कहने लगे, इस बात को छोड़ कर तू और कुछ भी वरदान मांग ले। तो मैं बहुत कहने लगा, इतनी छोटी बात आप पूरी नहीं करेंगे! वे कहने लगे, इसको छोड़ दे, कुछ और मांग ले। मैंने बार-बार कहा, तो कहने लगे कि तू नहीं मानता तो मैं बताए देता हूं। दस साल से मैं खुद ही कोशिश कर रहा हूं उस मंदिर में घुसने की। वह पादरी मुझको ही नहीं घुसने देता है, तो तुझे कैसे घुसने देगा? यह मेरे वश के बाहर है। मैं तुझे उस मंदिर में नहीं ले जा सकता हूं। उस आदमी ने कहा, इसलिए मैं नहीं आया। जहां भगवान को ही प्रवेश नहीं, वहां मुझे क्या प्रवेश हो सकता है!
यह पता नहीं कहानी कहां तक सच है या कहां तक झूठ, लेकिन इतिहास यही कहता है कि यह कहानी सच होनी चाहिए। इतिहास तो यही कहता है कि आज तक किसी मंदिर में भगवान को प्रवेश नहीं मिल सका, न मिल सकेगा।
यदि आप हर रगड़ से चिढ़ते हो, तो आपको पॉलिश कैसे किया जाएगा? -- रूमी
खतरा
कथा :
एक सांझ, रात उतरने के करीब है, अंधेरा घिर रहा है, और एक वनपथ से दो संन्यासी भागे चले जा रहे हैं। बूढ़े संन्यासी ने पीछे युवा संन्यासी से कई बार, बार-बार पूछा, कोई खतरा तो नहीं है? वह युवा संन्यासी थोड़ा हैरान हुआ कि संन्यासी को खतरा कैसा! और जिसको खतरा है, उसी को तो गृहस्थ कहते हैं। खतरा होता ही है कुछ चीज हो पास, तो खतरा होता है! न हो कुछ, तो खतरा होता है? और कभी इस बूढ़े ने नहीं पूछा कि कोई खतरा है; आज क्या हो गया!
फिर एक कुएं पर पानी पीने रुके। बूढ़े ने अपना झोला जवान संन्यासी के, अपने शिष्य के कंधे पर दिया और कहा,सम्हालकर रखना! तभी उसे लगा कि खतरा झोले के भीतर ही होना चाहिए। बूढ़ा पानी भरने लगा, उसने हाथ डालकर खतरे को टटोला। देखा कि सोने की ईंट अंदर है। खतरा काफी है! उसने ईंट को निकालकर तो फेंक दिया कुएं के नीचे, और एक पत्थर करीब-करीब उसी वजन का झोले के भीतर रखकर कंधे पर टांगकर खड़ा हो गया।
बूढ़े ने जल्दी-जल्दी पानी पीया।
जिसके पास खतरा है, वह पानी भी तो जल्दी-जल्दी पीता है! आप सभी जानते हैं उसको! सबके भीतर वह बैठा हुआ है, जो जल्दी-जल्दी पानी पीता है, जल्दी-जल्दी खाना खाता है, जल्दी- जल्दी चलता है, जल्दी-जल्दी पूजा-प्रार्थना करता है। जल्दी-जल्दी बेटे-बच्चों को प्रेम की थपकी लगाता है। जल्दी-जल्दी सब चल रहा है, क्योंकि खतरा भारी है।
नहीं, पानी पीया भी कि नहीं पीया! प्यास बुझी कि नहीं बुझी! जल्दी से झोला कंधे पर लिया; टटोलकर देखा, खतरा साबित है; चल पड़े। फिर रास्ते में पूछने लगा कि अंधेरा घिरता जाता है। रास्ता सूझता नहीं। कोई दूर गांव का दीया भी दिखाई नहीं पड़ता। बात क्या है! हम भटक तो नहीं गए? कुछ खतरा तो नहीं है?
वह युवक खिलखिलाकर हंसने लगा। और उस अंधेरी रात में उसकी खिलखिलाहट वृक्षों में गूंजने लगी। उस बूढ़े ने कहा, हंसते हो पागल! कोई सुन लेगा, खतरा हो जाएगा! उस युवक ने कहा, अब आप बेफिक्र हो जाएं। खतरे को मैं कुएं पर ही फेंक आया हूं।
बूढ़े ने घबड़ाकर झोले के भीतर हाथ डाला। निकाला, तो सोने की ईंट तो नहीं है, पत्थर का टुकड़ा है। लेकिन दो मील तक पत्थर का टुकड़ा भी खतरा देता रहा! हृदय धड़कता रहा जोरों से! क्लिंगिंग! सोना तो था नहीं, इसलिए सोने को आप दोष नहीं दे सकते। पत्थर का टुकड़ा था, लेकिन मन में सोना था। मन में तो पकड़ थी सोने की।
एक क्षण तो बूढ़े के हृदय की धड़कन जैसे बंद हुई-हुई हो गई। फिर उसे भी हंसी आ गई यह सोचकर कि दो मील पत्थर को ढोया, नाहक डरे। युवक खिलखिलाकर हंस ही रहा था, वह भी खिलखिलाकर हंसा। झोले को वहीं पटक दिया। और कहा कि अब हम यहीं सो जाएं, अब तो कोई खतरा नहीं है।
अगर पत्थर का टुकड़ा मन में सोना हो, तो खतरा हो जाता है। और अगर सोने का टुकड़ा मन में पत्थर हो, तो आदमी बेखतरा हो जाता है। आप पर निर्भर है।
जिस जगह बर्बादी है, उस जगह खजाने की आशा भी है -- रूमी
अधार्मिक
कथा :
चीन की एक कहानी। एक मेला भरा है। और एक आदमी गिर पड़ा कुएं में। शोरगुल बहुत है। बहुत चिल्लाता है, मगर कोई सुनता नहीं। तब एक बौद्ध—भिक्षु उसके पास आकर रुका। उसने नीचे नजर डाली। वह आदमी चिल्लाया कि बचाओ महाराज! हे भिक्षु महाराज मुझे बचाओ! मैं मरा जा रहा हूं। भिक्षु ने कहा: भगवान ने कहा है कि जीवन तो जरा है, मरण है। मरना तो होगा ही। मरना तो सभी को है। यहां जो भी आए सभी को मरना है।
उस आदमी ने कहा: वह सब ठीक है, अगर अभी, अभी फिलहाल तो निकालो, फिर जब मरना है मरेंगे। मगर बौद्ध—भिक्षु भी ज्ञानी था, उसने कहा कि क्या समय से भेद पड़ता है, आज मरे कि कल मरे! अरे जब मरना ही है तो मर ही जाओ। और जड जीवन की आशा छोड़कर मरोगे, तो फिर पुनर्जन्म नहीं होगा। और यह जीवन की आशा लेकर मरे, फिर सड़ोगे। चौरासी का चक्कर है!
वह आदमी वैसे ही तो मरा जा रहा है, उसको और चौरासी का चक्कर! बौद्ध भिक्षु तो आगे बढ़ गया। ज्ञान की बात कह दी, मतलब की बात कह दी; सुनो सुनो, समझो, न समझो न समझो। उसके पीछे एक कन्फ्यूशियन भिक्षु आकर रुका। उसने भी देखा नीचे। वह आदमी चिल्लाया कि महाराज, तुम बचाओ। कन्फ्यूशियस को मानने वाले ने कहा: घबड़ा मत, कन्फ्यूशियस ने अपनी किताब में लिखा है कि हर कुएं पर पाट होनी चाहिए, आज यह प्रमाण हो गया। इस कुएं पर पाट नहीं है, इसलिए तू गिरा। अगर पाट होती, कभी न गिरता। हम सारे देश में आंदोलन चलाएंगे कि हर कुएं पर पाट होने चाहिए।
उसने कहा: यह सब तुम करना पीछे। मैं मर जाऊंगा। और अब पाट भी बन जाएगी। तो क्या होगा? मैं तो गिर ही चुका हूं।
उसने कहा: तू तो फिकर ही मत कर; यह सवाल व्यक्तियों का नहीं है। व्यक्ति तो आते रहते हैं, जाते रहते हैं; सवाल समाज का है।
वह गया और मंच पर खड़ा हो गया और मेले में लोगों को समझाने लगा कि भाइयो! हर कुएं पर पाट होने चाहिए।
तब एक ईसाई पादरी भी आकर रुका। उसने जल्दी से अपने झोले में से बाल्टी निकाली, रस्सी निकाली। बाल्टी डाली, रस्सी डाली। आदमी को कहा कि पकड़ ले रस्सी, बैठ जा बाल्टी में। खींच लिया उसे बाहर। वह आदमी पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा कि तुम्हीं सच्चे धार्मिक आदमी हो। बौद्ध—भिक्षु आया, वह मुझे धम्मपद की गाथाएं सुनाने लगा। कन्फ्यूशियसी आया, वह मुझे कहने लगा कि सब कुओं पर पाट बनवा देंगे, तू मत घबड़ा। तेरे बच्चे कभी भी नहीं गिरेंगे। एक तुम्हीं, सच्चे, जो तुमने मुझे बचाया। मगर एक बात मेरे मन में उठती है कि एकदम से बाल्टी—रस्सी कहां से ले आए?
उसने कहा: मैं ईसाई हूं। हम सब इंतजाम पहले ही करके चलते हैं। सेवा हमारा धर्म है। और हमारी तुमसे इतनी ही प्रार्थना है, न तो जरूरत है कुओं पर पाट बनाने की, न जरूरत है धम्मपद की गाथाओं को याद करने की। ऐसे ही गिरते रहना, ताकि हम भी बचाएं, हमारे बच्चे भी बचाए। अपने बच्चों को भी समझा जाना कि गिरते रहना। क्योंकि न तुम गिरोगे न हम बचाएंगे, तो फिर स्वर्ग कैसे जाएंगे?
आप सागर में एक बूंद जैसे नहीं हैं; आप एक बूंद में पूरे महासागर जैसे हैं -- रूमी
एक अंधा आदमी एक चर्च में जाता था। अंधा भी था, बहरा भी था। बहुत जोर से कोई चिल्लाए तो बामुश्किल सुन सकता था। तो चर्च में न तो प्रवचन पुरोहित का उसे सुनायी पड़ता था, न चर्च में चलता भजन-संगीत उसे सुनायी पड़ता था। न वह कुछ देख सकता था। पर जाता नियम से था। एक दिन एक आदमी ने उससे पूछा कि हमारी कुछ समझ में नहीं आता, तुम किसलिए यहां आते हो? न तुम देख सकते, न तुम सुन सकते हो, तो किसलिए इतनी परेशानी उठाते हो? उस आदमी ने कहा, मैं इसलिए आता हूं ताकि दूसरे देख लें कि मैं चर्च आने वाला धार्मिक आदमी हूं। और तुम्हारे पास भला आंखें हों, लेकिन आते तुम भी इसीलिए हो। और भला तुम्हारे पास कान हों, आते तुम भी इसीलिए हो।
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी हूँ से आध।
कबीर संगत साधु की, कटे कोटि अपराध ।
मुल्ला नसरुद्दीन रोज सुबह नमाज के वक्त जोर से चिल्ला कर कहता था, हे परमात्मा! एक बात खयाल रख; जब भी लूंगा, पूरे सौ रुपए लूंगा। कम मैं न लूंगा। जब भी तुझे देना हो, सौ की पूरी थैली गिरा देना। और ध्यान रख, निन्यान्नबे भी न लूंगा।
पड़ोस का एक आदमी रोज यह सुनता था। उसे मजाक सूझी! उसने कहा कि रोज यह एक ही बात किए जा रहा है। और निन्यान्नबे तो यह लेगा नहीं। तो खतरा भी नहीं है। तो उसने एक थैली में निन्यान्नबे रुपए रख कर, जब दूसरे दिन वह नमाज पढ़ रहा था, उसके छप्पर में से नीचे गिरा दी।
उसने नमाज बीच में ही छोड़ कर पहले रुपए गिने और फिर कहा, वाह रे वाह! एक रुपया थैली का काट ही लिया!
पडित कोटि अनन्त हैं ज्ञानी कोटि अनन्त ।श्रोता कोटि अनन्त है विरले साधु सन्त ॥
अभ्यास
कथा :
एक सर्कस में ऐसा हुआ। एक आदमी रोज ही अपनी पत्नी को तख्ते पर रखकर और तीर से निशाना लगाता था। तीस तीर मारता था। लेकिन तीर ऐसे कि हाथ को छूकर तख्ते में चुभ जाते; कान को छूते हुए गुजरते और तख्ते में चुभ जाते। सिर को छूते हुए निकलते और तख्ते में चुभ जाते। पूरी पत्नी को चारों तरफ से तीरों से भर देता; लेकिन जरा भी पत्नी को खरोंच न लगती। ऐसा उसका तीस साल का अभ्यास था। तीस साल से वह यही काम कर रहा था।
एक दिन--ऐसे दिन बहुत आए थे, जब पत्नी से दिन में कलह हो गई थी। कई बार उसके मन में भी होता था कि आज तीर मार ही दूं बीच में ही, छाती में ही चुभ जाए। लेकिन अपने को सम्हाल गया था। सांझ होते-होते क्रोध चला गया था। एक दिन सांझ को इतना झगड़ा हो गया कि जब वह आया मंच पर और पत्नी खड़ी हुई तख्ते पर, तो उसने कहा, अब बहुत हो गया। उठाया तीर, आंख बंद कर लीं; क्योंकि अभ्यास इतना गहरा था कि आंख खुली रही, तो संभावना यही है कि तीर तख्ते में लगेगा, पत्नी में नहीं लगेगा। तीस साल का अभ्यास! आंख बंद कर लीं, कि आंख बंद करके मारूंगा तीर, तब तो लगने ही वाला है। आंख बंद कीं। सांस रोक ली। मारा तीर। हाल में तालियां बजीं। घबड़ाकर आंख खोली। तीर पत्नी को छूता हुआ तख्ते में लग गया था। तीस तीर आंख बंद करके मारे उसने, लेकिन तीर अपनी जगह पहुंचते रहे! बंद आंख से भी तीर पत्नी में न लग सका। अभ्यास गहरा था; तीस साल का था। बंद आंख में भी काम कर गया।
हमारा तो जन्मों का, लाखों जन्मों का अभ्यास है चूकने का। उठा क्रोध कि ध्यान का मौका आया; opportunity to meditate !
उन्नीस सौ बीस में बंगाल में दो बच्चियां पकड़ी गईं, जिनको भेड़िए उठाकर ले गए थे और उन्होंने उनको बड़ा कर लिया। भेड़िए शौकीन हैं। और कई दफे दुनिया में कई जगह उन्होंने यह काम किया है। बच्चों को उठा ले जाते हैं, फिर उनको पाल लेते हैं। एक बच्ची ग्यारह साल की थी और एक तेरह साल की थी, जब वे पकड़ी गईं। और पहली दफा हैरानी हुई, वे कोई भाषा नहीं बोलती थीं। भाषा की तो बात दूसरी है, वे दो पैर से खड़ी भी नहीं हो सकती थीं। वे चारों हाथ-पैर से ही चलती थीं।
अभी कुछ दिन पहले, पांच-सात वर्ष पहले यू.पी. में एक बच्चा पकड़ा गया जंगल में, वह भी भेड़ियों ने पाल लिया था। वह कोई चौदह साल का था, वह भी कोई भाषा नहीं बोल सकता था। उसका नाम रख लिया था राम, पकड़ने के बाद। छः महीने कोशिश करके बामुश्किल उससे राम निकलवाया जा सका कि वह राम कह सके। लेकिन छः महीने में वह मर गया। और चिकित्सक कहते हैं कि वह राम कहलवाने की कोशिश ही उसकी जान लेने वाली सिद्ध हुई।
चौदह साल का बच्चा एक शब्द नहीं बोलता था। क्या हुआ? चारों हाथ-पैर से चलता था। छः महीने मसाज कर-करके उसको बामुश्किल खड़ा कर पाए। नहीं तो रीढ़ उसकी सीधी नहीं होती थी, फिक्स्ड हो गई थी। चार हाथ-पैर से वह भेड़ियों की तेजी से दौड़ता था! लेकिन खड़ा करके वह ऐसा चलता था कि रत्ती-रत्ती मुश्किल हो गया। क्या हो गया?
आदमी वही हो जाता है, जिस आयाम में उसका अभ्यास करवा दिया जाता है; वही हो जाता है। वह भेड़िए के साथ रहा, भेड़िए का अभ्यास हो गया। अभ्यास कर लिया, वही हो गया।
आदमी एक अनंत संभावना है, infinite possibility! हम जो हो गए हैं, वह हमारी एक संभावना है।
चंदूलाल और ढब्बू जी एक ही साथ मरे, क्योंकि एक ही साइकिल पर सवार थे। और बस से टकरा गई साइकिल और गिर गई नाले में। चंदूलाल आगे बैठे थे, साइकिल चला रहे थे और डब्बू जी पीछे। सो चंदूलाल एक—दो मिनट पहले पहुंचे स्वर्ग के दरवाजे पर, ढब्बू जी भी भागते हुए एक—दो मिनट पीछे। ढब्बू जी ने सुन लिया जो हुआ। दरवाजा खुला और द्वारपाल ने पूछा चंदूलाल से, विवाहित या अविवाहित? चंदूलाल ने कहा विवाहित। द्वारपाल ने कहा : भीतर आ जाओ, नरक तुम भोग चुके। अब तुम्हें स्वर्ग मिलेगा।
ढब्बू जी ने सुन लिया सब, चले आ रहे थे भागे पीछे—पीछे। फिर द्वार खुला जब ढब्बू जी ने दस्तक दी। द्वारपाल ने फिर पूछा विवाहित या अविवाहित? ढब्बू जी ने कहा -- चार बार विवाहित! इस आशा में कि चंदूलाल को हराऊं। इस आशा में कि बच्चू को अगर मिला होगा पहले नंबर का स्वर्ग तो मुझे मिलेगा कम से कम चार मंजिल ऊपर। लेकिन द्वारपाल ने दरवाजा बंद कर लिया और उसने कहा कि दुखी लोगों के लिए तो यहां जगह है, पागलों के लिए नहीं। एक बार माफ किया जा सकता है कि भाई चलो, जानते नहीं थे, तो भूल हो गई। मगर चार बार!
एक दिन अबु हसन के पास एक व्यक्ति आया और बोलाः 'ओ परमात्मा के प्यारे दरवेश! मैं अपने अपवित्र जीवन से भयाक्रांत हूं और स्वयं को बदलने के लिए कटिबद्ध हूं। मैं संन्यासी होना चाहता हूं। क्या आप मुझ पर अनुकंपा नहीं करेंगे? क्या आप अपने पहने हुए पवित्र वस्त्र मुझे नहीं दे सकते हैं? मैं भी उन्हें पहन कर पवित्र होना चाहता हूं।' उस व्यक्ति ने हसन के पैरों पर सिर रख दिया और उन्हें आंसुओं से गीला कर दिया। उसकी उत्कट आकांक्षा में संदेह का तो सवाल ही नहीं था। उसके आंसू ही क्या उसके लिए गवाह नहीं थे? अबु हसन ने उसे उठाया और कहाः 'मित्र! इसके पहले कि मैं तुम्हें अपने वस्त्रों को देने की भूल करूं, क्या तुम भी मेरे एक प्रश्न का उत्तर देने की कृपा कर सकते हो? क्या कोई स्त्री किसी पुरुष के वस्त्रों को पहन कर पुरुष हो सकती है? या कोई पुरुष किसी स्त्री के वस्त्र पहन कर स्त्री हो सकता है? उस व्यक्ति ने अपने आंसू पोंछ लिए। संभवतः वह गलत जगह आ गया था। और कहाः 'नहीं।' अबु हसन हंसने लगा और बोलाः 'ये रहे मेरे वस्त्र! लेकिन यदि तुम मेरे शरीर को भी ओढ़ लो तो क्या होगा? संन्यासी के वस्त्र पहन कर क्या कभी कोई संन्यासी हुआ है? '
seek not water, seek thirst -- Rumi
भगवत्प्रेम
कथा :
गदर के समय, म्यूटिनी के समय, अठारह सौ सत्तावन में, एक मौन संन्यासी, जो पंद्रह वर्ष से मौन था। नग्न संन्यासी। रात गुजर रहा था। चांदनी रात थी। चांद था आकाश में। वह नाच रहा था। धन्यवाद दे रहा था चांद को। उसे पता नहीं था कि उसकी मौत करीब है।
नाचते हुए नग्न वह निकला नदी की तरफ। बीच में अंग्रेज फौज का पड़ाव था। फौजियों ने समझा कि यह कोई जासूस मालूम पड़ता है। तरकीब निकाली है इसने कि नग्न होकर गीत गाता हुआ फौजी पड़ाव में से गुजर रहा है। उन्होंने उसे पकड़ लिया। और जब उससे पूछताछ की और वह नहीं बोला, तब शक और भी पक्का हो गया कि वह जासूस है। बोलता क्यों नहीं? हंसता है, मुस्कुराता है, नाचता है, बोलता क्यों नहीं?
मैंने कहा, गीत गाता हुआ, वाणी से नहीं। ऐसे भी गीत हैं, जो प्राणों से गाए जाते हैं। ऐसे भी गीत हैं, जो शून्य में उठते और शून्य में ही खो जाते हैं। वह तो मौन था, शब्द से तो चुप था। पर गीत गाता हुआ, नाचता हुआ, अपने समग्र अस्तित्व से पूर्णिमा के चांद को धन्यवाद देता हुआ!
सिपाहियों ने कहा कि बोलता क्यों नहीं है? मुस्कुराता है। आंखें कहती हैं। गाता है। नाचता है। बोलता क्यों नहीं है? बेईमान है। जासूस है! उन्होंने उसकी छाती में भाला भोंक दिया।
उस संन्यासी ने संकल्प लिया हुआ था कि एक ही शब्द बोलूंगा -- आखिर, अंतिम, मृत्यु के द्वार पर। इस जगत से पार होते हुए धन्यवाद का एक शब्द इस पार बोलकर विदा हो जाऊंगा।
कठिन पड़ा होगा उसको कि क्या शब्द बोले! मुश्किल पड़ा होगा! एक ही वाक्य बोलना है--अंतिम!
छाती में घुस गया भाला। खून के फव्वारे बरसने लगे। वह जो नाचता था हृदय, मरने के करीब पहुंच गया। उस संन्यासी ने कहा, तत्वमसि श्वेतकेतु! उपनिषद का महावाक्य। उसने कहा, श्वेतकेतु, तू भी वही है। दैट आर्ट दाऊ। तू भी वही है।
नहीं समझे होंगे वे अंग्रेज सिपाही। लेकिन उसने उस सिपाही से कहा, तू भी वही है--तत्वमसि! उस अंग्रेज सिपाही से, जिसने उसकी छाती में भोंका भाला, उससे उसने कहा, तू भी वही है।
इस खिड़की में से भी वह उसी को देख पाया। इस भाला भोंकती हुई खिड़की में से भी उसी का दर्शन हुआ। भगवत्प्रेम को उपलब्ध हुआ होगा, तभी ऐसा हो सकता है, अन्यथा नहीं हो सकता है।
सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।
संशय
कथा :
ज्ञान का अर्थ? ज्ञान का अर्थ है, समत्वबुद्धिरूपी योग। वही, जब बुद्धि सम होती है, तो ज्ञान का जन्म होता है। बुद्धि की समता का बिंदु ज्ञान के जन्म का क्षण है। जहां बुद्धि संतुलित होती है, वहीं ज्ञान जन्म जाता है। और जहां बुद्धि असंतुलित होती है, वहीं अज्ञान जन्म जाता है। जितनी असंतुलित बुद्धि, उतना घना अज्ञान। जितनी संतुलित बुद्धि, उतना गहरा ज्ञान। पूर्ण संतुलित बुद्धि, पूर्ण ज्ञान। पूर्ण असंतुलित बुद्धि, पूर्ण अज्ञान। पूर्ण असंतुलित बुद्धि होती है विक्षिप्त की, पागल की, इसलिए उसके संशय का कोई हिसाब ही नहीं है। पागल, विक्षिप्त का संशय पूर्ण है। अपने पर ही संशय करता है पागल।
अभी-अभी अमेरिका से एक युवती मेरे पास आई। छः साल पागलखाने में थी। उसने अपने हाथ की कलाइयां मुझे बताईं, दोनों कलाइयां बिलकुल कटी हुई। कई बार काटा उसने खुद ही। वही उसका पागलपन था, कलाई काट डालना! रेजर मिल जाए, कैंची मिल जाए, छुरा मिल जाए, सब्जी काटने की छुरी मिल जाए, कुछ भी मिल जाए, बस कलाई काटती।
मैंने उससे पूछा कि तुझे कलाई काटने का यह खयाल क्यों चढ़ा था? उसने कहा, खयाल! मुझे ऐसा लगता था कि अगर मेरे हाथ कहीं मेरी गर्दन दबा दें और मैं मर जाऊं। तो इनको काट डालूं। अपने ही हाथ पर संशय कि कहीं गर्दन न दबा दें!
विक्षिप्त इस स्थिति में पहुंच जाता है कि वह दूसरे पर संशय करता है, ऐसा नहीं; अपने पर भी संशय करता है। अपने पर भी!
विक्षिप्त का संशय पूर्ण हो जाता है, ज्ञान शून्य हो जाता है। विमुक्त का संशय शून्य हो जाता है, ज्ञान पूर्ण हो जाता है।
दो छोर हैं, विक्षिप्त और विमुक्त। और हम बीच में हैं, नट की तरह डोलते हुए। हम अपनी रस्सी पकड़े हुए हैं, कभी विक्षिप्त की तरफ डोलते, कभी विमुक्त की तरफ।
सुबह मंदिर जाते हैं, तो देखें चाल। फिर लौटकर बाजार जाते हैं, तब देखें अपनी चाल। सुबह जब मंदिर का घंटा बजाते हैं प्रभु को कहने को कि आ गया, मैं आया, तब देखें भाव। फिर उसी मंदिर से लौटकर भागते हैं दुकान की तरफ, तब देखें आंखें। तब बड़ी हैरानी होती है कि एक आदमी, इतना फर्क! वही बैठा है गंगा के किनारे तिलक-चंदन लगाए, पूजा-पाठ, प्रार्थना! वही बैठा है दफ्तर में; वही बैठा है नेता की कुर्सी पर, तब उसकी स्थिति!
एक ही आदमी सुबह से सांझ तक कितने चेहरे बदल लेता है! चेहरे बदलते हैं इसलिए कि भीतर बुद्धि बदल जाती है। करीब-करीब पारे की तरह है हमारी बुद्धि। वह जो थर्मामीटर में पारा होता है--ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे।
तकलीफ
कथा :
एक आदमी बड़ा व्यवसायी है। लेकिन धीरे-धीरे कुछ दिन से पता चलता है कि उसका मुनीम पैसे हड़प रहा है। धीरे-धीरे बात पक्की हो गई, प्रमाण हाथ लग गए, तो उस मालिक ने उस मुनीम को एक दिन बुलाया और कहा कि तुम्हारी तनख्वाह कितनी है? उस मुनीम ने कहा कि पंद्रह सौ रुपए महीना। उस मालिक ने कहा, मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। और आज से तुम्हारी तनख्वाह करते हैं दो हजार। फिर कहा, नहीं-नहीं-नहीं, दो हजार तो कम ही होगा। तुम्हारा काम देखते हुए ढाई हजार करना ठीक होगा। मुनीम तो एकदम हैरानी से खड़ा हो गया। उसने कहा, क्या कह रहे हैं आप! एकदम हजार रुपए की बढ़ती! छाती जोर से धड़कने लगी। मालिक ने कहा कि इतने से तुम खुश हो गए? मैंने तो सोचा था कि तीन हजार...। उस मुनीम ने हाथ पकड़ लिए और कहा, धन्यवाद! मालिक ने कहा कि एक आखिरी बात और कि आज से तुम्हारी नौकरी खतम। उस आदमी ने कहा, आप क्या कह रहे हैं? अगर नौकरी ही खतम करनी थी, तो तीन हजार तक तनख्वाह क्यों बढ़ाई? उस मालिक ने कहा, अब तुम जरा ज्यादा परेशान रहोगे। पंद्रह सौ की नौकरी नहीं छूट रही है, तीन हजार की छूट रही है! अब जाओ।
सफल आदमी मरते वक्त पाता है कि तीन हजार की नौकरी गई। मुश्किल से तो राष्ट्रपति हो पाए थे, वह गया मामला! चपरासी मरते वक्त इतनी तकलीफ नहीं पाता। चपरासी जिंदा में बहुत तकलीफ पाता है, कि सिर्फ चपरासी! राष्ट्रपति मरते वक्त तकलीफ पाता है कि राष्ट्रपति हुए और मरे। तीन हजार तनख्वाह मिली, एंड फायर्ड!
एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ट्रेन से सफर कर रहा था: और उसने बगैर किसी कारण के अपने छोटे बच्चे की पिटाई कर दी। एक बार, दो बार, तीन बार। सामने बैठी हुई महिला से जब यह न देखा गया तो वह बोली कि देखो जी, अब यदि तुमने एक भी चांटा इस बच्चे को मारा तो मैं तुम्हें मुसीबत में डाल दूंगी।
मुल्ला ने उसे देखा और कहा: बाई, तू कौन सी मुसीबत में मुझे डालेगी! अरे, मैं पहले से ही इतना परेशान हूं। सुन! अभी पिछले माह ही मेरे पिता की टी.बी. से मृत्यु हो गई और हम लोग यहां दिल्ली से जा रहे हैं जहां मेरी सास मृत्युशय्या पर पड़ी है, मैं खुद कैंसर का मरीज हूं, रेलवे प्लेटफार्म पर मेरी पत्नी मुझसे बिछुड़ गई है, इस छोटे बच्चे ने खिड़की में अपनी अंगुली कुचल ली है, मंझले लड़के ने यात्रा की टिकटें चबा डाली हैं, और अभी-अभी मुझे पता चला है कि हम लोग गलत टेन में यात्रा कर रहे हैं..अब तू और कौन सी मुसीबत में डाल सकती है!!
धक्का
कथा :
बाल्या भील का काम था डकैती, हत्या। एक साधु को लूटकर रस्सी से बांधकर एक वृक्ष से कस दिया। पर उस साधु ने कहा कि तुम इतना उपद्रव, इतनी लूट-खसोट, यह सब करते हो। किसके लिए? मुझे मारना जरूर, लेकिन इतना जवाब तो दे दो! क्योंकि मेरा तो काम पूरा हो गया, साधु ने कहा, मेरे मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन इतना तो बता दो कि यह करते किसलिए हो? उसने कहा, अपने घर वालों के लिए। तो उस साधु ने कहा, मुझे यहां बांध जाओ और जरा घर-वालों से पूछकर आओ कि इस हत्या का जो फल होगा, उसके लिए वे बंटाने को राजी हैं? भागीदार होंगे?
आदमी शांत और सीधा मालूम पड़ता था। मरने को तैयार था। भागता नहीं था। सीधा बंधकर खड़ा हो गया था। बाल्या ने सोचा, पूछ लूं। हर्ज क्या है! लौटकर घर जाकर पत्नी से पूछा कि मैं इतनी हत्याएं करता हूं, इतने डाके डालता हूं। कल अगर इसके फल में मुझे नर्क जाना पड़े, तो कौन-कौन मेरे साथ चलेगा? पत्नी ने कहा, यह तुम जानो। यह तुम्हारा काम! इससे हमारा क्या लेना-देना? हमें तो तुम पत्नी बनाकर घर ले आए हो। दो रोटी दे देते हो, काफी है। तुम कहां से रोटी लाते हो, यह तुम जानो। तुम कैसे रोटी लाते हो, यह तुम्हारा काम है। पिता से पूछा। पिता ने कहा कि मुझ बूढ़े को क्यों फंसाते हो? तुम्हारा काम, तुम जानो! बूढ़ा आदमी हूं, मुझे दो रोटी देते हो, इतना तुम्हारा कर्तव्य है बेटे होने की तरह।
सारा भवन गिर गया उसका। सारी हत्याएं आंख के सामने खड़ी हो गईं, सारे डाके। जिनके लिए किए थे, वे भागीदार बनने को राजी नहीं हैं! लौट पड़ा। आदमी बदल गया। बाल्या डाकू वाल्मीकी हुआ । कोई सोच नहीं सकता था, इस डकैत और लुटेरे से रामायण का जन्म होगा। लौट गया बिलकुल। बात ही खतम हो गई। वह जिस साधु से उसको संदेश मिला था, वह साधु तो पीछे रह गया होगा, वाल्मीकि और भी आगे निकल गया।
शिष्टाचार
कथा :
एक ज्ञानी एक चर्च में गया, एक पादरी। और जो भी धर्मशास्त्र पढ़ लेते हैं, वे ज्ञानी हो जाते हैं! ज्ञानी होना बड़ा सरल है! है नहीं, मान लेना बहुत सरल है। उस पादरी को खयाल है कि मैं जानता हूं। आते ही उसने पहली धाक लोगों पर जमा देनी चाही। उसने खड़े होकर लोगों से कहा कि मैं तुमको समझाऊंगा बाद में, पहले मैं यह पूछ लूं कि तुम में कोई अज्ञानी हो, तो खड़ा हो जाए।
कौन खड़ा होता! लोग एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। जैसे मैं आपसे पूछूं कि कोई अज्ञानी हो, तो खड़ा हो जाए। तो जो जिसको अज्ञानी समझता होगा--अपने को छोड़कर ही समझेगा सदा--वह उसकी तरफ देखेगा कि फलां खड़ा हो रहा है कि नहीं? अब तक खड़ा नहीं हुआ! पत्नी पति की तरफ देखेगी, पति पत्नी की तरफ देखेगा; बाप बेटे की तरफ देखेगा, बेटा बाप की तरफ देखेगा कि अभी तक खड़े नहीं हो रहे! कोई खड़ा नहीं होगा।
कोई खड़ा नहीं हुआ। उस पादरी ने कहा, कोई भी अज्ञानी नहीं है? धक्का लगा उसे। क्योंकि वह सोचता था, वह ज्ञानी है। और जब कोई भी खड़ा नहीं होता, तो सभी ज्ञानी हैं! तभी एक डरा हुआ सा आदमी, बहुत दीन-हीन सा आदमी झिझकता हुआ, चुपचाप उठकर खड़ा हो गया। उस पादरी ने कहा, आश्चर्य! चलो, एक आदमी तो अज्ञानी मिला। क्या तुम अपने को अज्ञानी समझते हो? उसने कहा कि नहीं महानुभाव, आपको अकेला खड़ा देखकर मुझे बड़ी शर्म मालूम पड़ती है, इसलिए मैं खड़ा हो गया हूं। आप अकेले ही खड़े हैं! अच्छा नहीं मालूम पड़ता, शिष्टाचार नहीं मालूम पड़ता। आप अजनबी हैं, बाहर से आए हैं। इसलिए मैं खड़ा हो गया हूं, अज्ञानी मैं नहीं हूं।
इस पृथ्वी पर कोई अपने को अज्ञानी मानने को राजी नहीं है। कोई अपने को भोगी मानने को राजी नहीं है। कोई अपने को अहंकारी मानने को राजी नहीं है। कोई अपने को ममत्व से घिरा है, ऐसा मानने को राजी नहीं है। और सब ऐसे हैं। और जब बीमारी अस्वीकार की जाए, तो उसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है। बीमारी स्वीकार की जाए, तो उसका इलाज हो सकता है, निदान हो सकता है, चिकित्सा हो सकती है।
अपने कार्य के पीछे की मंशा को देखो। अक्सर तुम उस चीज को पाना नहीं चाहते जो तुम्हें सच में चाहिए।
मुल्ला नसरुद्दीन बाजार गया था, और एक दुकान पर साड़ियां खरीदने गया था। साडियां सस्ते में बिक रही थीं। दुकान बंद होने को थी। और सस्ते में साड़ियां नीलाम हो रही थीं। तो बहुत स्त्रियां पहुंच गई थीं। वह बेचारा सज्जनता के वश पीछे-पीछे खड़ा था। स्त्रियां कोई सज्जन तो होती नहीं! सज्जनता का स्त्रियों से क्या लेना—देना! स्त्री स्त्री है। सज्जनता तो पुरुषों के लिए है। वह पीछे खड़ा था। स्त्रियां तो धूम-धड़ाका मचाकर भीतर घुस रही थीं। वह कोई क्यू नहीं, कोई हिसाब नहीं।
वह कोई घंटेभर खड़ा रहा, पीछे ही पीछे रहे, आगे जाने का कोई उपाय ही न था। और पत्नी जान खा लेगी कि साड़ी बिना लिए आ गए। आखिर उसने भी एकदम से धक्का दिया। सिर झुकाकर नीचे, जैसे कि बैल घुस जाए भीड़ में, ऐसा वह स्त्रियों की भीड़ में घुस गया जोर से!
आखिर कई स्त्रियां चौकी और उन्होंने कहा कि शर्म नहीं आती, मर्द होकर और सभ्य आदमी होकर असभ्य व्यवहार कर रहे हो? पुरुषोचित व्यवहार करो!
उसने कहा, चुप रहो! पुरुषोचित व्यवहार घंटेभर से कर रहा हूं। अब स्त्रियोचित व्यवहार करता हूं।
अगर पद चाहिए और तुम चूक जाओ, तो उसका कुल मतलब इतना ही है कि तुम जरा सज्जनता का व्यवहार कर रहे थे ।
एक गांव में एक आदमी मरा, राजनेता था। उस गांव का नियम था कि जब कोई मर जाए तो उस आदमी की प्रशंसा में दो शब्द कहे जाएं। लोगों ने बहुत माथापच्ची की कि कोई दो शब्द खोजे, मगर थे ही नहीं दो शब्द उसकी प्रशंसा में कहने योग्य। वह आदमी ऐसा दृष्ट था। उसने एक-एक को सताया था। उसने एक-एक की जान दूभर कर रखी थी। उसने लोगों को ऐसा परेशान किया था कि लोग प्रसन्न हो रहे थे, दिल ही दिल में खुश हो रहे थे, फूल खिल रहे थे लोगों की आत्माओं में कि चल बसा तो झंझट मिटी। मगर लाश रखी है, चिता पर चढ़ेगी तब जब कोई प्रवचन दे, भाषण दे और मर गए आदमी के संबंध में दो सम्मान के शब्द बोले, वह परंपरा थी गांव की। आखिर लोग एक-दूसरे की तरफ देख रहे हैं; कौन बोले, क्या बोले! फिर गांव के लोगों ने गांव के पंडित से कहा कि भैया, तुम्हीं कुछ बोलो, शास्त्रों में कुछ खोजो! तुम तो शास्त्र के ज्ञाता हो, शब्दों के धनी हो, अरे दो शब्द बोलो, अब किसी तरह खत्म करो, अब हम यहां कब तक बैठे रहें! इसने जिंदा रह कर भी सताया, अब मर कर भी सता रहा है। यह तो मर गया, अब हम बैठे हैं नाहक इस मरघट में। घर जाएं अपने, दूसरे काम में लगें। जिंदगी भर इसने परेशान किया है और आखिरी वख्त तक यह रस चखा रहा है अपना। कुछ बोल दो, कुछ भी बोल दो! हम आंख बंद करके, कान बंद करके मान लेंगे, सुन लेंगे, ताली बजा देंगे..झंझट खत्म करो! तुम झूठ बोलो कि सच बोलो, इसकी फिक्र नहीं।
लेकिन पंडित को भी उसने इतना सताया था कि उसके भी सब शास्त्रज्ञान वगैरह काम नहीं आ रहा था; वह खोज रहा था, बहुत भीतर, मगर कुछ..., आखिर खड़ा हुआ, पंडित था, कुछ रास्ता निकाला। उसने कहा कि भाइयो, यह जो सज्जन मर गए हैं, इनके पांच भाई अभी और जिंदा हैं, उन पांच के मुकाबले ये देवता थे।
क्या तरकीब निकाली! कि वे पांच इनसे भी पहुंचे हुए हैं, इतने निश्चिंत न हो जाओ, ये पांच पीछे छोड़ गए हैं, अभी वे ठिकाने लगाएंगे तुम्हें। उनके मुकाबले यह देवता थे।
तब उनकी चिता पर लाश चढ़ाई जा सकी।
(कबीर)
आप ही दंडी, आप तराज़ू, आप ही बैठा तोलता,
आप ही माली, आप बगीचा, आप ही कलियाँ तोड़ता
सात्विक अहंकार
कथा :
कलकत्ते के एक मुहल्ले में एक नाटक चलता था। पुरानी बात है। एक बड़े बुद्धिमान आदमी विद्यासागर देखने गए हैं। सामने ही बैठे हैं। प्रतिष्ठित, नगर के जाने-माने पंडित हैं। सामने बैठे हैं। फिर नाटक कुछ ऐसा है, कथा कुछ ऐसी है कि उसमें एक पात्र है, जो एक स्त्री को निरंतर सता रहा है, परेशान कर रहा है। बढ़ती जाती है कहानी। उस स्त्री की परेशानी और उस आदमी के हमले और आक्रमण भी बढ़ते चले जाते हैं। और फिर एक दिन एक अंधेरी गली में उसने उस स्त्री को पकड़ ही लिया। बस, फिर बरदाश्त के बाहर हो गया विद्यासागर के। छलांग लगाकर मंच पर चढ़ गए, निकाला जूता और पीटने लगे उस आदमी को!
लेकिन उस आदमी ने विद्यासागर से भी ज्यादा बुद्धिमानी का परिचय दिया। उसने सिर झुकाकर उनका जूता सिर पर ले लिया। जूता हाथ में लेकर जनता से कहा कि इतना बड़ा पुरस्कार मुझे कभी नहीं मिला। मैं सोच नहीं सकता था कि विद्यासागर जैसा बुद्धिमान आदमी मेरे अभिनय को वास्तविक समझ लेगा!
विद्यासागर को तो पसीना छूट गया। खयाल आया कि नाटक देख रहे थे! नाटक था; कर्ता बन गए। दर्शक न रह पाए। भूल गए। समझा कि स्त्री की इज्जत जा रही है, तो बचाने कूद पड़े। बहुत उस आदमी से कहा, जूता वापस कर दो। माफ कर दो। उसने कहा, यह मेरा पुरस्कार है। इसे तो मैं घर में सम्हालकर रखूंगा। क्योंकि मैंने सोचा भी नहीं था कि इतना कुशल हो सकेगा मेरा अभिनय कि आप धोखे में आ जाएं।
क्या, हुआ क्या? विद्यासागर को बचाने का खयाल पकड़ गया। कर्ता आ गया कहीं से, सात्विक अहंकार।
बुद्धिमान वो हैं जो औरों की गलती से सीखता है। थोड़ा कम बुद्धिमान वो है जो सिर्फ अपनी गलती से सीखता है। मूर्ख एक ही गलती बार-बार दोहराते रहते हैं और उनसे कभी सीख नहीं लेते।
फैलाव
कथा :
लंदन में, लंदन यूनिवर्सिटी का मेडिकल हास्पिटल है। हर तीन महीने में वहां एक अजीब घटना घटती है। उस हास्पिटल की हर तीन महीने में ट्रस्टीज की बैठक होती है।
अगर कभी आप उस बैठक को देखें, तो बहुत हैरान होंगे। थोड़ी देर में चकित हो जाएंगे। आप देखेंगे कि प्रेसिडेंट की जगह जो आदमी प्रेसिडेंट की चेयर पर बैठा हुआ है, कुर्सी पर बैठा हुआ है अध्यक्ष की, न तो हिलता, न तो डुलता, न उसकी पुतली हिलती। बहुत हैरान होंगे। थोड़ी देर में आपको शक होगा कि वह आदमी जिंदा है या मरा हुआ! जब आप पास जाएंगे, तो पाएंगे, वह तो मुर्दा है। लाश रखी है सौ साल से!
जरेमी बैंथम (1748-1832) नाम के आदमी ने वह हास्पिटल बनाया था। फिर वह अपनी वसीयत में लिख गया कि यह मैं मरने के बाद भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मैं अस्पताल बनाऊं और अध्यक्षता कोई और करे। इसलिए मेरी लाश को यहां रखना। और मैं ही अध्यक्षता करूंगा, जब भी ट्रस्टीज की बैठक होगी। प्रेसिडेंट मैं ही रहूंगा।
तो अभी भी उसकी लाश रखी हुई है। सामने प्रेसिडेंट की तख्ती उसके रखी रहती है। हर बार जब ट्रस्टीज की बैठक पूरी होती है और किसी मसले पर वोटिंग होती है, तो उनको लिखना पड़ता है, दि प्रेसिडेंट इज़ प्रेजेंट, बट नाट वोटिंग। मौजूद हैं सभापति, लेकिन वोट नहीं कर रहे हैं! यह सौ साल से चल रहा है।
आदमी का पागलपन! ऐसा हमारा सारा मन है। इसको हम फैलाए चले जाते हैं। इस मन से जागे बिना कोई प्रभु की यात्रा पर नहीं निकला है।
जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके प्रति बहुत गंभीर रहा जाए। जीवन तुम्हारे हाथों में खेलने के लिए एक गेंद की तरह है । गेंद को पकड़े मत रहो।
संवाद
कथा :
एक आदमी ने किसी मित्र से रुपए मांगे, सौ रुपए मांगे। चौंककर उस मित्र ने देखा। स्वभावतः, जैसा कि किसी से भी रुपए मांगो, जिस तरह वह देखता है, वैसे उसने देखा। सोचा कि गए! लेकिन सौ रुपए देना उसकी सामर्थ्य के भीतर था। मित्रता खोनी उसने ठीक नहीं समझी। सोचा, सौ रुपए जाएंगे, यही उचित है। सौ रुपए दे दिए।
लेकिन ठीक पंद्रह दिन बाद जो वायदा था, उस दिन, बारह बजे दोपहर का जैसा वचन था, उस आदमी ने लाकर सौ रुपए लौटा दिए। फिर उसने चौंककर देखा। यह बिलकुल भरोसे के बाहर की बात थी।
लेकिन पंद्रह दिन बाद उसने फिर पांच सौ रुपए मांगे। अब उसकी हृदय की धड़कन बहुत बढ़ गई। लेकिन फिर भी उसकी सीमा के भीतर था, उसने पांच सौ रुपए दे दिए। और आश्चर्यों का आश्चर्य कि वह फिर पंद्रह दिन बाद, ठीक वक्त पर, जो समय तय था, उसने लाकर पांच सौ रुपए लौटा दिए। वह और भी चकित हो गया।
पंद्रह दिन बाद फिर उस आदमी ने हजार रुपए मांगे। उस मित्र ने कहा कि बस, अब बहुत हो गया! यू हैव फूल्ड मी ट्वाइस। थ्राइस, इट इज़ टू मच टु एक्सपेक्ट! दो दफे तुम मुझे मूर्ख बना चुके। लेकिन तीसरी बार, अब यह जरूरत से ज्यादा है। अब मैं हिम्मत नहीं कर सकता। उस आदमी ने कहा, मैंने तुम्हें कहां मूर्ख बनाया! दो दफे तो मैंने तुम्हें रुपए लौटा दिए। उस आदमी ने कहा कि तुमने लौटा दिए होंगे, लेकिन मैंने दो में से एक भी दफे नहीं सोचा था कि तुम लौटाओगे। तुम न लौटाते, तो मैं समझता कि मैं होशियार हूं। बात पक्की हो गई। जो मैंने जाना था, वह हो गया। तुमने लौटाए, उससे तो मैं मूर्ख बना। मैंने सोचा था, रुपए लौटेंगे नहीं, और तुमने लौटा दिए। एक दफे तुमने मूर्ख बना दिया। फिर भी दूसरी बार मैंने सोचा था कि रुपए लौटेंगे नहीं। फिर भी तुमने मुझे मूर्ख बना दिया। लेकिन अब क्षमा करो। अब बहुत ज्यादा है। तीन बार भरोसा करना बहुत मुश्किल है, उसने कहा कि अब मुझे तुम क्षमा कर दो! वह मित्र तो समझ ही नहीं पाया कि बात क्या है।
अक्सर ऐसा होता है। हम समझ ही नहीं पाते कि बात क्या है। दूसरा आदमी अपने भीतर से बात करता है, हम अपने भीतर से बात करते हैं। इसलिए दुनिया में संवाद बहुत कम होते हैं।
दूसरों को सुनो फिर भी मत सुनो। अगर तुम्हारा दिमाग उनकी समस्याओं में उलझ जाएगा फिर ना सिर्फ वो दुखी होंगे बल्कि तुम भी दुखी हो जओगे।
रुग्ण-चित्त
कथा :
फ्रेंक वू करके एक मनोचिकित्सक के पास एक आदमी आया है। अति क्रोध से पीड़ित है। क्रोध ही बीमारी है उसकी। क्रोध ने ही उसे जला डाला है भीतर। क्रोध ने उसे सुखा दिया है। उसके सारे रस-स्रोत विषाक्त हो गए हैं। आंखों में क्रोध के रेशे हैं। चेहरे पर क्रोध की रेखाएं हैं। नींद खो गई है। हिंसा ही हिंसा मन में घूमती है।
फ्रेंक वू उसे बिठाता है, और उसके मनोविश्लेषण के लिए एक छोटा-सा प्रयोग करता है। हाथ में उठाता है अपना रूमाल ऊंचा, और उस आदमी से कहता है, इसे देखो। और रूमाल को छोड़ देता है। वह रूमाल नीचे गिर जाता है। फ्रेंक वू उस आदमी से कहता है, आंख बंद करो और मुझे बताओ कि रूमाल के गिरने से तुम्हें किस चीज का खयाल आया? तुम्हारे मन में पहला खयाल क्या उठता है रूमाल के गिरने से?
वह आदमी आंख बंद करता है और कहता है, मुझे तो किसी को मारने का खयाल आता है।
फ्रेंक वू थोड़ा हैरान हुआ, क्योंकि रूमाल के गिरने से मारने का क्या संबंध? फ्रेंक वू ने पास में पड़ी एक किताब उठाई और कहा, इसे मैं खोलता हूं; गौर से देखो। किताब खोलकर रखी, कहा, आंख बंद करो और मुझे कहो कि किताब खुलती देखकर तुम्हें क्या खयाल आता है?
उसने कहा, मुझे फिर किसी को मारने की ही याद आती है!
फ्रेंक वू और हैरान हुआ। उसने टेबल पर पड़ी हुई घंटी बजाई और कहा कि घंटी को ठीक से सुनो! आंख बंद करो। क्या याद आता है? उसने कहा, वही किसी को मारने का खयाल आता है!
फ्रेंक वू ने कहा, बड़ी हैरानी की बात है कि तीन बिलकुल अलग चीजें तुम्हें एक ही चीज की याद कैसे दिलाती हैं! रूमाल का गिरना, किताब का खुलना, घंटी का बजना--इतनी विभिन्न बातें हैं! तुम्हें इन तीनों में एक ही बात का खयाल आता है; कारण क्या है?
उस आदमी ने कहा, तुम्हारी चीजों से मुझे कोई संबंध नहीं। मुझे सिवाय मारने के और कोई खयाल आता ही नहीं। तुम्हारी चीजों से कोई संबंध नहीं है। तुम रूमाल गिराओ कि पत्थर गिराओ। तुम घंटी बजाओ कि घंटा बजाओ। तुम किताब खोलो कि बंद करो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं तो सिवाय मारने के कुछ सोचता ही नहीं।
यह आदमी पागल मालूम पड़ेगा। लेकिन दुनिया में सौ में से निन्यानबे आदमी इस भांति के हैं। उन्हें पता हो या न पता हो। और जिन्हें पता है, उनकी तो चिकित्सा हो सकती है; जिन्हें पता नहीं है, वे बड़ी खतरनाक हालत में हैं।
जहां भी दूसरे से सुख लेने की आकांक्षा है, वहीं काम है।
एक आदमी का दिमाग खराब हुआ और खयाल पैदा हो गया कि वह मर गया है। जिंदा था, खयाल पैदा हो गया कि मर गया है। घर के लोग परेशान हो गए। समझा-समझाकर हैरान हो गए कि तुम जिंदा हो। लेकिन वह कहे, मैं कैसे मानूं, जब मैं मर ही चुका हूं! कैसे समझाएं इस आदमी को कि यह आदमी जिंदा है! लोग कहते कि हमें देखो, तुम्हारे सामने खड़े हैं। वह कहता कि तुम सब भी मर गए हो। भूत-प्रेत हैं। हम सब भूत-प्रेत हो गए हैं। कोई जिंदा नहीं है, सब मर चुके हैं। लोग कहते, हम तुमसे बोल रहे हैं। वह कहता, मैं सुन रहा हूं। लेकिन सब भूत-प्रेत हैं। कोई जिंदा है नहीं।
बड़े परेशान हो गए, तब उसको चिकित्सक के पास ले गए। चिकित्सक ने कहा, घबड़ाओ मत। हम कुछ इसे कनविन्स करने का उपाय करते हैं। इसे समझाएंगे। उस आदमी से कहा, आईने के सामने खड़े हो जाओ। वह आदमी आईने के सामने खड़ा हो गया। और उससे कहा, तीन घंटे तक मंत्र की तरह एक ही बात कहते रहो, dead man do not blead। मरे हुए आदमियों के शरीर से खून नहीं निकलता, तीन घंटे तक कहते रहो।
वह आदमी तीन घंटे तक कहता रहा, मरे हुए आदमी के शरीर से खून नहीं निकलता, dead man dont bleed। तीन घंटे के बाद चिकित्सक उसके पास गया, हाथ में चाकू मारा उस पागल के, खून बहने लगा। प्रसन्नता से हंसकर कहा कि देखो, इससे क्या सिद्ध होता है? What is proved by this? हाथ से खून निकल रहा है! उस आदमी ने कहा कि this proves that dead man do bleed--इससे सिद्ध होता है कि मरे आदमी में से खून निकलता है। और क्या सिद्ध होता है!
सारे तर्क बेमानी हैं।
अगर संशय मिटाना है, तो तुम पक्ष-विपक्ष में मत पड़ो।
एक आदमी बहुत परेशान है। वह चिकित्सक के पास गया। वह कहता है, मेरी परेशानी यही है कि जब रात मैं बिस्तर के ऊपर सोता हूं, तो मुझे ऐसा लगता है कि बिस्तर के नीचे कोई है। फिर मैं नीचे चला जाता हूं सोने के लिए, देखता हूं, कोई नहीं है। लेकिन तब मुझे लगता है, ऊपर कोई है। फिर मैं ऊपर आता हूं, तब ऊपर किसी को नहीं पाता। पाता हूं कि अब नीचे कोई है। ऐसा रातभर मैं बिस्तर के ऊपर-नीचे होता रहता हूं। नींद मेरी नष्ट हो गई है। मैं पागल हुआ जा रहा हूं। मुझे छुटकारा दिलाओ। जानता हूं भलीभांति, नीचे जाकर पाता हूं, कोई नहीं है। लेकिन तब तक मुझे लगता है, ऊपर कोई है। अब मैं नीचे हूं, ऊपर का भरोसा कैसे करूं कि नहीं है? जाऊं, तभी पता चले। लेकिन जब तक ऊपर जाता हूं, तब तक लगता है, नीचे कोई है!
मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह बहुत कठिन मामला है। दो वर्ष लग जाएंगे। फिर भी पक्का नहीं कहा जा सकता कि आप इस नासमझी के बाहर हो सकेंगे। कोशिश मैं करूंगा। सौ रुपए सप्ताह का खर्च होगा। हर सप्ताह दो बैठक मुझे तुम्हें देनी पड़ेंगी। और दो साल मेहनत चलेगी। उस आदमी ने कहा, इतनी मेरी आर्थिक हैसियत नहीं है। इतना लंबा इलाज मैं न करवा पाऊंगा। फिर भी मैं कोशिश करता हूं। पत्नी से जाकर बात कर लूं। कोई रास्ता बन जाए, तो मैं इलाज करवा लूं। मैं कल आपको खबर करूंगा।
लेकिन उस आदमी ने सात दिन तक कोई खबर न की। मनोवैज्ञानिक रास्ता देखता रहा। सातवें दिन उसने फोन किया कि क्या हुआ? आप आए नहीं! उसने कहा कि मैं बिलकुल ठीक हूं। हद हो गई! मेरी पत्नी ने इलाज कर दिया! मनोवैज्ञानिक ने कहा, कैसा इलाज किया होगा? क्या तुम ठीक हो गए? उस आदमी ने कहा, बिलकुल ठीक। तुम्हारी पत्नी ने क्या किया? मनोवैज्ञानिक हैरान हुआ; क्योंकि बीमारी खतरनाक थी और लंबी दिखाई पड़ती थी। उस आदमी ने कहा, मेरी पत्नी ने केवल बिस्तर के चारों पैर काट डाले; पलंग के चारों पैर काट दिए और कुछ नहीं किया। अब नीचे किसी के होने का उपाय ही नहीं रहा। अब मैं मजे से सो रहा हूं!
और मैं आपसे कहता हूं कि वह मनोवैज्ञानिक दो साल नहीं, दो सौ साल में भी उस आदमी को ठीक न कर पाता। कई बार जरा सा गलत रुख, और यात्रा कितनी ही हो, मंजिल फिर नहीं मिलती।
'आज' भगवान का दिया हुआ एक उपहार है, इसीलिए इसे 'PRESENT' कहते हैं।
नार्सीसस एक बहुत सुंदर युवक हुआ। वह इतना सुंदर था कि एक झील में अपने ही प्रतिबिंब को देख कर मोहित हो गया। मगर तुम उसकी मुसीबत समझ सकते हो जैसे ही झील में उतरे, झील कंप जाए, प्रतिबिंब खो जाए; किनारे पर बैठे, झील शांत हो जाए, लहरें विलीन हो जाएं, फिर प्रतिबिंब दिखाई पड़ने लगे। वह वहीं झील के किनारे बैठा-बैठा मर गया। उसकी याददाश्त में नदियों और झीलों के किनारे उगने वाले एक पौधे का नाम नार्सीसस रख दिया गया है। वह पौधा झील और नदी के किनारे ही उगता है और सदा झील की तरफ झुका रहता है और झील के दर्पण में अपने को देखता रहता है। वह पौधा भी!
मनोविज्ञान कहता है. नार्सीसस जैसा जो हो जाएगा, वह विक्षिप्त हो गया, रुग्ण हो गया। जितना तुमने अपने को दूसरों से तोड़ लिया उतने ही तुम परमात्मा से टूट गए -- रह गए अकेले, एकांगी, एकाकी। बचा सिर्फ तुम्हारा अहंकार। मनोविज्ञान इस तरह की मनोवृत्ति को कहता है -- नार्सिसिज्म। इसी नार्सीसस की यूनानी कथा के आधार पर यह शब्द बना। कहानियां हैं कि संतों ने अपनी आंखें फोड़ लीं कि कहीं रूप से आकर्षित न हो जाएं कि अपने कान फोड़ लिए कि कहीं संगीत प्रभावित न कर दे।
जैसे श्वास कभी भीतर आती है और कभी बाहर जाती है -- ऐसे जीओ।
चमचासन : सबसे पहले सीधे खड़े हो जाइए। मुंह पर भोलापन और आंखों में मक्कारी लाइए। फिर क्रमशः भोलापन को दीनता में बदलिए और मक्कारी को चाटुकारिता में परिवर्तित कीजिए। अब टांगों को सीधा रख कर धीरे-धीरे झुकते हुए नासिका को जमीन पर पहले से रखे हुए जूतों पर रगड़िए। और गहरी-गहरी श्वास लीजिए। कुहनियों को पेट से सटा कर दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम की मुद्रा बनाइए। जब तक जूते हटा न लिए जाएं तब तक सीधे खड़े मत होइए। प्रारंभ में इस आसन में कठिनाई होती है और स्वाभिमान आड़े आता है, किंतु एक सप्ताह के निरंतर अभ्यास से स्वाभिमान का सत्यानाश हो जाएगा और साधक एक सुयोग्य चमचा बन कर आशातीत लाभ उठाएगा।
नहीं नौकरी मिल रही बैठे हो बेकार ।
चमचासन की कृपा से, हो जाए उद्धार ॥
हो जाए उद्धार, उदासी दूर भगाओ ।
बिना परिश्रम इनक्रीमेंट प्रमोशन पाओ ॥
क्लर्कासन : सर्व प्रथम कुर्सी पर तन कर बैठ जाइए, बिलकुल सीधे बैठ जाइए! और मस्तिष्क में फाइलों की कल्पना करिए। दाहिनी काल्पनिक फाइलों को बाएं हाथ में उठा कर बाईं ओर रखने जैसी क्रिया कीजिए। पुनः दाहिने हाथ से बायीं फाइल को झटके के साथ दाहिनी और फेंकने का उपक्रम कीजिए। अब एक काल्पनिक सिगरेट को दो अंगुलियों के बीच दबाकर श्वास अंदर खींचकर कुंभक कीजिए। अर्थात धुएं को भीतर रोकिए, फिर उसी धुआं मिश्रित श्वास का नासिका-रंध्रों द्वारा रेचन कीजिए। संपूर्ण क्रिया को पांच बार दोहराइए। अंतिम बार रेचक क्रिया करते समय मुंह को गोल बना कर जैसी अंग्रेजी का ओ बोलते समय बनाया जाता है, झटके से सांस छोड़िए ताकि वायुमंडल में धुएं के वर्तुलाकार छल्ले तैरने लगें। तब दोनों हाथों को कुर्सी के हत्थों पर टिका कर दोनों पैरों को सिकोड़कर उठाइए और आहिस्ता-आहिस्ता मेज पर लंबे हो कर आराम फरमाइए। आप चाहें तो खर्राटे भी भर सकते हैं।
क्लर्कासन के लाभ--
घर से दफ्तर को चलो, कर नाश्ता भरपेट ।
उलटो पलटो फाइलें, सुलगाओ सिगरेट ॥
सुलगाओ सिगरेट, इत्र का फाहा सूंघो ।
पांव मेज पर फैलाकर, जी भर कर ऊंघो ॥
घर बच्चों के कारण, रह गया रेस्ट अधूरा ।
दफ्तर में हो जाए, नींद का कोटा पूरा ॥
समता
कथा :
मजिस्ट्रेट सुबह-सुबह आया और उसने अदालत में खड़े होकर कहा कि जैसा कि आप सब जानते हैं--जूरी, वकील, और अदालत के सारे लोग--कि मैं सदा ही न्याय और समता में प्रतिष्ठित रहता हूं। आज तक मैंने कभी किसी का पक्ष नहीं लिया। कानून एकमात्र मेरी दृष्टि है। लेकिन आज जिस मुकदमे का मुझे फैसला करना है, उस मुकदमे के एक पक्ष ने कल रात मेरे घर एक लिफाफा भेजा, उसमें चार हजार रुपए भेजे। उसके आधी घड़ी बाद दूसरे पक्ष ने भी एक लिफाफा भेजा और उसमें पांच हजार रुपए भेजे। अब मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। लेकिन जैसा कि मेरी सदा की आदत है, मैं कोई समता का मार्ग निकाल लेता हूं। वह मैंने निकाल लिया है। जिसने पांच हजार भेजे हैं, वह हजार रुपए वापस ले जाए। चार-चार हजार दोनों के बराबर रह गए। अब समता से अदालत का काम आगे चल सकता है!
हमारी समताएं ऐसी ही हैं। अगर हम दूसरे दो व्यक्तियों के प्रति समता भी रख लें, तो भी अपने प्रति और दूसरों के बीच समता नहीं रख पाते। असली समता दूसरे दो व्यक्तियों के बीच निर्मित नहीं होती, अपने और दूसरे के बीच निर्मित होती है!
उस मजिस्ट्रेट ने ठीक कहा। जहां तक दोनों पक्षों का सवाल है, बात समान हो गई। दोनों के चार-चार हजार रिश्वत में मिल गए। अब बात शुरू हो सकती है, जैसे कि न मिले हों। चार हजार ने चार हजार काट दिए। लेकिन जहां तक मजिस्ट्रेट का संबंध है, उसके पास आठ हजार रुपए हो गए। समता उसने दो अन्यों के बीच में खोज ली, अपने और अन्य के बीच में नहीं।
गहरी समता दो के बीच नहीं होती। गहरी समता सदा अपने और दूसरे के बीच होती है। दूसरे के बीच तटस्थ हो जाना बहुत आसान है। बहुत आसान है। सवाल तो तब उठते हैं, जब अपने और दूसरे के बीच तटस्थ होने की बात उठती है।
बर्ट्रेंड रसेल ने पंडित नेहरू की बहुत गहरी आलोचना की है, कीमती आलोचना की है। कहा है कि जब तक दूसरे दो मुल्कों के बीच झगड़े थे, पंडित नेहरू सदा तटस्थता की बात करते रहे। लेकिन जब वे खुद, उनका राष्ट्र किसी मुल्क के साथ झगड़े में पड़ा, तब सारी तटस्थता खो गई। तब उन्होंने वही काम किया, जो उस मजिस्ट्रेट ने किया। आसान है सदा।
दो लोग लड़ रहे हों रास्ते पर, आप किनारे खड़े होकर कह सकते हैं कि हम तटस्थ हैं, न्यूट्रल हैं, हम किसी के पक्ष में नहीं हैं। असली सवाल तो यह है कि जब कोई आपकी छाती पर छुरा लेकर खड़ा हो जाए, तब आप तटस्थ रह पाएं।
समता दो के बीच नहीं, अपने और अन्य के बीच समता है। और निःसंशय, शांत, सम वही होता है, जो अपने प्रति भी तटस्थ हो जाता है; जो अपने प्रति भी साक्षी हो जाता है; जो अपने को भी अन्य की भांति देखने लगता है।
मूर्ख दुर्बुद्धि जन प्रमाद में लगे रहते हैं, मेधावी श्रेष्ठ धन के सामान अप्रमाद की रक्षा करता है ।
बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की कथा कही है। और कहा है कि अपने पिछले जन्म में, जब मैं ज्ञान को उपलब्ध नहीं था, तब उस समय एक बुद्धपुरुष थे, कोई ज्ञान को उपलब्ध हो गए थे, तो मैं उनके दर्शन करने गया। मैंने झुककर उनके पैर छुए। स्वाभाविक! उन्होंने जान लिया था, मैं अज्ञानी था। मैं पैर छूकर खड़ा भी न हो पाया था कि मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया। मैंने क्या देखा, अनपेक्षित, कि वे बुद्धपुरुष मेरे चरणों में सिर रखे हैं, झुक गए हैं। घबड़ाकर मैंने उन्हें ऊपर उठाया और कहा कि आप यह क्या करते हैं! यह तो मेरे साथ...मुझे पाप लगेगा। मैं आपके पैर छुऊं, यह तो ठीक, क्योंकि आप जानते हैं और मैं नहीं जानता। और आप मेरे पैर छुएं!
तो उन बुद्धपुरुष ने हंसकर कहा था कि जो तेरे भीतर बैठा है, मैं भलीभांति जानता हूं, वह वही है जो मेरे भीतर बैठा है। तुझे पता नहीं है, कभी पता चल जाएगा। जब तुझे पता चल जाएगा, तब तेरी समझ में आ जाएगा यह राज कि मैंने तेरे पैर क्यों छुए थे! मैंने तेरे पैर क्यों छुए थे, यह राज तुझे कभी समझ में आ जाएगा। आज तुझे पता नहीं कि तेरे भीतर वही हीरा छिपा है, जो मेरे भीतर। तू तो नहीं जानता है, इसलिए अगर मैं तेरे पैर न भी छुऊं, तो तुझे पता नहीं चलेगा। लेकिन मैं तो जानता हूं; अगर मैं तेरे पैर न छुऊं, तो मेरे सामने ही मैं गिल्टी और अपराधी हो जाऊंगा। मैं जानता हूं कि वही तेरे भीतर भी छिपा है, जो मेरे भीतर छिपा है।
यह सादृश्य है। यह समता है।
जिसे तुम चाहते हो उससे प्रेम करना नगण्य है। किसी से इसलिए प्रेम करना क्योंकि वह तुमसे प्रेम करता है यह महत्वहीन है। किसी ऐसे से प्रेम करना जिसे तुम नहीं चाहते, मतलब तुमने जीवन से कुछ सीखा है। किसी ऐसे से प्रेम करना जो तुमसे घृणा करे यह दर्शाता है की तुमने जीवन जीने की कला सीख ली।
परिवर्तन
कथा :
एक साधु-चित्त व्यक्ति वर्षों से एक कारागृह के कैदियों को परिवर्तित करने के लिए श्रम में रत था। वर्षों से लगा था कि कारागृह के कैदी रूपांतरित हो जाएं, ट्रांसफार्म हो जाएं। कोई सफलता मिलती हुई दिखाई नहीं पड़ती थी। पर साधु वही है कि जहां असफलता भी हो, तो भी शुभ के लिए प्रयत्न करता रहे। उसने प्रयत्न जारी रखा था।
एक दिन चार बार सजा पाया हुआ व्यक्ति, चौथी बार सजा पूरी करके घर वापस लौट रहा है। साठ वर्ष उस अपराधी की उम्र हो गई। उस साधु ने उसे द्वार पर जेलखाने के विदा देते समय पूछा कि अब तुम्हारे क्या इरादे हैं? आगे की क्या योजना है? उस बूढ़े अपराधी ने कहा, अब दूर गांव में मेरी लड़की का एक बड़ा बगीचा है अंगूरों का। अब तो वहीं जाकर अंगूरों के उस बगीचे में ही मेहनत करनी है, विश्राम करना है।
साधु बहुत प्रसन्न हुआ, खुशी से नाचने लगा। उसने कहा कि मुझे कुछ दिन से लग रहा था, कुछ तुम्हारे भीतर बदल रहा है। उस कैदी ने चौंककर रहा, किसने तुमसे कहा कि मैं बदल रहा हूं? मैं सिर्फ रिटायर हो रहा हूं। किसने कहा कि मैं बदल रहा हूं, मैं सिर्फ थक गया हूं और अब विश्राम को जा रहा हूं!
अर्जुन रिटायर होना चाहता था; कृष्ण reform करना चाहते हैं। अर्जुन चाहता था, सिर्फ बच निकले! कृष्ण उसकी पूरी जीवन ऊर्जा को नई दिशा दे देना चाहते हैं।
किसी नगरी में दो भाई रहते थे। उस नगरी में सर्वाधिक धन उन्हीं के पास था। शायद नगरी का नाम था, अंधेर नगरी! बडा भाई बडा धार्मिक था। रोज नियमित मंदिर जाता था। दान-पुण्य करता था। कथा-वार्ता सुनता था। साधु-संतों का सत्संग करता था। उसके कारण भवन में प्रतिदिन ही महात्माओं की भीड जुडी रहती थी। इस लोक में साधु-संतों की सेवा से वह परलोक में स्वर्ग का अधिकारी बन गया था। ऐसा वे साधु-संत उसे समझाते थे। शास्त्रों में भी ऐसा ही लिखा है, क्योंकि वे शास्त्र भी उन्हीं साधु-संतों के गिरोह ने बनाए हैं। वह एक ओर धन का शोषण करता था और दूसरी ओर दान-पुण्य करता। दान-पुण्य के बिना स्वर्ग नहीं है। धन के बिना दान-पुण्य नहीं है। शोषण के बिना धन नहीं है। अधर्म से धन होता है और फिर धन से धर्म होता है! वह दूसरों का शोषण करता था। साधु-संत उसका शोषण करते थे और शोषकों-शोषकों में तो सदा से ही मैत्री रही है! लेकिन उसे अपने छोटे भाई पर सदा ही बहुत दया आती थी। वह धन जुटाने में कुशल नहीं था, और परिणामतः धर्म जुटाने में भी असफल हुआ जाता था। उसका प्रेम और सत्य का व्यवहार ही उसके और परमात्मा के आडे आ रहा था! फिर न वह मंदिर ही जाता था और न धर्म-शास्त्रों का क, ख, ग, ही जानता था। उसकी स्थिति निश्चित ही दयनीय थी और परलोक में उसका खाता खाली पडा था। साधु-संतों से भी वह ऐसे बचता था, जैसे लोग छुतही बीमारियों से बचते हैं। महात्मागण घर में एक द्वार से आते तो वह दूसरे द्वार से बाहर हो जाता था। उसका धार्मिक भाई अनेक महात्माओं से अपने अधार्मिक भाई के हृदय-परिवर्तन के लिए प्रार्थना करता था। लेकिन जब वह महात्माओं के सान्निध्य में रुके तभी तो परिवर्तन हो। वह तो रुकता ही नहीं था। लेकिन एक दिन एक पूरे और असली महात्मा आ पहुंचे। उन्होंने न मालूम कितने अधार्मिकों को धार्मिक बना दिया था। साम, दाम, दंड, भेद, सभी में वे कुशल थे। लोगों को धार्मिक बनाना ही उनका धंधा था। ऐसे ही महात्माओं पर तो धर्म की आधारशिलाएं टिकी हैं। नहीं तो धर्म तो कभी का ही मिट-मिटा गया होता। उनसे भी बडे भाई ने अपनी प्रार्थना दुहराई तो वे बोलेः 'घबडाओ मत। उस मूर्ख की अब शामत आ गई है। मैं उससे प्रभु-स्मरण कराके ही रहूंगा। मैं जो कहता हूं, उसे सदा पूरा करता हूं।' यह कह कर उन्होंने अपना डंडा उठाया और बडे भाई के साथ हो लिए। पहले वे एक पहलवान थे। फिर महात्मागिरी को पहलवानी से भी अच्छा धंधा समझ महात्मा हो गए थे। उन्होंने आते ही छोटे भाई को पकड लिया। न केवल पकडा ही, बल्कि गिरा कर उसकी छाती पर सवार हो गए। वह युवक कुछ समझ ही न पाया। हैरानी से वह अवाक ही रह गया। फिर भी उसने कहाः 'महानुभाव! यह क्या करते हैं? ' महात्मा ने कहाः 'हृदय-परिवर्तन।' वह युवक हंसा और बोलाः 'छोडिए। यह भी हृदय-परिवर्तन की कोई राह है? देखिए, कहीं आपकी देह को कुछ चोट न लग जाए!' महात्मा बोलेः 'हम देह को माननेवाले नहीं। हम तो ब्रह्म को मानते हैं। 'राम' कहो, तभी छोडेंगे। नहीं तो हम से बुरा कोई भी नहीं है।' महात्मा बडे दयालु थे, सो उस युवक के हित के लिए मारने-पीटने को तैयार हो गए। उस युवक ने कहाः 'भय से भगवान का क्या संबंध? और भगवान का क्या कोई नाम है? और, नाम भी हो तो प्रभुमय जीवन चाहिए या उसका स्मरण? ऐसे तो मैं 'राम' नहीं बोलूंगा। चाहे जीवन रहे या जाए।' और फिर उसने महात्मा को धक्का दे नीचे गिरा दिया। गिर कर महात्मा बोलेः 'वाह, वाह! बोल दिया। 'मैं राम नहीं बोलूंगा', यह भी राम बोलना ही है।' उसका भाई महात्मा के गिराए जाने से छोटे भाई पर बहुत नाराज हुआ, लेकिन महात्मा से वह बहुत प्रसन्न था। नास्तिक भाई से उसने प्रभु-स्मरण जो करा दिया था! राम-नाम की महिमा तो अपार है। उसे तो एक बार भूल से बोलने से भी मनुष्य भवसागर से तर जाता है! उस दिन उसने नगर-भोज दिया। उसका छोटा भाई धार्मिक जो हो गया था!
कुएं का मेंढक
कथा :
समुद्र का एक मेंढक तीर्थ-यात्रा को निकला होगा। राह में थकान आ गई, थका-मांदा है; एक कुएं में विश्राम करने को रुका। कुएं के मेंढक ने बड़ा स्वागत भी किया और कहा, 'मित्र, कहां से आते हो? ' उसने कहा, 'सागर से।' कुएं के मेंढक ने कहा, 'सागर? सागर यानी क्या? सागर कहां है? कितना बड़ा है? ' कुएं के मेंढक ने तो कभी कुएं के बाहर जाकर देखा नहीं। उसकी तो सारी दुनिया वहीं सीमित है, उस छोटे से घेरे में।
सागर वाला मेंढ़क कुछ चुप ही रह गया; कुछ उत्तर न खोज पाया; कुछ ठगा सा रह गया-अवाक! उसकी सहायता के लिए कुएं का मेंढ़क चैथाई कुएं में छलांग लगाया और कहा, 'इतना बड़ा है सागर? ' सागर के मेंढक ने कहा, 'नहीं, नहीं।'
कुएं के मेंढ़क ने आधे कुएं तक छलांग लगाई और कहा, 'इतना बड़ा है सागर? ' सागर के मेंढ़क ने कहा, 'क्षमा करो। समझाना कठिन है। तुम कुएं के कभी बाहर गए हो? ' कुएं के मेंढक ने कहा, 'कुएं के बाहर कुछ है भी? जाने योग्य रखा क्या है? जो है-यहां है। सब सुख यहां है। सब सार यहां है।' उसने तीन-चैथाई कुएं की छलांग लगाई और कहा, 'इतना बड़ा है? ' लेकिन अब भी ना की आवाज सुन कर, वह थोड़ा नाराज हुआ। उसने पूरे कुएं का एक चक्कर लगाया और कहा, 'इतना बड़ा है? '
लेकिन जब सागर के मेंढक ने कहा कि 'नहीं मित्र, तुम्हारे कुएं से कोई तुलना नहीं की जा सकती। सागर इतना बड़ा है कि भेद परिमाण का ही नहीं है, गुण का है। ऐसे नहीं कह सकता कि इतना बड़ा है, कि इससे हजार गुना बड़ा है, कि करोड़ गुना बड़ा है। कितना ही गुना कहूं, सागर बहुत बड़ा है।'
कुएं के मेंढक ने कहा, 'अच्छा, बाहर निकलो। रास्ता पकड़ो। झूठे कहीं के! यह शिष्टाचार है कि मैंने तुम्हें अपने घर में मेहमान बनाया और तुम मेरे घर की निंदा कर रहे हो! आतिथेय की--अतिथि होकर-निंदा कर रहे हो? निकलो बाहर, रास्ता पकड़ो अपना। कुएं से बड़ी कोई चीज दुनिया में नहीं है।'
जीवन कटना था, कट गया
अच्छा कटा, बुरा कटा, यह तुम जानो
मैं तो यह समझता हूं कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया
जीवन कटना था कट गया।
रीता है क्या कुछ, बीता है क्या कुछ
यह हिसाब तुम करो, मैं तो यह कहता हूं
परदा भरम का जो हटना था, हट गया
जीवन कटना था कट गया।
क्या होगा चुकने के बाद, बूंद-बूंद रिसने के बाद
यह चिंता तुम करो, मैं तो यह कहता हूं
करजा जो मिटटी का पटना था, पट गया
जीवन कटना था कट गया।
बंधा हूं कि खुला हूं, मैला हूं कि धुला हूं
यह बिचार तुम करो, मैं तो यह सुनता हूं
घट-घट का अंतर जो घटना था, घट गया
जीवन कटना था कट गया।
-- पद्मश्री श्री गोपाल दास नीरज
सुख-दुःख
कथा :
इमेनुअल कांट, जर्मनी का एक बहुत प्रज्ञावान पुरुष, रात दस बजे सो जाता था, सुबह चार बजे उठता था। नौकर से कह रखा था, जो उसकी सेवा करता था, कि दस और चार के बीच कुछ भी हो जाए, भूकंप भी आ जाए, तो मुझे मत उठाना।
लेकिन फिर ऐसा हुआ कि इमेनुअल कांट जिस विश्वविद्यालय में शिक्षक था, अध्यापक था, उस विश्वविद्यालय ने तय किया कि उसे चांसलर, कुलपति बना दिया जाए। रात बारह बजे तार आया; नौकर को तार मिला। इतनी खुशी की बात थी। गरीब इमेनुअल कांट, साधारण प्रोफेसर था, चांसलर होने का निर्णय किया विश्वविद्यालय की एकेडेमिक कौंसिल ने! तो नौकर भूल गया यह। सोचा था कि भूकंप के लिए मना किया है। मगर यह तो बात इतनी खुशी की, इतने सुख की है, इसकी तो खबर दे देनी चाहिए।
गया और जाकर इमेनुअल कांट को हिलाया और उठाया, कहा कि शुभकामनाएं करता हूं! आपको विश्वविद्यालय ने कुलपति चुना। इमेनुअल कांट ने आंख खोली, एक चांटा नौकर को मारा और वापस चादर ओढ़कर सो गया।
नौकर तो बहुत हैरान हुआ। बड़ा हैरान हुआ! यह क्या हुआ? भूकंप को मना किया था; यह तो बात ही कुछ और है!
सुबह इमेनुअल कांट ने उठकर पहला तार यूनिवर्सिटी आफिस को किया कि मुझे क्षमा करें, इस पद को मैं स्वीकार न कर सकूंगा, क्योंकि इस पद के कारण मेरे नौकर को भी भ्रांति हुई और कहीं मुझे न हो जाए। इसमें मैं नहीं पडूंगा। इस पद के कारण मेरी कल की नींद खराब हुई, अब और आगे की नींद मैं खराब न करूंगा। इससे झंझटें आएंगी। इससे झंझटों की शुरुआत हो गई। वर्षों से मैं कभी दस और चार के बीच उठा नहीं!
सुबह नौकर से कहा कि तू बिलकुल पागल है! नौकर ने कहा, लेकिन आपने तो कहा था, भूकंप आए तो नहीं उठाना है! कांट ने उसे कहा कि दुख के भी भूकंप होते हैं, सुख के भी भूकंप होते हैं। और जो सुख के भूकंप स्वीकार कर लेता है, उसी के घर दुख के भूकंप आते हैं; अन्यथा कोई कारण नहीं है। शुरुआत हो गई थी। अगर मैं कल खुश होकर तुझे धन्यवाद दे देता, तो मैं गया था! बस, मैंने फिर निमंत्रण दे दिया, दरवाजे खोल दिए दुख के लिए।
उस नौकर ने कहा, लेकिन मुझे आपने चांटा क्यों मारा? कांट ने कहा कि तू समझता होगा, मिठाई बांटूंगा! तो मैंने तुझे खबर दी कि जिसे तू सुख समझकर आ रहा है, उससे भी आखिर में दुख ही आने वाला है, इसलिए मैंने कहा, चांटा अभी ही मार दूं। तुझे भी पता होना चाहिए कि सुख सदा दुख को ही लाता है पीछे, देर-अबेर।
जागें। सुख को समझने की कोशिश करें।
शोकरहित धीर शोकग्रस्त जनों को ऐसे देखता है जैसे कि पर्वत पर खडा हुआ धरति पर खड़े हुए लोगों को देखे ।
बुद्ध को वैराग्य उत्पन्न होने की जो बड़ी कीमती घटना है, वह मैं आपसे कहूं।
बुद्ध के पिता ने बुद्ध के महल में उस राज्य की सब सुंदर स्त्रियां इकट्ठी कर दी थीं। रात देर तक गीत चलता, गान चलता, मदिरा बहती, संगीत होता और बुद्ध को सुलाकर ही वे सुंदरियां नाचते-नाचते सो जातीं। एक रात बुद्ध की नींद चार बजे टूट गई। एर्नाल्ड ने अपने लाइट आफ एशिया में बड़ा प्रीतिकर, पूरा वर्णन किया है।
चार बजे नींद खुल गई। पूरे चांद की रात थी। कमरे में चांद की किरणें भरी थीं। जिन स्त्रियों को बुद्ध प्रेम करते थे, जो उनके आस-पास नाचती थीं और स्वर्ग का दृश्य बना देती थीं, उनमें से कोई अर्धनग्न पड़ी थी; किसी का वस्त्र उलट गया था; किसी के मुंह से घुर्राटे की आवाज आ रही थी; किसी की नाक बह रही थी; किसी की आंख से आंसू टपक रहे थे; किसी की आंख पर कीचड़ इकट्ठा हो गया था।
बुद्ध एक-एक चेहरे के पास गए और वही रात बुद्ध के लिए घर से भागने की रात हो गई। क्योंकि इन चेहरों को उन्होंने देखा था; ऐसा नहीं देखा था। लेकिन ये चेहरे असलियत के ज्यादा करीब थे। जिन चेहरों को देखा था, वे मेकअप से तैयार किए गए चेहरे थे, तैयार चेहरे थे। ये चेहरे असलियत के ज्यादा करीब थे। यह शरीर की असलियत है।
लेकिन जैसी शरीर की असलियत है, वैसे ही सभी सुखों की असलियत है। और एक-एक सुख को जो एक्सरे मेडिटेशन करे, एक-एक सुख पर एक्सरे की किरणें लगा दे, ध्यान की, और एक-एक सुख को गौर से देखे, तो आखिर में पाएगा कि हाथ में सिवाय दुख के कुछ बच नहीं रहता। और जब आपको एक सुख की व्यर्थता में समस्त सुखों की व्यर्थता दिखाई पड़ जाए, और जब एक सुख के डिसइलूजनमेंट में आपके लिए समस्त सुखों की कामना क्षीण हो जाए, तो आपकी जो स्थिति बनती है, उसका नाम वैराग्य है।
वैराग्य का अर्थ है, अब मुझे कुछ भी आकर्षित नहीं करता। वैराग्य का अर्थ है, अब ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए मैं कल जीना चाहूं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे पाए बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।
मनुष्यों में पार जाने वाले लोग विरले ही होते हैं, बाकी तो तट पर ही दौड़ने वाले होते हैं ।
अरब में एक छोटी-सी कहावत है। एक बूढ़े ऊंट से किसी ने पूछा कि तुम पहाड़ पर चढ़ते वक्त ज्यादा आनंद अनुभव करते हो कि पहाड़ से नीचे उतरते वक्त? उसने कहा, ये दोनों बातें फिजूल हैं। असली सवाल यह है कि मेरे ऊपर बोझ है या नहीं। ऊपर-नीचे का कोई सवाल नहीं है। मेरा दोनों वक्त एक ही काम रहता है। चाहे पहाड़ के नीचे जाऊं, तो बोझ ले जाता हूं। चाहे पहाड़ के ऊपर जाऊं, तो बोझ ले जाता हूं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सदा बोझ ही ढोता हूं।
पुण्य करने में जल्दी करे, पाप से चित्त को हटाए; धीमी गति से पुण्य करने वाले का मन पाप में लीन होने लगता है ।
ईरान के एक बादशाह का वजीर एक जुर्म में पकड़ा गया। और जुर्म यह था कि उसने कानून के खिलाफ तीन विवाह कर लिए थे और तीनों औरतों को धोखा दिया था। एक ही विवाह कर सकता था, तीन विवाह कर लिए थे और हर स्त्री को धोखा दिया था कि मैं अविवाहित हूं।
यह बात पकड़ गई और सम्राट ने उस वजीर को कहा कि यह तो बहुत ही खतरनाक जुर्म है। अपने न्यायाधीशों से कहा, कठिन से कठिन सजा खोजो। अगर यह भी सजा हो कि इसको फांसी देनी पड़े, तो फांसी दो। लेकिन न्यायाधीशों ने एक सप्ताह विचार किया और कहा कि नहीं, फांसी देने को हम बड़ी कठिन सजा नहीं मानते। हमने और दूसरी सजा खोजी है। बादशाह ने कहा, हैरान करते हो मुझे तुम। फांसी से और कठिन सजा क्या हो सकती है? उन्होंने कहा कि तीनों औरतों के साथ इस आदमी को इकट्ठा रहने दो।
कहते हैं, इक्कीसवें दिन उस आदमी ने आत्महत्या कर ली। और वह चिट्ठी लिखकर रख गया कि यह सजा मुझे तो दी, लेकिन कभी अब किसी और को मत देना। इससे तो फांसी बेहतर थी।
पापी भी, जब तक पाप का विपाक नहीं होता, उसे अच्छा ही समझता है; जब विपाक होता है, तब पापी पापों को देखने लगता है ।
एक अमेरिकी फिल्म निर्माता नई अभिनेत्री की तलाश में था। अपने एक कवि मित्र को पकड़ लाया, जिसकी सौंदर्य के संबंध में बड़ी सुरुचि थी, जो सौंदर्य का पारखी था, और जिसने सुंदरतम स्त्री को खोजकर विवाह किया था। सौंदर्य पर उसने कविताएं लिखी थीं और सौंदर्य पर शास्त्र लिखे थे। एस्थेटिक्स पर उसकी बड़ी प्रसिद्ध किताबें थीं। उस फिल्म निर्माता ने सोचा कि इस मित्र कवि को ले चलूं; वह एक नई अभिनेत्री की तलाश में था।
एक विश्व सौंदर्य प्रतियोगिता हो रही थी, जहां दुनियाभर से कोई तीन दर्जन सुंदर युवतियां पुरस्कार लेने आई थीं। तो उसने कहा अपने मित्र को कि तुम बैठकर एक-एक स्त्री को ठीक से देखते जाना और जो स्त्री तुम्हें ठीक जंच जाए, मुझे इशारा कर देना, तो मैं उसे अपनी नई फिल्म के लिए प्रमुख पात्र बना लूं।
लेकिन फिल्म निर्माता बड़ी मुश्किल में पड़ गया। पहली ही सुंदर युवती आई; सभी स्त्रियां एक से एक ज्यादा सुंदर थीं; एक-एक राष्ट्र से चुनकर भेजी गई थीं। पहली स्त्री सामने आई--बगल में कवि बैठा था--अर्धनग्न, करीब-करीब नग्न। कवि ने उसे देखा और कहा, फूः। वह बहुत हैरान हुआ; निर्माता बहुत हैरान हुआ। उसने इतनी सुंदर स्त्री देखी नहीं थी। पर कवि ने कहा, फूः। वह स्त्री चली गई, दूसरी स्त्री आई। और भी सुंदर थी। पर कवि ने कहा, फूः। वे तीन दर्जन स्त्रियां सामने से जो गुजरती गईं और वह एक ही काम करता रहा, फूः! फूः!
वह चित्र निर्माता तो बहुत घबड़ा गया। और जब तीनों दर्जन स्त्रियां निकल गईं, तो उसने पूछा, आश्चर्य, मैं तो तुम्हें लाकर बड़ी मुश्किल में पड़ गया। कोई भी स्त्री पसंद नहीं पड़ी! जो भी स्त्री तुमने देखी, कहा, फूः। तो क्या मतलब है तुम्हारा? क्या चाहते हो तुम? क्या मापदंड है तुम्हारा?
उस कवि ने कहा, यू हैव मिसअंडरस्टुड मी सर; आप मुझे गलत समझे। आई वाज़ नाट सेइंग फूः-फूः टु दीज गर्ल्स। आई वाज़ सेइंग फूः टु माई वाइफ। यह मैं इन लड़कियों के लिए फूः-फूः नहीं कह रहा था; यह तो मैं अपनी पत्नी के लिए फूः-फूः कर रहा था।
पर उसने कहा कि पत्नी का इससे क्या संबंध? तो उसने कहा, जब मैंने पत्नी को पहली दफा देखा था, तो वह भी ऐसी ही अतीव सुंदरी मालूम पड़ी थी। फिर जैसे-जैसे पास आई, सब फूः-फूः सिद्ध हो गया। तो मैं जानता हूं कि यह सब जो रूपरेखा दिखाई पड़ रही है, यह पीछे फूः-फूः सिद्ध हो जाने वाला है। अब इस जगत में दुबारा शरीर की रेखाएं मुझे आकर्षित न कर पाएंगी। अब दुबारा शरीर का अनुपात मेरे लिए सौंदर्य न बन सकेगा। एक ही अनुभव ने मुझे बहुत कुछ कह दिया है।
इस जगत में एक अनुभव, उससे मिलते-जुलते सारे अनुभव की खबर दे जाता है। पर उसके लिए बहुत दूर तक देखने वाली दृष्टि, मेधा चाहिए।
अशोक युद्ध पर गया था। अल्पबुद्धि आदमी नहीं था। कलिंग के युद्ध पर लड़ा। एक लाख आदमी मारे गए। अशोक के पहले भी सम्राट लड़े हैं, बाद में भी लड़ते रहे हैं, सदा लड़ते रहेंगे। लेकिन जो अशोक को दिखाई पड़ा, वह पहले के सम्राटों को भी कभी दिखाई नहीं पड़ा, बाद के सम्राटों को भी कभी दिखाई नहीं पड़ा।
अशोक कलिंग के युद्ध से वापस लौटा, जीतकर लौटा था, लेकिन उदास लौटा।
जीतकर दुनिया में बहुत कम लोग हैं, जो उदास लौटते हैं। जीतकर तो आदमी प्रसन्न होकर लौटता है, अल्पबुद्धि का लक्षण है वह। जब कोई जीतकर प्रसन्न होकर लौटे, तो समझना कि वह अल्पबुद्धि है। और जब कोई हारकर प्रसन्न लौट आए, तो समझना कि वह अल्पबुद्धि नहीं है। जीतकर कोई उदास लौटे, तो समझना कि वह अल्पबुद्धि नहीं है। और जीतकर कोई हंसता हुआ लौटे, तो समझना कि वह अल्पबुद्धि है।
अशोक उदास लौट आया। उसे नाम ही उसके माता-पिता ने अशोक इसलिए दिया था कि वह कभी उदास नहीं होता था; सदा प्रफुल्लित था, चियरफुल था। उसे नाम ही इसलिए दिया था कि वह सदा आनंदित और प्रफुल्लित रहता था। लेकिन इतने बड़े राज्य को जीतकर लौटा है, कलिंग की विजय करके लौटा है, और उदास लौटा आया है! चिंता फैल गई है। उसके मित्रों ने पूछा, इतने उदास हो जीतकर! हार जाते तो क्या होता? स्वभावतः, अल्पबुद्धि के लिए यह सवाल उठा होगा। जीतकर इतने उदास हो, हार जाते तो क्या होता!
अशोक ने कहा, युद्ध अब असंभव है, एक अनुभव काफी सिद्ध हुआ। अब नहीं युद्ध कर सकूंगा, अब नहीं जीतने जा सकूंगा। क्योंकि कितनी कामना की थी कि कलिंग को जीत लूंगा, तो इतना आनंद मिलेगा। लेकिन कलिंग हाथ में आ गया, आनंद तो हाथ में नहीं आया। हालांकि मेरा मन फिर धोखा दे रहा है कि अभी और भी जीतने को जगह पड़ी है, उनको भी जीत लो। लेकिन इस मन की अब दुबारा नहीं मानूंगा। मानकर देख लिया एक बार; एक लाख आदमियों की लाशें बिछा दीं। सिर्फ खून बहा; हाथ में खून के दाग लगे। करुण चीत्कारें सुनाई पड़ीं; रोना; और न मालूम कितने घरों के दीए बुझ गए। और इस मन ने मुझे कहा था, आनंद मिलेगा; वह मैं भीतर खोज रहा हूं, वह मुझे कहीं मिला नहीं। लाखों लोग मर गए, लाखों परिवार उजड़ गए, और जिस सुख के लिए इस मन ने मुझे कहा था, उसकी रेखा भी मुझे दिखाई नहीं पड़ती। युद्ध समाप्त हो गया; मेरे लिए अब कोई युद्ध नहीं है।
और उसी दिन से अशोक ने भिक्षु की तरह रहना शुरू कर दिया। उसने कहा कि जब युद्ध मेरे लिए नहीं है, तो अब सम्राट होने का कोई अर्थ नहीं रहा। वह तो युद्ध के साथ जुड़ा हुआ भाव था--सम्राट होने का।
एच.जी.वेल्स ने विश्व इतिहास में लिखा है कि दुनिया में बहुत सम्राट हुए, लेकिन अशोक जैसा चमकता हुआ तारा विश्व के इतिहास में दूसरा नहीं है। कारण है उसका। महाबुद्धि है। और उसके महाबुद्धि होने की बात क्या है? राज क्या है? राज यह है कि युद्ध के एक अनुभव ने उसे मन का पूरा रहस्य समझा दिया।
प्रार्थना तो वही सार्थक है, जो वहां पहुंचा दे, जिसे मिलने पर फिर खोना नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक चर्च के पास से गुजर रहा है। उसकी पत्नी भी साथ है। उस चर्च में बड़ी तैयारियां हो रही हैं। बड़े फूल लगाए गए हैं। और बड़े दीए जलाए गए हैं। और द्वार पर लाल दरी बिछाई गई है। कोई स्वागत-समारंभ का इंतजाम हो रहा है। पत्नी पूछती है कि नसरुद्दीन, इस चर्च में? क्या होने वाला है? उस चर्च में एक विवाह की तैयारी हो रही है। नसरुद्दीन कहता है, इस चर्च में? एक तलाक की तैयारी हो रही है। एक तलाक का प्रारंभ! विवाह तलाक का ही प्रारंभ है। सब सुख दुख के प्रारंभ हैं।
आत्म-भाव में स्थित व्यक्ति को न तो कुछ पकड़ने की आकांक्षा रह जाती है, न कुछ छोड़ने की, इसलिए सुख-दुख समान हो जाते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन की सास मर गई । बड़ा प्रसन्न था, बड़ा आनंदित मालूम हो रहा था। उसकी पत्नी ने कहा कुछ तो शर्म खाओ। मेरी मां मर गई, तुम इतने प्रसन्न हो रहे हो! नसरुद्दीन ने कहा, इसीलिए तो प्रसन्न हो रहा हूं। उसकी पत्नी ने कहा कि कभी तो कुछ मेरी मां में तुमने अच्छा देखा होता! और अब तो वह मर भी गई। कुछ एकाध गुण तो कभी देखा होता! नसरुद्दीन ने कहा -- मैंने बहुत कोशिश की तेरी बात मानकर देखने की, लेकिन जब हो ही नहीं, तो दिखाई कैसे पड़े।
उसकी पत्नी दुखी तो थी ही मां के मरने से, छाती पीटकर रोने लगी। और उसने कहा, मेरी मां ने ठीक ही कहा था। शादी के पहले उसने बहुत जिद की थी कि इस आदमी से शादी मत करो। नसरुद्दीन ने कहा, क्या कहती है? तेरी मां ने शादी से रोका था? काश, मुझे पता होता तो मैं उसे इतना बुरा कभी भी नहीं समझता। बेचारी! अगर मुझे पता होता, तो उसे बचाने की कोशिश करता। इतनी भली स्त्री थी, यह तो मुझे पता ही नहीं था।
I have so much to do that I shall spend the first three hours in prayer -- Martin Luther
एक ईसाई स्त्री ने अपने मरे पति की कब्र के लिए पत्थर बनवाया। उस पत्थर पर लिखवाया, 'शांति से स्वर्ग में विश्राम करो। Rest in peace.'
इधर पत्थर बन कर तैयार हुआ, तब तक पति के द्वारा की गई वसीयत खोली गई। वसीयत में पति पत्नी के लिए कुछ भी नहीं छोड़ गया। और सब बांट गया। मगर पत्नी के लिए एक पैसा नहीं छोड़ गया। पत्नी तो एकदम नाराज होकर भागी पत्थर खोदने वाले के पास। कहा कि 'बदलो; यह नहीं चलेगा। यह आदमी धोखा दे गया! इसने जिंदगी भर सताया और मर कर भी सता गया। यह मत लिखो इसके पत्थर पर।'
उसने कहा -- नहीं, पत्थर तो बन गया। अब बदलना मुश्किल है।
पत्नी ने कुछ सोचा और उसने कहा -- फिर ऐसा करो। तुमने लिख दिया-स्वर्ग में शांति में विश्राम करो; जब तक मैं नहीं आ जाती-Rest in peace... until I come.
कल की इच्छा वही कर सकता है जिसकी मृत्यु के साथ मैत्री हो, जो मौत के मुंह से बच कर पलायन कर सके और जो जानता हो -- मैं नहीं मरुंगा
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी बेटी की शादी की। बेटी की शादी पूरी हो गई, तो शादी के बाद उसने अपने दामाद को गले से लगा लिया और बड़े प्रेम से कहा, 'बेटे, आज तुम संसार के दूसरे नंबर के सुखी आदमी हो, क्योंकि तुमने मेरी बेटी से शादी करनी चाही और हो गई।' दामाद थोड़ा चैंका। आश्चर्य से उसने पूछा, 'जी, मैं पहले नम्बर का सुखी क्यों नहीं? ' मुल्ला ने कहा, 'वह तो न पूछो तो अच्छा। क्योंकि पहले नम्बर का सुखी तो मैं हूं, जो यह बला टाल सका।'
(गोपालदास 'नीरज')
चांदी का यह देश, यहां के छलिया राजकुमार,
सोच-समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार, हृदय व्यापार
यहां किसे अवकाश, सुने जो तेरी करुण-कराहें,
तुझ पर करें बयार, यहां खाली हैं किसकी बाहें,
बादल बन कर खोज रहा तू, किसको इस मरुथल में
कौन यहां व्याकुल हो जिसकी, तेरे लिए निगाहें,
फूलों की यह हाट, लगा है मुसकानों का मेला,
कौन खरीदेगा तेरे, घायल आंसू दो चार।
सोच-समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार ॥
ध्यान
कथा :
नानक एक गांव में ठहरे हैं। और नानक कहते हैं, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है। तो गांव का मुसलमान नवाब नाराज हो गया। उसने कहा, बुला लाओ उस फकीर को। कैसे कहता है? किस हिम्मत से कहता है कि न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है?
नानक आए। उस नवाब ने पूछा कि मैंने सुना है, तुम कहते हो, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान? नानक ने कहा, हां, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान। तो तुम कौन हो? तो नानक ने कहा कि मैंने बहुत खोजा, बहुत खोजा। चमड़ी, हड्डी, मांस, मज्जा, वहां तक तो मुझे लगा कि हां, हिंदू भी हो सकता है, मुसलमान भी हो सकता है। लेकिन वहां तक मैं नहीं था। और जब उसके पार मैं गया, तो मैंने पाया कि वहां तो कोई हिंदू-मुसलमान नहीं है!
तो उस नवाब ने कहा कि फिर तुम हमारे साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने चलोगे? क्योंकि जब कोई हिंदू-मुसलमान नहीं, तो मस्जिद में जाने में एतराज नहीं कर सकते हो। नानक ने कहा, एतराज! मैं तो यह पूछने ही आया था कि मस्जिद में ठहरूं, तो आपको कोई एतराज तो नहीं है?
नवाब थोड़ा चिंतित हुआ, एक हिंदू कहे! पर उसने कहा कि देखें, परीक्षा कर लेनी जरूरी है। मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए ले गया नानक को। नवाब तो मस्जिद में नमाज पढ़ने लगा, नानक पीछे खड़े होकर हंसने लगे। तो नवाब को बड़ा क्रोध आया। हालांकि नमाज पढ़ने वाले को क्रोध आना नहीं चाहिए। लेकिन नमाज कोई पढ़े तब न!
बड़ा क्रोध आया और जैसे क्रोध बढ़ने लगा, नानक की हंसी बढ़ने लगी। अब नमाज पूरी करनी बड़ी मुश्किल पड़ गई। तबियत तो होने लगी, गर्दन दबा दो इस फकीर की। लेकिन नमाज पूरी करनी जरूरी थी। बीच में तोड़ा नहीं जा सकता नमाज को। तो जल्दी पूरी की, जैसा कि अधिक लोग करते हैं।
पूजा अधिक लोग जल्दी करते हैं। इतने जल्दी करते हैं कि कोई भी शार्ट कट मिल जाए, तो जल्दी छलांग लगाकर वे पूजा निपटा देते हैं। लांग रूट से पूजा में शायद ही कोई जाता हो। शार्ट कट सबने अपने-अपने बनाए हुए हैं, उनसे वे निकल जाते हैं, तत्काल! बाई पास! पूजा को निपटाकर वे भागे, तो फिर लौटकर नहीं देखते पूजा की तरफ। एक मजबूरी, एक काम, उसे निपटा देना है!
नवाब ने जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की और आकर नानक से कहा कि बेईमान निकले, धोखेबाज निकले। तुमने कहा था, नमाज में साथ दूंगा। साथ न दिया। नानक ने कहा, मैंने कहा था नमाज में साथ दूंगा, लेकिन तुमने नमाज ही न पढ़ी, साथ किसका देता? तुम तो न मालूम क्या-क्या कर रहे थे! कभी मेरी तरफ देखते थे। कभी नाराज होते थे। कभी मुट्ठियां बांधते थे। कभी दांत पीसते थे। यह कैसी नमाज पढ़ रहे थे? मैंने कहा कि ऐसी नमाज तो मैं नहीं जानता। साथ भी कैसे दूं! और सच, भीतर तुमने एक भी बार अल्लाह का नाम लिया? क्योंकि जहां तक मैं देख पाया, मैंने देखा कि तुम काबुल के बाजार में घोड़े खरीद रहे हो!
नवाब तो मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा, क्या कहते हो! काबुल के बाजार में घोड़े! बात तो सच ही कहते हो। कई दिन से सोच रहा हूं कि अच्छे घोड़े पास में नहीं हैं। तो नमाज के वक्त फुरसत का समय मिल जाता है। और तो काम में लगा रहता हूं। तो अक्सर ये काबुल के घोड़े मुझे नमाज के वक्त जरूर सताते हैं। मैं खरीद रहा था। तुम ठीक कहते हो। मुझे माफ करो। मैंने नमाज नहीं पढ़ी, सिर्फ काबुल के बाजार में घोड़े खरीदे।
आप जब प्रभु का स्मरण कर रहे हैं, तो ध्यान रखना, प्रभु को छोड़कर और सब कुछ कर रहे होंगे। प्रभु को तो आप जानते नहीं, स्मरण कैसे करिएगा? ध्यान कैसे करिएगा?
ध्यान का अर्थ है, जिसके साथ हम आत्मसात होकर एक हो जाएं। नहीं तो ध्यान नहीं है। अगर आप बच रहे, तो ध्यान नहीं है। ध्यान का अर्थ है, जिसके साथ हम एक हो जाएं। ध्यान का अर्थ है कि कोई आपको काटे, तो आपके मुंह से निकले कि प्रभु को क्यों काट रहे हो! ध्यान का अर्थ है कि कोई आपके चरणों में सिर रख दे, तो आप जानें कि प्रभु को नमस्कार किया गया है। सोचें नहीं, जानें। आपका रोआं-रोआं प्रभु से एक हो जाए। लेकिन यह घटना तो एकांत में घटती है। इनर अलोननेस, वह जो भीतरी एकांत गुहा है, जहां सब दुनिया खो जाती, बाहर समाप्त हो जाता। मित्र, प्रियजन, शत्रु सब छूट जाते। धन, दौलत, मकान सब खो जाते। और आखिरी पड़ाव पर स्वयं भी खो जाते हैं आप। क्योंकि उस स्वयं की भीतर कोई जरूरत नहीं है, बाहर जरूरत है।
आपका दिमाग अधिकतर प्रश्नों के उत्तर दे देगा यदि आप विश्राम करना और उत्तर की प्रतीक्षा करना सीख लें ।
मात्सु साधना में था। वह अपने गुरु-आश्रम के एकांत झोपड़े में, अहर्निश मन को साधने का अभ्यास करता था। जो उससे मिलने भी जाते, उनकी ओर भी वह कभी ध्यान नहीं देता था।
उसके गुरु एक दिन उसके झोपड़े पर गये। मात्सु ने उनकी ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया। पर गुरु दिन भर वहीं बैठे रहे और एक ईंट को पत्थर पर घिसते रहे।
मात्सु से अंततः न रहा गया और उसने पूछा, 'आप यह क्या कर रहे हैं?'
गुरु ने कहा, 'इस ईंट का दर्पण बनाना है।'
मात्सु ने कहा, 'ईंट का दर्पण? पागल हुए हैं क्या? जीवन भर घिसते रहने से भी दर्पण नहीं बनेगा।'
यह सुनकर गुरु हंसने लगे और उन्होंने मात्सु से पूछा, 'तब तुम क्या कर रहे हो? ईंट दर्पण नहीं बनेगी तो क्या मन दर्पण बन सकता है?'
मन सिर्फ निकट है जीवन के। बहुत निकट है। इतना निकट है कि जीवन उसमें प्रतिबिंबित होता है और जीवित मालूम होता है मन।
ध्वनि
कथा :
ओंकारनाथ ठाकुर इटली में मुसोलिनी के मेहमान थे--भारत के एक बड़े संगीतज्ञ। मुसोलिनी ने ऐसे ही मजाक में--भोजन पर निमंत्रित किया था ठाकुर को--मजाक में, भोजन करते वक्त मुसोलिनी ने कहा कि मैं सुनता हूं कि कृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो जंगली जानवर आ जाते; गउएं नाचने लगतीं; मोर पंख फैला देते। यह कुछ मुझे समझ में नहीं आता कि संगीत से यह कैसे हो सकता है! ओंकारनाथ ठाकुर ने कहा कि कृष्ण जैसी मेरी सामर्थ्य नहीं। संगीत के संबंध में उतनी मेरी समझ नहीं। सच तो यह है कि संगीत के संबंध में कृष्ण जैसी समझ पृथ्वी पर फिर दूसरे आदमी की नहीं रही है। लेकिन थोड़ा-बहुत क ख ग, जो मैं जानता हूं, वह मैं आपको करके दिखा दूं कि समझाऊं! मुसोलिनी ने कहा, समझाने में तो कोई सार नहीं है। तुम कुछ करके ही दिखा दो।
कुछ न था हाथ में। खाना ले रहे थे, तो कांटा-चम्मच हाथ में थे। सामने चीनी के बर्तन, प्यालियां थीं। ओंकारनाथ ठाकुर ने वे प्यालियां और बर्तन चम्मच-कांटे से बजाना शुरू कर दिया। पांच मिनट, सात मिनट और मुसोलिनी की आंख झप गई और जैसे वह नशे में आ गया। और उसका सिर टेबल से टकराने लगा। जोर से बजने लगे बर्तन और मुसोलिनी का सिर और जोर से टकराने लगा। और जोर से बजने लगे बर्तन! और फिर मुसोलिनी चिल्लाया कि रोको, क्योंकि मैं सिर को नहीं रोक पा रहा हूं! रोका, तो सिर लहूलुहान हो गया था।
मुसोलिनी ने अपनी आत्मकथा में लिखवाया है कि मैंने जो वक्तव्य दिया था, उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। जरूर कृष्ण की बांसुरी से जंगली जानवर आ गए होंगे। जब कि एक सभ्य आदमी का सिर सारी कोशिश करके भी नहीं रुक सकता है। और सिर्फ कांटे-चम्मच बर्तन पर बजाए जा रहे हैं, कोई बड़ा वाद्य नहीं!
चित्त की सूक्ष्मतम तरंगें ध्वनि की तरंगें हैं। ध्वनि से हम जीते हैं।
तनाव ये सोचना है कि आपको क्या होना चाहिए. आराम वो है जो आप हैं ।
हल
कथा :
आज जहां रूस का बहुत बड़ा महानगर है, स्टैलिनग्राद, पुराना नाम था उस गांव का पैत्रोग्राद। पीटर महान ने उसको बसाया था, रूस के एक सम्राट ने। और पीटर महान जब उसे बसा रहा था, तो उसने एक पहाड़ी के कोने को चुना था अपने लिए कि इस जगह मैं अपना भवन बनाऊं। लेकिन उस पहाड़ी को हटाना बड़ा भारी प्रश्न था। और पीटर महान चाहता था, समतल भूमि हो जाए। बहुत इंजीनियरों को कहा, लाखों रुपए देने की बात कही। इंजीनियर कहते थे, बहुत खर्च है। कई लाख खर्च होंगे, तो यह पत्थर हटेगा।
एक दिन पीटर महान खुद गया देखने। सच में इतना बड़ा पत्थर था कि उसे काट-काटकर हटाने के सिवाय कोई उपाय उस समय नहीं था। एक बैलगाड़ी वाला किसान पास से गुजरता था, वह हंसने लगा। उसने कहा, लाखों रुपए! हम सस्ते में जमीन सपाट कर दे सकते हैं। इंजीनियर हंसे, सम्राट हंसा, कहा कि भोला किसान है, क्यों पागलपन में पड़ता है! उसने कहा कि हम कर ही देंगे सस्ते में, इसमें कोई लाखों का सवाल नहीं है। और उसने कर दिया। तो उस महल के नीचे एक पत्थर लगाया था पीटर महान ने उस किसान की स्मृति में--उस किसान की स्मृति में।
उस किसान ने बहुत कम, कुछ ही हजार रुपयों में वह पत्थर सपाट कर दिया। लेकिन उसने और ढंग से सोचा। सोचा कम, और किया कुछ ज्यादा। उसने पत्थर को काट-काटकर फेंकने का खयाल ही नहीं लाया। उसने तो पत्थर के चारों तरफ गङ्ढा खोदना शुरू करवाया। चारों तरफ गङ्ढा खोदा और उस पत्थर को गङ्ढे में नीचे गिरा दिया, ऊपर से मिट्टी डलवा दी। जमीन सपाट हो गई।
पीटर जब देखने आया, तो उसने कहा, वह पत्थर कहां गया? उस किसान ने कहा, पत्थर से आपको क्या प्रयोजन! जमीन सपाट चाहिए, जमीन सपाट हो गई। लेकिन पीटर महान बोला कि मैं यह जानना चाहता हूं, वह पत्थर गया कहां? उसको हटाना बहुत मुश्किल था! उस किसान ने कहा कि आप सदा उसको दूर हटाने की भाषा में सोचते थे, हमने उसको और गहराई में पहुंचा दिया।
तो उसके नाम पर एक स्मरण का पत्थर पीटर ने लगवाया था कि बड़े इंजीनियर जिसे महीनों सोचते रहे और हल न कर पाए, एक छोटे-से ग्रामीण किसान ने उसे हल कर दिया।
कई बार बड़े बुद्धिमान जिसे हल नहीं कर पाते, छोटे-से प्रयोगकर्ता उसे हल कर लेते हैं। और योग के संबंध में तो ऐसा ही मामला है--बिलकुल ऐसा ही मामला है।
आप अगर सोच-सोचकर हल करना चाहें, तो जिंदगी में कोई प्रश्न हल नहीं होगा।
जो आप बन सकते थे वो बनने के लिए कभी भी बहुत देर नहीं हुई होती है ।
एक रास्ते पर, एक पुल के नीचे; ऊपर रेलवे का पुल था, और रास्ता नीचे से गुजरता था, एक ट्रक फंस गया। सामान उसमें काफी ऊंचाई तक लदा था। न इस तरफ आ सके, न उस तरफ जा सके, और उसकी वजह से पूरा ट्रैफिक रुक गया। पुलिस के अधिकारी आये, लेकिन कुछ उपाय न खोज पाये। बड़ी कोशिश की खींचने की। इंजीनियर आया, कुछ समझ न पाये कि क्या करना? और सब इतनी गड़बड़ मच गई। क्योंकि इतने ट्रक इस तरफ रुक गये, उस तरफ रुक गये, सारा ट्रैफिक जाम हो गया, बड़ा शोरगुल मच गया, सैकड़ों लोगों की भीड़ लग गई।
और तब एक आदमी ने कहा, कोई मेरी सुनता ही नहीं; एक गरीब आदमी जो किनारे खड़ा था अपना डंडा लिए हुए। उसने कहा कि ट्रक की हवा क्यों नहीं निकाल देते? उसकी कोई सुन ही नहीं रहा था। क्योंकि जहां बड़े इंजीनियर मौजूद हों, वहां उसकी कौन सुने? और वह ठीक कह रहा था, हवा ही निकालनी पड़ी ट्रक की और ट्रक बाहर आ गया।
कभी-कभी सीधी बातें चूक जाती हैं।
स्टैलिन ने मरने के पहले खु्रश्चेव को दो पत्र दिए। और कहा कि जब मैं मर जाऊं और तू ताकत में आ जाए, तो इन पत्रों को सम्हालकर रखना। इसमें नंबर एक का जो पत्र है, वह तू तब खोलना, जब तेरी कोई योजना इतनी असफल हो जाए कि तेरा तख्ता डांवाडोल हो उठे। और दूसरा तब खोलना, जब कि कोई भरोसा ही न रह जाए तेरे बचने का, सब डूबने की हालत हो जाए और तुझे उतरने के सिवा कोई चारा न रहे, तब तू दूसरा खोलना। जब ख्रुश्चेव असफल हुआ।
और सभी राजनीतिज्ञ असफल होते हैं। अब तक कोई राजनीतिज्ञ जमीन पर सफल नहीं हुआ। होंगे भी नहीं। क्योंकि सफलता से राजनीति का कोई संबंध भी नहीं है।
समस्याएं बड़ी हैं, और आदमी का अहंकार भर उसे खयाल देता है कि मैं हल कर लूंगा। समस्याएं विराट हैं। किसी से हल नहीं होतीं। पर थोड़ी देर को यह वहम भी मन को बड़ा सुख देता है, अहंकार को बड़ी तृप्ति देता है कि मैं हल करने की कोशिश कर रहा हूं। यह खयाल भी कि सारी समस्याओं के हल मुझ पर निर्भर हैं और लोगों की आशा मुझ पर लगी है, काफी सुख देता है।
जब ख्रुश्चेव की योजनाएं असफल हुईं, तो उसने मजबूरी में पहला पत्र खोला। उस पहले पत्र में स्टैलिन ने लिखा था कि सब जिम्मेवारी मेरे सिर पर थोप दे।
यह पुरानी तरकीब है राजनीतिज्ञों की कि जो ताकत में नहीं हैं, जो पीछे ताकत में थे, जो मर गए हैं, उन पर सारी जिम्मेवारी थोप देना कि उनके कारण.।
ख्रुश्चेव ने वही किया। थोड़े दिन नाव और चली। फिर नाव के डूबने के दिन फिर आ गए। तब उसने दूसरा पत्र खोला। दूसरे पत्र में स्टैलिन ने लिखा था कि अब तू भी दो पत्र लिख।
एक मौत को भी ठीक से देख लो, तो जिंदगी व्यर्थ हो जाती है। एक सूखा पत्ता वृक्ष से गिरता हुआ भी ठीक से समझ लो, तो जिंदगी में कुछ पाने जैसा नहीं रह जाता।
जोड़
कथा :
एक सर्कस के मालिक के पास बंदर थे। वह सुबह उनको चार रोटी देता, शाम को तीन रोटी। एक दिन उसने बंदरों से कहा कि कल से हम व्यवस्था बदल रहे हैं। तुम्हें सुबह तीन रोटी मिलेंगी, शाम चार रोटी। बंदर एकदम नाराज हो गए। चीखने-चिल्लाने लगे, कि हम बरदाश्त नहीं कर सकते यह बात। बंदरों ने तीन रोटी लेने से इनकार कर दिया। वह मालिक बड़ा हैरान हुआ। उसने कहा कि पागलो, जोड़ो भी तो!
तो मैंने सुना है कि बंदरों ने कहा, जोड़ करता ही कौन है! आदमी नहीं करते, तो बंदर क्यों करें? हमें सुबह चार चाहिए, जैसी हमें सदा मिलती रही हैं! कोई रास्ता न देखकर उन्हें चार रोटियां दी गईं, बंदर राजी हो गए। शाम उनको तीन रोटी मिलतीं, सुबह चार मिलतीं। वे तृप्त। सुबह तीन मिलतीं, शाम चार मिलतीं, सात ही होती थीं, लेकिन जोड़ कौन करता है!
एक आदमी में थोड़ा क्रोध ज्यादा होता है, थोड़ा लोभ कम होता है, दोनों का जोड़ बराबर सात होता है। इन चारों का जोड़ सब आदमियों में बराबर है। लेकिन जोड़ कोई करता नहीं। और एक-एक को, जिसको क्रोध ज्यादा लगता है, वह कहता है, क्रोध से किस तरह छूट जाऊं? लोभ की तो मुझे झंझट नहीं है; क्रोध ही की झंझट है। उसे पता नहीं है कि अगर क्रोध काट दिया जाए, तो क्रोध की जितनी रोटियां हैं, कहीं और जुड़ जाएंगी। क्रोध कट नहीं सकता अकेला। चारों साथ रहते हैं, या चारों साथ जाते हैं।
योग कहता है, ऊपर से मत लड़ो। जड़ पकड़ो।
क्रोध
कथा :
गुरजिएफ, अभी फ्रांस में एक फकीर था। शायद इस सदी में थोड़े-से लोग थे, जिनकी इतनी गहरी समझ है। अगर उसके पास कोई जाता और कहता कि मैं क्रोध से बहुत परेशान हूं, क्रोध इतना बुरा है, फिर भी मैं छूट नहीं पाता, तो गुरजिएफ कहता कि रुको। पहली तो बात यह छोड़ दो कि क्रोध बुरा है। पहली बात यह छोड़ दो, क्योंकि यह बात तुम्हें कभी समझने न देगी। क्योंकि यह बात समझदारी का झूठा भ्रम पैदा करती है कि तुमको पता है। तुमको पता ही है कि क्रोध बुरा है!
तुम्हें बिलकुल पता नहीं है। पहले तुम यह छोड़ दो। क्रोध नहीं छूटता। क्रोध को रहने दो। कृपा करके यह छोड़ दो कि क्रोध बुरा है।
वह आदमी कहता कि क्रोध बुरा है, यह जानकर मैं इतना क्रोध कर रहा हूं! और अगर यह छोड़ दूं कि क्रोध बुरा है, तब तो बहुत मुसीबत हो जाएगी!
गुरजिएफ कहता कि तुम रुको। हम मुसीबत को लेने को तैयार हैं। मुसीबत होने दो। और गुरजिएफ ऐसे उपाय करता कि उस आदमी के क्रोध को जगाए। ऐसी सिचुएशंस, ऐसी स्थितियां पैदा करता कि उस आदमी का क्रोध भभककर जले। और उस आदमी से कहता कि पूरा करो। थोड़ा भी छोड़ना मत। पूरा ही कर डालो। उबल जाओ। रोआं-रोआं जल उठे। आग बन जाओ। पूरा कर लो। और वह ऐसी स्थितियां पैदा करता--अपमान कर देता, गाली दे देता या किसी और से उस आदमी को फंसवा देता--उस आदमी के घाव को छू देता कि वह एकदम किसी क्षण में होश खो देता और उबल पड़ता। और भयंकर रूप से। और वह उसको बढ़ावा दिए जाता, उसके क्रोध को, और घी डालता।
और जब वह पूरी आग में जल रहा होता, तब वह चिल्लाकर कहता कि मित्र! इस वक्त देख लो कि क्रोध क्या है। यह है मौका। अभी देख लो कि क्रोध क्या है। पहचान लो कि क्रोध क्या है। यह है। आंख बंद करो, एंड मेडिटेट आन इट। आंख बंद कर लो, और अब ध्यान करो इस क्रोध पर। रोआं-रोआं जल रहा है। खून का कण-कण आग हो गया है। हृदय फूट पड़ने को है। मस्तिष्क की शिरा-शिरा खून से भर गई है और पागल है। रुको भीतर। अब तुम जरा ठीक से देख लो, क्रोध पूरा मौजूद है। और यह आश्चर्य की बात है कि गुरजिएफ जिसको भी ऐसा क्रोध दिखा देता, वह आदमी दुबारा क्रोध करने में असमर्थ हो जाता--असमर्थ!
लेकिन हमारी पूरी व्यवस्था उलटी है। छोटे-से बच्चे को हम दमन शुरू करवा देते हैं, क्रोध मत करना। क्रोध दबाना; क्रोध बहुत बुरा है। और बच्चा देखता है कि बाप क्रोध करता है; मां क्रोध करती है। सब जारी है! वह बाप बच्चे को समझा रहा है कि क्रोध मत करना; क्रोध बुरा है। और बच्चा अगर न माने, तो बाप क्रोध में आ जाता है उसी वक्त! वह बच्चा देखता है कि बड़ा मजा चल रहा है, बड़ा खेल चल रहा है!
और बच्चे बहुत एक्यूट आब्जर्वर्स हैं, बड़े गौर से देखते हैं। क्योंकि अभी उनकी निरीक्षण की क्षमता बहुत शुद्ध है। वे बिलकुल ठीक देखते हैं कि हद बेईमानी चल रही है! बाप कह रहा है, क्रोध मत करना, और अगर हम क्रोध करते हैं, तो वह खुद ही क्रोध कर रहा है!
दमन हम करवा रहे हैं। कभी बच्चा क्रोध को जान नहीं पाएगा कि क्रोध क्या है। बस, इतना ही जान पाएगा, क्रोध बुरा है। और कुनकुने क्रोध को जान पाएगा, जो बीच-बीच में फूटता रहेगा।
कुनकुने क्रोध से कभी पहचान नहीं हो सकती। कुनकुने पानी में हाथ डालने से कभी वह स्थिति न आएगी कि गरम पानी जलाता है, इसका पता चले। एक बार उबलते पानी में हाथ जाना जरूरी है। फिर हाथ बाहर रहने लगेगा। फिर कोई कहेगा कि प्यारे आओ, बहुत अमृत उबल रहा है। हाथ डालो! कहोगे कि प्यारे बिलकुल नहीं आएंगे। अनुभव है!
विलियम शेक्सपीयर -- यदि तुम प्यार करते हो और तुम्हे कष्ट मिलता है तो और प्यार करो ।
मृत्यु
कथा :
बुद्ध के आखिरी छः महीने बहुत पीड़ा में बीते। पीड़ा में उनकी तरफ से, जिन्होंने देखा; बुद्ध की तरफ से नहीं। बुद्ध एक गांव में ठहरे हैं। और उस गांव के एक शूद्र ने, एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया कि मेरे घर भोजन कर लें। तो वह पहला निमंत्रण देने वाला था, सुबह-सुबह जल्दी आ गया था पांच बजे, ताकि गांव का कोई धनपति, गांव का सम्राट निमंत्रण न दे दे। बहुत बार आया था, लेकिन कोई निमंत्रण दे चुका था।
वह निमंत्रण दे ही रहा था कि तभी गांव के एक बड़े धनपति ने आकर बुद्ध को कहा कि आज मेरे घर निमंत्रण स्वीकार करें। बुद्ध ने कहा, निमंत्रण आ गया। उस अमीर ने उस आदमी की तरफ देखा और कहा, इस आदमी का निमंत्रण! इसके पास खिलाने को भी कुछ होगा? बुद्ध ने कहा, वह दूसरी बात है। बाकी निमंत्रण उसका ही स्वीकार किया। उसके घर ही जाता हूं।
बुद्ध गए। उस आदमी को भरोसा भी न था कि बुद्ध कभी उसके घर भोजन करने आएंगे। उसके पास कुछ भी न था खिलाने को वस्तुतः। रूखी रोटियां थीं। सब्जी के नाम पर बिहार में गरीब किसान, वह जो बरसात के दिनों में कुकुरमुत्ता पैदा हो जाता है--लकड़ियों पर, गंदी जगह में--उस कुकुरमुत्ते को इकट्ठा कर लेते हैं, सुखाकर रख लेते हैं और उसी की सब्जी बनाकर खाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुकुरमुत्ता poisonous हो जाता है। कहीं ऐसी जगह पैदा हो गया, जहां जहर मिल गया, तो कुकुरमुत्ते में जहर फैल जाता है।
बुद्ध के लिए उसने कुकुरमुत्ते बनाए थे, वे जहरीले थे। जहर थे, सख्त कड़वे जहर थे। मुंह में रखना मुश्किल था। लेकिन उसके पास एक ही सब्जी थी। तो बुद्ध ने यह सोचकर कि अगर मैं कहूं कि यह सब्जी कड़वी है, तो वह कठिनाई में पड़ेगा; उसके पास कोई दूसरी सब्जी नहीं है। वे उस जहरीली सब्जी को खा गए। उसे मुंह में रखना कठिन था। और बड़े आनंद से खा गए, और उससे कहते रहे कि बहुत आनंदित हुआ हूं।
जैसे ही बुद्ध वहां से निकले, उस आदमी ने जब सब्जी चखी, तो वह तो हैरान हो गया। वह भागा हुआ आया और उसने कहा कि आप क्या कहते हैं? वह तो जहर है! वह छाती पीटकर रोने लगा। लेकिन बुद्ध ने कहा, तू जरा भी चिंता मत कर। क्योंकि जहर मेरा अब कुछ भी न बिगाड़ सकेगा, क्योंकि मैं उसे जानता हूं, जो अमृत है। तू जरा भी चिंता मत कर।
लेकिन फिर भी उस आदमी की चिंता तो हम समझ सकते हैं। बुद्ध ने उसे कहा कि तू धन्यभागी है। तुझे पता नहीं। तू खुश हो। तू सौभाग्यवान। क्योंकि कभी हजारों वर्षों में बुद्ध जैसा व्यक्ति पैदा होता है। दो ही व्यक्तियों को उसका सौभाग्य मिलता है, पहला भोजन कराने का अवसर उसकी मां को मिलता है और अंतिम भोजन कराने का अवसर तुझे मिला है। तू सौभाग्यशाली है; तू आनंदित हो। ऐसा फिर सैकड़ों-हजारों वर्षों में कभी कोई बुद्ध पैदा होगा और ऐसा अवसर फिर किसी को मिलेगा। उस आदमी को किसी तरह समझाकर-बुझाकर लौटा दिया।
बुद्ध के शिष्य कहने लगे, आप यह क्या बातें कह रहे हैं! यह आदमी हत्यारा है। बुद्ध ने कहा, भूलकर ऐसी बात मत कहना, अन्यथा उस आदमी को नाहक लोग परेशान करेंगे! तुम जाओ; गांव में डुंडी पीटकर खबर करो कि यह आदमी सौभाग्यशाली है, क्योंकि इसने बुद्ध को अंतिम भोजन का दान दिया है।
मरने के वक्त लोग उनसे कहते थे कि आप एक दफे भी तो रुक जाते! कह देते कि कड़वा है, तो हम पर यह वज्रपात न गिरता! लेकिन बुद्ध कहते थे कि यह वज्रपात रुकने वाला नहीं था। किस बहाने गिरेगा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और जहां तक मेरा संबंध है, मुझ पर कोई वज्रपात नहीं गिरा है, नहीं गिर सकता है। क्योंकि मैंने उसे जान लिया है, जिसकी कोई मृत्यु नहीं है।
विलियम शेक्सपीयर -- मैं तुम्हे बुद्धिमता की लड़ाई के लिए ललकारता परन्तु मैं यह देख रहा हूँ की तुम निहत्थे हो ..
दुःख
कथा :
कबीर ने एक छोटा-सा दोहा लिखा है। जिसका अर्थ है कि कबीर बहुत रोने लगा यह देखकर कि दो चक्कियों के पाट के बीच जो भी पड़ गया, वह पिस गया। कबीर घर लौटा। कबीर के घर एक बेटा पैदा हुआ था। कबीर का बेटा था, तो कबीर की हैसियत का बेटा था। उसका नाम था कमाल। कबीर ने घर जाकर यह दोहा पढ़ा और कहा कि कमाल, आज रास्ते पर चलती चक्की देखकर मैं रोने लगा, क्योंकि मुझे खयाल आया कि जगत की चक्की के दो पाटों के बीच जो भी पड़ गया, वह बचा नहीं।
कमाल ने दूसरा दोहा कहा और उसने कहा कि नहीं, यह मत कहो। मैं भी चलती चक्की देखा हूं। चलती चक्की देखकर कमाल हंसने लगा, क्योंकि मैंने देखा कि दो पाटों के बीच में एक छोटी-सी कील भी है। जिसने उस कील का सहारा ले लिया, दो पाट उसको पीस नहीं पाए। पाट चलते रहे। वह जो छोटी-सी कील है चक्की के बीच में, उसके सहारे जो गेहूं का दाना चढ़ गया, उसके सहारे जो रह गया, दो चाक चलते रहे, चलते रहे, पीसते रहे, लेकिन वह अनपिसा बच गया!
जो परमात्मा की बीच में कील है, उसके निकट जितना सरक जाए, सेंटर के, केंद्र के, उतना ही इस जगत की कोई चीज फिर पीस नहीं पाती है। अन्यथा तो दो पाट पीसते ही रहेंगे। दुख पीसता ही रहेगा। मृत्यु पीसती ही रहेगी। और हम कंपते ही रहेंगे, स्वभावतः।
शास्त्र तो झील में बना प्रतिबिंब है चांद का। समझ लेना इशारा और झील को छोड़ देना। यात्रा बिलकुल अलग है। अगर झील में छलांग लगा ली और चांद को खोजने के लिए डुबकियां मारने लगे, तो शास्त्र ही पढ़ते रह जाओगे।
डर
कथा :
नेपोलियन छोटा बच्चा था, तो एक छः महीने का बच्चा था जब नेपोलियन, तो एक बिलाव ने जंगली बिलाव ने उसकी छाती पर पंजा मार दिया था। नौकरानी इधर-उधर हट गई थी, जैसा कि नौकरानियां हट जाती हैं। बिल्ली ने पंजा मार दिया। भागी नौकरानी आई। बिल्ली तो हट गई। लेकिन छः महीने के बच्चे पर बिल्ली का पंजा बैठ गया। वह जो बाद में कहता था, आई एम दि ला, वह सिर्फ बिल्ली का पंजा था उसकी छाती में, कोई कानून नहीं था। फिर वह बहादुर आदमी सिद्ध हुआ। शेर से लड़ सकता था, लेकिन बिल्ली से डरता था। वह छः महीने में जो कानून बनकर बैठ गई थी बिल्ली! बिल्ली को देखता था तो छः महीने के बच्चे की हैसियत हो जाती थी उसकी, रिग्रेस कर जाता। कभी हारा नहीं था।
लेकिन उसके दुश्मन ने, नेल्सन ने, जो उसके खिलाफ लड़ने आया था, पता लगा लिया कि उसकी कमजोरी बिल्ली है। तो सत्तर बिल्लियां नेल्सन अपनी युद्ध की फौज के सामने बांधकर लाया। और जब नेपोलियन ने बिल्लियां देखीं, तो जैसा अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि हे कृष्ण, मेरा गांडीव धनुष शिथिल हो गया; मेरे गात शिथिल हुए जाते हैं, पसीना छूट रहा है। अब मेरी हिम्मत नहीं होती। ऐसा ही नेपोलियन ने अपने सेनापति से कहा कि तू सम्हाल। बिल्लियों को देखकर मेरे गात शिथिल हुए जाते हैं! हार गया उसी सांझ।
और जिसने पंद्रह दिन पहले कहा था, आई एम दि ला, वह पंद्रह दिन बाद हेलेना के द्वीप पर कैद था कारागृह में। सुबह घूमने निकला था। छोटा-सा द्वीप। द्वीप पर उसको मुक्त रखा गया था, क्योंकि छोटे द्वीप के बाहर भाग नहीं सकता था। द्वीप पर कारागृह था, पूरा द्वीप ही उसके लिए कारागृह था। सुबह घूमने निकला था। छोटी-सी पगडंडी है जंगल की और एक घास वाली औरत एक बड़ा घास का गट्ठर लिए उस तरफ से आती थी। नेपोलियन के साथ एक चिकित्सक रखा गया था, क्योंकि नेपोलियन जो कि कभी भी बीमार नहीं पड़ा था, हारते ही इस बुरी तरह बीमार पड़ गया, जिसका कोई हिसाब नहीं।
सभी राजनीतिज्ञ पड़ जाते हैं, हारते ही! ज्यादा दिन जिंदगी नहीं रहती फिर। फिर मौत बड़ी जल्दी करीब आ जाती है।
तो चिकित्सक साथ था। दोनों चल रहे थे। चिकित्सक तो भूल गया, चिल्लाकर जोर से कहा कि ओ घसियारिन! रास्ता छोड़। लेकिन घसियारिन क्यों रास्ता छोड़े? हो कौन तुम, जिसके लिए रास्ता छोड़े! घसियारिन तो बढ़ी चली आई। तब नेपोलियन को खयाल आया। नेपोलियन रास्ते से नीचे उतर गया, डाक्टर को भी नीचे उतार लिया और उसने कहा कि वे दिन चले गए, जब हम पहाड़ों से कहते थे, रास्ता छोड़ दो और पहाड़ रास्ता छोड़ देते थे। अब घास वाली औरत रास्ता नहीं छोड़ेगी। नीचे उतरकर किनारे खड़ा हो गया। पंद्रह दिन पहले उस आदमी ने कहा था, I am the law, मैं हूं कानून, मैं हूं नियम।
असल में नेपोलियन की या सिकंदर की यात्रा भी इसी आशा में है कि एक जगह मिल जाए, जहां जाकर मैं कह सकूं, मैं हूं प्रभु। पद की हो, कि धन की हो, कि यश की हो, सारी यात्रा mis-interpretation है, उस प्यास की गलत व्याख्या है, जो हमारे भीतर प्रभु के लिए है। वह सबके भीतर है।
जहाँ सब-कुछ जल ही रहा हो, वहां कैसी हंसी? कैसा आनन्द? ऐ अन्धकार से घिरे हुए ! प्रकाश दीप की खोज क्यों नहीं करते?
बुद्ध का शिष्य आनंद एक गांव से गुजर रहा है। एक वेश्या ने आनंद को देखा। आनंद सुंदर था। संन्यस्त व्यक्ति अक्सर सुंदर हो जाते हैं। और संन्यस्त व्यक्तियों में अक्सर एक आकर्षण आ जाता है, जो गृहस्थ में नहीं होता। एक व्यक्तित्व में आभा आ जाती है। वह वेश्या मोहित हो गई। और कथा यह है कि उसने कुछ तंत्र-मंत्र किया। बुद्ध देख रहे हैं दूर अपने वन में वृक्ष के नीचे बैठे। दूर घटना घट रही है, आनंद बहुत दूर है, लेकिन कथा यह है कि बुद्ध देख रहे हैं। बुद्ध देख सकते हैं। वे देख रहे हैं। बुद्ध के पास सारिपुत्त, उनका शिष्य भी बैठा हुआ है। वह भी देख रहा है।
सारिपुत्त बुद्ध से कहता है, आप आनंद को बचाएं। वह किसी मुश्किल में न पड़ जाए। क्योंकि स्त्री बड़ी रूपवान है और उसने बडा गहरा तंत्र-मंत्र फेंका है। और आनंद कहीं ठगा न जाए। लेकिन बुद्ध देखते रहते हैं।
अचानक बुद्ध उठकर खड़े हो जाते हैं और सारिपुत्त से कहते हैं, अब कुछ करना होगा। सारिपुत्त कहता है, अब क्या हो गया जो आप करने के लिए कहते हैं? अब तक मैं आपसे कह रहा था, कुछ करें। आप चुप बैठे रहे। जो बीमारी शुरू हुई, उसे पहले ही रोक देना उचित है!
बुद्ध ने कहा, बीमारी अब तक शुरू नहीं हुई थी; अब शुरू हुई है। आनंद मूर्च्छित हो गया, साक्षी-भाव खो गया। अभी तक कोई डर नहीं था। वेश्या हो, सुंदर हो, कुछ भी हो, अभी तक कोई भय न था। और आनंद उसके घर में चला जाए; रात वहा टिके, कोई भय की बात नहीं थी। अब भय खड़ा हो गया है।
लेकिन सारिपुत्त बडा चकित है, क्योंकि आनंद अब भाग रहा है। वेश्या बहुत दूर रह गई है। जब बुद्ध कहते हैं, भय हो गया है, तब आनंद वेश्या से दूर निकल गया है भागकर और उसने पीठ कर ली है। वह लौटकर भी नहीं देख रहा है। लेकिन बुद्ध खड़े हैं। और वे कहते हैं, इस समय आनंद को सहायता की जरूरत है।
सारिपुत्त कहता है, आप भी अनूठी बातें करते हैं! जब वेश्या सामने खड़ी थी और आनंद उसको देख रहा था और डर था कि वह लोभित हो जाए, मोहित हो जाए, तब आप चुपचाप बैठे रहे। और अब जब कि आनंद भाग रहा है, और वेश्या दूर रह गई है, और उसके मंत्र-तंत्र पीछे पडे रह गए हैं, और उसके प्रभाव का क्षेत्र पार कर गया है आनंद, और आनंद लौटकर भी नहीं देख रहा है, तो अब आपके खड़े होने की क्या जरूरत है?
बुद्ध ने कहा, वह भाग ही इसलिए रहा है कि साक्षी-भाव खो गया। अब वह कर्ता-भाव में आ गया है। और कर्ता की वजह से डरा हुआ है। और अब वह डर रहा है। जब तक साक्षी था, तब तक खड़ा था, डर के कोई कारण भी न थे। अब उसको सहायता की जरूरत है।
सत्य तो अकेला भी काफी है। असत्य को भीड़ चाहिए।
मुल्ला नसरुद्दीन बड़ा नाराज था पत्नी से, और कलह कुछ ज्यादा ही बढ़ गई, तो आधी रात उठा और उसने कहा, बहुत हो चुका; जितना सह सकता था, सह लिया। हर चीज की सीमा आती है; और सीमा आ गई। मैं मरने जा रहा हूं इसी समय, झील में डूबकर। दरवाजा खोलकर बाहर निकलता था, पत्नी ने कहा, लेकिन नसरुद्दीन, तैरना तो तुम जानते ही नहीं! तो वह वापस लौट आया, उदास बैठ गया। उसने कहा, तो फिर मुझे कोई और उपाय सोचना पड़ेगा।
भय से हिंसा पैदा होती है। अभय का अंतिम परिणाम अहिंसा है।
मैं और तू
कथा :
एक विद्यार्थी नंबर तीन पास हुआ। उसके बाप ने उसे डांटा कि हमारे कुल में कभी न चला ऐसा। ऐसा कभी नहीं हुआ हमारे कुल में कि कोई नंबर तीन आया हो। हालांकि न होने का कुल कारण इतना था कि कुल में कोई पढ़ा ही नहीं था! नंबर तीन आएगा कैसे? लड़के ने बड़ी मेहनत की। वह सालभर मेहनत करके नंबर दो आया। बाप ने कहा कि क्या रखा है! कौन-सी बड़ी उन्नति कर ली! एक ही लड़के को पीछे हटा पाए! लड़के ने और मेहनत की और तीसरे साल वह नंबर एक आ गया। तो बाप ने कहा कि इसमें कुछ नहीं है। इससे पता चलता है कि तुम्हारी क्लास में गधों के सिवाय कोई भी नहीं है!
बाप को भी अड़चन होती है कि बेटा कुछ है। हालांकि सब बाप कोशिश करते हैं कि मेरा बेटा कुछ हो, दूसरों के सामने। क्योंकि मेरा बेटा कुछ है, ऐसा दूसरों को बताकर वे भी कुछ होते हैं। लेकिन अगर बेटा सच में कुछ है, तो बाप अड़चन में पड़ जाता है बेटे के साथ। दूसरों के साथ चर्चा करता है, मेरा बेटा कुछ है। क्योंकि मेरा बेटा! लेकिन बेटा सामने पड़ता है, तो बेचैनी शुरू होती है। बाप के मन को तक बेटे के मन से बेचैनी शुरू होती है!
अगर लड़की सुंदर हो, तो मां तक चिंतित हो जाती है। और रास्ते पर जब गुजरती है, तो देखती रहती है कि लोग लड़की को देख रहे हैं कि उसको देख रहे हैं। अगर लड़की को देख रहे हैं, तो बहुत बेचैनी होती है। उसका बदला वह घर लौटकर लड़की से लेगी!
आदमी का मन इतने निकट संबंधों में भी मैं को ऊपर रखता है। मां और बेटी के संबंध में भी, बाप और बेटे के संबंध में भी, वह मैं को ऊपर रखता है। निकटतम के साथ भी हमारी दुश्मनी चलती है मैं और तू की।
John Donne’s (1572-1631) -- Any man's death diminishes me, because I am involved in mankind, and therefore never send to know for whom the bell tolls; it tolls for thee.
चरम-पंथ
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन हमेशा दांत के डाक्टरों से बचता रहा। हमेशा डरा रहा। लेकिन एक बार मजबूरी इतनी बढ़ गई, पीड़ा इतनी थी दांत में कि जाना ही पड़ा। गया तो डाक्टर से उसने कहा, 'वर्षों से टाल रहा हूं, अब उस जगह पहुंच गई है बात कि अब और सहा नहीं जा सकता। न सो सकता, न बैठ सकता। दर्द बहुत है; आना ही पड़ा। लेकिन भयभीत हूं। हाथ-पैर मेरे कांप रहे हैं। स्नायु मेरे तने हैं। हृदय मेरा धड़क रहा है। मैं तुमसे बहुत डरता हूं।' डाक्टर दयालु था; उसने कहा, 'तुम घबड़ाओ मत।' भरा हुआ गिलास शराब का नसरुद्दीन को दिया और कहा, 'यह पी जाओ।' एक ही घूंट में नसरुद्दीन उसे पी गया। गम आई। आंखों में सुख आ गई। दर्द भी भूल गया। डाक्टर ने थोड़ी देर बाद पूछा, 'कैसा लग रहा है? भय गया? थोड़ी निर्भयता आई?' नसरुद्दीन खड़ा हो गया। छाती फुलाकर उसने कहा, 'निर्भयता ! अब मेरे दांत को हाथ लगाओ तो जानूं। देखें, कौन माई का लाल मेरे दांत को हाथ लगाता है।'
किस्सा ए लैला-ओ-मझनूं तो सुना हंस-हंसकर ।
अब जिगर थामकर बैठो, उनकी बारी है ॥
ययाति
कथा :
ययाति की बहुत पुरानी कथा है, जिसमें ययाति सौ वर्ष का हो गया। बहुत मीठी, बहुत मधुर कथा है। तथ्य न भी हो, तो भी सच है। और बहुत बार जो तथ्य नहीं होते, वे भी सत्य होते हैं। और बहुत बार जो तथ्य होते हैं, वे भी सत्य नहीं होते।
यह ययाति की कथा तथ्य नहीं है, लेकिन सत्य है। सत्य इसलिए कहता हूं कि उसका इंगित सत्य की ओर है। तथ्य नहीं है इसलिए कहता हूं कि ऐसा कभी हुआ नहीं होगा। यद्यपि आदमी का मन ऐसा है कि ऐसा रोज ही होना चाहिए।
ययाति सौ वर्ष का हो गया, उसकी मृत्यु आ गई। सम्राट था। सुंदर पत्नियां थीं, धन था, यश था, कीर्ति थी, शक्ति थी, प्रतिष्ठा थी। मौत द्वार पर आकर दस्तक दी। ययाति ने कहा, अभी आ गई? अभी तो मैं कुछ भोग नहीं पाया। अभी तो कुछ शुरू भी नहीं हुआ था! यह तो थोड़ी जल्दी हो गई। सौ वर्ष मुझे और चाहिए। मृत्यु ने कहा, मैं मजबूर हूं। मुझे तो ले जाना ही पड़ेगा। ययाति ने कहा, कोई भी मार्ग खोज। मुझे सौ वर्ष और दे। क्योंकि मैंने तो अभी तक कोई सुख जाना ही नहीं।
मृत्यु ने कहा, सौ वर्ष आप क्या करते थे? ययाति ने कहा, जिस सुख को जानता था, वही व्यर्थ हो जाता था। तब दूसरे सुख की खोज करता था। खोजा बहुत, पाया अब तक नहीं। सोचता था, कल की योजना बना रहा था। तेरे आगमन से तो कल का द्वार बंद हो जाएगा। अभी मुझे आशा है। मृत्यु ने कहा, सौ वर्ष में समझ नहीं आई। आशा अभी कायम है? अनुभव नहीं आया? ययाति ने कहा, कौन कह सकता है कि ऐसा कोई सुख न हो, जिससे मैं अपरिचित होऊं, जिसे पा लूं तो सुखी हो जाऊं! कौन कह सकता है?
मृत्यु ने कहा, तो फिर एक उपाय है कि तुम्हारे बेटे हैं दस। एक बेटा अपना जीवन दे दे तुम्हारी जगह, तो उसकी उम्र तुम ले लो। मैं लौट जाऊं। पर मुझे एक को ले जाना ही पड़ेगा।
बाप थोड़ा डरा। डर स्वाभाविक था। क्योंकि बाप सौ वर्ष का होकर मरने को राजी न हो, तो कोई बेटा अभी बीस का था, कोई अभी पंद्रह का था, कोई अभी दस का था। अभी तो उन्होंने और भी कुछ भी नहीं जाना था। लेकिन बाप ने सोचा, शायद कोई उनमें राजी हो जाए। शायद कोई राजी हो जाए। पूछा, बड़े बेटे तो राजी न हुए। उन्होंने कहा, आप कैसी बात करते हैं! आप सौ वर्ष के होकर जाने को तैयार नहीं। मेरी उम्र तो अभी चालीस ही वर्ष है। अभी तो मैंने जिंदगी कुछ भी नहीं देखी। आप किस मुंह से मुझसे कहते हैं?
सबसे छोटा बेटा राजी हो गया। राजी इसलिए हो गया--जब बाप से उसने कहा कि मैं राजी हूं, तो बाप भी हैरान हुआ। ययाति ने कहा, सब नौ बेटों ने इनकार कर दिया, तू राजी होता है। क्या तुझे यह खयाल नहीं आता कि मैं सौ वर्ष का होकर भी मरने को राजी नहीं, तेरी उम्र तो अभी बारह ही वर्ष है!
उस बेटे ने कहा, यह सोचकर राजी होता हूं कि जब सौ वर्ष में भी तुमने कुछ न पाया, तो व्यर्थ की दौड़ में मैं क्यों पडूं! जब मरना ही है और सौ वर्ष के समय में भी मरकर ऐसी पीड़ा होती है, जैसी तुमको हो रही है, तो मैं बारह वर्ष में ही मर जाऊं। अभी कम से कम विषाद से तो बचा हूं। अभी मैंने दुख तो नहीं जाना। सुख नहीं जाना, दुख भी नहीं जाना। मैं जाता हूं।
फिर भी ययाति को बुद्धि न आई। मन का रस ऐसा है कि उसने कल की योजनाएं बना रखी थीं। बेटे को जाने दिया। ययाति और सौ वर्ष जीया। फिर मौत आ गई। ये सौ वर्ष कब बीत गए, पता नहीं। ययाति फिर भूल गया कि मौत आ रही है। कितनी ही बार मौत आ जाए, हम सदा भूल जाते हैं कि मौत आ रही है। हम सब बहुत बार मर चुके हैं। हम सब के द्वारों पर बहुत बार मौत दस्तक दे गई है।
ययाति के द्वार पर दस्तक हुई। ययाति ने कहा, अभी! इतने जल्दी! क्या सौ वर्ष बीत गए? मौत ने कहा, इसे भी जल्दी कहते हैं आप! अब तो आपकी योजनाएं पूरी हो गई होंगी?
ययाति ने कहा, मैं वहीं का वहीं खड़ा हूं। मौत ने कहा, कहते थे कि कल और मिल जाए, तो मैं सुख पा लूं! ययाति ने कहा, मिला कल भी, लेकिन जिन सुखों को खोजा उनसे दुख ही पाया। और अभी फिर योजनाएं मन में हैं। क्षमा कर, एक और मौका! पर मौत ने कहा, फिर वही करना पड़ेगा।
इन सौ वर्षों में ययाति के नए बेटे पैदा हो गए; पुराने बेटे तो मर चुके थे। फिर छोटा बेटा राजी हो गया। ऐसे दस बार घटना घटती है। मौत आती है, लौटती है। एक हजार साल ययाति जिंदा रहता है।
मैं कहता हूं, यह तथ्य नहीं है, लेकिन सत्य है। अगर हमको भी यह मौका मिले, तो हम इससे भिन्न न करेंगे। सोचें थोड़ा मन में कि मौत दरवाजे पर आए और कहे कि सौ वर्ष का मौका देते हैं, घर में कोई राजी है? तो आप किसी को राजी करने की कोशिश करेंगे कि नहीं करेंगे! जरूर करेंगे। क्या दुबारा मौत आए, तो आप तब तक समझदार हो चुके होंगे? नहीं, जल्दी से मत कह लेना कि हम समझदार हैं। क्योंकि ययाति कम समझदार नहीं था।
हजार वर्ष के बाद भी जब मौत ने दस्तक दी, तो ययाति वहीं था, जहां पहले सौ वर्ष के बाद था। मौत ने कहा, अब क्षमा करो! किसी चीज की सीमा भी होती है। अब मुझसे मत कहना। बहुत हो गया! ययाति ने कहा, कितना ही हुआ हो, लेकिन मन मेरा वहीं है। कल अभी बाकी है, और सोचता हूं कि कोई सुख शायद अनजाना बचा हो, जिसे पा लूं तो सुखी हो जाऊं!
अनंत काल तक भी ऐसा ही होता रहता है। तो फिर वैराग्य पैदा नहीं होगा। अगर एक राग व्यर्थ होता है और आप तत्काल दूसरे राग की कामना करने लगते हैं, तो राग की धारा जारी रहेगी। एक राग का विषय टूटेगा, दूसरा राग का निर्मित हो जाएगा। दूसरा टूटेगा, तीसरा निर्मित हो जाएगा। ऐसा अनंत तक चल सकता है। ऐसा अनंत तक चलता है। वैराग्य कब होगा?
असलीयत
कथा :
एक दिन सुबह-सुबह एक आदमी भागा हुआ पागलखाने पहुंचा। जोर से दरवाजा खटखटाया। पागलखाने के प्रधान ने दरवाजा खोला। उस आदमी ने पूछा कि मैं यह पूछने आया हूं कि आपके पागलखाने से कोई निकलकर तो नहीं भाग गया? नहीं; कोई निकलकर भागा नहीं। आपको इसका शक क्यों पैदा हुआ? उसने कहा, और कोई कारण नहीं है। मेरी पत्नी को कोई लेकर भाग गया है! तो मैं अपने होश में नहीं मान सकता कि जिसमें थोड़ी भी बुद्धि होगी, वह मेरी पत्नी को लेकर भाग जाएगा! तो मैंने सोचा, पागलखाने में जाकर देख लूं कि कोई निकल तो नहीं गया।
पर उस प्रधान ने कहा कि माफ कर मेरे भाई। तेरी पत्नी के साथ मैंने तुझे कई बार रास्ते पर घूमते देखा है। मेरा तक मन बहुत बार हुआ कि तेरी पत्नी को लेकर भाग जाऊं। वह देखने में बहुत सुंदर है। उस आदमी ने कहा, उसी देखने की सुंदरता के पीछे तो मैं फंसा। फिर पीछे नरक ही निकला है!
जीवन के जो चेहरे हमें दिखाई पड़ते हैं, वे असलियत नहीं हैं।
मित्र बनाएंगे, तो शत्रु बनना निश्चित है। आधा नहीं चुना जा सकता।
अमेरिका में एक व्यक्ति बड़ी अनूठी खोज में लगा हुआ है। उसकी खोज भरोसे योग्य नहीं है, लेकिन खोज के परिणाम बड़े साफ हैं। और उस व्यक्ति का कहना यह है कि एक समय था मनुष्य जाति के इतिहास में जब कोई भोजन नहीं करता था।
जैन शास्त्रों में ऐसे समय का उल्लेख है। जैनों के जो पहले तीर्थंकर हैं आदिनाथ, उन्होंने ही भोजन और कृषि और अन्न की खोज की। उसके पहले कोई भोजन नहीं करता था। लोग भूखे नहीं होते थे।
यह बात कहानी की मालूम पड़ती है। लेकिन जो आदमी अमेरिका में खोज कर रहा है, उसके बड़े वैज्ञानिक आधार हैं। और वह कहता है कि भोजन सिर्फ एक लंबी आदत है। और वह यह कहता है कि भोजन से शरीर को शक्ति नहीं मिलती। भोजन से ज्यादा से ज्यादा शरीर में जो शक्ति पड़ी है, उसको गति मिलती है। ऐसे ही जैसे कि पनचक्की चलती थीं। तो पानी चक्की के पंखे पर से गिरता था, पंखा घूमता था। पंखा तो मौजूद है, सिर्फ गिरता हुआ पानी पंखे को घुमा देता था।
इस वैज्ञानिक का कहना है कि शरीर में शक्ति मौजूद है। सिर्फ यह भोजन का शरीर में जाना और शरीर के बाहर मल होकर निकलना, यह सिर्फ शरीर के भीतर जो पंखे बिना चले पड़े हैं, उनको चलाता है। इससे कोई शक्ति मिलती नहीं। और आदमी बिना भोजन के रह सकता है।
और ऐसी घटनाएं हैं, जहां कुछ लोग बिना भोजन के रहे हैं चालीस—पचास साल तक भी। उनका वजन भी नहीं गिरा। उनके शरीर में कोई रोग भी नहीं आया। बल्कि वे बहुत स्वस्थ लोग रहे हैं।
अभी बवेरिया में एक स्त्री है, थेरेसा न्यूमेन। उसने तीस साल से भोजन नहीं किया है। रत्तीभर वजन नीचे नहीं गिरा है। और तीस साल से वह कभी बीमार नहीं पड़ी। न कोई मल—मूत्र का सवाल है। उसकी सारी अंतड़ियां सिकुड़ गई हैं। पेट ने सारा काम बंद कर दिया है। लेकिन उसका शरीर परिपूर्ण स्वस्थ है। और जितनी उसकी उम्र है, उससे कम उम्र मालूम होती है। क्या कारण होगा? इस बात की संभावना है कि हो सकता है भोजन मनुष्य जाति की सिर्फ एक गलत आदत हो। और किसी दिन आदमी भोजन से मुक्त किया जा सके।
एक बात निश्चित है कि शरीर को भला जरूरत हो या आदत हो, लेकिन भीतर जो चेतना है, उसको न तो जरूरत है और न आदत है। वह भीतर की चेतना परम ऊर्जा से भरी है। उसकी ऊर्जा का स्रोत शाश्वत है। उसको ऊर्जा रोज—रोज ग्रहण नहीं करनी पड़ती।
जरूरत पर रुक जाना, जरूरत से आगे इंचभर न जाना। तो फिर आपके लिए कोई बंधन नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन की लड़की का विवाह हुआ। तो लड़की दहाड़ मार-मारकर, छाती पीट-पीटकर रो रही थी। सब समझा रहे थे, वह सुन नहीं रही थी। फिर मुल्ला उसके पास गया। तू मेरी बेटी है; तू बिलकुल मत घबड़ा; थोड़ी देर की बात है। थोड़ा धैर्य रख! उसने कहा, बेटी, तू मत रो, तुझे ले जाने वाले रोएंगे।
लाओत्से -- बोधि को उपलब्ध ऐसे चलता है, सावधान, जैसे प्रतिपल शत्रुओं से घिरा है। वह एक-एक कदम ऐसे रखता है, सोचकर, विचारकर, जैसे कोई सर्दी के दिनों में बर्फीली नदी में उतरता हो।
छलांग
कथा :
मोझर्ट के पास एक आदमी गया। और उस आदमी ने मोझर्ट से पूछा कि जिस भांति तुमने सात वर्ष की उम्र में संगीत की समस्त कला उपलब्ध कर ली थी, मैं भी किस भांति उसको उपलब्ध करूं, उसी तरह? मोझर्ट ने कहा, तुम्हारी उम्र कितनी है? उस आदमी ने कहा, मेरी उम्र तो पैंतालीस पार कर गई है। उसने कहा, तुमको सात वर्ष में आना चाहिए था, एक। और दूसरी बात ध्यान रखना, यह तुमसे न हो सकेगा। उसने कहा, लेकिन क्यों न हो सकेगा? तुमसे हो सका, मुझसे क्यों न हो सकेगा? मोझर्ट ने कहा, इसलिए कि मैं किसी से कभी पूछने नहीं गया। तुम पूछने आए हो!
पूछने वाला तो सीढ़ियां ही चढ़ सकता है। पूछने वाला sudden नहीं हो सकता। पूछने का मतलब ही है कि सीढ़ियां पूछने गया है कि सम्हलकर कैसे चढ़ जाएं, उतर जाएं। न पूछने वाला छलांग लगाता है।
चील ऊंचे आकाश में उड़ती है, लेकिन नजर नीचे पड़ी हुई लाश पर लगी रहती है। एकांत में बैठे हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर नजर भीड़ पर है।
दूसरे महायुद्ध में एक अंग्रेज सेनापति ने तोप से एक हवाई जहाज गिराया। और सब तो मर गए, लेकिन पायलट बच गया। वह भी जर्मन सेना का उतना ही बड़ा अधिकारी था जितने बड़े अधिकारी ने अंग्रेजी सेना के जहाज को गिराया था। उसे जिंदा देख कर अंग्रेज सेनापति ने उसे अस्पताल में भर्ती किया, उसकी बड़ी सेवा की। लेकिन चोटें बहुत लगी थीं उसे, उसका एक पैर काटना पड़ा। अंग्रेज सेनापति ने पूछा कि मैं कुछ सेवा कर सकता हूं?
तो उसने कहा, इतना भर करो, एक ही आकांक्षा है मेरी कि अपने देश की भूमि में ही दफनाया जाऊं। यह मेरा पैर तुम पार्सल से जर्मनी भेज दो मेरे घर।
पैर भेज दिया गया। फिर उसका एक हाथ भी काटना पड़ा। फिर पूछा अंग्रेज सेनापति ने तो उसने कहा, यह हाथ मेरा पार्सल से घर भिजवा दो। हाथ भेज दिया गया। फिर दूसरा हाथ कटा, वह भी भेज दिया। फिर दूसरा पैर कटा, वह भी भेज दिया। जब यह चौथी बार पैर को भेजा जाने लगा तो अंग्रेज सेनापति ने उस जर्मन सेनापति से कहा, मित्र, एक बात बताओ। एक पैर भेज दिया, फिर एक हाथ भेज दिया, फिर एक पैर भेज दिया, अब चौथा भी भेजने लगे। कल कहोगे सिर भेज दो, परसों कहोगे अब धड़ भेज दो। कहीं तुम भागने की कोशिश तो नहीं कर रहे हो?
बुद्ध : किसी दूसरे की भूल पर तुम्हारा क्रुद्ध होना ऐसे ही है जैसे किसी दूसरे की भूल पर अपने को दंड देना।
अंगुलिमाल
कथा :
बुद्ध के जीवन में उल्लेख है कि बुद्ध एक गांव से गुजरते हैं। लोग कहते हैं, मत जाओ, आगे एक डाकू है, वह हत्या कर रहा है लोगों की। रास्ता निर्जन हो गया है। वह अंगुलिमाल किसी को भी मार देता है। तुम मत जाओ इस रास्ते से। बुद्ध कहते हैं, अगर मुझे पता न होता, तो शायद मैं दूसरे रास्ते से भी चला जाता। लेकिन अब जब कि मुझे पता है, इसी रास्ते से जाना होगा। लोग कहते हैं, लेकिन किसलिए? बुद्ध कहते हैं, इसलिए कि वह बेचारा प्रतीक्षा करता होगा। लोग मिल न रहे होंगे; उसको बड़ी तकलीफ होती होगी। कोई गर्दन तो मिलनी चाहिए गर्दन काटने वाले को! और अपनी गर्दन का इतना भी उपयोग हो जाए कि किसी को थोड़ी शांति मिल जाए, तो बुरा क्या है! बुद्ध आगे बढ़ जाते हैं।
अंगुलिमाल देखता है, कोई आ रहा है दूर से, तो अपने पत्थर पर, अपने फरसे पर धार रखने लगता है। बहुत दिन हो गए, जंग खा गया फरसा। कोई निकलता ही नहीं रास्ते से। उसने कसम खा ली है कि एक हजार लोगों की गर्दन काटकर, उनकी अंगुलियों का हार बनाना है, इसलिए वह अंगुलिमाल उसका नाम पड़ गया। उसने नौ सौ निन्यानबे आदमी मार दिए, एक की ही दिक्कत है। उसी में वह अटका हुआ है। कोई निकलता ही नहीं! रास्ता करीब-करीब बंद हो गया है! किसी को आते देखकर, अति प्रसन्न होकर वह अपने फरसे पर धार रखता है।
लेकिन जैसे-जैसे बुद्ध करीब आते हैं, और जैसे-जैसे वह साफ देख पाता है, उसको थोड़ा लगता है कि निरीह आदमी, सीधा-सादा आदमी, शांत आदमी! इस बेचारे को शायद पता नहीं है कि यहां अंगुलिमाल है और रास्ता निर्जन हो गया है। इसको एक चेतावनी दे देनी चाहिए। इसको एक दफा कह देना चाहिए कि तू खतरनाक रास्ते पर आ रहा है।
अंगुलिमाल के पास जब बुद्ध पहुंच जाते हैं, तो वह चिल्लाता है कि हे भिक्षु! लौट जा वापस। शायद तुझे पता नहीं, तू भूल से आ गया है। इस मार्ग पर कोई आता नहीं। और तेरी शांत मुद्रा को देखकर, तेरी धीमी गति को देखकर, तेरे संगीतपूर्ण चलने को देखकर मुझे लगता है कि तुझे माफ कर दूं। तू लौट जा। एक शर्त, अगर तू लौट जाए, तो मैं फरसा न उठाऊं। लेकिन अगर एक कदम भी आगे बढ़ाया, तो तू अपने हाथ से मरने जा रहा है। फिर मेरा कोई जिम्मा नहीं है।
लेकिन बुद्ध आगे बढ़े चले जाते हैं। अंगुलिमाल और हैरान होता है। ठिठके भी नहीं वे। एक दफे उसकी बात के लिए रुककर सोचा भी नहीं कि विचार कर लें। वे आगे ही बढ़ते चले आते हैं। अंगुलिमाल कहता है कि देखो, सुना? समझे कि नहीं? बहरे तो नहीं हो!
बुद्ध कहते हैं, भलीभांति सुनता हूं, समझता हूं। अंगुलिमाल कहता है, रुक जाओ। मत बढ़ो! बुद्ध कहते हैं, अंगुलिमाल, मैं बहुत पहले रुक गया। तब से मैं चल ही नहीं रहा हूं। मैं तुझसे कहता हूं, अंगुलिमाल, तू रुक जा, मत चल। अंगुलिमाल बोला कि बहरे तो नहीं हो, लेकिन पागल मालूम होते हो। मैं खड़ा हुआ हूं। मुझ खड़े हुए को कहते हो कि रुक जाओ! तुम चल रहे हो। चलते हुए को कहते हो कि खड़े हो!
तो बुद्ध ने कहा, मैंने जब से जाना कि मन ही चलता है, और जब मन रुक जाता है, तो सब रुक जाता है। तेरा मन बहुत चल रहा है। इतनी दूर से तू मुझे देख रहा है, और तेरा मन चल रहा है। फरसे पर धार रख रहा है, तेरा मन चल रहा है। अभी तू सोच रहा है, तेरा मन चल रहा है। मारूं, न मारूं। यह आदमी लौट जाए, आए। तेरा मन चल रहा है। तेरे मन के चलने को मैं कहता हूं, अंगुलिमाल, तू रुक जा।
अंगुलिमाल ने कहा, मेरी किसी की बात मानने की आदत नहीं है। तो ठीक है। तुम आगे बढ़ो, मैं भी फरसे पर धार रखता हूं। वह फरसे पर धार रखता है; बुद्ध आगे आ जाते हैं। बुद्ध सामने खड़े हो जाते हैं। वह अपना फरसा उठाता है।
बुद्ध कहते हैं, लेकिन मरते हुए आदमी की एक बात पूरी कर सकोगे? अंगुलिमाल ने कहा, बोलो। कोई बात पूरी करने के लिए तो हजार आदमी मैंने काटे! तुम बोलो; बात पूरी करूंगा। मेरे वचन का भरोसा कर सकते हो। बुद्ध ने कहा, वह मैं जानता हूं। कोई दिया गया वचन ही हजार आदमी मारने के लिए उसको मजबूर किया है। तो बुद्ध ने कहा, इसके पहले कि मैं मरूं, एक छोटी-सी बात जानना चाहता हूं। यह सामने जो वृक्ष लगा है, इसके दो-चार पत्ते मुझे काटकर दे दो।
उसने फरसा वृक्ष में मारा। दो-चार पत्ते क्या, दो-चार शाखाएं कटकर नीचे गिर गईं। बुद्ध ने कहा, यह आधी बात तुमने पूरी कर दी। अब इनको वापस जोड़ दो! उस अंगुलिमाल ने कहा, तुम निश्चित पागल हो। तोड़ना संभव था, जोड़ना संभव नहीं है।
तो बुद्ध ने कहा, अंगुलिमाल, तोड़ना तो बच्चे भी कर सकते हैं। अगर जोड़ सको, तो कुछ हो, अन्यथा कुछ भी नहीं। तोड़ना तो बच्चे भी कर सकते हैं। अगर जोड़ सको, तो कुछ हो। हजार गर्दन भी काट ली, तो मैं कहता हूं, कुछ भी नहीं हो। एक गर्दन जोड़ दो, तो मैं समझूंगा, कुछ हो।
अंगुलिमाल ने फरसा नीचे पटक दिया। वह बुद्ध के पैरों पर गिर गया। और बुद्ध ने कहा, अंगुलिमाल, तू आज से उपलब्ध हुआ। तू आज से ब्राह्मण हुआ। तू आज से संन्यासी हुआ।
बुद्ध के भिक्षु पीछे खड़े थे। उन्होंने कहा कि हम वर्षों से आपके साथ हैं। हम से कभी आपने ऐसे वचन नहीं बोले कि तुम ब्राह्मण हुए, कि तुम उपलब्ध हुए, कि तुम पा गए। और अंगुलिमाल हत्यारे से, जो अभी क्षणभर पहले गर्दन काटने को तैयार था, और फरसा फेंककर सिर्फ पैर पर गिरा है, उससे आप ऐसे वचन बोल रहे हैं!
बुद्ध ने कहा, यह उन थोड़े-से लोगों में से है, जो छलांग लगा सकते हैं। यह छलांग लगा गया है। और जब अंगुलिमाल को उठाकर खड़ा किया, तो लोग उसका चेहरा भी न पहचान सके। वह क्रूर हत्यारा न मालूम कहां विदा हो गया था। उन आंखों में जहां आग जलती थी, वहां फूल खिल गए थे। वह व्यक्ति, जिसके हाथ में फरसा था, कोई भरोसा न कर सकता था कि इस हाथ में कभी फरसा रहा होगा। इस हाथ ने कभी फूल भी तोड़े होंगे, इतनी भी इस हाथ में कठोरता नहीं है।
लेकिन बुद्ध के भिक्षुओं को तोर् ईष्या होनी स्वाभाविक थी। आज का नया आदमी एकदम सीनियर हो गया। एकदम सीनियर! सब छलांग लगा गया! सब व्यवस्था तोड़ दी! अंगुलिमाल बुद्ध के बगल में चलने लगा। गांव में प्रवेश किया। भिक्षुर् ईष्या से भर गए। उन्होंने कहा, यह अंगुलिमाल हत्यारा है।
बुद्ध ने कहा, थोड़ा ठहरो। उस आदमी को तुम नहीं जानते हो। वह उन थोड़े-से लोगों में से है, जो छलांग लगा लेते हैं। वह हत्या कर-करके हत्या से मुक्त हो गया। और तुम हत्या बिना किए हत्या से मुक्त नहीं हो पाए हो। मैं तुमसे पूछता हूं भिक्षुओ, तुम्हारे मन में अंगुलिमाल की हत्या का खयाल तो नहीं उठता?
एक भिक्षु जो पीछे था, वह घबड़ाकर हट गया। उसने कहा, आपको कैसे पता चला? मेरे मन में यह खयाल आ रहा था कि इसको तो खतम ही कर देना चाहिए। नहीं तो मुफ्त, यह नंबर दो का आदमी हो गया! बुद्ध के बाद ऐसा लगता है कि यही आदमी है! और अभी-अभी आया!
तो बुद्ध ने कहा कि मैं तुमसे कहता हूं, तुम हत्या छोड़-छोड़कर भी नहीं छोड़ पाए। यह हत्या कर-करके भी मुक्त हो गया। इसके लिए मन को वश में करने की कोई प्रक्रिया नहीं है। और जब गांव में गए, तो बुद्ध ने कहा, अब तुम्हें अभी, जल्दी ही प्रमाण मिल जाएगा। थोड़ी प्रतीक्षा करो, जल्दी प्रमाण मिल जाएगा।
गांव में जब सब भिक्षु गए, तो बुद्ध ने कहा, अंगुलिमाल, भिक्षा मांगने जा।
सम्राट भी डरते थे। अंगुलिमाल का नाम कोई ले दे, तो उनको भी कंपन हो जाता था। सारे गांव में खबर फैल गई कि अंगुलिमाल भिक्षु हो गया। लोगों ने दरवाजे बंद कर लिए। क्योंकि भरोसा क्या, कि वह आदमी एकदम किसी की गर्दन दबा दे! दरवाजे बंद हो गए। दुकानें बंद हो गईं। गांव बंद हो गया। लोग अपनी छतों पर, छप्परों पर चढ़ गए।
अंगुलिमाल जब नीचे भिक्षा का पात्र लेकर भिक्षा मांगने निकला, तो कोई भिक्षा देने वाला नहीं था। हां, लोगों ने ऊपर से पत्थर जरूर फेंके। और इतने पत्थर फेंके कि अंगुलिमाल सड़क पर लहूलुहान होकर गिर पड़ा। और जब लोगों ने पत्थर फेंके, तो अंगुलिमाल ने सिर्फ अपने भिक्षा-पात्र में पत्थर झेलने की कोशिश की। न उसने एक दुर्वचन कहा, न एक क्रोध से भरी आंख उठाई।
और जब वह लहूलुहान, पत्थरों में दबा हुआ नीचे पड़ा था, बुद्ध उसके पास गए। और उन्होंने कहा, अंगुलिमाल, इन लोगों के इतने पत्थर खाकर तेरे मन में क्या होता है? तो अंगुलिमाल ने कहा, मेरे मन में यही होता है कि जैसा नासमझ मैं कल तक था, वैसे ही नासमझ ये हैं। परमात्मा, इनको क्षमा कर। और मेरे मन में कुछ भी नहीं होता। तो बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा कि इसको देखो, यह बिना विधि के छलांग लगा गया है।
विनाश केवल उन्हीं चीजों का होता है, जो संयोग होती हैं, कंपाउंड होती हैं। सिर्फ संयोग का विनाश होता है, तत्व का विनाश नहीं होता।
याद
कथा :
बुद्ध एक गांव में ठहरे हैं। उस गांव के सम्राट के बेटे ने आकर दीक्षा ली। उस सम्राट के लड़के से कभी किसी ने न सोचा था कि वह दीक्षा लेगा। लंपट था, निरा लंपट था। बुद्ध के भिक्षु भी चकित हुए। बुद्ध के भिक्षुओं ने कहा, इस निरा लंपट ने दीक्षा ले ली? इस आदमी से कोई आशा नहीं करता था। यह हत्या कर सकता है, मान सकते हैं। यह डाका डाल सकता है, मान सकते हैं। यह किसी की स्त्री को उठाकर ले जा सकता है, मान सकते हैं। यह संन्यास लेगा, यह कोई सपना नहीं देख सकता था! इसने ऐसा क्यों किया? बुद्ध से लोग पूछने लगे।
बुद्ध ने कहा, मैं तुम्हें इसके पुराने जन्म की कथा कहूं। एक छोटी-सी घटना ने आज के इसके संन्यास को निर्मित किया है--छोटी-सी घटना ने। उन्होंने पूछा, कौन-सी है वह कथा? तो बुद्ध ने कहा...।
और बुद्ध और महावीर ने उस साइंस का विकास किया पृथ्वी पर, जिससे लोगों के दूसरे जन्मों में झांका जा सकता है; किताब की तरह पढ़ा जा सकता है।
तो बुद्ध ने कहा कि यह व्यक्ति पिछले जन्म में हाथी था, आदमी नहीं था। और तब पहली दफा लोगों को खयाल आया कि इसकी चाल-ढाल देखकर कई दफा हमें ऐसा लगता था कि जैसे हाथी की चाल चलता है। अभी भी, इस जन्म में भी उसकी चाल-ढाल, उसका ढंग एक शानदार हाथी का, मदमस्त हाथी का ढंग था।
बुद्ध ने कहा, यह हाथी था पिछले जन्म में। और जिस जंगल में रहता था, हाथियों का राजा था। तो जंगल में आग लगी। गर्मी के दिन थे, भयंकर आग लगी आधी रात को। सारे जंगल के पशु-पक्षी भागने लगे, यह भी भागा। यह एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने को एक क्षण को रुका। भागने के लिए एक पैर ऊपर उठाया, तभी एक छोटा-सा खरगोश वृक्ष के पीछे से निकला और इसके पैर के नीचे की जमीन पर आकर बैठ गया। एक ही पैर ऊपर उठा, हाथी ने नीचे देखा, और उसे लगा कि अगर मैं पैर नीचे रखूं, तो यह खरगोश मर जाएगा। यह हाथी खड़ा-खड़ा आग में जलकर मर गया। बस, उस जीवन में इसने इतना-सा ही एक महत्वपूर्ण काम किया था, उसका फल आज इसका संन्यास है।
रात वह राजकुमार सोया। जहां पचास हजार भिक्षु सोए हों, वहां अड़चन और कठिनाई स्वाभाविक है। फिर वह बहुत पीछे से दीक्षा लिया था, उससे बुजुर्ग संन्यासी थे। जो बहुत बुजुर्ग थे, वे भवन के भीतर सोए। जो और कम बुजुर्ग थे, वे भवन के बाहर सोए। जो और कम बुजुर्ग थे, वे रास्ते पर सोए। जो और कम बुजुर्ग थे, वे और मैदान में सोए। उसको तो बिलकुल आखिर में, जो गली राजपथ से जोड़ती थी बुद्ध के विहार तक, उसमें सोने को मिला। रात भर! कोई भिक्षु गुजरा, उसकी नींद टूट गई। कोई कुत्ता भौंका, उसकी नींद टूट गई। कोई मच्छर काटा, उसकी नींद टूट गई। रातभर वह परेशान रहा। उसने सोचा कि सुबह मैं इस दीक्षा का त्याग करूं। यह कोई अपने काम की बात नहीं।
सुबह वह बुद्ध के पास जाकर, हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। बुद्ध ने कहा, मालूम है मुझे कि तुम किसलिए आए हो। उसने कहा कि आपको नहीं मालूम होगा कि मैं किसलिए आया हूं। मैं कोई साधना की पद्धति पूछने नहीं आया। क्योंकि कल मैंने दीक्षा ली, आज मुझे साधना की पद्धति पूछनी थी; उसके लिए मैं नहीं आया। बुद्ध ने कहा, वह मैं तुझसे कुछ नहीं पूछता। मुझे मालूम है, तू किसलिए आया। सिर्फ मैं तुझे इतनी याद दिलाना चाहता हूं कि हाथी होकर भी तूने जितना धैर्य दिखाया, क्या आदमी होकर उतना धैर्य न दिखा सकेगा?
उस आदमी की आंखें बंद हो गईं। उसको कुछ समझ में न आया कि हाथी होकर इतना धैर्य दिखाया! यह बुद्ध क्या कहते हैं, पागल जैसी बात! उसकी आंख बंद हो गई।
लेकिन बुद्ध का यह कहना, जैसे उसके भीतर स्मृति का एक द्वार खुल गया। आंख उसकी बंद हो गई। उसने देखा कि वह एक हाथी है। एक घने जंगल में आग लगी है। एक वृक्ष के नीचे वह खड़ा है। एक खरगोश उसके पैर के नीचे आकर बैठ गया। इस डर से वह भागा नहीं कि मेरा पैर नीचे पड़े, तो खरगोश मर जाए। और जब मैं भागकर बचना चाहता हूं, तो जैसा मैं बचना चाहता हूं, वैसा ही खरगोश भी बचना चाहता है। और खरगोश यह सोचकर मेरे पैर के नीचे बैठा है कि शरण मिल गई। तो इस भोले से खरगोश को धोखा देकर भागना उचित नहीं। तो मैं जल गया।
उसने आंख खोली, उसने कहा कि माफ कर देना, भूल हो गई। रात और भी कोई कठिन जगह हो सोने की, तो मुझे दे देना। अब मैं याद रख सकूंगा। उतना छोटा-सा, उतना छोटा-सा काम, क्या मेरे जीवन में इतनी बड़ी घटना बन सकता है?
सब छोटे बीज बड़े वृक्ष हो जाते हैं। चाहे वे बुरे बीज हों, चाहे वे भले बीज हों, सब बड़े वृक्ष हो जाते हैं--सब बड़े वृक्ष हो जाते हैं।
जागों को कैसे जगाओ? जागे हुए नहीं हैं, भ्रांति है जागने की। सोए को जगाना आसान है, क्योंकि वह मानता है मैं सोया हुआ हूं। और जो सोया है और सपना देख रहा है कि मैं जागा हुआ हूं उसको जगाना बहुत मुश्किल है।
किसी ने पूछा रैदास से कि राम को कैसे जपें? कैसे स्मरण करें? करते हैं, छूट-छूट जाता है । एकाध-दो क्षण को याद रहती है, फिर भूल जाती है। हाथ में माला चलती रहती है यंत्रवत और मन कहीं का कहीं चला जाता है। उसके ही उत्तर में कहा कि मैं तो छुड़ाना चाहता हूं कभी-कभी कि कभी तो फुरसत हो, मगर छूटती नहीं। मैं अगर न भी बोलूं तो भी गूंजती रहती है। तेरी यह मुश्किल, मेरी यह मुश्किल!
पहला मंत्र का कदम है : ओंठों से उच्चार। फिर दूसरा कदम है : उच्चार हो कंठ में, ओंठ तक न आए। तीसरा कदम है : हृदय में उच्चारण। चौथा कदम है, उच्चार भी नहीं! तुम्हारी तरफ से कोई प्रयास ही नहीं। उसी की बात कर रहे हैं रैदास -- अब कैसे छूटै नामरट लागी।
सन्यास
कथा :
एक युवक बैठा है स्नानगृह में। उसकी पत्नी उबटन लगाती है। उबटन लगाते वक्त, स्नान करवाते वक्त, अपने पति को वह कहती है कि मेरे भाई ने संन्यास लेने का विचार किया है। वह पति पूछता है, कब लेगा तुम्हारा भाई संन्यास? उसकी पत्नी कहती है, एक महीने बाद का तय किया है। वह पति ऐसे ही मजाक में पूछता है कि एक महीना जीएगा, पक्का है? पत्नी कहती है, किस तरह की अपशकुन की बातें बोलते हो अपने मुंह से! यह शोभा नहीं देता। ऐसा सोचते ही क्यों हो? उसने कहा, सोचता नहीं हूं, लेकिन एक महीना जीएगा, यह पक्का है? ये ढंग संन्यास लेने के नहीं हैं। क्योंकि जो आदमी स्थगित करता है, उसके भीतर वह जो संन्यास-विरोधी कर्मों का भार है, भारी है।
वह युवक ऐसे ही कह रहा है। तो उसकी पत्नी ने सिर्फ मजाक में और व्यंग्य में कहा कि अगर तुमको संन्यास लेना हो, तो क्या करोगे? आधी उबटन लगी थी शरीर पर, आधी धुल गई थी। वह युवक नग्न था, खड़ा हो गया। पत्नी ने कहा, कहां जाते हो? उसने दरवाजा खोला। पत्नी ने कहा, कहां निकलते हो? लोग क्या कहेंगे? नग्न हो तुम! वह दरवाजे के बाहर हो गया। पत्नी ने कहा, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न! पर उसने कहा, मैंने संन्यास ले लिया। बात खतम हो गई।
तिब्बती कहावत -- गुरु को खोजो मत। जब शिष्य तैयार है, तो गुरु मौजूद हो जाता है।
बुद्ध जब खुद अपने गांव में आए और भीख मांगने निकले, तो उनके पिता ने उनको जाकर रोका और कहा कि अब हद हुई जाती है! क्या कमी है तेरे लिए? कम से कम इस गांव में तो भीख मत मांग! मेरी इज्जत का तो कुछ खयाल कर। बुद्ध ने कहा, मैं अपनी इज्जत तो गंवा चुका। तुम्हारी भी गंवा दूं, तो साधन हो जाए। इसे कहां तक बचाए रखोगे? इसको छोड़ो! बुद्ध के पिता ने फिर भी नहीं समझा। बुद्ध के पिता ने कहा कि नासमझ, तुझे पता नहीं है।
उस बुद्ध को बुद्ध के पिता नासमझ कह रहे हैं, जिससे समझदार आदमी इस जमीन पर मुश्किल से कभी कोई होता है! लेकिन बाप का अहंकार बेटे को समझदार कैसे माने! लाखों लोग उसको समझदार मान रहे हैं। लाखों लोग उसके चरणों में सिर रख रहे हैं लेकिन बुद्ध के बाप अकड़कर खड़े हैं।
कहा, नासमझ, हमारे परिवार में, हमारी कुल-परंपरा में कभी किसी ने भीख नहीं मांगी। बुद्ध ने कहा, आपकी कुल-परंपरा में न मांगी होगी। लेकिन जहां तक मैं याद करता हूं अपने पिछले जन्मों को, मैं सदा का भिखारी हूं। मैं सदा ही भीख मांगता रहा हूं। उसी भीख मांगने की वजह से तुम्हारे घर में पैदा हो गया था; और कोई कारण न था। मगर पुरानी आदत, मैंने फिर अपना भिक्षा-पात्र उठा लिया।
जब बुद्ध अपने घर पहली बार गए बारह वर्ष के बाद, तो उनकी पत्नी ने बहुत क्रोध से अपने बेटे को कहा कि मांग ले बुद्ध से! ये तेरे पिता हैं। देख तेरे बेशर्म पिता को, ये सब छोड़कर भाग गए हैं। ये मुझे छोड़कर भाग गए हैं। ये मुझसे बिना पूछे भाग गए हैं। तू एक दिन का था, तब ये भाग गए हैं। ये तेरे पिता हैं, इनसे अपनी वसीयत मांग ले। गहरा व्यंग्य कर रही थी पत्नी। पत्नी को पता नहीं कि किससे व्यंग्य कर रही है। वह आदमी अब मौजूद ही नहीं है। शून्य में यह व्यंग्य खो जाएगा। लेकिन पत्नी को तो अभी भी पुराना पत्नी का भाव मौजूद था। उसे बुद्ध दिखाई नहीं पड़ रहे थे। वह जो सामने खड़ा था सूर्य की भांति, वह उसकी अंधी आंखों में नहीं दिखाई पड़ सकता था।
राग अंधा कर देता है; सूर्य भी नहीं दिखाई पड़ता है। बुद्ध भी बुद्ध की पत्नी को नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। पत्नी अपने बेटे से व्यंग्य करवा रही है कि मांग। हाथ फैला। बुद्ध से मांग ले कि संपत्ति क्या है? मेरे लिए क्या छोड़े जा रहे हैं? गहरा व्यंग्य था। बुद्ध के पास तो कुछ भी न था।
लेकिन उसे पता नहीं। बुद्ध के बेटे ने, राहुल ने, हाथ फैला दिए। बुद्ध ने अपना भिक्षा-पात्र उसके हाथ में रख दिया, और कहा, मैं तुझे भिक्षा मांगने की वसीयत देता हूं, तू भिक्षा मांग।
पत्नी रोने-चिल्लाने लगी कि आप यह क्या करते हैं? बाप घबड़ा गए और कहा कि तू गया, अब घर का एक ही दीया बचा, उसे भी बुझाए देता है! बुद्ध ने कहा, मैं इसी के लिए आया हूं इतनी दूर। इसकी संभावनाओं का मुझे पता है। इसकी पिछली यात्राओं का मुझे अनुभव है। तुम इसे जानते हो कि छोटा-सा बच्चा है, मैं नहीं जानता। मैं जानता हूं कि इसकी अपनी यात्रा है, जो काफी आगे निकल गई है। जरा-सी चोट की जरूरत है।
बाप नहीं समझ पाए; पत्नी नहीं समझ पाई; पर बारह साल का राहुल भिक्षा-पात्र लेकर भिक्षुओं में सम्मिलित हो गया। मां ने बहुत बुलाया; पिता ने बहुत कहा कि बेटे, तू लौट आ। इस बात में मत पड़। पर राहुल ने कहा, बात पूरी हो गई। मेरी दीक्षा हो गई।
योग हजार विधियों का प्रयोग करता है। योग ने जब पहली दफा संन्यासियों को कहा कि तुम भिक्षा मांगो, तो उसका कारण सिर्फ साधन था।
साधन का अर्थ है, वह जो सात्विक होने का भी अहंकार बच रहेगा, उसे भी काटना ।
अधर्म से भरे हुए व्यक्ति को प्रकृति आज्ञा देती है; वे गुलामों की तरह होते हैं। धर्म से भरा हुआ व्यक्ति प्रकृति के ऊपर उठता है, वह प्रकृति को आज्ञा देना शुरू करता है।
साधना
कथा :
सूफी फकीर हुआ बायजीद। बायजीद के पास, जिस राजधानी में वह ठहरा था, उस राजधानी का जो सबसे बड़ा धनपति था, नगर सेठ था, वह आया। उसने आकर लाखों रुपए बायजीद के चरणों में डाल दिए और कहा बायजीद, मैं सब त्याग करना चाहता हूं। स्वीकार करो! बायजीद ने कहा कि अगर तू त्याग को त्याग करना चाहे, तो मैं स्वीकार करता हूं। त्याग को स्वीकार नहीं करूंगा। त्याग को भी त्याग करना चाहे, तो स्वीकार करता हूं। उस आदमी ने कहा, मजे की बात कर रहे हैं आप। धन तो त्यागा जा सकता है; त्याग को कैसे त्यागेंगे! त्याग क्या कोई चीज है?
बायजीद ने कहा, साधन का उपयोग करेंगे; त्याग को भी त्याग करवा देंगे। उस आदमी ने कहा, करो साधन का उपयोग, लेकिन मेरी समझ में नहीं आता। यह त्याग तो है ही नहीं! समझिए कि एक कमरे में मैं मौजूद हूं, तो मुझे बाहर निकाला जा सकता है। लेकिन अगर मैं मौजूद नहीं हूं, तो मेरी गैर-मौजूदगी को कैसे बाहर निकाला जा सकेगा!
बायजीद ने कहा, प्यारे, जिसे तू गैर-मौजूदगी कह रहा है, वह गैर-मौजूदगी नहीं है। वह सिर्फ जो प्रकट अहंकार था, उसका अप्रकट हो जाना है। तू टेबल-कुर्सी के नीचे छिप गया है; गैर-मौजूद नहीं है। हम निकालेंगे। साधन का उपयोग करेंगे।
उसने कहा, अच्छा भाई। मैं तो सोचता था कि सब धन छोड़कर--अंतःकरण इस धन की वजह से अशुद्ध होता है--अशुद्धि के बाहर हो जाऊंगा। तुम कहते हो कि और! और क्या चाहते हो तुम?
उस फकीर ने कहा कि तू कल से एक काम कर। रोज सुबह सड़क पर बुहारी लगा, कचरे को ढो। फिर जब जरूरत होगी, आगे साधन का उपयोग करेंगे।
बड़ा कष्ट हुआ उस आदमी को। धन छोड़ देने में कष्ट न हुआ था। यह सड़क पर बुहारी लगाने में बहुत कष्ट हुआ। कई दफा मन में खयाल आता कि क्या सड़क पर बुहारी लगाना, यह कोई योग है? यह कोई साधन है? कई दफा आता बायजीद के पास, पूछने का मन होता। बायजीद कहता कि रुक, रुक। अभी पूछ मत। थोड़ा और बुहारी लगा।
बुहारी लगाते-लगाते एक महीना बीत गया, तब बायजीद एक दिन सड़क के किनारे से निकल रहा था। वह धनपति इतने आनंद से बुहारी लगा रहा था कि जैसे प्रभु का गीत गा रहा हो। उसने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने लौटकर भी नहीं देखा बायजीद को। वह अपनी बुहारी लगाता रहा। बायजीद ने कहा, मेरे भाई, सुनो भी! उसने कहा, व्यर्थ मेरे भजन में बाधा मत डालो। बायजीद ने कहा, चल, अब बुहारी लगाने की कोई जरूरत न रही। बुहारी लगाना भजन बन गया। एक साधन का उपयोग हुआ।
महावीर -- एक ही वीरता है इस पृथ्वी पर, अकेले होने का साहस - The courage to be alone।
अपनी पहचान
कथा :
चंडूखाने में तीन अफीमची बैठे अफीम पी रहे थे। उनमें से एक बोला: 'चलो आज एक खेल खेलते हैं। कुछ देर बाद हम तीनों में से एक उठ कर घर चला जाए, बाकी दो को यह पता लगाना होगा कि तीनों में से कौन-सा घर गया है?'
आप पृथ्वी पर मेहमान हो, मालिक नहीं
मुल्ला नसरुद्दीन हज की यात्रा को गया। बड़ी भीड़भाड़ थी वहां। बमुश्किल ही धर्मशाला में जगह मिली, वह भी बहुत हाथ-पैर जोड़ कर। मगर मैनेजर ने कहा कि जगह तो देते हैं लेकिन एक अड़चन है: एक ही बिस्तर पर एक दूसरे आदमी के साथ सोना पड़ेगा। उसको भी मुफ्त जगह दी है, इसलिए वह अड़चन नहीं डाल सकता। लेकिन सोना पड़ेगा दोनों को एक ही बिस्तर में, जगह और है नहीं।
नसरुद्दीन ने कहा: 'यह तो बड़ी झंझट की बात है। मगर खैर कोई बात नहीं, कोई रास्ता निकाल लेंगे।' गया अपनी टोपी लगाए, जूता पहने, कपड़े पहने और लेटने लगा बिस्तर पर, तो वह दूसरा आदमी बोला कि भाईजान, वैसे ही दिक्कत होगी दो आदमियों के एक बिस्तर में सोने में, मगर मैं भी मुफ्त इसलिए कुछ कह सकता नहीं, नहीं तो वह मैनेजर निकाल करेगा, मगर आप कृपा करके टोपी, कोट, जूता तो कम से कम निकाल ही दें! नहीं तो कैसे आपके साथ सोऊंगा?
नसरुद्दीन ने कहा: 'यह तुम बात ही मत उठाना। ये मैं उतार नहीं सकता, क्योंकि मैं ये उतार दूं तो सुबह मैं पहचानूंगा कैसे कि कौन कौन है! इन्हीं की वजह से तो मुझे पहचान रहती है कि यह मैं ही हूं। जब दर्पण के सामने खड़ा देखता हूं--वही टोपी, वही कोट, वही जूता, सब वही--तो मैं निश्चिंत रहता हूं कि मैं वही हूं। वह आदमी को जरा मजाक सूझा कि यह आदमी तो बड़ा अजीब सा दिखता है। उसने कहा: 'एक काम करो, इन सबको उतार दो। इस कमरे में पहले लोग ठहरे होंगे, उनका बच्चा रहा होगा, दिखता है फुग्गा छोड़ गया है एक। वह पड़ा है कोने में फुग्गा फूला हुआ। उसको हम तुम्हारी टांग में बांध देते हैं। सो सुबह तुम्हें जब टांग में फुग्गा बंधा हुआ मिले, समझ जाना यह तुम्हीं हो। नसरुद्दीन ने कहा: 'यह बात तुमने अच्छी बतायी, क्योंकि मैं भी दिक्कत में था कि टोपी, कोट, जूते पहने नींद कैसे आएगी!' । उसने टोपी, कोट, पेंट उतार दिए और सो गया । उस दूसरे आदमी को रात मजाक सूझा, उसने आंधी रात को उठ कर फुग्गा खोल कर अपने पैर में बांध लिया और सो रहा। सुबह नसरुद्दीन उठा, उसने क्या हूं हुल्लड़ मचाया! बाहर भागा ! भीड़ इकट्ठी कर ली और पूछने लगा कि बड़ी मुश्किल खड़ी हो गयी। मैनेजर को बुलाओ। अब कैसे तय हो? यह तो पक्का है कि नसरुद्दीन वह दूसरा आदमी है, जिसके पैर में फुग्गा बंधा है; लेकिन मैं कौन हूं, यह कुछ पता नहीं चल रहा।
एक व्यक्ति चंडूखाने के पास से गुजर रहा था कि एक अफीमची बाहर निकला और उस व्यक्ति से पूछने लगा: 'भाई, क्या बता सकते हैं इस समय टाइम क्या है?' उस व्यक्ति ने कहा: 'तीन बजे हैं।' दोनों अलग-अलग दिशाओं में कुछ कदम चले कि अफीमची जोर से चिल्लाया कि रुको भाई रुको! यह तो बताओ कि आज आज है कि कल है?
दो अफीमची बात कर रहे थे। एक ने पूछा: 'यार, यदि नदी में आग लग जाए तो सारी मछलियां कहां जाएगी?'
दूसरे ने कहा: 'चिंता मत कर, वे सब पेड़ों पर चढ़ जाएंगी।'
पहले ने कहा: 'तुम भी गजब के आदमी हो जी! हद के बेवकूफ हो! क्या मछलियां गाय-भैंस हैं जो पेड़ों पे चढ़ जाएंगी?'
चंदूलाल बहुत गुस्से में पहुंचा दुकानदार के पास और बोला कि सुनो जी, यहां से हाथीदांत की जो मैं कंघी ले गया था वह नकली थी।
दुकानदार ने कहा: 'साहब अगर हाथी भी नकली दांत लगाने लगे हैं तो इसमें मेरा क्या कसूर?'
स्व-पीडन
कथा :
मैसोच नाम का एक लेखक हुआ, जो अपने को ही कोड़े न मार ले, तब तक उसको नींद न आती थी। बिस्तर में कांटे न डाल ले, तब तक उसको नींद न आए। भोजन में जब तक थोड़ी-सी नीम न मिला ले, तब तक उससे भोजन न किया जाए। अगर हमारे मुल्क में मैसोच पैदा हुआ होता, तो हम कहते, बड़ा महात्मा है!
गांधीजी को भी नीम की चटनी भोजन के साथ खाने की आदत थी। जो भी लोग देखते थे, कहते थे, बड़ी ऊंची बात है! स्वभावतः। लुई फिशर गांधीजी को मिलने आया, तो उन्होंने लुई फिशर की भी थाली में एक बड़ी मोटी पिंडी नीम की चटनी की रखवा दी। जो भी मेहमान आता था, उसको खिलाते थे, क्योंकि खुद खाते थे। जो आदमी अपने को दुख देना सीख जाता है, वह दूसरे को भी दुख देने की चेष्टाएं करता है।
लुई फिशर ने देखा कि क्या है! और गांधीजी इतने रस से खा रहे हैं! तो उसने भी चखकर देखा, तो सब मुंह जहर हो गया। उसने सोचा कि बड़ा मुश्किल हो गया। उसके साथ रोटी लगाकर खानी, मतलब रोटी भी खराब हो जाए; सब्जी मिलाकर खाओ, सब्जी भी खराब हो जाए! पर उसने सोचा कि न खाएंगे, तो गांधीजी क्या सोचेंगे, कि मैंने इतने प्रेम से चटनी दी और न खाई। भला आदमी। उसने सोचा, इसको इकट्ठा ही गटक जाना बेहतर है सब भोजन खराब करने की बजाय। और अशुभ भी मालूम न पड़े, अशिष्टाचार भी मालूम न पड़े, इसलिए इसे एकदम एक दफा में गटक लेना अच्छा है। फिर पूरा भोजन तो खराब न हो। तो वह पूरी की पूरी चटनी गटक गया। गांधीजी ने रसोइए को कहा कि देखो, चटनी कितनी पसंद आई! और ले आओ!
लुई फिशर पर जो गुजरी होगी, वह हम समझ सकते हैं।
गांधीजी के आश्रम में एक सज्जन थे, अभी भी हैं, प्रोफेसर भंसाली। अभी उनका जन्मदिन मनाया गया। महा संत की तरह, गांधीजी के मानने वाले, भंसाली को मानते हैं। पक्के तपस्वी हैं। छः महीने तक गाय का गोबर खाकर ही रहे। तपस्वी पक्के हैं, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं! लेकिन मैसोचिस्ट हैं। इलाज होना चाहिए दिमाग का। पागलखाने में कहीं न कहीं इलाज होना चाहिए। गाय का गोबर खाना! ऐसे तो मौज है आदमी की; जो उसे खाना हो, खाए। लेकिन यह तपश्चर्या बन जाती है। आस-पास के लोग कहते हैं, क्या महान तपस्वी! गाय का गोबर खाकर जीता है! हम तो नहीं जी सकते। नहीं जी सकते, तो फिर हम कुछ भी नहीं हैं; यह बहुत महान है। यह मैसोचिज्म है।
अगर एक आदमी सड़क पर खड़े होकर अपने को कोड़े मार रहा है, तो आपको आदर देने का क्या कारण है?
अगर मनसविद से पूछेंगे, गहरा जो गया है आदमी के मन में, उससे पूछेंगे, तो वे कहेंगे, इसका कारण है कि आप सैडिस्ट हैं, वह मैसोचिस्ट है। वह अपने को सताने में मजा ले रहा है, और आप दूसरे को सताने में मजा ले रहे हैं। आपने चाहा होता कि किसी को कोड़े मारें; उस तकलीफ से भी आपको बचा दिया। वह खुद ही कोड़े मार रहा है। आप भीड़ लगाकर देख रहे हैं, और चित्त प्रसन्न हो रहा है। आप दुष्ट प्रकृति के हैं, इसलिए आप उसमें रस ले रहे हैं।
मोहम्मद -- अगर पहाड़ मोहम्मद के पास न आएगा, तो मोहम्मद पहाड़ के पास जाएगा। जल से भर गया मेघ खोजता है उत्तप्त हृदय को।
चिढ
कथा :
मुझे अपने बचपन की एक स्मृति है, जो कभी नहीं भूलती। मेरे गांव में जिस आदमी का मुझे सबसे पहला स्मरण है, और शायद मरते वक्त सबसे आखिरी स्मरण रहेगा; उस आदमी का मुझे नाम भी पता नहीं; क्योंकि बहुत छोटा था, तभी वह आदमी मर गया। एक ही बात स्मरण है कि वह आदमी अपने घर से नदी तक स्नान करने सुबह जाता था, तो घर से नदी तक का फासला पैदल चलने में मुश्किल से पांच मिनट का था। लेकिन उसको नदी तक पहुंचने में दो घंटे लगते थे। नदी में स्नान करने में मुश्किल से, वह जिस ढंग से स्नान करता था, पांच मिनट से ज्यादा लगने की कोई जरूरत न थी। लेकिन नदी में उसको स्नान करने में दो घंटे लगते थे। घर लौटने में पांच मिनट का फासला था, लेकिन फिर दो घंटे लगते थे। असल में उस आदमी की जिंदगी सुबह और शाम नहाने में जाती थी। सुबह छः घंटे नहाने में, और शाम छः घंटे नहाने में! मामला क्या था?
मामला यह था कि वह आदमी घर से निकला कि बस, बच्चों की और लोगों की भीड़ उसके चारों तरफ! और लोग चिल्ला रहे हैं, राधेश्याम! राधेश्याम! और वह पत्थर फेंक रहा है। नाराज हो रहा है। चिल्ला रहा है। दौड़ रहा है। राधेश्याम का दुश्मन था। कहता कि कहो, राम! और लोग चिल्लाते, राधेश्याम! बस, दो घंटे उसको नदी तक जाने में लगते।
तो वह नहा रहा है, और लोग चिल्ला रहे हैं। और वह बीच-बीच में निकलकर आ रहा है, आधा नहाया हुआ। वह कपड़ा धो रहा है, और लोग चिल्ला रहे हैं। और भीड़ लगी है, और वह भाग रहा है! न वह कपड़ा धो पाता है, न वह नहा पाता है। उसकी मुझे याद है।
मैं भी उसके पीछे बहुत बार नदी तक उसे छोड़ने गया हूं, और नदी से उसको वापस घर तक लाया हूं। उसके पीछे मेरे भी छः घंटे बहुत दफे खराब हुए हैं।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे खयाल आना शुरू हुआ कि वह आदमी हाथ में पत्थर भी उठाता है, मारने को दौड़ता भी है, लेकिन जब भी राधेश्याम कहो, तो उसकी आंखों में कोई चमक आ जाती है। तब मुझे शक पैदा हुआ।
गांवभर में खबर थी कि वह राम का भक्त है। वह गया था एक दिन नदी। मैं अपने टेंपटेशन को रोककर--क्योंकि उस आदमी को नदी तक पहुंचाना बड़ा टेंपटेशन था--किसी तरह रोककर, वह नदी गया; मैं चोरी से उसकी दीवाल को छलांग लगाकर उसके घर में गया। अपने घर में वह किसी को कभी घुसने नहीं देता था। कहते हैं, जिस दिन वह मरा, उसी दिन लोग उसके घर में घुसे। वर्षों से उसके दरवाजे से किसी ने भीतर प्रवेश नहीं किया था।
मैंने जाकर उसके घर के भीतर देखा, तो राधाकृष्ण की मूर्ति उसके घर में रखी है, और फूल चढ़े हैं! फिर मैं वहीं बैठा रहा। उस आदमी ने आकर दरवाजा खोला। मुझे भीतर देखकर तो एकदम पागल हो गया। उसने कहा, भीतर कैसे आए? क्योंकि मेरे घर में कभी मैंने किसी को प्रवेश नहीं करने दिया। मैंने उससे कहा कि अब तो मैं भीतर आ गया। और अब चाहें तो बाहर निकाल दें। लेकिन राज मेरे हाथ में आ गया है।
उस आदमी की आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा, इस गांव में इतने लोग हैं, लेकिन किसी ने कभी मेरे हृदय में भीतर प्रवेश करके नहीं देखा। मैं सिर्फ इसीलिए नाराज होता हूं कि लोग राधेश्याम का नाम ही ले लें। मेरी जिंदगी इसी में बीत रही है। लेकिन मैं प्रसन्न हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि शब्द के जगत में मैंने बहुत-से राधेश्याम की ध्वनियों को संगृहीत करवा दिया है। और कोई मुझे चिढ़ाने को ही नाम लेता होगा राधेश्याम का, तो भी लेता तो राधेश्याम का ही नाम है। अभी चिढ़ाता रहेगा, चिढ़ाता रहेगा, चिढ़ाता रहेगा; किसी दिन...। आखिर तुम भी तो चिढ़ाते-चिढ़ाते नदी छोड़कर-छोड़कर एक दिन मेरे घर के भीतर आ गए हो।
वह आदमी जिस दिन मरा, उसी दिन गांव को पता चला। लेकिन उसने मुझसे प्रार्थना की, और मेरे पैर पकड़कर प्रार्थना की। मैं तो बहुत छोटा था, वह तो बूढ़ा था। उसने पैर पकड़कर प्रार्थना की कि तुम आ गए, सो ठीक। जब भी आना हो, दीवाल कूदकर आ जाना। लेकिन किसी को बताना मत कि मेरे घर में राधेश्याम की प्रतिमा है। नहीं तो गांव में खबर हो गई, तो मुझे कोई चिढ़ाएगा नहीं। बात ही समाप्त हो जाएगी। इस राज को राज ही रहने देना, जब तक मैं मर न जाऊं!
कीमत
कथा :
एक करोड़पति एक तालाब में गिर गया था। अनेक लोग खड़े होकर देख रहे थे। एक अजनबी आदमी भी भीड़ में था, वह चिल्लाया कि तुम खड़े होकर क्यों देख रहे हो? आदमी मर रहा है! उसे कुछ पता नहीं था कि वह आदमी कौन है। वह बेचारा कूद पड़ा। उस करोड़पति को, बड़ी मुश्किल से, अपनी जान को जोखिम में डालकर, बचाकर बाहर लाया। जब वह होश में आया धनपति, तो उसने कहा, बहुत-बहुत धन्यवाद। खीसे में उसने हाथ डालकर कुछ खोजा, फिर एक नया पैसा निकालकर उस आदमी को भेंट किया।
सारी भीड़ चिल्लाने लगी कि इसीलिए तो हममें से कोई कूदकर नहीं बचा रहा था। आदमी देखते हैं! एक नया पैसा! उस आदमी ने जिंदगी, जान लगा दी; जोखम में डाला अपने को; और यह एक पैसा उसको इनाम दे रहा है!
एक और आदमी, एक फकीर इस बीच उस भीड़ के पास आकर खड़ा हो गया था। उसने कहा, नाराज मत होओ। उसकी जिंदगी की कीमत उसके सिवाय और किसको ज्यादा मालूम हो सकती है! वह बिलकुल ठीक दे रहा है। एक नया पैसा! वह अपनी जिंदगी की कीमत ही चुका रहा है। और किसी की जिंदगी का कोई सवाल नहीं है। अगर मर जाता, तो एक नए पैसे का नुकसान हो रहा था दुनिया में। और तो कोई खास नुकसान नहीं था।
असल में हमारे भीतर हमारी कोई कीमत ही क्या है? असल में हम ही कहां हैं? बीइंग कहां है? हमारे भीतर आत्मा जैसी चीज कहां है?
संतत्व का फूल तब खिलता है, जब तुम निंदा में भी सत्य को खोज लेते हो और प्रशस्ति में भी झूठ को खोज लेते हो।
एक अंग्रेज कवि हुआ ईट्स। उसे नोबल प्राइज मिली। और डबलिन में, क्योंकि वह आइरिश था, उसका स्वागत-समारोह किया गया। वह बड़ा विनम्र आदमी था। बड़ा सच्चा आदमी था। लोग उसकी प्रशस्ति में बड़ी-बड़ी बातें कहने लगे। उसकी प्रशंसा के लिए ही तो सभा का आयोजन हुआ था। खचाखच हॉल भरा था। गांव के सब धनपति, सब शक्तिशाली, पदशाली लोग इकट्ठे थे। और एक के बाद एक लोग उठे; मेयर उठा, मंत्री उठे, अधिकारी उठे, धनपति उठे, और उसकी प्रशस्ति में उन्होंने बातें कीं। वह अपनी कुर्सी में जैसे डूबता गया। संकोच से भर गया। उसका सिर भी नीचे झुक गया। लोग समझे कि शायद वह सो गया। लेकिन इतनी प्रशस्ति में कोई कभी सोता? सोता आदमी जग जाता है!
फिर आखिरी अध्यक्ष ने घोषणा की, कि हम सबकी तरफ से एक छोटी सी भेंट--कोई पच्चीस हजार पौंड--स्वीकार करें। तो उसने सिर उठाया और पच्चीस हजार पौंड का जो चेक था, खड़े हो कर उसको देखा, उसको नीचे गिरा कर उसने कहा, कि सिर्फ पच्चीस पौंड के लिए इतना झूठ मुझे सुनना पड़ा।
अध्यक्ष ने कहा, 'माफ करें, आप ठीक से पढ़ नहीं पाये। पच्चीस हजार पौंड! उसने कहा, 'पच्चीस हजार पौंड और पच्चीस पौंड में क्या कोई बहुत फर्क है? मगर झूठ इतना सुनना पड़ा। डेढ़ घंटे से बैठा हुआ अपने संबंध में झूठ सुन रहा हूं।'
जिस चीज को भी सुनकर तुम फैलो, सचेत हो जाना; जिस चीज को भी सुनकर तुम सिकुड़ो, सचेत हो जाना।
एक बार लंदन में एक बात का सर्वेक्षण किया गया कि लंदन में टावर है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। लंदन का टावर लंदन की प्रसिद्ध देखी जाने वाली चीजों में एक है। सर्वेक्षण किया गया कि एक करोड़ आदमी लंदन में रहते हैं, इनमें से कितने लोगों ने लंदन का टावर देखा और कितने लोगों ने नहीं देखा? दस लाख आदमियों ने नहीं देखा! लंदन में रहते हैं। रोज बस से या कार से या ट्रेन से टावर के पास से गुजरते हैं, मगर टावर पर चढ़ कर नहीं देखा। देख लेंगे, कभी भी देख लेंगे, जल्दी क्या है! और सारी दुनिया से लोग लंदन का टावर देखने आते हैं। हजारों मील का सफर करके लंदन का टावर देखने आते हैं। आदमी अजीब है!
एक बार तीन अमरीकी यात्री पोप से मिलने वैटिकन गए। पोप ने पूछा, कितनी देर रुकेंगे इटली में?
पहले यात्री ने कहा, तीन महीने रुकने का इरादा है।
पोप ने कहा, थोड़ा-बहुत देख लोगे।
सुन कर यात्री थोड़ा हैरान हुआ। तीन महीने कुछ कम समय होता है! और अमरीकी रफ्तार से देखने वाला आदमी तीन महीने में सारी दुनिया देख ले, चांदत्तारे होकर आ जाए। अमरीकी तो गति से जाता है। तीन महीने, इटली जैसा छोटा देश और थोड़ा-बहुत देख लूंगा! पोप होश में है? लेकिन अमरीकी शिष्टाचारवश कुछ बोला नहीं।
दूसरे से पूछा, तुम कितनी देर रुकोगे?
उसने कहा, मैं तो केवल एक महीने ही रुकने आया हूं।
पोप ने कहा, तुम काफी देख पाओगे।
अब तो बात और जरा उलझी हो गई। पहले से कहा, कुछ थोड़ा-बहुत देख लोगे, जो तीन महीने रुकेगा। और दूसरे से कहा, तुम काफी देख लोगे। इसके पहले कि वह कुछ कहता, उसने तीसरे से पूछा। तीसरे ने कहा कि मैं तो केवल एक सप्ताह के लिए आया हूं।
पोप ने कहा, तुम कुछ भी न छोड़ोगे, तुम पूरा इटली देख लोगे।
और बात महत्वपूर्ण है। जो सहज उपलब्ध होता है, हम सोचते हैं--कल, परसों, कभी भी देख लेंगे! जो सहज उपलब्ध नहीं होता, लगता है क्षण भी खोना उचित नहीं है।
अल्बर्ट आइंस्टीन -- पागलपन : एक चीज को बार- बार करना और विभिन्न परिणामों की उम्मीद रखना ।
एक व्यक्ति ने एक द्वार पर दस्तक दी। महिला ने द्वार खोला। व्यक्ति ने कहा -- मैं शब्दकोष बेचता हूं, डिक्शनरी बेचता हूं। और एक नया शब्दकोष आया है; आप लेना पसंद करेंगी ? महिला ने उसे टालने के लिए कहा, कि शब्दकोष तो हमारे पास है। टेबिल पर रखी हुई किताब बता दी दूर से। उस आदमी ने कहा कि वह शब्दकोष नहीं हो सकता, वह बाइबिल है।वह महिला बड़ी हैरान हुई, वह बाइबिल थी! वह तो सिफ बहाना थ कि शब्दकोश है--टालने के लिए बात की थी। उसने कहा कि हैरानी की बात है। तुमने कैसे जाना, कि वह बाइबिल है?उसने कहा, जमी धूल बता रही है। शब्दकोष तो कोई कभी-कभी देखता भी है, उस पर इतनी धूल नहीं जम सकती। सिर्फ बाइबिल पर, वेद पर ऐसी धूल की पर्ते जमती हैं।
तू जो प्रार्थना कर रहा है मजदूरी की शर्त पे - ये बंद कर दे ,
कि अल्लाह को पता है ये दुनिया कैसे चलानी है -- रूमी
यिन यांग
कथा :
कनफ्यूसियस के जमाने में चीन में दो चीनियों ने आमने-सामने दुकान खोली, होटल। एक का नाम था यिन और दूसरे का नाम था यांग; उन दोनों ने दुकानें खोलीं। दोनों की दुकानें अच्छी चलने लगीं, बहुत जोर से चलने लगीं। धन इकट्ठा होने लगा, तिजोड़ी भरने लगी। लेकिन दोनों का दुख भी बड़ा होने लगा, जैसा कि अक्सर होता है। सफलता के साथ न मालूम कैसी गहरी उदासी आने लगती है। क्योंकि आप अकेले ही सफल नहीं होते, दूसरा भी सफल हो रहा होता है।
दोनों परेशान हो गए। दोनों की दुकान अच्छी चलती है। भीड़-भड़क्का होता है। ग्राहक काफी आते हैं। लेकिन दोनों परेशान हो गए। दोनों का हृदय-चाप बढ़ गया। दोनों की नींद हराम हो गई। अनिद्रा पकड़ गई। दोनों चिकित्सकों का चक्कर लगाने लगे, लेकिन कोई रास्ता न सूझे। धन बढ़ता गया और बेचैनी बढ़ती चली गई। बेचैनी यह थी कि दोनों अपने-अपने काउंटर पर बैठकर देखते थे कि दूसरे की दुकान में कितने ग्राहक जा रहे हैं, उनकी गिनती करते थे। रात परेशान होते थे कि इतने ग्राहक चूक गए; अपने पास भी आ सकते थे।
चिकित्सकों ने कहा कि हम तुम्हारा इलाज न कर पाएंगे, क्योंकि यह बीमारी शारीरिक नहीं है। तुम कनफ्यूसियस के पास चले जाओ। उन्होंने कहा, कनफ्यूसियस इसमें क्या करेगा? वह उपदेश देगा। उपदेश से कुछ होने वाला नहीं है। सवाल असल यह है कि दूसरे की दुकान पर ग्राहक बहुत जा रहे हैं, और उन्हें हम देखते हैं। आंख बंद कर नहीं सकते हैं। सामने ही दुकान है। छाती पर चोट लगती है। हर बार एक आदमी भीतर प्रवेश करता है, फिर छाती पर चोट लगती है। नींद न जाएगी, तो होगा क्या!
फिर भी, चिकित्सकों ने कहा, तुम कनफ्यूसियस के पास जाओ। वह आदमी होशियार है, और वह आदमी की गहरी बीमारियों को जानता है।
वे दोनों गए। कनफ्यूसियस ने तरकीब बताई और वह काम कर गई और दोनों स्वस्थ हो गए। बड़ी मजेदार तरकीब थी। शायद ही इस जमीन पर किसी और होशियार आदमी ने ऐसी तरकीब कभी बताई हो।
कनफ्यूसियस ने कहा -- पागलों, बड़ा सरल-सा इलाज है। दुकानें चलने दो, तुम एक-दूसरे के काउंटर पर बैठने लगो। यिन यांग के काउंटर पर बैठे, यांग यिन के काउंटर पर बैठे, तब तुम दोनों का चित्त बड़ा प्रसन्न होगा। दूसरे की दुकान में जो घुस रहे हैं, वे अपनी ही दुकान में जा रहे हैं! तुम ऐसा कर लो।
और कहते हैं, उन दोनों ने ऐसा कर लिया और उस दिन से उनकी सब बीमारियां समाप्त हो गईं। वे दिनभर बैठे मजा लेते रहते कि ठीक! काफी लोग जा रहे हैं अपनी दुकान में! वह दूसरे की दुकान अपनी हो गई अब।
जिस दिन कोई परमात्मा को झांक लेता है, उस दिन सब दुकानें अपनी हो जाती हैं, सब कुछ अपना हो जाता है। उस दिन भीतर की प्रफुल्लता का कोई अंत नहीं है। उस दिन फूल खिलते हैं भीतर के। सहस्र पंखुड़ियों वाला फूल उस दिन खिलता है भीतर का, क्योंकि उस दिन हम परम आनंद में विराजमान हो जाते हैं। सब अपने हैं। सब अपना है। सारा विराट अपना है।
चाहे मूढ़ महीने-महीने में केवल कांटे की नोक जितना भोजन करे, तो भी वह धर्म-वेत्ताओं के सोलहवें भाग की बराबरी नहीं कर सकता ।
भीड़ का मनोविज्ञान
कथा :
एक आदमी एक रास्ते से गुजर रहा है, एक गरीब गधे को लिए हुए है। उसके ऊपर सामान काफी लादा हुआ है। जितना गरीब गधा हो, उतना ज्यादा सामान लाद देते हैं लोग! लेकिन रास्तेभर के लोग बड़े हैरान हैं, क्योंकि वह चिल्ला-चिल्ला कर कई नाम ले रहा है, और गधा एक है। कभी कहता है, शाबाश कल्लू! कभी कहता है, शाबास हीरा! कभी कहता है, शाबास माणिक! गधा एक है, और नाम इतने ले रहा है!
एक आदमी का आखिर धीरज टूट गया और उसने जाकर पास पूछा कि माफ करना, इस गधे का नाम क्या है? उसने कहा, इसका नाम कल्लू है। तो इतने नाम क्यों ले रहे हो? उसने कहा, ताकि इसको भरोसा बना रहे कि और भी गधे लदे हैं। और सब चल रहे हैं, तो मैं भी क्यों परेशान! चलता रहूं। उस कुम्हार ने कहा कि जरा mass psychology का उपयोग कर रहा हूं, भीड़ का मनोविज्ञान।
अगर गधे को पता चले कि अकेले कल्लू ही चल रहे हैं, तो बहुत मुश्किल में पड़ जाएंगे। वे बैठ जाएं, कि नहीं चलते! कोई दुनिया में नहीं चल रहा है, हम ही क्यों परेशान हों! लेकिन चारों तरफ गधे चल रहे हैं--माणिक भी, हीरा भी--सब चल रहे हैं, तो कल्लू भी चल रहे हैं। वे प्रसन्न हैं, क्योंकि अकेले तो लदे नहीं; सब लदे हैं। और जरूर कहीं पहुंच जाएंगे।
कहीं पहुंचना नहीं है। कहीं पहुंचना नहीं है।
धर्म और संप्रदाय में उतना ही फर्क है, जितना सत्य और अफवाह में।
किसी समय एक शहर था, जिसमें दो समानांतर गलियां थीं। एक दरवेश किसी दिन एक गली से दूसरी गली में जा पहुंचा और लोगों ने देखा कि उसकी आंखों में आंसू हैं।
'दूसरी गली में कोई मर गया है,' एक आदमी ने चीखकर कहा। और तुरंत ही पास के बच्चों ने उसकी बात को सिर पर उठा लिया। वास्तव में हुआ यह था कि दरवेश प्याज छील रहा था।
थोड़ी ही देर में बच्चों की आवाज पहली गली में पहुंच गई। और दोनों गलियों के सयाने इतने दुखी और भयभीत हुए कि उन्हें चीख-पुकार का कारण जानने की हिम्मत भी नहीं रही।
एक समझदार आदमी ने समझाने की कोशिश भी की, कि कारण का पता लगाना चाहिए। लेकिन तब तक लोग इतनी घबराहट और विभ्रम से भर गये थे कि उन्हें इसका होश भी नहीं रहा कि वे क्या कह रहे हैं।
इतने में कुछ लोग बोल उठे: 'हम इतना जानते हैं कि दूसरी गली मारक प्लेग के चंगुल में है।'
यह अफवाह भी जंगली आग की तरह फैल गई। अब हरेक गली यही समझने लगी कि दूसरी गली पर कयामत उतरी है। जब कुछ व्यवस्था लौटी तब दोनों गली के वासी अलग-अलग यही तय कर पाये कि आत्मरक्षा के लिए उन्हें शहर छोड़ देना है। अंततः पूरा शहर खाली कर वहां के सभी लोग अन्यत्र जा बसे।
सदियों बाद अब भी वह शहर उजाड़ है। और उससे जरा दूर हटकर दो गांव हैं, जहां की परंपरायें कहती हैं कि उनके पुरखे किसी अज्ञात अनिष्ट से बचने के लिये कभी किसी अभिशप्त नगर को छोड़ कर यहां आये थे।
सिद्धांत का तुम सुनते हो और तथ्य का तुम देखते हो ।
एक घर में ऐसा हुआ; छोटे-छोटे बच्चे थे घर में। बाप जब काफी बूढ़ा हो गया तब पैदा हुए थे। उन्होंने, बचपन की एक ही बात उन्हें याद थी। बाप की आदत थी, भोजन के बाद वह एक सींक से अपने दांत साफ कर लेता था। बाप तो मर गया, मां भी मर गई। बच्चे जब बड़े हुए तब उन्हें इतना ही याद रहा, कि बाप एक सींक आले में रखता था। जरूर उसमें कोई रहस्य होगा। क्योंकि कुछ भी हो जाये, सींक सदा आले में रहती थी। और कुछ भी हो जाये, अच्छे दिन हों कि बुरे, सुबह हो कि सांझ, सुख हो कि दुख, भोजन के बाद बाप जरूर आले के पास जाता था। इतना ही उन्हें याद रहा। तो उन्होंने सोचा कि सींक तो रख लेना जरूरी है। बाप की सींक तो कभी की खो गई थी। कूड़-कचरे में फिंक गई होगी। तो उन्होंने एक चंदन की सुंदर सींक बनवा कर वहां रख ली। वह काफी बड़ी थी। उससे दांत साफ करने का कोई संबंध ही न रहा। फिर वे और बड़े हुए। फिर उन्होंने नया मकान बनाया, काफी धन कमाया, तो उन्होंने सोचा कि इतनी सी लकड़ी रखने से क्या फायदा? बाप हमारा गरीब था, इसलिए छोटे को रखता था। और आला क्या, हम एक मंदिर ही बना दें! तो उन्होंने चौके के ठीक सामने जहां भोजन चलता था, एक छोटा मंदिर बना दिया और एक बड़ा स्तंभ चंदन का खुदवा कर मंदिर के बीच में लगा दिया। नियम से भोजन के बाद वे हाथ झुका कर, सिर झुका कर उस मंदिर में नमस्कार कर आते थे।
और मैंने सुना है कि यह प्रक्रिया चल रही है। बच्चों के बच्चे हो गये हैं, और बच्चों के बच्चे हो गये हैं। अब मकान छोटा हो गया है और मंदिर बहुत बड़ा हो गया है। पहले चौके के सामने मंदिर था, अब मंदिर के सामने चौका है। और स्तंभ रोज बड़ा होता गया है। अब वह चंदन का नहीं है, स्वर्ण का है। और उस पर हीरे-मोती जड़ दिये गये हैं। और अब पूजा बच्चे खुद नहीं करते। क्योंकि पूजा जैसा कृत्य! कभी भूल-चूक न हो जाये, इसलिए उन्होंने किराये के पुजारी रख लिए। वह जो दांत खुजाने की सींक थी, वह संप्रदाय बन गई। और जब मैं ऐसा कहता हूं, तो तुम यह मत सोचना कि यह कहानी है। ऐसा हर मंदिर में हो रहा है।
शास्त्र शब्द दे सकता है, समझ, प्रज्ञा नहीं दे सकता। भीतर की जलती ज्योति उधार नहीं मिलती।
श्रीनगर की एक मस्जिद में मुहम्मद का एक बाल रखा है। कुछ वर्षों पहले वह बाल खो गया था, तो भारी उपद्रव हुआ। अनेक लोग मारे गये। जब तक वह बाल वापिस नहीं लौटा दिया गया, जब तक वह वापिस नहीं आ गया, तब तक महाक्रांति की हालत कश्मीर में हो गई। कोई भी नहीं जानता वह बाल मुहम्मद का है, या नहीं। और मुहम्मद का भी हो तो क्या फर्क पड़ता है? और आदमी ऐसा है कि भरोसा करना मुश्किल है कि असली बाल बचा हो। और जो खोज लिया गया है दुबारा, वह भी संदिग्ध है। क्योंकि वह सिर्फ उपद्रव शांत करने के लिए ही खोज लिया गया हो, इसकी पूरी संभावना है। फिर बाल-बाल में फर्क भी तो करना बहुत मुश्किल है। सिद्ध कैसे करोगे कि मुहम्मद का है, कि किसी और का है? लेकिन मुहम्मद के बाल की पूजा से क्या होगा?
और मुसलमान पूजा करे तो बड़ी हैरानी मालूम होती है। वह कहता है, हम मूर्तिभंजक हैं। मंदिरों को तोड़े, मूर्तियों को मिटाये और पूजे बाल को! तो फर्क क्या हुआ मूर्तिभंजक में और मूर्तिपूजक में? मुहम्मद की मूर्ति न बनने देगा, मुहम्मद का चित्र न बनाने देगा, अगर किसी किताब में मुहम्मद का चित्र छप जाये तो दंगे-फसाद हो जायेंगे, लेकिन पूजेगा बाल को। तो बाल मूर्तिपूजा नहीं है?
असल में संप्रदाय मूर्तिपूजा से बच ही नहीं सकता। सिर्फ धर्म बच सकता है। क्योंकि संप्रदाय के पास तो सत्य नहीं होता, सिर्फ नक्शे होते हैं। नक्शे यानी मूर्तियां। फिर नक्शा तुम कैसा बनाते हो, यह तुम पर निर्भर है। कैसे रंग भरते हो, यह तुम पर निर्भर है।
अज्ञानी को सत्य से कोई प्रयोजन नहीं, उसको अपने मत से प्रयोजन है।
व्यवसाय
कथा :
एक आदमी ने नई-नई किसी के साथ साझेदारी की। कोई पूछता था कि फिर कोई साझेदार मिल गया तुम्हें? क्योंकि वह आदमी कई साझेदारों को धोखा दे चुका है। फिर कोई साझेदार मिल गया तुम्हें? उसने कहा, फिर कोई साझेदार मिल गया। जमीन पर नासमझों की कोई कमी नहीं है। लेकिन कोई भी साझेदार मेरे साथ रहकर नुकसान में कभी नहीं पड़ता। उस आदमी ने कहा, यह तुम क्या कह रहे हो! हमने तो अब तक यही सुना कि जो भी तुम्हारे साथ रहता है, नुकसान में पड़ता है।
उसने कहा, तुम समझो, फिर तुम कभी ऐसा न कहोगे। अब यह जो नया साझीदार है, पूरी पूंजी लगा रहा है। पूरी पूंजी वह लगा रहा है, पूरा अनुभव मैं लगा रहा हूं। फिफ्टी-फिफ्टी समझो। आधा मेरा है, आधा उसका। अनुभव मेरा, धन उसका। और तुमसे मैं कहता हूं कि पांच साल में अनुभव उसके पास होगा और धन मेरे पास। लेकिन तुम समझते हो कि मैं ही फायदे में रहूंगा, वह फायदे में नहीं रहेगा? अनुभव!
शरद काल की फैंकी हुई अपथ्य लौकी के सामान कुम्ल्हाए हुए मृत शरीर को देख कर और कबूतरों के से वर्ण वाली श्मशान में पड़ी हड्डियों को देखकर किसको इस देह से अनुराग होगा?
केलिफोर्निया के एक मोटेल में एक यात्री मेहमान है। सुबह सूरज निकल रहा है और पक्षी गीत गा रहे हैं। तो मोटेल के मैनेजर ने उस यात्री को कहा कि आप कृपा करके बाहर आएं। सूरज निकला है, पक्षी गीत गा रहे हैं, आकाश बहुत सुंदर है। उस आदमी ने कहा, वह तो ठीक है, पहले मुझे बता दो कि कीमत क्या चुकानी पड़ेगी!
मूर्ख दूसरों पर हँसते हैं. बुद्धिमत्ता खुद पर ।
दोस्तोवस्की ने एक छोटी—सी कथा लिखी है। लिखा है कि जीसस के मरने के अठारह सौ वर्ष बाद जीसस को खयाल आया कि मैं पहले जो गया था जमीन पर, तो बेसमय पहुंच गया था। वह ठीक वक्त न था, लोग तैयार न थे और मुझे मानने वाला कोई भी न था। मैं अकेला ही पहुंच गया था। और इसलिए मेरी दुर्दशा हुई; और इसलिए लोग मुझे स्वीकार भी न कर पाए, समझ भी न पाए। और लोगों ने मुझे सूली दी, क्योंकि लोग मुझे पहचान ही न सके। अब ठीक वक्त है। अगर मैं अब वापस जमीन पर जाऊं, तो आधी जमीन तो ईसाइयत के हाथ में है। हर गांव में मेरा मंदिर है। जगह— जगह मेरे पुजारी हैं। जगह—जगह मेरे नाम पर घंटी बजती है, और जगह—जगह मेरे नाम पर मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। आधी जमीन मुझे स्वीकार करती है। अब ठीक वक्त है, मैं जाऊं।
और जीसस यह सोचकर एक रविवार की सुबह बैथलहम, उनके जन्म के गांव में वापस उतरे। सुबह है। रविवार का दिन है। लोग चर्च से बाहर आ रहे हैं। प्रार्थना पूरी हो गई है। और जीसस एक वृक्ष के नीचे खड़े हो गए हैं। उन्होंने सोचा है कि आज वह अपनी तरफ से न कहेंगे कि मैं जीसस क्राइस्ट हूं। क्योंकि पहले एक दफा कहा था, बहुत चिल्लाकर कहा था कि मैं जीसस क्राइस्ट हूं; मैं ईश्वर का पुत्र हूं मैं तुम्हारे लिए संदेश लेकर आया परम जीवन का, और जो मुझे समझ लेगा, वह मुक्त हो जाएगा, क्योंकि सत्य मुक्त कर देता है। लेकिन इस बार, अब तो वे लोग मुझे वैसे ही पहचान लेंगे, घर—घर में तस्वीर है। अब तो कोई जरूरत न होगी मुझे घोषणा करने की। वे चुपचाप खड़े रहे।
लोगों ने पहचाना जरूर, लेकिन गलत ढंग से पहचाना। भीड़ इकट्ठी हो गई, और लोग हंसने लगे, और मजाक करने लगे। और किसी ने कहा कि बिलकुल बन—ठन कर खड़े हो! बिलकुल जीसस जैसे ही मालूम पड़ते हो! खूब स्वांग रचा है! अभिनेता कुशल हो, जरा भी भूल—चूक निकालनी मुश्किल है!
जीसस को कहना ही पड़ा कि तुम गलती कर रहे हो। मैं कोई अभिनय नहीं कर रहा हूं। मैं वही जीसस क्राइस्ट हूं जिसकी तुम पूजा करके बाहर आ रहे हो। तो लोग हंसने लगे और उन्होंने कहा कि जल्दी से तुम यहां से भाग जाओ, इसके पहले कि मंदिर का प्रधान पुरोहित बाहर निकले। नहीं तो तुम मुसीबत में पड़ोगे। और रविवार का दिन है, चर्च में बहुत लोग आए हुए हैं, व्यर्थ तुम्हारी मारपीट भी हो जा सकती है। तुम भाग जाओ।
जीसस ने कहा, क्या कहते हो, ईसाई होकर! पहली दफा जब मैं आया था, तो यहूदियों के बीच में आया था, कोई ईसाई न था; तो मुझे कोई पहचान न सका। यह स्वाभाविक था। लेकिन तुम भी मुझे नहीं पहचान पा रहे हो!
और तभी पादरी आ गया। चर्च के बाहर और लोग आ गए और बाजार में भीड़ लग गई। जीसस पर जो लोग हंस रहे थे, वे जीसस के पादरी के चरणों में झुक—झुक कर नमस्कार करने लगे! लोग जमीन पर लेट गए। बड़ा पादरी! बड़ा पुरोहित मंदिर के बाहर आया है!
जीसस बहुत चकित हुए। फिर भी जीसस के मन में एक आशा थी कि लोग भला न पहचान पाएं, लेकिन मेरा पुजारी तो पहचान ही लेगा! लेकिन पादरी के जब लोग चरण छू चुके, और उसने आंखें ऊपर उठाकर देखा, तो कहा कि बदमाश को पकड़ो और नीचे उतारो! यह कौन शरारती आदमी है? जीसस एक बार आ चुके, और अब दुबारा आने का कोई सवाल नहीं है।
लोगों ने जीसस को पकड़ लिया। जीसस को अठारह सौ साल पहले का खयाल आया। ठीक ऐसे ही वे तब भी पकडे गए थे। लेकिन तब पराए लोग थे और तब समझ में आता था। लेकिन अब अपने ही लोग पकडेंगे, यह भरोसे के बाहर था। और जीसस को जाकर चर्च की एक कोठरी में ताला लगाकर बंद कर दिया गया। आधी रात किसी ने दरवाजा खोला, कोई छोटी—सी लालटेन को लेकर भीतर प्रविष्ट हुआ। जीसस ने उस अंधेरे में थोड़े से प्रकाश में देखा, पादरी है, वही पुरोहित!
उसने लालटेन एक तरफ रखी, दरवाजा बंद करके ताला लगाया। फिर जीसस के चरणों में सिर रखा और कहा कि मैं पहचान गया था। लेकिन बाजार में मैं नहीं पहचान सकता हूं। तुम हो पुराने उपद्रवी! हमने अठारह सौ साल में किसी तरह व्यवसाय ठीक से जमाया है। अब सब ठीक चल रहा है, तुम्हारी कोई जरूरत नहीं; हम तुम्हारा काम कर रहे हैं। तुम हो पुराने उपद्रवी! अगर तुम वापस आए, तो तुम सब अस्तव्यस्त कर दोगे, तुम हो पुराने अराजक। तुम फिर सत्य की बातें कहोगे और सब नियम भ्रष्ट हो जाएंगे। और तुम फिर परम जीवन की बात कहोगे, और लोग स्वच्छंद हो जाएंगे। हमने सब ठीक—ठीक जमा लिया है, अब तुम्हारी कोई भी जरूरत नहीं है। अब तुम्हें कुछ भी करना हो, तो हमारे द्वारा करो। हम तुम्हारे और मनुष्य के बीच की कड़ी हैं। तो मैं तुम्हें भीड़ में नहीं पहचान सकता हूं। और अगर तुमने ज्यादा गड़बड़ की, तो मुझे वही करना पड़ेगा, जो अठारह सौ साल पहले दूसरे पुरोहितों ने तुम्हारे साथ किया था। हम मजबूर हो जाएंगे तुम्हें सूली पर चढ़ाने को। तुम्हारी मूर्ति की हम पूजा कर सकते हैं और तुम्हारे क्रास को हम गले में डाल सकते हैं, और तुम्हारे लिए बड़े मंदिर बना सकते हैं, और तुम्हारे नाम का गुणगान कर सकते हैं, लेकिन तुम्हारी मौजूदगी खतरनाक है।
सवाल ये नहीं है कि कितना सीखा जा सकता है…इसके उलट , सवाल ये है कि कितना भुलाया जा सकता है ।
चहरे
कथा :
अमेरिका में एक बहुत बड़ा अरबपति था, रथचाइल्ड। एक दिन एक भिखारी भीतर घुस गया उसके मकान के और जोर-शोर से शोरगुल करने लगा कि मुझे कुछ मिलना ही चाहिए। बिना लिए मैं जाऊंगा नहीं। जितना दरबानों ने अलग करने की कोशिश की, उतनी उछलकूद मचा दी। आवाज उसकी इतनी थी कि रथचाइल्ड के कमरे तक पहुंच गई। वह निकलकर बाहर आया। उसने उसे पांच डालर भेंट किए और कहा कि सुन, अगर तूने शोरगुल न मचाया होता, तो मैं तुझे बीस डालर देने वाला था।
भिखमंगे ने कहा -- महानुभाव, अपनी सलाह अपने पास रखिए। आप बैंकर हो, मैं आपको बैंकिंग की सलाह नहीं देता। मैं जन्मजात भिखारी हूं, कृपा करके भिक्षा के संबंध में मुझे कोई सलाह मत दीजिए।
रथचाइल्ड ने लिखा है अपनी आत्मकथा में कि उस दिन मैंने उस भिखारी को गौर से देखा और मैंने पाया कि सम्राटों के ही चेहरे नहीं होते; भिखारियों के भी अपने चेहरे हैं।
तुम किसी को कठोर वचन मत बोलो, बोलने पर तुम्हे भी वैसी ही बोलेंगे; क्रोध या विवाद भरी वाणी दुःख है, उसके बदले में तुम्हे दण्ड मिलेगा ।
फकीर नसरुद्दीन के गांव में उस देश का सम्राट आने वाला था। तो गांव में कोई इतना बुद्धिमान आदमी नहीं था, जितना कि नसरुद्दीन। तो लोगों ने कहा कि तुम्हीं गांव की तरफ से उनसे मिल लेना, क्योंकि दरबारी शिष्टता, सदाचार का हमें कुछ पता नहीं। नसरुद्दीन ने कहा, मुझे ही कहां पता है! अधिकारियों ने कहा, घबड़ाओ मत, हम राजा को प्रश्न भी समझा देंगे कि वह तुमसे क्या पूछे और तुम्हें जवाब भी समझा देते हैं कि तुम क्या जवाब दो; फिर कोई दिक्कत न रहेगी। नसरुद्दीन ने कहा कि बिलकुल ठीक है।
सब बना हुआ खेल था। राजा को समझा दिया गया था कि गरीब गांव है, बेपढ़े-लिखे लोग हैं। एक नसरुद्दीन भर है, जो थोड़ा-सा लिख-पढ़ लेता है। तो यही सवाल पूछना, क्योंकि इसी के जवाब उसने तैयार कर रखे हैं। और कोई सवाल मत पूछना।
लेकिन बड़ी गड़बड़ हो गई। सम्राट ने पूछा...नसरुद्दीन को सिखाया था कि तेरी उम्र कितनी है? नसरुद्दीन की जितनी उम्र थी, साठ वर्ष, उसने तय कर रखा था। सम्राट को पूछना था कि तू कितने दिन से धर्म के अध्ययन और साधना में लगा है? तो पंद्रह वर्ष, उसने याद कर रखा था। लेकिन सब गड़बड़ हो गया।
सम्राट ने पूछा, तेरी उम्र कितनी है? नसरुद्दीन ने कहा, पंद्रह वर्ष। थोड़ा सम्राट हैरान हुआ। साठ साल का बूढ़ा था, लेकिन पंद्रह वर्ष कह रहा था। फिर उसने पूछा कि और तुम धर्म की साधना में कितने दिन से लगे हो? नसरुद्दीन ने कहा, साठ वर्ष। सम्राट ने कहा कि तुम पागल तो नहीं हो? नसरुद्दीन ने कहा, वही मैं सोच रहा हूं कि आप पागल तो नहीं हैं! क्योंकि मुझे जिस क्रम में समझाया गया था, मालूम होता है कि तुम्हें किसी और क्रम में समझाया गया है। तुम भी रटे-रटाए सवाल पूछ रहे हो, मैं भी रटे-रटाए जवाब दे रहा हूं। बीच का आदमी गड़बड़ कर गया।
बड़ी मुश्किल हो गई। पूरा गांव इकट्ठा था। दरबारी इकट्ठे थे। अब क्या हो? नसरुद्दीन ने कहा, ऐसा करें, तुम यह राजा होने का जरा नकाब उतार लो, और मैं बुद्धिमान होने का नकाब उतार लूं। फिर हम दोनों बैठकर दिल खोलकर बात करें, तो कुछ मजा आए। यह चेहरा तुम जरा अलग कर दो सम्राट होने का, और मैं भी चेहरा अलग कर दूं बुद्धिमान होने का। इसी में सब गड़बड़ हो गई। ये चेहरे दिक्कत दे रहे हैं।
पता नहीं, वह सम्राट समझा या नहीं। नसरुद्दीन तो मजाक कर रहा था। वह सच में ही बुद्धिमान लोगों में से एक था। नसरुद्दीन ने कहा कि अच्छा न हो कि हम आदमी आदमी की तरह बैठकर बात कर लें! ये चेहरे अलग कर दें। सम्राट को बड़ा कठिन पड़ा होगा। सम्राट जैसा चेहरा उतारना बड़ा मुश्किल होता है। सम्राट का चेहरा उतारना तो दूर है, भिखारी को भी अपना चेहरा उतारना मुश्किल होता है; fixed हो जाता है सब; बंध जाता है।
यदि तुम अपने को टूटे हुए कांसे के सामान नि:शब्द कर लो तो समझो निर्वाण पा लिया । तुममें कोई विवाद / प्रतिवाद नहीं रह गया ।
एक गांव में बड़ी बेकारी के दिन थे। अकाल पड़ा था और लोग बहुत मुश्किल में थे। एक सर्कस गुजर रहा था गांव से। स्कूल का एक मास्टर नौकरी से अलग कर दिया गया था। उसने सर्कस वालों से प्रार्थना की कि कोई काम मुझे दे दो। सर्कस के लोगों ने कहा कि सर्कस का तुम्हें कोई अनुभव नहीं है। उसने कहा, बहुत अनुभव है। स्कूल सिवाय सर्कस के और कुछ भी नहीं है। मुझे जगह दे दो। कोई और जगह तो न थी, लेकिन एक जगह सर्कस वालों ने खोज ली, उसे जगह दे दी गई। और काम यह था कि उसके शरीर पर शेर की खाल चढ़ा दी, पूरे शरीर पर; और उसे एक शेर का काम करना था। एक रस्सी पर उसे चलना था शेर की तरह।
चल जाता, कोई कठिनाई न आती। लेकिन जब वह पहले ही दिन बीच रस्सी पर था, तभी उसे दिखाई पड़ा कि उसके स्कूल के दस-पंद्रह लड़के सर्कस देखने आए हैं और उसे गौर से देख रहे हैं। नर्वस हो गया। मास्टर लड़कों को देखकर एकदम नर्वस हो जाते हैं। घबड़ा गया और गिर पड़ा। गिर पड़ा नीचे, जहां कि चार-आठ दूसरे शेर गुर्रा रहे थे, और चिल्ला रहे थे, और गरज रहे थे, और घूम रहे थे नीचे के कठघरे में। जब शेरों के बीच में घुसा, गिरा, तो घबड़ा गया। भूल गया कि मैं शेर हूं। याद आया कि मास्टर हूं। दोनों हाथ ऊंचे उठाकर चिल्लाया कि मरा, अब बचना मुश्किल है!
जनता उसके उस चमत्कार से उतनी चमत्कृत नहीं हुई थी, रस्सी पर चलने से, जितनी इससे चमत्कृत हुई कि शेर आदमी की तरह बोल रहा है दोनों हाथ उठाकर!
बाकी एक शेर, जो पास ही गुर्रा रहा था, उसने धीरे से कहा कि मास्टर, घबड़ा मत। तू क्या सोचता है, तू ही अकेला बेकार है गांव में? घबड़ा मत। तू अकेला ही थोड़े बेकार है गांव में, और लोग भी बेकार हैं। वे जो चार शेर नीचे घूम रहे थे, वे भी आदमी ही थे!
हम सबकी हालत वैसी ही है। आप ही झूठा चेहरा लगाकर घूम रहे हैं, ऐसा नहीं है। आप जिससे बात कर रहे हैं, वह भी घूम रहा है। आप जिससे मिल रहे हैं, वह भी घूम रहा है। आप जिससे डर रहे हैं, वह भी घूम रहा है। आप जिसको डरा रहे हैं, वह भी घूम रहा है।
आप ही अकेले नहीं हैं, यह पूरा का पूरा समाज, चेहरों का समाज है। इतने चेहरों की जरूरत इसलिए पड़ती है कि हमें अपने पर कोई भरोसा नहीं। हम भीतर हैं ही नहीं। अगर हम इन चेहरों को छोड़ दें, तो हम पैर भी न उठा सकेंगे, एक शब्द न निकाल सकेंगे। क्योंकि भीतर कोई है तो नहीं मजबूती से खड़ा हुआ, कोई क्रिस्टलाइज्ड बीइंग, कोई युक्त आत्मा तो भीतर नहीं है। तो हमें सब पहले से तैयारी करनी पड़ती है।
जिस मनुष्य के संदेह समाप्त नहीं हुए हैं उसकी शुद्धि न नग्न रहने से, न जटा धारण करने से, न भस्म लगाने से, न उपवास करने से, न कड़ी भूमि पर सोने से, न कीचड पोतने से और न उकडू बैठने से ही होती है ।
जानना
कथा :
जापान का एक चित्रकार बांसों का एक झुरमुट बना रहा है, वंशीवट बना रहा है; एक झेन फकीर। लेकिन उसका गुरु कभी-कभी पास से निकलता है और कहता है कि क्या बेकार! और वह बेचारा अपने बनाए हुए चित्रों को फेंक देता है। फिर एक दिन वह गुरु के पास जाता है कि मैं कितना ही सुंदर बनाता हूं, लेकिन तुम हो कि कह ही देते हो कि बेकार! और मुझे फाड़ना पड़ता है। मैं क्या करूं?
उसके गुरु ने कहा, पहले तू बांस हो जा, तब तू बांस का चित्र बना पाएगा। उसने कहा कि यह कैसे हो सकता है कि मैं बांस हो जाऊं? उसके गुरु ने कहा, तू जा। आदमी की दुनिया को छोड़ दे; बांसों की दुनिया में चला जा। उन्हीं के पास बैठना, उन्हीं के पास सोना; उनसे बातचीत करना, उन्हें प्रेम करना; उनको आत्मसात करना, imbibe करना, उनको पी जाना, उनको खून और हृदय में घुल जाने देना। उसने कहा कि मैं तो बातचीत करूंगा, लेकिन बांस? उसने कहा, तू फिक्र तो मत कर। आदमी भर बोले, वृक्ष तो बोलने को सदा तैयार हैं। लेकिन इतने सज्जन हैं कि अपनी तरफ से मौन नहीं तोडते। तू जा।
गया। एक वर्ष बीता। दो वर्ष बीते। तीन वर्ष बीते। गुरु ने खबर भेजी कि जाकर देखो, उसका क्या हुआ? ऐसा लगता है कि वह बांस हो गया होगा। आश्रम के अंतेवासी खोज करने गए। बांसों की एक झुरमुट में वह खड़ा था। हवाएं बहती थीं। बांस डोलते थे। वह भी डोलता था। इतना सरल उसका चेहरा हो गया था, जैसे बांस ही हो। उसके डोलने में वही लोच थी, जो बांसों में है। जैसे हवा का तेज झोंका आता और बांस झुक जाते, ऐसे ही वह भी झुक जाता। कोई रेसिस्टेंस, कोई विरोध, कोई अकड़, जो आदमी की जिंदगी का हिस्सा है, नहीं रह गई थी। बांस जमीन पर गिर जाते, जोर की आंधी आती, तो वह भी जमीन पर गिर जाता। आकाश से बादल बरसते और बांस आनंदित होकर पानी को लेते, तो वह भी आनंदित होकर पानी को लेता।
लोगों ने उसे पकड़ा और कहा, वापस चलो। गुरु ने स्मरण किया है। अब तुम वह बांस के चित्र कब बनाओगे?
उसने कहा, लेकिन अब चित्र बनाने की जरूरत भी न रही। अब तो मैं खुद ही बांस हो गया हूं। फिर उसे लाए और गुरु ने उससे कहा कि अब तू आंख बंद करके भी लकीर खींच, तो बांस बन जाएंगे। उसने आंख बंद करके लकीरें खींचीं और बांस बनते चले गए। और गुरु ने कहा कि अब आंख खोल और देख। तूने पहले जो बनाए थे, बड़ी मेहनत थी उनमें, लेकिन झूठे थे वे, क्योंकि तेरा कोई जानना नहीं था। अब तुझसे बांस ऐसे बन गए हैं, जैसे बांस की जड़ से बांस निकलते हैं, ऐसे ही अब तुझसे बांस निकल रहे हैं।
एक ज्ञान है, जहां हम एक होकर ही जान पाते हैं।
अज्ञानी जीव बैल के समान जीर्ण होता है, उसका मांस बढ़ता है, प्रज्ञा नहीं ।
महर्षि देवेंद्रनाथ, रविन्द्रनाथ के पिता, बड़े ज्ञानी थे, बड़े पंडित थे। उनके पास भी विवेकानंद, रामकृष्ण से मिलने के पहले, गए थे। आधी रात, गंगा में बजरे पर महर्षि का निवास था, तो कूदकर आधी रात अंधेरे में बजरे पर चढ़ गए; द्वार खोला। रात आधी; महर्षि अपने ध्यान में बैठे थे आंख बंद करके। जाकर कालर पकड़कर उनका गला हिलाया और कहा कि मैं यह पूछने आया हूं क्या ईश्वर है?
महर्षि समझा सकते थे, बता नहीं सकते थे। तर्क दे सकते थे, खुद का कोई अनुभव नहीं था। तो महर्षि ने कहा, युवक, बैठो।
मैं तुम्हें शास्त्रानुसार समझाऊंगा। लेकिन विवेकानंद छलांग लगाकर वापस गंगा में कूद गए। महर्षि ने आवाज दी कि लौट आओ, मैं तुम्हें सब तरह से समझाऊंगा। विवेकानंद ने कहा, समझने मैं नहीं आया हूं। अगर आप जानते हों, तो हां कह दें, या न कह दें। आप जानते हों, तो बोलें, अन्यथा चुप रह जाएं। क्योंकि शास्त्र तो मैं भी पढ़ लूंगा। देवेंद्रनाथ की हिम्मत न जुटी कहने की कि हां, मैं जानता हूं।
बाद में विवेकानंद कहते थे कि देवेंद्रनाथ की झिझक ने सब कुछ कह दिया। जानते थे बहुत, लेकिन वह सब किसी और के द्वारा जानते थे; सीधी कोई प्रतीति न थी।
फिर यही युवक रामकृष्ण के पास गया। उतनी ही अकड़ से, उतने ही जोर से। रामकृष्ण को भी हाथ पकड़कर पूछा है कि ईश्वर है? लेकिन हालत बिलकुल बदल गई। जैसे देवेंद्रनाथ कंप गए थे आधी रात इसका सवाल सुनकर; रामकृष्ण ने जब देखा आंख उठाकर विवेकानंद की तरफ, तो विवेकानंद खुद कंप गए। रामकृष्ण ने कहा, है या नहीं, यह छोड़ो। तुम्हें जानना हो तो बोलो? और
अभी जानना है? हाथ-पैर कंप गए विवेकानंद के। विवेकानंद ने कहा कि मैं जरा सोचकर आऊं। यह मैं सोचकर नहीं आया! रामकृष्ण ने कहा, है या नहीं, यह सवाल बेकार है। तुम्हें जानना, तो मैं जना सकता हूं।
रामकृष्ण ने विवेकानंद का हाथ पकड़ लिया। इस बातचीत में विवेकानंद ने जो हाथ पकड़ा था, वह छूट गया था। रामकृष्ण ने हाथ पकड़ लिया और कहा कि ऐसे नहीं जाने दूंगा। जब आ ही गए हो, तो अच्छा होगा, जानकर ही जाओ! विवेकानंद ने कहा है कि फिर मेरी हिम्मत रामकृष्ण से कभी कुछ पूछने की न पड़ी। क्योंकि यहां पूछना आग से खेलना था -- सीधा।
खुद को खोजिये, नहीं तो आपको दुसरे लोगों के राय पर निर्भर रहना पड़ेगा जो खुद को नहीं जानते ।
बड़े महाकवि मिल्टन ने अंतिम जीवन में शादी की। जब वे अंधे हो गये, तब शादी की। आंखवाले आदमी भी ठीक पत्नियां नहीं खोज पाते, तो अंधे ने कैसी खोजी होगी, हम समझ ही सकते हैं। और साधारण गणित से जीने वाले लोग भी चूक जाते हैं, तो कविता से जीने वाला तो निश्चित चूका होगा।
एक उपद्रवी स्त्री घर में उठा लाया। जिंदगी भर शांति से बीती थी, आंखें फूट कर मुसीबत हो गई। बड़ी कर्कशा, उपद्रवी, मारे-पीटे भी। और अंधा आदमी! सोचा था यह कि अंधा हो गया हूं, कोई साथी चाहिए। साथी की तलाश में अक्सर लोग शत्रु को खोज कर घर आ जाते हैं। एक मित्र बहुत दिन बाद मिलने आये। उन्होंने पत्नी नहीं देखी थी। देखी पहली दफा, तो मिल्टन से बोले, गुलाब का फूल है। ऐसी सुंदर पत्नी! मिल्टन ने कहा, 'फूल है या नहीं, गुलाब का है या नहीं, मैं अंधा हूं, देख नहीं पाता। लेकिन कांटे मुझे जरूर चुभते हैं।'
पर तुम अंधे से भी गये बीते हो। तुम्हें कांटे भी नहीं चुभ रहे। तुम्हारी आंखें तो चली ही गई हैं, तुम्हारी स्पर्श की क्षमता भी खो गई है। तुम जहां खड़े हो, वहां कुछ भी नहीं है। लेकिन फिर भी तुम समझ रहे हो कि कुछ तुमने कमा लिया, कुछ तुमने पा लिया।
तुम्हारी प्यास तो तभी बुझेगी, जब तुम भीतर के अनंत स्रोत से पीओगे।
अकड
कथा :
ख्रुश्चेव को किसी ने कुछ कोई कीमती कपड़ा भेंट किया था; जब प्रधान मंत्री था ख्रुश्चेव। उसने मास्को में बड़े-बड़े दर्जियों को बुला भेजा। उन्होंने कहा कि नहीं, पूरा सूट न बन सकेगा। या तो पैंट बनवा लो, या कोट बनवा लो, लेकिन पूरा सूट नहीं बनता। पर जिसने भेजा था, सोच-समझकर भेजा था। ख्रुश्चेव ने उसे सम्हालकर रख लिया। कीमती कपड़ा था, सूट बने तो ही मतलब का था, नहीं तो बेजोड़ हो जाए।
फिर ख्रुश्चेव इंगलैंड घूमने आया था, तो कपड़ा साथ ले आया। और लंदन के एक दर्जी को उसने बुलाकर कहा कि तुम कपड़ा बनवा दो। उसने कहा कि तैयार हो जाएगा आठ दिन बाद पूरा सूट। ख्रुश्चेव ने कहा, लेकिन आश्चर्य! मास्को में कोई भी दर्जी पूरा सूट बनाने को तैयार न हुआ। कहते थे, या तो पैंट बनेगा या कोट। तुम कैसे बना सकोगे? उस दर्जी ने कहा, मास्को में आप जितने बड़े आदमी हैं, उतने बड़े आदमी आप लंदन में नहीं हैं। साइज! मास्को में आपकी साइज बहुत ज्यादा है। उधर पैंट भी बन जाता, तो बहुत मुश्किल है। यहां तो बन जाएगा। और आप चाहो, तो एकाध-दो और आपके मित्रों का भी बनवा दूं।
वह जो हमारे भीतर नशा है, बहुत तरह का है। पद का भी होता है, ज्ञान का भी होता है, त्याग का भी होता है। सब शराब बन जाती है, भीतर आदमी अकड़कर खड़ा हो जाता है। वह अकड़ अगर है, तो परमात्मा से मिलन न होगा। और परमात्मा से मिलन हुआ, तो वह अकड़ तो बह जाती है। उस अकड़ की जगह, परमात्मा ही शेष रह जाता है। लहरें खो जाती हैं और सागर ही बचता है।
पहले अपने आपको ही उचित में लगाए, फिर दूसरे को उपदेश करे तो पंडित क्लेश को प्राप्त नहीं होगा ।
धार्मिक
कथा :
एक गांव में बड़ी तकलीफ है। भूख है, बीमारी है, परेशानी है। लोगों के पास दवा नहीं, खाना नहीं, कपड़े नहीं। गांव के चर्च का जो पादरी है, उसने कभी परमात्मा से कोई ऐसी प्रार्थना नहीं की, जिसमें कुछ मांगा हो। वह सत्तर साल का बूढ़ा है। गांवभर की तकलीफ; और चर्च में बड़ी भीड़ होती है। फटे-चीथड़े पहनकर, भूखे बच्चे और भूखे बूढ़े इकट्ठे होते हैं। और वे रोते हैं। उनके आंसू देखकर एक रात वह रातभर नहीं सोया। और उसने परमात्मा से प्रार्थना की, मैंने कभी तुझसे कुछ मांगा नहीं। एक बात मांगता हूं, वह भी अपने लिए नहीं; मेरे गांव के लोगों की हालत सुधार दे।
स्वभावतः, चूंकि उसने कभी कुछ नहीं मांगा था, इसलिए उसकी प्रार्थना में बड़ा बल था। और स्वभावतः, क्योंकि उसने अपने लिए प्रार्थना नहीं की थी, इसलिए भी बड़ा बल था।
कहानी कहती है कि परमात्मा ने उसकी प्रार्थना सुन ली। और सुबह जब नगर के लोग उठे, तो चमत्कृत रह गए। जहां झोपड़े थे, वहां महल हो गए। जहां बीमारियां थीं, वहां स्वास्थ्य आ गया। वृक्ष फलों से लद गए। फसलें खड़ी हो गईं। सारा गांव धनधान्य से परिपूर्ण हो गया।
यह तो चमत्कार हुआ; पूरे गांव ने देखा। इससे भी बड़ा चमत्कार पादरी ने देखा, कि चर्च में सदा भीड़ होती थी, वह बिलकुल बंद हो गई; कोई चर्च में नहीं आता। पादरी दिनभर बैठा रहता है बाहर, कोई चर्च में नहीं आता। कभी कोई नमस्कार नहीं करता। कभी कोई निमंत्रण नहीं भेजता। प्रार्थना के लिए कोई आता नहीं। चर्च गिरने लगा। ईंटें खिसकने लगीं। पलस्तर टूटने लगा। एक साल, दो साल; लोग गांव के भूल गए कि चर्च भी है।
दो साल बाद उस बूढ़े फकीर ने एक रात फिर परमात्मा से प्रार्थना की कि हे प्रभु, एक प्रार्थना और पूरी कर दे। परमात्मा ने कहा कि अब तेरी क्या कमी रह गई! और तूने जो चाहा था, सब कर दिया। उसने कहा, अब एक ही प्रार्थना और है कि मेरे गांव के लोगों को वैसा ही बना दे, जैसे वे पहले थे। उन्होंने कहा, तू यह क्या कह रहा है!
उसने कहा कि मैं तो सोचता था कि वे चर्च में परमात्मा की प्रार्थना के लिए आते हैं, वह मेरा गलत खयाल सिद्ध हुआ। कोई अर्थ के कारण आता था। कोई दुख के कारण आता था। कोई लोभ के कारण, कोई भय के कारण। अब उनका लोभ भी पूरा हो गया; उनके भय भी दूर हो गए; उनके दुख भी दूर हो गए। तब मैंने यह न सोचा था कि परमात्मा को वे इतनी सरलता से भूल जाएंगे।
तो तीन तरह के लोग हैं। अर्थार्थी को अर्थ मिल जाए, धन मिल जाए, भूल जाएगा। दुखी को, कातर को, आर्त को, दुख दूर हो जाए, भूल जाएगा। जिज्ञासु को उसके प्रश्न का उत्तर मिल जाए, समाप्त हो जाएगा। असली भक्त तो चौथा ही है। कुछ भी मिल जाए, वह तृप्त नहीं होगा। जब तक कि वह स्वयं परमात्मा ही न हो जाए, इसके पहले कोई तृप्ति नहीं है।
जो इस लोक को बुलबुले और मृग-मरीचिका के समान देखता है उसकी ओर मृत्युराज नहीं देखता ।
इपिटेक्टस यूनान में एक बड़ा संत हुआ। वह गुलाम था - एक सम्राट का गुलाम था। उन दिनों गुलाम होते थे। सम्राट को पता लगा कि यह तो बड़ा पहुंचा हुआ फकीर है और यह कहता है कि मैं शरीर नहीं हूं। सम्राट ने कहा, 'परीक्षा करनी जरूरी है।' उसे बुलाया। दो पहलवान बुला कर उसका पैर मरोड़ने को कहा।
जब उन्होंने पैर मरोड़ा, तो वह फकीर बोला कि 'देखो, मरोड़ तो रहे हो, लेकिन टूट जाएगा।' जैसे कि अपने से कोई लेना-देना नहीं। जैसे कि कोई और किसी चीज को मरोड़ता हो, और कोई कह दे कि भाई, टूट जाएगी। ज्यादा न मरोड़ो। ऐसे ही उसने कहा कि 'मरोड़ तो रहे हो, मजे से मरोड़ो; मगर कहे देता हूं, पीछे पछताओगे; टूट जाएगी। यह टांग टूट जाएगी इतना मरोड़ोगे तो।'
लेकिन सम्राट ने कहाः 'मरोड़े जाओ।' जब बिलकुल टांग टूटने के करीब आ गई, चटकने लगी; उसने कहा कि 'देखो, अभी भी समझ जाओ। अब जरा और आगे गए--कि गई।'
मगर अभी भी वह यह नहीं कह रहा है कि मेरी टांग मत तोड़ो। चिल्ला नहीं रहा है कि मुझे लंगड़ा कर दोगे! जब वह बिलकुल तोड़ने लगे, तो उसने सम्राट से कहाः 'सावधान, तुम्हारा गुलाम लंगड़ा हो जाएगा। तुम समझो। मेरा कुछ बिगड़ता नहीं है; नुकसान तुम्हारा है। फिर मुझसे मत कहना।'
लेकिन सम्राट तो पूरी परीक्षा लेने को ही था! उसने टांग तुड़वा दी। जब टांग टूट गई, तो फकीर हंसने लगा। उसने कहाः 'हमने पहले ही कहा था। अब भोगो'। मगर एक क्षण को भी तादात्म्य पैदा नहीं हुआ। यह नहीं कहाः 'मेरी टांग!' बस, यही संसार में रहते हुए मुक्त रहने का सूत्र है।
अपने हाथ से विसर्जन करोगे तो समाधि। कोई आकर मछली को पकड़कर ले जाए, तो मृत्यु।
आदत
कथा :
एक जहाज पर, पानी के जहाज पर बहुत-से यात्री हैं और एक जादूगर भी है। और एक तोता भी है एक आदमी के पास। वह जादूगर समय काटने के लिए जहाज के यात्रियों को बिठाकर कुछ ट्रिक्स, कुछ अपना काम दिखाता है, कुछ हाथ की सफाइयां दिखाता है। लेकिन वह तोता भी उसी जादूगर के गांव का है और जादूगर के घर के सामने का ही है। जब भी वह जादूगर कुछ दिखाता है, तो वह तोता जोर से चिल्लाता है, phony! phony ! सब झूठ है, सब झूठ है; सब तरकीब है, सब हाथ की सफाई है।
एक दिन बड़ा तूफान आया और जहाज डूब गया। संयोग की बात, एक लकड़ी के पटिए को जादूगर पकड़कर अपने को बचाने की कोशिश करता है। वह तोता भी उसी लकड़ी के पटिए पर आकर बैठ गया है। अब वे दोनों ही समुद्र में चलते हैं। दो दिन तक जादूगर भी गुस्से में उससे नहीं बोला, क्योंकि वह उससे दुश्मनी कर रहा था रोज। और तोता भी दो दिन तक नहीं बोला। क्योंकि उसकी भी हिम्मत न पड़ी कहने की। लेकिन दो दिन बाद उसने कहा जादूगर से, अच्छी बात है। माना कि तुम बड़े बुद्धिमान हो, लेकिन जरा यह तो बताओ कि उस जहाज का तुमने क्या किया? वह समझा कि कोई ट्रिक की है; इसी की शरारत है।
चौबीस घंटे, वर्षों से वह तोता जादूगर के घर के सामने उसके हाथ की सफाइयां देख रहा था। उसके सोचने का एक ढंग बना। फिर जहाज पर भी वह हाथ की सफाइयां देख रहा था। उसके सोचने का एक ढंग निश्चित हो गया था। वह यह सोच ही नहीं पाया तोता कि जहाज डूब गया। उसने समझा कि इसी की शरारत है। इसी ने कोई ट्रिक, कोई हाथ की सफाई दिखलाई है। इसलिए दो दिन तक वह चुप रहा कि कब तक यह हाथ की सफाई दिखलाता रहेगा। आखिर थोड़ी-बहुत देर में जहाज प्रकट होगा, तब मैं चिल्लाऊंगा, फोनी! फोनी! सब झूठा है। लेकिन वह मौका आया नहीं दो दिन में।
हम सब के भी मन की आदतें हैं, सोचने के ढंग हैं। बंध जाते हैं। जब पत्थर में नहीं दिखता कुछ, तो मूर्ति में नहीं दिखेगा। पत्थर में दिखे, तो मूर्ति में भी दिख जाएगा। कोई कहता हो कि पत्थर में तो मुझे पत्थर ही दिखता है और मूर्ति में भगवान दिखते हैं, तो झूठ कहता है। कोई अगर कहता हो कि मेरे बेटे में तो मुझे शरीर ही दिखता है, मेरी पत्नी में मुझे शरीर दिखता है, मेरे पिता में मुझे शरीर दिखता है और राम में मुझे भगवान दिखते हैं, तो गलत कहता है। यह नहीं हो सकता। यह संभव नहीं है। क्योंकि एक बार राम के शरीर में अगर निराकार दिखाई पड़ जाए, तो सभी शरीरों में दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा।
दिखाई पड़ जाए, तो बात खुल गई। वह हमारा पुराना तर्क टूट गया।
सुकरात -- दुनिया में केवल एक ही चीज अच्छी है, ज्ञान, और केवल एक ही चीज बुरी है वो है अज्ञान।
चंदूलाल को सरकारी काम से पंद्रह दिन के लिए बंबई जाना पड़ा। सरकारी भत्ते पर ही उन्हें एक आलीशान होटल में रहने मिला। पांच-छह दिन में ही वह बहुत परेशान हो उठा। एक दिन झल्ला कर वेटर से गुस्से में बोला -- सुनो मिस्टर, मेरे लिए जल्दी से दो जली हुई रोटियां, एक प्लेट कंकड़ों से भरी दाल, एक प्लेट अधकच्चे चावल और बुरी तरह जली हुई मिर्चदार सब्जी लेकर आओ।
वेटर ने बाइज्जत सिर झुका कर पूछा: साहब, कुछ और?
चंदूलाल बोला -- हां, सब चीजें लाने के बाद तुम मेरे सामने की कुर्सी पर बैठ कर घर-गृहस्थी का रोना रोओ, मेरा सिर चाटो, मुझे सताओ, क्योंकि मुझे घर की याद सता रही है! आदत हो गई है। रोज जब तक पत्नी सामने बैठ कर और खोपड़ी न खाए तब तक भोजन करने में मजा नहीं आता।
जॉन डोने (1572-1631) --
एक छोटी सी नींद, हम हमेशा के लिए जागते हैं
और मृत्यु अब और नहीं होगी; मौत, तुम मर जाओगे।
दिखना
कथा :
जीसस को जिस रात पकड़ा गया, उस रात जीसस के मित्रों ने कहा था, हमें खबर मिली है कि दुश्मन पकड़ने आ रहे हैं। अच्छा हो कि हम यहां से भाग जाएं। तो जीसस मुस्कुराए। वह मुस्कुराहट अब तक समझ के बाहर है। क्योंकि जीसस किसलिए मुस्कुराए होंगे? मैं कहता हूं, इसलिए कि जीसस जानते हैं, पकड़ा जाना जरूरी है; होने ही वाला है; इसलिए भागने का कोई अर्थ नहीं है। मुस्कुराए होंगे इसलिए कि ये जो मित्र बेचारे चिंता से कह रहे हैं, इन्हें कुछ पता नहीं है। जो होने वाला है, होगा।
फिर जीसस पकड़े गए। तो मित्रों ने कहा, हमने कहा था, आपने न सुना। फिर वे मुस्कुराए। क्योंकि उन्हें पता है कि जो होने वाला है, वह हो रहा है। कहना भी तुम्हारा जरूरी था; मेरा सुनना भी जरूरी था; और यह पकड़ा जाना भी जरूरी था।
फिर उनमें से एक ने कहा कि चाहे जान रहे, चाहे जाए, मैं तो आपके साथ रहूंगा। जीसस ने कहा, तुझे पता नहीं; सुबह सूरज के उगने के पहले तक तू तीन दफे मुझे इनकार कर चुका होगा। अभी आधी रात है, सूरज के उगने तक तू तीन दफे मुझे इनकार कर चुका होगा। उसने कहा, आप कैसी बातें करते हैं! मैं अपनी जान लगा दूंगा आपके लिए। मैं इनकार करूंगा?
जीसस मुस्कुराए। क्योंकि उस बेचारे को पता नहीं उसका भी कि वह क्या कर सकता है सुबह तक। लेकिन जीसस को दिखाई पड़ रहा है कि वह क्या करेगा।
फिर जीसस को पकड़कर दुश्मन ले चले। बाकी शिष्य तो भाग गए; वह एक शिष्य पीछे हो लिया, जिसने कहा था, मैं आखिरी दम तक साथ रहूंगा। दुश्मनों ने देखा कि कोई एक अजनबी आदमी साथ में है। कौन है यह? उन्होंने अपनी मशालें उसके चेहरे की तरफ कर दीं। उसको पकड़ लिया और कहा कि तू कौन है? तू जीसस का साथी तो नहीं है? उसने कहा, कौन जीसस! मैं तो पहचानता ही नहीं।
जीसस ने पीछे की तरफ देखा, मुस्कुराए और कहा, अभी सूरज नहीं उगा। और ऐसा तीन बार हुआ। फिर थोड़ी देर बाद रास्ते पर वे आए। और सैनिक आए और उन्होंने कहा, यह आदमी कौन है, जो बीच में चल रहा है? अजनबी मालूम पड़ता है। फिर उन्होंने उसे पकड़ा। उसने कहा, मुझे क्यों पकड़ते हो? मैं परदेसी हूं। तुम जीसस के साथी हो? उसने कहा, कौन जीसस! मैं पहचानता भी नहीं। जीसस फिर मुस्कुराए और उन्होंने जोर से कहा, देख! अभी सुबह नहीं हुई। ऐसा तीन बार रात में उसने इनकार किया।
जीसस को पता है, क्या होने वाला है, क्या होगा। इसलिए जो बहुत गहरे जीसस को पहचानते हैं, वे जीसस की मृत्यु को कहते हैं, क्राइस्ट ड्रामा। वे कहते हैं, उसको कोई ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है; जीसस के लिए तो वह नाटक से ज्यादा नहीं था। क्योंकि जब पहले से ही पता हो, तो मामला नाटक हो जाता है।
जैसे ठीक से न पकड़ा गया कुश हाथ को ही छेद देता है, वैसे ही गलत प्रकार से ग्रहण किया गया श्रामण्य नरक की ओर खींच ले जाता है ।
महान सिकंदर भारत आया। उसने एक फकीर के हाथ में एक चमकती हुई चीज देखी। पूछा, क्या है? वह फकीर बोला, बताऊंगा नहीं। बता नहीं सकूंगा। यह राज बताने का नहीं है। लेकिन सिकंदर जिद्द पर अड़ गया। उसने कहा, हार मैंने माननी जीवन में कभी सीखी नहीं। जान कर रहूंगा। तो फकीर ने कहा, एक बात बता सकता हूं कि तुम्हारी सारी धन-दौलत इस छोटी सी चीज के सामने कम वजन की है।
सिकंदर ने तत्क्षण एक बहुत विशाल तराजू बुलाया और लूट का जो भी उसके पास सामान था, हीरे-जवाहरात थे, सोना-चांदी था, सब उस तराजू के एक पलवे पर चढ़ा दिया और उस फकीर ने उस चमकदार छोटी सी चीज को दूसरे पलवे पर रख दिया। उसके रखते ही फकीर का पलवा नीचे बैठ गया और सिकंदर का पलवा ऊपर उठ गया–ऐसे कि जैसे खाली हो! सिकंदर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।
झुका फकीर के चरणों में और कहा, कुछ भी हो, नतमस्तक हूं। लेकिन राज मुझे कहो। फकीर ने कहा, राज कहना बहुत मुश्किल है। कहा नहीं जा सकता, इसलिए नहीं कह रहा हूं। लेकिन तुम झुके हो, इसलिए एक बात और बताए देता हूं। एक चुटकी धूल उठाई रास्ते से और उस चमकदार चीज पर डाल दी और न मालूम क्या हुआ कि फकीर का पलवा एकदम हलका हो गया और ऊपर की तरफ उठने लगा। और सिकंदर का पलवा भारी हो आया और नीचे बैठ गया। स्वभावतः सिकंदर तो और भी चकित हुआ। उसने कहा, यह मामला क्या है? तुम पहेलियों को और पहेलियां बना रहे हो। और उलझा रहे हो। सीधी-सादी बात है। कहना हो कह दो, न कहना हो न कहो।
उस फकीर ने कहा, अब कह सकता हूं। अब तुम जिज्ञासा से पूछ रहे हो। अब जोर-जबरदस्ती नहीं है। यह कोई खास चीज नहीं है; मनुष्य की आंख है। धूल पड़ जाए, दो कौड़ी की। धूल हट जाए तो इससे बहुमूल्य और कुछ भी नहीं–सारी पृथ्वी का राज्य भी नहीं, सारी धन-दौलत फीकी है।
संबोधि का अर्थ होता है –तुम्हारे भीतर की आंख। और कुछ ज्यादा कठिनाई की बात नहीं है; थोड़ी सी धूल पड़ी है–सपनों की धूल। धूल भी सच नहीं। विचारों की धूल। कल्पनाओं की धूल। कामनाओं की धूल । धूल भी कुछ वास्तविक नहीं, धुआं-धुआं है; मगर उस धुएं ने तुम्हारी भीतर की आंख को छिपा लिया है। जैसे बादल आ जाएं और सूरज छिप जाए; बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए। बस इतना ही अर्थ है संबोधि का: बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं -- जिस दिन से तुम अतीत के संबंध में ज्यादा विचार करने लगो, समझ लेना कि बूढ़े हो गए। बुढ़ापे की यह मनोवैज्ञानिक परिभाषा है।
शरण
कथा :
बुद्ध के पास एक युवक आया। उसने सुन रखा था कि बुद्ध लोगों से कहते हैं, 'अप्प दीपो भव'! अपने प्रकाश स्वयं बनो; be a life unto yourself. फिर जब वह युवक बुद्ध के पास आया, तो उसे बड़ी बेचैनी हुई। वहां उसने देखा कि लोग कह रहे हैं, 'बुद्धं शरणं गच्छामि', बुद्ध की शरण जाते हैं। उस युवक को तो बड़ी परेशानी हुई। वह तो सुनकर आया था कि बुद्ध कहते थे कि अपने दीए स्वयं बनो। तो यह तो बात बड़ी उलटी मालूम पड़ती है, बुद्ध की शरण जाओ! अपने दीपक बनना है, तो किसी की शरण मत जाओ, यही उसने मतलब लिया था।
स्वभावतः, हमारा अहंकार इसी तरह के मतलब लेता है। वह मतलब की बातें पकड़ लेता है। वह कहता है, किसी की शरण मत जाओ। तो वह कहता है, ठीक, यही तो हम कहते हैं, किसी की शरण जाने की कोई जरूरत नहीं है।
उस युवक ने देखा कि यह क्या हो रहा है! हजारों भिक्षु, और वे बुद्ध के चरणों में सिर रखते हैं, और कहते हैं, बुद्धं शरणं गच्छामि, बुद्ध की शरण जाता हूं। उस युवक ने बुद्ध के पास आकर कहा, माफ करिए! आप तो कहते हैं, अप्प दीपो भव; अपने प्रकाश स्वयं बनो; खुद खोजो सत्य को। और ये लोग क्या कर रहे हैं! ये कहते हैं, बुद्धं शरणं गच्छामि; हम बुद्ध की शरण जाते हैं!
तो बुद्ध ने कहा, तू पहले शरण जा, तभी तो तू हो पाएगा। अभी तू है ही नहीं। अभी जिसे तूने समझा है मैं, वही तो तेरे होने में बाधा है। उस 'मैं' को हम तोड़ दें। हां, उस दिन मैं तुझे मना कर दूंगा कि अब शरण मत जा, जिस दिन तेरे भीतर कोई शरण जाने को न बचे। उस दिन मैं कहूंगा, अब शरण जाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जब तक तेरे भीतर कोई शरण जाने के लिए बचा है, तब तक तू शरण जा। इन दोनों बातों में बुद्ध ने कहा, कोई विरोध नहीं है। असल बात यहा है कि -- बुद्धं शरणं गच्छामि! बुद्धं का अर्थ होता है: जागरण, साक्षी, बोध। मैं तो प्रतीक मात्र हूं। मैं तो बहाना हूं। वे बुद्धत्व की शरण जाते हैं।
एक बार भी अगर कोई पूर्ण हृदय से कह पाए, जो तेरी मर्जी, उसके जीवन से दुख विदा हो जाता है। मेरी मर्जी दुख है; उसकी मर्जी कभी भी दुख नहीं है।
नेपोलियन बोनापार्ट जब पढ़ता था, तो अपनी एक स्कूल की एक्सरसाइज कापी में, एक छोटी-सी कापी में उसने एक वाक्य लिखा है। भूगोल के बाबत जानकारी ले रहा था। किसलिए? भूगोल के बाबत जानकारी ले रहा था कि सारी दुनिया जीतनी है, तो भूगोल तो जानना ही पड़ेगा। बचपन से ही नेपोलियन के दिमाग में सारी दुनिया को जीतने का खयाल था, तो भूगोल की जानकारी जरूरी थी। एक बड़ी मजेदार घटना घटी। और इस जिंदगी में बड़ी मजेदार घटनाएं घटती ही हैं। जिंदगी बड़ी गहरी मजाक है।
सेंट हेलेना का छोटा-सा द्वीप है, बहुत छोटा। तो नक्शे पर नेपोलियन बोनापार्ट ने उसके चारों तरफ एक गोल लकीर खींच दी और लिख दिया, यह इतनी छोटी जगह है कि इसे जीतने की कोई जरूरत नहीं। और मजे की बात यह है कि नेपोलियन जब हारा, तो सेंट हेलेना के द्वीप में ही बंद किया गया, कैदी किया गया। जिस जगह को उसने जीतने के लिए छोड़ रखा था कि बेकार है; एक छोटा-सा द्वीप है, जिस पर कुछ नहीं, घास ही उगती है। इसको नहीं जीतने की कोई जरूरत है।
सारी दुनिया जीतनी चाही थी उसने! लेकिन कभी-कभी जिंदगी बड़े मजाक करती है। सारी दुनिया तो हार गया, आखिर में सेंट हेलेना का द्वीप ही बचा। और उस पर ही कैदी होकर नेपोलियन आखिरी वक्त में था। शायद उसे खयाल भी न आया होगा कि कभी मैंने भूगोल की किताब पर निशान लगाया था कि सेंट हेलेना बिलकुल बेकार है। आखिर में वहीं शरण मिली। जो बिलकुल बेकार मालूम पड़ा था, वही शरण बना। सारी जमीन छिन गई हाथ से, वह सेंट हेलेना का द्वीप ही छोटा-सा, कुल जमा शरण थी।
जिंदगी में ऐसा रोज होता है। जिस परमात्मा को हम सदा छोड़े रहते हैं कि पाने योग्य नहीं है, और जिस परमात्मा को हम सदा बाहर रखते हैं जिंदगी के, वही परमात्मा अंत में पता चलता है कि शरण होने योग्य था--वही परमात्मा।
अज्ञानी वही है, जो अपने ही हाथों नर्क की यात्रा करता है।
पूर्णता
कथा :
आज से एक हजार साल पहले सेलवीसियस नाम का एक ईसाई, कैथोलिक फकीर हिंदुस्तान आया। सेलवीसियस बहुत अदभुत आदमियों में से एक था। और बाद में वह कैथोलिक चर्च का पोप बना, हिंदुस्तान से लौटने के बाद। और जितने पोप बने हैं, उनमें सेलवीसियस का मुकाबला नहीं है। सेलवीसियस ने हिंदुस्तान के बहुत-से राज समझने की कोशिश की और हिंदुस्तान की धार्मिक साधना में गहरा उतरा। हिंदुस्तान के फकीरों ने उसे बहुत-सी चीजें भेंट दीं कि तुम ले जाओ।
एक फकीर ने उसे एक चीज भेंट दी, एक तांबे का बना हुआ आदमी का सिर भेंट दिया। वह सिर बहुत अदभुत था। एक बड़ी से बड़ी रहस्य और मिस्ट्री उस सिर के साथ जुड़ी है। उस सिर से कोई भी जवाब हां और न में लिया जा सकता था। उससे कुछ भी पूछें, वह हां या न में जवाब दे देता था। वह था तो सिर्फ तांबे का सिर, आदमी की एक खोपड़ी पर चढ़ाया हुआ। वह अदभुत था। सेलवीसियस ने हजारों तरह के सवाल पूछे और सदा सही जवाब पाए। पूछा कि यह आदमी मर जाएगा कल कि बचेगा? उसने कहा, हां, मर जाएगा, तो मरा। उसने कहा कि नहीं, तो नहीं मरा। न मालूम क्या-क्या पूछा और सही पाया।
सेलवीसियस बड़ी मुश्किल में पड़ गया। उस फकीर ने कहा था, लेकिन एक खयाल रखना, बुद्धि की मानकर कभी इस सिर को खोलकर मत देखना कि इसके भीतर क्या है। लेकिन जैसे-जैसे सेलवीसियस को उत्तर मिलने लगे, वैसे-वैसे उसका मन बेचैन होने लगा। उसकी रात की नींद खो गई। उसको दिनभर चैन न पड़े। कब इसको खोलकर देख लें, तोड़कर, इसके भीतर क्या है!
वह बामुश्किल हिंदुस्तान से जा पाया। रोम पहुंचते ही उसने पहला काम यह किया कि उसको तोड़कर, उसको खोलकर देख लिया। उसके भीतर तो कुछ भी न था। एक साधारण खोपड़ी थी। कुछ भी न मिला।
सेलवीसियस बहुत दुखी और परेशान हुआ। आज भी उस सिर के टुकड़े, टूटे हुए, वेटिकन के पोप की लाइब्रेरी में नीचे दबे पड़े हैं; आज भी। और भी बहुत-सी चीजें वेटिकन की लाइब्रेरी में दबी पड़ी हैं, जो कभी बड़ी काम की सिद्ध हो सकती हैं। सेलवीसियस बहुत रोया, बहुत पछताया, बहुत जोड़ने की कोशिश की। सब जोड़ा-जाड़ा। लेकिन जवाब फिर न आया।
बुद्धि तत्काल चीजों को तोड़कर देखना चाहती है कि भीतर क्या है। लेकिन भीतर जो भी है, वह सिर्फ जुड़े हुए में होता है, टूटे में नहीं होता। जिस चीज को भी हम तोड़ लेते हैं, उसकी होलनेस, उसकी पूर्णता नष्ट हो जाती है। और जीवन के सब रहस्य उसकी पूर्णता में हैं।
संसार छोड़ने से परमात्मा नहीं मिलता परंतु परमात्मा के मिलने से संसार छूट जाता है ।
समझ
कथा :
एक गांव में पहली ही बार कुछ लोग एक घोड़े को खरीदकर ले आए थे। उस देश में घोड़ा नहीं होता था और उस गांव के लोगों ने घोड़ा देखा भी नहीं था। जो लोग ले आए थे परदेश से, वे घोड़े के शरीर से, उसकी दौड़ से, उसकी गति से प्रभावित होकर ले आए थे। लेकिन उन्हें घोड़े के संबंध में कुछ भी पता नहीं था। एक बात पक्की थी, उन्हें घोड़े की भाषा बिलकुल पता नहीं थी। बहुत मुश्किल में पड़ गए। घोड़े को उन्होंने चलते देखा था हवा की रफ्तार से। गांव में लाकर उन्होंने पाया कि चार आदमी आगे से खींचें और चार आदमी पीछे से धकाएं, तब कहीं वह मुश्किल से कुछ-कुछ चलता है। बड़ी मुश्किल में पड़ गए कि अगर घोड़े को चलाने के लिए आठ आदमियों की जरूरत पड़े, तो यह घोड़ा है किसलिए! बहुत उन्होंने कहा कि हमने देखा था तुझे हवा से बातें करते! घोड़ा खड़ा सुनता रहा।
और घोड़ा रोज सूखने लगा और दुबला होने लगा, क्योंकि उन्होंने पूछा ही नहीं था कि उसे भोजन भी देना है! अब चलना रोज-रोज मुश्किल होता चला गया। चार की जगह आठ और आठ की जगह दस और दस की जगह बारह, रोज-रोज आदमी बढ़ाने पड़ते जब उस घोड़े को चलाना पड़ता। पूरा गांव दिक्कत में पड़ गया। लोगों ने कहा, तुम यह क्या ले आए हो? ऐसा वक्त आ जाएगा जल्दी कि पूरे गांव को इसे चलाना पड़ेगा! लेकिन फिर चलाने से फायदा क्या है? ठीक था; एक दिन तमाशा हो गया; लोगों ने चलाकर भी देख लिया, फिर क्या करेंगे?
गांव में एक अजनबी उस रात रुका था, उसने भी देखा यह खेल कि पूरा गांव धक्का देता है, घोड़े को चलाता है, घोड़ा चलता नहीं। उसने कहा कि पागलो, क्या तुम्हें घोड़े की भाषा बिलकुल भी पता नहीं? उन्होंने कहा, हम इसी मुश्किल में पड़े हैं। वह आदमी सिर्फ घोड़े के सामने घास का एक छोटा-सा पूला लेकर चलने लगा। और घोड़ा इतना कमजोर था, तो भी तेजी से उसने गति पकड़ ली। वह आदमी दौड़ने लगा, तो घोड़ा दौड़ने लगा। घास का एक छोटा-सा पूला हाथ में लेकर! घोड़े को घास का पूला समझ में आया।
गुरु से शिष्य की कोई भी बात छुपी हुई नहीं है क्योंकि सागर को मालूम होता है की बूंद में कितना पानी है ।
एक बस में मुल्ला नसरुद्दीन सफर कर रहा था। अचानक चलती बस में वह खड़ा हो गया और उसने जोर से चिल्ला कर कहा, भाइयो! किसी के सुतली में बंधे नोट तो नहीं गिरे? अनेक आवाजें आयीं कि हमारे गिरे, हमारे गिरे, कई लोग खड़े हो गए। उसने कहा, शांति रखो। अभी मुझे केवल सुतली मिली है।
धर्म तो नोट है, पुण्य सुतली है। सुतली पर बहुत मत अकड़ जाना। क्योंकि सुतली से कुछ होता जाता नहीं। नोटों पर बंध जाए तो कीमती हो जाती है। पत्थरों पर बंधी रहे तो क्या मूल्य है उसका?
संस्कार
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन को पत्नी की हत्या करने पर मुकदमा चला और उसे सूली की सजा मिली। जिस दिन उसे सूली की सजा मिली, उसे खबर देने जेलर आया और उसने कहा कि मुल्ला, आने वाले सोमवार को सुबह तुम्हारी सूली हो जाने वाली है। मुल्ला ने कहा, सोमवार को! क्या यह नहीं हो सकता कि आने वाले शनिवार को सूली दी जाए? जेलर ने कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हें! तुम्हें क्या फर्क पड़ता है कि सोमवार लगी सूली कि शनिवार लगी! मुल्ला ने कहा, असल में इस बुरे मुहूर्त से मैं सप्ताह का प्रारंभ नहीं करना चाहता हूं। सोमवार!
वह अपनी दुकान की दुनिया में जी रहा है, जहां मुहूर्त चलते हैं। अब फांसी लग रही है, लेकिन वह सोच रहा है कि सोमवार को मुहूर्त करना कि नहीं!
फिर फांसी हुई, तो जिस देश में वह रहता था, वहां नियम था कि बीच चौराहे पर नगर के फांसी लगती थी। हजारों लोग देखने आते थे। और फांसी जिसको दी जाती थी, उस आदमी से कहा जाता था कि उसे कुछ बोलना हो मरने के पहले, तो वह जनता के सामने बोल सकता था।
ठीक फांसी के पहले नसरुद्दीन से कुछ लोग मिलने आए। और जेलर बहुत हैरान हुआ कि नसरुद्दीन और उनके बीच बड़ा मोलत्तोल हुआ। कुछ जेलर की समझ में भी न पड़े कि यह बात क्या हो रही है! लेकिन नसरुद्दीन ने कहा कि मैं आखिरी वक्तव्य के संबंध में कुछ तैयारी कर रहा हूं, इसलिए आप बीच में बाधा न दें। बड़ी देर तक चला। कुछ वे कहते, कुछ यह कहता। फिर हां, न। आखिर कुछ समझौता हुआ और उन लोगों ने कोई चीज नसरुद्दीन को दी और उसने जल्दी से खीसे में रख ली। जेलर ने भी मरते हुए आदमी को बाधा देनी ठीक न समझी। सोचा कि अभी फांसी हो जाएगी; पीछे देख लेंगे कि जेब में क्या है।
जब फांसी लगाने का वक्त आया और नसरुद्दीन चढ़ा तख्ते पर, तो जेलर ने कहा, तुम्हें कुछ कहना हो तो कह दो। तो उसने कहा, हां, मुझे कुछ कहना है। और उसने कहा कि भाइयो, याद रखना, जूता छाप साबुन ही दुनिया में सबसे अच्छा साबुन है।
लोग भी चकित हुए। फिर उसको फांसी लग गई। उसने सौदा किया था सौ रुपए में। वे जो लोग आए थे, जूता छाप साबुन बनाने वाले लोग थे। वह यही कर रहा था। वे कहते थे, बीस ले लो; पच्चीस ले लो। बामुश्किल सौ पर तय हुआ था मामला। मरता हुआ आदमी! वे सौ रुपए जेब में पड़े मिले। लेकिन वह आखिरी क्षण भी धंधा कर गया! उस वक्त भी वह पचास पर राजी न हुआ; अस्सी पर राजी न हुआ। उसने कहा, सौ से कम में तो मैं मानूंगा ही नहीं!
जिंदगीभर की आदत आखिरी क्षण तक भी पीछा करती है। जिन्होंने जीवनभर शरीर को ही स्मरण किया हो, वे मरते वक्त उस अशरीर को कैसे स्मरण कर सकेंगे? मरते वक्त आदमी को पहचाना जा सकता है कि असल में यह आदमी क्या था।
मौत का कोई रिहर्सल आप नहीं कर सकते, यह दिक्कत है। इसलिए अभ्यास नहीं कर सकते। यह बड़ी खराबी है। पहली ही दफे नाटक में सीधे खड़ा हो जाना पड़ता है। यह भी पता नहीं होता कि कौन-सा डायलाग बोलना है। कौन हैं, यह भी पता नहीं होता है, कि राम हैं, कि लक्ष्मण हैं, कि सीता हैं, कि रावण हैं। बस, अचानक पर्दा उठता है और खड़े हैं मंच पर! और पहली ही दफे बोलना पड़ता है। उसका कोई पता ही नहीं होता।
मौत की चूंकि पुनरुक्ति नहीं है; अचानक आती है, आकस्मिक है, उसकी पहले से कोई तैयारी नहीं हो सकती, इसलिए आपकी तैयारी वाला काम काम नहीं आएगा। वह तैयारी की व्यवस्था मौत तोड़ ही देगी। जिसे अभ्यास से पाया था, जिस स्मरण को, मौत के वह काम नहीं पड़ेगा। जिसे हृदय से पाया हो, तो बात अलग है। हृदय से पाना अभ्यास से पाना नहीं है।
लगातार हो रहे असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए । कभी कभी गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल देती है ।
मुल्ला नसरुद्दीन ने पहली ही शादी की। पंद्रह या बीस दिन हुए होंगे, पत्नी बहुत उदास है और अपनी किसी सहेली से कह रही है कि बहुत मुश्किल हो गई। कल ही मुझे पता चला कि नसरुद्दीन शराब पीता है। सहेली ने पूछा, क्या कल वह शराब पीकर आ गया था? उसकी पत्नी ने कहा, नहीं, कल वह बिना पीए आ गया। नहीं तो पता ही न चलता। शादी के पहले उससे मिलती थी, तब भी वह रोज पीए रहता था। तो मैं समझी कि यही उसका ढंग है। शादी के बाद भी पंद्रह दिन वह पीए रहता था, तो मैं समझी कि यही उसका ढंग है। कल वह बिना पीए आ गया और उलटी-सीधी बातें करने लगा। तब शक हुआ। मैंने पूछा कि क्या शराब पीकर आ गए हो? ऐसी बात तो तुम कभी नहीं करते। उसने कहा, क्षमा करना, आज मैं पीना भूल गया हूं।
एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में एक बड़ी अनूठी घटना घटी। उस प्रयोगशाला में सभी तरह के जहर, पायजन मौजूद थे। उन्हीं का अध्ययन उस प्रयोगशाला का लक्ष्य था। फिर उस प्रयोगशाला में बहुत से चूहे बढ़ गए। उन चूहों को मारने के लिए बहुत उपाय किए। लेकिन मारना आसान न हुआ। क्योंकि जो भी जहर डाला जाता, चूहे उसे खाने के पहले से ही आदी थे। चूहे इम्यून हो गए थे। जहर ही जहर थे प्रयोगशाला में। जहर डाला जाता, चूहे मरते तो न, जहर खा जाते। उसे भोजन बना लेते।
तब किसी ने सुझाव दिया कि पुराना ही रास्ता अख्तियार करना ठीक है। चूहे पकड़ने की जो पुरानी व्यवस्था है, चूहे की जाली, उसी में उनको फांसना उचित होगा। चूहे की जालियां लायी गयीं, उनमें चीज के टुकड़े डाले गए, रोटी के टुकड़े डाले गए। लेकिन चूहों ने कोई ध्यान न दिया। वे जहर खाने के इतने आदी हो गए थे कि रोटी और चीज उन्हें जंची ही नहीं। एक भी चूहा न फंसा।
तब किसी ने सुझाव दिया कि अब एक ही उपाय है कि चीज और रोटी के ऊपर जहर की पर्त लगा दो, तभी ये चूहे जाल में फंसेंगे। यही किया गया। और रास्ता कामयाब सिद्ध हुआ। चीज पर और रोटी के टुकड़ों पर जहर लगा दिया गया। जहर के कारण चूहे जाल के भीतर गए और फंसे।
अनुपात
कथा :
एक ईसाई फकीर मरकर स्वर्ग पहुंचा। द्वार पर ही सेंट पीटर उसे मिले। तो उस फकीर ने कहा, मैंने बड़ी-बड़ी बातें स्वर्ग के संबंध में सुनी हैं। मैं सदा फकीर रहा; कौड़ी-कौड़ी मांगकर जीया। मैंने सुना है कि स्वर्ग की एक कौड़ी भी, एक पाई भी पृथ्वी के अरबों-खरबों रुपयों के बराबर होती है। सेंट पीटर ने कहा, तुमने ठीक ही सुना है। तो उस फकीर ने कहा, क्या कृपा करके एक छोटी-सी पाई मुझे उधार न दे सकेंगे!
फकीर ने सोचा कि एक पाई अगर अरबों-खरबों रुपयों के बराबर होती है और एक पाई देने से सेंट पीटर जैसा भला आदमी क्या इनकार करेगा। सेंट पीटर ने कहा, जरूर दूंगा। लेकिन एक क्षण ठहर जाओ।
दिन बीतने के करीब आ गया। फकीर द्वार पर बैठा रहा। सांझ होने लगी। उसने कहा, एक क्षण कितना लंबा होता है यहां? सेंट पीटर ने कहा, पृथ्वी के अरबों-खरबों बरसों के बराबर। क्योंकि जब पाई अरबों-खरबों के बराबर होगी, तो क्षण भी अरबों-खरबों बरसों के बराबर होगा। अनुपात वही होता है।
अनुपात वही होता है। एक आदमी के पास एक कौड़ी है और एक आदमी के पास एक करोड़ रुपए हैं, तो आप यह मत समझना कि करोड़ रुपए वाले की आसक्ति ज्यादा होगी और एक कौड़ी वाले की आसक्ति कम होगी। नहीं, इस भूल में मत पड़ना। आसक्ति का अनुपात वही होगा। एक कौड़ी पर भी उतनी ही होगी, करोड़ रुपए पर भी उतनी ही होगी।
इसे ऐसा समझें। एक आदमी एक घर से एक कौड़ी चुरा लाता है, और एक आदमी एक लाख रुपए चुरा लाता है। क्या लाख रुपए वाले की चोरी ज्यादा होगी? निश्चित ही जो रुपए गिनते हैं, वे कहेंगे, हां। लाख रुपए की चोरी लाख रुपए की चोरी है, और कौड़ी की चोरी कौड़ी की चोरी है।
लेकिन चोरी तो बराबर है। चोरी में कोई भेद पड़ता नहीं। कौड़ी की चोरी उतनी ही चोरी है, जितनी लाख की चोरी चोरी होती है। चोरी में कोई अंतर नहीं पड़ता। क्या चुराया, यह गौण है। चुराया, यही महत्वपूर्ण है। अनुपात वही होता है।
यदि आप मानसिक शांति के बदले में साम्राज्य भी प्राप्त करते हैं तो भी आप पराजित ही हैं ।
राज
कथा :
एक सूफी फकीर हुआ है, बायजीद। एक धनपति उसके पीछे पड़ा है। रोज उसके पैर दाबता है और कहता है, राज बता दो। तुम्हारे जीवन का राज बता दो। बायजीद उससे कहता है, जो राज है, अगर वह बता दिया जाए, तो राज कैसे रहेगा? सीक्रेट का मतलब ही यह है कि जिसे मैं तुझे बताऊंगा नहीं। जिसे मैंने कभी किसी को नहीं बताया। तभी तो वह राज है, अन्यथा फिर राज कैसे रहेगा?
लेकिन वह आदमी मानता ही नहीं। वर्ष बीतने को आ गया। वह है कि रोज पैर दबाए जाता है। वह कहता है बायजीद को कि बता दो राज। तो बायजीद ने एक दिन कहा कि तो ठीक है, आज बताए देता हूं, लेकिन एक शर्त रहेगी। क्या तुम मेरे राज को राज रखोगे? किसी को बताओगे नहीं?
उस आदमी ने कहा, कसम परमात्मा की कि राज को राज रखूंगा और किसी को बताऊंगा नहीं। बायजीद ने कहा, शाबाश, अगर तू अपनी कसम रख सकता है, तो मैं भी अपनी कसम रखूंगा और राज को बताऊंगा नहीं। और अगर मैं ही तोड़ दूंगा, तो तेरा कैसे भरोसा करूं कि तू नहीं बताएगा!
यदि आप अपने आप से मिलें, तो क्या आप अपने को पसंद करेंगे?
अभेद
कथा :
कबीर के घर रोज बहुत लोग इकट्ठे होते थे। वे रोज उन्हें भोजन करा देते। कबीर का बेटा मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा, हम पर कर्ज होता चला जाता है। रोज लोग आते हैं, आप रोज उनसे जाते वक्त कहते हैं, भोजन कर जाओ। वे भजन-कीर्तन करने आते हैं, उनको जाने दें, भोजन के लिए मत रोकें। कबीर रोज कहते कि कल खयाल रखूंगा। कल फिर वही भूल होती। लोग भजन-कीर्तन करने सुबह आते, और जब जाने लगते, तो कबीर कहते, भोजन तो कर जाओ!
आखिर एक दिन उसके बेटे ने कहा कि अब यह असंभव है और आगे खींचना। क्या मैं चोरी करने लगूं? कर्ज बढ़ता चला जाता है!
तो कबीर एकदम आनंदित हो गए और उन्होंने कहा, पागल, अगर चोरी से यह हल हो सकता था, तो तूने पहले क्यों न सोचा? कमाल तो थोड़ा दिक्कत में पड़ा, उनका बेटा तो दिक्कत में पडा। समझा उसने कि शायद कबीर समझ नहीं पाए कि मैंने क्या कहा, चोरी! उसने कहा, आप समझे भी! सुना भी! मैं कह रहा हूं क्या मैं चोरी करने लग? कबीर ने कहा, बिलकुल समझा। लेकिन इतने दिन से तेरी बुद्धि कहां गई थी?
कमाल ने कहा, अब बात को आखिर तक ही खींचना पड़ेगा। कमाल था बेटा, और कमाल का ही बेटा था। कबीर ने उसे नाम दिया था और अदभुत बेटा था। उसने कहा, तो फिर ठीक है। तो आज मैं चोरी को जाता हूं।
रात उठा, आधी रात, और उसने कहा, मैं जा रहा हूं। आशा है? आशीर्वाद है? कबीर ने कहा कि प्रभु तेरी सब भांति सहायता करें। कमाल केवल कबीर की परीक्षा ले रहा है कि बात कहो तक जाती है! हद्द इसकी कहा है! कमाल ने कहा, लेकिन अकेला शायद सामान ज्यादा चुरा लूं र तो लाने में दिक्कत हो। क्या आप भी साथ चलने को तैयार हैं? कबीर ने कहा, अब तो नींद टूट ही गई। चलो, चला चलता हूं।
तब कमाल की बेचैनी बहुत बढ़ने लगी। यह क्या हो रहा है। कबीर! और चोरी को जा रहा है! पर कमाल ही था, उसका बेटा ही था, उसने कहा, इतनी जल्दी छुटकारा ठीक नहीं। बात पूरे लाजिकल एंड, तर्क के अंत तक ले जानी जरूरी है, तभी शायद पहचान हो पाए कि यह मजाक है या गंभीरता है।
जाकर उसने सेंध लगाई। कबीर पास खड़ा रहा। सेंध लगाते वक्त उसका हाथ कंपता था। कभी चोरी की नहीं। कभी चोरी का सोचा नहीं। लेकिन कबीर ने उससे कहा, तेरा हाथ क्यों कंपता है? चोरी ही कर रहे हैं न, कुछ बुरा तो नहीं कर रहे! कबीर के बेटे ने अपने सिर पर हाथ ठोंक लिया। उसने कहा, हद्द हो गई! चोरी ही कर रहे हैं, कुछ बुरा तो नहीं कर रहे हैं! अब बुरा और क्या होता है? कबीर ने कहा, यह हाथ का कंपना बहुत बुरा है। जब चोरी कर रहे हैं, तो पूरी कुशलता से करनी चाहिए।
योग कर्म की कुशलता है, हाथ न कंपे।
फिर कमाल भीतर गया, और एक बोरा गेहूं खींचकर बाहर लाया। कबीर ने उसे खींचने में सहायता दी । और जब कमाल उसे अपने कंधे पर रखने लगा, उठाने लगा, तो कबीर ने कहा, रुक । घर के लोगों को बता आया कि नहीं ? घर के लोगों को जाकर कम से कम कह दे कि हम एक बोरा चुराकर लिए जा रहे हैं! कमाल ने कहा, यह चोरी हो रही है या क्या हो रहा है !
और जब कमाल ने कबीर से पूछा कि इस सबका मतलब क्या है? तो कबीर ने कहा कि जब से हम न रहे, वही रह गया, तो अब किसकी चोरी, और कौन करे! और कौन दान दे और कौन ले ? उसी का माल है । वही वहाँ सोते सोच रहा है कि मेरा है । मैं भी उसी का। वही मेरे भीतर कह रहा है कि ले चलो । वही सुबह कीर्तन करने आएगा । उससे कैसे कहूं कि बिना भोजन किए जाओ? सभी उसका है ।
इस तल पर उठ जाने की भी संभावना है तत्वविद की ।
अति विचार आपको बर्बाद करता है, स्थिति को बर्बाद करता है, बात को उलझाता है, आपको चिंता में डाल देता है और सब कुछ जितना मुश्किल है नहीं उससे अधिक मुश्किल कर देता है ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक कब्रिस्तान से निकलता था और एक कब्र पर उसने एक तख्ती लगी देखी । चौंक कर खड़ा हो गया, अपने साथी से कहा कि नहीं-नहीं, यह नहीं हो सकता । साथी ने पूछा, क्या नहीं हो सकता? उसने कहा, यह जो तख्ती लगी है कब्र पर कि यहां एक ईमानदार वकील सोते हैं । इतनी छोटी कब्र में दो बन ही नहीं सकते ।
बॉब मारले - पैसा एक संख्या है और संख्या का कोई अंत नहीं है; अगर पैसे से ही सुख मानते हो तो सुख की खोज कभी पूरी नहीं होगी ।
कसौटी
कथा :
प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्ध था। सुकरात के पास एक दिन उसका एक परिचित व्यक्ति आया और बोला -- मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है । यह सुनते ही सुकरात ने कहा, -- दो पल रूकें! मुझे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि हम एक छोटा सा परीक्षण कर लें जिसे मैं 'तीन कसौटियों का परीक्षण' कहता हूँ।
'तीन कसौटियाँ? कैसी कसौटियाँ?', परिचित ने पूछा।
'हाँ', सुकरात ने कहा, 'मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि आप कैसी बात कहने जा रहे हैं, इसलिए किसी भी बात को जानने से पहले मैं इन कसौटियों से परीक्षण करता हूँ।
इसमें पहली कसौटी सत्य की कसौटी है। क्या आप सौ फीसदी दावे से यह कह सकते हो कि जो बात आप मुझे बताने जा रहे हो वह पूर्णतः सत्य है?
'नहीं', परिचित ने कहा, 'दरअसल मैंने सुना है कि…'
'ठीक है', सुकरात ने कहा, 'इसका अर्थ यह है कि आप आश्वस्त नहीं हो कि वह बात पूर्णतः सत्य है। चलिए, अब दूसरी कसौटी का प्रयोग करते हैं जिसे मैं अच्छाई की कसौटी कहता हूँ।
मेरे मित्र के बारे में आप जो भी बताने जा रहे हो क्या उसमें कोई अच्छी बात है?
'नहीं, बल्कि वह तो…', परिचित ने कहा.
'अच्छा', सुकरात ने कहा, 'इसका मतलब यह है कि आप मुझे जो कुछ सुनाने वाले थे उसमें कोई भलाई की बात नहीं है और आप यह भी नहीं जानते कि वह सच है या झूठ। लेकिन हमें अभी भी आस नहीं खोनी चाहिए क्योंकि आखिरी यानि तीसरी कसौटी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है; और वह है उपयोगिता की कसौटी।
जो बात आप मुझे बतानेवाले थे, क्या वह मेरे किसी काम की है?'
'नहीं, ऐसा तो नहीं है', परिचित ने असहज होते हुए कहा।
'बस, हो गया', सुकरात ने कहा, 'जो बात आप मुझे बतानेवाले थे वह न तो सत्य है, न ही भली है, और न ही मेरे काम की है, तो मैं उसे जानने में अपना कीमती समय क्यों नष्ट करूं?'
अल्बर्ट आइंस्टीन -- महान आत्माओं को हमेशा सामान्य मन से हिंसक विरोध का सामना करना पड़ता है ।
पुरुष
कथा :
वृंदावन के मंदिर के पुजारी ने नियम ले रखा था कि किसी स्त्री को मंदिर में प्रवेश नहीं करने देगा। मीरा जब नाचती हुई उस मंदिर के द्वार पर पहुंच गई, तो द्वार बंद कर दिए गए। और लोगों ने खबर दी कि मंदिर के पुजारी जो हैं, गोस्वामी जो हैं, वे स्त्री को भीतर प्रवेश नहीं करने देते हैं, आप लौट जाएं। मीरा ने कहा, इतनी खबर पुजारी तक पहुंचा दो, मैं तो सोचती थी कि जगत में केवल एक ही पुरुष है, कृष्ण। गोस्वामी भी पुरुष हैं? उनसे इतना पूछ आएं।
द्वार खुल गए। गोस्वामी मीरा के चरणों में गिर पड़ा। क्योंकि गोस्वामी को संदेश मिल गया। गोस्वामी को खयाल आ गया कि भक्त होकर कृष्ण का, वह पुरुष कैसे हो सकता है? एक आत्मिक तल पर कृष्ण पुरुष हो गए और गोस्वामी उनका भक्त है, तो स्त्रैण हो गया।
अनासक्त
कथा :
बुद्ध ने कहा है कि गुजरता था एक नदी के किनारे से। बच्चों को रेत के घर बनाते देखा, रुककर खड़ा हो गया। इसलिए खड़ा हो गया कि बच्चे भी रेत के घर बनाते हैं और के भी। थोड़ा इनके खेल को देख लूं। रेत के ही घर थे। हवा का झोंका आता, कोई घर खिसक जाता। किसी बच्चे का धक्का लग जाता, किसी का घर गिर जाता। किसी का पैर पड़ जाता, किसी का बना-बनाया महल जमीन पर हो जाता। बच्चे लड़ते, गाली देते, एक-दूसरे को मारते। किसी ने किसी का घर गिरा दिया हो, तो झगड़ा तो सुनिश्चित है। सारे झगड़े ही घरों के हैं। किसी का धक्का लग गया, किसी का घर गिर गया। किसी ने बड़ी मुश्किल से तो आकाश तक पहुंचाने की कोशिश की थी; और किसी ने चोट मार दी, और सब जमीन पर गिर गया!
तो बुद्ध खड़े होकर देखते रहे। बच्चे एक-दूसरे से लड़ते रहे। झगड़ा होता रहा। फिर सांझ होने लगी। फिर सूरज ढलने लगा। फिर किसी ने नदी के किनारे आकर जोर से आवाज लगाई कि तुम्हारी माताएं तुम्हारी घर राह देख रही हैं; अब घर जाओ! जैसे ही बच्चों ने यह सुना, अपने ही बनाए हुए घरों पर कूद-फांद करके, उनको गिराकर, वे घर की तरफ चल पड़े।
बुद्ध खड़े थे, देखते रहे। उन्होंने कहा, जिस दिन हम अपने सारे जीवन को रेत के खेल जैसा समझ लें, और जिस दिन खयाल हमें आ जाए कि अब यह खेल समाप्त हुआ, पुकार आ गई वहां से असली घर की, अब उस तरफ चलें, तो उस दिन हम भी इनको गिराकर इसी तरह चले जाएंगे। अभी लड़ रहे थे कि मेरे घर को गिरा दिया, अब खुद ही गिराकर भाग गए हैं!
बच्चे जैसे रेत के घर बनाकर खेल खेल रहे हों, वैसे ही जब कोई व्यक्ति जीवन को खेल बना ले, तो अनासक्त हो जाता है। परमात्मा के लिए जीवन एक खेल है।
सोचने से सिर्फ पुराने के नये संयोग बनते हैं। कभी कोई नया उपलब्ध नहीं होता।
लाओत्से एक नदी के किनारे बैठा हुआ है। सम्राट ने किसी को भेजा है कि लाओत्से को खोज लाओ! सुनते हैं बहुत बुद्धिमान आदमी है। तो हम उसे अपना वजीर बना लें। वह आदमी गया है। बामुश्किल तो लाओत्से को खोज पाया। क्योंकि जहां-जहां लोगों से पूछा, उन्होंने कहा कि लाओत्से को खुद ही पता नहीं होता कि कहां जा रहा है। जहां पैर ले जाते हैं चला जाता है। तो पहले से तो वह खुद भी नहीं बता सकता कि कहां जाएगा। इसलिए बताना मुश्किल है। लेकिन फिर भी खोजो, कहीं न कहीं होगा। क्योंकि सुबह यहां दिखाई पड़ा है। इस गांव में वह था। कहीं बहुत दूर नहीं निकल गया होगा। दूर इसलिए भी नहीं निकल गया होगा, क्योंकि तेजी से वह चलता ही नहीं है। क्योंकि जाना ही नहीं है कहीं, पहुंचना ही नहीं है कहीं। तो कहीं दूर नहीं गया होगा, मिलेगा आसपास।
खोजा है तो वह नदी के किनारे बैठा हुआ था। उन्होंने जाकर उसको कहा कि अच्छा हुआ मिल गए, हम बडी मुश्किल गांव-गांव खोजते फिर रहे हैं। सम्राट ने बुलाया है। कहा है कि वजीर का पद लाओत्से सम्हाल ले। लाओत्से चुपचाप बैठा रहा। फिर उसने कहा, देखते हो उस कछुए को! एक कछुआ वहां कीचड़ में मजा कर रहा है। उन्होंने कहा, देखते हैं। तो लाओत्से ने कहा, हमने सुना है कि तुम्हारे सम्राट के घर एक सोने का कछुआ है। उसकी पूजा होती है। कभी कोई कछुआ कई पीढ़ियों पहले किसी कारणवश उस परिवार में पूज्य हो गया था। उस पर सोने की खोल चढ़ाकर उसको बड़े उससे रखा गया है। क्या यह सच है? तो उन्होंने कहा, यह सच है। सोने की खोल मढ़ा हुआ वह कछुआ परम आदरणीय है। सम्राट स्वयं उसके सामने सिर झुकाते हैं। तो लाओत्से ने कहा, बस मैं यह तुमसे पूछता हूं -- अगर तुम इस कछुए से कहो कि हम तुझे सोने से मढ़कर और सुंदर बहुमूल्य पेटी में बंद करके पूजा करेंगे, तो यह कछुआ सोने से मढ़ा जाना पसंद करेगा कि यहीं कीचड़ में लोटना पसंद करेगा? उन्होंने कहा, कछुआ तो कीचड में लोटना ही पसंद करेगा। तो लाओत्से ने कहा, हम भी पसंद करेंगे। नमस्कार! तुम जाओ। जब कछुआ तक इतना बुद्धिमान है, तो तुम लाओत्से को ज्यादा बुद्धिहीन समझे हो कछुए से! तुम जाओ। तुम्हारा वजीर होना हमारे काम का नहीं है। असल में, लाओत्से ने कुछ भी होना बंद कर दिया अब। लाओत्से जो है वह है।
गालिब -- दिले-नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
आशा
कथा :
उमर खय्याम ने अपने एक गीत की कड़ी में कहा है कि मैंने लोगों को दुख झेलते देखा और फिर भी जीते देखा! लोगों को पीड़ा पाते देखा और फिर भी जीवेषणा से भरा देखा, तो मैं बहुत चिंतित हुआ। इतना दुख है कि समस्त मनुष्य-जाति को आत्महत्या कर लेनी चाहिए। दुख इतना है कि जीवन कभी का असंभव हो जाना चाहिए था। लेकिन जीवन असंभव नहीं होता। दुखी से दुखी व्यक्ति भी जीए चला जाता है।
तो उमर खय्याम ने कहा है कि मैंने पूछा ज्ञानियों से, बुद्धिमानों से, लेकिन कोई उत्तर न पाया। क्योंकि उन ज्ञानियों और बुद्धिमानों को भी मैंने दुख में ही पड़े हुए देखा। और उनके दरवाजे पर, उनके मकान पर, मैं जिस दरवाजे से प्रवेश किया, सब चर्चा के बाद उसी दरवाजे से मुझे वापस आ जाना पड़ा, वही का वही। कोई उत्तर हाथ न आया। सब जगह से निराश होकर एक दिन मैंने आकाश से पूछा कि जमीन पर इतने लोग रह चुके हैं अरबों-अरबों, न मालूम कितने कालों से! आकाश, तूने सबको देखा है। सब दुख में जीए। क्या तू मुझे बता सकता है कि उनके जीने का राज क्या है? सीक्रेट क्या है? इतना दुख, फिर भी आदमी जीए क्यों चला जाता है?
तो उमर खय्याम ने कहा है, आकाश ने एक ही शब्द उच्चारा, आशा, होप। एक ही छोटा-सा शब्द, आशा।
जिस दिन भी तुम जागोगे, उस दिन तुम्हें लगेगा कि अब तक का सारा जीवन व्यर्थ गया। और यह इतनी पीड़ा देती है बात, कि मेरा सारा जीवन व्यर्थ गया, कि बेहतर है इसको छिपाये ही रखो। इसलिए लोग सत्य की तरफ जाने से बचते हैं।
एक दिन मैं मुल्ला नसरुद्दीन के घर गया। दरवाजा खुला था। तो मैंने देखा कि वह दीवाल से कान लगा कर कुछ सुन रहा है। पड़ोसी की दीवाल। उस तरफ पड़ोसी है। वह इतनी लवलीनता से सुन रहा था, ऐसा लीन था, कि उसे पता ही नहीं चला कि मैं ठीक कमरे में आ गया। तो मैंने उससे पूछा कि नसरुद्दीन, क्या सुन रहे हो? उसने हाथ से इशारा किया कि आप भी सुनो। मैंने भी कान दीवाल से लगाया। मुझे कुछ सुनाई न पड़ा। मिनिट, दो मिनिट...मैंने कहा नसरुद्दीन, कुछ सुनाई नहीं पड़ता। वह हंसने लगा। उसने कहा, समझा क्या है? चालीस साल से मैं सुन रहा हूं, कुछ सुनाई न पड़ा, तुम्हें दो मिनट में सुनाई पड़ जायेगा?
धर्म की तरफ आंख मुड़ते ही यह दीवाल छोड़नी पड़ती है। क्योंकि तुम्हें साफ दिखाई पड़ता है, यह मूढ़तापूर्ण है। और बड़ा कष्ट होता है यह जानकर कि चालीस साल से तुम यह मूर्खता कर रहे थे।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने चिकित्सक के पास गया। नब्बे वर्ष उसकी उम्र थी। जीर्ण-शीर्ण उसका शरीर हो गया था। आंखों से ठीक दिखाई भी नहीं पड़ता था। हाथ से लकड़ी टेक-टेक बामुश्किल चल पाता था। अपने चिकित्सक से उसने कहा कि मैं बड़ी दुविधा में और बड़ी मुश्किल में पड़ा हूं। कुछ करें। चिकित्सक ने पूछा कि तकलीफ क्या है? नसरुद्दीन ने कहा कि संकोच होता है कहते, लेकिन अपने चिकित्सक को तो बात कहनी ही पड़ेगी। मैं अभी भी स्त्रियों का पीछा करता हूं। इतना बूढा हो गया हूं अब यह कब रुकेगा? मैं अभी भी स्त्रियों का पीछा कर रहा हूं। आंखों से दिखाई नहीं पड़ता, पैरों से चल नहीं सकता, लेकिन स्त्रियों का पीछा करता हूं!
उसके चिकित्सक ने कहा, नसरुद्दीन, चिंता मत करो। यह कोई बीमारी नहीं है। यह तुम्हारे स्वस्थ होने का प्रतीक है कि अभी भी तुम जिंदा हो नब्बे साल में! इससे तुम्हें दुखी नहीं होना चाहिए। नसरुद्दीन ने कहा कि वह मेरा दुख भी नहीं है। तुम फिर गलत समझे। तकलीफ यह है कि मैं स्त्रियों का पीछा तो करता हूं लेकिन यह भूल गया हूं कि पीछा क्यों कर रहा हूं। अगर स्त्री को पकड़ भी लिया, तो करूंगा क्या!
अशांति के कारण खो जाएं, तो आदमी शांत हो जाता है। शांति के कारण खोजने की जरूरत ही नहीं है। शांति मनुष्य का स्वभाव है।
मेरे गांव में मेरे मकान से कोई चार सौ कदम की दूरी पर एक वृक्ष है। चार सौ कदम काफी फासला है। और मकान में जो नल का पाइप आता है, वह अचानक एक दिन फूट पड़ा, तो जमीन खोदकर पाइप की खोजबीन करनी पड़ी कि क्या हुआ! चार सौ कदम दूर जो वृक्ष है, उसकी जड़ें उस पाइप की तलाश करती हुई पाइप के अंदर घुस गई थीं, पानी की खोज में।
वैज्ञानिक कहते हैं कि वृक्ष बड़े हिसाब से अपनी जडें पहुंचाते हैं—कहां पानी होगा? चार सौ कदम काफी फासला है और वह भी लोहे के पाइप के अंदर पानी बह रहा है। लेकिन वृक्ष को कुछ पकड़ है। उसने उतने दूर से अपनी जड़ें पहुंचाईं। और ठीक उन जड़ों ने आकर अपना काम पूरा कर लिया, कसते—कसते उन्होंने पाइप को तोड़ दिया लोहे के। वे अंदर प्रवेश कर गईं और वहां से पानी पी रही थीं; वर्षों से वे उपयोग कर रही होंगी।
वृक्ष को भी पता नहीं कि वह क्यों जीना चाहता है। अफ्रीका के जंगल में वृक्ष काफी ऊंचे जाते हैं। उन्हीं वृक्षों को आप यहां लगाएं, उतने ऊंचे नहीं जाते। ऊंचे जाने की यहां कोई जरूरत नहीं है। अफ्रीका में जंगल इतने घने हैं कि वैज्ञानिक कहते हैं, जिस वृक्ष को बचना हो, उसको ऊंचाई बढ़ानी पड़ती है। क्योंकि वह ऊंचा हो जाए, तो ही सूरज की रोशनी मिलेगी। अगर वह नीचा रह गया, तो मर जाएगा।
वही वृक्ष अफ्रीका में ऊंचाई लेगा तीन सौ फीट की। वही वृक्ष भारत में सौ फीट पर रुक जाएगा। जीवेषणा में यहां संघर्ष उतना नहीं है।
वैज्ञानिक कहते हैं, जेब्रा है, ऊंट है, उनकी जो गर्दनें इतनी लंबी हो गई हैं, वह रेगिस्तानों के कारण हो गई हैं। जितनी ऊंची गर्दन होगी, उतना ही जानवर जी सकता है, क्योंकि इतने ऊपर वृक्ष की पत्तियों को वह तोड़ सकता। सुरक्षा है जीवन में, तो गर्दन बड़ी होती चली गई है।
चारों तरफ जीवन का बचाव चल रहा है। छोटी—सी चींटी भी अपने को बचाने में, खुद को बचाने में लगी है। बड़े से बड़ा हाथी भी अपने को बचाने में लगा है। हम भी उसी दौड़ में हैं।
पहली बात, आंख खोलकर देखना जरूरी है, सजग होना जरूरी है कि जीवन क्या दे रहा है! फिर दूसरी बात, देखना जरूरी है कि मिल तो कुछ भी नहीं रहा और जीवन रोज मौत में उतरता जा रहा है। और आज नहीं कल मैं मरुंगा।
चीन का एक बहुत बड़ा कथाकार हुआ, स्लम। उसने एक छोटी—सी कहानी लिखी है। उसमें लिखा है कि एक युवक एक ज्योतिषी के पास ज्योतिष सीखता था। उसने अपने गुरु से एक दिन पूछा कि अगर मैं लोगों को सत्य—सत्य कह देता हूं उनकी हाथ की रेखाएं पढ़कर, तो पिटाई की नौबत आ जाती है। झूठ मैं कहना नहीं चाहता। झूठ कहता हूं तो लोग बड़े प्रसन्न होते हैं।
एक घर में बच्चे का जन्म हुआ। लोगों ने मुझे बुलाया। तो मैंने देखकर उनको बताया, झूठ बोला, कि महायशस्वी होगा। सभी मां—बाप को भरोसा होता है; सभी बच्चे प्रतिभाशाली की तरह पैदा होते हैं। सभी मां—बाप को भरोसा होता है कि इसका तो कोई मुकाबला नहीं।
महायशस्वी होगा, बड़ा प्रतिभाशाली है। धन्यभाग हैं तुम्हारे। वे लोग बड़े खुश हुए, उन्होंने काफी भेंट दी, शाल ओढ़ाई, भोजन कराया, सेवा की।
मगर मैं झूठ बोला था, तो उससे मेरे मन में चोट पड़ती रही। दूसरे घर में बच्चा पैदा हुआ, तो मैंने सत्य ही कह दिया कि बाकी तो और कुछ पक्का नहीं है, लेकिन यह एक दिन मरेगा, इतना भर पक्का है। तो मेरी वहां पिटाई हुई। लोगों ने मुझे मारा और कहा कि तुम ज्योतिष तो दूर, तुम्हें शिष्टाचार का भी पता नहीं!
तो उसने अपने गुरु से पूछा कि आप मुझे कुछ रास्ता बताएं। झूठ भी मुझे न बोलना पड़े और पिटाई की नौबत भी न आए। क्योंकि अब यह धंधा मैंने स्वीकार कर लिया है ज्योतिष का।
तो उसके गुरु ने कहा, अगर ऐसा अवसर आ जाए तो मैं तुम्हें अपना सार बता देता हूं जीवनभर का, जो मैं करता हूं। अगर झूठ भी न बोलना हो और पिटना भी न हो, तो तुम कहना, वाह—वाह, क्या बच्चा है! ही—ही—ही। तुम कुछ वक्तव्य मत देना, तो तुम झूठ बोलने से भी बचोगे और पिटाई भी नहीं होगी।
सभी होशियार ज्योतिषी आपको देखकर यही करते हैं।
मृत्यु के पार जाना हो, तो जीवन की इच्छा को छोड़ देना जरूरी है। यह बात कुछ उलटी प्रतीत होती है। जीवन निश्चित ही काफी जटिल है और विरोधाभासी है, पैराडाक्सिकल है।
एक अंगूर के बगीचे के मालिक ने, अंगूर पक गए हैं, सुबह-सुबह कुछ मजदूर बुलाए। अंगूरों को तोड़ना है। अब ज्यादा देर अंगूरों को छोड़ा नहीं जा सकता, अन्यथा वे सड़ जाएंगे, अन्यथा अपने-आप गिरने लगेंगे। लेकिन वे मजदूर कम थे। दोपहर उसने और मजदूर बुलाए। वे भी कम पड़े। सांझ उसने और मजदूर बुलाए । सांझ को जो मजदूर आए, वे तो ऐसे समय आए जबकि दीए जलने का समय होने लगा था, अंधेरा उतरने लगा था। काम बंद कर रहे थे और मजदूर। फिर उसने सारे मजदूर इकट्ठे किए और सबको बराबर-बराबर तनख्वाह बांट दी। स्वभावतः जो सुबह आए थे, खिन्न हुए, नाराज हुए। आखिर आदमी थे! तुम होते तो तुम भी नाराज होते। उन्होंने कहा कि यह कैसा अन्याय है, हम सुबह से खून-पसीना कर रहे हैं, हमें भी उतनी ही तनख्वाह; जो दोपहर आए, आधे दिन काम किया उनको भी उतनी तनख्वाह! और यह भी हम बर्दाश्त कर लेते, मगर जो अभी-अभी आए, जिन्होंने काम किया ही नहीं, उन्हें भी उतनी ही तनख्वाह! अन्याय की भी कोई सीमा होती है!
वह मालिक हंसने लगा। उसने कहा: 'तुमसे एक बात पूछूं। मैंने तुम्हें जो दिया है वह तुम्हारी मजदूरी से कम है?'
उन्होंने कहा कि नहीं, हमारी मजदूरी से तो ज्यादा है। जितना हमने मांगा था सुबह, उससे तो दो गुना है।
उस मालिक ने कहा: 'तुम उसके लिए मुझे धन्यवाद नहीं दे रहे कि मैंने तुम्हें दो गुना दिया। फिर यह संपत्ति मेरी है, मैं किसी को लुटाऊं, तुम्हें शिकायत कैसी? तुम हो कौन? जो दोपहर आए, उनको भी मैंने उतना दिया और जो अभी-अभी आए जिन्होंने काम किया नहीं, उनको भी उतना दिया--इसलिए नहीं कि वे पात्र हैं, इसलिए नहीं कि उन्होंने श्रम किया है, बल्कि इसलिए कि मेरे पास बहुत है। मेरे पास देने को बहुत है। मैं तलाश करता हूं कि किसको दूं। जो मिल जाता है। उसको देता हूं। मैं अपने आधिक्य से देता हूं।'
जीसस कहते थे: परमात्मा ने तुम्हें दिया है अपने आधिक्य से। उसके पास जरूरत से ज्यादा है। उसके पास इतनी आंखें हैं, सो तुम्हें आंखें दे दी, अन्यथा तुम्हारी कोई पात्रता न थी। उसके पास इतना जीवन है कि तुम्हें जीवन दिया, अन्यथा तुम्हारी कोई योग्यता न थी। उसके पास इतना प्रेम है कि तुम्हें प्रेम की क्षमता दी, अन्यथा तुम्हारी कोई योग्यता न थी। उसके पास इतना प्रेम है कि तुम्हें प्रेम की क्षमता दी, अन्यथा तुमने इसे अर्जित न किया था। मगर कोई धन्यवाद नहीं, उल्टी शिकायत ? महत्त्वाकांक्षा शिकायत सिखाती है।
Life is a due-drop
Yes I am convinced perfectly -- life is a due drop
and yet, and yet...
निश्चित ही जीवन एक ओस का कण है
और मैं पूर्णतया सहमत हूं कि जीवन एक ओस का कण है
फिर भी, फिर भी...
कोलंबस भारत की खोज में निकला था। तीन बड़ी नावें लेकर--कोई सौ नाविक लेकर। कोई तीन महीने के भोजन का इंतजाम था। ज्यादा से ज्यादा जितना भोजन ले जा सकता था, साथ ले लिया था। लेकिन भोजन चुकने के करीब आ गया। केवल तीन दिन का भोजन बचा। नाविक क्रोध से भर गए। मंजिल कहीं पहुंचती मालूम नहीं होती। यात्रा भटक गई लगती है। सिर्फ सागर, सिर्फ सागर--कोई कूल-किनारा दिखाई नहीं पड़ता है।
तो उन नाविकों ने, जब रात कोलंबस सोया था, तो एक बैठक की। और उस बैठक में तय किया कि 'हम कोलंबस को उठा कर समुद्र में फेंक दें और वापस लौट जाएं। क्योंकि यह आदमी तो मुसीबत में डाले हुए है! मरेंगे; भोजन चुक गया है। कहीं पहुंचते हुए लगते नहीं। इस आदमी ने अटका दी जिंदगी।'
कोलंबस ने सुना; वह सिर्फ बना हुआ सो रहा था। उसे भी डर था कि अब खतरा है। और जब तक कोलंबस जिंदा है, तब तक नावें वापस नहीं होंगी, यह भी नाविकों को पता है। क्योंकि कोलंबस वापस होना जानता ही नहीं; जिद्दी है, अहंकारी है। मर जाएगा, लौटेगा नहीं। क्योंकि क्या कहेगा लौटकर-अपने देश में? पहले ही लोगों ने कहा था कि तुम मूढ़ हो। किन बातों में पड़े हो? सिद्धांतों के चक्कर में आ गए हो! लोग कहते हैंः पृथ्वी गोल है। और तुमने मान लिया? और जीसस की बाइबिल तो कहती है कि पृथ्वी चपटी है। लौटने पर लोग कहेंगे, आ गए वापस! नहीं पहुंच पाए! पृथ्वी अगर गोल है, तो तुम पहुंच ही जाते! कहीं न पहुंचते, तो यहीं लौट आते।
कोलंबस जाग रहा था। जैसे ही उसने सुना कि उन्होंने तय कर लिया है--एक मत से--उसे फेंक देने का, तो वह उठा और उसने कहा, 'एक बात मुझे भी पूछनी है! वह यह कि तीन महीने का सामान था, वह समाप्त हो गया है। तीन दिन का बचा है। अगर तुम लौटे भी तो पहुंच पाओगे? क्योंकि लौटने में कम से कम तीन महीने तो लगेंगे ही। अगर तुम ठीक उसी रास्ते से लौट सको, जिससे हम आए हैं। और समुद्र में कहीं कोई रास्ता नहीं बना है। अगर तुम लौटे तो तीन दिन ही लौट पाओगे न? बाकी दिनों का क्या होगा? और जब लौट कर ही मरना है, तो आगे बढ़ने की हिम्मत रखो। जब मरना ही है, तो पीछे क्या जाना! मैं तुमसे कहता हूं कि पीछे लौटने में तो तीन महीने लगेंगे, आगे हो सकता है कि तीन दिन में ही हम पहुंच जाएं। इसकी संभावना है।'
आशा बंधी; बात तो सीधी थी; गणित साफ था। आगे शायद तीन दिन में ही पहुंच जाएं, क्योंकि पता नहीं, किनारा कितनी दूर हो। पीछे तो तीन महीने से कम में पहुंचने वाले नहीं हैं। इसलिए मौत निश्चित है। आशा बंधी; नाविक फिर श्रम में लग गए।
जैसे ही आशा बंधती है, वैसे ही तुम श्रम लग जाते हो। जैसे ही आशा छूटती है, वैसे ही तुम्हारे हाथ-पैर शिथिल हो जाते हैं। जैसे आशा छूटती है, दुख दिखाई देने लगता है। जैसे ही आशा बंधती है, सुख का स्वाद आने लगता है।
संसार आदमी को नहीं बांधे हुए है। संसार से ज्यादा जगाने वाली जगह खोजनी कठिन है। चौबीस घंटे दुख है। सब तरफ से दुख है। हर घड़ी कांटा चुभता है। लेकिन तुम यहां हो ही नहीं, जिसको कांटा चुभे। तुम आशाओं के किसी लोक में भटके हुए हो।
नासमझ दूसरे के अनुभवों से सीख नहीं सकता। नासमझ अपने अनुभवों से भी मुश्किल से सीख पाता है। समझदार अपने अनुभव के लिए नहीं रुकता है; दूसरे के अनुभव से भी वह सीख लेता है।
एक सूफी फकीर मरा और स्वर्ग में पहुंचा। देख कर हैरान हुआ कि स्वर्ग में द्वार पर ही चार लोग जंजीरों से बंधे हैं। थोड़ा चौंका कि भीतर प्रवेश करूं या न करूं! क्योंकि मैंने तो सुना थाः संसार में बंधन होते हैं! स्वर्ग में लोग जंजीरों से बंधे हैं! उसने पूछा द्वारपाल को कि 'यह क्या राज है? इन लोगों को क्यों बांधा गया है?' उसने कहा कि 'पहले तुम भीतर तो जाओ, फिर सारी बात समझ लेना। इनकी आशा टूट गई है; ये स्वर्ग में भी रुकने को राजी नहीं हैं। तुम संसार में भी रुके थे--आशा थी। इनको रोकने के लिए जंजीरें बांधनी पड़ी।
दुख को देखने की प्रक्रिया का नाम तपश्चर्या है। भूख लगी है और उस भूख को देखने का नाम उपवास है; भूखे मरने का नाम उपवास नहीं है। जब भूख लगी है, तब राम-राम, राम-राम करके अपने को उलझाए रखना, यह उपवास नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन पहली दफा समुद्र की यात्रा पर गया। उसे फिट, उल्टियां, वमन, नॉसिया पैदा हुई। वह इतना घबड़ा गया, इतना परेशान हो गया कि कप्तान जहाज का उसे समझाने आया और उसने कहा, 'सुनो नसरुद्दीन, तुम्हें मैं एक अनुभव की बात कहता हूं। तकलीफ कितनी ही हो--तकलीफ है--लेकिन पूरे मनुष्य-जाति के इतिहास में कोई भी सी-सिकनेस से मरा नहीं। यह जो तकलीफ तुम्हें हो रही है--वमन आदि की, यह सब ठीक है; लेकिन कभी कोई मरता नहीं है इससे। इसलिए घबड़ाओ मत।'
नसरुद्दीन ने छाती पीट ली। उसने कहा 'इसी एक आशा से तो हम जी रहे थे कि मरे कि झंझट मिटी। तुमने वह भी छीन ली!'
आदमी अद्भुत है। जीवन में तो आशा रखता ही है; मौत में भी आशा रखता है। इसलिए तो लोग आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या मौत से भी आशा बांधनी है। आत्महत्या का अर्थ हैः मौत से भी हम कुछ आशा रखते हैं। दुख से छुटकारा हो जाएगा; इस जिंदगी का अंत होगा। शायद इससे कुछ बेहतर शुरू हो। इससे बुरा तो कुछ हो नहीं सकता।
आत्महत्या मृत्यु से भी आशा बांधने का नाम है। और ज्ञानी कहते हैंः तुम जीवन से भी आशा छोड़ देना। और अज्ञानी कहते हैंः मृत्यु से भी तुम आशा बांधे रखना।
हमारी वैज्ञानिक शक्ति ने हमारी आध्यात्मिक शक्ति को कुचल दिया। हमारे पास guided missile तो है, लेकिन लोग mis-guided हैं। (-- मार्टिन लूथर किंग जूनियर)
किसी ने जॉन बैप्टिस्ट को पूछा कि 'तुम कौन हो?' बप्तिस्मा वाले जॉन ने ही जीसस को दीक्षा दी थी। वह जीसस का गुरु था। उसने जीसस को बप्तिस्मा दिया, इसलिए वह जॉन बप्तिस्मा वाला कहलाता था। वह अनूठा फकीर था। उससे किसी ने पूछा कि 'तुम कौन हो? क्या तुम वही मसीहा हो, जिसके आने का शास्त्रों में उल्लेख है?' उसने कहा कि 'नहीं, मैं तो सिर्फ सूने रेगिस्तान में गूंजती हुई एक आवाज हूं। जस्ट ए वायस इन वाइल्डरनेस। बस, एक आवाज--जंगल में गूंजती हुई।' बड़ा ठीक उत्तर दिया। बुद्धों की आवाज जंगल में गूंजती हुई आवाज है। कोई सुननेवाला नहीं है। लोग सुन भी लेते हैं, तो फिर, अपने रास्ते पर चले जाते हैं। उनके चलने से पता चलता है कि वे चूक गए; उन्होंने सुना नहीं।
आंख पर कोई ऐसा परदा है कि हर चीज को विकृत कर जाता है! बुद्ध की बात को सुनकर उसको भी हम विकृत कर लेते हैं। जब हम सुनते हैंः 'जीवन में दुख है', तो तत्क्षण हमारे मन में यह आशा बंधती है कि शायद बुद्ध के पास हमें कोई उपाय मिल जाए, जिससे जीवन का दुख मिट जाए। तत्क्षण हम बुद्ध के चरण पकड़ लेते हैं कि 'बताओ मार्ग, जीवन का दुख मिट जाए।'
दुख को मिटाने का कोई मार्ग नहीं है। वस्तुतः दुख मिटाने की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारी आशा टूट जाए, तो आशा के साथ ही सुख-दुख सब विलीन हो जाते हैं।
यदि तुम उड़ नहीं सकते हो तो दौड़ो, यदि तुम दौड़ नहीं सकते हो तो चलो, यदि तुम चल नहीं सकते हो तो रेंगो। लेकिन, तुम जैसे भी करो, तुम्हे आगे बढ़ना ही होगा। (-- मार्टिन लूथर किंग जूनियर)
अपेक्षा
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक टर्किश स्नानगृह में स्नान करने गया। यात्रा से आया था, फटे-पुराने उसके कपड़े थे, धूल-धंवास से भरा था। शक्ल पर भी धूल थी, लंबी यात्रा की थकान थी, दीन-हीन उसके कपड़े थे। तो टर्किश बाथ के सेवकों ने समझा कि कोई गरीब आदमी है।
स्वभावत:, जहां आशा में आदमी जीता है, वहां अमीर की सेवा की जा सकती है, गरीब की सेवा नहीं की जा सकती। होना तो उलटा चाहिए कि गरीब की सेवा हो, क्योंकि वह सेवा की ज्यादा उसे जरूरत है। अमीर को उतनी जरूरत नहीं है, उसे सेवा मिलती ही रही होगी। लेकिन आशा का जो जगत है..।
नौकर-चाकरों ने उस पर कोई ध्यान ही न दिया। फटी-पुरानी तौलिया उसे दे दी; क्योंकि पुरस्कार की कोई संभावना न थी। उपयोग में लाया हुआ साबुन उसे दे दिया। पानी की भी किसी ने चिंता नहीं की कि गरम है कि ठंडा है। मालिश करने वाले ने भी ऐसे ही हाथ फेरा, जैसे जिंदा आदमी पर हाथ न फेरता हो।
नसरुद्दीन सब देखता रहा। स्नान करके बाहर निकला। कपड़े पहने। किसी नौकर को आशा ही नहीं थी कि इससे कुछ टिप भी मिलेगी, कोई पुरस्कार भी होगा। लेकिन उसने अपने खीसे से उस देश की जो सबसे कीमती स्वर्णमुद्रा थी, वह बाहर निकाली। प्रत्येक नौकर को एक-एक स्वर्णमुद्रा दी, और अपने रास्ते पर चल पड़ा। अवाक रह गए नौकर। छाती पीट ली दुख से। दुख से कह रहा हूं! छाती पीट ली दुख से। क्योंकि अगर इसकी सेवा ठीक से की होती, तो आज पता नहीं क्या हो जाता! स्वर्णमुद्रा कभी किसी ने नहीं दी थी। नवाब भी वहां से गुजरे थे, वजीर भी वहां से गुजरे थे। एक-एक नौकर को एक-एक स्वर्णमुद्रा किसी ने कभी भेंट न दी थी। और इतनी सेवा की थी! और यह आदमी सब को मात कर गया। छाती पर सांप लोट गया। उस रात नौकर सो नहीं सके। बार-बार यही खयाल आया, बड़ी भूल हो गई। अगर ठीक से सेवा की होती-सेवा तो की ही नहीं उस आदमी की-अगर ठीक से सेवा की होती, तो पता नहीं क्या दे जाता!
मुल्ला नसरुद्दीन दूसरे दिन फिर उपस्थित हुआ। और भी फटे-पुराने कपड़े थे, और भी धूल-धंवास से भरा था। लेकिन ऐसे उसका स्वागत हुआ, जैसे सम्राट का हो। जो श्रेष्ठतम तेल था उनके पास, निकाला गया। जो श्रेष्ठतम साबुन थी, वह आई। नए ताजे तौलिए आए। गरम पानी आया। घंटों उसकी सेवा हुई। घंटों उसे नहलाया गया। वह शांत, जैसे कल नहाता रहा, वैसे ही नहाता रहा। जाते वक्त, जब जाने लगा, अपने खीसे में हाथ डाला। नौकर सब हाथ फैलाकर आशा में खड़े हो गए। जो उस देश का सबसे छोटा पैसा था, वह उसने एक-एक पैसा उनको भेंट दिया!
छाती पर पत्थर पड़ गया। वे सब चिल्लाने लगे कि तुम आदमी पागल तो नहीं हो! यह तुम क्या कर रहे हो? कल जब हमने कुछ भी नहीं किया, तुमने. स्वर्णमुद्राएं दीं! और आज जब हमने सब कुछ किया, तो ये पैसे तुम दे रहे हो?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, यह कल का पुरस्कार है। आज का पुरस्कार कल दे चुका हूं।
उस रात भी नौकर नहीं सो सके!
हम जो भी अपेक्षाएं बांधकर जीते हों। कुछ भी हो जाए, कुछ न करें और स्वर्णमुद्रा मिल जाए, तो भी दुख होता है। कुछ करें, स्वर्णमुद्रा न मिले, तो भी दुख होता है। अपेक्षा में दुख है, अपेक्षा में पीड़ा है।
भीतर-बाहर
कथा :
एक साधु और एक वेश्या की एक साथ मृत्यु हुई, एक ही दिन। आमने-सामने घर था। मृत्यु के दूत लेने आए, तो दूत बडी मुश्किल में पड़ गए। उन्हें फिर जाकर हेड आफिस में पता लगाना पड़ा कि मामला क्या है! क्योंकि संदेश में कुछ भूल मालूम पड़ती है। साधु को ले जाने की आज्ञा हुई है नर्क, और वेश्या को आज्ञा हुई है स्वर्ग! तो उन्होंने कहा, इसमें जरूर कहीं भूल हो गई है! साधु बड़ा साधु था, वेश्या भी कोई छोटी वेश्या नहीं थी। मामला सीधा साफ है, गणित में कोई गड़बड़ है। वेश्या को नर्क जाना चाहिए, साधु को स्वर्ग जाना चाहिए।
काश, जिंदगी इतनी सीधी होती, तो सभी वेश्याएं नर्क चली जातीं और सभी साधु स्वर्ग चले जाते। लेकिन जिंदगी इतनी सीधी नहीं है, जिंदगी बहुत जटिल है।
ऊपर से पता लगाकर लौटे। खबर मिली कि वही ठीक आज्ञा है, वेश्या को स्वर्ग ले आओ, साधु को नर्क। उन्होंने पूछा, थोड़ा हम समझ भी लें, क्योंकि हम बड़ी दुविधा में पड़ गए हैं। तो दफ्तर से उन्हें खबर मिली कि तुम जरा नए दूत हो; तुम्हें अनुभव नहीं है। पहले ही दिन डयूटी पर गए थे। पुरानों से पूछो! यह सदा से होता आया है; यही नियम है। फिर भी उन्होंने कहा, थोड़ा हम समझ लें।
तो पता चला कि जब भी साधु के घर में सुबह कीर्तन होता, तो वेश्या रोती अपने घर में। सामने ही घर था। रोती, रोती इस मन से कि मेरा जीवन व्यर्थ गया। कब वह क्षण आएगा सौभाग्य का कि ऐसे कीर्तन में मैं भी सम्मिलित हो जाऊं! मन भी होता, तो कभी द्वार के बाहर निकल आती। साधु के मंदिर के पास कान लगाकर खड़ी हो जाती दीवाल के। लेकिन मन में ऐसा लगता कि मुझ जैसी पापी मंदिर में कैसे प्रवेश करे! तो कहीं साधु को पता न चल जाए, इसलिए चुपचाप छिप-छिपकर कीर्तन सुन लेती। मंदिर की सुगंध उठती, धूप जलती, मंदिर के फूलों की खबर आती, मंदिर का घंटा बजता, और चौबीस घंटे, पूरे जीवन वेश्या मंदिर में रही। चित्त मंदिर में घूमता रहा, घूमता रहा, घूमता रहा। और एक ही कामना थी कि अगले जन्म में चाहे बुहारी ही लगानी पड़े, पर मंदिर में ही जन्म हो। मंदिर के द्वार पर ही!
साधु भी कुछ पीछे न थे वेश्या से। जब भी वेश्या के घर रात राग-रंग छिड़ जाता, आधी रात होती, तो वे करवट बदलते रहते! वे सोचते, सारी दुनिया मजा लूट रही है। हम कहां फंस गए! और सामने के सामने ही आनंद लुटा जा रहा है और एक हम मुसीबत में फंस गए। यह साधुता कहां से ले फंसे! कई बार भाग जाते निकलकर घर से, वेश्या के घर का चक्कर लगा आते। भीतर घुसने की कोशिश भी करते, तो हिम्मत न होती कि मैं साधु, भीतर कैसे जा सकता हूं! कोई देख न ले!
वेश्या मंदिर में रही, साधु वेश्यालय में रहे। देखा किसी ने नहीं यह, क्योंकि यह घटना भीतर की है। और जो बाहर से तौलते हैं, वे नहीं देख पाएंगे।
कर्म वही है जो बांधे ना; विद्या वही है जो मुक्त करे । शेष सभी कर्म अनायास प्रयास मात्र है; शेष सभी विद्या शिल्प या निपुणता मात्र है ।
That is action which does not promote attachment; that is knowledge which liberates. All other action is mere pointless effort; all other knowledge is merely craftsmanship or skill
रामकृष्ण से कोई पूछा कि मैं गंगा जा रहा हूं। आपका क्या खयाल है--गंगा में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं या नहीं?
रामकृष्ण बड़े सरल व्यक्ति थे। उन्होंने कहा कि जरूर धुल जाते हैं; जब गंगा में स्नान करोगे, डुबकी लगाओगे, पाप अलग हो जाते हैं। लेकिन निकलोगे बाहर कि नहीं?
निकलेंगे तो जरूर।
उन्होंने कहा, वे वृक्ष जो गंगा के किनारे खड़े हैं, इसीलिए खड़े हैं कि उन पर पाप बैठ जाते हैं। तुम निकले, वे फिर उचक कर तुम पर सवार हो गए। गंगा की वजह से छूटे थे, तुम्हारी वजह से तो छूटे भी नहीं थे। अगर तुम डूबे ही रहो गंगा में तो मुक्त हो जाओगे। निकलना मत।
उस आदमी ने कहा, लेकिन निकलना तो पड़ेगा!
तो फिर बेकार मेहनत कर रहे हो।
सामान्य लोग विघ्नों के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते हैं । मध्यम लोग कार्य आरम्भ करने के बाद विघ्नों के आने पर रोक देते हैं । किंतु उत्तम लोग बार-बार विघ्नों के बावजूद भी कार्य आरम्भ करने के उपरांत उसे बीच में नहीं छोड़ते हैं ।
Ordinary people do not start the work due to the fear of obstacles. Medium people begin the work but leave them after hit by obstacles. But Great people once they begin the work do not leave it despite hit by obstacles again and again.
वसीयत
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी मरणशथ्या पर पड़ा है। आखिरी घड़ी है। वह आंख खोलता है और अपनी पत्नी से कहता है कि मेरा जो सागर के तट पर भवन है, चाहता हूं कि मेरे मित्र अहमद को दे दिया जाए-वसीयत कर रहा है।
उसकी पत्नी कहती है, अहमद को? इस आदमी की शक्ल मुझे पसंद ही नहीं। बेहतर हो, यह हम रहमान को दे दें!
मुल्ला दुख में आंख बंद कर लेता है। फिर आंख खोलता है और कहता है, ठीक, मेरा जो पहाड़ पर बंगला है, वह मैं चाहता हूं कि मेरी बड़ी लड़की को दे दिया जाए।
उसकी पत्नी कहती है, बड़ी लड़की को? उसके पास काफी है! मेरी छोटी लडकी के लिए एक मकान की पहाड़ पर जरूरत है। वह उसको दे देना उचित है।
मुल्ला और भी थोड़ी देर तक आंख बंद किए पड़ा रहता है। फिर आंख खोलता है और कहता है कि मेरी जो बड़ी कार है, वह मेरे मित्र मर गए हैं, उनका बेटा है, उसको दे देना चाहता हूं।
उसकी पत्नी कहती है, उस पर तो मेरी बहुत दिन से आंख है। वह मैं किसी को नहीं दे सकती हूं। वह तो मेरे छोटे बेटे के काम में आने वाली है।
मुल्ला तब आंख बंद करके कहता है कि एक बात पूछूं आखिरी? मैं यह जानना चाहता हूं मर कौन रहा है? मैं मर रहा हूं कि तू मर रही है? तू कम से कम इतना धीरज तो रख कि मुझे मर जाने दे। फिर तुझे जो करना हो, करना। इतना तो मुझे पता ही है कि जब जिंदगी अपनी न हुई, तो वसीयत क्या अपनी होने वाली है!
मौत सब छीन लेती है।
मन
कथा :
बुद्ध मे महाकाश्यप ने पूछा है। महाकाश्यप एक दिन सुबह बुद्ध के पास पहुंचा है, उनका एक प्रमुख शिष्य है। सूरज उग रहा है, पक्षी गीत गा रहे हैं और महाकाश्यप बुद्ध से पूछता है कि यह जो चारों तरफ फैला है, क्या यह सुंदर नहीं है?
बुद्ध चुप रह जाते हैं। महाकाश्यप की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हैं, लेकिन बोलते नहीं। महाकाश्यप फिर पूछता है कि क्या मेरे प्रश्न में कोई असंगति है? आप उत्तर क्यों नहीं देते हैं?
बुद्ध फिर चारों तरफ देखते हैं, फिर महाकाश्यप की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हैं और चुप रह जाते हैं। महाकाश्यप तीसरी बार पूछता है कि इतना ही कह दें कि आप जवाब न देंगे।
बुद्ध फिर चारों तरफ देखते हैं और चुप रह जाते हैं। महाकाश्यप से वे तब कहते हैं कि तू जो पूछ रहा है, उससे तू मुझे बड़ी मुश्किल में डाल रहा है। मुश्किल में इसलिए डाल रहा है कि अगर मैं कहूं, यह सब सुंदर है, तो मैं किसको कुरूप कहूं? क्योंकि जब भी सुंदर का उपयोग करें, तो कुरूप की धारणा सुनिश्चित हो जाती है।
और बुद्ध ने कहा कि अब मुझे न कुछ कुरूप रहा है और न कुछ सुंदर रहा है, जो जैसा है, वैसा ही रह गया है। यह मन के बाहर से देखा गया जगत है। कांटा कांटा है, फूल फूल है, गुलाब गुलाब है, चंपा चंपा है। न कुछ सुंदर है, न कुछ कुरूप है। जो जैसा है, वैसा है।
बुद्ध ने कहा, जो जैसा है, वह मुझे दिखाई पड़ता है। यह सुंदर है या कुरूप, यह मैं कैसे कहूं? क्योंकि जिस मन से मैं बांटता था, वह खो गया है। मन जो मेरे पास था, जिससे मैं तौलता था, वह खो गया है।
अब्राहम लिंकन -- किसी वृक्ष को काटने के लिए आप मुझे छ: घंटे दीजिये और मैं पहले चार घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाऊंगा ।
आज वसंत की रात, गमन की बात न करना!
धूल बिछाए फूल बिछौना, बगिया पहने चांदी-सोना
कलियां फेके जादू-टोना, महक उठे सब पात
हवन की बात करना!
आज वसंत की रात, गमन की बात न करना!
तमस
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक घर में नौकर था। बड़ा घर था। बहुत नौकर-चाकर थे। और जैसा बड़ा घर था, शाही ठाठ-बाठ था, बड़े नौकर-चाकर थे, भयंकर आलस्य था नौकरों में। पता ही नहीं चलता कि कौन क्या करता है, कौन क्या नहीं करता। काम बड़ा अस्तव्यस्त था। मालिक चिंतित हुआ। सब उपाय कर लिए, लेकिन काम में कोई सुधार न हुआ। तो उसने एक efficiency एक्सपर्ट को बुलाया कि जो थोड़ी सलाह दे कि क्या करना।
उस विशेषज्ञ ने कहा, बुलाओ सब नौकरों को। सारे नौकर पंक्तिबद्ध खड़े किए गए। उस विशेषज्ञ ने कहा कि तुममें जो सबसे ज्यादा आलसी हो, वह बाहर निकल आए। क्योंकि मैं उसे ऐसा काम दे दूंगा, जिसमेँ ज्यादा काम करना ही न पड़े। लेकिन एक सड़ी मछली पूरी नदी को गंदा कर देती है। तो मुझे ऐसा लगता है कि तुममें कोई एक महा आलसी है, जो सब को खराब कर रहा है। वह बाहर निकल आए। हम उसे कोई दंड न देंगे; नौकरी न छुडाएंगे, आश्वासन पक्का है। हम उसे ऐसा ही काम दे देंगे, जिसमें कुछ करना ही ज्यादा न पड़े। पहरेदार की तरह स्कूल पर बैठा सोता रहे या मालिक की दुकान है कपड़े-लत्ते की, और कई दुकानें हैं, उसे ऐसी जगह बिठा देंगे। जैसे उदाहरण के लिए उसने कहा कि जहां मालिक के कपड़े की दुकान में पाजामे और नाइट ड्रेस और इस तरह की चीजें बेची जाती हैं, वहां बिठा देंगे कि वहा सोया रहे। और वहा तख्ती लिख देंगे कि हमारे कपड़े पहनने से ऐसी गहरी नींद आती है। कोई रास्ता निकाल लेंगे। बाहर आ जाए जो आदमी सब से ज्यादा आलसी है!
सब लोग बाहर आ गए सिर्फ मुल्ला नसरुद्दीन को छोड्कर। उस विशेषज्ञ ने पूछा कि नसरुद्दीन, मालिक को भी संदेह है और मुझको भी संदेह है कि तुम ही हो उपद्रवी। लेकिन तुम बाहर क्यों नहीं आए? उसने कहा, मालिक, जहां हम हैं, बड़े आनंद में हैं। दो पैर कौन चले!
चित्त बाह्यता से घिरा हो, तो भोग भी उसे बाहर रखता है और त्याग भी।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन लौट रहा था किसी सभा में भाषण करके। पत्नी से कहने लगा कि तीसरा भाषण सबसे जोरदार हुआ। पत्नी ने कहा, तीसरा भाषण ? तुम्हारा अकेले का ही तो भाषण था! मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मेरा ही तीसरा भाषण। उसकी पत्नी ने कहा, लेकिन तीसरा! कुल एक बार तुमने भाषण दिया। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, पहले मेरी पूरी बात सुन लो। एक भाषण तो वह है, जो मैं घर से तैयार करके चला था कि दूंगा। एक वह है, जो मैंने दिया। और एक वह है, जो मैं अब सोच रहा हूं कि दिया होता। यह तीसरा, इसका कोई मुकाबला ही नहीं। बेहोश आदमी ऐसा ही चल रहा है। जो कहना चाहता था, वह कहा नहीं। जो कहा, वह कहना नहीं चाहता था। जो कहना चाहता था, वह अपने भीतर कह रहा है।
(भवानीप्रसाद मिश्र :)
दूसरे सारे पंछी अपने सारे गीत गा चुके हैं
रक्त और नील सारे फूल मेरे आँगन में आ चुके हैं
सुनाई नहीं दी, एक तुम्हारी ही बोली, ओ पीताभ किरण पंछी
ओ ठीक कविता की सहोदरा, फूल और गीत और धरा,
सब जैसे धाराहत हैं इस घटना से, अनुक्षण रत हैं सब, तुम्हारी प्रतीक्षा में!
एक फकीर हुए भीखण। वे बोल रहे थे एक गांव में..राजस्थान का कोई गांव रहा होगा; भीखण राजस्थान में हुए। सभा में नगर का जो सबसे बड़ा धनपति था..आसोजी..वह सामने ही बैठा। वह बार-बार झपकी खा रहा था। भीखण से न रहा गया। कोई साधारण पंडित-पुरोहित नहीं थे कि इसकी फिक्र करें कि यह पैसे वाला है तो इससे कुछ डरें। बार-बार उसकी झपकी से भीखण के बरदाश्त के बाहर हो गया। भीखण ने कहा: आसो जी, क्या सोते हो? आसो जी ने आंख खोली, कहा: नहीं-नहीं, सोता नहीं, आंख बंद करके ध्यानपूर्वक सुनता हूं। होशियार आदमी तो हर तरफ तरकीबें निकाल लेता है। भीखण ने देख लिया कि वह झूठ बोल रहा है। क्योंकि ध्यान में इस तरह सिर नहीं डगमगाता। झोंका ऐसा आता था कि वह गिर-गिर पड़ता जैसा हो रहा था। ध्यान में यह नहीं होता। शकल-सूरत से साफ था कि ध्यान इत्यादि कुछ भी नहीं है। फिर थोड़ी देर और फिर आसो जी ने झपकी खाई। फिर पुकारा भीखण ने: आसो जी, सोते हो? आसो जी ने कहा, नहीं-नहीं, आपने भी क्या लगा रखा है! आप अपना काम करो, बोलो, मैं ध्यानपूर्वक सुन रहा हूं! क्या गांव में मेरी बदनामी करवानी है? एक बार हो तो ठीक, दोबारा आप फिर वहीं पूछने लगे; आपको बोलना है कि मेरे पीछे पड़े हो?
फिर थोड़ी देर और आसो जी की फिर नींद लग गई। भीखण ने तीसरी बार आवाज दीः आसो जी, जिंदा हो? और आसो जी ने कहा: नहीं-नहीं। वह समझा कि पुरानी वही बात कि आसो जी सोते हो। भीखण ने कहा: अब तुम धोखा न दे सकोगे। तुम निश्चित सो रहे हो। क्योंकि इस बार मैंने बात ही दूसरी पूछी और तुम उत्तर वही दे रहे हो। मगर एक लिहाज से तुम्हारा उत्तर सही है, क्योंकि जो सोता है, वह मुर्दा है; जिंदा है कहां?
महावीर -- असुत्ता मुनिः; जो सोया नहीं है, वह मुनि; सुत्ता अमुनिः; और जो सोया है, वह अमुनि। सोया है, वह असाधु, जागा है, वह साधु।
विंस्टन चर्चिल ने कहा है कि मैं जिंदगी में एक बार सुबह जल्दी उठा। क्योंकि बार-बार सुना, पढ़ा कि सुबह का मुहूर्त बड़ा सुंदर। एक बार ही उठा...वह तो उठता ही दस बजे था... और एक ही बार उठकर जो दुःख पाया, फिर दोबारा वह भूल नहीं की। सुबह उठ तो आया, लेकिन सुबह से ही नींद पीछा करने लगी। जिंदगी भर की आदत। किसी चीज में मन ही न लगे, झपकियां आएं। चाय की टेबल पर पहले ही पहुंच गया। बैठ कर आधा घंटा राह देखी तब चाय आई। तब तक इतना झल्ला चुका था कि चाय पीने का मजा भी खराब हो गया। दफ्तर जाने के लिए...युद्ध के दिन थे, पेटरोल की कमी थी, बस से ही जाना होता था... दफ्तर जाने के लिए बस के लिए जाकर खड़ा हो गया आधे घंटे पहले ही से, वहां कोई था ही नहीं। न बस, न लोगों का 'क्यू'..अभी टिकट बेचने वाला भी नहीं आया था। आधा घंटा भुनभुनाता रहा। दफ्तर पहले पहुंच गया, चपरासी बाद में पहुंचा। ....'मैं दरवाजे पर खड़ा था जब चपरासी पहुंचा। मुझे बैठ कर दफ्तर में धूल-धवांस खानी पड़ी; क्योंकि दफ्तर साफ हुआ। दिन भर परेशान रहा और दिन भर मैंने गालियां दीं उन सब लोगों को जो ब्रह्ममुहूर्त में उठने की बातें करते हैं। ऐसा दुख मैंने कभी पाया नहीं। फिर कभी यह भूल नहीं की।'
किसी प्रज्वलित व्यक्तित्व के पास बैठ कर तुम्हें यह बोध आ जाता है कि अरे, मैं भी ऐसा ही हो सकता हूं!
नकारात्मकता
कथा :
एक शिकारी ने चिड़ियों को पकड़ने वाला एक अद्भुत कुत्ता खरीदा। वह कुत्ता पानी पर चल सकता था। शिकारी वह कुत्ता अपने दोस्तों को दिखाना चाहता था। उसे इस बात की बड़ी खुशी थी कि वह अपने दोस्तों को यह काबिले-गौर चीज दिखा पाएगा। उसने अपने एक दोस्त को बत्तख का शिकार देखने के लिए बुलाया। कुछ देर में उन्होंने कई बत्तखों को बंदूक से मार गिराया। उसके बाद उस आदमी ने कुत्ते को उन चिड़ियों को लाने का हुक्म दिया। कुत्ता चिडियों को लाने के लिए दौड़ पड़ा। उस आदमी को उम्मीद थी कि उसका दोस्त कुत्ते के बारे में कुछ कहेगा, या उसकी तारीफ करेगा, लेकिन उसका दोस्त कुछ नहीं बोला। घर लौटते समय उसने अपने दोस्त से पूछा कि क्या उसने कुत्ते में कोई खास बात देखी। दोस्त ने जवाब दिया, 'हां, मैंने उसमें एक खास बात देखी। तुम्हारा कुत्ता तैर नहीं सकता।'
जब प्यार और नफरत दोनों ही ना हो तो हर चीज साफ़ और स्पष्ट हो जाती है ।
स्व-पर प्रकाशक
कथा :
सूफी हसन के जीवन में उल्लेख है कि वह अपने गुरु के पास गया। दो और मित्र उसके साथ सत्य की खोज पर निकले थे। वे तीनों अपने गुरु के पास गए। उन तीनों ने कहा कि हम जानना चाहते हैं, आत्मा क्या है? उनका गुरु उस समय कबूतरों को दाने डाल रहा था। उसने एक-एक कबूतर पकड़कर तीनों को दे दिया और उन तीनों से कहा कि तुम ऐसी जगह जाओ जहां कोई देखता न हो, और कबूतर की गर्दन मरोड़कर आ जाओ, मार डालों। फिर पीछे हम आगे की खोज पर चलेंगे। यह तुम्हारा पहला पाठ!
एक युवक सीढ़ियों से नीचे उतरा। पास की गली में गया। देखा, कोई भी नहीं है। कबूतर को मरोड़ा और वापस आ गया। दूसरा युवक खोजबीन किया। गली में गया। लेकिन उसे लगा कि प्रकाश है और मैं मरोडू, और तभी कोई खिड़की से झांककर देख ले, या अचानक कोई गली में आ जाए, तो रात तक रुकूं, अंधेरा हो जाने दूं। रात अंधेरा जब हो गया, तब वह एक गली में गया और उसने कबूतर की गर्दन मरोड़ दी और रात आकर गुरु के चरणों में कबूतर रख दिया।
लेकिन हसन, तीसरे युवक का तीन दिन तक कोई पता न चला। दोनों मित्र राह देखते हैं, गुरु राह देखता है। तीसरे दिन गुरु ने उन दोनों को कहा कि अब तुम हसन को खोजकर लाओ कि वह कहां है!
हसन ने सब तरह की कोशिश की। गली में जाकर देखा। लगा, कोई भी देख लेगा। अंधेरे में जाकर देखा। गहन अंधेरे में गया, तो भी कबूतर की आंखें! जब भी कबूतर को मरोड़ने जाता, कबूतर की आंखें अंधेरे में भी उसे दिखाई पड़ती। तो उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और कबूतर की आंखों पर भी पट्टी बांध दी और नीचे एक तलघरे में उतर गया, जहां गहन अंधेरा था। और जब उसने कबूतर की गर्दन पर हाथ रखा, तब उसे खयाल आया, कोई न देखता हो, लेकिन मैं तो जान ही रहा हूं मैं तो देख ही रहा हूं।
तीन दिन बाद उसके साथी उसे पकड़कर लाए। उसने कबूतर गुरु के चरणों में रख दिया। और उसने कहा कि क्षमा करें, यह काम हो नहीं सकता। क्योंकि कहीं भी मैं जाऊं, मैं तो देखता ही रहूंगा। और यह भी हो सकता है कि मैं भी न देखूं लेकिन कबूतर तो मौजूद रहेगा ही। ऐसा भी कोई उपाय हो सकता है कि मैं बहुत दूर हट जाऊं, कबूतर के गले में रस्सी बांध दूर तलघरे में लटका दूं; मैं पार निकल जाऊं और वहां से रस्सी खींचकर उसकी गर्दन दबा दूं। लेकिन कबूतर तो कम से कम, एक गवाह तो रहेगा ही। तो मैं ऐसी कोई जगह नहीं खोज पाया, जहां कोई भी गवाह न हो। मुझे आप क्षमा कर दें। मैं इस पहले पाठ में असफल हुआ।
उसके गुरु ने कहा, तुम ही सफल हुए हो। तुम्हारे दो साथी असफल हो गए हैं। और अब तुम्हारा दूसरा पाठ शुरू होगा। तुम्हारे दो साथियों को मैं विदा कर देता हूं। उसके गुरु ने कहा कि आत्मज्ञान की दिशा में पहला पाठ यही है कि आत्म-ज्ञान स्व-प्रकाशित है। चाहे कुछ भी करो, स्वयं को जानने को भुलाया नहीं जा सकता। एक तो मौजूद रह ही जाएगा। और यह सूत्र तुम्हारे खयाल में आ गया है।
आत्मा स्व-प्रकाशित है। पदार्थ पर-प्रकाशित है और चेतना स्व- प्रकाशित है। ये दो अस्तित्व हैं, जो हमें दिखाई पड़ते हैं। चेतना के लिए किसी और के जानने की जरूरत नहीं; चेतना स्वयं को ही जानती है।
ऐसा ही समझें कि एक दीया जल रहा है। दीया जलता है, तो सारे कमरे को प्रकाशित करता है। दीया बुझ जाए, तो कमरा दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन दीया जलता है, तो अपने को भी प्रकाशित करता है। उस दीये को जानने के लिए किसी दूसरे दीये की जरूरत नहीं पड़ती। चेतना अपने को ही जानती और अनुभव करती है। और सब चीजों को जानने के लिए किसी और की जरूरत पड़ती है।
अब्राहम लिंकन -- अगर कुत्ते की पूँछ को पैर कहें, तो कुत्ते के कितने पैर हुए ? चार.. पूँछ को पैर कहने से वो पैर नहीं हो जाती ।
विसंवाद
कथा :
एक बार की बात है हाथी और गधा जंगल के हरे-भरे मैदानों में घूम रहे थे। घांस चरते-चरते गधा बोला, 'हाथी भाई! इन नीली घांसों का स्वाद ही कुछ और है।' 'क्या कहा? नीली घांसों का?', हाथी ने आश्चर्य से पूछा। 'हाँ, इन नीली घांसों का स्वाद बड़ा अच्छा है।', गधा कॉन्फिडेंस के साथ बोला। 'गधे तू कितना मूर्ख है ये घास हरी है नीली नहीं', हाथी ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा। इस पर गधा नाराज़ होते हुए बोला, 'ओये हाथी! तेरी तरह तेरी बुद्धि भी मोटी हो गयी है तुझे ये नीला रंग नज़र नहीं आता।' घास के रंग को लेकर दोनों में विवाद बढ़ गया, दोनों मरने-मारने पर उतारू हो गए। अंत में तय हुआ कि जंगल के राजा शेर के पास जाया जाए और वहीँ निर्णय करेंगे कि कौन गलत है और कौन सही।
गधा और हाथी शेर के पास पहुंचे। शेर को देखते ही गधा जोर से बोला, 'महाराज आप ही बताइये न इस बेवकूफ को कि घास का रंग नीला होता है हरा नहीं।' शेर बोला, ' हाँ, गधा बिलकुल सही कह रहा है। घास का रंग नीला ही होता है।' गधा मुस्कुराया और इतराते हुए हाथी की और इशारा करे हुए बोला, 'सजा दीजिये इस बेवकूफ हाथी को, ताकि ये आगे से ऐसी गलती ना करे।' शेर बोला, 'हम हाथी को एक महीने कैद की सजा सुनाते हैं।'
हाथी आवाक था। गधे के जाने के बाद वो बोला, 'महाराज क्षमा कीजियेगा, पर मैंने तो घास के रंग को हरा बता कर कोई गलती तो नहीं की थी…फिर ये सजा ?' शेर बोला -- तुम्हे घास के रंग के कारण सजा नहीं मिल रही… तुम्हे इस लिए सजा मिल रही है कि तुम इतने बुद्धिमान जानवर होते हुए भी गधे जैसे मूर्ख प्राणी के साथ बहस में क्यों पड़े…और तो और तुम मेरे पास इस समस्या का हल करने भी चले आये और मेरा भी समय बर्बाद किया… इसीलिए तुम्हे सजा मिली है।
मूर्ख से कभी बहस मत करो; वह आप को अपनी मूर्खता के स्तर तक उतार लायेगा और अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर आपको हरा देगा ।
निर्मोह
कथा :
Epictetus को यूनान के सम्राट ने अपने पास बुलवाया था। क्योंकि सम्राट को किसी ने कहा कि इपिक्टैटस कहता है कि आत्मा अमर है। सम्राट शरीरवादी था। उसने इपिक्टैटस को बुलवाया और कहा कि मैंने सुना हैं -- सोचकर जवाब देना -- मैंने सुना है कि तुम कहते हो, आत्मा अमर है। मैं कोई सिद्धांत की चर्चा के लिए नहीं बुलाया हूं मैं तो सीधी परीक्षा लूंगा। क्योंकि मैं तो मानता हूं शरीर के सिवाय कुछ भी नहीं है।
इपिक्टैटस ने कहा, तो परीक्षा शुरू करो! क्योंकि वक्तव्य देने की क्या जरूरत है, परीक्षा ही वक्तव्य देगी। और जब तुम मानते ही नहीं हो कि शरीर के अलावा कुछ है, तो मैं समझाऊं भी तो किसको समझाऊं! तुम परीक्षा शुरू करो।
सम्राट ने दो आदमियों को आज्ञा दी और कहा कि इपिक्टैटस का एक पैर मोड़कर तोड़ डालो। इपिटैक्टस ने पैर आगे बढ़ा दिया और उन दोनों आदमियों से कहा कि इस तरह बाएं तरफ घुमाओ, जल्दी टूट जाएगा। सम्राट ने कहा, यह मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। यह पैर सच में ही तोड़ दिया जाएगा। इपिक्टैटस ने कहा, आप मजाक कर भी नहीं सकते हैं, मैं मजाक कर सकता हूं क्योंकि मैं पैर से अलग हूं। मैं मजाक कर सकता हूं। पैर तोड़े।
वह पैर तोड़ दिया गया। इपिक्टैटस ने कहा कि और कुछ परीक्षा लेनी है? पैर टूट गया, और मैं साबित हूं। मैं उतना का ही उतना हूं। मैं लंगड़ा नहीं हुआ; शरीर लंगड़ा हो गया।
लेकिन जो आत्मवादी भी अपने को कहते हैं, उनके भी, उनके भी जीवन में हम झांकें, तो पता चलेगा, शरीर ही है। शरीर ही सब कुछ है।
हिटलर -- अधिकतर लोग छोटे झूठ की अपेक्षा बड़े झूठ का शिकार आसानी से हो जाते है ।
वितण्डा
कथा :
एक बहुत बड़ा सोफिस्ट था, जीनो। जीनो ने घोषणा कर रखी थी कि किसी को भी हराना हो, तो मैं तर्क की शिक्षा देता हूं। और वह इतना आश्वस्त था कि जब भी वह किसी विद्यार्थी को लेता था अपनी तर्क की शिक्षा के लिए, तो उससे आधी फीस लेता था। और कहता था, आधी तब देना, जब तुम किसी से तर्क में जीत जाओ।
एक विद्यार्थी आया, अरिस्तोफेनीज, और उसने आधी फीस दी, और गुरु से शिक्षा ली दो साल। और दो साल के बाद गुरु राह देखने लगा कि वह किसी से तर्क में जीते, तो आधी फीस ले ले।
लेकिन अरिस्तोफेनीज ने उस दिन से किसी से विवाद ही नहीं किया। यहां तक कि अगर उससे कोई कहे दिन में भी कि रात है, तो वह कहे, हां। क्योंकि अगर वह जीत जाए, तो वह आधी फीस चुकानी पड़े। जीनो बड़ी मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा, यह तो लड़का कुछ ज्यादा चालबाज है! जीनो के शिष्य ने, अरिस्तोफेनीज ने कहा कि मैं फीस देने वाला नहीं हूं, जब तक मैं जीतू न। और जीतने का कोई कारण नहीं, क्योंकि मैं हर हालत में सरेंडर कर देता हूं। कोई कुछ भी कहे, हां! मैं न कहता ही नहीं, विवाद होगा ही नहीं, जीत का सवाल नहीं है।
लेकिन गुरु भी ऐसे हार नहीं मान सकता था। उसने अदालत में मुकदमा चलाया, और अदालत से अपील की कि यह मेरी आधी फीस नहीं चुकाता है, वह मुझे मिलनी चाहिए। इसकी शिक्षा पूरी हो गई। और उसकी तरकीब यह थी कि अदालत तो कहेगी कि यह अभी पैसा नहीं चुकाएगा, क्योंकि अभी शर्त पूरी नहीं हुई। यह अभी पहला विवाद नहीं जीता है। तो जीनो का खयाल था कि मैं अरिस्तोफेनीज से कहूंगा कि अदालत ने तुझे जिता दिया, तू पहला विवाद जीत गया। आधी फीस मुझे दे दे। अगर अदालत निर्णय देगी अरिस्तोफेनीज के पक्ष में कि अभी फीस नहीं दी जा सकती, तो भी मैं फीस ले लूंगा, क्योंकि वह जीत गया, पहला विवाद जीत गया। लेकिन अरिस्तोफेनीज भी उसी का शिष्य था। उसने कहा, अगर अदालत कहेगी कि तुम जीत गए, तब तो मैं पैसा देने वाला नहीं हूं क्योंकि मैं अदालत से प्रार्थना करूंगा कि इसमें अदालत का अपमान है। और अगर मैं हार गया, तब तो देने का सवाल ही नहीं है। क्योंकि पहला ही विवाद हार गया।
अदालत ने फैसला भी दे दिया कि अरिस्तोफेनीज को पैसा देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अभी उसने कोई विवाद ही नहीं किया, जीत का कोई सवाल नहीं है।
बाहर आते ही जीनो ने कहा, अरिस्तोफेनीज, अब पैसा दे दो, क्योंकि तुम पहला विवाद अदालत में मुझसे जीत गए। अरिस्तोफेनीज ने कहा कि गुरु, मैं आपका ही शिष्य हूं। आप भूल जाते हैं। मैं अदालत का अपमान कभी भी नहीं कर सकता, चाहे मेरे प्राण चले जाएं!
यह सोफिस्ट्री है। सोफिस्ट्री का मतलब होता है, वितंडा। उसमें आप कुछ भी कर सकते हैं। और दोनों तरफ तर्क चल सकते हैं।
अगर किसी बच्चे को उपहार न दिया जाए तो वो कुछ देर रोयेगा मगर संस्कार ना दिए जाएं तो वो जीवन भर रोयेगा ।
शब्द-भ्रान्ति
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन भारत आया था और एक योगी के द्वार पर रुका। थका-मांदा था, सोचा उसने, विश्राम मिल जाए। बड़ा भवन था, विश्रामकक्ष था, योगी के बड़े शिष्य थे। मुल्ला आकर पास बैठा; एक मुसलमान फकीर पास आकर बैठा, प्रभावशाली व्यक्ति। योगी भी बहुत आनंदित हुआ कि चलो, अब मुसलमान भी मेरे पास आने लगे। थोड़ी देर योगी की बातचीत सुनी, जो शिष्यों से चल रही थी।
योगी समझा रहा था जीव-दया। जीव-दया की बात समझा रहा! था। कह रहा था कि समस्त जीव एक ही परिवार के हैं। समस्त जीवन जुड़ा हुआ है। इसलिए दया ही धर्म है। जब योगी बोल चुका,! तो मुल्ला ने भी खड़े होकर कहा कि आप बिलकुल ठीक कहते हैं। एक बार मेरी जाती हुई जान एक मछली ने बचाई थी।
योगी तो एकदम हाथ जोड़कर उसके चरणों में बैठ गया। उसने कहा कि धन्य! मैं बीस साल से साधना कर रहा हूं लेकिन अभी तक मुझे ऐसा प्रत्युत्तर नहीं मिला कि किसी पशु ने मेरी जान बचाई हो। मैंने कई पशुओं की जान बचाई है, लेकिन किसी पशु ने मेरी जान बचाई हो, अब तक ऐसा मेरा भाग्य नहीं है। तुम धन्यभागी हो! तुम्हारी बात से मेरा सिद्धांत पूरी तरह सिद्ध हो जाता है। तुम रुको यहां, विश्राम करो यहां।
तीन दिन मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी सेवा हुई। और तीन दिन योगी की बहुत-सी बातें नसरुद्दीन ने सुनीं। चौथे दिन योगी ने कहा कि अब तुम पूरी घटना बताओ, वह रहस्य, जिसमें एक मछली ने तुम्हारी जान बचा दी थी! नसरुद्दीन ने कहा कि आपकी इतनी बातें सुनने के बाद मैं सोचता हूं कि अब बताने की कोई जरूरत नहीं है। योगी नीचे बैठ गया, नसरुद्दीन के पैर पकड़ लिए और कहा, गुरुदेव, आप बचकर नहीं जा सकते। बताना ही पड़ेगा वह रहस्य, जिसमें एक मछली ने आपकी जान बचाई! नसरुद्दीन ने कहा, अच्छा यह हो कि वह चर्चा अब न छेड़ी जाए। वह विषय छेड़ना ठीक नहीं है। योगी तो बिलकुल सिर रखकर जमीन पर लेट गया। उसने कहा कि मैं छोडूंगा नहीं गुरुदेव! वह रहस्य तो मैं जानना ही चाहूंगा। क्या आप मुझे इस योग्य नहीं समझते?
नसरुद्दीन ने कहा, नहीं मानते, तो मैं कहे देता हूं। मैं बहुत भूखा था और एक मछली को खाकर मेरी जान बची! एक मछली ने मेरी जान बचाई!
शब्द एक से हों, इससे भ्रांति में पड़ने की जरूरत नहीं है। एक से शब्दों के भीतर भी बड़े विभिन्न सत्य हो सकते हैं। और कई बार विभिन्न शब्दों के भीतर भी एक ही सत्य होता है; उससे भी भ्रांति में पड़ने की जरूरत नहीं है। शब्दों की खोल को हटाकर सदा सत्य को खोजना जरूरी है।
हर सुनी-सुनाई बात पर यकीन न करिए । एक कहानी के हमेशा तीन पहलू होते हैं -- आपका, उनका और सच ।
एक छोटा बच्चे से स्कूल में पूछा गया, 'भगवान कहां है?' तो उसने कहा कि 'मेरे घर के बाथरूम में।' शिक्षिका बहुत हैरान हुई, 'यह तुझे किसने बताया?' उसने कहा कि 'बताया किसी ने नहीं, मेरी मां रोज पूछती है। जब मेरे पिता स्नान कर रहे होते हैं, तो रोज कहती है, हे भगवान!, क्या अभी तक स्नान चल रहा है? इससे मैं समझा कि परमात्मा मेरे घर के बाथरूम में रहता है।'
पुराना सूत्र था चिकित्सा का--बीमारी का इलाज। अब वे कहते हैं--बीमार का इलाज। Dont treat the desease, treat the patient। हर मरीज को अलग से अध्ययन करना पड़ेगा।
समानता
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन एक भीड़ में खड़ा है। टिकट खरीदने लोग खड़े हैं एक क्यू में सिनेमागृह के पास। सामने के व्यक्ति से, बड़ी देर हो गई है, वह कुछ बात करना चाहता है। उसने कहा कि देखते हैं, कैसा जमाना बिगड़ गया! सामने देखते हैं उस लड़के को, जो खिड़की के करीब पहुंच गया। लड़कियों जैसे कपड़े पहन रखे हैं! मुल्ला नसरुद्दीन के पड़ोसी व्यक्ति ने कहा, क्षमा करें, आप भूल में हैं। वह लड़का नहीं है, लड़की ही है। नसरुद्दीन ने कहा कि तुम्हारे पास क्या मापदंड है इतनी दूर से! मुझे बिलकुल लड़का मालूम होता है! उसने कहा, क्षमा करिए। वह मेरी ही लड़की है। लड़की है, लड़का नहीं; मेरी ही लडकी है। तब तो नसरुद्दीन ने कहा कि क्षमा करिए। मुझसे बड़ी भूल हो गई! कपड़े की वजह से यह भूल हो गई। तो आप उसके पिता हैं! उस व्यक्ति ने कहा, माफ करिए। आप फिर भूल कर रहे हैं, मैं उसकी मां हूं!
मरते क्षण में जो पीड़ा है, वह मृत्यु की नहीं, वह व्यर्थ गए जीवन की होती है।
जूआँ
कथा :
कनफ्यूशियस ने अपने एक शिष्य को कहा था कि ध्यान करने के पहले तू दो जगह हो आ। एक तो तू जुआघर में बैठकर देख कि लोग वहां क्या कर रहे हैं, observe. वहां बैठ जा और देख कि लोग रातभर वहां क्या करते रहते हैं। तुझे कुछ करना नहीं है। सिर्फ निरीक्षण करना। तीन महीने तक तू जुआघर में ही बैठा रह और निरीक्षण कर। और फिर तू मुझे आकर कहना।
वह शिष्य तीन महीने बाद आया और उसने कहा कि लोग पागल हैं। कनक्यूशियस ने कहा कि तब मैं तुझे दूसरी साधना का सूत्र देता हूं। अब तू मरघट पर तीन महीने बैठ जा और लोगों को जलते हुए देख।
तीन महीने बाद वह शिष्य आया और उसने कहा कि मैं देखकर आया हूं। सारी जिंदगी एक जुआ है। और सारी जिंदगी का अंत मरघट पर हो रहा है। कनक्यूशियस ने कहा कि अब तू उस गहरी यात्रा में जा सकता है।
जुए को और मौत को जो समझ ले, वह अंतर्यात्रा पर निकल सकता है।
अनुभव
कथा :
टाल्सटाय ने एक कहानी लिखी है, कि रूस में एक झील के किनारे तीन फकीरों का नाम बड़ा प्रसिद्ध हो गया था। और लोग लाखों की तादाद में उन फकीरों का दर्शन करने जाने लगे। और वे फकीर महामूढ़ थे, बिलकुल गैर पढ़े-लिखे थे। कुछ धर्म का उन्हें पता ही नहीं था। यह खबर रूस के आर्च प्रीस्ट को, सबसे बड़े ईसाई पुरोहित को लगी। उसे बड़ी हैरानी हुई। क्योंकि ईसाई चर्च तो कानूनन ढंग से लोगों को संत घोषित करता है, तभी वे संत हो पाते हैं।
यह भी बड़े मजे की बात है! ईसाई चर्च तो घोषणा करता है कि फलां आदमी संत हुआ। और जब पोप इसकी गारंटी दे देता है कि फलां आदमी संत हुआ, तभी वह संत माना जाता है। इसलिए ईसाइयत में एक मजेदार घटना घटती है कि दो-दो सौ, तीन-तीन सौ साल हो जाते हैं आदमी को मरे हुए, तब चर्च उनको संत घोषित करता है। जिंदों को तो जला दिया कई दफा चर्च ने। जान आफ आर्क को जलाया, वह जिंदा थी तब। फिर सैकड़ों साल बाद उसको संतत्व की पदवी घोषित की, कि वह भूल हो गई, वह संत थी। अभी संत कैसे हो गए ये! हिंदुस्तान होता तो चलता, यहां कोई भी संत हो सकता है। इसकी कोई तकलीफ नहीं है। लेकिन रूस में तकलीफ हुई कि ये संत हो कैसे गए! तो आर्च प्रीस्ट बड़ा परेशान हुआ। और जब उसे पता चला कि लाखों लोग वहां जाते हैं, तो उसने कहा, यह तो हद हो गई! यह तो चर्च के लिए नुकसान होगा। ये कौन लोग हैं! इनकी परीक्षा लेनी जरूरी है।
तो आर्च प्रीस्ट एक मोटर बोट में बैठकर झील में गया। जाकर वहां पहुंचा, तो वे तीनों झाड के नीचे बैठे थे। देखकर वह बडा हैरान हुआ। सीधे-सादे ग्रामीण देहाती मालूम पड़ते थे। वह जाकर जब खड़ा हुआ, तो उन तीनों ने झुककर नमस्कार किया, उसके चरण छुए।
उसने कहा कि बिलकुल नासमझ हैं। इनकी क्या हैसियत! उसने बहुत डांटा-डपटा, फटकारा कि तुम यह क्यों भीड़-भाड़ यहां इकट्ठी करते हो? उन्होंने कहा, हम नहीं करते। लोग आ जाते हैं। आप उनको समझा दें। पूछा कि तुमको किसने कहा कि तुम संत हो? लोग कहने लगे। हमको कुछ पता नहीं है। तुम्हारी प्रार्थना क्या है? बाइबिल पढ़ते हो? उन्होंने कहा, हम बिलकुल पढ़े—लिखे नहीं हैं। तुम प्रार्थना क्या करते हो? क्योंकि चर्च की तो निश्चित प्रार्थना है। तो उन्होंने कहा, हमको तो प्रार्थना कुछ पता नहीं। हम तीनों ने मिलकर एक बना ली है। तुम कौन हो बनाने वाले प्रार्थना? प्रार्थना तो तय होती है पोप के द्वारा। बिशप्स की बड़ी एसेंबली इकट्ठी होती है, तब एक-एक शब्द का निर्णय होता है। तुम कौन हो प्रार्थना बनाने वाले? तुमने अपनी निजी प्रार्थना बना ली है! भगवान तक जाना हो, तो बंधे हुए रास्तों से जाना पड़ता है! क्या है तुम्हारी प्रार्थना?
वे तीनों बहुत घबड़ा गए। कंपने लगे। सीधे-सादे लोग थे। तो उन्होंने कहा, हमने तो एक छोटी प्रार्थना बना ली है। आप माफ करें, तो हम बता दें। ज्यादा बड़ी नहीं है, बहुत छोटी-सी है।
ईसाइयत मानती है कि परमात्मा के तीन रूप हैं, ट्रिनिटी। त्रिमूर्ति परमात्मा है। परमात्मा है, उसका बेटा है, होली घोस्ट है। ये तीन रूप हैं परमात्मा के।
तो उन्होंने कहा कि हमने तो एक छोटी-सी प्रार्थना बना ली। you are three, we are three, have mercy on us. तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो। यही हमारी प्रार्थना है। उस पादरी ने कहा, नासमझो, बंद करो यह बकवास। यह कोई प्रार्थना है? सुनी है कभी? और तुम मजाक करते हो भगवान का कि तुम भी तीन और हम भी तीन हैं?
उन्होंने कहा, नहीं, मजाक नहीं करते। हम भी तीन हैं। और हमने सुना है कि वह भी तीन है। उसका तो हमें पता नहीं। बाकी हम तीन हैं। और हम ज्यादा कुछ जानते नहीं। हमने सोचा, हम तीन हैं, वे भी तीन हैं, तो हम तीनों पर कृपा कर। उसने कहा कि यह प्रार्थना नहीं चलेगी। आइंदा करोगे, तो तुम नरक जाओगे। तो मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूं आथराइज्ड, जो अधिकृत है।
उसने प्रार्थना बताई। उन तीनों को कहलवाई। उन्होंने कहा, एक दफा और कह दें, कहीं हम भूल न जाएं। फिर एक दफा कही। फिर उन्होंने कहा, एक दफा और। कहीं भूल न जाएं। उसने कहा, तुम आदमी कैसे हो? तुम संत हो? तो उन्होंने कहा, नहीं, हम कोशिश तो पूरी याद करने की करेंगे, एक दफा आप और दोहरा दें! उसने दोहरा दी।
फिर पादरी वापस लौटा। जब वह आधी झील में था, तब उसने देखा कि पीछे वे तीनों पानी पर भागते चले आ रहे हैं। तब उसके प्राण घबड़ा गए। उसने अपने माझी से कहा कि यह क्या मामला है? ये तीनों पानी पर कैसे चले आ रहे हैं? उस माझी ने कहा कि मेरे हाथ-पैर खुद ही काँप रहे हैं। यह मामला क्या है! वे तीनों पास आ गए। उन्होंने कहा, जरा रुकना। वह प्रार्थना हम भूल गए; एक बार और बता दो! उस पादरी ने कहा कि तुम अपनी ही प्रार्थना जारी रखो। हमारी प्रार्थना तो कर-करके हम मर गए, पानी पर चल नहीं सकते। तुम्हारी प्रार्थना ही ठीक है। तुम वही जारी रखो। वे तीनों हाथ जोड़कर कहने लगे कि नहीं, वह प्रार्थना ठीक नहीं। मगर आपने जो बताई थी, बड़ी लंबी है और शब्द जरा कठिन हैं। और हम भूल गए। हम बेपढ़े-लिखे लोग हैं।
निजी अनुभव के लिए कोई अधिकृत प्रार्थनाओं की जरूरत नहीं है। और निजी अनुभव के लिए कोई लाइसेंस्ट शास्त्रों की जरूरत नहीं है। और निजी अनुभव का किसी ने कोई ठेका नहीं लिया हुआ है। हर आदमी हकदार है पैदा होने के साथ ही परमात्मा को जानने का। वह उसका स्वरूपसिद्ध अधिकार है। वह मैं हूं यही काफी है, मेरे परमात्मा से संबंधित होने के लिए। और कुछ भी जरूरी नहीं है। बाकी सब गैर—अनिवार्य है।
सच एक डेबिट कार्ड की तरह है -- पहले कीमत चुकाएं और बाद में आनंद लें; झूठ एक क्रेडिट कार्ड की तरह है -- पहले आनंद लें और बाद में कीमत चुकाएं ।
सिग्मंड फ्रायड के जीवन में उल्लेख है कि जीवन के अंतिम वर्ष में उसने अपने सारे सहयोगियों को, सारे मित्रों को, शिष्यों को अपने घर निमंत्रित किया कि शायद यह आखिरी दिन है अब। सारी दुनिया में उसके खास-खास शिष्य थे, वे सब इकट्ठे हुए। उनको भोजन पर आमंत्रित किया। फ्रायड बैठा है, भोजन चल रहा है, कि फ्रायड के ही किसी सिद्धांत के संबंध में विवाद छिड़ गया । बहस होने लगी कि फ्रायड का क्या मतलब है। एक कुछ कहता, दूसरा कुछ कहता, तीसरा और ही कुछ कहता तू-तू मैं-मैं होने लगी। बात यहां तक बढ़ गई कि मारपीट हो जाए, ऐसी संभावना आ गई। फ्रायड ने जोर से टेबल पीटी और कहा -- सज्जन, मैं अभी जिंदा हूं, यह तुम भूल ही गए। मैं मर जाऊं, फिर तो यह गति होगी ही, मुझे पता है; मगर मेरे सामने यह गति कर रहे हो तुम! मैं मौजूद हूं, तुम मुझसे पूछते भी नहीं कि आपका क्या प्रयोजन है कम से कम जब तक मैं मौजूद हूं तब तक तो मुझ से पूछ लो। आपस में ही लड़े जा रहे हो!
परमात्मा सदा मौजूद है, उससे ही पूछो। क्या वेद पुराण कुरान में उलझे हो? जो मोहम्मद के कान में गुनगुना गया, वह तुम्हारे कान में भी गुनगुनाने को राजी है। जो वेद के ऋषियों के हृदय में तरंगें उठा गया, तुम पर उसकी अनुकंपा कुछ कम नहीं है। तुम भी उसके उतने ही हो।
तुम्हारे बीच और अस्तित्व के बीच एक अविरोध लयबद्धता, एक छंद, एक नृत्य का छिड़ जाना सुख है।
मुल्ला नसरुद्दीन पोस्ट-आफिस गया और पोस्ट मास्टर के पास जाकर उसने कहा कि जरा मेरा यह कार्ड लिख दें, पता लिख दें इस पर। पोस्ट मास्टर ने पता लिख दिया।
धन्यवाद!--नसरुद्दीन ने कहा--अब जरा चार पंक्तियां मेरी खैरियत की भी लिख दें। पोस्ट मास्टर ऐसे तो प्रसन्न नहीं था कि वह इस काम के लिए पोस्ट मास्टर नहीं है, लेकिन अब यह बूढ़ा आदमी, अब पता लिख ही दिया, चार पंक्तियां और। किसी तरह झुंझलाते हुए उसने चार पंक्तियां और लिख दीं और फिर पूछा: और कुछ? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा: बस एक पंक्ति और लिख दें, इतना और लिख दें कि गंदे और फूहड़ हैंडराइटिंग के लिए क्षमा करना।
जिसने अपने अनुभव से कहा है, उसका उसके साथ एक तारतम्य है, एक तालमेल है। कोई और वही बिना अनुभव के कहे तो खुशबू चली जाती है ।
चोर-मन
कथा :
किसी मित्र ने ऑस्कर वाइल्ड से पूछा, एक किताब मुझे पढ़ने की जरूरत है। बाजार में मिलती नहीं है, लाइब्रेरियों में मौजूद नहीं। मैंने सुना है कि वह किताब तुम्हारे पास है। वाइल्ड ने कहा, निश्चित। लेकिन मैं दूंगा नहीं। मित्र हैरान हुआ। पुराना संबंध! सिर्फ पढ़ने को किताब मांगता हूं, किताब दोगे नहीं? वाइल्ड ने कहा, उसका कारण है। ये सब किताबें मैंने मांग-मांग कर इकट्ठी की हैं। ये सब चुराई हुई हैं। ये जो हजारों किताबें मेरी लाइब्रेरी में दिखाई पड़ती हैं, मैंने एक भी खरीदी नहीं है। अब तुम मुझसे मत मांगो।
चोर सदा डरा होता है। जो उसने किया है वही उसके साथ हो सकता है।
अफ्रीका में एक जाति है, छोटा सा कबीला है कांगो के किनारे। जिसकी गणित की संख्या में केवल तीन अंक हैं--एक, दो और बहुत। बस! तीन से ज्यादा संख्या नहीं है। एक, दो, बहुत। जब पहली दफा उस कबीले की खोज-बीन हुई तो लोग बड़े हैरान हुए कि तुमने इतने से काम कैसे चला लिया? तीन कुल संख्या! वन, टू एंड मेनी। पर वह जाति रह रही है सदा से। और उस जाति के कुछ लक्षण हैं। वहां चोरी नहीं हुई है आज तक, क्योंकि चोरी के लिए थोड़ा गणित बड़ा चाहिए। वह चोर नहीं है, बेईमान नहीं है, धोखेबाज नहीं है, किसी अदालत की कोई जरूरत नहीं पड़ी है। शांत से शांत कबीला है। गणित ही नहीं है इतना बड़ा कि तुम धोखा दे सको। बड़ा गणित चाहिए तब तुम बड़ा धोखा दे सकते हो। हिसाब चारों तरफ का चाहिए।
लाभ की भाषा में सोचनेवाला व्यक्ति कभी मित्रता की भाषा में नहीं सोच सकता, वह शत्रुता की भाषा में ही सोच रहा है।
बालसेम के घर एक फकीर मेहमान हुआ। उस फकीर की बड़ी ख्याति थी। दूर-दूर तक लोग उसे बड़ा संत मानते थे। जब वह फकीर मेहमान हुआ तो बालसेम ने अपनी पत्नी से कहा कि 'दिस मैन इज ए थीफ।' यह आदमी एक चोर है। पत्नी ने कहा, क्या कह रहे हो? यह आदमी एक महान संत है, चोर नहीं है। बालसेम ने कहा, 'आई टेल यू, ही इज ए थीफ। मैं निश्चित तुम्हें कहता हूं कि चोर है। बिकॉज ही वान्ट्स हेवन ओनली फॉर हिमसेल्फ। क्योंकि वह स्वर्ग को सिर्फ अपने लिए चाहता है; यह चोर है। इसने कभी प्रार्थना बांटी नहीं। यह प्रार्थना को भी ऐसा रखता है जैसे लोग तिजोड़ी में धन को रखते हैं। यह ध्यान को भी ऐसा समझता है जैसे इसकी संपत्ति है; यह चोर है।'
बुद्ध -- जब भी तुम प्रार्थना करो, तो चाहे कभी प्रार्थना चूक जाओ हर्ज नहीं; लेकिन प्रार्थना के बाद अनिवार्य रूप से कहना कि इस प्रार्थना का जो फल है वह सारी पृथ्वी को, सारे प्राणिमात्र को उपलब्ध हो जाये;
एक सड़क पर एक आदमी बर्तन बेच रहा था। जो बर्तन बाजार में दो रुपए में मिलते हैं, वह उनके चार—चार रुपए दाम मांग रहा था। एक ठेले पर जोर से आवाज लगा रहा था कि बिलकुल सस्ते लुटा दिए, चार रुपए में। कोई आ भी नहीं रहा था। तभी अचानक बगल की गली से एक दूसरा आदमी आया एक ठेले पर बर्तन लिए और उसने कहा, क्यों लूट रहे हो लोगों को! चार रुपया? बर्तन तीन रुपए के हैं।
लोग ठहर गए। एक चिल्ला रहा था, चार रुपए! दूसरा कह रहा था कि लूटो मत; बर्तन तीन रुपए के हैं। भीड तीन रुपए वाली दुकान पर लग गई। सब बर्तन थोड़ी ही देर में खाली हो गए। दूसरा चिल्ला रहा है कि तू अपने समव्यवसायी को धोखा दे रहा है। तू क्यों मेरे पीछे पड़ा है? तू क्यों मेरे ग्राहक बिगाड़े दे रहा है?
थोड़ी ही देर बाद जब दूसरे के बर्तन समाप्त हो गए, वह ठेले को लेकर अंदर एक गली में' चला गया। दूसरा भी पहुंचा और उसने कहा, तूने तो कमाल कर दिया भाई। फिर जिसके बर्तन बिलकुल नहीं बिके थे, आधे-आधे फिर उन्होंने ठेले पर रख लिए। वे दोनों सहयोगी हैं, साझेदार हैं। फिर दूसरी सड़क पर वही शुरू हो गया शोरगुल। एक चार रुपए चिल्ला रहा है। दूसरा कह रहा है कि तीन रुपए! मत लूटो लोगों को। वे तीन रुपए वाले बर्तन बिक रहे हैं। बाजार में दाम दो रुपए हैं।
वह जो आपके भीतर चोर है और जो आपके भीतर अचोर है, उन दोनों की conspiracy है, दोनों साझीदार हैं। उनमें से किसी भी एक की आपने सुनी, तो दूसरे के जाल में भी आप गिरे।
यह जरा समझना कठिन है। और यहीं से धर्म की यात्रा शुरू होती है। नीति और धर्म का यही फर्क है।
अगर दूसरे के सुख में सुख होता हो, तो ही दूसरे के दुख में दुख हो सकता है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने बढ़िया सा कपड़ा खरीदा और सूट सिलवाने के लिए दर्जी के पास गया। दर्जी ने कपड़ा लेकर मापा और कुछ सोचते हुए कहा: कपड़ा कम है। इसका एक सूट नहीं बन सकता।
वह दूसरे दर्जी के पास चला गया। उसने माप लेने के बाद कहा: आप दस दिन बाद आइए और सूट ले जाएगा। निश्चित समय पर मुल्ला नसरुद्दीन दर्जी के पास गया। सूट तैयार था। अभी सिलाई के पैसे चुका ही रहा था कि दुकान में दर्जी का पांच वर्षीय लड़का प्रविष्ट हुआ। उस बच्चे ने बिलकुल उसी कपड़े का सूट पहन रखा था, जिसका मुल्ला नसरुद्दीन ने सूट बनवाया था। मुल्ला चौंका। उसने कहा: मामला क्या है? तुमने कपड़ा चुराया है।
थोड़ी सी बहस के बाद दर्जी ने स्वीकार कर लिया। अब मुल्ला नसरुद्दीन पहले दर्जी के पास गया और फुंकराते हुए बोला: तुम तो कहते थे कपड़ा कम है, पर तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी दर्जी ने उसी कपड़े से न केवल मेरा बल्कि अपने लड़के का भी सूट बना लिया।
दर्जी धीरज से सुनता रहा। फिर कुछ सोचते हुए बोला: लड़के की उम्र क्या है। पांच वर्ष।
दर्जी चहक कर बोला: मैं भी कहूं कारण क्या है। श्रीमान मेरे लड़के की उम्र अठारह वर्ष है।
फ्रायड -- अगर दुनिया के लोग चौबीस घंटे के लिए एक बात तय कर लें कि चौबीस घंटे में झूठ बोलेंगे ही नहीं तो उसका कुल परिणाम इतना होगा कि दुनिया में सब दोस्तियां टूट जाएंगी। सब तलाक हो जाएंगे।
एक आदमी ने परमात्मा को पत्र लिखा। पत्नी बीमार थी और सब उपाय कर चुका, कोई उपाय काम न आए। जब कोई उपाय काम न आए तब आदमी परमात्मा का ध्यान करता है। सोचा परमात्मा को ही पत्र लिख दूं। सीधा-सादा आदमी था, लिखा कि पचास रुपये जल्दी भेज दो। मिले परमात्मा को, केयर ऑफ पोस्टमास्टर जनरल। और क्या करें? पोस्टमास्टर जनरल को चिट्ठी मिली; चिट्ठी पढ़ी, उसे भी दया आ गई कि आदमी निश्चित बहुत दुख में होगा। बहुत पीड़ा से लिखी थी कि पत्नी के लिए दवा चाहिए और पचास रुपये अब भेज ही दो! अब बिना पचास रुपये के काम नहीं चलेगा। पोस्टमास्टर ने और मित्रों को आफिस में बताई चिट्ठी, सबने मिल कर चालीस रुपये इकट्ठे किए और कहा कि चलो जितने हुए उतने भेज दो। चालीस रुपये मनीआर्डर से उस आदमी के नाम भेज दिए । लौटती डाक से उस आदमी की चिट्ठी आई कि 'परमात्मा को मिले, केयर ऑफ पोस्टमास्टर जनरल', ... आपने रुपये भेजे सो तो ठीक, मगर दोबारा कभी भी भेजें तो सीधे-सीधे भेजना। क्योंकि इस पोस्टमास्टर जनरल ने दस रुपये अपना कमीशन काट लिया'।
साम्प्रदायिक
कथा :
यहूदियों के पवित्र दिन थे। और एक यहूदी ने अपने को एक अपरिचित गांव में पाया। उस अपरिचित गांव का जो सिनागाग था, जो यहूदियों का मंदिर था, वह दूसरे संप्रदाय का था। वह दूसरे गुरु में मानता था। मगर मजबूरी थी। खुद का गांव बहुत दूर था और खुद के गुरु के पास जाना मुश्किल था। और पवित्र दिन आ ही गया, तो बड़े दुख और पीड़ा से वह इस दूसरे संप्रदाय के सिनागाग में गया। उस सिनागाग का जो रबी था, जो गुरु था, वह बड़ा अनूठा पुरुष था और बड़ा प्रफुल्लचित्त आदमी था। और उसके प्रवचन हंसी के फव्वारे थे। वह न मालूम कितनी कथाएं कहता। और सारा भवन हंसी से लोटपोट हो जाता। सिर्फ यह एक आदमी जो अजनबी था, बिलकुल गंभीरता से बैठा रहा। एक भी बार न हंसा, न प्रफुल्लित हुआ। और सारा भवन हंस रहा है। आखिर उसके पड़ोस के आदमी ने पूछा कि क्या बात है? क्या आप बीमार हैं, या दुखी हैं, या परेशान हैं, या बहरे हैं? उसने कहा, 'न तो मैं बहरा हूं, और न मैं दुखी और परेशान हूं।' 'तो क्या आप समझ नहीं पा रहे हैं कि इतनी आनंदपूर्ण वार्ता चल रही है? आप एक दफा मुस्कुराये भी नहीं।' उसने कहा, 'नहीं, मैं दूसरे गुरु का शिष्य हूं।'
दूसरे आदमी को बड़ी हैरानी हुई। उसने कहा, 'हद्द हो गई! मगर ये बातें ही ऐसी हो रही हैं कि हंसी अनायास आ जाये।' उसने कहा, 'घर जाकर हंस लेंगे, लेकिन यहां नहीं। क्योंकि यह बात जाहिर करेगी कि मैं हंसा, तो मैं सम्मिलित हो गया।'
नहीं, समानांतर रेखायें हम हंसी में भी नहीं तोड़ते। वहां भी हमारे संप्रदाय हैं। हमारा कण-कण संप्रदायों में बंटा है।
अनुमान
कथा :
एक यहूदी मछलियों का व्यापार करता था। और बाजार बड़ा डांवाडोल था। वह एक गाड़ी भरकर मछलियां ले कर बाजार गया गांव से। लेकिन बिक्री न हो सकी। बाजार में बहुत मछलियां थीं और खरीदार न थे। और मछली ऐसी चीज है कि अगर न बिके, तो सड़ जायेगी। उसे ले जाने का कोई प्रयोजन न था। तो वह गांव के बाहर मछलियों को उलटा, गाड़ी को खाली करके उदास, दुखी, अपनी गाड़ी में बैठा सिर झुकाये हुए लौटा। रास्ते में संत सेवासियन का एक छोटा सा मंदिर था। जिसकी छाया में उसने अपनी गाड़ी डाली। मंदिर के अंदर जाकर विश्राम करने को बैठा। संत सेवासियन की मूर्ति थी उस मंदिर में...उदास, सिर लटका हुआ। तो उसने कहा, 'अरे, क्या तुम भी मछलियों के ही धंधे में थे?'
दूसरे के संबंध में अगर अनुमान अपने अनुसार होता है तो वहीं भ्रांति हो जाती है।
अन्धकार
कथा :
एक आदमी एक पहाड़ के रास्ते पर, एक अंधेरी रात में भटक गया। अमावस की रात! हाथ को हाथ न सूझे। बहुत चीख-पुकार मचाई, लेकिन कोई सुनने वाला भी नहीं। टटोल-टटोल कर बढ़ रहा था कि अचानक देखा कि एक गङ्ढे में फिसल गया। पकड़ कर कोई झाड़ी लटक गया। रो रहा है, चिल्ला रहा है, कोई सुनने वाला नहीं। अपनी ही आवाज गूंज कर सुनाई पड़ती है, जो और भयानक मालूम होती है। सुबह बहुत दूर है। रात बड़ी सर्द है। हाथ ठंडे हुए जा रहे हैं। और लगता है कि हाथ धीरे-धीरे, जिस जड़ को पकड़ कर वह लटका है, वह छूट रही है। और हाथ जकड़ते जा रहे हैं, जैसे लकवा लग गया हो। और अब पकड़ने की क्षमता खोती जा रही है।
उसकी कठिनाई हम समझ सकते हैं। वही कठिनाई है साधक की, जो आखिरी घड़ी में आती है। और आखिर में उसने देखा कि हाथ से जड़ें छूटने लगीं। अब हाथ बिलकुल ही ठंडा हो गया, बर्फ जैसा जम गया खून, और अब पकड़ने का कोई उपाय नहीं है। उसने कहा, हे भगवान, गये! हाथ से जड़ छूट गई और उस घाटी में जोर की खिलखिलाहट की हंसी गूंजी। वह आदमी हंस रहा था। हुआ यह था कि नीचे कोई खाई न थी। नाहक इतनी देर कष्ट पाता रहा। नीचे समतल जमीन थी जिस पर वह खड़ा हो गया। लेकिन अंधेरी रात में नीचे खाई दिखाई पड़ती थी, अंधकार था। जिस जड़ के सहारे वह लटका था, उसने ही इतनी देर उसे कष्ट और नर्क में रखा। जैसे ही छूट गई, वह नरक के बाहर हो गया।
ऐसी ही स्थिति है। ध्यान की आखिरी घड़ी में तुम उस जगह आ जाते हो, जहां खाई है अनंत। विचार की आखिरी जड़ों को पकड़ कर तुम अटके हो, लटके हो। तुम चाहते हो किसी तरह बचा लिए जाओ, लौट जाओ। तुम्हारी सारी प्रार्थना इतना ही कहती है कि किसी तरह अपने घर पहुंच जाऊं। अब यह ध्यान इत्यादि की झंझट में दुबारा न पडूंगा।
उस समय ही चाहिए गुरु जो तुम्हें कहे कि छोड़ दो; नीचे सम्हालने को मैं खड़ा हूं। छोड़ दो, नीचे कोई खाई नहीं है, वह तुम्हारे मन की व्याख्या है। मरता हुआ मन तुम्हें खाई दिखला रहा है; डरा हुआ मन तुम्हें मृत्यु दिखला रहा है। वहां अमृत है; वहां समतल भूमि है।
कूदते ही खाई खो जाती है। मगर कूदने के पहले तक वह है; वह बुद्धि का नजरिया है।
गणित
कथा :
एक गणितज्ञ ने होटल खोली। खूबी यह थी कि होटल में सब्जियों के भाव बहुत ज्यादा थे। श्री भोंदूमल जब खाना खाने के लिए आए तो बिल देख कर घबड़ा गए। उन्होंने जाकर होटल मालिक से कहा, हद हो गई भाई! इतनी महंगी सब्जियों की प्लेट! आखिर बात क्या है, इस सब्जी में ऐसी कौन सी चीज है?
दिखता नहीं भोंदूमल जी, इस सब्जी में पचास प्रतिशत फल और पचास प्रतिशत तरकारी का मिश्रण है! फलों के कारण ही यह इतनी महंगी है।
मगर मुझे तो फल का एक टुकड़ा भी दिखाई नहीं दिया!
वह तो मुझे भी दिखाई नहीं देता, गणितज्ञ होटल मालिक बोला, क्योंकि यह सब्जी एक अंगूर और एक कद्दू को मिला कर जो बनाई गई है।
गणित का एक जगत है, वहां एक कद्दू और एक अंगूर एक हो सकते हैं। जीवन गणित नहीं है और न जीवन विज्ञान है।
कार्ल गुस्ताव जुंग -- मैंने हजारों मानसिक रोगियों के निरीक्षण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि बयालीस साल के बाद जो लोग रोगग्रस्त हैं उनका असली रोग मानसिक नहीं है, धार्मिक है। बयालीस साल के हो गए और 'हां' कहने की कला नहीं आई, अभी भी 'नहीं' कहे चले जा रहे हैं -- बचपना है!
एक जहाज डूब रहा था। सारे लोग घबड़ा रहे हैं, परेशान हो रहे हैं, लेकिन एक मारवाड़ी निश्चिंत बैठा हुआ है। आखिर किसी ने कहा कि सेठजी, जहाज डूब रहा है!
तो उस मारवाड़ी ने कहा, तो अपने बाप का क्या डूब रहा है? सरकारी जहाज है, डूबने दो!
गणित तो लोभ की भाषा में सोचता है: अपना क्या है? कल का डूबता आज डूब जाए। लेकिन किसी ने कहा कि यह तो ठीक कह रहे हैं आप कि अपना जहाज नहीं है, मगर जहाज में हम भी डूबेंगे।
मारवाड़ी ने कहा, इंश्योरेंस करवा कर चलता हूं। बीमा करवाया है। तुम जैसा बुद्धू नहीं हूं।
यही मारवाड़ी महात्मा हो जाता है, तब भी इसका हिसाब-किताब जारी रहता है। तब यह सोचता है: इतने व्रत किए, इतने उपवास किए, कितना लाभ मिलेगा? तब भी हिसाब-किताब है।
मन कहता है: थोड़ा और! थोड़ा और! मन जीता है 'और' में; 'और' मन का भोजन है।
एक आदमी मरा। द्वारपाल ने स्वर्ग पर उससे पूछा कि कुछ दान किया है? कुछ पुण्य किया है?
उसने कहा, हां, एक बूढ़ी स्त्री को मैंने तीन पैसे दिए थे।
द्वारपाल मुश्किल में पड़ा--क्या करे, क्या न करे! किताबें खोलीं, बात सच थी, तीन पैसे उसने दिए थे। द्वारपाल ने अपने सहयोगी से कान में पूछा कि अब क्या करें? इसने पुण्य तो किया है, इसको स्वर्ग मिलना चाहिए। मगर कुल तीन पैसे में स्वर्ग पा ले यह, तो बहुत सस्ता हो गया मामला। इसको एकदम नरक भी नहीं भेज सकते, क्योंकि पुण्यात्मा और नरक जाए! तीन ही पैसे का सही पुण्य, लेकिन पुण्यात्मा नरक जाए तो पुण्य पर श्रद्धा उठ जाएगी।
सहयोगी ने कहा, ऐसा करें, इसको तीन पैसे भी दे दें ब्याज सहित और नरक भेजें। और क्या करेंगे? बहुत से बहुत ब्याज ले ले, और क्या करेगा!
गणित से तुम चलोगे, तो ज्यादा से ज्यादा ब्याज पाओगे। जिंदगी से चूक जाओगे।
संत पलटूदास -- मन बनिया बान (आदत) न छोड़ै।
नानक युवा हुए तो माता-पिता चिंतित थे कि वे दिन-रात राम की धुन में लीन, साधु-संग में लगे। पिता ने बहुत समझाया कि एक उम्र होती है साधु-सत्संग की। अभी मैं भी साधु-सत्संग में नहीं पड़ा हूं--पिता ने कहा--और तू पड़ गया! यह कोई वक्त है? अभी जवान है। अभी जिंदगी के मजे ले। अभी जिंदगी की प्रतिष्ठा, सफलता अभियान पर निकल। कुछ धंधा कर, कुछ कमा। ऐसे समय मत गंवा।
पिता ने कहा तो नानक ने कहा, ठीक है, तो कुछ कमाऊंगा।
पिता खुश हुए। बहुत से रुपये देकर भेजा कि पास के बड़े नगर से कंबल खरीद ला; सर्दी के दिन आ रहे हैं, अच्छी बिक्री हो जाएगी। और तेरे लिए कमाई का पहला पाठ हो जाएगा।
नानक रुपये लेकर गए और सात दिन बाद जब वापस आए तो उनकी मस्ती देखने लायक थी, जैसे रुपये दस गुने हो गए हों! आए खाली हाथ, रुपये तो थे ही नहीं, कंबल भी नहीं लाए थे! पूछा पिता ने, क्या हुआ? खुश तो ऐसे नजर आते हो जैसे बहुत कमाई कर ली! क्या कमा कर लाए?
नानक ने कहा, आपकी कृपा से, आपके आशीष से खूब कमाई हुई। कंबल लेकर आ रहा था, रास्ते में साधुओं की एक जमात मिल गई। सर्दी आ गई है। साधु बिना कंबलों के थे। बांट दिए कंबल। दिन दो दिन खूब सत्संग भी चला और चित्त प्रसन्न हुआ। उन सबको कंबलों में सर्दी से बचते हुए देख कर ऐसा आनंद हुआ जैसा कभी न हुआ था। कमा कर आ रहा हूं, आनंद कमा कर आ रहा हूं, उत्सव कमा कर आ रहा हूं।
बाप ने सिर पीट लिया। बाप का गणित बनिए का था। बेटे का गणित कुछ और था। बाप ने कमाई से कुछ और चाहा था, बेटा कमाई से कुछ और समझा था। बाप बाहर की कमाई की बात कर रहा था, बेटा भीतर की कमाई करके लौटा था।
ऐसे बहुत प्रयास किए, सब व्यर्थ गए। फिर आखिर सोचा--दुकानदारी इससे न हो सकेगी, नौकरी लगा देनी चाहिए। गांव के ही सूबेदार के यहां नौकरी लगा दी। सूबेदार को भी नानक के बाप ने कहा, ध्यान रखना इसका। कोई बहुत जिम्मेवारी का काम देकर मत भेज देना। और रुपये तो इसके हाथ में देना ही मत, नहीं तो यह कुछ कमा कर आ जाएगा जो हमारे लिए तो गंवाना है और यह समझता है कमाना है। हमारा-इसका गणित बैठता नहीं। तो मैं आपको पहले सावधान कर दूं, नहीं तो पीछे मैं झंझट में पडूंगा कि कहां का बेटा हमें लाकर दे दिया!
स्वस्थ था, सुंदर था, प्रतिभाशाली था; सूबेदार ने रख लिया। उसने काम भी ऐसा दिया कि जिसमें कुछ गंवाने का सवाल ही नहीं था। उसके सिपाही थे बहुत, उनको रोज भोजन के लिए गेहूं, चावल, दाल तौल कर देने पड़ते थे। सूबेदार ने नानक को कहा कि तू यही काम कर। बस इनको तौल कर दे दिए। ये जो पर्ची लाएं कि किसको कितना पसेरी चावल चाहिए, किसको कितना पसेरी गेहूं चाहिए, उतना तौल कर दे देना और इनकी चिट्ठियां रखते जाना। तुझे चिंता भी नहीं कोई; न कम देना है, न ज्यादा; न पैसा लेना है।
नानक ने काम शुरू कर दिया, लेकिन दूसरे ही दिन गड़बड़ हो गई। एक दिन भी कैसे ठीक चल गया, यह भी आश्चर्य है। पहले दिन तो ठीक चला। पिता भी खुश थे जब नानक घर लौटे, कुछ गड़बड़ न हुई थी। सूबेदार ने भी खबर भेजी: निश्चिंत रहो, बेटा होशियार है। और ठीक से काम किया। व्यवस्थित काम किया। पर दूसरे दिन ही सब गड़बड़ हो गया। तौलते थे। पहले दिन गड़बड़ नहीं हुई, उसका कारण केवल इतना था कि किसी को केवल पांच पसेरी चाहिए था, किसी को छह पसेरी, किसी को सात पसेरी, किसी को दस पसेरी। दूसरे दिन सिपाहियों की एक टुकड़ी को बीस पसेरी चावल चाहिए था। बस वहीं गड़बड़ हो गई। नानक ने तौला। हिंदी में तो शब्द तेरह है, पंजाबी में शब्द है तेरा। बस वह "तेरा' में उपद्रव हो गया। आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह तक सब ठीक रहा और जब तेरा आया, बस ईश्वर की याद आ गई, उसकी याद आ गई। 'तेरा' शब्द और बस नानक ने सुध-बुध खो दी। लोगों के हिसाब से सुध-बुध खो दी, अपने हिसाब से तो सुध-बुध पा ली। बस फिर पसेरी पर पसेरी भरते गए। और 'तेरा' से आगे तो कुछ है ही नहीं संख्या। 'तेरा' आ गया तो अब इसके आगे और क्या! चौदह आया ही नहीं। सिपाही भी चौंके, वे तौले ही जाते हैं--और 'तेरा!' सुबह से सांझ हो गई, भीड़ लग गई। अंततः सूबेदार को खबर पहुंची कि वह तुम्हारा सारा भंडार लुटाए दे रहा है और तेरा पर अटका है। कहां के आदमी को रखा है! मालूम होता है उसे इससे ज्यादा संख्या नहीं आती, चौदह नहीं आता उसे, पंद्रह नहीं आता उसे। कल तो सब ठीक चला, क्योंकि तेरह के नीचे की संख्याएं थीं, आज सब गड़बड़ हो गई।
लोग यही समझे कि इसे गणित नहीं आता। इसे कोई और गणित आता था। इसे पारलौकिक गणित आता था। इसे तो 'तेरा' शब्द ने ही रूपांतरित कर दिया। इसकी तो भाव-दशा बदल गई। यह तो एक मस्ती से भर गया। और हर बार कहे 'तेरा' और हर बार डाले अनाज और हर बार उसकी मस्ती बढ़ती जाए। सांझ जब सूबेदार आया, वह 'तेरा' का काम चल रहा था, सारा गांव इकट्ठा हो गया था। किसी की हिम्मत भी न पड़ रही थी कि नानक को रोके। उन क्षणों में नानक की आभा ऐसी मालूम हो रही थी, बल ऐसा मालूम हो रहा था। न कोई थकान थी, दिन भर तौलते रहे--एक अपूर्व ऊर्जा थी, एक अदभुत नृत्य था! सूबेदार भी खड़ा रह गया। यह 'तेरा' की धुन प्रार्थना बन गई थी। यह मंत्र था। यह मंत्र किसी शास्त्र से उधार नहीं लिया था, यह आविष्कृत हुआ था। यह अपना था, यह अपने प्राणों से आया था।
सूबेदार चरणों में गिर पड़ा। उसने कहा कि मैं देख सकता हूं। मैं कोई बनिया नहीं हूं। तेरा पिता नहीं देख सकेगा। मैं क्षत्रिय हूं। मैं देख सकता हूं, क्या तुझे घट रहा है! लेकिन हमारे काम का तू नहीं है, तू उसके ही काम का है, तू उसके ही काम में लग! मैं तेरे पैर छूता हूं, क्योंकि जो आज मैंने तुझमें देखा है, किसी में कभी नहीं देखा। जो ज्योति आज तुझमें झलकी है, वह मैंने कभी किसी में नहीं देखी। बड़े फकीर देखे, बड़े संत-महात्मा देखे, मगर सब उधार। तू नगद है। और तेरा यह स्वर, 'तेरा' की तेरी यह पुकार, इससे बड़ा कोई महामंत्र नहीं हो सकता। पर हमारे किसी काम न आएगा, हम तो बरबाद हो जाएंगे। ऐसे तूने अगर तौला तो हम तो कहीं के न रहेंगे; हमें इस दुनिया में रहना है।
जो लेकर जाना है, उसे छोड़ रहा है !
जो यहीं रह जाना है, उसे जोड़ रहा है !!
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी गाड़ी में बैठा हार्न पर हार्न बजा रहा था। देर हुई जा रही है, समय निकला जा रहा है, ट्रेन पकड़नी है--और पत्नी है कि उतर नहीं रही है ऊपर से! जब उसका हार्न पर हार्न बजना सुना तो उसकी पत्नी खिड़की से झांकी और कहा कि सुनो जी, एक घंटे से कह रही हूं कि एक मिनट में आती हूं! लेकिन बस लगे हो हार्न पर हार्न बजाने में।
शरीर जितना घूमता रहे उतना स्वस्थ रहता है; मन जितना स्थिर रहे उतना स्वस्थ रहता है ।
चंदूलाल ने एक भिखारी को देखा। भिखारी बोला: 'मालिक! ऐ मालिक!! जो दे दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला।' चंदूलाल जा रहे थे किसी जरूरी काम से। सोचते थे अगर भला हो जाए तो अच्छा। काम ही ऐसा था कि एक दफा हो जाए तो बस जिंदगी भर के लिए निपट गए। भिखारी से बोले : 'क्यों भई, अगर मैं तुम्हीं पांच रुपए दे दूं और फिर वापिस ले लूं तो मेरा क्या होगा? दे तो सकते नहीं, पांच रुपए छोड़ तो सकते नहीं। मगर वह जो उसने कहा, "जो दे उसका भी भला, और जो न दे उसका भी भला', तो सोचा दोहरे भले मुफ्त हो जाएं। पांच रुपए पहले दे दें, सो भला; और फिर पांच रुपए ले लें, सो भला! दोहरा भला छोड़ने की हिम्मत चंदूलाल की भी न पड़ी। भिखारी भी मारवाड़ियों के गणित जानता है। भिखारियों को भी मामला चौबीस घंटे मारवाड़ियों से पड़ता है। भिखारी ने कहा: 'सेठ जी, पहले आपको लाटरी खुलेगी।' 'अरे' -- चंदूलाल ने कहा -- 'गजब कर दिया, गजब कर दिया! तू भिखारी नहीं है, ज्योतिषी है ज्योतिषी! मैं लाटरी की ही टिकिट खरीदने तो जा रहा हूं। लेकिन दूसरी बात भी बात दे कि फिर जब पांच रुपये वापिस ले लूंगा तो क्या होगा?' तो उसने कहा: 'पहले तो लाटरी खुलेगी और फिर आपका हार्टफेल हो जाएगा।' चंदूलाल ने कहा: 'पहला भला तो मेरी समझ में आया, दूसरा भला?' उसने कहा: 'दूसरा भला तो अंतिम भला है--आवागमन से छुटकारा! फिर इस दुखसागर में, भवसागर में नहीं आना पड़ेगा।'
हेरोडोटस पहला आदमी था जिसने औसत का सिद्धांत खोजा। स्वभावतः जब उसने स्वयं सिद्धांत खोजा था, तो वह चैबीस घंटे औसत के सिद्धांत में उलझा रहता था। हर चीज में औसत निकालता रहता। पिकनिक को गया था पत्नी-बच्चों को लेकर, एक छोटे-से नाले को पार करना पड़ा, मौका चूका नहीं वह..पंडित मौके चूकते भी नहीं। पत्नी ने कहा कि बच्चों को सम्हालो नदी से, हाथ पकड़ लो, उसने कहा, तू रुक, तूने समझा क्या है? अरे, मैं हेरोडोटस, जिसने औसत का सिद्धांत खोजा! अभी निकालता हूं औसत बच्चों की ऊंचाई और औसत नदी की गहराई। जल्दी से..फुटा तो वह अपने साथ ही रखता था..बच्चे नापे, पांच-सात जगह जाकर नदी को नापा, रेत पर बैठ कर हिसाब लगाया, रेत पर ही लिख कर गणित किया और उसने कहा, बेफिक्र रहो, बच्चों की औसत ऊंचाई नदी की औसत गहराई से ज्यादा है; कोई चिंता की बात नहीं। अब पति कहे, तो पति तो परमात्मा है...और फिर हेरोडोटस जैसा ज्ञानी पति...पत्नी ने कहा: जब कहते हो तो ठीक है। हालांकि पत्नी को थोड़ा संदेह था। पत्नियां जल्दी से इस तरह सिद्धांत वगैरह मानती नहीं। मगर अब मजबूरी थी कि ठीक है!
पांच-छह बच्चे, आगे-आगे हेरोडोटस चला अपना फुटा लेकर, बीच में बच्चे चले, पीछे पत्नी चली..कुछ बच्चे बीच-बीच में डुबकी खाने लगे। पत्नी ने कहा कि बच्चे डुबकी खा रहे हैं, भाड़ में जाए तुम्हारा औसत का सिद्धांत, बच्चों को बचाओ! मगर हेरोडोटस ने बच्चों को नहीं बचाया, वह भागा, उसने कहा तो फिर गणित में कोई गलती हुई होगी। पंडित तो पंडित। किसी तरह पत्नी ने बच्चों को पकड़ा, किसी तरह बचाया। हेरोडोटस तो फिर अपना हिसाब रेत पर लगाने लगा था। कहीं कुछ भूल होनी चाहिए, नहीं तो यह हो ही कैसे सकता है!
पश्चिम से एक यात्री आया हुआ था, उसने कहा कि मैंने सुना कि आपके देश में शिक्षा सौ प्रतिशत बढ़ गई है। इतनी शीघ्रता से इतना विकास कैसे हुआ? जिस अधिकारी से उसने कहा था, उसने कहा: आओ, हम दिखाते हैं। वह पास के गांव में ले गया। वह यात्री तो बड़ा हैरान हुआ, वहां केवल एक शिक्षक था और दो विद्यार्थी, उसने कहा, हम कुछ समझे नहीं। उसने कहा कि क्रांति के पहले एक ही विद्यार्थी था, अब दो विद्यार्थी हैं। शिक्षा एकदम दुगुनी हो गई है।
अप्राप्यकारी
कथा :
रसायनशास्त्र के नये-नये अध्यापक चेलाराम ने पूछा, KCN क्या है? एक छोटा सा बच्चा खड़ा हुआ, उसने कहा मास्टर जी, बिलकुल जबान पर ही रखा है। चेलाराम चिल्लाए, अरे थूक इसी वक्त थूक! जल्दी थूक! नहीं तो मर जाएगा। वह पोटैशियम साइनाइड है।
ज्ञान नेत्र की तरह अप्राप्यकारी है, जैसे आग को देखने से जलाते नहीं हैं, उसी प्रकार आग का ज्ञान जलाता नहीं है ।
औपचारिक
कथा :
मुल्ला नसरुद्दीन अमरीका जाने की तैयारी कर रहा था। बहुत दिन हो गए, एक दिन पता चला कि अस्पताल में भर्ती किया गया है, कई फ्रैक्चर हो गए हैं! मैं उसे देखने गया। पट्टियां ही पट्टियां बंधी हैं- मुंह पर, चेहरे पर, खोपड़ी पर, हाथ में, पैर में! मैंने कहा नसरुद्दीन हुआ क्या? उसने कहा ऐसी की तैसी अमरीका की! मैंने कहा - अमरीका का इसमें क्या लेना-देना है? अभी तो तुम गए ही नहीं! उसने कहा अरे बिना गए ही यह हालत हो गई। मैं अमरीका जाने का अभ्यास कर रहा था कि वहां क्या-क्या नियम, क्या-क्या विधियां-पता चला कि वहां दाएं चलना पड़ता है, सो कार दाएं चला रहा था, कि अभ्यास तो कर लूं! चम्मच-छुरी से खाने का अभ्यास कर रहा था। और सब तो ठीक रहा, यह दाएं चलाना कार झंझट आ गई। आ गई बस एक और बस बच गए, इतना ही बहुत है!
अमरीका में कोई गड़बड़ नहीं हो रही। सभी लोग उसी नियम को मान कर चल रहे हैं, तो वह नियम कारगर हो जाता है। बाएं सब लोग मान कर चलते हैं तो बाएं चलना ठीक हो जाता है, दाएं मान कर चलते हैं तो दाएं चलना ठीक हो जाता है। मगर कोई एक नियम मान कर चलना होता है। यह नियम केवल औपचारिक है। इन नियमों की कोई शाश्वतता नहीं है। उसी समय, उसी स्थान के लिए है। इनमें कोई पारमार्थिक तत्त्व नहीं है, कोई पारलौकिक तत्व नहीं है -- कामचलाऊ हैं, व्यावहारिक हैं।
जैसे—जैसे तुम्हारा ध्यान गहरा होगा वैसे-वैसे तुम पाओगे बाहर और भीतर दोनों तरफ जीने का मजा आने लगा; बाहर-भीतर दोनों समान हो गए; तुम तीसरे हो गए; तुम दोनों से मुक्त हो गए, दोनों से अतिक्रमित हो गया तुम्हारा व्यक्तित्व, अतिक्रमण हो गया; तुम दोनों के पार हो गए। तुम देखोगे अपने को कभी बाहर के अभिनय के जगत में और कभी देखोगे भीतर की परम शांति में, मगर तुम जानोगे न तो मैं बाहर हूं न मैं भीतर हूं; मैं दोनों हूं और दोनों के पार भी।
अंतर्जगत भी सत्य है - उतना ही जितना बहिर्जगत सत्य है, जरा भी कम-ज्यादा सत्य नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर लखनऊ से मियां बदरुद्दीन मेहमान बन कर रुके। सुबह दोनों को एक साथ पाखाना जाने का हुआ। तहजीब के अनुसार नसरुद्दीन ने कहा, पहले आप!
बदरुद्दीन कैसे पीछे रहते। वे बोले, जी नहीं, पहले आप।
मुल्ला बोले, जी नहीं, पहले आप!
लेकिन बदरुद्दीन बोले, अजी नहीं मियां, पहले आप।
तो नसरुद्दीन ने बड़े इत्मीनान से कहा, मियां, हमारा तो यहीं हो गया। अब आप ही जाइए।
औपचारिकताएं--पहले आप! पहले आप! किसी को प्रयोजन नहीं है, लेकिन चलती हुई बातें हैं, सदा से मानी जाती रही हैं, उस ढंग से ही चलना चाहिए।
आसुरी वृत्ति
कथा :
चंगेज खां निकले आपके गांव से, तो मुश्किल है कि आप न देख पाएं। क्योंकि घटनाएं बहुत भौतिक, मैटीरियल घटेंगी। चंगेज खां जिस गांव से निकलता, उस गांव के सारे बच्चों को कटवा डालता। भालों पर बच्चों के सिर लगवा देता। और जब चंगेज खां से किसी ने पूछा कि तुम क्या कर रहे हो? दस-दस हजार बच्चे भालों पर लटके हैं! तो चंगेज खां ने हंसकर कहा कि लोगों को पता होना चाहिए कि चंगेज खां निकल रहा है।
फ्रायड -- लोग तय पहले कर लेते हैं, तर्क बाद में खोजते हैं।
नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा है..। उसने कुछ कानून बनाए फिर उनको बदल दिया, फिर बदल दिया। तो उसके राजमत्रियों ने कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं! कानून थिर होना चाहिए। और इस तरह तो अराजकता हो जाएगी। तो नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा, I am the law -- और कोई कानून नहीं है, मैं कानून हूं। जो मुझसे निकलता है, वह कानून है। कोई कानून मेरे ऊपर नहीं है, मैं ही कानून हूं।
यही आसुरी संपदा वाले का प्राथमिक लक्षण है, मैं श्रेष्ठ हूं। और धन और मान के मद से युक्त हुए..।
फ्रायड -- प्रत्येक व्यक्ति अंधे की तरह जीता है और सिद्ध करने को कि मैं अंधा नहीं हूं कारणों की तजवीज करता है। उनको उसने rationalization कहा है। फिर उनको वह बुद्धि-युक्त ठहराता है।
हमारा जीवन हमें इतना मूल्यवान होता है मालूम कि अगर सबकी मृत्यु भी उसके लिए घट जाए तो भी कोई हर्ज नहीं। अगर हमें दूसरों के सिरों पर पैर रखकर, सीढ़ियां बनाकर राजमहल तक पहुंचने का उपाय हो, तो हम लोगों के सिरों का उपयोग सीढ़ियों की तरह करेंगे। सभी महत्वाकांक्षी करते हैं। लोग उनके लिए सीढियों से ज्यादा नहीं हैं। धन की यात्रा करता हो कोई, पद की यात्रा करता हो, लोगों का उपयोग करता है सीढ़ियों की तरह। सभी राजनीतिज्ञ जानते हैं। राजनीतिज्ञों के सबसे बड़े दार्शनिक मेक्यावेली ने लिखा है कि तुम जिस आदमी का सीढ़ी की तरह उपयोग करो, उपयोग करने के बाद उसे जिंदा मत छोड़ना। उसको काट—पीट डालना। क्योंकि तुम उसका सीढ़ी की तरह उपयोग कर सके हो, दूसरे भी उसका सीढ़ी की तरह उपयोग कर सकते हैं।
वह जो आसुरी संपदा का व्यक्ति है, अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोधादि के परायण हुआ, दूसरों की निंदा करने वाला, दूसरों के शरीर में मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाला है।
एक सूफी फकीर के पास दो युवक गए। वे साधना में उत्सुक थे और सत्य की खोज करना चाहते थे। उस फकीर ने कहा, सत्य और साधना थोड़े दिन बाद, अभी मुझे कुछ और दूसरा काम तुमसे लेना है। लकड़ी चुक गई हैं आश्रम की, तो तुम दोनों जंगल चले जाओ और लकड़ियां इकट्ठी कर लो। और अलग— अलग ढेर लगाना। क्योंकि तुम्हारी लकड़ी का ढेर केवल लकड़ी का ढेर नहीं है, उससे मुझे कुछ और परीक्षा भी करनी है। तो दोनों युवक गए; उन्होंने लकड़ी के दो ढेर लगाए। फिर गुरु सात दिन बाद आया, तो उसने पहले युवक के लकड़ी के ढेर में आग लगाने की कोशिश की। सांझ तक परेशान हो गया। आंखों से आंसू बहने लगे। धुआं ही धुआं निकला, आग न लगी। सब लकड़िया गीली थीं। शिष्य ने क्या कहा गुरु को? कि मैं चला। जब तुमसे लकड़ी में आग लगाना नहीं आता, तो तुम मुझे क्या बदलोगे!
दूसरे युवक की लकड़ियों में गुरु ने आग लगाई; लकड़िया भभककर जल गईं। सूखी लकड़ियां थीं। दूसरा युवक भी पहली घटना देख रहा था।
और पहला युवक छोड्कर जा चुका था, और जाकर उसने गांव में प्रचार करना शुरू कर दिया था कि यह आदमी बिलकुल बेकार है। एक तो हमारे सात दिन खराब किए लकड़ी इकट्ठी करवाईं। हम गए थे सत्य को खोजने! इसमें कोई तुक नहीं है, संगति नहीं है। फिर हमने पसीना बहा—बहाकर, खून—पसीना करके लकड़ियां इकट्ठी कीं। और इस आदमी को आग लगाना नहीं आता। तो उसने लकड़ियां भी खराब कीं, धुआं पैदा किया, हमारी तक आंखें खराब हुईं। और यह आदमी किसी योग्य नहीं है। भूलकर कोई दुबारा इसकी तरफ न जाए।
दूसरा युवक भी यह देख रहा था कि पहला युवक जा चुका है। दूसरे युवक की लकड़ियां जब भभककर जलने लगीं, तो उसने कहा कि बस, ठहरो। यह मत समझ लेना कि बड़े अकलमंद हो तुम। लकड़ियां सूखी थीं, इसलिए जल रही हैं, इसमें तुम्हारी कोई कुशलता नहीं है। और मैं चला। अगर तुम इसको अपना ज्ञान समझ रहे हो कि सूखी लकड़ियों को जला दिया तो कोई बहुत बड़ी बात कर ली, तो तुम से अब सीखने को क्या है!
दोनों युवक चले गए। गुरु मुस्कुराता हुआ वापस लौट आया। आश्रम में लोगों ने उससे पूछा, क्या हुआ? तो उसने कहा, जो होना था ठीक उससे उलटा हुआ। पहला युवक अगर कहता कि लकड़ियां गीली हैं, मैं गीला हूं इसलिए तुम्हें जलाने में इतनी कठिनाई हो रही है, तो उसका रास्ता खुल जाता। दूसरा युवक अगर कहता कि तुम्हारी कृपा है कि मेरी लकड़ियों में आग लग गई, तो उसका रास्ता खुल जाता। लेकिन दोनों ने रास्ते बंद कर लिए। और अब दोनों जाकर प्रचार कर रहे हैं; दोनों ने धारणा बना ली, अब दोनों उसके लिए तर्क जुटा रहे हैं। मुझसे उन्होंने पूछा नहीं। मेरी तरफ देखा नहीं। मैं क्या कर रहा था, मेरा क्या प्रयोजन था, इसकी उन्होंने कोई खोज न की। सतह से कुछ बातें लेकर वे जा चुके हैं।
आप भी, जहां भी आपको दूसरे को श्रेष्ठ मानना पड़ता है, वहा बड़ी अड़चन आती है। दूसरे को अपने से नीचा मानना बिलकुल सुगम है।
परमात्मा का अर्थ ही वह महानियम है जो इस जीवन को चला रहा है। उसे हम कर्म का नियम कहें, या परमात्मा कहें, एक ही बात है।
परमात्मा एक व्यवस्था है, व्यक्ति नहीं। आग में कोई आदमी हाथ डाले, तो आग जलाएगी। आग जलाने को उत्सुक नहीं है। आग इस आदमी को जलाने के लिए पीछे नहीं दौड़ती। लेकिन यह आदमी आग में हाथ डालता है, तो आग जलाती है। क्योंकि आग का स्वभाव जलाना है, वह उसका नियम है। अगर हम आग से पूछें, तो वह कहेगी, जो मुझमें हाथ डालेगा, उसे मैं जलाऊंगी। आग चूंकि बोलती नहीं, इसलिए हमें खयाल में नहीं है। जगत के नियम को समझकर उसके अनुकूल चलने का नाम धर्म है।
नियम शाश्वत है, सनातन है; आपकी ऊर्जा शाश्वत है, सनातन है; ये दोनों समानांतर हैं। इन दोनों के बीच में एक और तत्व है, आपका चुनाव, इस ऊर्जा को नियम के अनुकूल बहाना या नियम के प्रतिकूल बहाना।
मुल्ला नसरुद्दीन एक नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया था। इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी ने उससे कहा कि नसरुद्दीन, बताओ तो जरा कि रेडियो का आविष्कार किसने किया था?
नसरुद्दीन ने बहुत सोचा, बहुत सोचा, बहुत सिर मारा और फिर कहा, पता नहीं महानुभाव।
अधिकारी ने कहा, अच्छा चलो यही बताओ कि पेनिसिलीन का आविष्कारक कौन है?
मुल्ला नसरुद्दीन सिर झुका कर खड़ा हो गया सो खड़ा ही रहा। मिनट पर मिनट बीतने लगे। आधा घंटा जब बीत गया तो उस अधिकारी ने कहा कि कुछ बोलोगे या नहीं? चलो छोड़ो इसे, मैं दूसरे प्रश्न पूछता हूं। उसने और दो-चार प्रश्न पूछे, लेकिन हर प्रश्न के उत्तर में या तो उसने कहा कि मुझे पता नहीं और या वह सिर झुका कर खड़ा हो जाए तो सिर ऊपर ही न उठाए। आखिर अधिकारी क्रोध में आ गया। उसने कहा, अरे नसरुद्दीन के बच्चे, मैं जब भी तुझसे कुछ पूछता हूं तो या तो तू कहता है कि मालूम नहीं या फिर चुपचाप खड़ा हो जाता है तो बोलता ही नहीं! तेरे दिमाग में बिलकुल गोबर भरा है।
अब नसरुद्दीन बोला। बड़ी शांत, गंभीर, प्रभावशाली वाणी में उसने कहा, महानुभाव, यदि मेरे दिमाग में गोबर भरा है तो आप उसे चाट क्यों रहे हैं?
सोऊ बैरी होत है, जाकौ दीजै प्रीत। जिसको तुम प्रेम करोगे वही तुम्हारा शोषण करेगा।
बर्नार्ड शॉ से किसी ने एक बार पूछा...सुबह-सुबह थी, सर्द सुबह और बर्नार्ड शॉ बगीचे में घूमने गया है, दोनों हाथ अपने पैंट की जेबों में डाले हुए। किसी ने पूछा बर्नार्ड शॉ से कि क्या कोई आदमी जिंदगी पैंट के खीसों में हाथ डाले-डाले गुजार सकता है?
बर्नार्ड शॉ ने कहा, हां, गुजार सकता है; सिर्फ एक बात का खयाल होना चाहिए--हाथ अपने और जेब दूसरे की। बस इतना खयाल रहे, फिर कोई अड़चन नहीं है।
जब तक दूसरों को प्रभावित करने की चाहत है, समझो.....अहंकार में हो ।
प्रत्यक्ष-बाधित
कथा :
मुल्ला कॉफी हाउस में बैठा था। मित्रों ने जोश चढ़ा दिया कि 'मुल्ला, तुम सदा डींग मारते हो-अपनी दान की, दया की। मगर कभी भोजन तक के लिए हमें घर नहीं बुलाया!'
मुल्ला ने कहा, 'सभी चलो, उठो। पूरा कॉफी-घर चले।'
तीस-पैंतीस आदमियों का जत्था मुल्ला के साथ हो लिया।
पहले तो मुल्ला अकड़ा रहा, लेकिन जैसे-जैसे घर करीब आया...। जैसे सभी की अकड़ घर के करीब कम हो जाती है, उसकी भी होने लगी।
दरवाजे पर उसने कहा, 'भाइयों, चुपचाप रहो। पहले...। अब तुम तो जानते ही हो; सब घर-द्वार वाले हो; तुम्हारी भी पत्नी है। तुम समझते ही हो, पत्नियों का मामला। मैं जरा अंदर जाकर उसे राजी कर लूं। अचानक पैंतीस आदमी देख कर एकदम बिफर जाएगी!'
सबकी समझ में बात आई। उन्होंने कहा, 'हम रुकते हैं; अंदर जाकर तुम समझा-बुझा लो।'
मुल्ला अंदर गया, सो बाहर निकला न। घड़ी बीती, दो घड़ी बीती। आखिर लोगों ने दरवाजा पीटा।
मुल्ला ने अपनी पत्नी से कहा कि 'मुझसे भूल हो गई, बड़ी भूल हो गई। कह गया जोश में, तेरी याद न रही। तू जाकर उनको कह दे कि मुल्ला घर में नहीं है।' पत्नी ने कहा, 'वे मानेंगे? ' उसने कहा, 'तू फिकर न कर। तू कहना कि वे घर में हैं ही नहीं। जिद्द पड़ जाना कि हैं ही नहीं घर में। बात खतम।'
पत्नी बाहर आई, उसने लोगों से पूछा -- 'क्या चाहते हो? ' उन्होंने कहा कि 'मुल्ला नसरुद्दीन...!' पत्नी ने कहा, 'वे तो घर में हैं ही नहीं। वे तो आज दिन भर से घर में नहीं हैं।'
लोगों ने कहा, 'अरे! यह भी खूब रही! हमने अपनी आंखों से उन्हें भीतर जाते देखा। हमारे साथ ही आए, हमको लिवा कर आए। अभी बाहर भी नहीं निकले।'
वे पत्नी से वाद-विवाद करने लगे। अब अपनी पत्नी हो तो आदमी वाद-विवाद नहीं करता; दूसरे की पत्नी में क्या अड़चन! वे वाद-विवाद करने लगे। उन्होंने कहा, 'नहीं, वह घर में होना ही चाहिए। यह तो धोखा-धड़ी हो रही है। वह हमको निमंत्रण देकर आए कि भोजन आज यहीं होगा। और हम अपने घर भी नहीं गए। अब तो आधी रात भी हुई जा रही है, हम भूखे भी हैं।'
मुल्ला ने देखा कि विवाद बढ़ता जा रहा है; पत्नी हारती सी लगती है; कुछ झेंपती सी लगती है कि अब क्या करें। तो मुल्ला एकदम ऊपर की खिड़की खोल कर नीचे झांका और कहा कि 'जब हजार दफे वह कह रही है कि वे घर में नहीं हैं, तो नहीं होंगे। तुम्हें शर्म नहीं आती पराई स्त्री से विवाद करते? मेरी स्त्री कभी झूठ नहीं बोलती। फिर यह भी हो सकता है कि वह बाहर के दरवाजे से आए हों और पीछे के दरवाजे से चले गए हों!'
रात के घुप्प अन्धेरे में जो एकाएक जागता है
और दूर सागर की घुरघुराहट-जैसी चुप्पी सुनता है
वह निपट अकेला होता है।
अन्धकार में जागनेवाले सभी अकेले होते हैं।